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नैना बरसे रिमझिम रिमझिम

कोई-कोई सुबह ऐसी भी होती है जब लगता है कि पिछली रात को आप किसी जंगलों, पहाड़ो और समन्दरों से चल के आये है। यात्रा थी पर कही जाना नही हुआ। कुछ ढूँढने की फिराक में थे पर पता ही ना था कि ढूंढना किसे था। और फिर आंख खुले। आप के पैर उस थकान को महसूस करें। पसीने से भीगी काया हो। बैचैन हो अवचेतन। उन जगहों से फिर से ढूंढने की कोशिशे हो। उस यात्रा को उनींदी आंखों में फिर से लाने की कोशिश हो। खाली खाली सा पिंजर अचानक ऐसे भाव से भर जाए जो आपने अब तक महसूस नही किया हो। आप अपने भीतर तक उतरते चले जाए। सारा बिखराव सिमट जाये। अचानक आप लबालब होते जाते है। भाव से। प्यार से। भर जाए। इतने लबालब हो जाये कि कोई हाथ रखे और आप फूट पड़े।
कोई-कोई सुबह अपने भरे हुए मन के लिए ऐसे किसी गीत को दवा बनानी पड़ती है जो आपको छलकने का मौका दें और ऐसे में लता के गाये नैना बरसे को एक बार फिर सुनना पड़ता है। जाने कितने बरसो से सुनते ही आ रहे है। संगीतकार मदन मोहन की ये कमाल धुन राज खोसला की फिल्म वो कौन थी मे दर्ज है पर इस धुन के इस्तेमाल की कहानी भी कम लाजवाब नही। नैना बरसे की धुन को मदन मोहन रिकार्ड करने से अठारह साल पहले ही बना चुके थे पर जाने क्या था कि लगातार हर निर्माता-निर्देशक इसे रिजेक्ट किये जा रहे थे। इतना रिजेक्ट कि मदन मोहन ने सोच लिया कि अगर राज खोसला भी इस धुन को ना कर देंगे तो इस फिर धुन के बारे में सोचना बंद कर देंगे पर राज खोसला को ये धुन बहुत पसन्द आई। सुनते ही हाँ कर दी पर अब फिल्म की एक दूसरी धुन लग जा गले उन्हें बहुत साधारण लगी। उसे रिजेक्ट कर दिया। अजीब था पर सच यही है कि रिजेक्ट हों रही धुन सलेक्ट हो गई और लगभग सलेक्ट होने वाली धुन हो गई रिजेक्ट। बाद में फिल्म के हीरो मनोज कुमार ने ये लग जा गले की धुन सुनी और सुनकर ठीक वैसे ही उस खुमार में चले गए जिस खुमार में हम सब आज तक इस गाने को सुनकर हैं। उन्होने ही राज खोसला को फिर इस गाने को फिल्म में रखने के लिए राजी किया और गाने फिल्म में रहे। आज इन दोनों गानो को सुन सुन कर हमने जमाने बदल दिए। ये गीत अब तक हम सब की सुप्त होती भावनाओ को सहलाते रहते है।
खुद मदन मोहन ने फिर इस पर बोलते हुए एक रेडियो इंटरव्यू में कहा- 'फीलिंग कैसी भी हो, किसी भी कला में ढली हुई हो, उसे वक्त और जमाना कैद नही कर सकता। वह हर समय ताजा बनी रहती है।Ó मदन मोहन साहब, कितने सही थे आप।
और फिर ये सब जानने के बाद अक्सर इस गाने को सुनते हुए एक डर मन में हमेशा हरा रहता है कि अगर उस दिन, उस रोज राज खोसला भी नैना बरसे को रिजेक्ट कर देते तो.....

