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'क्यों धन संचय?'

एक सेठ ने साधु को अपना बंगला, संसाधन और एक तहखाने में जमा किया हुआ खजाना दिखाया। सेठ ने साधु के समक्ष अहंकार के साथ पूछा कि साधु को खजाना और उसके द्वारा एकत्र किये गये संसाधान कैसे लगे? साधु ने निर्लिप्त भाव से सेठ से पूछा कि वह इस खजाने से और संसाधनों से कितना कमा लेता है? सेठ ने कहा कि कमाना तो दूर, उलटा उसने चार चौकीदार इस खजाने और संसाधनों की रक्षार्थ नियुक्त कर रखे हैं। यह सुनकर साधु ने कहा कि उसके गांव में एक वृद्ध महिला है जिसके पास संसाधन के नाम पर सिर्फ एक चक्की है। वो चक्की से धान पीसने का काम करती है और अपना गुजारा चलाती है। वो भी अपना और बच्चों का पेट तो भर ही रही है। वो खजाना न होते हुए भी सेठ से कम चिंतित है और बहुत सुखी है। ऐसे में बुद्धिमान कौन हुआ? साधु ने कहा कि अगर खजाने और संसाधनों से कोई कमाई नहीं हो रही है तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल? क्या इस खजाने और संसाधनों को जरुरतमंदों को नहीं दे दिया जाना चाहिये? 

कथा सांकेतिक है। मूर्खतापूर्ण रूप से धन संचय की प्रवृत्ति पर चोट करती है। यह बात सत्य है कि हमने 'खजाने की रक्षाÓ को ही जीवन का मूल ध्येय मान लिया है। क्या संसाधनों का संवर्धन, उनका संरक्षण और उनकी बढ़ोतरी ही जीवन है? यदि यही जीवन है तो हमें कई अपराधियों, कुख्यात चोरों को भी आदर के साथ याद करना चाहिये क्योंकि संसाधनों का भंडारण और संरक्षण तो उन्होंने भी किया था। क्या धन के भंडारण कर लेने के कारण आप और हम उन अपराधियों को सम्मान और आदर दे सकते हैं?
समस्या यह है कि हमारे मन में भविष्य को लेकर बहुत ही ज्यादा डर व्याप्त है। वर्तमान को सुखपूर्वक जीने के बजाय हम भविष्य हेतु संचयन में अधिक इच्छुक रहते हैं। क्या यह सही है? क्या अगले पल का कोई भरोसा है? जो है वह आज है। यदि हमारे द्वारा अर्जित संसाधनों से ही हमें कष्ट हो रहा हो तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल है? हमने अपने जीवन में यह तय कर रखा है कि जो भी सर्वश्रेष्ठ वस्तु होगी उसे 'बाद मेंÓ या 'समय आने परÓ इस्तेमाल करेंगे। ऐसा इंतजार करने में ही जीवन समाप्त हो जाता है। यहां मन्त्र यही है कि संसाधनों के भंडारण के बजाय उसे समाजोपयोगी कार्यों में लगाना श्रेयस्कर है। धनगैला अर्थात पैसे के लिये पागल होना वाकई मूर्खता की पराकाष्ठा है। धनगैले बनने से बचें। यही जीवन प्रबंध है।

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'नैतिकता से कमायें धन'

एक अमीर सेठ ने साधु महाराज से पूछा कि वह ऐसा क्या करे कि उसे गृहस्थ होते हुए भी साधु की भांति शांत और सुखी जीवन जी सके। साधु ने कहा कि ऐसा करना बड़ा ही आसान है। यदि व्यक्ति सुखी और शांत रहना चाहता है तो उसे दो उपाय करने होंगे:

