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'सोचो मत, करो'

तीन दोस्तों को यात्रा पर निकलना था. उन्हें अपने साथ एक ऐसे कर्मचारी को भी रखना था जो उन्हें सही मार्ग बताता जाये और उनके भोजन आदि का प्रबंध कर सके. योग्य कर्मचारी के चुनाव हेतु उन्होंने एक परीक्षा ली. तीनों दोस्तों ने दो कार्मिकों को बुलाया और कहा कि तीन किलोमीटर बाद यह सड़क दो भागों में विभक्त हो जायेगी. एक रास्ता सही है और दूसरा गलत. जो सही रास्ते पर जायेगा उसी का चयन होगा. दोनों ने यात्रा शुरू की. पहला कार्मिक बाएं हाथ वाले रास्ते पर निकल पड़ा लेकिन दूसरा कार्मिक वहीं रुक गया और विश्लेषण करने लगा कि कौनसा रास्ता सही हो सकता है? दो घंटे बाद पहला कार्मिक वापिस लौटकर आया और कहने लगा कि उसके द्वारा चयन किया गया रास्ता गलत था. दूसरे कार्मिक को लगा कि उसका चयन पक्का है लेकिन तीनों दोस्तों ने पहले कार्मिक का चयन किया. दोस्तों ने कहा कि पहला कार्मिक इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वो कुछ करता है, सिर्फ विश्लेषण करने का काम नहीं करता. याद रहे, विश्लेषण से ज्यादा जरूरी है - क्रियान्विति.
कहीं ऐसा न हो जाये कि सही रास्ते के चयन करने की प्रक्रिया में हम इतना ज्यादा समय नष्ट कर देवें कि उस रास्ते पर जाने का महत्व ही समाप्त हो जाये. वर्तमान विद्यार्थियों में यह समस्या आम हो चुकी है. वे सदा यही कहते रहते हैं कि उन्हें इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि उन्हें किस क्षेत्र में करियर बनाना चाहिये? समस्या मात्र यही नहीं है. वास्तविक समस्या है मेहनत करने में जोर आना. उनसे श्रम नहीं हो रहा. सभी कोर्से? आपकी रूचि के हों, यह तो आवश्यक नहीं हैं. भोजन की थाली में क्या आपको सभी व्यंजन सामान रूप से पसंद होते हैं? उसी प्रकार प्रत्येक विषय में कुछ रुचिकर और कुछ तथाकथित अरुचिकर विषय होते हैं. समझ नहीं आता, गाइडेंस नहीं है, इंटरेस्ट नहीं है जैसे मूर्खतापूर्ण जुमलों से बाहर आइये और श्रम कीजिये. यही सत्य है.
जीवन में भी कभी न कभी ऐसा अवसर आता है जहाँ हम निर्णय नहीं कर पाते कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत? ऐसे में हम सोच-विचार करने में अपना काफी समय बर्बाद कर देते हैं. जबकि, जरुरत इस बात की है कि चीजों को अत्यधिक विश्लेषण करने की बजाय अपने विकल्पों पर विचार करके उनपर क्रियान्विति करना प्रारम्भ करें. यहां मन्त्र यही है कि बैठकर सोचते रहने से, विश्लेषण करते रहने से और अपनी कमजोरी को 'इंटरेस्ट नहीं हैÓ की ढाल से ढकने से आपका जीवन बर्बाद हो सकता है. क्रियान्विति ही जीवन में सफलता पाने का महामंत्र है.

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उसूल सर्वोपरि

जब भी बात आपके उसूलों, सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों पर आन पड़े, तो समझौता श्रेयस्कर नहीं होता। वे व्यक्ति सर्वोत्कृष्ट हैं जो सिद्धांत विहीन कार्य करके धनार्जन करने के बजाय उस कार्य को त्याग देने का दम रखते हैं। ये दम आपके पास है क्या? यही मूल प्रश्न है। आपकी सफलता आपके विश्वसनीय व्यवहार से जुड़ी होती है। जिस कार्य को करने से आपकी विश्वसनीयता और मूल्यों पर आंच आये, उसे कदापि न करें। 

