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मूर्खों को न देवें सलाह

एक बन्दर और एक चिड़िया पीपल के पेड़ पर रहते थे. चिड़िया ने दिन – रात मेहनत करके घोंसला बनाया था ताकि विपत्ति काल में या वर्षा ऋतु में वह सुखपूर्वक जी सके. एक दिन भीषण वर्षा हुई. वर्षा होते ही बन्दर सर्दी से ठिठुरने लगा. चिड़िया ने बन्दर से कहा कि बन्दर ने अपना घर न बनाकर बहुत बड़ी गलती की है. बन्दर ने गुस्से से चिड़िया को चुप रहने को कहा. थोड़ी देर बाद चिड़िया ने पुनः बन्दर को घर बनाने और घर के फायदों पर भाषण दे डाला. बार – बार घर बनाने के सलाह सुनकर बन्दर क्रोधित हो गया. बन्दर बोला कि वह घर बना तो नहीं सकता लेकिन तोड़ तो सकता है. ऐसा कहकर बंदर ने चिड़िया का घोंसला तोड़ दिया. चिड़िया भी अब सर्दी में धूजने लगी. चिड़िया को मूर्खों को सलाह देने का दंड मिला.

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'एक खरगोश ही काफी'

चन्दू के पिता चन्दू को खरगोशों के पार्क में ले गये. उन्होंने चन्दू को कोई भी एक खरगोश पकडऩे का लक्ष्य दिया. सबसे पहले चन्दू ने सबसे सुंदर खरगोश को पकडऩे के लिये दौड़ लगाना प्रारम्भ किया. सुन्दर खरगोश पकड़ में नहीं आया. चन्दू भी थक रहा था अत: चन्दू ने तुरंत ही दूसरे खरगोश को पकडने के लिये दौड़ लगाना शुरू किया. दूसरे को पकड़ पाने से पहले ही उसे एक चितकबरा खरगोश दिखा और वो उसके पीछे दौड़ पड़ा. ऐसा चलता रहा. चन्दू खरगोश बदलता रहा और अंतत: किसी खरगोश को न पकड़ सका. उसके पिता ने उसे समझाया कि यदि वो अनेक खरगोशों की जगह किसी एक खरगोश के भागने के पैटर्न पर शोध और समीक्षा करता और योजनाबद्ध तरीके से पीछा करता तो शायद वो किसी खरगोश को पकड़ लेता.

हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो चन्दू की तरह हैं.
जरा सोचिये-
* विद्यार्थी कहता है कि 'साइंस लूंगा, डॉक्टर तो बना समझोÓ. यह कहकर साइंस ली और जैसे ही श्रम करने की बारी आई तो सोफेस्टिकेटेड अंदाज में कह दिया कि 'मेरा इंटरेस्ट साइंस में नहीं है, मैं तो आईएएस के लिए मुफीद हूंÓ. अब चले आईएएस की ओर. वहां भी भरसक श्रम को ताड़कर उससे भी नाता तोड़ लिया और चले किसी अन्य कोर्स की ओर. कोर्स दर कोर्स बदलते रहे. किया कुछ नहीं. ऐसी पढाई का क्या मोल? हर विषय में आपकी दिलचस्पी हो, यह जरूरी थोड़े ही है लेकिन पडऩा तो पड़ता ही है. जिस प्रकार चन्दू किसी खरगोश को न पकड़ सका, उसी प्रकार किसी भी विषय में आप महारथ हासिल न कर सकेंगे.
* खरगोश पकडऩे का उदाहरण सिर्फ विद्यार्थियों के लिये नहीं है. जीवन में भी यही होता है. हम किसी एक लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु जुटते हैं. जैसे ही उसमे मेहनत करने या समर्पण करने का समय आता है, तभी किसी अन्य लक्ष्य की तरफ मुड़ जाते हैं. लक्ष्य संधान न हो पाने का सबसे बड़ा कारण यही है. समूचा जीवन सिर्फ दौडऩे में ही बीत जाता है. मिलता कुछ नहीं है.
यहां मन्त्र यही है कि आप दोनों पैर हवा में नहीं रख सकते. एक पैर जमीन पर होना चाहिये. उसी प्रकार स्वप्न देखने मात्र से लक्ष्य हासिल नहीं होते. मेहनत चाहिये. एक खरगोश अर्थात लक्ष्य पर नजर रखें. यही लक्ष्य संधान का परम सत्य है.