1. नैतिकता और ईमानदारी के साथ धन कमाना होगा। धन किसी को संताप, कष्ट, दु:ख देकर नहीं अपितु लोगों का भला करके, उनकी समस्या का समाधान देकर कमाया जाये।
2. जो धन कमाया है उसका एक बड़ा हिस्सा पुन: समाजोत्थान के कार्यों में लगाया जाये क्योंकि धन कमाया तो समाज से ही है।
अब हमें अपने आप से यह प्रश्न करना चाहिये कि:
* क्या हम नैतिक रूप से दृढ रहकर जीविका कमा रहे हैं?
* कहीं हमने अनैतिक आचरण से धनार्जन करने को अपने अंतर्मन में स्वीकार तो नहीं कर लिया?
* क्या हम अनैतिक रूप से धन कमाने के बाद "सब चलता है, सभी ऐसे ही तो करते हैं" का जाप प्रारम्भ कर देते हैं?
* क्या हम हमारे द्वारा कमाये गये धन का कुछ हिस्सा समाजोत्थान के लिये या असहाय निर्बलों के लिये खर्च करते हैं?
* दान देने के नाम पर क्या हम सिर्फ अपनी बहन - बेटी के ससुराल तक मेवा-मिष्टान्न पहुंचाने हेतु लालयित रहते हैं या वास्तव में जिसे आवश्यकता है उसे दान देते हैं?
इन प्रश्नों का स्वयं से जवाब मांगिये। अपने पुत्र या पुत्री से पूछिये कि उन्हें कैसा पिता चाहिये? वह अमीर पिता जिसने येन केन प्रकारेण अनैतिकता का सहारा लेकर धन कमाया है या वह पिता जिसकी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता एक मिसाल हो? हर बच्चा यह चाहेगा कि उसका पिता स्वधर्म के पथ पर चलता हो।
जरा सोचिये कि आखिर हम किसके लिये अथाह मात्रा में कमाना चाहते हैं? क्या हमें यह लगता है कि हमारी अगली पीढ़ी इतनी निकृष्ट है कि वो अपना भरण पोषण नहीं कर सकेगी? क्या हमें अपनी पीढ़ी पर विश्वास नहीं है? हम किसे दिखाना चाहते हैं कि हमारे पास रुपयों का अम्बार है? उस रुपयों के पहाड़ रूपी अम्बार से क्या जीवन का एक पल भी खरीदा जा सकता है? यहां मन्त्र यही है कि अनैतिक कमाई सदा विषाद, दु:ख, क्लेश और रोगों को जन्म देती है। धन बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन सब कुछ नहीं है। अत: खूब कमायें लेकिन जरुरतमंदों की मदद भी करें। यही तो जीवन है।

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'प्रदर्शन या वास्तविक कार्य?'

एक आश्रम में दो विद्यार्थियों ने अनेक विद्याएं सीखीं। एक दिन पूजन के समय एक शिष्य को चमत्कार करने की सूझी। उसने मन्त्र जपा और उसकी चटाई पानी पर तैरने लगी। उसने अपनी विद्या का अहंकारपूर्वक प्रदर्शन करते हुए कहा कि आज पूजा इस चटाई पर खड़े होकर करेंगे क्योंकि वो चटाई अब नौका बन चुकी है। दूसरे शिष्य के अहंकार पर चोट पहुंची। वह भी स्वयं को बड़ा विद्वान मानता था। उसने मन्त्र जपकर अपनी चटाई को हवा में उड़ाया और उसे विमान का रूप दे दिया। उसने कहा कि आज पूजा चटाई रूपी विमान में बैठकर करेंगे। दोनों के इस अहंकारपूर्ण रवैये को देखकर उस गुरुकुल के गुरूजी ने दोनों को डांटा। गुरूजी ने कहा कि विद्या का वास्तविक उद्देश्य उसका वृथा प्रदर्शन या अहंकार के साथ किया गया चमत्कार नहीं हो सकता। अत: वे दोनों भविष्य में ऐसा न करें। यदि वे चमत्कार करना ही चाहते हैं तो समाज हेतु वास्तविक कार्य करें तथा पीडि़त जनों के दु:ख दूर करने हेतु चमत्कार करें। 

जो आडम्बर, अहंकार, शक्ति प्रदर्शन इन दोनों साधुओं ने किया वह वाकई गलत है। हमारे जीवन का मूल उद्देश्य समाज को यह दिखाना नहीं है कि हम कितने ताकतवर या शक्तिसंपन्न या गुणों से युक्त हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य यह होना चाहिये कि हम अपनी शक्तियों और सामथ्र्य से समाज के लिये कुछ उपयोगी कार्य करें और समाज का उत्थान करें।
जरा सोचिये कि इस शक्ति प्रदर्शन से क्या हासिल हुआ? क्या इससे किसी नई समाजोपयोगी तकनीक का जन्म हुआ? क्या समाज और राष्ट्र को इन दोनों के अहंकार से और प्रदर्शन से कुछ हासिल हुआ? क्या इन्होने प्रदर्शन करके विद्या के वास्तविक उद्देश्य को नहीं झुठला दिया?
विद्या का वास्तविक उद्देश्य चमत्कार करना, शेखी बघारना या प्रदर्शन करना नहीं है। विद्या का वास्तविक उद्देश्य जनमानस की सेवा और राष्ट्र की रक्षार्थ समर्पण करने के भाव की जागृति है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या ईश्वर आडम्बर से, प्रदर्शन से या शेखी बघारने की प्रवृत्ति से खुश होता है? शायद ऐसा नहीं है। भारतीय शास्त्र तो 'कामये दु:ख तप्नानाम, प्राणिनाम आर्तिनाशनमÓ के सिद्धांत को मानता है जिसके अनुसार मनुष्य जीवन का लक्ष्य है दु:ख से पीडि़त जनों की सेवा। ऐसे आडम्बरों से भय फैलता है। चमत्कार करना भी हो तो किसी व्यक्ति या समाज के सुधार हेतु करना चाहिये, अहंकार की पूर्ति के लिए नहीं। अत: यहां मन्त्र यही है कि आडम्बर, अहंकार, और प्रदर्शन से मुक्त रहकर ही हम मानवमात्र की सेवा करें। वास्तविक ठोस कार्यों को, धरातल के कार्यों को अंजाम दें। यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।