आप और हम उन्हीं का नाम श्रद्धा और गर्व से लेते हैं जिन्होंने अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया। जऱा सोचिये
• अतिथि सेवी राजा रंतिदेव का उसूल अतिथि सत्कार था। उन्होंने अतिथियों के श्वानों को भी अपना भोजन दान किया। आज वे अतिथि सेवी के रूप में अमर हैं।
• महात्मा गांधी ने चौरी चौरा काण्ड की हिंसा के तुरंत बाद अपना आन्दोलन वापिस वे लिया। वे चाहते तो ऐसा न भी करते। कुछेक इतिहासविद इसे गलती भी मानते हैं लेकिन हिंसा उनके मूल्यों के खिलाफ थी। उन्होंने ऐसा करके अहिंसा का बड़ा सन्देश देते हुए समझाया कि उन्हें हिंसा के दम पर प्राप्त स्वतन्त्रता नहीं चाहिये।
• वीर विनायक दामोदर सावरकर ने अंडमान जेल में ब्रिटिश सत्ता के भीषणतम अत्याचार सहे लेकिन स्वतंत्रता के लक्ष्य की प्राप्ति के मूल्य से समझौता नहीं किया।
• सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के आगे पुत्र का शव पड़ा होने के बावजूद उन्होंने अपने कर्त्तव्य पथ को सबसे बड़ा माना और कर्त्तव्यपरायणता की मिसाल बने।
क्या आप जानते हैं कि सिद्धांतों से समझौता और सकारात्मक सोच की कमी; संगठन में इन दो कारणों से सर्वाधिक कर्मचारी बर्खास्त होते हैं। यह निष्कर्ष एक विदेशी प्रबंध विश्वविद्यालय का है। श्रेष्ठ नैतिक आचरण और सिद्धांतों के लिये सर्वस्व न्योछावर कर देने की शक्ति ही मनुष्य की सफलता का आधार तत्व है। यहाँ मन्त्र यही है कि नैतिकता और जिम्मेदारी महानता की कीमत है। अपने मूल्यों से समझौता करके जीना वास्तव में श्वास लेने वाला शव बन जाने जैसा है।
उसूलों पर गर आंच आये,
टकराना ज़रूरी है।
जि़ंदा हो तो फिर,
जि़ंदा नजर आना ज़रूरी है।

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'मूर्खतापूर्ण संघर्ष'

एक नदी के तट पर पीपल का पेड़ था. एक दिन पीपल के पेड़ से दो पत्ते नदी में गिरे. एक पत्ता सीधा गिरा और दूसरा पत्ता उलटा गिरा. जो पत्ता सीधा गिरा वो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा था. सीधा पत्ता कहता कि नदी कईयों की प्यास बुझाती है अत: इस श्रेष्ठ कार्य में वो नदी का साथ देगा और नदी को उसके लक्ष्य अर्थात समुद्र तक पहुंचा कर ही दम लेगा. उलटा गिरा पत्ता अड़ गया कि वो नदी की धारा को रोककर ही दम लेगा. वो बिना वजह नदी से संघर्ष करता रहा और कई बार नष्ट होते-होते बचा. अन्ततोगत्वा वो पत्ता कटकर, जगह जगह से फटकार सागर में जा मिला. वो अपने जीवन के एक भी पल का आनंद न ले सका. 

दोनों पत्ते यहां पर मनुष्यों का रूप हैं. उलटा गिरा पत्ता विपरीत बुद्धि का और सीधा गिरा पत्ता सुबुद्धि का प्रतीक है. जिस प्रकार दोनों पत्तों को नदी के साथ सागर तक जाना है , उसी प्रकार मनुष्यों को भी एक दिन परमात्मा रूपी सागर में मिल जाना है.
1. उलटा गिरा पत्ता कुबुद्धि का संकेत है. व्यर्थ में संघर्ष करते रहने का संकेत है. जरा सोचिये कि बिना बात ही, अकारण संघर्ष करना आपका व्यवहार तो नहीं बन गया है? आप पायेंगे कि ऐसे कई व्यक्ति हैं जो बहुत बड़े 'शिकायातचंदÓ हैं. उन्हें हर बात से, हर कृत्य से शिकायत है. वे भली - भांति जानते हैं कि नदी के बहाव को रोकना अर्थात इस श्रेष्ठ कार्य को रोकना असंभव है लेकिन फिर भी अच्छे कार्य को रोकते हैं. नदी का बहना एक श्रेष्ठ कार्य है. उसे बिना वजह रोकने का भाव रखेंगे तो जीवन का आनंद नहीं ले सकेंगे. कई बार विरोधी या बागी होते-होते, बगावत करना और बिना वजह अन्यों के रास्ते में रोड़े अटकाना मनुष्य का स्वभाव बन जाता है. इससे बचिये.
2. सीधा गिरा पत्ता श्रेष्ठ कार्यों का विरोध नहीं करता. उसमे बिना बात का अहंकार नहीं है. वह लहरों के साथ बहता है. जीवन का आनंद लेता है. यही तो सुबुद्धि है. बुरे का प्रतिकार और श्रेष्ठता से प्यार-यही तो जीवन है. यह परमात्मा तक पहुंचने का श्रेष्ठ मार्ग है.
जरा सोचिये कि आप कौनसे पत्ते हैं? यहाँ मन्त्र यही है कि उलटे पत्ते की तरह वृथा अहंकार, लोभ, विरोध करने की प्रवृत्ति को त्यागिये वरना आपका समूचा जीवन एक युद्ध बन जाएगा और अंत में आप पायेंगे कि जीवन तो व्यर्थ के संघर्षों में ही नष्ट कर दिया. यह जीवन का सबसे बड़ा सच है.