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'दिखावा छोडिय़े'

पांच सौ रूपए के नोट की कीमत पांच सौ रूपए इसलिए होती है क्योंकि उस पर गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं और उन्हीं हस्ताक्षर के कारण उस कागज का मूल्य दूसरे सामान्य कागजों से अधिक होता है। यह हस्ताक्षर आतंरिक मूल्य कहलाता है और कागज फेस वैल्यू है। फेस वैल्यू बाहरी पहचान है और आतंरिक वैल्यू हमारे संस्कारों और श्रेष्ठता का प्रतीक है। मैनेजमेंट में फेस वैल्यू के स्थान पर आतंरिक वैल्यू ज्यादा महत्व रखती है। किसी पद पर पहुंच जाना, धन संपन्न बन जाना, अनेकानेक पुरस्कार प्राप्त करना फेस वैल्यू है, परन्तु देश और समाज के हित में कुछ बेहतर कार्य करने की इच्छा रखते हुए समर्पित भाव से कार्य करना आतंरिक वैल्यू को दर्शाता है। यदि महात्मा गांधी फेस वैल्यू को महत्व देकर बैरिस्टर बने रहते, सुभाष बोस आईसीएस बने रहते, रानी लक्ष्मीबाई सिर्फ एक रानी बनी रहती तो क्या आज हम उन्हें राष्ट्र नायक के रूप में याद कर रहे होते? इन सभी ने फेस वैल्यू के स्थान पर आतंरिक वैल्यू को ज्यादा तरजीह दी और राष्ट्र नायक बनकर उभरे। 

वर्तमान में समाज फेस वैल्यू के पीछे दौड लगा रहा है। वह अपना आतंरिक मूल्य नहीं समझ पा रहा। बाहरी दिखावा, ब्रांडेड पहनावा, शारीरिक रूप से सुंदर बनने की हो?, पैसों का भोंडा प्रदर्शन आदि ने समाज में समस्याएं ही खड़ी की हैं। सुन्दर दिखना या फेस वैल्यू को अच्छा बनाना गलत नहीं है। यह भी बहुत आवश्यक है लेकिन सिर्फ फेस वैल्यू के पीछे पड़े रहना गलत है। प्रत्येक व्यक्ति को समझना होगा कि वह कुछ अच्छा और सार्थक करने के लिए जन्मा है। ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को अद्वितीय बनाया है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग पहचान और शख्सियत है। इसी शख्सियत को या अपने मौलिक सामर्थ्य को पहचानना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।
वर्तमान मैनेजमेंट में भी मौलिक सामथ्र्य अर्थात् आंतरिक मूल्यों को विकसित करने की दिशा में अथक प्रयास हो रहे हैं। कम्प्यूटर की एक प्रमुख कंपनी द्वारा एक ही एसंबली लाइन पर अनेकानेक कम्प्यूटर्स का निर्माण या एक बड़े इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन द्वारा प्रत्येक वस्तु के आकार को सूक्ष्म बनाने का सामथ्र्य विकसित किया जाना इसके उदाहरण हैं। यहां मन्त्र यही है कि व्यक्ति और संगठनों को अपने आतंरिक मूल्य को विकसित कर मौलिक सामथ्र्य में बढ़ोतरी करनी चाहिये।

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'कार्यस्थल के ठग'

