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70 साल बाद भी शहर न बन सका लूणकरनसर Featured

अनुराग हर्ष. बीकानेर
कुछ नहरी और कुछ बारानी ग्रामीण क्षेत्र लूणकरनसर विधानसभा क्षेत्र आजादी के बाद से विकास के लिए तरस रहा है। अगर आप बीकानेर से होते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग से श्रीगंगानगर की तरफ जा रहे हैं तो लूणकरनसर कस्बा अपनी उपस्थिति एक पिछड़े कस्बे के रूप में दर्ज कराता है। कभी बाढ़ की चपेट में आए इस विधानसभा क्षेत्र के अभी विधायक मानिकचंद सुराना एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ है जबकि इससे पहले गृह राज्य मंत्री रहे वीरेंद्र बेनीवाल थे। इसके बाद भी क्षेत्र विकास को तरस रहा है। काफी लंबे-चौड़े क्षेत्र में फैले लूणकरनसर विधानसभा क्षेत्र में कृषि ही सबसे बड़ा आय स्रोत है, लेकिन कभी पानी का संकट और कभी इंद्रदेव की मेहरबानी नहीं होने से किसान परेशान ही रहा। ऋण माफी के नाम पर किसानों के साथ सिर्फ और सिर्फ धोखा ही हुआ।
कभी भाजपा, कभी कांग्रेस
लूणकरनसर विधानसभा के मतदाता कांग्रेस और भाजपा के दोनों के साथ रहे है। यहां प्रदेश के दो बड़े नेता निकले हैं। दोनों ही सैद्धांतिक राजनीति के लिए पहचान रखते हैं। पहले भीमसेन चौधरी और दूसरे मानिकचंद सुराना। चौधरी जहां कांग्रेस से विधायक बने, वहीं सुराना कभी अपनी पार्टी से तो कभी भाजपा से। अब वो निर्दलीय विधायक है। इस बीच चौधरी के पुत्र वीरेंद्र बेनीवाल उपचुनाव तो हारे लेकिन बाद में मुख्य चुनाव में जीत गए। गृह राज्यमंत्री भी बने।
सरकार से नाराजगी
कस्बे के लोग एक बार फिर सरकार से नाराज है। कारण साफ है कि क्षेत्र के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं रखी गई। कांग्रेस और भाजपा दोनों यहां की सत्ता से बाहर है, दोनों ने पिछले पांच वर्ष में मुद्दे तो उठाए। भाजपा प्रत्याशी रहे सुमित गोदारा काफी सक्रिय नजर आए, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी रहे वीरेंद्र बेनीवाल भी क्षेत्र में कभी कभार ही नजर आए। हालांकि चुनाव नजदीक आते ही सभी पूर्व प्रत्याशी और नए दावेदारों की गतिविधियां बढ़ गई है।
थोड़ा मिला, ज्यादा की जरूरत
पिछले पांच साल में निर्दलीय होते हुए भी सरकार के नजदीक रहे मानिकचंद सुराना ने लूणकरनसर के लिए कुछ करने का प्रयास किया है। इसके बाद भी महाविद्यालय शिक्षकों का अभाव और स्कूलों में रोज बदलते शिक्षकों से शिक्षण व्यवस्था चौपट है। नहर में कम पानी और कृषि कुओं के कनेक्शन कभी राहत देते नजर आते हैं तो कभी परेशान करते।
यह हैं मुख्य दावेदार
भाजपा से एक बार फिर मानिक चंद सुराना दावेदारी कर सकते हैं जबकि सुमित गोदारा पूरे पांच साल से इसी काम में जुटे हुए हैं। युवा चेहरे के रूप में भाजयुमो अध्यक्ष भागीरथ मूंड भी यहां से मजबूत दावेदारी कर रहे हैं। वहीं कुछ अन्य नेता भी कोशिश में जुटे हुए हैं। लूणकरनसर में जातिगत आधार है, ऐसे में जाट और ब्राह्मण दोनों टिकट की मांग करते हैं। हालांकि ब्राह्मण नेताओं को पार्टियों से टिकट नहीं मिला। निर्दलीय के रूप में पंडित लक्ष्मीनारायण पारीक और गोपाल कृष्ण जोशी अपना दमखम यहां दिखा चुके हैं।
न शिक्षा, न मूलभूत सुविधाएं
लूणकरनसर शिक्षा की दृष्टि से आज भी पिछड़ा हुआ है। यहां न तो कोई बड़ा उच्च शिक्षण संस्था है और न ही माकूल चिकित्सा व्यवस्था। सड़कों और सीवरेज की व्यवस्था आज भी इतनी बिगड़ी हुई है कि कस्बे की स्थिति गांव से ज्यादा बेहतर नजर नहीं आती।

DNR Reporter

DNR desk

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