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'बी द चेंज'

तालाब किनारे एक लड़के ने देखा कि एक बूढी महिला छोटे-छोटे कछुओं की पीठ को साफ कर रही थी। लड़के ने जब उस महिला से ऐसा करने का कारण पूछा तो महिला ने कहा कि कछुओं की पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचरा जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है और कछुओं को तैरने में दिक्कत आती है। अत: वो कवच को साफ करते है। लड़के ने महिला से पूछा कि वो अकेली कब तक इन असंख्य कछुओं की पीठ साफ करेगी और इससे आखिर कितना परिवर्तन हो सकेगा? महिला ने बड़ा ही मार्मिक जवाब दिया कि भले ही उसके इस कार्य से से संसार में कोई बड़ा बदलाव नहीं आये लेकिन कछुए की जिन्दगी तो बदलेगी ही। 

छोटा ही सही पर सकारात्मक दिशा में चेंज होना सीखिये। जिन्दगी में बहुत सारे अवसर ऐसे आते हैं जब हम बुरे हालात का सामना कर रहे होते है। हम परिवर्तन की सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते। मन मसोसकर यही कहते हैं कि क्या किया जा सकता है? इतनी जल्दी तो सिस्टम को बदलना संभव नहीं है। ऐसा सोचकर वह कार्य भी नहीं करते जिससे समाज में कुछ नई क्रान्ति आये। इससे निकलिये। गांधीजी ने कहा है - 'बी द चेंजÓ। जो परिवर्तन आप समाज और राष्ट्र में लाना चाहते हैं उसे पहले खुद में लाइये। स्वयं से शुरुआत कीजिये।
* आप चाहते हैं कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें। उन्हें मत सिखाइये। स्वयं पालन करना प्रारम्भ कीजिये। खुद से पूछिये कि क्या आप हेलमेट लगाते हैं या सीट बेल्ट बांधते हैं? यदि नहीं तो क्रान्ति नहीं आयेगी।
* आप चाहते हैं कि नारी का सम्मान हो। बहन बेटियां पड़ें। आगे बड़ें।
जरा सोचिये कि क्या आप अपनी पुत्रियों को उच्च शिक्षा दे रहे हैं?
* आप चाहते हैं कि विवाह से फिजूलखर्ची मिटे। क्या आप अपने पुत्र का आडम्बर विहीन विवाह करवाएंगे?
* आप चाहते हैं कि दान के नाम पर समर्थ पुत्रियों और बहनों को टिफिन/नकद बांटना बंद हो। समाज में कईयों को आपके दान की आवश्यकता है और यह आवश्यकता उन बेटियों से अधिक है। क्या आप टिफिन या नकद बांटना रोक सकेंगे?
क्या पता आपका छोटा सा बदलाव कुछ क्रांति लेकर आये। हर बदलाव की शुरुआत स्वयं से होती है। कई बार तो सफलता हमसे बस थोड़ी ही दूर होती है कि हम हार मान लेते है। अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें। कोई भी सकारात्मक परिवर्तन आसान नहीं होता। परिवर्तन में सदियां लगती हैं। आप परिवर्तन के संवाहक बनें तभी राष्ट्र प्रगति करेगा। 'बी ए चेंजमेकरÓ। यहाँ मन्त्र यही है कि अपनी क्षमताओं पर भरोसा रख कर किया जाने वाला कोई भी परिवर्तन छोटा नहीं होता। सिस्टम तभी बदलेगा जब हम खुद बदलने को तैयार होंगे।

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कितने आसाराम? कितनी निर्भया?

