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कांग्रेस का यह कैसा डीएनए

न सिर्फ गाय बल्कि गौ के पूरे वंश यानी गौ वंश की रक्षा के लिए अचानक से कांग्रेसी चिंतित हो गए हैं। राहुल गांधी एक बात बार बार बताते हैं कि कांग्रेस के डीएनए में क्या-क्या है। इतना निश्चित है कि यह गाय कभी कांग्रेस के डीएनए में नहीं थी। इसके बाद भी उनकी पार्टी के बैनर तले इस तरह हिन्दूवादी नीति रीति की न सिर्फ बातें बल्कि उनकी आस्था से जुड़े मुद्दों की बात भी हो रही है, तथाकथित चिंता हो रही है और इसी चिंता का जमकर जिक्र हो रहा है। कांग्रेस के डीएनए में नहीं होते हुए भी ऐसा क्यों हो रहा है, इसका जवाब 'कींकरिया क्लबÓ के एक साथी ने दे दिया। उन्होंने कहा कि गोपाल गहलोत के डीएनए में गाय और हिन्दूवादी राजनीति थी। वो कांग्रेस में आकर भी वैसा ही कर रहे हैं। एक दूसरे नेता जो कांग्रेस से भाजपा में चले गए हैं, वो आज भी कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर रहे हैं। बताते हैं कि पिछले दिनों वो खुद यह स्वीकार कर चुके हैं कि वो कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर सकते हैं। 

दरअसल, कांग्रेस और भाजपा के जिन नेताओं ने पिछले चुनाव में पार्टी बदली थी, उनमें अधिकांश का अपनी मूल पार्टी में ही मन लगता है। एक नेताजी अब कांग्रेस में आ गए हैं लेकिन साथी और 'चेलेÓ अब भी भाजपा में ही है। ऐसे में वो स्वयं कांग्रेस में रहकर भाजपा के अपने मित्रों को अब तक संभाले हुए हैं। भाजपा के युवा नेताओं का समर्पण इन नेताजी के प्रति इतना जबर्दस्त है कि वो चाहकर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। अच्छी बात है। राजनीति किसी पार्टी की सीमाओं में बंधकर नहीं की जा सकती। प्रतिबद्धता एक पार्टी के प्रति हो सकती है लेकिन मित्रता सभी के साथ होनी चाहिए। बीकानेर में दो पार्टियों के बीच ऐसी मित्रता देखकर मन को सुकून मिलता है।


फिर से कर्मचारी नेता सक्रिय है


विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही कर्मचारी नेता फिर सक्रिय हो गए हैं। विभिन्न विभागों की राजनीति कर रहे कर्मचारी नेता जैसे ही चुनाव आते हैं अपनी राग तेज कर देते हैं। उनके साथ वाले भी समझ जाते हैं कि इन्हें चुनाव लडऩा है, वो ही उन्हें पीछे धकेलना शुरू कर देते हैं। दो कर्मचारी नेता इस बार भी टिकट की कोशिश में है। एक नेताजी बीकानेर में राजनीति करते हैं और दूसरे जयपुर में। दूसरे वाले नेताजी कभी कभार ही जयपुर से बीकानेर आते हैं। वो सत्ता के नजदीक है लेकिन सत्ता का हिस्सा अब तक नहीं बन पाए। पिछले दो विधानसभा चुनाव में उनका नाम आता है, टिकट नहीं आता।


बेनीवाल बिगाड़ रहे हैं फिल्डिंग

हनुमान बेनीवाल ने प्रदेश की राजनीति में अड़ंगा डाला है तो बीकानेर में भी उनसे कई बड़े नेता अब परेशान हो रहे हैं। लाखों युवाओं की मीटिंग करने वाले राजस्थान के इक्का दुक्का नेताओं में से एक हनुमान बेनीवाल ने जैसे ही बीकानेर में हुकार रैली करने की घोषणा की, वैसे ही कई नेताओं के चेहरे पर चिंता की लकीरे नजर आने लगी है। दरअसल, बेनीवाल अगर यहां मजबूत होते हैं तो कई विधानसभा सीटों पर असर डाल सकते हैं। उनसे सर्वाधिक कांग्रेस प्रभावित होगी। नोखा, श्रीडूंगरगढ़ और लूणकरनसर सीटों पर बेनीवाल की प्रभावी उपस्थिति रहती है तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को जाने वाला है। दरअसल, कांग्रेस विचारधारा के किसान मतों का बंटवारा ही बेनीवाल करेंगे। पिछले दिनों पत्रकार सम्मेलन में उनसे यह सीधा सवाल पूछा तो वो हंसी मजाक में टाल गए।

जिसा छोड़ग्या, बिसा ही हां

पद के साथ व्यक्ति की विचारधारा बदल जाती है। व्यस्तता भी बढ़ जाती है। इसी विचारधारा और व्यस्तता के बीच कई बार अपने पराए होने लगते हैं। अब तक जो लोग हमारे आगे पीछे दौड़ रहे थे, वो ही लोग बोझ लगने लगते हैं। उन्हें जरा से टेढ़ा बोला नहीं कि वो किनारे हो जाते हैं। न सिर्फ किनारा करते हैं बल्कि विरोधी उसे तुरंत अपने साथ जोड़ भी लेते हैं। पिछले दिनों कांग्रेस के एक कद्दावर नेता को कुछ ऐसा ही अहसास हुआ। इनके पास सत्ता नहीं होने के बावजूद दबदबा होने के कारण स्वभाव में अंतर देखा गया। एक युवा नेता उनसे नाराज हो गए। जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उपस्थिति में इस बड़े नेता ने अपने युवा नेता से कुशलक्षेम पूछी तो युवा नेता ने यह कहकर किन्नी काट ली..'जिसा थे छोड़ग्या हा, बिसा ही हांÓ