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'अहंकार यानि नाश'

एक महान संत और उनके शिष्य किसी गांव में पहुंचे। संध्या काल था। संत और उनके शिष्य अत्यंत थके हुए और भूखे थे। किसी व्यापारी ने सुना कि गांव में संत आये हैं। उसने तुरंत ही भोजन, जल, निवास आदि की व्यवस्था की और संत से जाकर कहा कि समस्त संत और महात्माओं के लिये आवास और भोजन की व्यवस्था की गई है। व्यापारी बोला कि ऐसे सिद्ध संतों के आने से गाँव धन्य हो गया। व्यापारी वापिस चला गया। संत ने अपने सभी शिष्यों से कहा कि उन्हें आज भी भूखा सोना पडेगा। शिष्यों ने इसका कारण पूछा तो संत ने कहा कि 'यह भोजन तो सिद्धस्थ संतों और महात्माओं के लिये है। मैं तो अभी कुछ भी नहीं हूँ। संत तो वो है जिसने सभी इच्छाओं का अंत कर दिया हो। मैं तो अभी तक पूरा मनुष्य भी नहीं हूंÓ। यह कहकर संत सो गये। कथा समझाती है कि जो कुछ भी नहीं है वही सब कुछ है। कथा अहंकार को समाप्त करने और सदा अन्यों के प्रति कृतज्ञ भाव रखने का सन्देश देती है। कथा से निम्नलिखित मूल मन्त्र सीखे जा सकते हैं-

* मैं कुछ नहीं हूं। सब कुछ समाज का है। जो सीखा, जो पाया, जो भी हासिल किया, सब समाज से ही प्राप्त किया। मेरा क्या है? शायद कुछ भी नहीं। नाम, धन, रूतबा , शोहरत - सब समाज से यानि दूसरों से मिली अत: मैं तो कुछ हूं ही नहीं। जिसने यह स्वीकार कर लिया, वह उसी क्षण महानता की ओर चल पड़ा और ईश्वर से जुड़ गया।
* 'मैं हूं और मैं तो बहुत कुछ हूंÓ। जिसमे यह अहं आ गया, वो ईश्वर से, समाज से, और यहां तक कि अपने निकट जनों से भी कट जायेगा। यह मन का अहंकार है। यही मृत्यु का मार्ग है। यह कष्ट का, समस्या का, द्वेष का सबसे बड़ा जनक है।
जरा सोचिये कि क्या आप दिखावे में विश्वास करते हैं? आपके लिये क्या महत्त्वपूर्ण है - स्वयं का अहंकार या प्रेमपूर्ण सम्बन्ध? यदि स्वयं का अहंकार ही आपके लिये सर्वोपरि है तो यकीन मानिये कि आपने निचले स्तर की ओर यात्रा करना प्रारम्भ कर दिया है। बाली , रावण, दुर्योधन, यहां तक कि भीम और अर्जुन भी अहंकार करने के बाद शर्मसार हुए हैं तो आपकी और हमारी क्या बिसात? यहां मन्त्र यही है कि अहंकार आपको ईश्वरत्व से, श्रेष्ठता से, प्रेम से और शान्ति से दूर ले जाकर आपके ही भीतर एक युद्ध छेड़ देता है और आपके अंतर्मन के सदगुणों को परास्त कर देता है। अहंकार को पराजित कीजिये। यही जीवन को जीने का श्रेष्ठ तरीका है।

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लालन पालन के सूत्र

डॉ स्पेंसर जॉनसन की पुस्तक 'द वन मिनिट फादर' के अनुसार यदि आपने अपने बच्चे में आत्मानुशासन और आत्मसम्मान का भाव जागृत कर दिया, तो यकीन मानिये कि आपने पिता होने का दायित्व भी निभा दिया। आत्मानुशासन की पहली शर्त है माता-पिता का स्वयं अनुशासित होना। बच्चे आपसे सीखते हैं. आप उनके रोल मॉडल हैं। जऱा सोचिये कि:

• क्या आपका जीवन अनुशासित है?
• आपकी उम्मीद है कि बच्चा नित्य स्वाध्याय करे. क्या आप रोजाना नियम से अध्ययन करते हैं?
• आप चाहते हैं कि बच्चा सभी का सम्मान करे. क्या आपके कम्युनिकेशन में अन्यों के लिये सम्मान का भाव है?
बच्चे आपको बहुत कुछ सिखा सकते हैं. उन्हें थोड़ी लिबर्टी या स्वतंत्रता देकर देखिये. वे इतने अपडेटेड हैं कि कई बार आप उनके आगे स्वयं को ज्ञान विहीन महसूस करने लगेंगे। बच्चों का तकनीकी ज्ञान , वार्ता कौशल और सामान्य जानकारी का स्तर बहुत बेहतरीन है अत: उनसे कुछ सीखने में गुरेज़ न करें।
बच्चे बड़े ही इम्पल्सिव होते हैं। उन्हें अपनी भावनाओं को दबाना नहीं आता। एक पल में उन्हें एक खिलौना चाहिये और दूसरे ही पल वे उस खिलौने को छोड़ भी सकते हैं। ऐसी अवस्था में हमें उनके साथ प्रेमपूर्वक नेगोसिएशन करना चाहिये. इसे इस कथा से समझें:
• एक बच्चा भोजन नहीं कर रहा था और कोल्ड ड्रिंक की जिद किये जा रहा था। बच्चा चाहता था कि पहले कोल्ड ड्रिंक पिलाई जाये तभी वो भोजन करेगा। माँ को लग रहा था कि कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद बच्चा भोजन नहीं करेगा। माँ के कई बार समझाने पर भी जब बच्चा नहीं माना तो माँ ने एक तरकीब लगाई। माँ ने कहा कि भोजन और कोल्ड ड्रिंक साथ-साथ ली जायेगी यानि एक कौर भोजन का और एक घूँट कोल्ड ड्रिंक का। बच्चा मान गया. इसे कहते हैं सकारात्मक नेगोसिएशन। जऱा सोचिये कि आप सकारात्मक नेगोसिएशन करते हैं या अपनी चौधराहट जताकर बच्चे से वही करवाते हैं जो आप चाहते हैं? यहाँ मन्त्र यही है कि आप बच्चों में ऊर्जा प्रवाहित करके उन्हें सपनों को साकार करने के लिये प्रेरित करें. उनमे राष्ट्रभक्ति, स्त्री सम्मान, भोजन, जल और बिजली संरक्षण के लिये प्रारम्भिक काल से ही तैयार करें। बच्चों के समक्ष हम यह रट लगाए रहते हैं कि 'यह नहीं करना हैÓ। इसके स्थान पर यदि हम उन्हें यह सिखाएं कि 'यह करना हैÓ तो शायद और भी श्रेष्ठ परिणाम आयेंगे. यही लालन पालन का सिद्ध सूत्र है।

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'नकारात्मकता के बादशाह'

रोवणखारा अर्थात नकारात्मकता का वो बादशाह जो प्रति पल नकारात्मक सन्देश देता हुआ रोनी सूरत बनाए बैठा रहता है। यह व्यक्ति वह होता है जो हर बेहतर से बेहतर बात का भी नेगेटिव पोस्टमार्टम कर देता है। पत्नी के जन्मदिन पर जब पत्नी नींद से जागी तो देखा एक दिव्य माहौल है। चारों ओर सजावट है और गुब्बारे लगे हैं। वो बहुत खुश हुई। ज्यों ही बाहर गयी तो खुशी के आंसू छलक पड़े। बाहर उसके माता पिता आशीर्वाद देने खड़े थे। वो पति से बड़ी खुश थी। इतनी खुश कि मानो समूचा संसार कदमों में हो। परन्तु उसी समय उसकी नई साडी पर हल्दी का दाग लग गया। यहीं से दु:ख शुरू। इसके बाद पति, माता-पिता आदि ने पूरा दिन हंस खेल के बिताया परन्तु दाग के दु:ख ने उसकी सारी खुशी छीन ली। 