Anurag Harsh
पिछले कुछ दिनों से देश में दुष्कर्म को लेकर बड़ी खबरें आ रही है। मोदी सरकार में बने साहसिक कानून के तहत अब बारह साल तक की बालिका के साथ दुष्कर्म करने वाले को फांसी की सजा दी जाएगी। इस निर्णय के तुरंत बाद जोधपुर की अदालत ने खुद को संत कहने वाले आसाराम को बुधवार को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। 'आसाराम को सजाÓ देशभर की मीडिया के लिए बड़ी खबर है। हर चैनल का पत्रकार बकायदा दिल्ली से सफर करके जोधपुर की जेल तक पहुंचा, वहां से लाइव किया। अखबारों में भी बड़ी खबर यही छप रही है। इस खबर को महत्व इसलिए नहीं दिया जा रहा है कि दुष्कर्म करने वाले को सजा मिली है, बल्कि इसलिए ज्यादा 'प्रचारÓ मिल रहा है क्योंकि वो कभी 'संत आसारामÓ था। उसे पूरा देश जानता है, इसलिए खबर की 'टीआरपीÓ ज्यादा मिलने वाली है, वेबसाइट पर हिट्स ज्यादा आने वाले हैं, फेसबुक पर लाइक ज्यादा मिलने वाले हैं, अखबार की हैडिंग में 'करामातÓ दिखाने का अवसर ज्यादा मिलने वाला है। कहीं न कहीं सवाल सिलसिलेवार उठना चाहिए। पहला यह कि केंद्र सरकार ने बारह साल तक की बालिका के साथ दुष्कर्म करने वाले दरिंदे को ही फांसी की सजा देने का कानून क्यों बनाया? बारह साल से अधिक और चालीस-पचास साल तक की महिला के साथ दुष्कर्म करने वाले दरिंदों के खिलाफ फांसी से कम सजा की रियायत क्यों दी जा रही है। नि:संदेह मोदी सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है लेकिन उम्र का दायरा नहीं रखना चाहिए था। दुष्कर्म पीडि़ता बालिका बारह वर्ष की हो या फिर युवती तीस साल की हो, दोनों का दर्द समान होता है। किसी महिला के साथ ऐसा दुराचार किसी व्यक्ति की हत्या से भी ज्यादा दर्दनाक है। हत्या में एक बार मरना होता है और दुष्कर्म की पीडि़ता को हर पल मरना होता है। यह सोच पाना ही कितना दर्दनाक है कि दुष्कर्म पीडि़ता को खुद पर हुए अत्याचार को साबित करने के लिए लंबी लड़ाई लडऩी पड़ती है। जगह-जगह जांच करवानी होती है, हजार लोगों को जवाब देना होता है। जब तक आरोपी को अदालत दोषी नहीं मान लेती तब तक उसे ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भले ही उसका कसूर कुछ भी ना हो। इसीलिए आरोपी के खिलाफ जांच में तेजी आनी चाहिए। उस वहशी को सजा ए मौत मिलनी चाहिए, जिसने इंसानियत को तार तार किया हो। राजस्थान सहित देशभर में ऐसे मामलों की फटाफट सुनवाई करने का दौर एक बारगी चला लेकिन फिर ठंडा हेा गया। नि:संदेह जल्दबाजी में किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए लेकिन दोषी को सजा देने में विलंब भी नहीं होना चाहिए।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि कितने आसाराम है? आज ही जब आसाराम से जुड़ी खबरों के लिए प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की खबरों को टटोल रहा था तो आधा दर्जन खबरें मिली, जिसमें नाबालिग के साथ दुष्कर्म, छात्रा का शारीरिक शोषण, नई दिल्ली में नाबालिग सौतेली बेटी के साथ दुष्कर्म, झारखंड में आठ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म, ओडिशा में ५० साल की महिला के साथ दुष्कर्म की खबरें नजर आई। सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि क्या एक आसाराम को सजा देकर इन दरिंदों को सबक सिखाया जा सकता है? शायद नहीं। क्योंकि अगर सबक लेना ही होता तो 'निर्भयाÓ के मामले में फांसी की सजा देने के बाद देश में यह अपराध रुकना चाहिए था। आज देश में हजारों आसाराम है और लाखों निर्भया। ऐसे में परिवर्तन समाज में करना होगा, सुदृढ़ और चाक चौबंद व्यवस्था समाज में करनी होगी। ऐसे भेडिय़ों को पहचानना होगा और इनके खिलाफ जोर से बोलना होगा। सरकारों को सिर्फ कानून बनाकर इतिश्री नहीं करनी चाहिए, बल्कि सामाजिक स्तर पर बदलाव लाने के लिए प्रयार करने चाहिए। एक आसाराम के जेल में जाने से भय का माहौल तो बनेगा लेकिन बाहर बैठे हजारों 'आसारामÓ क्या अपनी विभत्स, कुंठित और आपराधिक सोच को छोड़ सकेंगे? इन मुद्दों पर काम करना होगा। 'बेटी बचाओ-बेटी बढ़ाओÓ का नारा देने मात्र से माहौल नहीं बदलेगा।

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बीकानेर - फोटो की राजनीति कब तक? (अनुराग हर्ष)

फोटो खिंचवाने का सबसे ज्यादा शौक अगर किसी को है तो वो नेता है। राजनीति चलती ही फोटो के दम पर है। ऐसे में कई नेता अपनी शुरूआत अखबारों में फोटो के साथ करते हैं, यह बात अलग है कि जो जनता के बीच काम नहीं करते, वो फोटो तक ही सीमित होकर रह जाते हैं। जनता उसी के साथ नजर आती है, जो खुद आगे बढ़कर काम करते हैं। खैर हम बात कर रहे हैं, फोटो के शौकीन नेताओं की। इन दिनों कांग्रेस और भाजपा दोनों बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रही है और इस बीच फोटो के दीवाने नेताओं की चांदी हुई पड़ी है। टिकट के दावेदार नेता तो इन कार्यक्रमों में बस कुछ देर के लिए आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चलते बनते हैं। कई बार तो नेताजी अपने कुछ साथियों को साथ लेकर पहुंचते हैं, उनको अपना मोबाइल थमाते हैं और फोटो खिंचवाते हैं। पीछे भीड़, पार्टी के झंडे, बैनर सभी फोटो में दिखने चाहिए। महज दस-पंद्रह मिनट की यह एंट्री लेने वाले एक-दो नहीं बल्कि कई नेता है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसे सिर्फ कांग्रेस में है, बल्कि भाजपा में भी ऐसे शौकीन नेताओं की कमी नहीं है। दरअसल, इसके पीछे भी कहानी है। टिकट की दौड़ में लगने के लिए इन नेताओं को फाइल तैयार करनी होती है। इसी फाइल में यह फोटो चिपकाए जाते हैं। किसी अखबार में अगर फोटो आ गई है तो सोने पर सुहागा। उसकी कटिंग भी फाइल का हिस्सा बन जाती है। अब बड़े नेता इन लोगों से परेशान है, पार्टी लाइन के कारण कुछ बोल भी नहीं पाते। करे तो आखिर क्या करें। हमारी सलाह तो सिर्फ इतनी है कि टिकट के लिए काम करने के बजाय जनता के लिए काम करेंगे तो कल जनता भी बोलेगी कि इन्हें टिकट दो। अगर काम नहीं करेंगे तो जीते हुए हैं, उन्हें हराने में भी कसर नहीं छोड़ते। अच्छा होगा कि फोटो राजनीति के बजाय काम की राजनीति करें।