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'उद्देश्यपूर्ण जीवन'

एक राजा ने विद्वानों से पूछा कि संसार के तीन सबसे बड़े दु:ख क्या हैं. विद्वानों ने बताया कि पहला दु:ख है किसी का ऋणी होना. ऋण लेते ही आप 'रीसीविंग ऐंड पर आ जाते हैं. यही से दु:ख प्रारंभ होता है. दूसरा दु:ख है ऐसा रोग होना जिसका उपचार असंभव हो. यहाँ व्यक्ति पल-पल मृत्यु का एहसास करता है. तीसरा सबसे बड़ा भयानक दु:ख है कि जीवन के अंतिम छोर पर पहुंच जाना और वहां पहुंचकर यह समझना कि पूरा जीवन तो बेकार के कामों में ही नष्ट कर दिया. यह सबसे बड़ा दु:ख है. जब पूरा जीवन ही निरर्थक रह जाये तो इसी को सबसे बड़ा दु:ख कहा जाता है. दूसरों से घृणा करने, नाराजगी जताने, नफरत का बहीखाता बनाने, षड्यंत्र रचने में जीवन को नष्ट न करें. यह निरुद्देश्य जीवन है. 

हम में से कई लोग निरुद्देश्य जीवन जी रहे हैं. हमें जीवन के अंतिम छोर पर पहुंचकर बहुत दु:ख होगा जब हम यह महसूस करेंगे कि जीवन तो बेकार के लड़ाई-झगड़ों, रोटी कमाने की मशक्कत और द्वेष-क्लेश-कष्ट आदि के विश्लेषण करने में ही व्यतीत कर दिया. आखिर हमें किस रूप में याद किया जाएगा? हमारा नामलेवा कौन होगा? हमें समाज सम्मान क्यों देगा? क्या हम ऐसा कुछ कर गुजरेंगे जिससे हमारे बच्चे हमारे नाम को गर्व के साथ बोल सकें? हमें अपने पूर्वजों पर, समाज की थातियों पर, राष्ट्र पर गर्व है. यह अच्छा है. लेकिन हमने ऐसा क्या किया है कि समाज हम पर गर्व कर सके? यह सोचना अत्यावश्यक है. इसी क्षण इस प्रश्न का उत्तर सोचिये. आपको वास्तविक जवाब मिल जाएगा. अपनी स्थिति समझ आ जायेगी.
जीवन बड़ा होना चाहिये, लम्बा नहीं. ज्यादा आयु नहीं चाहिये. जितनी आयु मिली है उसी आयु में सार्थक, समाजोपयोगी, श्रेष्ठ कर्म होने चाहिये. बड़े जीवन से तात्पर्य है समाजोपयोगी, राष्ट्रोपयोगी जीवन जहां आप निस्स्वार्थ भाव से, स्वयं की प्रेरणा से राष्ट्र के लिए कार्य करने हेतु तैयार हों. लम्बे जीवन का अर्थ है बड़ी आयु लेकिन समाजोपयोगी कार्यों की सूची का अभाव. ईश्वरीय कृपा है यदि आप लम्बे जीवन के साथ जीवन को बड़ा भी बना सकें. यहाँ मन्त्र यही है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार करें. सिर्फ जियें नहीं, क्वालिटी के साथ जियें.
धर्म के लिये जियें, समाज के लिये जियें
ये धड़कनें ये श्वास हों, पुण्यभूमि के लिये,
मातृभूमि के लिये.

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सहा क्या नहीं, महत्वपूर्ण है कहा क्या...