हमारी समस्या यही है कि हम खुशी को एक सीमा में बांध लेते हैं और छोटे से दु:ख को ओढकर, पुरानी खुशी को भूलकर, रोनी सूरत बना रोवणखारे बन जाते हैं। संगठनों में भी हम अपने अच्छे कार्यों के समाचारों से ज्यादा खुश नहीं होते अपितु छोटी सी नकारात्मक बात की चटखारे लेकर विस्तार से चर्चा करते हैं। यही रोवणखारे या नकारात्मक बादशाह बनने की पहली सीढी है।
संगठन में यदि ऐसे पांच फीसदी नकारात्मक बादशाह हों, तो संगठन स्वत: नष्ट हो जाता है। ये महान नेगेटिव दार्शनिक होते हैं। एक व्यक्ति दुकान पर चादर खरीदने पहुंचा। चादर में सुई के जितना छेद था। छेद देखकर वो तुरंत बोल पड़ा- चादर में ये इतना बड़ा गड्ढा कैसे है? यानि हर बात का नकारात्मक छिद्रान्वेषण।
ऐसे कार्मिक संगठनों के लिये कलंक हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे या नकारात्मक बादशाह सिर्फ निचले स्टाफ में होते हों। ऐसे व्यक्ति अधिकारी भी होते हैं जो हर पल संगठन के मुखिया का सहयोग किये बिना, मन में कुड़कर, उसके द्वारा किये गए कामों की आलोचना अपने जूनियर्स से करते हैं और एक दिव्य नकारात्मक माहौल बनाकर मुखिया को काम करने से रोकते हैं। ऐसे लोग संगठन में कुछ भावुक कर्मचारियों को ढूंढकर, उन्हें सब्जबाग दिखाकर मुखिया के विरुद्ध उनका इस्तेमाल करते हैं और स्वयं परदे के पीछे रहते हैं। यही रोवणखारे संगठन के कलंक होते हैं। ऐसे रोवणखारों से बचिये। यहां मन्त्र यही है कि यदि कोई आपका भोजन प्रदूषित कर दे तो क्या आप उसे खायेंगे? यदि नहीं, तो नकारात्मक बातों पर चटखारे लगाने वाले या नकारात्मक बादशाह क्यों बनते हैं? जरा सोचिये।

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'सीधा या टेढा मार्ग?'

एक राजा ने कसरत करना त्याग दिया और जमकर भोजन करना प्रारम्भ कर दिया। इस कारण उसका वजन तेजी से बढऩे लगा और उसे अनेकानेक रोगों और व्याधियों ने जकड़ लिया। मंत्रियों, रिश्तेदारों, पत्नी और परिवार के समझाने के बाद भी राजा नहीं माना और उसने कसरत करना प्रारम्भ नहीं किया। जब राजा मंत्रियों और प्रजा द्वारा दी गई सलाह से परेशान हो गया तो उसने फरमान जारी करते हुए कहा कि जो भी उसे वजन कम करने की सलाह देगा, उसे एक माह में राजा का वजन कम करवा के दिखाना होगा और यदि ऐसा न हुआ तो उस व्यक्ति का सिर कटवा दिया जाएगा। डर के कारण अब राजा को कोई भी सलाह नहीं दे पा रहा था। एक मंत्री ने एक दिन राजा के सामने एक ज्योतिषी को बुलवाया। ज्योतिषी ने कुछ मन्त्र पढ़कर कहा कि राजा की आयु सिर्फ एक माह ही बची है। अब राजा चिंता में डूब गया। एक माह तक उसे भोजन की इच्छा ही नहीं हुई। राजा डरा हुआ था। एक माह बीत गया। जब एक माह बाद भी राजा नहीं मरा तो उसने उसी ज्योतिषी को वापिस बुलाकर सभा में कहा कि उस ज्योतिषी को मृत्युदंड दिया जाये। तभी मंत्री ने कहा कि यह व्यक्ति असल में ज्योतिषी नहीं बल्कि एक वैद्य है और उस मंत्री ने राजा का वजन कम करने के लिये यह चाल चली थी। राजा ने जब आईने में देखा तो वाकई उसका वजन काफी कम हो गया था। 

* बुरी आदतें बड़ी ही मुश्किल से जाती हैं। जब तक कोई डर न हो , बुरी आदत या व्यसन हमें छोड़ता ही नहीं है। कथा से यह स्पष्ट है कि कुछ आदतें जुबान की समझाइश से नहीं अपितु छड़ी के डर के कारण छूटती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि सिर्फ सकारात्मक बातें करने, बढिय़ा तरीके से काउंसलिंग करने से ही परिणाम नहीं मिलते। कई बार काउंसलिंग के साथ - साथ व्यक्ति को भयभीत भी करना पड़ता है।
* कई बार यथेष्ट कार्य करवाने के लिये उल्टा मार्ग भी अपनाना पड़ता है। जो व्यक्ति आपके श्रेष्ठ और मृदु व्यवहार से नहीं सुधरे, उसके साथ टेढा मार्ग भी अपनाना पड़ता है।
* कॉर्पोरेट जगत में ऐसे किस्से आम होते हैं। कर्मचारियों को भयभीत करने, उनकी बुरी आदतों के कारण उन्हें निकाले जाने का भय दिखाने और कभी - कभी औचक रूप से सख्त कार्यवाही करना भी अत्यावश्यक होता है। यदि ऐसा नहीं किया तो आपको "फॉर ग्रांटेड" ले लिया जायेगा जिसका अर्थ है कि आपकी इज्जत में कमी आती जायेगी।
यहां मन्त्र यही है कि जहां तक हो सके, सीधे मार्ग पर चलें लेकिन जब सीधे मार्ग पर चलने से मंजिल नहीं मिले तो थोड़ा सा परिवर्तन करें। इसका अर्थ नैतिक मूल्यों से समझौता करना नहीं है। इसका अर्थ है कि आप दूसरे मार्ग से मंजिल की ओर जा रहे हैं।

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'क्या आप बच्चे हैं?'