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'मेन्टल ब्लॉकेज'

मेन्टल ब्लॉकेज वर्तमान समय की बहुत बड़ी समस्या है. मेन्टल ब्लॉकेज का अर्थ है मस्तिष्क को एक दिशा में ही सोचने हेतु मजबूर करना, अपनी कार्यविधि को ही श्रेष्ठ मानना और विरोधी विचारधारा को बिलकुल स्वीकार न करना. यह गलत है. हाल ही में मैं अपने मित्र के घर गया. उसकी पुत्री ने मुझसे कहा कि वो अपने कमरे और स्टडी टेबल को सही ढंग से रखने का बहुत प्रयास करती है लेकिन दो दिन बाद ही कमरा वापिस अस्त व्यस्त हो जाता है. मैंने उसके कमरे में पड़ी एक पुस्तक को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया. ऐसा करते ही वो तुरंत बोली कि यह तो गलत है. ऐसा कहकर उसने पुस्तक को वापिस अपने द्वारा तय किये गये स्थान पर रख दिया. अब मैंने उसे समझाया कि उसने अपने मस्तिष्क में यह तय कर लिया है कि किस वस्तु को कहाँ रखना है. जब ऐसा नहीं हो पाता तो उसे लगता है कि सब अस्त व्यस्त है. अत: इससे बचे. मस्तिष्क को नया प्रयोग करने दे. जरूरी नहीं कि जो वो सोचती है, वही सही हो. अस्त व्यस्त कमरा नहीं अपितु हमारा मस्तिष्क है. इसपर सोचे. 

हमारी मूल समस्या यही है कि हमने अपने मस्तिष्क को एक ही प्रकार से कंडीशन कर दिया है. यह आवश्यक कतई नहीं है कि जिसे आप सही समझते हों या जो आपका निजी दृष्टिकोण हो, वही शाश्वत सत्य भी हो. मस्तिष्क को नये तरीकों से विचार करने दीजिये. क्या आप जानते हैं कि :
*आपका मस्तिष्क लगभग छ हजार मील जितनी लम्बी वायरिंग के रूप में गुंथे न्यूरोन्स के माध्यम से कम्युनिकेट करता है.
• आपका तंत्रिका तंत्र लगभग 28 लाख न्यूरोन्स से बना है जो शरीर के किसी भी भाग की सूचना को मात्र 20 मिलीसेकेंड में मस्तिष्क को पहुंचा देते हैं.
• आपका मस्तिष्क कई सुपर कम्प्यूटर्स से भी ?्यादा ते? और बेहतर है क्योंकि वो 30 लाख बिट्स की सूचना एक सेकंड में याद रख लेता है.

अब ?रा सोचिये:

• ईश्वर द्वारा दिये गये इस अनमोल तोहफे का क्या आप सही इस्तेमाल कर रहे हैं?
• कहीं आपने अपने मस्तिष्क में कुत्सित और घृणित विचार तो नहीं भर दिये हैं?
• क्या आप विरोधी विचारों को सहन करते हैं?

इनपर विचार करें और मस्तिष्क को खुला रखें. नये विचारों को ग्रहण करें. "सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार मेरे पास आते रहें" – भारतीय शास्त्र के इसी वाक्य को अपना आदर्श मानें. नया सीखना ही जीवन है अत: मेन्टल ब्लॉकेज से बचिये.

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कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस से

पिछले दिनों राजनीतिक दृष्टि से कई बड़े घटनाक्रम सामने आए। संयोग है कि दोनों ही घटनाक्रम कांग्रेस के थे और आपसी फूट से जुड़े थे। यह साबित हो गया कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता देने का मानस बनाया है या नहीं बनाया है, यह भविष्य के गर्त में है लेकिन स्वयं कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि उनकी सरकार आ रही है। पार्टी में जीत का कोई सवाल नहीं है, मुद्दा तो सिर्फ मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इसका है। यही कारण है कि हाल ही में जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर आए तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री का मुद्दा खड़ा हो गया। पहले उन्होंने सीकर में जो कुछ कहा, वो खबर का हिस्सा बना और बाद में उनकी उपस्थिति में रामेश्वर डूडी जिंदाबाद के  नारे चर्चा का केंद्र बने। दरअसल, कांग्रेस में इन दिनों तीन नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार है। पहले स्वयं अशोक गहलोत, दूसरे प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और तीसरे नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी। ऐसे में डूडी समर्थक पूरे जोश के साथ जिंदाबाद के नारे लगाने से नहीं चूक रहे थे। लोकतंत्र में इस तरह की स्वतंत्रता हर किसी को है लेकिन चुनाव से दस महीने पहले इसे जल्दबाजी कहा जाएगा। पार्टी को अभी अपनी जीत सुनिश्चित करनी है, जिसके लिए माहौल बनता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। दूसरा मामला था खाजूवाला का। यहां भी कांग्रेस खुद से उलझती नजर आई। एक तरफ तो कांग्रेस के देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत प्रदर्शन में जुटे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता गोविन्द मेघवाल। इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने अपनी फूट चुनाव से पहले ही स्पष्ट कर दी। देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने जिस तरह का प्रदर्शन यहां किया है, उससे साफ है कि वो व्यक्तिगत राजनीति में विश्वास रखते हैं।