महिला नेता भी सक्रिय

हालांकि बीकानेर में पूर्व की सीट पर सिद्धिकुमारी के अलावा कोई भी महिला नेता गंभीरता से टिकट की दावेदार नहीं है, फिर भी कांग्रेस और भाजपा दोनों में महिला नेता इन दिनों सक्रिय नजर आ रही है। खासकर भाजपा में महिला नेताओं के बीच प्रतिस्पद्र्धा ज्यादा नजर आ रही है। कार्यक्रमों में जिसकी चलती है, वो दूसरे पक्ष को आगे नहीं आने देती। यहां तक कि एक दूसरे के नंबर कम करवाने में भी पीछे नहीं रहती। अब चुनाव की बेला में अगर पुरुष नेता यह काम कर रहे हैं तो महिलाओं को क्या दोष दें?

सोशल मीडिया पर युद्ध

देशभर की राजनीति तो सोशल मीडिया पर होती ही है लेकिन अब स्थानीय राजनीति भी फेसबुक पर नजर आने लगी है। अधिकांश नेताओं ने अपने अपने ग्रुप बना लिए हैं, वो हर रोज कुछ न कुछ सोशल मीडिया पर डालते हैं, कभी तीखी मिर्च की तरह तो कभी अपने नेताओं की लड्डू जैसी मीठी बातों की टोकरी परोस देते हैं। विचारधारा से कम और व्यक्ति विशेष से ज्यादा जुड़े समर्थक अपने नेता के पक्ष में जमकर तर्क दे रहे हैं, हालांकि कई बार यह तर्क कुतर्क में बदल जाते हैं। कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने तो जैसे अपने 'सोशल मीडिया वार रूमÓ तैयार कर लिए हैं, जहां से हर रोज सुबह सवेरे गोला दाग दिया जाता है। इसके बाद छिटपुट गोरीबारी दिनभर चलती रहती है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन भाषा की अभद्रता कई बार रिश्तों को खराब भी कर देती है।

आखिर कब तक...

चुनाव नजदीक आने के साथ ही नेता तैयार बयानबाजी तो शुरू कर चुके हैं, लेकिन हकीकत में कोई काम नहीं हो रहा है। जिन नेताओं को टिकट चाहिए, वो अपने विधानसभा क्षेत्र तो दूर पार्षद क्षेत्र में भी भ्रमण नहीं कर पाए हैं। उन्हें नहीं पता कि उनके पार्षद क्षेत्र में कितनी सड़कें टूटी हुई है और कितनी नालियों से पानी बाहर निकल रहा है, किस स्कूल में शिक्षक नहीं है और किस अस्पताल में गॉज और पट्टी का टोटा चल रहा है। इसके बाद भी वो नेतागिरी करने से नहीं चूक रहे। जिस तरह हर बड़े पद पर पहुंचने से पहले मेहनत करनी होती है, ठीक वैसे ही जनता के वोट से विधायक बनने से पहले नेताओं को अपने क्षेत्र को पहचानना ही होगा। खासकर युवा नेताओं को इस दिशा में मेहनत करने की जरूरत है।

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रामानुजाचार्य : जिन्होंने अपनी सरलता से सबसे समरसता पूर्ण वैष्णव संप्रदाय की नींव डाली

सन्दर्भ : रामानुजाचार्य जयंती 20/04/2018

‘सामाजिक समता की दिशा में तत्कालीन ब्राह्मण जहां तक जा सकता था, रामानुजाचार्य वहां तक जाकर रुके. उनके संप्रदाय ने लाखों शूद्रों और अंत्यजों को अपने मार्ग में लिया, उन्हें वैष्णव-विश्वास से युक्त किया और उनके आचरण धर्मानुकूल बनाए और साथ ही ब्राह्मणत्व के नियंत्रणों की अवहेलना भी नहीं की.’

2700 साल पुरानी एक शक्तिशाली धार्मिक रीति से सामाजिक समरसता बनाने के लिए एक अनूठा प्रयोग 17 अप्रेल को हैदराबाद में हुआ। श्रीरंगनाथ मंदिर के उत्सव में तेलंगाना मंदिर संरक्षण समिति के अध्यक्ष पण्डित सी.एस. रंगराजन ने कंधों पर बिठाकर एक दलित भक्त आदित्य को मंदिर में प्रवेश करवाया। ख़ास बात है कि इस दौरान पारम्परिक नाद-स्वर और वेद मन्त्रों का उच्चारण हुआ। हज़ारों लोग इस दुर्लभ दृश्य को देखने के लिए वहां थे। इस अनुष्ठान में व्यक्तिगत मनमानी नहीं है बल्कि यह वैष्णवों के सबसे पुराने रामानुज संप्रदाय की शास्त्रीय पद्धति से की जाने वाली 'मुनि वाहन सेवा' है। जिसका एक सुदीर्घ इतिहास है। इसका मूल आलवार संत-भक्त-कवियों की भक्ति संवेदना में है।आलवारों के द्रविड़ भाषा पद्यों का संकलन 'दिव्यप्रबंधम्' इसका उद्गम है। यह इतिहास मनुष्य की जन्मसत्ता के बजाय उसकी व्यक्तिसत्ता को प्रधानता देता है।