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अति विनम्रता घातक

विनम्रता सद्गुण है लेकिन जरूरत से ज्यादा विनम्र होना कॉर्पोरेट जगत में घातक सिद्ध होता है। अति विनम्र होने से आप सभी के लिए सुलभ लक्ष्य हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सभी आपको सुलभ, सरल मानकर अपने काम भी आपसे करवाते जाते हैं। आप यह सोचकर अन्यों के भी काम करते जाते हैं ताकि सम्बन्ध नहीं बिगड़ जाये। नतीजा यह निकलता है कि आप स्वयं के कामों में उत्कृष्ट रूप से परफॉर्म नहीं कर पाते. अत: कॉर्पोरेट जगत में अति विनम्र होना या अत्यधिक सदाशयता का परिचय देना बहुत घातक सिद्ध हो सकता है। सभी के लिये उपलब्ध सज्जन मैनेजर की लोग प्रशंसा तो करते हैं लेकिन उसे परिणाम नहीं देते। परिणाम नहीं दे पाने के कारण अति विनम्र मैनेजर लोकप्रिय तो हो जाता है लेकिन प्रभावी नहीं हो पाता। अन्ततोगत्वा उस मैनेजर पर अप्रभावी होने का लेबल लगाकर उसे निकाल दिया जाता है। यही कठोर निर्मम मैनेजमेंट का स्याह सच है। यहां हमें मैनेजमेंट के सिद्धांत 'मंकी ऑन योर शोल्डरÓ सिद्धांत से प्रेरणा लेनी चाहिये। 'मंकीÓ का अर्थ है आपके मूल काम। यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि:
हम उतने मंकी ही अपने पास रखें जिन्हें हम फीड कर सकते हैं अर्थात उतने काम ही हाथ में लेवें जिन्हें आप सफलता पूर्वक कर सकते हों।
सदा विनम्र रहें लेकिन अपनी रीढ़ की हड्डी के केल्शियम को बनाये रखें। इसका अर्थ है कि रीढ़ विहीन 'एस मेनÓ नहीं बनें।
दूसरों के मंकी अर्थात दूसरों के कार्य स्वयं कदापि न करें। ऐसा करने पर आपको बेगार मिलती रहेगी क्योंकि सहकर्मियों को लगेगा कि आपको मंकीज की जरूरत है।
दूसरों के मंकीज यानि कामों को स्वयं ले लेने पर आप यह कहते हैं कि अब वह काम आपका है और आप अपने सहकर्मी को उसकी प्रगति रिपोर्ट भी देंगे।
विनम्र व्यवहार उन्हीं के साथ रखें जो इस विनम्रता का मूल्य समझते हों। जो विनम्रता और सदाशयता को कमजोरी मानते हों, उनके साथ पेशेवर व्यवहार ही उचित और तर्कसंगत है।
प्रशंसा और चापलूसी में अंतर करना सीखिये. चापलूसी को प्रशंसा समझकर हम कई बार अन्यों के कामों को भी कर डालते हैं, इससे बचिये।
मन्त्र यह है कि विनम्रता, प्रेम, दया आदि सद्गुण हैं। इन्हें समझने के लिए परिपक्वता की ज़रूरत होती है। अपरिपक्वों से ये उम्मीद न रखें कि वे आपके विनम्र व्यवहार को समझेंगे। अत: अति विनम्र न बनें।

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लिखने वालों के लिए सृजन का प्रवेश-द्वार है लघुकथा

सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य की सबसे अधिक उपयोग में आने वाली विधा बन गई है। हर व्यक्ति जो कुछ लिखना चाहता है लेकिन सीधे तौर पर बात नहीं करना चाहता, वह लघुकथा के माध्यम को अपनाता है। अप्रत्यक्ष रूप से किसी प्रवृत्ति या घटना पर अपनी दृष्टि रखने का एक सशक्त माध्यम बनती जा रही है लघुकथा। देखा जाए तो इसकी सहजता, सम्पे्रषणीयता और संक्षिप्तता ही ऐसे तीन कारण हैं कि नवोदित का ध्यान भी अपनी ओर खींचते हैं तो प्रौढ़ रचनाकार के लिए भी एक चुनौती बन जाते हैं। चुनौती बनने के दो कारण हैं। पहला तो यह कि लघुकथा कभी भी व्यंग्य या विश्लेषण से निकलते हुए हास्य पैदा करने का कारण बनकर चुटुकले की श्रेणी में आ सकती है। इसके लिए लेखक और खासतौर से प्रतिष्ठित लेखकों से अतिरिक्त श्रम का आग्रह हो जाता है तो दूसरी ओर लघुकथा भले ही भारतेंदु युग से चली आ रही हो, इसके शास्त्रीय स्वरूप या मानकीकरण का काम अभी तक नहीं हुआ है। अभी भी यह व्यंग्य की तरह प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए मशक्कत कर रही है। तो दूसरी ओर कई बार संस्मरण, रेखाचित्र आदि के बीच के फर्क की तरह इसे भी दूसरी विधाओं में शामिल कर लिया जाता है। व्यंग्य के मुकाबले नियमित रूप से लघुकथा लिखने वाले रचनाकारों की संख्या बहुत कम है, इस वजह से इस विधा को अभी भी साहित्य की जाजम पर चर्चा के लिहाज से तीजे-चौथे पायदान पर ही माना जाता है।
सोशल मीडिया ने जरूर इसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश की है और यह कोशिश इस रूप में सार्थक भी हुई है कि यह लिखने वालों के लिए साहित्य का प्रवेश द्वार बन गया है, लेकिन यहां यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि बात लिखने वालों की हो रही है, लिखना सीखने वालों की नहीं। जिन्हें लिखना आता है, वे छोटी-छोटी घटना और समय को उकेरते हुए अपनी बात को कहने के लिए लघुकथा विधा का उपयोग करते देखें भी जा सकते हैं। क्योंकि हर व्यक्ति के पास पर्याप्त तर्क, तथ्य और भाषा शक्ति नहीं होती, इसलिए वह अपने आसपास और परिवेश में होने वाले घटनाक्रमों पर लिख नहीं पाता, लेकिन जो भी अपने आसपास होते हुए देखता है और इन सभी को देखते हुए जो झंझावात उभरता है, उसे कहने की गुंजाइश भर से एक लघुकथा बना लेता है। अपने भाव, दृष्टि और सामान्य बुनावट के साथ बात कहने का सलीका ही लघुकथा के क्षेत्र में प्रवेश के लिए उर्वर जमीन का कारण बनता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें न तो घटनाओं की भरमार होती है और न किरदारों की भीड़। थोड़े-से शब्दों में भी अपनी बात कही जा सकती है। हालांकि इन थोड़े-से शब्दों की अधिकतम शब्द-सीमा का अभी तक कहीं निर्धारण नहीं हो सका है। हाल ही में प्रकाशित कथारंग-3 के ‘लघुकथा अंक’ में सबसे छोटी लघुकथा मुकेश व्यास की मिलती है, जो 29 शब्दों की है और अपनी बात कहने में सफल भी, लेकिन कई बार लघुकथा के नाम पर कहानी के शब्दों को कम करने की कोशिशें हास्यास्पद स्थितियां पैदा करती है और ‘कहन’ कमजोर हो जाता है। इसलिए लघुकथा को बजाय शब्दों के एक घटना, एक समय के इर्दगिर्द बुने कथानक से लिया जाता है। जैसे ही लेखक फ्लैशबैक में गया, किरदार रचने शुरू किए या अगले समय में छलांग लगाई वह लघुकथा से दूर होने लगता है। नव-लेखकों