पत्रबाजी का सिलसिला शुरू हुआ

कांग्रेस के अंदरुनी कलह का ही नमूना है कि पार्टी के नेता अपने ही पदाधिकारियों के खिलाफ जमकर पत्रबाजी कर रहे हैं। खासकर खाजूवाला मामले के बाद देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत को घेरने की तैयारी पूरी हो रही है। एक ही दिन में दो आयोजन से पहले भी गहलोत के खिलाफ प्रदेशाध्यक्ष को पत्र लिखा गया था और नए सिरे से फिर गहलोत की शिकायत की जा रही है। इस बार प्रदेश अध्यक्ष के साथ नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तक बात पहुंचाने का प्रयास हो रहा है कि यहां पार्टी को अपने ही पदाधिकारियों से नुकसान हो रहा है। यह बात अलग है कि गहलोत भी पूरी तैयारी करके मैदान में है।

क्रिकेट के बहाने राजनीति

क्रिकेट के बहाने राजनीति उ"ा स्तर पर तो होती रही है लेकिन जिला स्तर पर ऐसा मामला पहली बार ही सामने आया है। पिछले दिनों पुष्करणा स्टेडियम पर आयोजित एक क्रिकेट प्रतियोगिता के शानदार आयोजन के बाद एक नेताजी ने मंच पर खड़े होकर जमकर भाषण दिए। अपनी जाति के लिए काफी जोश और खरोश के साथ बात रखी। अ'छी बात है। इसके साथ ही उन्हें यह भी बताना था कि वो इस मैदान के लिए क्या कर रहे हैं। दुखद बात है कि बीकानेर पश्चिम विधानसभा में एक भी ऐसा खेल मैदान नहीं है जहां खिलाड़ी पूरे विश्वास के साथ अपना समय दे सकें। पुष्करणा स्टेडियम में ुसुविधा नहीं है, एमएम ग्राऊंड में जगह नहीं है। धरणीधर मैदान में कुछ कोशिश हो रही है लेकिन इंडोर गेम वाले खिलाड़ी को मन मसोसना ही पड़ेगा।

गहलोत की राजनीति

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार साबित कर गए कि बीकानेर के बड़े राजनेताओं के बावजूद उनकी फेन फॉलोविंग यहां कम नहीं है। उन्होंने 'अपनों' से जुडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ा। वो यहां अपने मित्र भवानीशंकर शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करने आए थे लेकिन आ ही गए तो कई अन्य काम भी निपटा गए। रिश्तेदार रवि गहलोत के निधन पर शोक जताया तो पुराने समय के मित्र प्रोफेसर अशोक आचार्य के घर पहुंचकर उनके पुत्र संजय आचार्य से भी मिले। इतना ही नहीं गहलोत बाद में कांग्रेस नेता और माली समाज के प्रदेशाध्यक्ष गुलाब गहलोत के घर भी पहुंचे। गुलाब अशोक गहलोत के नजदीकी रहे हैं। दरअसल, गहलोत ने जिले के बड़े कांग्रेसी नेताओं को बता दिया कि उनके क्षेत्र में भी वो वजूद रखते हैं। 

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'दिमाग में पड़े पत्थर'

