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टिकट की दौड़ में कहां दौड़ें

विधानसभा चुनाव की घंटी बजने वाली है। गुजरात में जैसे चुनावी नतीजे आएंगे, वैसे ही राजस्थान में चुनावी तैयारियां परवान पर पहुंच जाएगी। इससे पहले वो लोग अपना होमवर्क कर रहे हैं, जो टिकट के दावेदार है। सबसे ज्यादा तैयारी भारतीय जनता पार्टी में हो रही है, जहां दावेदारों की संख्या दिन दुनी और रात चौगुनी बढ़ रही है। न सिर्फ शहर में बल्कि ग्रामीण अंचल की विधानसभा सीटों पर भी जोरदार लॉबिंग का खेल शुरू हो गया है। वर्तमान विधायकों को अपने कामों से फुर्सत नहीं है और नए विधायक बनने के दावेदारों ने उनकी जमीन हिलानी शुरू कर दी है।बात लूणकरनसर की हो या फिर नोखा की। हर कहीं नए दावेदार सामने आ रहे हैं। लूणकरनसर में एक दावेदार ने तो गांव गांव चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं। जातिगत राजनीति के आंकड़े दिमाग में सेट करके वो निकल पड़े है सफर पर। हर हाल में इस बार टिकट लाना है। इन नेताजी का तय रूप से मानना है कि अगर मानिकचंद सुराना को टिकट नहीं मिला तो सबसे बड़े दावेदार भाजपा से ये ही है। लूणकरनसर में प्रवेश करने के साथ ही सबसे पहले इनका ही चित्र वहां नजर आता है। लोकतंत्र की यही सुंदरता है कि यहां हर कोई अपनी दावेदारी जता सकता है। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि बीकानेर के एक वरिष्ठ नेता बड़े ओहदे वाले नोखा से चुनाव लड़ सकते हैं। अब तक तो उनकी बीकानेर पूर्व और पश्चिम से ही चुनाव लडऩे की अटकले आ रही थी लेकिन पाटे पर अब इनके नोखा से चुनाव लडऩे की खबर ने कुछ को परेशान कर दिया और शहर वालों को कुछ राहत दे दी। समझ नहीं आ रहा इस एक नेता को भारतीय जनता पार्टी कहां कहां पर दावेदार बनाएगी। इस नगर का विकास फिर कौन करेगा?
कांग्रेस का हिन्दूवादी प्रेम
कांग्रेस आजकल हिन्दूवाद में शायद भाजपा से भी आगे निकलने की कोशिश में है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर मंदिर मत्था टेक रहे हैं तो स्थानीय स्तर तक इसका असर दिख रहा है। एक कांग्रेस नेता गौ सेवा में व्यस्त है। सुबह उठने के साथ ही गायों की सेवा में लग जाते हैं। बताया जाता है कि गाय की सेवा से फल मिल जाता है। इनका तो बस एक ही लक्ष्य है कि एक बार जैसे-तैसे विधायक बनना है। गौ सेवा ऐसा मुद्दा है, जिस पर हिन्दू भी साथ है और पार्टी से नए मतदाता भी जुड़ रहे हैं। वैसे बता दें कि कुछ और कांग्रेसी नेता इन दिनों हिन्दू और सनातन विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। अच्छी बात है।
नमो विजय मंच
राजनीति के लिए मंच की जरूरत होती है, इसलिए हर कोई इसी जुगत में लगा है कि उसे टिकट मिल जाए। अब टिकट लेने के लिए अपना दमखम भी दिखाना पड़ता है। बाकी दावेदारों ने अपना काम किया, एक नेताजी ने अपना काम शुरू कर दिया है। बकायदा एक मंच गठित किया गया है, कार्यालय खोला गया है। नाम भी ऐसा दिया गया है जो कई अर्थ लिए हुए हैं। नमो विजय मंच। नमो यानी नरेंद्र मोदी और विजय यानी जीत। नरेंद्र मोदी को जीत मिले इसके लिए इस मंच का गठन किया है। या फिर यूं कहें कि भाजपा के एक 'विजयÓ को विजय दिलाने के लिए जतन अभी से शुरू हो गए हैं। अच्छी बात है। राजनीति में भी आजकल ऐसा ही है, जो दिखता है वो चलता है।
छवि सुधारने में लगे हैं
बात लूणकरनसर की चल पड़ी है तो बड़े वाले नेताजी की भी बात कर लेते हैं। सुनने में आया है कि वो आज कल काफी 'लिबरलÓ हो गए हैं। लोगों के बीच बैठते हैं, बात करते हैं, उनकी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। विधानसभा चुनाव में इस बार भी अपनी पार्टी से वो इकलौते दावेदार है। पिछले चुनाव में अपने ओहदे और जिम्मेदारियों के कारण ठेठ ग्रामीण परिवेश वाले 'अपनोंÓ को नाराज कर बैठे थे। इस बार इस छवि को बदलने में लगे हैं कि वो कुछ अलग अंदाज में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में जो भी रूस गए हैं, अरे... वो विदेश वाला रूस नहीं...। रूस गए यानी जो नाराज हो गए हैं, उन्हें वापस राजी करने में लगे हैं। छोटी छोटी बातों की नाराजगी दूर हो जाती है तो बड़ी बड़ी सफलताएं मिल ही जाती है।