की यह बड़ी समस्या होती है कि वे एक समय से दूसरे समय में जाते समय भाषा के मामले में चूक जाते हैं। किरदार रच नहीं पाते और कथानक को सम्पे्रषणीय बनाने के लिए स्मृतियों तथा संयोगों का सही तरीके से आश्रय नहीं ले पाते। इसलिए बड़ी कहानियों की बुनावट करना उनके वश में नहीं होता लेकिन लघुकथा के माध्यम से अपनी बात बहुत ही आसानी से कह सकते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य में प्रवेश का वह द्वार है जो आपको एक रचनाकार के रूप में पहचना तो दिला सकता है, लेकिन यह पहचान ठीक उसी तरह की होती है जैसे लघुकथा होती है। बहुत सारे लेखकों ने पहले लघुकथा लिखी और फिर उसी के विस्तार से बेहतर कहानियां भी रच पाए। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि लघुकथाएं करते हुए लिखने वाला सृजन के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है, बशर्ते कि उसे लघुकथा के छोटे-छोटे ‘रिस्क-फैक्टर्स’ का पता हो। इन सभी के बीच में लघुकथा-विधा की प्रतिष्ठा का सवाल अभी भी खड़ा है और यह प्रतिष्ठा तब ही संभव है जब परिपक्व और प्रतिबद्ध रचनाकार स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम लघुकथा को चुनेंगे।
आयोजनों की धूम
बीकानेर में साहित्य-कला-संस्कृति के आयोजनों की संख्या इन दिनों बढ़ी-चढ़ी रही है। बीकानेर में लंबे समय बाद टीएम ऑडिटोरियम में विरासत संवद्र्धन संस्थान की ओर से मुशायरा आयोजित किया गया तो बरबस ही सवाल खड़ा हुआ कि क्या मुशायरा अब दो-ढाई सौ की तादाद तक सीमित हो चुका है? शहर में सुनने वाले कम हो गए हैं कि बुलाने वालों ने ही कुछ सरहदें या अर्हताएं तय कर दी हैं? मुशायरा और कवि-सम्मेलन का तो मतलब ही खुला आसमान और सामने बैठा हर खासोआम हुआ करता था। ये सारे परिवर्तन के लक्षण हैं तो यही सही। दूसरी ओर कथारंग के दोनों अंकों का लोकार्पण बीकानेर में होने के बाद इस बार हनुमानगढ़ में लघुकथा अंक का लोकार्पण करवाया गया और इसे साहित्य को बंद कमरों से आम जन के बीच ले जाने की कवायद बताया गया। ‘जन तक सृजन’ अभियान के तहत जहां बीकानेर से बाहर भी साहित्यिक माहौल बनाने की बात हुई तो यह भी एक बड़ी खबर है कि जल्द ही एक लघुकथा सम्मेलन के लिए बीकानेर में लेखक जुट रहे हैं। डेजर्ट फेस्टिवल भी हुआ लेकिन कुछ सूना-सा लगा। कुछ चेहरे गायब मिले। आयोजनों में यह होना कोई नई बात नहीं है। दो अक्टूबर को जनकवि हरीश भादाणी का जन्मदिन था। कृतज्ञ शहर उन्हें नहीं भूला।
खामोश हुआ एक समय
सीपी माथुर नहीं रहे। बीकानेर रंग-जगत में वे एक हलचल की तरह थे। जहां जाते एक हलचल मचा देते। उनकी दमदार आवाज और उस पर जिंदादिली। जहां खड़े होते अपना ध्यान खींचते। पूरा जीवन संघर्ष में बीता लेकिन हार नहीं मानीं। घर बनाने का सपना पूरा होने वाला ही था। निमंत्रण-पत्र बांट रहे थे कि एक एक्सीडेंट हुआ और मेजर आपरेशन के बाद लंबा समय शून्य में बीता। फिर कैंसर ने जकड़ लिया। हार्ट-पेशेंट भी थे। बावजूद इसके ‘खामोश अदालत जारी है’, ‘गुलाम बादशाह’, ‘पंछी ऐसे आते हैं’ जैसे कितने ही नाटकों में अपने किरदार से लोकप्रिय हुए सीपी माथुर को भुला पाना इतना आसान नहीं होगा। वास्तव में वे ऐसे रंगकर्मी थे, जिन्होंने बीकानेर के रंगजगत को अपने खून-पसीने से सींचा। एक ऐसी आवाज को खामोश होना भला किसे नहीं अखरेगा।