एक भिक्षुक था। एक दिन किसी व्यक्ति ने उसे दान में एक बकरा दे दिया। वो भिक्षुक घर जा रहा था तभी सुनसान रास्ते पर तीन ठगों ने उसे देखा। ठगों ने बकरा प्राप्त करने की योजना बनाई और अलग - अलग हो गये। सबसे पहले एक ठग ने भिक्षुक के पास से गुजरते हुए कहा कि वो भिक्षुक एक कुत्ते को अपने कंधे पर उठा कर क्यों ले जा रहा है? इस पर भिक्षुक ने ठग को भला-बुरा कहते हुए कहा कि इतना बड़ा बकरा क्या उसे कुत्ता नजर आता है? थोड़ी दूर चलने के बाद भिक्षुक को दूसरा ठग मिला। उसने भी भिक्षुक से यही कहा कि वो कंधे पर कुत्ता लादकर क्यों चल रहा है। भिक्षुक उसे झिड़ककर आगे बढ़ गया। भिक्षुक से अब तीसरा ठग मिला और उसने भे वही कहा जो पहले दोनों ठगों ने कहा था। भिक्षुक के मन में आया कि हो न हो उसकी आंखे ही धोखा खा रही है क्योंकि इतने सारे लोग झूठ नहीं बोल सकते। उसने बकरे को कुत्ता मान लिया और कंधे से उतारकर घर चला गया। तीनो ठगों ने बकरे को मारकर दावत उड़ाई। सांकेतिक कथा सिखाती है कि-

1. बार-बार अनेकानेक लोगों द्वारा बोला गया झूठ भी सच ही हो जाता है।
2. यदि आप नौकरी करते हैं तो इस बकरे की कथा से सीखिये कि कहीं आपका ही कोई सहकर्मी बारम्बार बॉस के पास जाकर आपके बारे में असत्य बात न कहता जाये। कहीं आपकी इतनी ज्यादा कारसेवा न हो जाये कि आपकी नौकरी छोडऩे की नौबत आ जाये। इस कथा में आप बॉस को भिक्षुक के रूप में देखें और ठग हैं आपके सहकर्मी।
3. इन ठगों की भांति कार्यस्थल पर भी कुछ कर्मचारियों का 'नेक्ससÓ होता है। वे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से श्रेष्ठ जनों, बेहतर कार्यकर्ताओं का सफाया करते हैं क्योंकि वे यह जानते हैं कि बेहतर कार्मिकों जितना अच्छा कार्य तो वे कर नहीं सकेंगे अत: उन्ही बेहतर कार्मिकों के बारे में उल-जलूल फीडबैक देना इनका धर्म होता है।
4. कार्यस्थल के ऐसे ठगों का मूल लक्षण है बॉस से जबरदस्त जुड़ाव, उसके निजी कार्य करना, उसकी पत्नी और बच्चों का विशेष ध्यान रखना, बॉस को सर्वशक्ति संपन्न होने का बोध करवाना और जब सब ठीक प्रकार से हो जाये तो अपने गुप्त एजेंडे पर कार्य प्रारम्भ करके सीधे और श्रेष्ठ लोगों का सफाया करना। जैसा कि कथा में ठगों ने भिक्षुक के साथ किया।
यहां मन्त्र यही है कि कार्यस्थल के ठगों से सावधान रहें, बारम्बार कहा गया असत्य कहीं सत्य न हो जाये - इसका ध्यान रखें और सदा प्लान बी अर्थात आल्टरनेटिव योजना तैयार रखें।

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'सीखना ही जीवन'

एक दार्शनिक के पास हर दिन कई विद्वानों का जमावड़ा लगा रहता था। सभी लोग उनसे कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करके ही जाया करते थे। स्वयं दार्शनिक खुद को कभी ज्ञानी नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि इन्सान हमेशा नया सीखता ही रहता है तो वह पूर्ण ज्ञानी कैसे हुआ? उन्होंने कहा कि वह प्रत्येक व्यक्ति आपका गुरु है, जिससे आप कुछ नया सीखते हैं। उनका मत था कि ज्ञान का अहंकार करना मूर्खता है। 