सामान्य भाषा में सृजन को प्रसव-वेदना से परिभाषित किया जाता है। कुछ लोग ऐसा कह भी देते हैं, लेकिन सृजन का निर्णायक-पक्ष कभी भी वेदना नहीं बल्कि संवेदना रही है। वेदना तो सभी सहते हैं, अभिव्यक्त वही कर सकता है, जिसमें संवेदना हो। कदाचित सृजन को प्रसव-वेदना से इसलिए जोड़ दिया गया हो कि प्रसव-वेदना को पीड़ा का चरम माना गया है और इससे मिलने वाले परिणाम को सृजन का सुख। इसलिए एक साधारणीकरण करने के लिए यह परिभाषा दी गई और मोटी-मोटी बात समझ में आ गई तो फिर इस पर बहस भी नहीं हुई। अगर यह परीक्षा के सवालों को हल करने और नंबर लेने तक सीमित है तो ठीक, लेकिन एक रचनाकार को अपना आंकलन करने की शर्त से जुड़ा मसला है तो पुनरावलोकन की मांग करता है। जैसे ही हम प्रसव-वेदना के निहितार्थ पर जाते हैं तो पता चलता है कि यहां सिर्फ वेदना की बात है और थोड़ा-सा खींचतान करते हुए इसे पीड़ा से उपजे क्रंदन से जोड़ सकते हैं। सनद रहे! यह क्र्रंदन अभिव्यक्ति नहीं है। यह दर्द से निजात पाने की एक अवैज्ञानिक विधि भर है। कहीं यह प्रमाणित नहीं हुआ है कि रोने से दर्द कम हुआ है। असली बात तो उसे अभिव्यक्त करना है, जो सहा। यह सभी के वश में नहीं है। यह सच है कि प्रसव-वेदना अनिर्वचनीय होती है। लेकिन सृजन में अभिव्यक्ति ही प्राण-तत्त्व है। अभिव्यक्ति जितनी सघन होगी, संवेदनायुक्त होगी, समष्टि का भाव लिए होगी उतना ही विस्तृत उसका आकाश होगा। 