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'अति भावुकता से बचें'

संगठनों में कार्य करना आसान नहीं है। नौकरी अर्थात सेवाधर्म को हमारे ग्रंथों में अत्यधिक मुश्किल बताते हुए यहां तक कहा गया है कि नौकरी तो योगियों के लिए भी निभाना मुश्किल है। इस बात के नेपथ्य में एक सूत्र है। वह सूत्र है कि - यदि संगठन में नौकरी करोगे तो वहाँ पर राजनीति भी होगी ही। कार्यस्थल की राजनीति से पार पाना बहुत ही आसान है यदि हम किसी के सॉफ्ट टारगेट नहीं बनें। सॉफ्ट टार्गेट का अर्थ है किसी का मोहरा बन जाना और स्वयं की अक्ल न लगाना। प्रत्येक कर्मचारी चाहता है कि बॉस सुधरे। कई कर्मचारियों को बॉस से अपने स्कोर सैटल करने होते हैं। ऐसे में वे सीधे तौर पर बॉस से न भिड़कर संगठन के किसी भावुक व्यक्ति को सॉफ्ट टारगेट बना कर उसका इस्तेमाल बॉस की मुखालफत करने में करते हैं। वे उस भावुक व्यक्ति को समझाकर या भड़काकर उसे बॉस के विरुद्ध वह बातें बोलने को कहते हैं जिन्हें असल में वे बोलना चाहते थे। वह भावुक जूनियर कर्मचारी जब तक यह समझ पाता है कि वो तो बॉस की खिलाफत में किसी का मोहरा है, तब तक राजनीति से प्रेरित व्यक्ति अपना काम कर चुका होता है। 

ऐसे में हमें स्वयं का विवेक इस्तेमाल करते हुए क्षण प्रतिक्षण खुद से यह प्रश्न करते रहना चाहिए कि मुझे अमुक व्यक्ति ने ऐसा क्यों कहा? इसके कितने अर्थ और परिणाम हो सकते हैं। मजदूरों की हडताल, राजनैतिक दलों द्वारा आयोजित बंद, और अनेकानेक धरना - प्रदर्शनों में कुछ भावुक लोग पिटते रहते हैं और राजनीति करने वाला उनका फायदा उठा के ले जाता है। सॉफ्ट टारगेट बनने वाले मूलतया भावुक और मूल्यवान लोग ही होते हैं। तेज, चतुर, डेढ़ होशियार व्यक्ति को कोई भी सॉफ्ट टार्गेट नहीं बनाता। चाणक्य नीति के अनुसार, सीधे वृक्षों को उपयोग हेतु तुरंत काट दिया जाता है लेकिन टेढ़े-मेढ़े वृक्षों को कोई नहीं काटता। इस इशारे को समझने की जरूरत है।
निष्कर्षत: हम यह कह सकते हैं कि कॉर्पोरेट जगत में भावुक होना अपराध से कम नहीं है। यहां जो मूल सूत्र है वो सिर्फ यही है कि हम प्रत्येक की सुनें। अपना रिएक्शन बिलकुल न देवें। फिर गहराई से व्यवहार की विवेचना करें और सोचें कि कहीं हमें सॉफ्ट टारगेट तो नहीं बनाया जा रहा है? भावुकता से नहीं, तार्किक होकर निर्णय लेवें। अपने कार्य को सौ फीसदी बेहतरीन बनाए रखें ताकि उसपर कोई प्रश्न चिन्ह न लगा सके। याद रहे, दूसरों का मोहरा बनने से आप अपनी मौलिकता खो देते हैं, इससे बचें।

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नहरी-लेखन करना है या नदी-सी अभिव्यक्ति?

सहने को कलात्मक तरीके से कहने की कला ही सृजन है- कहानी है, कविता है या अभिव्यक्ति की अनेकानेक विधाएं हैं। कहन, जो उस प्रथम पुरुष की त्रासदी को दुनिया का दर्द बनाकर प्रस्तुत करे और हर व्यक्ति को वह अपना-सा लगा, उसमें भले ही किरदार न हो, लेकिन बातें हमारी-आपकी लगे। उसमें भले ही किरदार हों, लेकिन वे देश-काल और परिस्थितियों से मुक्त समय को प्रतिनिधित्व करे, सृजन है। दिक्कत तब आती है जब कलात्मकता के नाम पर सनसनी फैलाने की कोशिश की जाती है। चौंकाए जाने के यत्न होते हैं। अतिरंजनाएं फैलाई जाती है, न तो सृजन रहता है और न कला का कोई अभिप्राय। मतलब सिर्फ यही होता है कि एक रोमांच जगाते हुए पाठक को उल्लू बनाना और यही वजह है कि अभिव्यक्ति में जैसे ही कृत्रिम कौतुहल जगाने का कीड़ा लगता है, जन से सृजन दूर होने लगता है। 