उनकी बात सत्य है। इन्सान अपनी पूरी जिन्दगी में भी कुछ पूरा नहीं सीख सकता। हमेशा कुछ न कुछ अधूरा ही रहता है। हर इन्सान के पास कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो दूसरों के पास नहीं है। अत: हर किसी को हर किसी से सीखते रहना चाहिये। हर बात और अनुभव पुस्तकों से नहीं मिलते क्योंकि बहुत कुछ ऐसा है जो लिखा नहीं गया है। समाज के बीच रहकर और लोगो से सीखते रहने की आदत डालकर ही हम अपने आप को श्रेष्ठता की ओर ले जा सकते हैं।
यदि आप नित्य नया सीखने हेतु तत्पर नहीं है तो इसका अर्थ है कि आप सडांध की ओर यात्रा कर रहे हैं। नया सीखना ही जीवन का मर्म है। आपने तालाब से एक लोटा भर लिया। आपने पानी पीया। उससे आपकी प्यास बुझ गई। क्या इसका अर्थ यह है कि आपने पूरा तालाब पी लिया है। प्रत्येक व्यक्ति को समझना चाहिये कि ज्ञान तालाब के सामान है। हमें जितना पता है वो एक लोटे से ज्यादा नहीं है। अत: अपने तथाकथिक ज्ञान का अहंकार करना तुरंत बंद करना चाहिये।
सदा नया सीखने की तत्परता ही मनुष्य को पशु से अलग करती है। क्या आपने कभी सुना या देखा है कि किसी पशु ने अपने ज्ञान में जबरदस्त वृद्धि करके समूचे संसार को जीने की नई दृष्टि दी हो? शायद नहीं। सिर्फ मनुष्य ही ऐसा कर सकता है। अत: नया सीखिये। प्रति पल सीखिये। प्रत्येक व्यक्ति से सीखिये. छोटे से छोटे कारिंदे से सीखिये। प्रत्येक व्यक्ति ऐसा कुछ जरूर जानता होगा जिसे आप नहीं जानते। यहां मन्त्र यही है कि प्रतिपल नया सीखना ही जीवन है। सीखने का त्याग करने का अर्थ है सांस लेने वाला शव बनना। अब मर्जी आपकी है कि आप वास्तविक मनुष्य बनना चाहते हैं या सांस लेने वाला शव?

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जब नन्दू महाराज को समझा किडनेपर

बात तब की है जब नंदलाल व्यास उर्फ नंदू महाराज बीकानेर से विधायक थे और जयपुर से अपने दोस्तों व स्टाफ के साथ प्रदेश में घूमने के लिए निकले। ये लोग रणकपुर, नाथद्वारा, नाकौड़ा आदि स्थान होते हुए जसोल जा रहे थे तब गाडी में डिजल भरवाने के लिए बाडमेर के कल्याणपुर से करीब 30 किमी पहले पेट्रोल पम्प पर रूके। रात के एक बजे और सर्दी होने के कारण महाराज व उनके साथी पिछली सीट पर कंबल ओढे हुए थे और आगे गाडी से उनका गनमैन राजाराम विश्नोई ए के 47 हाथ में लिए उतरा। ड्राइवर राजू ने जोर से आवाज लगाई, कोई हो तो डीजल भर दे। काफी समय बाद बार बार आवाज लगाने पर एक आदमी आया और गाडी मेंडीजल भरकर चला गया। महाराज अपने साथियों के साथ जसोल की तरफ रवाना हो गए। आधे घण्टे बाद कल्याणपुर पुलिस स्टेशन के सामने थानाधिकारी मदनदान रतनू ने दूर से देखा की स्कोर्पियो गाडी जिसका नंबर 1244 था आ रही है तो उसने गाडी को रोक लिया और आरएसी व पुलिस के दर्जनों जवानों ने गाडी को घेर लिया और बंदूके गाडी की ओर तान दी। मदनदान रतनू ने कडक आवाज में कहा बाहर निकलो और अपने आप को पुलिस के हवाले कर दो। इतना सुनते ही नंदू महाराज व उनके बाकी साथी बाहर आए और समझ नहीं पाए माजरा क्या है। मदनदान रतनू नंदू महाराज को पहले से जानता था और नंदू महाराज को दखते ही उसके होश उड गए किय ये क्या हुआ। नंदू महाराज कुछ कहते उससे पहले ही थानेदार ने कहा कि अभी राजस्थान की नामचीन हस्ती राजेन्द्र मिर्धा का अपहरण हो रखा है और पिछले पेट्रोल पंप के कर्मचारियों ने पुलिस को सूचना दी थी कि गाडी संख्या 1244 में कुछ लोग ए के 47 लेकर चल रहे हैं जिनके पीछे तीन लोग कंबल में लपेटे हुए हैं और लगता है कि राजेन्द्र मिर्धा के अपहरणकर्ता हैं। इतनी सूचना मिलने पर बाडमेर के कलक्टर और एसपी तुरंत सक्रिय हो गए और गाडी संख्या 1244 का इंतजार होने लगा। इतना सुनते ही नंदू महाराज सारा माजरा समझ गए और कलक्टर साहब से फोन पर बात की और अपना परिचय दिया। प्रशासन ने महाराज से माफी मांगी और असुविधा के लिए खेद जताया और आदर सत्कार करके महाराज को विदा किया। आज भी जब महाराज ने गनमैन राजाराम ने यह वाकया सुनाया तो हंसे बिना नहीं रहा।