इस बात की बहुत अधिक संभावना रहती है कि पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए रचना में कल्पना का सहारा भी लिया जाए। भले ही इस वजह से साहित्य में विज्ञान जैसी विश्वसनीयता नहीं आ पाती, लेकिन साहित्य की यही कमी उसकी सुंदरता है। मौलिकता है। वरना साहित्य भी विज्ञान हो जाता। विज्ञान व्यक्तिगत स्तर पर परिणाम देता है, लेकिन साहित्य तो हर पढऩे वाले के मन में उतरकर उसकी थाह लेता है। एक पुस्तक न जाने कितने-कितनों की अंतर्कथाओं को स्पर्श करते हुए आगे बढ़ती है। विज्ञान में जो काम तर्क और यथार्थ करता है, साहित्य में अनुभूतियां करती हैं। अनुभूतियां जितनी सघन होंगी, अभिव्यक्ति उतनी ही व्यापक होगी। सारी बात को समझने के लिए एक बार फिर हमें प्रसव वेदना को समझना होगा। प्रसव-वेदना यथार्थ है, लेकिन इस वेदना के बाद उत्पन्न सारे बच्चों के प्रति समाज का एक जैसा नजरिया नहीं होता। जैसे, प्रसव-वेदना के बाद भी उत्पन्न बच्चे का लिंग, वर्ण और शारीरिक संरचनागत विशेषताओं के आधार पर सामान्य लोग खुशियों के अवसर ढूंढते हुए देखे जा सकते हैं। सभी परिणाम एक जैसे नहीं होते, लेकिन प्रसव-वेदना तो लगभग समान ही होती है। ऐसे में प्रसव-वेदना को सृजन से जोडऩे पर एक सनसनी तो पैदा की जा सकती है, लेकिन यह अंतिम नहीं है। निर्णायक नहीं है। सृजन प्रसव-वेदना नहीं है। सिवाय इसके कि प्रसव-वेदना जैसी पीड़ा का कोई भी स्तर सृजन का कारक माना जा सकता है। वास्तव में इन दोनों का कोई लंबी दूरी का रिश्ता नहीं है। सिवाय इसके कि जैसे हर प्रसव वेदना के बाद मिलने वाला परिणाम खुशियों की गारंटी नहीं होता, उसी तरह हर लिखा हुआ जनप्रिय होने की गारंटी नहीं होता। यह दूसरा अर्थ तो फिर भी सम्प्रेषित होता है, लेकिन सृजन और पीड़ का कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं करता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पीड़ा से अभिव्यक्ति का एक मार्ग बनता है। यह अभिव्यक्ति आंसू, कराह, क्रंदन से भी हो सकती है और समझे या सहे दर्द को दुनिया का दर्द बना देने से भी। फिर जरूरी नहीं है कि पीडि़त ही सृजक हो। रामायण काल से जुड़े एक पौराणिक आख्यान में शिकारी द्वारा क्रौंच-वध करना और फिर मादा क्रौंच के विलाप की प्रतिक्रिया में एक कवि का हमें मिलना, इसका एक बड़ा उदाहरण है। फिर वाल्मीकी ही क्यों, कलिंग का एक युद्ध सम्राट अशोक की सारी प्राथमिकताएं बदलने वाला साबित हुआ। स्त्री और दलितों ने जिस पशुवत-जीवन को अपनी नियति समझकर स्वीकार कर लिया, उसी को लेखकों ने मानवीयता और समानता के दृष्टिकोण से देखा। भुगता किसी ने,अभिव्यक्ति किसी और ने किया। सहा किसी ने, कहा किसी और ने। यहां इसे यूं समझ सकते हैं कि ठोकर खाने के बाद सीखना ही जरूरी नहीं। ठोकर खाने वाले को देखकर भी सीखा जा सकता है। पीडि़त व्यक्ति ही अपना दर्द लिखे, जरूरी नहीं। किसी की पीड़ा को देखकर भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। बशर्ते की संवेदनाएं हों। संवेदनाएं ही व्यक्ति के जिंदा होने का सबूत है। रोजाना होने वाले घटनाक्रमों में जो व्यक्ति संवेदनशील नहीं है, वह तो मृतक के समान ही हुआ। यही पीड़ा और अभिव्यक्ति का अंतर्सबंध है, जो संवेदना के रसायन के बगैर नहीं मिलता। यहीं से सवाल खड़ा होता है कि दर्द एक जैसा होने के बाद भी अभिव्यक्ति का स्तर अलग-अलग कैसे होता है? इसी सवाल के जवाब में सृजक होने की चाबी छिपी है। एक ही घटना, समय या संदर्भ से प्रभावित लोगों की अभिव्यक्ति का स्तर ही उनके अनुभवी होने का प्रमाण देता है। बहुत सारे लोग सामने आने वाली चीजों को 'तत्काल, समकाल और चिरकालÓ की डिवाइस से देखते हैं। पता करते हैं कि इस तरह की घटनाओं के सूत्र भूतकाल में कैसे और कहां
मिलते हैं।
उन प्रवृत्तियों पर जाते हैं, जिससे घटना का जन्म हुआ और फिर इन सारी स्थितियों को भविष्य में देखते हैं और इस पूरे अध्ययन से जो हासिल होता है, उसे अपनी रचना में शामिल करते हुए पहला ड्राफ्ट तैयार करते हैं और उसे बार-बार अपनी ही कसौटी पर कसते हैं। हर बार यह सवाल करते हैं कि क्या उसे जो कहना था, वह सौ फीसदी आ चुका है और जो रचना इस तसल्ली तक पहुंचे बगैर सार्वजनिक हो जाती है, स्तरीय नहीं हो पाती। यहां स्तरीय होना महत्वपूर्ण है और यह कहना जरूरी नहीं कि स्तरीय होने का फैसला करने के लिए न्याय या शासन व्यवस्था निर्णायक नहीं होती। यह तो मन तक पहुंचने की कला है। मन ही निर्णय करता है और मन को संवेदन ही झंकृत कर सकता है। सबसे पहली जरूरत संवेदनाओं के तार कसने की है। अगर संवेदना है तो प्रसव-वेदना क्या, किसी बच्चे को मारे जाने वाले एक थप्पड़ से भी कालजयी कृति का प्रणयन हो सकता है। अगर संवेदना नहीं है तो भले ही दस-दस प्रसवों का साक्षी बन जाए कोई, अभिव्यक्ति का आधा-क भी कहां लगाना है, पता नहीं चलेगा। इसलिए पीड़ नहीं, सृजन की अनिवार्यता अनुभूति है, संवेदना है। संवेदनशील मन ही कर सकता है सृजन।


इतिहास रच रहा
है 'अवरेखÓ

प्रज्ञालय संस्थान की ओर से शुरू किए गए 'अवरेखÓ कार्यक्रम में इस बार साहित्यकार शंभूदयाल सक्सेना की रचनाओं का
अनुवाद हुआ।
यह एक ऐसा नवाचार है, जिसमें अनुवाद-कला को प्रोत्साहन मिलेगा। यह सच है कि अनुवाद से ही हम दूसरी भाषाओं में रचे जाने वाले साहित्य को समझ सकते हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि वह अपने जीवनकाल में अपनी किसी एक प्रिय कृति का अपनी भाषा में अनुवाद करे। बहुत सारे लोग अनुवाद को एक नई कृति के लिए की जाने वाली मेहनत से भी दुष्कर विधा मानते हैं, क्योंकि यहां लेखक को प्रयोग की तो छूट होती है लेकिन कथ्य बदलने की नहीं।