हालांकि, इस बात में दो राय नहीं है कि पाठक रंजन के लिए पढ़ता है या सुनता है, लेकिन वह प्रवाह में बहना पसंद करता है। एक नदी की तरह। नहर की तरह नहीं जो कृत्रिम किनारों की बीच चलती रहे। कभी उठाई-गिराई जाती लहरों के साथ चलती रही। नहरी-लेखन किसी वाद, विचार और विमर्श की जमीन पर लिखने को कहा जा सकता है, जहां बहुत कुछ बातें पहले से तय होती है। नदी-अभिव्यक्ति सरल, स्वाभाविक और राग-द्वेष से मुक्त होती है। इसका कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं होता जैसे नहर उसी क्षेत्रों से निकलेगी जहां ज्यादा वोट होंगे। नदी अपने रास्ते खुद बनाती है। नदी के मुंह को कोई भी राजनीतिक-आग्रह मोड़ नहीं सकता।
और इस प्रक्रिया में अगर कौतुहल भी आए तो स्वागत है। कुछ रहस्य-रोमांच पैदा हो तो हो, लेकिन उठा-पटक नहीं चाहिए। पाठक अनुभूतियों से निकलते हुए स्वयं के पूरे जीवन का आंकलन करता रहता है। वह बार-बार किताब को पढ़ते-पढ़ते बंद करता है और खुद को जोड़ता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि एक ही पन्ने पर घंटों पड़ा रहता है, उसकी नजरें या तो पन्ने पर गड़ी रहती है या वह चेतन-अचेतन की एक अलौकिक-सी अवस्था में चला जाता है, जहां शब्दों के बीच के स्पेस में गूंजते कथानक को अपनी जिंदगी से जोड़ते हुए स्मृतियों के कई कपाटों को खोलता-बंद करता है। इसीलिए तो पढ़ता है कोई किसी को। इसी में तो किसी के रचनाकार होने की सार्थकता है। यहीं तो आनंद है। इस आनंद का अनुभव ही किसी भी सृजनात्मकता की एकमात्र और अनिवार्य कसौटी है।
जिस रचनाकार को यह समझ आ गया। समझो वह जनप्रिय हो गया। इसे समझे बगैर कुछ नया और अनूठा कहने के चक्कर में बहुत सारे रचनाकार के प्रारंभिक वर्ष खत्म हो जाते हैं, जैसे-जैसे उसे पता चलता है प्रौढ़ता सिर चढ़ी होती है। बहुत सारे ऐसे उदाहरण हैं, जब बहुत सारे लेखकों ने अपने जवानी में पाए हुए सच को बुढ़ापे तक आते-आते नकारा और सदियों पुराने चले आ रहे सत्य को स्वीकार करते हुए उसी में स्वयं को अभिव्यक्त किया। सराहे भी गए। यह गलत भी नहीं है। व्यक्ति जब मुकम्मल नहीं है तो हासिल कैसे अंतिम हो सकता है।
कुछ लोग इसे खुद में लगातार परिवर्तन के अर्थ में स्वीकारते हुए बढ़ते हैं तो कुछ अपने कहे-किए में इतने जड़ हो चुके होते हैं तो वापसी संभव नहीं होती और मनोमस्तिष्क का यह द्वंद्व उन्हें रचनाकार नहीं रहने देता, क्योंकि रचनाकार का मन और मस्तिष्क तो कल-कल पानी की तरह बहता है। ठहरा हुआ पानी तो पानी भी कितने दिन रह पाता है भला। लेखन की सजगता और सावधानी का अपना महत्व है, लेकिन क्योंकि इसमें अनुभूतियों का प्रकटीकरण है, इसमें चालाकियों का क्या काम। अगर कोई अपने कहन मे फ्लैशबैक, प्रतीक या बिंबों को अय्यार के रमल की तरह प्रयोग भी करता है तो मानो वह सृजन नहीं कर रहा है, जुआ खेल रहा है। इस जुए की बाजी उसके खिलाफ भी हो सकती है। क्या जरूरी है अभिव्यक्ति को चौपड़-पासा बनाने की?
यह हर रचनाकार के लिए सोचने की बात है कि एक पाठक के साथ उसका रिश्ता बहुत ही समीप का होता है। हर पाठक चाहता है कि उसे एक किताब में ऐसे चार-पांच अवकाश मिले जब वह अपने जीवन में झांक आए। पन्ना किताब का खुला हो और वह अपने जीवन के अध्यायों का पुनर्पाठ कर ले। इस रूप में हर पाठक की अपने रचनाकार से यह अपेक्षा होती है, लेकिन जैसे ही उसका रचनाकार अपनी किताब के माध्यम से कुछ मायावी बनाने की कोशिश करता है, पकड़ा जाता है, क्योंकि रहस्य खड़ा करना बहुत मुश्किल है, उसे निभाना और फिर उसकी परतों को खोलना बहुत मुश्किल। जब वह इस स्तर पर नहीं कर पाता तो पकड़ा जाता है। इसलिए हर रचनाकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी अभिव्यक्ति के
मामले में मौलिक और स्वाभाविक रहे, यही
पाठक चाहता है और यही बात उसे इतिहास में स्थान दिलाती है।