क्या आपने किसी बच्चे के व्यवहार को गौर से देखा है? उसमे कुछ गुण जैसे नकल करना, तुरंत प्रतिक्रिया देना, आदि आम बात होती है. हम सभी अपने जीवन में किसी न किसी पल बच्चे होते हैं. यहां बच्चा होने का तात्पर्य उम्र से नहीं है. आप पचास साल के बच्चे भी हो सकते हैं यानि आपकी आयु चाहे जो भी हो लेकिन यदि आपके निम्नलिखित गुण हैं तो आप बच्चे ही हैं-

1. तुरंत प्रतिक्रिया देने की आदत : किसी भी बात को सुनकर, उसे समझे और विश्लेषण किये बिना ही अपना मत रख देना बच्चे का विशेष गुण होता है. आप बच्चे से जो भी कहेंगे, वो तुरंत प्रतिक्रिया देगा. उसमे इतनी समझ ही नहीं है कि पहले सुने, फिर उस बात को समझे और और उसके बाद अपना मत रखे. यदि आप भी बिना सोचे समझे तुरंत ही प्रतिक्रियाएं देते हैं तो आप भी बच्चे ही हैं और आपका बचपना अभी गया नहीं है. इसे सुधारिये. प्रतिक्रिया देने से पहले चार बार सोचिये. यह जानने की कोशिश कीजिये कि यहां बोलना जरूरी है या नहीं? हर जगह बच्चे की तरह मुंह न खोलिये.
2. इम्पल्सिव व्यवहार : इम्पल्सिव व्यवहार बच्चे का दूसरा गुण है. इम्पल्सिव व्यवहार का अर्थ है-भावनाओं पर, शब्दों पर और अपनी क्रियाओं पर नियंत्रण न रख पाना. उदाहरण के तौर पर आपको किसी ने कहा कि आज तो नए कपड़े पहने हैं , क्या बात है? आपने इम्पल्सिव व्यवहार के साथ तुरंत ही जवाब दिया कि 'क्यों, रोज गंदे कपडे पहनते हैं क्याÓ? समाज में कई व्यक्ति इम्पल्सिव व्यवहार का शिकार हैं. उन्हें आप चाहे जितना धैर्य रखने के लिये कहें लेकिन कुछ मुद्दों पर तो वो एकदम से आक्रामक हो उठते हैं. यही इम्पल्सिव व्यवहार कहलाता है. इससे बचिये. धीरज रखिये. एकदम से आक्रामक होना पशु के समतुल्य हो जाना है. विवेक से निर्णय लीजिये. यह अत्यावश्यक है.
यहां मन्त्र यही है कि अपने मन में छिपे बच्चे को तभी बाहर निकालें जब आपके उसकी तरह निश्छल और सच्चे बनना चाहते हैं. एकदम से रियेक्ट करना, कभी भी किसी से कुछ भी कह देना, कहने के बाद अफसोस करना , आदि दुर्गुणों से बचिये. यह बचपना है. बच्चे होने से बचिये क्योंकि यह रोजमर्रा के जीवन में सुखी रहने और नौकरी के दौरान शांत चित्त से काम करने के लिये अति आवश्यक है.

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बीकानेर - यह जानबूझकर की गई 'गलती' तो नहीं?

नेता गिरी - अनुराग हर्ष। पिछले दिनों अंत्योदय रेल शुरू करने के मौके पर रेलवे की ओर से वितरित किए गए आमंत्रण पत्र इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। दरअसल, रेलवे के कार्ड में बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी का नाम था लेकिन बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपालकृष्ण जोशी का नाम नहीं था। इतना ही नहीं संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल का नाम भी गायब था। हालांकि स्वयं विधायक गोपाल जोशी ने अब तक इस मामले में कोई नाराजगी जाहिर नहीं की है लेकिन बीकानेर पश्चिम के मतदाता जरूर रेलवे की इस गलती से नाराज है। माना जा रहा है कि रेलवे का यह कार्ड भाजपा की राजनीति को दर्शा रहा है। कार्ड में सिर्फ बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी का नाम दिया गया, जो स्वयं इस कार्यक्रम में पहुंची ही नहीं। शायद यह पहले से तय था कि सिद्धि कुमारी कार्यक्रम में नहीं होगी। जो आ सकते थे, उनका नाम नहीं दिया। न सिर्फ गोपाल जोशी बल्कि नगर विकास न्यास के चैयरमेन महावीर रांका को भी कार्यक्रम से किनारे रखा गया। दोनों के नाम अगर कार्ड में होते तो दोनों निश्चित रूप से पहुंच जाते। 