रंगकर्मियों का सम्मान

विश्व रंगमंच दिवस पर रमक-झमक संस्थान ने शहर के रंगकर्मियों का सम्मान किया। अशोक जोशी के निर्देशन में 'शहर हमारा सोता हैÓ का मंचन हुआ। इसके बाद धरणीधर रंगमंच पर आनंद वि. आचार्य के लिखे नाटक 'सूरज रो पूतÓ का मंचन हुआ।

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'लोग तो कहेंगे ही'

एक मूर्तिकार ने दो एक जैसी मूर्तियाँ बनाई। एक मूर्ति को उसने छिपाकर रख दिया। दूसरी मूर्ति को उसने प्रदर्शनी में सजाया और उसके नीचे लिखा कि इस मूर्ति में कमियाँ बताई जावें। अनेकानेक लोगों ने मूर्ति को देखा और अपनी टिप्पणी दी। मूर्तिकार ने प्रत्येक व्यक्ति ने जो कहा उसके हिसाब से मूर्ति में परिवर्तन कर दिया। सभी खुश थे। अब सौ से ज़्यादा परिवर्तन मूर्ति में हो चुके थे। मूर्ति का मूल स्वरुप नष्ट हो गया था। अब उस मूर्तिकार ने दूसरी छिपाई गई मूर्ति को इस मूर्ति के पास रखकर पूछा कि कौनसी मूर्ति श्रेष्ठ है। सभी ने छिपाई हुई मूर्ति को श्रेष्ठ बताया। 

इस कथा से यह तो स्पष्ट हो गया है कि:
- सभी को खुश रखना नामुमकिन कायज़् है।
- लोग क्या कहेंगे - ऐसा सोचना बेकार है। लोग तो टीका - टिप्पणी करेंगे ही। इसकी अत्यधिक परवाह न करें।
- यदि हम प्रत्येक कार्य को लोगों की टिप्पणी के अनुसार करेंगे तो वह कार्य बहुत ही बुरे तरीके से संपादित होगा, जैसा मूर्तिं के साथ हुआ।
यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि हम लोगों की कही गई वृथा टिप्पणियों को इतना महत्त्व क्यों देते हैं? लोगों का काम ही टिप्पणी करना है। यहाँ हमें स्वविवेक से निर्णय करना चाहिये। 'सुनिये सब की, करिये मन कीÓ का सिद्धान्त यहाँ पर अपनाया जाना मुफीद है।
इस स्थिति को हमें वतज़्मान विद्यार्थियों से जोडऩा चाहिये। विद्यार्थियों को हर व्यक्ति सलाह देता है कि उन्हें श्रेष्ठ करियर हेतु क्या करना चाहिये।यहाँ विद्यार्थी मूर्ति के भूमिका में है और समाज टिप्पणीकार के रूप में। विद्याथीज़् इतने ज़्यादा विकल्प सुन चुका होता है कि उसे यह समझ ही नहीं आता कि उसके लिये श्रेष्ठ विकल्प क्या होगा? यहीं से उनमें तनाव उपजता जाता है। ऐसी स्थिति में स्वयं की बुद्धि, विवेक और विश्लेष्ण के आधार पर निणर्य करना चाहिये। माता - पिता को चाहिये कि वे अपने बालक से वृहद् चर्चा करे, उसके व्यवहार का आकलन करे और उसके बाद निर्णय करें। सुनी - सुनाई बातों के आधार पर, किसी के भी कह देने के आधार पर निणज़्य करना घातक हो सकता है। विद्यार्थी के दिलचस्पी के क्षेत्र में उसका हौसला बढायें। अन्यों से तुलना न करें।
जऱा सोचिये कि यदि बच्चों ने आपकी तुलना अन्य माता - से करना प्रारंभ कर दिया तो क्या होगा? यहाँ मन्त्र यही है कि जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, आत्मावलोकन के बिना, औरों के कहे जाने से प्रेरित निणज़्य सदा ही दु:ख देता है। अत: तसल्ली से स्वयं के आधार पर
निर्णय लेवें। लोग तो कहेंगे ही, कहते रहेंगे ही अत: उनकी ज़्यादा परवाह न करें। यही सेल्फ मैनेजमेंट है।

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ये बहस बड़ी है मस्त

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***Ó को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवाÓ दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचाराÓ काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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'जीवन एक उत्सव'

जीवन क्या है और इसकी परिभाषा क्या है? जीवन की परिभाषा देना आसान नहीं है. क्या भोजन करना, प्रजनन करना, मकान बनवा लेना, बच्चों का विवाह कर देना और समाज में सुख - दु:ख के अवसरों में भाग लेना ही जीवन है? अधिकांश व्यक्ति इसी को जीवन मानते हैं. कुछ लोग धनार्जन को तो कुछ लोग आनंद के साथ जीने को ही जीवन मान लेते हैं. यह जीवन नहीं है. ये सभी कार्य (भोजन व्यवस्था आदि) तो पशु, पक्षी और कीट - पतंगे तक भी करते हैं. वास्तविक जीवन को हम जैसा परिभाषित करते हैं, हमारा जीवन वैसा ही बनता जाता है. 