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न्यूटन फिल्म नही एक पूरी की पूरी विचार प्रक्रिया है

अमित मसूरकर की फिल्म न्यूटन का विचार अद्भुत और पावन है। यह लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव कहे जाने वाले चुनाव और देश के दूरदराज, मुख्य धारा के शहरों से दूर बैठे उस आम वोटर की पूरी विचार प्रक्रिया है। फिल्म की कहानी कहने भर को इतनी सी है कि छतीसगढ में नक्सलवाद से प्रभावित एक छोटे से पोलिंग बूथ में मतदान होना है जिसके लिये न्यूटन राजकुमार राव, रधुबीर यादव और अन्य लोगो की सरकारी ड््यूटी लगती है। सुबह नौ बजे से तीन बजे तक के इस मतदान के समय के बहाने फिल्म लोकतंत्र से शुरू होती है और जन के मन तक पहुच जाती है। यहां ये बताना बेहद जरूरी हो जाता है कि हिन्दी सिनेमा ने इससे पहले कभी चुनाव प्रक्रिया पर फिल्म नही बनाई है। हिन्दी सिनेमा में चुनाव का मुख्य विषय चुनाव जीतना और हारना से लेकर इसमें किये जाने वाले जोड तोड, भ्रष्टाचार और दूसरे तथ्यो पर ध्यान दिया है। इस बार सिनेमा पोलिंग पहली बार पोलिंग बूथ के अंदर घुसा है। फिल्म का तनाव दरअसल इस बात पर है कि उस बूथ के सत्तर से ज्यादा लोगो के वोट कास्ट किये जायें जबकि तनाव इस पर आकर खत्म होता है कि क्या लोकतंत्र का मतलब हम सभी ने ज्यादा से ज्यादा वोट कास्टिंग और शांतिपूर्ण मतदान से मान लिया है जबकि लोकतंत्र तो वास्तव ये होना चाहिए कि सरकार या उम्मीदवार ये जाने कि उस इलाके में रहने वाले लोगो की समस्याएं क्या है। उसकी अपने प्रतिनिधि से क्या उम्मीदें है और क्या उसने चुनाव जीतने के बाद वो सब किया जाता है, जो उसने वादा किया था। फिल्म में एक जगह जब न्यूटन आम लोगो से पूछता है कि तुम अपने जनप्रतिनिधि से क्या चाहते हो तो आम आदमी का जवाब मिलता है कि क्या वो उसकी फसल का सही भाव उसे दिला देगा। आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर आम जन को सरकार येे बुनियादी जरूरतें ही नही दे पा रही है तो फिर इस देष मे बुलेट ट्रेन की बात करना गरीबो का जमकर उडाया गया मजाक लगता है। लोकतंत्र का मजाक ये भी है कि आज तक भी आम वोटर को अच्छे उम्मीदवार नही मिलते जिसका नतीजा ये है कि वोटर को अच्छे या बुरे में से एक नही चुनना होता। दरअसल उसे बुरे और कम बुरे में से एक चुनना होता है। लोकतंत्र और चुनाव को हमने बुलेट और बटन तक सीमित कर दिया है। पिछले कुछ समय मे बड़े शहरों में वोट कास्टिंग बढ़ी है पर भारत केवल दिल्ली-मुम्बई-बेंगलोर नही है। ठेठ गांव तक में कास्टिंग बढी है पर लोगो के वोट करने के पीछे कारण भी जानने होंगे। जानना ये होगा कि क्या हम सभी वोट का इस्तेमाल अपना जीवनस्तर सुधारने के लिये कर रहे है या फिर सत्ता के चेहरे बदलने के लिये। हम आम आदमी के जीवन में सत्ता बदलने पर कोई महत्वूपर्ण बदलाव आता है या नही, ये जानना बेहद जरूरी है। क्या हम लोकतंत्र की जुगाली करते जाॅम्बी तो नही बन गये है। जाॅम्बी की तरह चुनाव तो नही हो रहे है। जाॅम्बी की तरह वोट कास्ट और जाॅम्बी की ही क्या हम लोग भक्ति या विरोध तो नही करने लगे है। क्या हमारे विचार खत्म होते जा रहे है और लोकतंत्र में क्या व्यक्ति विचार से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चले है। फिल्म न्यूटन ऐसे ही तीखे सवाल उठाती जो बेहद महत्वपूर्ण है, समझने लायक है। सहेजने लायक है। 