गठित हुआ राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल गठित हो चुका है। परामर्श मंडल के संयोजक वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार, साहित्यकार मधु आचार्य 'आशावादीÓ ने पिछले दिनों इसे अंतिम रूप दिया, जिसका अकादमी की जनरल काउंसिल की बैठक में अनुमोदन भी हो चुका है। मंडल में वरिष्ठ साहित्यकार भंवरसिंह सामौर, सोहनदान चारण, महिपालसिंह राव, मुकुट मणिराज, डॉ.शारदाकृष्णा, डॉ. मंगत बादल, कमल रंगा, राजेंद्र जोशी और डॉ.राजेश कुमार व्यास को शामिल किया गया है। आचार्य ने बताया कि मंडल को बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि राजस्थान के सभी अंचलों से प्रतिनिधित्व हो। राजस्थानी के प्राचीन और आधुनिक स्वरूप के जानकार इसमें रहें तो दूसरी और इतिहास, भाषा और व्याकरण के विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है ताकि आने वाले पांच सालों में कुछ ठोस कार्यों को पूरा किया जा सके, जिन्हें पिछले पांच साल में शुरू किया गया।

दो दिवसीय कला-महोत्सव

बीते सप्ताह कला, साहित्य, संगीत के कार्यक्रमों की धूम रही। चार अप्रैल को सखा संगम ने वरिष्ठ संगीतज्ञ डॉ.मुरारी शर्मा का जन्मदिन मनाते हुए उन्हें और उद्योगपति कन्हैयालाल बोथरा को सम्मानित किया। बीकानेर साहित्य कला संगम और थार विरासत की ओर से दो दिवसीय कला-महोत्सव में कविता और गजल पर केंद्रित दो दिवसीय कार्यक्रम हुआ। सरोद-सितार वादक अमित-असित गोस्वामी ने जयपुर में जलवा बिखेरा। खासतौर से कविता के लिए बीकानेर हमेशा से ही उर्वर रहा है। इन दिनों जिस तरह से कवियों की एक नई पौध खड़ी हो रही है, उत्साहजनक है। एक ऐसा समय जब समाज की संवेदना पर सवाल हो, बीकानेर में कवियों की बेतहाशा वृद्धि एक खबर है।

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'सफलता और समाज'

एक साधु कुछ लोगों को पड़ा रहे थे। तभी साधु के गांव के दो व्यक्ति पधारे। दोनों व्यक्ति साधु के गाँव के होने के कारण साधु को भली भांति जानते थे। वे दोनों ही साधु के वर्तमान आभामंडल और उपलब्धियों से परिचित नहीं थे। अत: उन्होंने तुरंत ही साधु को कहा कि "गणपतिये, तू यहां बैठा क्या पाखण्ड कर रहा है। तुझ जैसा व्यक्ति यदि साधु है तो देश का क्या होगा"। यह कहकर वे हंसने लगे। 

यहां यह स्पष्ट हो गया है कि:
* व्यक्ति चाहकर भी अपनी पुरानी छवि को समाप्त नहीं कर सकता।
* समझने की बात यह है कि हमारे बचपन में, या सफलता के शिखर छूने से पूर्व जिन व्यक्तियों ने हमें जिस रूप में देखा होता है; वे बाद में भी हमें उसी रूप में देखते हैं। हमें उन्हें अन्यथा नहीं लेना चाहिये।
* लोगों के विषय में नकारात्मक बातें बोलना समाज की आदत है। इससे घबराएं नहीं।
* सफल व्यक्तियों को ज्यादा कष्ट, समस्या, व्यंग्यबाण और मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। जैसा कि उदाहरण से स्पष्ट है कि यदि गणपतिया साधु न बना होता तो उसे भी प्रतिकूल टिप्पणी नहीं सुननी पड़ती।
गोस्वामी तुलसीदास ने इस सन्दर्भ में कहा है कि:
तुलसी वहां न जाइये, जन्मभूमि के ठाम,
गुण - अवगुण चीन्हें नहीं, लेत पुरानो नाम।
इसका अर्थ है कि व्यक्ति को बड़ा या सफल बनकर अपने गाँव नहीं जाना चाहिये। उस गांव के लोग, उस व्यक्ति के बचपन के प्रेमीजन, उस सफल व्यक्ति के गुणों और क्वालिटी को नहीं समझ सकेंगे। उनके लिये तो वह ज्ञानी सफल व्यक्ति अब भी वही होगा जो वह बचपन में था।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ हद तक समाज को सफल व्यक्तियों को कोसने की आदत सी है। यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगा। फुटबॉल खेलते समय कुछ बालक एक बच्चे को जानबूझकर परेशान करते थे। उसे टंगड़ी मारते, परेशान करते और हंसते रहते। वो बच्चा उस राज्य के सूबेदार का पुत्र था और तथा खेलकूद में निपुण था। जब उन बालकों से किसी ने पूछा कि वे उस बालक को तंग क्यों करते हैं तो उन लड़कों ने जवाब दिया कि सूबेदार पुत्र भविष्य में सूबेदार बनेगा। चाहे वो भविष्य में कुछ भी बन जाये लेकिन हम तो यही कहते रहेंगे कि हमने इसे खूब टंगड़ी मारी थे। यह निकृष्ट भाव है। ऐसे भाव होने से आप अपनी प्रगति को रोकते हैं। यहां मन्त्र यही है कि लोगों की, समाज की प्रतिकूल टिप्पणियों से न घबराकर कार्य करते रहें और यह स्वीकार कर लेवें कि जिस व्यक्ति ने आपको जिस दशा में देखा होगा, आप उसके लिये ताउम्र वही रहेंगे। जिस पेड़ पर सर्वाधिक आम लगे होंगे, उसी पेड़ पर सबसे ज्यादा पत्थर मारे जायेंगे। यही शाश्वत सत्य है।