एक अध्यापक सड़क किनारे बैठा जोर - जोर से हंस रहा था। लोग आश्चर्यचकित होकर उसे देख रहे थे। जब लोगों ने उसके हंसने का कारण पूछा तो उसने सभी से प्रश्न किया कि सामने कितने पत्थर पड़े हैं? सभी ने कहा कि वहां एक पत्थर पडा है। यह सुनकर वो फिर हंसने लगा। उसने हंसते - हंसते कहा कि वहां तो दो पत्थर हैं। लोगों को लगा कि वो मानसिक संतुलन खो चुका है। ऐसे में एक व्यक्ति ने हिम्मत करके पूछा कि जब वहां एक ही पत्थर है तो वो उसे दो पत्थर क्यों कह रहा है? अध्यापक ने जवाब देते हुए कहा कि एक पत्थर तो वास्तविक पत्थर है जो यहाँ पडा है और सभी को दिख रहा है। लेकिन दूसरा पत्थर सभी लोगों की अक्ल पर पडा हुआ है। उस अध्यापक ने कहा कि इस रास्ते से सैकड़ों लोग गये, उन्हें पत्थर से ठोकर लगी लेकिन किसी ने भी इस पत्थर को हटाने की कोशिश नहीं की। अक्ल पर पड़े पत्थर को क्या पत्थर नहीं कहेंगे? क्या जो दिखता है वही सत्य है? क्या अदृश्य बाधाओं और समस्याओं को नहीं देखना चाहिये? क्या प्रत्येक व्यक्ति जिसे पत्थर से ठोकर लगी उसे पत्थर हटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिये? कॉर्पोरेट जगत की सबसे बड़ी समस्या – अदृश्य बाधाओं को नहीं देख पाना। दृश्य बाधाएं और समस्याएँ तो नजर आ जाती हैं। बात तो तब है जब आप अदृश्य को भी देख सकने का माद्दा रखते हों। इसी को मैनेजमेंट में सुपर विजऩ कहते हैं जिसका अर्थ है सुपीरियर विजऩ या उसे भी देख लेना जिसे अन्य नहीं देख सकें। आपको याद रखना चाहिये कि छिपी हुई बाधाओं और समस्याओं का निराकरण ही प्रगति के मार्ग खोलता है। इसी को मैनेजमेंट में 'रूट कॉज़ एनेलिसिसÓ कहते हैं। इसका अर्थ है समस्या की जड़ में पहुंचना और फिर इसका स्थायी समाधान ढूंढना। यदि इस समय आप रोगी को ठन्डे पानी में बैठा देंगे तो इसका नतीज़ा आप समझ सकते हैं। अत: 'रूट कॉज़ एनेलिसिसÓ आवश्यक है। यहाँ मन्त्र यही है कि सबसे पहले अदृश्य छिपी वास्तविक समस्या को पहचानो और उसका समाधान खोजो। कई बार वास्तविक समस्या कुछ और होती है लेकिन दिमाग में पड़े पत्थरों के कारण हम उसकी जड़ तक नहीं पहुँच पाते। समस्या का समाधान निकालिये और जड़ तक जाने का प्रयास कीजिये। यही जीवन है।

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'संतुलित अर्थ पिशाच'

एक उद्योगपति था। उसने अरबों रुपया कमाया। जब वो मरने वाला था तो उसने अपने सेक्रेटरी को बुलाकर पूछा कि वो अगले जन्म में अमीर उद्योगपति बनना चाहेगा या उस अमीर उद्योगपति का सेक्रेटरी? सेक्रेटरी ने जवाब दिया कि वो तो सेक्रेटरी ही बनना चाहता है। सेक्रेटरी ने कहा कि वो देख रहा है कि उद्योगपति पिछले चालीस सालों से सिर्फ धन कमाने में लगा है। इसके अलावा क्या कमाया? क्या परिवार को, समाज को समय दे पाया? यदि ऐसा नहीं कर पाया तो उद्योगपति बनने से क्या लाभ हुआ? इस बात को सुनकर उस उद्योगपति को मरते - मरते ज्ञान प्रात हो गया।
धन के लिये आप दिन - रात बहुत दौड़ लगा रहें हैं लेकिन उस दौड़ के समाप्त होने पर कहाँ पहुँच पाये हैं? पैसे की, यश प्राप्ति की, समाज पर अपनी धाक जमाने की अंधी दौड़ से क्या प्राप्त होगा? कहीं उस उद्योगपति की भांति आपका जीवन भी असंतुलित तो नहीं रह गया? दिन रात लालच, एक रूपए को दो रुपया बनाने का जुनून कहीं आपके व्यक्तित्व को असंतुलित न कर दे? यदि आपके पास आपके माता-पिता, पत्नी, और बच्चों के लिये समय नहीं है तो इस धन का क्या मोल? विचार कीजिये। क्या आपके पास मित्रों की अंतहीन सूची है? क्या आपके एक कहे पर बीस मित्र आपकी मदद हेतु आगे आयेंगे? यदि ऐसा नहीं है तो आप सिर्फ एक असंतुलित अर्थ पिशाच हैं। आप वास्तव में संतुलित जीवन नहीं जी रहे हैं।
अधिकांश व्यक्ति असंतुलित जीवन जीते - जीते ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं। कहीं आप भी धन की अंधी दौड़ के चलते चिंता, क्लेश और ईष्या रूपी जंजालों में फंस चुके हैं? जरा विचार अवश्य कीजिये। चिंताएं आपको मनोरोगी बना देंगी। आप एक शुद्ध सार्थक जीवन नहीं जी पायेंगे। जीवन में संतुलन का होना आवश्यक है। आप जो आज कर रहे हैं, उससे आपके भविष्य का निर्माण होता है। अत: धन मात्र के संचय पर ही स्थान न देवें। धन के साथ साथ परिवार, सामाजिक नेटवर्क और प्रेमीजनों का भी विशेष ध्यान रखें। ऐसा नहीं करने पर आप एक धन कमाने वाले रोबोट से ज्यादा कुछ नहीं होंगे। याद रखें, कि रोबोट्स के अंतिम संस्कार में कोई नहीं जाता। यह मार्मिक सन्देश समझना ही प्रभावी सेल्फ
मैनेजमेंट है।

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'मेन्टल ब्लॉकेज'