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'बी द चेंज'

तालाब किनारे एक लड़के ने देखा कि एक बूढी महिला छोटे-छोटे कछुओं की पीठ को साफ कर रही थी। लड़के ने जब उस महिला से ऐसा करने का कारण पूछा तो महिला ने कहा कि कछुओं की पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचरा जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है और कछुओं को तैरने में दिक्कत आती है। अत: वो कवच को साफ करते है। लड़के ने महिला से पूछा कि वो अकेली कब तक इन असंख्य कछुओं की पीठ साफ करेगी और इससे आखिर कितना परिवर्तन हो सकेगा? महिला ने बड़ा ही मार्मिक जवाब दिया कि भले ही उसके इस कार्य से से संसार में कोई बड़ा बदलाव नहीं आये लेकिन कछुए की जिन्दगी तो बदलेगी ही। 

छोटा ही सही पर सकारात्मक दिशा में चेंज होना सीखिये। जिन्दगी में बहुत सारे अवसर ऐसे आते हैं जब हम बुरे हालात का सामना कर रहे होते है। हम परिवर्तन की सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते। मन मसोसकर यही कहते हैं कि क्या किया जा सकता है? इतनी जल्दी तो सिस्टम को बदलना संभव नहीं है। ऐसा सोचकर वह कार्य भी नहीं करते जिससे समाज में कुछ नई क्रान्ति आये। इससे निकलिये। गांधीजी ने कहा है - 'बी द चेंजÓ। जो परिवर्तन आप समाज और राष्ट्र में लाना चाहते हैं उसे पहले खुद में लाइये। स्वयं से शुरुआत कीजिये।
* आप चाहते हैं कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें। उन्हें मत सिखाइये। स्वयं पालन करना प्रारम्भ कीजिये। खुद से पूछिये कि क्या आप हेलमेट लगाते हैं या सीट बेल्ट बांधते हैं? यदि नहीं तो क्रान्ति नहीं आयेगी।
* आप चाहते हैं कि नारी का सम्मान हो। बहन बेटियां पड़ें। आगे बड़ें।
जरा सोचिये कि क्या आप अपनी पुत्रियों को उच्च शिक्षा दे रहे हैं?
* आप चाहते हैं कि विवाह से फिजूलखर्ची मिटे। क्या आप अपने पुत्र का आडम्बर विहीन विवाह करवाएंगे?
* आप चाहते हैं कि दान के नाम पर समर्थ पुत्रियों और बहनों को टिफिन/नकद बांटना बंद हो। समाज में कईयों को आपके दान की आवश्यकता है और यह आवश्यकता उन बेटियों से अधिक है। क्या आप टिफिन या नकद बांटना रोक सकेंगे?
क्या पता आपका छोटा सा बदलाव कुछ क्रांति लेकर आये। हर बदलाव की शुरुआत स्वयं से होती है। कई बार तो सफलता हमसे बस थोड़ी ही दूर होती है कि हम हार मान लेते है। अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें। कोई भी सकारात्मक परिवर्तन आसान नहीं होता। परिवर्तन में सदियां लगती हैं। आप परिवर्तन के संवाहक बनें तभी राष्ट्र प्रगति करेगा। 'बी ए चेंजमेकरÓ। यहाँ मन्त्र यही है कि अपनी क्षमताओं पर भरोसा रख कर किया जाने वाला कोई भी परिवर्तन छोटा नहीं होता। सिस्टम तभी बदलेगा जब हम खुद बदलने को तैयार होंगे।

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कितने आसाराम? कितनी निर्भया?