वैसे भाजपा को इस कार्यक्रम से अलग नहीं रखा गया। मंच पर जनता के प्रतिनिधि यानी विधायक भले ही नहीं थे लेकिन पार्टी के प्रतिनिधि यानी जिलाध्यक्ष दोनों मौजूद थे। कार्यक्रम भले ही सरकारी था लेकिन पार्टी के पदाधिकारियों को मंच मिल गया।
दरअसल, राजनीति में ऐसा चलता है। अपनो को खुश रखने का सिलसिला और दूसरों को नीचे दिखाने की कोशिश। इसके बाद भी यह ध्यान रखना ही चाहिए कि जनता के प्रतिनिधि का ही अगर अपमान होगा तो उस राज में जनता का मान और सम्मान कैसे हो सकता है? जिनका अपमान हुआ है, उन्हें भी इस बारे में 'संज्ञान' लेना चाहिए था क्योंकि मामला सिर्फ उन तक सीमित नहीं था।

यह कैसी हो रही है राजनीति

यह पहला अवसर नहीं है जब पार्टी के विधायकों की अनदेखी हुई है। इससे पूर्व में भी अपनो की अनदेखी का चलता आ रहा सिलसिला राजनीति में कोई नया नहीं है। बात करें शिलान्या की या फिर विकास कार्यों के लोकार्पण की। उसमें भूल से रह गया हो या फिर जानबूझ कर गलती माने। क्षेत्र के विधायक को बुलाना तक मुनासबि नहीं समझ रहे है। जबकि विधानसभा में अपने हो या पराए दोनों ही एक-दूसरे के आमने-सामने होते है। बरहाल पार्टी की बात करें या पार्टी पदाधिकारियों की। वे चाहे भले ही जानबूझकर की गई इन छोटी-छोटी गल्तियों को चाहे भले ही नजर अंदाज कर दें, किंतु जनप्रतिनिधियों से जुड़े कार्यकर्ता तथा जनता छोटी से छोटी बात को भी गंभीरता से लेती है।

रिपोर्ट कार्ड में कौन आगे

चार वर्षों तक चाहे भले ही पार्टियां अपने विधायकों तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों का संज्ञान न लें, लेकिन जब बात अंतिम व चुनावी वर्ष की आती है तो पार्टियां अपने विधायकों के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर उनके कार्यों का मूल्यांकन व आंकलन करने लग जाती है। यहीं नहीं चुनाव में उनकी भूमिका तथा टिकट भी रिपोर्ट कार्ड के आधार पर तय होता है। यदि सरकार में हो या फिर विपक्ष में। पार्टियां यदि वर्ष में कम से कम एक बार अपने-अपने क्षेत्र के विधायकों की क्लास लें तथा उनकी ओर से पार्टी तथा जनहित में किए जा रहे कार्यों के बारे में सुध लें तो उसका ही फायदा पार्टियों, जनप्रतिनिधियों को मिलेगा, बल्कि जनता को भी होने वाले विकास कार्यों का समुचित लाभ मिल सकेगा। किंतु बात करें पहले वर्ष की तो पूरा साल जीत के जश्न में ही समाप्त हो जाता है। दूसरा वर्ष क्षेत्र में घूम-फिरकर उसके समझने तथा वोटरों की नब्ज टटोलने में बीत रहा है। तीसरे वर्ष में जब थोड़ा बहुत काम शुरू होता है। तब तक एक-दूसरे की टांग खिंचाई शुरू हो जाती है। इतने में चौथा साल भी निकल जाता है। ऐसे में पांचवा एवं कार्यकाल का अंतिम वर्ष चुनाव से होता है। जिसमें पार्टियों को ही नहीं जनप्रतिनिधियों को भी अपना कदम फंूक-फूंक कर रखना होता है। ऐसे में जनता की सुध लेने की फुर्सत तक नहीं मिलती। फिर भला रिपोर्ट कार्ड कैसा? पार्टियां तथा जनप्रतिनिधि कैसे और कौनसे रिपोर्ट कार्ड की बात कर रहे है। यह तो समझ से परे है, किंतु इतना जरूर है कि जनता से तीन-चार साल तक दूर रहने वाले जनप्रतिनिधियों को इन दिनों फुर्सत ही फुर्सत है। वे जनता के बीच पहुंचने तथा अपनी पार्टियों की रीति-नीति, कार्यों तथा उपलब्धियां गिनवाने से नहीं थक रहे है।

कौन कितना नजदीक?