मेन्टल ब्लॉकेज वर्तमान समय की बहुत बड़ी समस्या है। मेन्टल ब्लॉकेज का अर्थ है मस्तिष्क को एक दिशा में ही सोचने हेतु मजबूर करना, अपनी कार्यविधि को ही श्रेष्ठ मानना और विरोधी विचारधारा को बिलकुल स्वीकार न करना। यह गलत है। हाल ही में मैं अपने मित्र के घर गया। उसकी पुत्री ने मुझसे कहा कि वो अपने कमरे और स्टडी टेबल को सही ढंग से रखने का बहुत प्रयास करती है लेकिन दो दिन बाद ही कमरा वापिस अस्त व्यस्त हो जाता है। मैंने उसके कमरे में पड़ी एक पुस्तक को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया। ऐसा करते ही वो तुरंत बोली कि यह तो गलत है। ऐसा कहकर उसने पुस्तक को वापिस अपने द्वारा तय किये गये स्थान पर रख दिया। अब मैंने उसे समझाया कि उसने अपने मस्तिष्क में यह तय कर लिया है कि किस वस्तु को कहाँ रखना है। जब ऐसा नहीं हो पाता तो उसे लगता है कि सब अस्त व्यस्त है। अत: इससे बचे। मस्तिष्क को नया प्रयोग करने दे। जरूरी नहीं कि जो वो सोचती है, वही सही हो। अस्त व्यस्त कमरा नहीं अपितु हमारा मस्तिष्क है। इसपर सोचे।
हमारी मूल समस्या यही है कि हमने अपने मस्तिष्क को एक ही प्रकार से कंडीशन कर दिया है। यह आवश्यक कतई नहीं है कि जिसे आप सही समझते हों या जो आपका निजी दृष्टिकोण हो, वही शाश्वत सत्य भी हो। मस्तिष्क को नये तरीकों से विचार करने दीजिये। क्या आप जानते हैं कि :
*आपका मस्तिष्क लगभग छ हजार मील जितनी लम्बी वायरिंग के रूप में गुंथे न्यूरोन्स के माध्यम से कम्युनिकेट करता है।
* आपका तंत्रिका तंत्र लगभग 28 लाख न्यूरोन्स से बना है जो शरीर के किसी भी भाग की सूचना को मात्र 20 मिलीसेकेंड में मस्तिष्क को पहुंचा देते हैं।
* आपका मस्तिष्क कई सुपर कम्प्यूटर्स से भी ज्यादा तेज और बेहतर है क्योंकि वो 30 लाख बिट्स की सूचना एक सेकंड में याद रख लेता है।
अब जरा सोचिये :
* ईश्वर द्वारा दिये गये इस अनमोल तोहफे का क्या आप सही इस्तेमाल कर रहे हैं?
* कहीं आपने अपने मस्तिष्क में कुत्सित और घृणित विचार तो नहीं भर दिये हैं?
* क्या आप विरोधी विचारों को सहन करते हैं?
इन पर विचार करें और मस्तिष्क को खुला रखें। नये विचारों को ग्रहण करें। 'सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार मेरे पास आते रहेंÓ भारतीय शास्त्र के इसी वाक्य को अपना आदर्श मानें। नया सीखना ही जीवन है अत: मेन्टल ब्लॉकेज से बचिये।

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लक्ष्य संधान

* क्या आप प्रतिदिन अपनी ऊर्जा का पच्चीस प्रतिशत हिस्सा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु खर्च करते हैं।
* क्या आप प्रति पल यह हिसाब लगाते हैं कि आपके द्वारा किया गया कोई भी कार्य आपको आपके लक्ष्य के पास ले जाये।
* क्या आप अपने लक्ष्यों की सूची सदा अपने पास रखते हैं।
* क्या आप भावनात्मक रूप से अपने लक्ष्य से जुड़े हैं।
यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर ''नाÓÓ है तो यह तय है कि आप अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ कार्य में नहीं जुटे हैं। लक्ष्य संधान करने हेतु आपको सम्पूर्ण निष्ठा के साथए अंतरात्मा के साथ लक्ष्य संधान हेतु जुटना पडेगा। स्वर्ग किसी का बाहें फैलाये इंतजार नहीं करता। अपना स्वर्ग स्वयं अपनी शक्ति से बनाना होता है। लक्ष्य संधान हेतु जुटे रहना पड़ता है। यदि आप लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं तो इस सीढ़ी या पांच स्टेप्स का प्रयोग करें:
* लक्ष्य निर्धारण और लेखन : जो आप वास्तव में चाहते हों, उसे लक्ष्य मानें। उसको लिखें। बिना लिखा लक्ष्य उसी वार्तालाप की तरह होता है जिसे आप कुछ दिनों में भूल जाते हैं। बिना लिखा लक्ष्य अस्पष्ट और शक्तिहीन होता है। लिखित लक्ष्य को पडऩा संभव है और वह प्रेरित भी करता है।
* लक्ष्य प्राप्ति डेडलाइन बनाना : डेडलाइन का दबाव कार्य की गति को आश्चर्यजनक रूप से बड़ा देता है। अत: प्रत्येक कार्य के सामने यह लिखना न भूलें कि इसे कब तक संपन्न करना है। यही तिथि डेडलाइन है।
* कार्य के छोटे टुकड़े करें : डेडलाइन बनाने के बाद कार्य को अत्यंत ही छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट लेवें। यह स्विस चीज टेक्नीक है। इसमें प्रत्येक बड़े कार्य को छोटे टुकड़ों में बांट दिया जाता है। ऐसा करने से वो बड़ा काम आसान लगने लगता है।
* लक्ष्य प्राप्ति हेतु या कार्य संपन्न करने हेतु आपको जिन-जिन संसाधनों की जरुरत होगी उसकी सूची भी तैयार कर लेवें। ''एवरीथिंग शुड बी एट रीचÓÓ का सिद्धांत अपनाएँ।
* लक्ष्यों को प्राथमिकता के आधार पर जमायें और तुरंत क्रियान्विति प्रारम्भ करें।
यहां मन्त्र यही है कि 365 दिन लक्ष्य संधान हेतु कुछ न कुछ करते रहने से आप एक लय में आ जाते हैं। यह लय आपको आंतरिक रूप से प्रेरित करती है। इसी सकारात्मक ऊर्जा व प्रेरणा से आप लक्ष्य का संधान कर लेते हैं। यही लक्ष्य संधान का मन्त्र है।