Anurag Harsh
पिछले कुछ दिनों से देश में दुष्कर्म को लेकर बड़ी खबरें आ रही है। मोदी सरकार में बने साहसिक कानून के तहत अब बारह साल तक की बालिका के साथ दुष्कर्म करने वाले को फांसी की सजा दी जाएगी। इस निर्णय के तुरंत बाद जोधपुर की अदालत ने खुद को संत कहने वाले आसाराम को बुधवार को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। 'आसाराम को सजाÓ देशभर की मीडिया के लिए बड़ी खबर है। हर चैनल का पत्रकार बकायदा दिल्ली से सफर करके जोधपुर की जेल तक पहुंचा, वहां से लाइव किया। अखबारों में भी बड़ी खबर यही छप रही है। इस खबर को महत्व इसलिए नहीं दिया जा रहा है कि दुष्कर्म करने वाले को सजा मिली है, बल्कि इसलिए ज्यादा 'प्रचारÓ मिल रहा है क्योंकि वो कभी 'संत आसारामÓ था। उसे पूरा देश जानता है, इसलिए खबर की 'टीआरपीÓ ज्यादा मिलने वाली है, वेबसाइट पर हिट्स ज्यादा आने वाले हैं, फेसबुक पर लाइक ज्यादा मिलने वाले हैं, अखबार की हैडिंग में 'करामातÓ दिखाने का अवसर ज्यादा मिलने वाला है। कहीं न कहीं सवाल सिलसिलेवार उठना चाहिए। पहला यह कि केंद्र सरकार ने बारह साल तक की बालिका के साथ दुष्कर्म करने वाले दरिंदे को ही फांसी की सजा देने का कानून क्यों बनाया? बारह साल से अधिक और चालीस-पचास साल तक की महिला के साथ दुष्कर्म करने वाले दरिंदों के खिलाफ फांसी से कम सजा की रियायत क्यों दी जा रही है। नि:संदेह मोदी सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है लेकिन उम्र का दायरा नहीं रखना चाहिए था। दुष्कर्म पीडि़ता बालिका बारह वर्ष की हो या फिर युवती तीस साल की हो, दोनों का दर्द समान होता है। किसी महिला के साथ ऐसा दुराचार किसी व्यक्ति की हत्या से भी ज्यादा दर्दनाक है। हत्या में एक बार मरना होता है और दुष्कर्म की पीडि़ता को हर पल मरना होता है। यह सोच पाना ही कितना दर्दनाक है कि दुष्कर्म पीडि़ता को खुद पर हुए अत्याचार को साबित करने के लिए लंबी लड़ाई लडऩी पड़ती है। जगह-जगह जांच करवानी होती है, हजार लोगों को जवाब देना होता है। जब तक आरोपी को अदालत दोषी नहीं मान लेती तब तक उसे ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भले ही उसका कसूर कुछ भी ना हो। इसीलिए आरोपी के खिलाफ जांच में तेजी आनी चाहिए। उस वहशी को सजा ए मौत मिलनी चाहिए, जिसने इंसानियत को तार तार किया हो। राजस्थान सहित देशभर में ऐसे मामलों की फटाफट सुनवाई करने का दौर एक बारगी चला लेकिन फिर ठंडा हेा गया। नि:संदेह जल्दबाजी में किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए लेकिन दोषी को सजा देने में विलंब भी नहीं होना चाहिए।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि कितने आसाराम है? आज ही जब आसाराम से जुड़ी खबरों के लिए प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की खबरों को टटोल रहा था तो आधा दर्जन खबरें मिली, जिसमें नाबालिग के साथ दुष्कर्म, छात्रा का शारीरिक शोषण, नई दिल्ली में नाबालिग सौतेली बेटी के साथ दुष्कर्म, झारखंड में आठ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म, ओडिशा में ५० साल की महिला के साथ दुष्कर्म की खबरें नजर आई। सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि क्या एक आसाराम को सजा देकर इन दरिंदों को सबक सिखाया जा सकता है? शायद नहीं। क्योंकि अगर सबक लेना ही होता तो 'निर्भयाÓ के मामले में फांसी की सजा देने के बाद देश में यह अपराध रुकना चाहिए था। आज देश में हजारों आसाराम है और लाखों निर्भया। ऐसे में परिवर्तन समाज में करना होगा, सुदृढ़ और चाक चौबंद व्यवस्था समाज में करनी होगी। ऐसे भेडिय़ों को पहचानना होगा और इनके खिलाफ जोर से बोलना होगा। सरकारों को सिर्फ कानून बनाकर इतिश्री नहीं करनी चाहिए, बल्कि सामाजिक स्तर पर बदलाव लाने के लिए प्रयार करने चाहिए। एक आसाराम के जेल में जाने से भय का माहौल तो बनेगा लेकिन बाहर बैठे हजारों 'आसारामÓ क्या अपनी विभत्स, कुंठित और आपराधिक सोच को छोड़ सकेंगे? इन मुद्दों पर काम करना होगा। 'बेटी बचाओ-बेटी बढ़ाओÓ का नारा देने मात्र से माहौल नहीं बदलेगा।