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'उम्र सिर्फ एक अंक'

्रएक पत्रकार ने किसी राजनेता का इंटरव्यू समाप्त करके कहा कि यह उसका अंतिम इंटरव्यू है क्योंकि वो पैंसठ साल का हो चुका है और रिटायर हो रहा है। यह सुनते ही राजनेता ने कहा कि वो भी पैंसठ साल का है और इस बार वो राजनीति के साथ-साथ समाजसेवा हेतु एक नया एनजीओ प्रारम्भ कर रहा है। उसने कहा कि उम्र का सीखने से कोई सम्बन्ध नहीं है। 

उदाहरण से यह स्पष्ट है कि उम्र सिर्फ एक अंक है। सीखने की, नया कर गुजरने की, समझने की कोई उम्र नहीं होती हैअ हमने मनोवैज्ञानिक रूप से हमारे प्रत्येक कार्य को उम्र से बांध दिया है। धार्मिक व आध्यात्मिक पुस्तकें पढऩे की उम्र है युवावस्था। हमने यह सोच रखा है कि इनका अध्ययन तो रिटायरमेंट के बाद ही श्रेयस्कर है। क्या इसे हम सही ठहरा सकते हैं? खेलकूद, व्यायाम आदि में हमारी कम दिलचस्पी का भी यही कारण है कि हमने यह मान लिया है कि खेलकूद तो सिर्फ बच्चे ही कर सकते हैं। इस जाल से निकलना होगा। यह स्वीकारना होगा कि उम्र सिर्फ एक अंक से ज्यादा कुछ नहीं है। बढ़ती उम्र नहीं अपितु मानसिक बुढापा घातक होता है जहां आप नया सीखने के लिये तत्पर नहीं होते हैं।
जरा सोचिये कि-
* श्री प्रभुपाद ने भी बहुत बड़ी उम्र में इस्कॉन सोसायटी को स्थापित किया था। उन्होंने अमरीका जाकर बड़ी उम्र में कई ग्रन्थ लिखे और लोगों को जागृत किया।
* एक असफल गरीब बालक था होर्लंड सेंडर्स। उसकी मां उसको और उसके भाई बहन को छोड़कर मजदूरी पर जाती। वह रोज खाना बनाता। सातवीं तक पड़ा, सेल्समेन बना, कई नौकरियां की, पत्राचार से कानून की डिग्री ली और उसके पश्चात ट्रक ड्राइवरों के लिए खाना पकाकर पहुंचाने लगा। उम्र हो चली परन्तु समर्पित भाव से लगा रहा। थोड़ी सी आय से सेंडर्स केफे खोला और डेढ़ सौ लोगों का रेस्तरां खोला जिसमे फ्राईड चिकन प्रमुख आइटम था। ग्यारह तरह के चिकन बनाए। केन्चुकी के गवर्नर ने उन्हें कर्नल की उपाधि दी। छियासठ साल की उम्र में समर्पण से जमे रहे सेंडर्स को भारी मुनाफा हुआ और देखते ही देखते विशिष्ट चिकन रेसिपी के कारण समूचे विश्व में दो सौ रेस्तरां केन्चुकी फ्राइड चिकन के खुल गए और कल का फटेहाल - तेहत्तर साल का सेंडर्स आज प्रति माह तीन लाख डॉलर कमाने लगा।
जरा सोचिये कि तेहत्तर साल तक किया गया श्रम क्या सिद्ध करता है। छियासठ साल की उम्र में नया उपक्रम लगाना क्या सिद्ध करता है? क्या उम्र किसी कार्य को करने में बाधक है? यही सोचना महत्वपूर्ण है।
यहां मन्त्र यही है कि उम्रदराज होकर कुछ नया करना गुनाह नहीं है। उम्रदराज होने के बाद यदि आपको सफलता मिलती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि पहले का जीवन बेकार गया। पहले का जीवन मानो उस पल की तैयारी करवा रहा था जो आप आज जी रहे हो। यही सेल्फ मैनेजमेंट है।

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'जीवन की यात्रा'