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'नियाग्रा सिन्ड्रोम'

क्या आप वास्तव में जीवन जी रहे हैं या जीवन जीने की तैयारी में लगे हैं? अधिकांश व्यक्ति जीवन जीने की तैयारी करते - करते ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं? जीवन में उनके द्वारा किये गए गलत और घटिया निर्णयों के कारण वे सिर्फ जीवन जीने की तैयारी करते हैं। जीवन जीने की तैयारी का अर्थ है "नियाग्रा सिंड्रोम" के रोग से ग्रस्त होना। अब जरा सोचिये। जीवन एक नदी के समान है। अधिकांश व्यक्ति इस जीवन रूपी नदी में बिना तैयारी के कूद पड़ते हैं। उनकी कोई ठोस प्लानिंग नहीं होती। उनमे निर्णय लेने की ताकत भी नहीं होती। अब बिना तैयारी नदी में कूद पड़े हैं तो उन्हें "करंट" लगते रहते हैं। ये सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक या कोई भी अन्य "करंट" या समस्याएं हो सकती हैं। वे इससे जूझते हैं। जूझते - जूझते उन्हें पता चलता है कि जीवन रूपी नदी का कुछ समय में अंत होने वाला है। वो नदी कुछ समय बाद विश्व के सबसे बड़े जल प्रपात "नियाग्रा फाल्स" में गिर जायेगी। अब वे कुछ करने की तैयारी करते हैं लेकिन बहुत देर हो चुकी होती है। अंतत: वे "नियाग्रा सिंड्रोम" के कारण समाप्त हो जाते हैं। कहीं आप भी "नियाग्रा सिंड्रोम" से ग्रस्त तो नहीं हैं? विचार कीजिये:
* क्या आप सदा पैसे के अर्जन, वर्धन और रक्षण में लगे हैं?
* क्या आपके पेशे के अलावा आपकी कोई अन्य पहचान नहीं है?
* क्या समाजोपयोगी कार्य को आप "डेड इन्वेस्टमेंट" मानते हैं?
* क्या आपको लगता है कि जीवन के बहुमूल्य वर्ष कष्ट, क्लेश, लड़ाई, धनार्जन, पैसे के लेन –देन आदि के लिये नष्ट कर दिये?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है तो आप भी "नियाग्रा सिंड्रोम" से ग्रस्त हैं। इस सिंड्रोम से खुद को निकालिये। जीवन बहुत छोटा है। अगले पल का पता नहीं है। अत: श्रेष्ठ समाजोपयोगी कार्य करते चले जायें। ऐसे निर्णय लेवें जिनसे आपके साथ - साथ समाज और राष्ट्र का भी कल्याण हो। अपनी अलग पहचान बनाने का प्रयास करें। खेलें। अच्छा खाएं और खिलायें। महफिलें जमाते रहें ताकि मृत्यु के समय कंधा कम न पड़े। जनमानस से निस्वार्थ होकर मिलें। जो सच हो उसे बेहिचक कह देवें। व्यवहार को साफ रखें। देने का भाव रखें। याद रहे, जितना देंगे उसका दोगुना प्राप्त होगा। यही तो जीवन का सच है। आप पायेंगे कि जीवन अचानक सुखद सुगंध से भर गया है। जीवन का आनंद देने में है, प्राप्ति में नहीं। यही शाश्वत जीवन प्रबंध है।

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कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस से

सत्ता से पहले सत्ता की लड़ाई कांग्रेस में नजर आ रही है। कांग्रेस अगर यह मानकर चल रही है कि सत्ता खुद चलकर उनके पास आ रही है, तो उन्हें इस गलतफहमी को त्याग देना चाहिए। प्रदेश में भाजपा की जड़े इतनी मजबूत है कि वो किसी एक नेता के खराब प्रदर्शन के बाद भी अपनी वापसी करने में अब अक्षम नहीं है। ऐसे में कांग्रेस को आपसी मनमुटाव छोड़कर अपनी नीति और रीति को संभालना होगा।