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बीकानेर - फोटो की राजनीति कब तक? (अनुराग हर्ष)

फोटो खिंचवाने का सबसे ज्यादा शौक अगर किसी को है तो वो नेता है। राजनीति चलती ही फोटो के दम पर है। ऐसे में कई नेता अपनी शुरूआत अखबारों में फोटो के साथ करते हैं, यह बात अलग है कि जो जनता के बीच काम नहीं करते, वो फोटो तक ही सीमित होकर रह जाते हैं। जनता उसी के साथ नजर आती है, जो खुद आगे बढ़कर काम करते हैं। खैर हम बात कर रहे हैं, फोटो के शौकीन नेताओं की। इन दिनों कांग्रेस और भाजपा दोनों बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रही है और इस बीच फोटो के दीवाने नेताओं की चांदी हुई पड़ी है। टिकट के दावेदार नेता तो इन कार्यक्रमों में बस कुछ देर के लिए आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चलते बनते हैं। कई बार तो नेताजी अपने कुछ साथियों को साथ लेकर पहुंचते हैं, उनको अपना मोबाइल थमाते हैं और फोटो खिंचवाते हैं। पीछे भीड़, पार्टी के झंडे, बैनर सभी फोटो में दिखने चाहिए। महज दस-पंद्रह मिनट की यह एंट्री लेने वाले एक-दो नहीं बल्कि कई नेता है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसे सिर्फ कांग्रेस में है, बल्कि भाजपा में भी ऐसे शौकीन नेताओं की कमी नहीं है। दरअसल, इसके पीछे भी कहानी है। टिकट की दौड़ में लगने के लिए इन नेताओं को फाइल तैयार करनी होती है। इसी फाइल में यह फोटो चिपकाए जाते हैं। किसी अखबार में अगर फोटो आ गई है तो सोने पर सुहागा। उसकी कटिंग भी फाइल का हिस्सा बन जाती है। अब बड़े नेता इन लोगों से परेशान है, पार्टी लाइन के कारण कुछ बोल भी नहीं पाते। करे तो आखिर क्या करें। हमारी सलाह तो सिर्फ इतनी है कि टिकट के लिए काम करने के बजाय जनता के लिए काम करेंगे तो कल जनता भी बोलेगी कि इन्हें टिकट दो। अगर काम नहीं करेंगे तो जीते हुए हैं, उन्हें हराने में भी कसर नहीं छोड़ते। अच्छा होगा कि फोटो राजनीति के बजाय काम की राजनीति करें।

महिला नेता भी सक्रिय

हालांकि बीकानेर में पूर्व की सीट पर सिद्धिकुमारी के अलावा कोई भी महिला नेता गंभीरता से टिकट की दावेदार नहीं है, फिर भी कांग्रेस और भाजपा दोनों में महिला नेता इन दिनों सक्रिय नजर आ रही है। खासकर भाजपा में महिला नेताओं के बीच प्रतिस्पद्र्धा ज्यादा नजर आ रही है। कार्यक्रमों में जिसकी चलती है, वो दूसरे पक्ष को आगे नहीं आने देती। यहां तक कि एक दूसरे के नंबर कम करवाने में भी पीछे नहीं रहती। अब चुनाव की बेला में अगर पुरुष नेता यह काम कर रहे हैं तो महिलाओं को क्या दोष दें?