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'सबको खुश करना नामुमकिन'

एक व्यापारी के तीन पुत्रों ने अलग अलग व्यापार प्रारम्भ किये। एक ने खेती, दूसरे ने कुम्भकार और तीसरे ने हिल स्टेशन पर होटल चलाने का कार्य प्रारम्भ किया। व्यापारी ने एक दिन तीनों के हाल चाल जानने हेतु यात्रा की। जब वह पहले पुत्र के घर पहुंचा तो उसने पिता से वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। वह किसान था। उसका कार्य वर्षा पर आधारित था। दूसरे पुत्र के घर जाते ही पुत्र ने पिता को भीषण गर्मी पड़ते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। जब किसान को उसने वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते पाया तो वह आगबबूला हो गया और तुरंत ही प्रार्थना बंद करने को कहा। दुसरे पुत्र के कहने पर पिता ने गर्मी पडऩे की प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। अब व्यापारी तीसरे पुत्र के घर पहुंचा। व्यापारी पिता भीषण गर्मी पडऩे की प्रार्थना कर रहा था। यह देख तीसरा पुत्र क्रोधित हो गया और उसने अपने पिता को बसंत काल जैसे मौसम की प्रार्थना करते रहने को कहा। पिता को यह समझ नहीं आया कि आखिर वो ईश्वर से किस मौसम के लिये प्रार्थना करे?

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मानो ना मानो, दावेदार तो हो

कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रियता पचास तरह की चर्चाओं को जन्म दे देती है। ऐसे में आप मानो या ना मानो, लोग के जुबां पर बात आ ही जाती है। पिछले दिनों संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल की पत्नी गृह विज्ञान महाविद्यालय की वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. विमला डुकवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ समय से उनकी सक्रियता को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने कोई बात नहीं बोली। यहां तक कि स्वयं उनके निर्देशन में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में भी किसी ने मंच से इस तरह की बात नहीं की लेकिन मोहता भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ता ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि आप राजनीति में भी आ रही है तो हम आपका पूरा सहयोग करेंगे। अब उनके पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं। पास में बैठे लोगों से जरूर कहा कि उनका ऐसा कोई मानस नहीं है। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम के बाद वो बाहर निकले तो एक महिला ने भी उन्हें बड़े पद पर जाने का आशीर्वाद दे डाला। अब यह सब कुछ पत्रकारों के सामने होगा तो चर्चा ए आम तो होगी ही। वैसे आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी डॉ. विमला का नाम चर्चा में आया था और एक बार फिर इसी नाम पर चर्चा हो रही है। हालांकि स्वयं डॉ. विमला कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि वो चुनाव लडऩे के लिए सक्रिय नहीं है। जैसे हालात नजर आ रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार भी भाजपा के एक दल विशेष की ओर से उनका नाम आगे किया जाएगा। अगर ऐसा हो जाता है तो कोई गलत भी नहीं। पढ़ी लिखी सांसद आखिर किसको नहीं चाहिए? हां, वैसे वर्तमान वाले सांसद भी कहां कम है, वो तो आईएएस अधिकारी थे।

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'क्या आप स्टार हैं?