स्थानीय राजनीति को यदि एक बारगी दरकिनार कर दिया जाएं तो चार साल नदारद रहने वाले कार्यकर्ता तथा नए-नए चेहरे नजर आने लगे है। वे हर तरह से चर्चा में रहना चाह रहे है। वे चाहते है कि उनकी चर्चा हो। ताकि चुनाव की राह उनकी आसान हो जाएं। चुनाव की बात करें तो इन दिनों हर कोई टिकट की दौड़ में शामिल हो रहा है। इनमें से कई चेहरे तो न पहले दिखे है और न ही दिखाए गए है। वे भी बढ़-चढ़कर सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनने से पीछे नहीं रह रहे है। जुगाड़ बिठाने की राजनीति भी गर्माने लगी है। कौन शीर्ष नेताओं या टिकट वितरण करने वाले आकाओं के नजदीक है। इसकी जानकारी जुटाने तथा जुगाड़ बिठाने में मशगूल नजर आ रहे है। आने वाले विधानसभा चुनाव में किसकी टिकट पक्की होगी, किसकी कटेगी ऐसे कयास भी लगाए जा रहे है।

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'ईश्वर पर रखें विश्वास'

एक पर्वतारोही अपने देश की पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने ही वाला था. गहन अन्धकार था. रात के दो बज चुके थे. तभी अचानक पर्वतारोही का पैर फिसला और वो नीचे की ओर गिरने लगा. गिरते हुए उसने अपने अंतर्मन से ईश्वर को याद किया और प्रार्थना की कि ईश्वर उसकी रक्षा करे. थोड़ी देर बाद उसने पाया कि वो लटका हुआ है. पर्वतारोही के कमर पर सुरक्षा हेतु रस्सी बंधी थी और वो उसी से लटका हुआ था. तभी आकाशवाणी हुई. आकाशवाणी से पर्वतारोही को कहा गया कि वो अपने दोनों हाथों में पकड़ी रस्सी को छोड़ दे और चाकू निकालकर अपने कमर से बंधी रस्सी को काट डाले. पर्वतारोही भयभीत था. उसने आकाशवाणी की नहीं सुनी और रात भर हाथों से रस्सी को पकडे रहा. सुबह जब रेस्क्यू टीम पहुंची तो उस टीम ने पर्वतारोही को मरा हुआ पाया. खास बात यह थी कि जमीन उस पर्वतारोही से सिर्फ एक फुट नीचे थी. यदि उसने ईश्वर के संकेत रूपी आकाशवाणी को मान लिया होता तो वो जमीन पर होता. ईश्वर पर विश्वास नहीं करने के कारण उसे अपने प्राण गंवाने पड़े. इससे यह स्पष्ट है कि: 

* ईश्वर की मदद पर संदेह करना मूर्खता है. जब तक हम हैं, ईश्वर सदा हमारी सहायता करने के लिये तत्पर रहता है. समस्या यह है कि हमें ही इस पर विश्वास नहीं होता. मुसीबत में, कष्ट में, समस्या में वो कभी हमें अकेला नहीं छोड़ता. वो हमें कष्टों को सहन करने का प्रशिक्षण देता है और इसी प्रशिक्षण को पाकर हम जीवन की मुसीबतों का सामना करने हेतु तैयार होते हैं.
* ईश्वर से कभी गलती नहीं हो सकती. उसका प्लान हम समझ ही नहीं सकते. रामायण में हमें लगता है कि कैकेयी के कहने के कारण श्रीराम राजा नहीं बने. यह अर्ध सत्य है. श्रीराम का जन्म तो राक्षस राज्य और अहंकारी रावण को समाप्त कर राम राज्य बनाने हेतु हुआ था. अब यदि हम सिर्फ कथा को देखें तो कैकेयी और मंथरा खलनायिका नजर आती हैं लेकिन वे तो निमित मात्र थीं. ईश्वर का प्लान तो राक्षस राज मिटाना था और यह देख पाने में हम असमर्थ हैं.
* ईश्वर विविध रूपों में, पल प्रतिपल हमारा सहयोग करता है. एक द्वार बंद होते ही चार नये द्वार हमारे लिये खोलता है. ऐसी असंख्य संघर्ष कथाएं हैं जिनमे व्यक्ति एक स्थान पर फेल होने के बाद दूसरे स्थान पर जबरदस्त सफलता हासिल करता है.
यहां मन्त्र यही है कि ईश्वर पर संदेह न करें. ईश्वर पर दृढ़ विश्वास हमें संबल देता है, जीवन जीने की प्रेरणा देता है और सदा सकारात्मक रहकर समाजोपयोगी कार्य करने हेतु प्रवृत्त करता है. यही जीवन का सत्य है.

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