पिछले दिनों राजनीतिक दृष्टि से कई बड़े घटनाक्रम सामने आए। संयोग है कि दोनों ही घटनाक्रम कांग्रेस के थे और आपसी फूट से जुड़े थे। यह साबित हो गया कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता देने का मानस बनाया है या नहीं बनाया है, यह भविष्य के गर्त में है लेकिन स्वयं कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि उनकी सरकार आ रही है। पार्टी में जीत का कोई सवाल नहीं है, मुद्दा तो सिर्फ मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इसका है। यही कारण है कि हाल ही में जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर आए तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री का मुद्दा खड़ा हो गया। पहले उन्होंने सीकर में जो कुछ कहा, वो खबर का हिस्सा बना और बाद में उनकी उपस्थिति में रामेश्वर डूडी जिंदाबाद के नारे चर्चा का केंद्र बने। दरअसल, कांग्रेस में इन दिनों तीन नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार है। पहले स्वयं अशोक गहलोत, दूसरे प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और तीसरे नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी। ऐसे में डूडी समर्थक पूरे जोश के साथ जिंदाबाद के नारे लगाने से नहीं चूक रहे थे। लोकतंत्र में इस तरह की स्वतंत्रता हर किसी को है लेकिन चुनाव से दस महीने पहले इसे जल्दबाजी कहा जाएगा। पार्टी को अभी अपनी जीत सुनिश्चित करनी है, जिसके लिए माहौल बनता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
दूसरा मामला था खाजूवाला का। यहां भी कांग्रेस खुद से उलझती नजर आई। एक तरफ तो कांग्रेस के देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत प्रदर्शन में जुटे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता गोविन्द मेघवाल। इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने अपनी फूट चुनाव से पहले ही स्पष्ट कर दी। देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने जिस तरह का प्रदर्शन यहां किया है, उससे साफ है कि वो व्यक्तिगत राजनीति में विश्वास रखते हैं।


पत्रबाजी का सिलसिला शुरू हुआ

कांग्रेस के अंदरुनी कलह का ही नमूना है कि पार्टी के नेता अपने ही पदाधिकारियों के खिलाफ जमकर पत्रबाजी कर रहे हैं। खासकर खाजूवाला मामले के बाद देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत को घेरने की तैयारी पूरी हो रही है। एक ही दिन में दो आयोजन से पहले भी गहलोत के खिलाफ प्रदेशाध्यक्ष को पत्र लिखा गया था और नए सिरे से फिर गहलोत की शिकायत की जा रही है। इस बार प्रदेश अध्यक्ष के साथ नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तक बात पहुंचाने का प्रयास हो रहा है कि यहां पार्टी को अपने ही पदाधिकारियों से नुकसान हो रहा है। यह बात अलग है कि गहलोत भी पूरी तैयारी करके मैदान में है।


क्रिकेट के बहाने राजनीति

क्रिकेट के बहाने राजनीति उच्च स्तर पर तो होती रही है लेकिन जिला स्तर पर ऐसा मामला पहली बार ही सामने आया है। पिछले दिनों पुष्करणा स्टेडियम पर आयोजित एक क्रिकेट प्रतियोगिता के शानदार आयोजन के बाद एक नेताजी ने मंच पर खड़े होकर जमकर भाषण दिए। अपनी जाति के लिए काफी जोश और खरोश के साथ बात रखी। अच्छी बात है। इसके साथ ही उन्हें यह भी बताना था कि वो इस मैदान के लिए क्या कर रहे हैं। दुखद बात है कि बीकानेर पश्चिम विधानसभा में एक भी ऐसा खेल मैदान नहीं है जहां खिलाड़ी पूरे विश्वास के साथ अपना समय दे सकें। पुष्करणा स्टेडियम में ुसुविधा नहीं है, एमएम ग्राऊंड में जगह नहीं है। धरणीधर मैदान में कुछ कोशिश हो रही है लेकिन इंडोर गेम वाले खिलाड़ी को मन मसोसना ही पड़ेगा।

गहलोत की राजनीति

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार साबित कर गए कि बीकानेर के बड़े राजनेताओं के बावजूद उनकी फेन फॉलोविंग यहां कम नहीं है। उन्होंने 'अपनोंÓ से जुडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ा। वो यहां अपने मित्र भवानीशंकर शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करने आए थे लेकिन आ ही गए तो कई अन्य काम भी निपटा गए। रिश्तेदार रवि गहलोत के निधन पर शोक जताया तो पुराने समय के मित्र प्रोफेसर अशोक आचार्य के घर पहुंचकर उनके पुत्र संजय आचार्य से भी मिले। इतना ही नहीं गहलोत बाद में कांग्रेस नेता और माली समाज के प्रदेशाध्यक्ष गुलाब गहलोत के घर भी पहुंचे। गुलाब अशोक गहलोत के नजदीकी रहे हैं। दरअसल, गहलोत ने जिले के बड़े कांग्रेसी नेताओं को बता दिया कि उनके क्षेत्र में भी वो वजूद रखते हैं।

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खाजूवाला में होगा राजनीतिक दंगल