जीवन एक संग्राम है : जो व्यक्ति ऐसा सोचते हैं उन्हें लगता है कि जीवन एक 'गला काटÓ प्रतिस्पर्धा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर जीत हासिल करना चाहता है. ऐसा सोचना गलत नहीं है लेकिन ऐसे में प्रतिस्पर्धा का भाव महत्वपूर्ण हो जाता है. जहां प्रतिस्पर्धा है वहां टीमवर्क, सहयोग और समन्वय का लोप हो जाता है. ऐसे व्यक्ति पल प्रति पल और अधिक हासिल करने, प्राप्त करने और ऊंचा चढऩे की लिप्सा से आगे बढ़ते जाते हैं. उनमे अत्यधिक महत्वाकांक्षा होती है. जीवन को संग्राम या प्रतिस्पर्धा मानने वालों को सोचना चाहिये कि यदि वे शहर की सारी सीढिय़ों को मिलाकर एक ऊंचाई पर पहुँच भी जायें तो वे यह पायेंगे कि ऐसी ऊंचाई पर कोई भी नहीं रहता. अत: जीवन को सिर्फ संग्राम न समझें.
जीवन एक संघर्ष है : कुछ व्यक्ति जीवन को संघर्ष मानकर चलते हैं. जब संघर्ष का भाव होता है तो व्यक्ति को लगता है प्रत्येक संसाधन की प्राप्ति हेतु अथाह श्रम और संघर्ष करना ही पडेगा. यह उसकी नियति बन जाती है. यही से व्यक्ति में परस्पर द्वेष, क्लेश और कुटिलता का जन्म होता जाता है. यदि आप जीवन को संघर्ष मानते हैं तो यह कुछेक अर्थों में तो सही है लेकिन पूर्ण रूप से सत्य नहीं है.
जीवन एक उत्सव : तो आखिर जीवन क्या है? जीवन एक उत्सव है. इस उत्सव रूपी जीवन में हमें समाज और राष्ट्र के लिये कुछ योगदान देना चाहिये. जीवन की सार्थकता यह समझने में है कि-
* आपने अपने कर्तव्यों का कितनी उत्कृष्टता से पालन किया?
* आपके कारण कितने लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट आई?
* आपने अपने माता पिता की सेवा किस मनोयोग से की?
* आप अपने बच्चों के लिए एक रोल मॉडल या हीरो बन पाये क्या?
यहां मन्त्र यही है कि जीवन का प्रति पल ईश्वर का आशीर्वाद है. प्रति पल जीयें. समाज के लिये जियें. राष्ट्र के लिये जियें. दूसरों की खुशी के लिये जियें. सुबह उठते ही आपके पैरों तले जमीन मिलना एक उत्सव से बढ़कर है क्योंकि इससे सिद्ध होता है कि आप जीवित हैं. जीवन के हानि - लाभ आदि को त्यागिये और जीवन्तता से जीना सीखिये. यही जीवन है.

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ये बहस बड़ी है मस्त

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***' को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवा' दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचारा' काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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उम्मीद से ज्यादा खरी सुन गए

भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी रणभेरी कांग्रेस के मुकाबले जल्दी भर दी है। कांग्रेस अभी रणनीति तय कर रही है लेकिन भाजपा ने टूटते जनाधार को संभालने के लिए अपनी फौज को मैदान में उतार दिया है। इसी फौज के कप्तान अशोक परनामी तीन दिन की यात्रा पर बीकानेर आए। श्रीगणेश ही ऐसा हुआ कि पहले ही दिन उन्हें यात्रा बीच में छोड़कर वापस जाना पड़ा। कयास लगाए गए कि उन्हें अब अध्यक्ष के रूप में वापस देखने का अवसर नहीं मिलेगा लेकिन ऊपर ऐसा कुछ नहीं था, जैसा नीचे सोचा गया था। परनामी अगले दिन ही वापस लौट आए। एक-एक विधानसभा की क्लास ली। मास्टरजी की तरह एक नहीं बल्कि दो दो विधायकों को अच्छी खासी डांट लगा दी। पहले बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपाल जोशी को और दूसरी खाजूवाला के विधायक डॉ. विश्वनाथ को। जोशी ने अपने ही कार्यकर्ताओं को विरोधी बताया था तो डॉ. विश्वनाथ ने अपने क्षेत्र में अतिक्रमण के नाम पर तोड़े गए मकानों के बारे में कोई जानकारी नहीं होने की बात कह दी। अध्यक्षजी ने कहा आपको अपने विधानसभा क्षेत्र की जानकारी नहीं है तो फिर क्या कर रहे हैं आप? एक विधायक ने बैठक में नहीं आने का साहस भी दिखा दिया। बीकानेर पूर्व की बैठक हुई, चर्चा हुई, बहस हुई लेकिन विधायक सिद्धि कुमारी नहीं थी। अध्यक्ष की बैठक में नहीं आने को हिम्मत ही कहा जाएगा। शिकायतों का सबसे बड़ा अंबार लेकर जो नेताजी हाजिर हुए वो हमारे महापौर नारायण चौपड़ा थे। चौपड़ा जी के बारे में पार्षदों ने इतनी शिकायतें की, जितने दिन उन्होंने महापौरी नहीं की। रही सही कसर पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी ने पूरी कर दी। देशनोक के मंच पर उन्होंने जितनी खरी कही, उतनी तो उम्मीद भी नहीं की होगी।

परिवर्तन यात्रा की चर्चा तेज

कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा अब चर्चा में आ रही है। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. बी.डी. कल्ला ने प्रत्येक वार्ड में पहुंचकर जन समस्याओं को सुनना शुरू किया तो क्षेत्र के लोगों का दर्द उभर कर सामने आ गया। अब भाजपा नेता इसे चुनावी तैयारी बता रहे हैं तो कांग्रेस इसे सधी हुई शुरूआत बता रहे हैं। इतना तय है कि प्रदेश में भले ही कांग्रेस की तैयारी मंद गति से चल रही है लेकिन बीकानेर में पार्टी एकजुट होकर लडऩे की कोशिश में है। जिस वार्ड में परिवर्तन यात्रा पहुंच रही है, वहां उसी वार्ड के लोगों को साथ लिया जा रहा है। भाजपा नेता अभी तक तो इस यात्रा का जवाब दे नहीं पा रहे हैं।

एक अच्छा काम ये भी

वैसे तो सोशल मीडिया महज चर्चा का केंद्र है, अपनी भड़ास निकालने का माध्यम है या फिर स्वयं की तारीफ करवाने का जरिया है लेकिन इस बीच कुछ काम अच्छे भी हो जाते हैं। टीम बीकानेर से जुड़े लक्ष्मण मोदी ऐसे ही मुद्दे फेसबुक पर डालते रहते हैं। पिछले दिनों पीबीएम अस्पताल के आगे टूटी हुई जालियों को उन्होंने खुद ठीक किया तो इस बार अम्बेडकर सर्किल पर हो रहे बेतरतीब निर्माण कार्य की तरफ ध्यान आकर्षित करवाया। उन्होंने बताया कि ऊंची दीवार सर्किल पर बनी तो दुर्घटनाएं बढ़ेगी। न्यास अध्यक्ष महावीर रांका ने जब इस पोस्ट को देखा तो तुरंत काम रुकवाया और इंजीनियर भेजकर इसे दुरुस्त करवाया। वैसे शिकायत सांसद अर्जुन मेघवाल से भी की गई थी। खैर काम किसी ने भी करवाया तो लक्ष्मण मोदी के प्रयास से दुर्घटना की आशंका कम जरूर हो गई।

नतीजा क्या होगा

अब अध्यक्षजी की यात्रा के बाद कार्यकर्ताओं का सवाल है कि इतनी सुनी है, उसका नतीजा क्या होगा? जवाब भी एक कार्यकर्ता ने ही दिया कि अध्यक्षजी को पता है कि इनकी एक बार सुन लो। न तो हमारे पास नए कार्यकर्ता आने वाले हैं और न हमारे कार्यकर्ताओं को कोई दूसरी पार्टी पकडऩे वाली है। ऐसे में दोनों को यही रहकर काम करना है। भाजपा कार्यकर्ताओं की यह विशेषता है कि वो लड़ाई कितनी भी कर लें लेकिन जब राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार और कांग्रेस का नाम लिया जाता है तो तुरंत प्रभाव से एक भी हो जाते हैं। अच्छी बात है। पार्टी इसी भावना का फायदा उठाकर अपने लोगों को आगे ले आती है और कार्यकर्ता हमेशा पीछे रह जाता है। भाजपा की यात्रा का नतीजा क्या होगा? जवाब तो आप समझ ही गए होंगे।

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