फिल्म न्यूटन कमाल है इसमें कोई दो राय नही। हम फिल्म के तकनीकी पक्ष की बजाय इसके विचार में घुसने की जरा कोषिष करते है। एक आदर्षवादी किरदार न्यूटन जो हर स्थिति में भी ईमानदार और सही रहना चाहता है। ऐसे बहुत से देष में युवा होंगे जो सिस्टम में है या सिस्टम से बाहर है पर अपना संघर्ष कर रहे है। एक पुलिस अधिकारी आत्मा सिंह का चरित्र है जो सही गलत का न सोचकर परिणाम के बारे में सोच रहा है। एक अपने रिटायरमेंट के नजदीक पहुचा सरकारी बाबू है जो अपनी नौकरी के आखिरी चुनाव मे ड्यूटी दे रहा है और एक दूसरा बाबू जो कि केवल इसलिये नक्सलवाद से प्रभावित इलाके मे चुनाव ड्यूटी को पहुचा है क्योंकि उसको केवल हेलीकॉप्टर में सफर करना है। पहले ही दृष्य मे चुनाव प्रचार के सीन में एक एक फ्रेम में लोगो के चेहरे देखिये। कुछ गुलाल रंगे समर्थन में। कोई मोबाइल रिकार्डिंग में। कुछ हैरान परेषान और बाकी सभी तटस्थ। बिना किसी भाव के। ऐसा लग रहा है कि तटस्थ वाले वो लोग है जो अब इस प्रक्रिया से बेहद उदासीन हो चुका है। चुनाव और सत्ता इनके लिये रस्म अदायगी रह गई है। आम आदमी क्या हम काले और सफेद के बीच फर्क करना भूल गया है। अमित मसूरकर और मयंक तिवारी ने इस पटकथा को फिल्मी नही बनाया है। इसे बेहद जिम्मेदारी से लिखा है और गंभीर सिनेमा बनाया है। सब कुछ हमारे सामने घटता हुआ दिखता है। बिना गोलियों की आवाज के, बिना किसी तरह की हिंसा दिखाए फिल्म उस माहौल का तनाव को बहुत अच्छे से दिखाती है। फिल्म ब्लैक हयूमर है और इसके वन लाइनर तो और भी उम्दा है। चुटीली है, हंसाती है और बहुत बार तिलमिला भी देती है। अभिनेता राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी और रधुबीर यादव ने बहुत उम्दा काम किया है। बेहद संयमित होकर बात कही है सारी। ये सभी प्रतिभाये देष की धरोहर है। अभिनय आसान नही होता पर ये करते है तो लगता है कि आसान ही होगा। फिल्म आॅस्कर के लिये भारत की अधिकारिक एंट्री है और नेकनीयती से बने इस सिनेमा को सभी दुआएं है। अंत साहिर के शेर के साथ। हम सभी के लिये जो आज तक इस चुनाव प्रणाली के बहाने छले ही जा रहे है।
हमीं से रंग-ए-गुलिस्तां, हमीं से रंग-ए-बहार
हमीं को नज्म एं गुलिस्तां पे इख्तियार नही

NAVAL VYAS

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‘गार्बेज इन ब्रेन’

जरा एक पल के लिए महसूस करिये। आपका एक पक्का दोस्त आपके घर आकर आपके ड्राइंग रूम में गोबर, विष्टा, मूत्र तथा शहर का सबसे गंदा कूड़ा करकट डाल देवे तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? उस मित्र की धुनाई, या पुलिस बुलाना या संबंधों की समाप्ति। शायद यही होगी। क्या आप उससे यह कहेंगे कि यह कूड़ा ज्यादा संक्रामक नहीं है इसलिये और गंदगी डाल देवें। शायद नहीं। आप उस कूड़े को तुरंत ही साफ करेंगे और उसका नामोनिशान मिटा देंगे।
यहाँ प्रश्न यह है कि जब बाहरी कूड़े को इतने अच्छे से साफ करते हैं तो जो गंदगी व कूड़ा हमारे मित्र बन्धु या जानकार हमारे मस्तिष्क में डाल रहे हैं उसका विरोध क्यों नहीं? क्या गंदे विचारों से मस्तिष्क गंदा नहीं होता? हम जानते हैं कि जो बोयेंगे वही काटेंगे। इसी तरह हम जो भी अपने मस्तिष्क में डालेंगे वही तो प्रोसेस होकर बाहर आएगा। गार्बेज यानि कचरा डालेंगे तो गार्बेज ही बाहर आयेगा। इसे कहते हैं ‘गार्बेज इन गार्बेज आउट’ का सिद्धांत।
कई बार जब हमारा कोई मित्र या परिचित हमारे मस्तिष्क में गार्बेज डाल रहा होता है तो हम तर्क देते हैं कि इस गंदगी का प्रभाव हमपर नहीं पडेगा। घटिया षड्यंत्रकारी फिल्मों, आपराधिक फिल्मों और निकृष्ट वाहियात टी वी शो को देखकर भी हम यही कहते हैं कि ये तो मनोरंजन है। यहाँ हमें समझना होगा कि हमारा अवचेतन मस्तिष्क कुछ नहीं भूलता है। डॉ। विल्डर पेनफील्ड का शोध कहता है कि दो साल की उम्र के बाद व्यक्ति अपने जीवन की कोई घटना नहीं भूलता। अवचेतन मस्तिष्क में गंदगी पडी रहती है और कई बार चाहे न चाहे प्रकट भी होती है। इससे बचिये। सेक सिटी में रहने वाले चाल्र्स को कैंसर के चलते एक गुर्दा निकलवाना पड़ा। उसके फेफड़े भी संक्रमित हो गये। हर दिन उससे मिलने वाले मित्र उससे कहते कि मृत्यु सुनिश्चित है। चाल्र्स ने उन नकारात्मक बातों पर ध्यान नहीं दिया और जीवन जीने की चाह को बनाये रखा। चाल्र्स ने कैंसर की ऐसी दवा ली जो सिर्फ दस प्रतिशत मामलों में सफल होती थी। दवा चाल्र्स पर कामयाब रही। चार्ल्स छह वर्ष और जीया। उसके पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कैंसर नहीं मिला। वो कैंसर से मुक्त इसलिए हो पाया क्योंकि उसने ‘गार्बेज’ को स्वीकार नहीं किया और अपने अवचेतन मस्तिष्क को पोजिटिव रखा। उसकी मौत का कारण दिल का दौरा था। यहाँ मन्त्र यह है कि गार्बेज को अस्वीकार करना ही प्रगति है।