* अन्धकार से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले 

* हम अन्धकार से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
यहां हमें यह विचार करना है कि हमारी श्रेणी कौनसी है? अन्धकार का अर्थ है तामसिक, बेकार घटिया मनोवृत्तियां जहां सिर्फ दु:ख, विषाद, तुलना, क्लेश और समस्याएँ हों और हम उनका रस ले - लेकर विश्लेषण करते हों। यदि हमारी श्रेणी अन्धकार से वापिस अन्धकार में जाने वाली है तो इसका सीधा अर्थ है कि हमने समूचा जीवन व्यर्थ नष्ट कर दिया। हमने कुछ भी नया नहीं सीखा। हमारी शिक्षा ने हमें सिर्फ जीविका कमाना सिखाया है। ऐसी शिक्षा को श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
यदि हम अन्धकार से प्रकाश के ओर यात्रा कर रहे हैं तो इससे तात्पर्य है कि हम वैचारिक दरिद्रता और द्वेष के भाव को छोड़कर श्रेष्ठता की ओर यात्रा कर रहे हैं। इससे तात्पर्य है कि हम सिर्फ जीविकोपार्जन को ही नहीं अपितु राष्ट्र और समाज के हित को भी वरीयता देते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने का अर्थ है श्रेष्ठता से निम्नता की तरफ जाना। इससे तात्पर्य है कि अपनी विद्या का गलत इस्तेमाल करना। प्रकाश से प्रकाश की ओर की यात्रा का तात्पर्य है श्रेष्ठता को और निखारना तथा ईश्वरीय निकटता स्थापित करना।
इसे यदि कॉर्पोरेट सेक्टर से जोड़े तो हम यह पायेंगे कि अधिकतर कर्मचारी तो अन्धकार से प्रकाश की तरफ जाते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें और सीखना है अत: वे अपने हुनर, क्षमता, ज्ञान को बढाते हैं और इसमें इजाफा करते रहते हैं। कुछ निकृष्ट कार्मिक ऐसे भी होते हैं जो प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा प्रारम्भ कर देते हैं। उच्च शिक्षण के बाद प्राप्त नौकरी को करते हुए वे संगठन के प्रति निष्ठावान न होकर, परस्पर द्वेष और झगड़ों की राजनीति करते हैं। ऐसी अवस्था में उन्हें हम तामसिक कर्मचारी कहते हैं क्योंकि वे शिक्षण, हुनर, परिवार आदि में श्रेष्ठ थे लेकिन नौकरी में आकर अपना व्यक्तित्त्व खराब करते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वालों से अन्य कर्मचारी भयभीत रहते हैं। इनका मस्तिष्क बड़ा तेज होता है लेकिन वे अपना मस्तिष्क नकारात्मक दिशा में खर्च करते हैं। मैनेजमेंट में प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा वर्जित है। कर्मचारियों का चयन तकनीकी योग्यता के माध्यम से होता है लेकिन उनका निष्कासन मानवीय गुणों की कमी के कारण होता है। हमें यह समझना चाहिये। यहां मन्त्र यही है कि अपनी विद्या का प्रयोग जनकल्याण, संगठन के कल्याण हेतु करें और सदा नया सीखने हेतु तत्पर रहें। यही वास्तविक मैनेजमेंट है।

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'क्यों धन संचय?'

एक सेठ ने साधु को अपना बंगला, संसाधन और एक तहखाने में जमा किया हुआ खजाना दिखाया। सेठ ने साधु के समक्ष अहंकार के साथ पूछा कि साधु को खजाना और उसके द्वारा एकत्र किये गये संसाधान कैसे लगे? साधु ने निर्लिप्त भाव से सेठ से पूछा कि वह इस खजाने से और संसाधनों से कितना कमा लेता है? सेठ ने कहा कि कमाना तो दूर, उलटा उसने चार चौकीदार इस खजाने और संसाधनों की रक्षार्थ नियुक्त कर रखे हैं। यह सुनकर साधु ने कहा कि उसके गांव में एक वृद्ध महिला है जिसके पास संसाधन के नाम पर सिर्फ एक चक्की है। वो चक्की से धान पीसने का काम करती है और अपना गुजारा चलाती है। वो भी अपना और बच्चों का पेट तो भर ही रही है। वो खजाना न होते हुए भी सेठ से कम चिंतित है और बहुत सुखी है। ऐसे में बुद्धिमान कौन हुआ? साधु ने कहा कि अगर खजाने और संसाधनों से कोई कमाई नहीं हो रही है तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल? क्या इस खजाने और संसाधनों को जरुरतमंदों को नहीं दे दिया जाना चाहिये? 

कथा सांकेतिक है। मूर्खतापूर्ण रूप से धन संचय की प्रवृत्ति पर चोट करती है। यह बात सत्य है कि हमने 'खजाने की रक्षाÓ को ही जीवन का मूल ध्येय मान लिया है। क्या संसाधनों का संवर्धन, उनका संरक्षण और उनकी बढ़ोतरी ही जीवन है? यदि यही जीवन है तो हमें कई अपराधियों, कुख्यात चोरों को भी आदर के साथ याद करना चाहिये क्योंकि संसाधनों का भंडारण और संरक्षण तो उन्होंने भी किया था। क्या धन के भंडारण कर लेने के कारण आप और हम उन अपराधियों को सम्मान और आदर दे सकते हैं?
समस्या यह है कि हमारे मन में भविष्य को लेकर बहुत ही ज्यादा डर व्याप्त है। वर्तमान को सुखपूर्वक जीने के बजाय हम भविष्य हेतु संचयन में अधिक इच्छुक रहते हैं। क्या यह सही है? क्या अगले पल का कोई भरोसा है? जो है वह आज है। यदि हमारे द्वारा अर्जित संसाधनों से ही हमें कष्ट हो रहा हो तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल है? हमने अपने जीवन में यह तय कर रखा है कि जो भी सर्वश्रेष्ठ वस्तु होगी उसे 'बाद मेंÓ या 'समय आने परÓ इस्तेमाल करेंगे। ऐसा इंतजार करने में ही जीवन समाप्त हो जाता है। यहां मन्त्र यही है कि संसाधनों के भंडारण के बजाय उसे समाजोपयोगी कार्यों में लगाना श्रेयस्कर है। धनगैला अर्थात पैसे के लिये पागल होना वाकई मूर्खता की पराकाष्ठा है। धनगैले बनने से बचें। यही जीवन प्रबंध है।

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