मैनेजमेंट की रिसर्च के अनुसार प्रत्येक संगठन पांच से सात प्रतिशत कार्मिक स्टार परफोरमर्स होते हैं। इन्हीं कर्मचारियों के कार्य के प्रति समर्पण के दम पर संगठन को विशेष पहचान मिल पाती है। स्टार परफोरमर्स के पास सिर्फ स्वप्न ही नहीं अपितु क्रियान्वित करने की शक्ति भी होती है। उसमे आंतरिक विश्वास की शक्ति होती है जहाँ कुछ भी असंभव नहीं होता। उद्यमिता को अपने व्यवहार में उतारने वाला, मुश्किलें आने पर मैदान में डटे रहने वाला और नव सृजन व परिवर्तन को स्वीकारने वाला ही स्टार होता है। जरा सोचिये, क्या आप संगठन के स्टार हैं? यदि आप स्टार नहीं हैं तो आप एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अपनी कार्यक्षमता, अधुनातन सोच, प्रोएक्टिव एप्रोच द्वारा एक स्टार कर्मचारी संगठन को उच्च स्तर पर ले जाता है। उसकी ऊर्जा का प्रवाह, नैतिक बल और विषय पर पकड़ अन्यों से श्रेष्ठ होती है। वही उसे स्टार बनाती है।

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'कष्ट देने हेतु आभार'

एक गर्भवती भूखी प्यासी महिला पेड़ के नीचे बैठी थी। प्यास से उसके प्राण निकल रहे थे। कहीं भी जल नहीं था। तभी उसे लगा कि पेड़ पर से कुछ बूंदें टपक रही हैं। उसने पास ही पड़ा मिट्टी का दीपक लिया और उसमे बूंदों को इकठ्ठा करने लगी। जैसे ही दीपक भरा तो महिला उसे पीने लगी। तभी एक चिडिय़ा आई और उसने दीपक को गिरा दिया। महिला क्रोधित हो गयी। उसने गुस्से में पास पड़ी लाठी से चिडिय़ा पर प्रहार किया। महिला ने ईश्वर को भला बुरा कहते हुए कई अपशब्द कहे। चिडिय़ा घायल हो गई और ज्यों त्यों उड़कर अपने घोंसले में चली गई। तभी महिला ने देखा कि जिसे वह निर्मल जल समझकर इकठ्ठा कर रही थी वो असल में एक सांप का जहर था जो उसके मुंह से टपक रहा था। यह देखते ही महिला की आँखों में अशु्र थे। उसने ईश्वर का आभार जताया और अपने कृत्य पर ईश्वर से क्षमा मांगी।

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नोट के साथ वोट

भारत में पहले आम चुनाव 1952 में हुए। इसी क्रम में बीकानेर में पहले सांसद का चुनाव बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा करणीसिंह ने लड़ा था। करणीसिंह महाराजा गंगासिंह के पौत्र और महाराजा सार्दुलसिंह के पुत्र थे। आजादी के बाद पहले आम चुनाव तक राजा-महाराजाओं के प्रति विशेष सम्मान व प्रेम नजर आता था। तब राजा-महाराजाओं से जब भी कोई व्यक्ति मिलता था तो अपनी हैसियत के अनुसार कुछ न कुछ लेकर जरूर जाता था, जिसको नजराना या भेंट कहा करते थे। राजा महाराजा से खाली हाथ मिलने का रिवाज उस समय नहीं था। इसी सोच व भावना के साथ बीकानेर की जनता ने महाराजा करणीसिंह को वोट दिए तो वोट के साथ एक नोट भी डाला। सोच यह थी कि महाराजा को खाली वोट कैसे दें! आखिर तो राजा है और राजा को पहली बार बिना मिले ही मिलना था तो खाली हाथ नहीं मिला जा सकता था।

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'प्राथमिकता क्या है?

एक महिला ने एक तोता खरीदा। विक्रेता ने कहा कि तोता बड़ा वाचाल है। पहले दिन जब तोता एक शब्द नहीं बोला तो महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की। विक्रेता ने महिला को कहा कि वो पिंजरे में शीशा लगा दे तो तोता बोल पड़ेगा। तोता नहीं बोला। दूसरे दिन विक्रेता ने एक छोटी सीढ़ी पिंजरे में रखने को कहा। तोता फिर भी नहीं बोला। तीसरे दिन विक्रेता ने पिंजरे में झूला रखने को कहा लेकिन तोता झूला देख कर भी नहीं बोला। चौथे दिन तोता मर गया। जब महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की तो विक्रेता ने महिला से तोते को दिये गये आहार की जानकारी मांगी। महिला ने धीरे से दुखी होकर कहा कि उसने तोते को आहार तो दिया ही नहीं। जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी- आहार। वह नहीं दिया तो बाकी सब दिया जाना निरर्थक रहा। महिला प्राथमिकता नहीं तय कर सकी कि तोते को क्या देना है।

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मदद: क्या सभी को नहीं चाहिये?