विधानसभा चुनाव में असली दंगल तो पांच और छह महीने बाद देखने को मिलेगा लेकिन खेल के पासे फैंकने का काम अभी शुरू हो गया है। बीकानेर की सात विधानसभा सीटों में से इस बार जिस सीट पर चुनाव से पहले दंगल होने वाला है वो हैं खाजूवाला की सीट। इस बार सीट पर दलित नेताओं की बाढ़ आने वाली है। जितने भी दावेदार है, सभी दमदार है, मजबूत है। यहां से भाजपा के विधायक डॉ. विश्वनाथ है लेकिन इस बार उन्हें अपनी पार्टी के सांसद पुत्र से चुनाव से पहले दो-दो हाथ करने पड़ेंगे। दरअसल, यहां से सांसद अर्जुन राम मेघवाल के पुत्र रवि मेघवाल भी दावेदार है। दरअसल, रवि स्वयं खाजूवाला में काफी सक्रिय है और पिछले दिनों हॉर्डिंग्स लगाकर उन्होंने साफ कर दिया कि पिता की विरासत लेने के लिए पूरी तरह से तैयार है। वैसे डॉ. विश्वनाथ का काम भी कच्चा नहीं है। वो भी पूरी मजबूती के साथ इन दिनों अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे हुए हैं। अगर रवि मेघवाल विधानसभा में टिकट के दावेदार है तो चर्चा है कि डॉ. विश्वनाथ की पत्नी डॉ. विमला भी सांसद की उम्मीदवार है। अगर किसी भी स्थिति में प्रधानमंत्री मोदी अपने सांसदों को रिपोट्र्स के आधार पर बदलते हैं तो विमला डुकवाल का नाम सबसे आगे चल रहा है। चुनाव से पहले की यह मशक्कत सिर्फ भाजपा में ही नहीं है बल्कि कांग्रेस में भी मची हुई है। यहां गोविन्द मेघवाल ने पिछला चुनाव लड़ा था। इस बार उनका टिकट कटवाने वालों की कमी नहीं है। राजनीतिक रूप से गोविन्द के प्रतिद्वंद्वी रहे नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश की राजनीति में इन दिनों काफी आगे चल रहे रामेश्वर डूडी के खास और देहात कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने गोविन्द की अनुपस्थिति में ही आन्दोलन कर नए समीकरण पैदा कर दिए।

विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे पर कई बार बात हो गई लेकिन लगातार खाजूवाला में ही टिकट के लिए दौड़भाग हो रही है। इस आरक्षित सीट पर कांग्रेस बहुत कम अंतर से पिछला विधानसभा चुनाव हार गई थी। इस बार भी वहां कांग्रेस एक जुट नजर नहीं आ रही है। एकता के मामले में भाजपा की हालत यहां और भी ज्यादा बदतर है। भाजपा के कई धड़े वहां आमने सामने चुनाव से पहले हो गए हैं।


उपचुनाव में बीकानेर का सीधा जुड़ाव

प्रदेश में दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट पर बीकानेर की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी हुई है। कैसे? वो ऐसे कि अलवर में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में डॉ. करण सिंह यादव मैदान में है। वो बीकानेर के उदयरामसर के निवासी है और बीकानेर के काफी करीब है। इसके अलावा अजमेर में भाजपा ने जिन इक्का दुक्का लोगों को जीत की जिम्मेदारी सौंपी है, उनमें बीकानेर के पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष विजय आचार्य भी है। दोनों ही जगह अलग-अलग पार्टी से बीकानेरी कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। वैसे तीसरे विधानसभा क्षेत्र मांडलगढ़ से हमारे ही शहर के गोकुल प्रसाद पुरोहित पहले विधायक रह चुके हैं।

गुजरात का हिसाब तो दो...

गुजरात में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए। सरकार भी बन गई। इसके बाद उपमुख्यमंत्री नाराज भी हो गए, उन्हें मनचाहे विभाग भी मिल गए। कहने का मतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव की बात अब पुरानी होने वाली है लेकिन हमारे यहां से गए नेताओं ने अब तक अपना हिसाब नहीं दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेता काफी जोश खरोश के साथ गुजरात में जुटे थे। कोई राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में तो कोई जातीय आधार पर अपनी पार्टी को टिकट दिलाने के लिए। वहां से खूब फोटो भी फेसबुक पर डाले लेकिन परिणाम आने के बाद किसी ने नहीं बताया कि उनके प्रचार वाले क्षेत्र में पार्टी को जीत मिली या फिर हार। हां...यह भी संभव है कि कुछ बताने लायक होगा ही नहीं तो क्या बताएं?


युवा नेता निष्क्रिय क्यों?


पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि शहर के कई युवा नेता अचानक से निष्क्रिय हो गए हैं। आखिर क्यों? राजनीति में रहना है तो कुछ न कुछ करना होगा। शहर भाजपा में भी कई नए और युवा चेहरों को अवसर दिया गया है लेकिन उनकी सक्रियता फिलहाल नजर नहीं आई है। वेद व्यास भी ऐसे ही नेताओं में है,जिनकी लंबी चौड़ी टीम निष्क्रिय सी नजर आ रही है। इसी तरह लूणकरनसर में टिकट के दावेदार माने जा रहे डॉ. भागीरथ मूंड भी इन दिनों कम नजर आ रहे हैं। इनकी कम सक्रियता से न सिर्फ राजनीतिक मैदान सूना नजर आ रहा है बल्कि समीकरण भी बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीति में ऐसे युवाओं की जरूरत है और उन्हें अपने दम पर अपना रास्ता बनाएं। किसी नेता की बैसाखी पकड़कर आगे नहीं आना है, उन्हें।

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