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आओ जन्मदिन मनाते हैं?

जन्मदिन के बहाने ही सही, बीकानेर में राजनीति का पैंतरा हर कोई चलाने के लिए तैयार है। पिछले एक महीने में जन्मदिन पॉलिटिक्स इतनी दमदार रही है कि हर किसी ने अपने जन्म को और अपने नेता के जन्म को उत्सव का रूप दे दिया। प्रधानमंत्री का जन्मदिन तो सर्वमान्य तरीके से मनाया गया लेकिन इसके बाद जो जन्मदिन आए वो राजनीति से पूरी तरह प्रेरित थे। राजनीति भी अंदरुनी। एक विधायक का जन्मदिन आया तो सिर्फ उनके क्षेत्र में कुछ हॉर्डिंग्स लगा दिए गए। एक टिकट दावेदार का जन्म दिन आया तो उन्होंने ‘जीमण’ कर दिया। शहर कांग्रेस अध्यक्ष का जन्मदिन आया तो शक्ति प्रदर्शन किया गया। एक नेताजी जन्मदिन मनाने मूक बधिर विद्यालय पहुंच गए। मजे की बात यह है कि एक नेता के जन्मदिन से दूसरा नेता प्रभावित हुआ तो उन्होंने भगवान का नाम लेकर ऐसे ही आयोजन कर दिया। राजनीति में अवसर ही सबसे बड़ी चीज है। ‘मौके पर चौके’ की जरूरत होती है। अब जब चुनावी सीजन शुरू होने वाला है, ऐसे में जन्मदिन ही सबसे बड़ा मौका है। पिछले दिनों जन्मदिन मनाने वालों में अधिकांश को विधानसभा में टिकट की जरूरत है तो कुछ अपनी ही पार्टी में पद की दरकार है। ‘बर्थ डे पोलिटिक्स’ गलत नहीं है, जरूरत सिर्फ इतनी सी है कि बधाई दें तो दिल से दें। आगे तारीफ और पीछे से छुरा चलाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। मेरा इशारा किसी की तरफ नहीं है, इसलिए ज्यादा दिमाग ना लगाएं, दिल से बधाई देने तक ही सीमित रहें।

इसका श्रेय कौन लेगा?
पिछले दिनों दिल्ली विमान सेवा शुरू हुई तो एयरपोर्ट पर श्रेय लेने वालों की होड मच गई। ‘जिंदाबाद-मुर्दाबाद’ के नारे लगे, केंद्रीय मंत्री को अपमानित होकर वापस लौटना पड़ा। इसके विपरीत अब सुनने में आ रहा है कि बीकानेर से जयपुर के बीच चल रही विमान सेवा दम तोडऩे के कगार पर है। अगर यह सेवा भी बंद हो जाए तो नेता जी श्रेय लेने के लिए तैयार रहें। अब इसमें ऐसा नहीं हो कि फ्लाइट जयपुर की है तो जयपुर वाले नेता का दोष और दिल्ली की है तो दिल्ली वाले नेताजी को श्रेय। देखते हैं इसका श्रेय लेने कौन आगे आएगा?
युवा भाजपा में भी आडवाणी?
भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चे की कार्यकारिणी पिछले दिनों घोषित हुई। एक भाई ने सोशल मीडिया पर लिखा कि युवा भाजपा में भी आडवाणी है। बात बहुत साधारण तरीके से कही गई लेकिन तीर बहुत निशाने पर जाकर लगा है। समझना होगा कि युवा नेतृत्व को साथ लेकर पार्टी नहीं चलेगी तो नींव हिल सकती है। फिर वो युवा जो अंग-अंग में पार्टी को रचा बसा चुका है, उसे ही हतोत्साहित किया तो नए लोग क्यों जुड़ेंगे?