सोशल मीडिया पर युद्ध

देशभर की राजनीति तो सोशल मीडिया पर होती ही है लेकिन अब स्थानीय राजनीति भी फेसबुक पर नजर आने लगी है। अधिकांश नेताओं ने अपने अपने ग्रुप बना लिए हैं, वो हर रोज कुछ न कुछ सोशल मीडिया पर डालते हैं, कभी तीखी मिर्च की तरह तो कभी अपने नेताओं की लड्डू जैसी मीठी बातों की टोकरी परोस देते हैं। विचारधारा से कम और व्यक्ति विशेष से ज्यादा जुड़े समर्थक अपने नेता के पक्ष में जमकर तर्क दे रहे हैं, हालांकि कई बार यह तर्क कुतर्क में बदल जाते हैं। कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने तो जैसे अपने 'सोशल मीडिया वार रूमÓ तैयार कर लिए हैं, जहां से हर रोज सुबह सवेरे गोला दाग दिया जाता है। इसके बाद छिटपुट गोरीबारी दिनभर चलती रहती है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन भाषा की अभद्रता कई बार रिश्तों को खराब भी कर देती है।

आखिर कब तक...

चुनाव नजदीक आने के साथ ही नेता तैयार बयानबाजी तो शुरू कर चुके हैं, लेकिन हकीकत में कोई काम नहीं हो रहा है। जिन नेताओं को टिकट चाहिए, वो अपने विधानसभा क्षेत्र तो दूर पार्षद क्षेत्र में भी भ्रमण नहीं कर पाए हैं। उन्हें नहीं पता कि उनके पार्षद क्षेत्र में कितनी सड़कें टूटी हुई है और कितनी नालियों से पानी बाहर निकल रहा है, किस स्कूल में शिक्षक नहीं है और किस अस्पताल में गॉज और पट्टी का टोटा चल रहा है। इसके बाद भी वो नेतागिरी करने से नहीं चूक रहे। जिस तरह हर बड़े पद पर पहुंचने से पहले मेहनत करनी होती है, ठीक वैसे ही जनता के वोट से विधायक बनने से पहले नेताओं को अपने क्षेत्र को पहचानना ही होगा। खासकर युवा नेताओं को इस दिशा में मेहनत करने की जरूरत है।

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रामानुजाचार्य : जिन्होंने अपनी सरलता से सबसे समरसता पूर्ण वैष्णव संप्रदाय की नींव डाली

सन्दर्भ : रामानुजाचार्य जयंती 20/04/2018

‘सामाजिक समता की दिशा में तत्कालीन ब्राह्मण जहां तक जा सकता था, रामानुजाचार्य वहां तक जाकर रुके. उनके संप्रदाय ने लाखों शूद्रों और अंत्यजों को अपने मार्ग में लिया, उन्हें वैष्णव-विश्वास से युक्त किया और उनके आचरण धर्मानुकूल बनाए और साथ ही ब्राह्मणत्व के नियंत्रणों की अवहेलना भी नहीं की.’

2700 साल पुरानी एक शक्तिशाली धार्मिक रीति से सामाजिक समरसता बनाने के लिए एक अनूठा प्रयोग 17 अप्रेल को हैदराबाद में हुआ। श्रीरंगनाथ मंदिर के उत्सव में तेलंगाना मंदिर संरक्षण समिति के अध्यक्ष पण्डित सी.एस. रंगराजन ने कंधों पर बिठाकर एक दलित भक्त आदित्य को मंदिर में प्रवेश करवाया। ख़ास बात है कि इस दौरान पारम्परिक नाद-स्वर और वेद मन्त्रों का उच्चारण हुआ। हज़ारों लोग इस दुर्लभ दृश्य को देखने के लिए वहां थे। इस अनुष्ठान में व्यक्तिगत मनमानी नहीं है बल्कि यह वैष्णवों के सबसे पुराने रामानुज संप्रदाय की शास्त्रीय पद्धति से की जाने वाली 'मुनि वाहन सेवा' है। जिसका एक सुदीर्घ इतिहास है। इसका मूल आलवार संत-भक्त-कवियों की भक्ति संवेदना में है।आलवारों के द्रविड़ भाषा पद्यों का संकलन 'दिव्यप्रबंधम्' इसका उद्गम है। यह इतिहास मनुष्य की जन्मसत्ता के बजाय उसकी व्यक्तिसत्ता को प्रधानता देता है।

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