अपने घर के आगे एक दिन मुझे एक भिक्षुक दिखा. मैं अपनी बाइक को स्टार्ट करने के जद्दोजहद में था। मुझे लग रहा था कि इससे पहले कि यह भिक्षुक मुझसे कुछ मांगे, मैं घर से निकल जाऊं। इसी बीच मैंने देखा कि भिक्षुक अचानक फिसल कर गिर पड़ा है। मैंने तुरंत ही उससे पूछा कि क्या उसे कुछ मदद की ज़रूरत है? इस प्रश्न पर उसने जो उत्तर दिया उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। भिक्षुक ने मुझे उत्तर देते हुए कहा कि ' क्या सभी को ज़रुरत नहीं है - मदद की, प्रेम की, दया कीÓ। यह सुनकर मुझे लगा मानो मेरा समूचा ज्ञान व्यर्थ है। मेरी स्थिति काटो तो खून नहीं जैसी थी। भिक्षुक मुझे जीवन जीने का सार समझा गया। मुझे लगा कि ईश्वरीय वेश में वो भिक्षुक मुझे जीने की नई राह बता गया।

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'जो बोयेगा वही काटेगा'

एक छोटे अनाथ बच्चा भूख और प्यास से परेशान था। उस दिन उसे मजदूरी भी नहीं मिली अत: उसके पास एक पैसा भी नहीं था। लड़का खुद्दार था। एक मकान के बाहर खड़ी महिला से उसने एक ग्लास पानी मांगा। महिला समझ गयी कि बच्चा भूखा- प्यासा है। महिला ने पानी की जगह बच्चे को एक ग्लास दूध दे दिया। बच्चे ने धीरे-धीरे दूध पिया और उसका मूल्य पूछा। महिला ने कहा कि मदद का पैसा नहीं लिया जाना चाहिये। बच्चे ने महिला का आभार जताया। कई वर्ष बाद वही महिला गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी। डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया। तभी डॉक्टर्स ने सुपर स्पेशिअलिस्ट डॉ. होवार्ड से मदद लेने की सोची। डॉ होवार्ड इस बीमारी का सबसे बड़ा डॉक्टर था। डॉ होवार्ड ने महिला का दस दिन तक पूर्ण मनोयोग से इलाज किया। डॉ होवार्ड अपने जूनियर्स से कहा कि इलाज का बिल उस महिला से नहीं लिया जाये। जब महिला ने स्वस्थ होने के बाद बिल की प्रति माँगी तो अस्पताल प्रशासन ने कहा कि बिल का भुगतान हो चुका है। महिला आश्चर्यचकित थी। जब बिल की प्रति महिला को मिली तो उसपर लिखा था 'मैडम, इस बिल की राशि उस एक ग्लास दूध से काफी कम है जो वर्षों पूर्व आपने मुझे पिलाया था। यदि वो एक ग्लास दूध नहीं मिलता तो आज डॉ होवार्ड जीवित नहीं होता। आपका ही डॉ होवार्डÓ। महिला की आंखों में अशु्र थे। सच है, जैसा आप अन्यों के साथ करोगे, अन्य भी आपके साथ वैसा ही करेंगे।

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कलाओं का कोलाज है नाटक

नाट्य-कर्म कलाओं का कोलाज है। यहां संगीत, नृत्य, गायन, वादन, चित्र और काव्य का एक ऐसा मंडल बनता है जो दर्शकों को भाव-विभोर करने की क्षमता रखे। इसी लिए नाट्य-मंडली या रंग-मंडल जैसे शब्द प्रचलन में आए। एक ऐसा वातावरण जहां सभी कलाओं के ज्ञाता हों और एक दिशा में चलने के अभ्यस्त हों। ध्येय एक हो, नाटक खेलना। वस्तुत: यह खुद को साधने की कला होती है और समस्त कलाएं मंच के इस साधक को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए होती है। इसीलिए नाटक को अभिनेता का माध्यम कहा गया है। अभिनेता नाटक का वह चेहरा होता है, जिसके बूते पूरा परिदृश्य अभिव्यक्त होता है और हम देखते हैं कि बहुत सारे नाटक अपने पात्रों की वजह से सदियों तक याद रखे जाते हैं। बहुत सारे नाटकों के निर्देशक तो क्या लेखकों के नाम भी याद नहीं रहते लेकिन उनके पात्रों का नाम याद रहता है। थैंक यू मिस्टर ग्लाड, अंधायुग, तुगलक, भोमा, कोर्ट मार्शल, सखाराम बाइंडर, अजातघर, खबसूरत बहू, बिन बाती के दीप, आत्मकथा, तीडोराव और ऐसे ही कई नाटक अपने पात्रों की वजह से, अभिनेता की वजह से पहचाने गए।

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