अच्छा लगा नेताजी?
पिछले दिनों एक युवा नेता ने फिर से प्रभावित किया। पार्टी की नीति और रीति अपनी जगह है और मित्रवत रिश्ते और शिष्टता अपनी जगह। आज के दौर में जब नेता एक दूसरे के लिए अपशब्द बोल रहे हैं, सोशल मीडिया पर अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे में भाजपा नेता सुरेंद्र सिंह शेखावत ने पिछले दिनों अस्वस्थ चल रहे कांग्रेस नेता गुलाब गहलोत के घर पूरे लवाजमे के साथ पहुंचे। भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष अशोक सैनी भी उनके आवास पर गए। राजनीति का ऐसा स्तर तो प्रभावित करता है, अच्छा लगा नेताजी।
वो क्या कहते हैं....? हां.... किप इट अप।

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जग्गा जासूस के भुजिया और निर्देशक अनुराग बसु का बीकानेर कनेक्शन

-Naval Vyas
फिल्म जग्गा जासूस में एक जगह रनवीर कपूर डायलॉग बोलता है-बीकानेर की तो हर गली में भुजिया और नमकीन मिल ही जाता है और सुनते ही अचानक रोमांचित हो उठता हूँ। बीकानेर के सिनेमाहॉल में शायद इसी डायलॉग को सीटी, तालियों और हो-हुल्लड से भारी ध्वनिमत से पास किया गया होगा। हमारा उत्सवधर्मी शहर कोई मौका नही छोड़ता खुश हो लेने का। हमारे बीकानेर का भला राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, व्यापारियों और हम आम लोगो ने भले ही ना किया हो पर इसके नाम से एक खास उबाल जरूर हम बीकानेरी महसूस कर ही लेते है। कमबख्त इससे प्यार तो सभी को है पर वफा किसी ने नही की। सालो-साल पीछे जाता जा रहा है। अजब गजब मामला है। 
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मै जानता हूं कि तू गैर है मगर यू ही.....

साहिर का लिखा कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है हिन्दी सिनेमा के सबसे अप्रतिम गीतों में से एक है। हम बूढे होते जा रहे है और समय की छाती पर गढा ये गीत आज भी कायम है। ये चिरकुट समय से निकल कर अब तक भाग रहा चिर युवा गीत है। हिन्दी सिनेमा के लिये ये गीत सच में बडी घटना थी। इसे हम सब ने गर्मी में छत पर लेटे उनींदी रातो में आसमान पर टकटकी लगायें रेडियो पर अमीन सियानी की कंमेट्री के बीच, दोस्तो की अंताक्षरी में, स्कूल-काॅलेज की पिकनिक बस में, बाइक चलाते हुए इयरफोन में, शादी में, ब्रेकअप के मातम में सब में सुना है। ये गीत अपने आप में भरा पूरा संसार है।

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नींव के पत्थर

भारतीय प्रबंध प्रणाली 'मैं शब्द में विश्वास नहीं करती। इन्डियन मैनेजमेंट के अनुसार 'मैंÓ की समाप्ति से ही जीवन की श्रेष्ठ यात्रा, प्रेम और सेवा के भाव का उद्भव होता है। भारतीय मैनेजमेंट हमें स्वयं के श्रेष्ठ कार्यों और उपलब्धियों की जगह 'श्रेय बांटनेÓ और मौन रहकर कार्य करने वाले नींव के पत्थरों का आभार जताने हेतु शिक्षित करता है। नवीन और बलराम मूर्तिकार बनने की चाहत में शहर आये।

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