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असंभव कुछ नहीं

एक विद्यार्थी देर से कक्षा में आया। उसने देखा कि बोर्ड पर दो सवाल लिखे हुए हैं। उसे लगा यही गृह कार्य होगा। उसने सवालों को नोट किया। घर जाकर उसने सवाल हल करना प्रारम्भ किया लेकिन सवाल बड़े ही कठिन और जटिल थे। पूरी रात लगा रहा तब जाकर सवाल हल हुए। अगले दिन गुरूजी को अपनी उत्तर पुस्तिका दी। गुरूजी ने अनमने ढंग से उसकी नोटबुक रख ली। उसे लगा कि इतने मेहनत से उसने गृह कार्य किया और गुरूजी ने शाबासी भी नहीं दी। यहां बात ये है कि वे दो सवाल गृह कार्य हेतु दिये ही नहीं गये थे। दो दिन बाद उस छात्र के घर पर अचानक खुशी से आल्हादित गुरूजी पहुंचे। उन्होंने छात्र का धन्यवाद देकर कहा कि उस छात्र ने उन दो सवालों को हल कर डाला है जिन्हें सांख्यिकी में हल करना असम्भव माना जाता रहा है। गुरूजी ने कहा कि वे तो इसी पर शोध भी कर रहे थे कि इसका हल कैसे निकाला जाये? असंभव को संभव बनाने वाले छात्र का नाम था - जॉर्ज डेंटजिग।

यहां समझने की बात यही है कि वह छात्र यह जानता ही नहीं था कि ये दोनों विश्वस्तरीय सवाल हैं जिनका हल आज तक कोई नहीं निकाल सका था। इससे सिद्ध होता है कि जब आप यह सोच लेते हैं कि अमुक कार्य तो मुश्किलए कठिन या नामुमकिन है, उसी क्षण वो कार्य वाकई नामुमकिन हो जाता है। यह सिर्फ सोच पर निर्भर करता है कि क्या मुमकिन है और क्या नामुमकिन? सच तो ये है कि नामुमकिन कुछ है ही नहीं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बाहरी परिस्थितियांए अन्यजनों के नकारात्मक कमेंट्स और भयभीत करने वाले स्नेहीजनों के कारण ही आप असंभव को संभव बनाने का प्रयास नहीं करते हैं। जैसे ही आपसे कोई कह देता है कि अमुक कार्य में बहुत कष्ट और समस्याएं हैं और यह कार्य तो लगभग असंभव है उसी पल आप उस कार्य को त्याग देते हैं।
विद्यार्थियों के तनाव का भी वास्तविक कारण यही है। किसी मनचले ने कह दिया कि-सिम्पल हारमोनिक मोशन तो मुश्किल है, आयनिक एक्विलिब्रियम के न्यूमेरिकल कठिन हैं या श्रोंडीजर वेव समीकरण तो टेढ़ा है। उसी पल विद्यार्थी यह मान लेता है और दिमाग में एक सोच निर्मित कर लेता है कि ये तो कठिन हैं। अब वो चाह कर भी उन्हें समझ नहीं पाता। पूर्वाग्रहों से बचें। अपनी अक्ल लगायें। दूसरों की बातों को सुनने के बजाय अपने मस्तिष्क का प्रयोग करना ही सफलता के शिखर पर ले जायेगा। यही सेल्फ मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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उस वक्त भी हुआ था मृत्यु भोज परम्परा का विरोध

बात उस समय की है जब पूर्व महाराजा सार्दुल सिंह की दादी व बीकानेर रियासत के पूर्व महाराज डूंगरहसिंह जी की पड़ी का निधन हुआ था और रिवाजानुसार उनके निधन पर मृत्युभोज 'तीन धडे का जीमण' रखा गया। राजा महाराजाओं सहित सेठ साहूकारों में अपने घरों में किसी बुजुर्ग का निधन होने पर उनकी तेंहरवीं में तीन धडे का भोज करने की परम्परा थी। तीन धड़ों में ब्राह्मण समाज के तीन बडे वर्गों के लोगों को मृत्युभोज खिलाया जाता और इस तरह हजारों लोग इस भोज में शामिल होते। इस अवसर पर एक बडी धनराशि खर्च हो जाती। तत्कालीन समाजवाद समर्थक युवक कांग्रेस के नेता मक्खन जोशी, भैंरूरतन रंगा व उनके साथियों ने समाज में फैली इस कुरीति का विरोध करने का निर्णय लिया और कहा कि ये धनवान लोगों का धन का प्रदर्शन है जो रूकना चाहिए। इनका मानना था कि यह धन जरूरतमंदों में बांटा जाय। इसके लिए उन्होंने एक अपील भी जारी की लेकिन वो बेअसर रही। सार्दुलसिंह ने तीन धडे का भोज करने का निर्णय ले लिया। इस देखकर मक्खन जोशी के नेतृत्व में इन नेताओं ने इस भोज का विरोध करने का निर्णय लिया। लेकिन मक्खन जोशी के पिता झमण सा जोशी भी अपने बेटे के इस विचार से सहमत नहीं थे। यह सब जानकार शहर में चर्चा हो गई कि अब देखते हैं कि बेटे के विरोध के कारण पिता क्या कदम उठाते हैं। इस तरह भोज का दिन आ गया और अपनी धुन के पक्के समाजवादी सोच के युवा नेता मक्खन जोशी अपने साथियों सहित इस भोज का विरोध करने के लिए भोज स्थल जूनागढ के बाहर पंडाल लगाकर बैठ गए और अनशन किया। उधर मक्खन जोशी के पिता इस भोज में भोजन लेने पहुंचे। इस तरह बेटा तो बाहर विरोध कर रहा है लेकिन पिता अंदर भोज ले रहा है। यह देखकर पूरे शहर में यह चर्चा हो गई कि बेटा तो भूखा रह गया लेकिन पिता खाना खाकर आ गया। शहर के लोग आज भी इस घटना को याद कर चर्चा करते हैं लेकिन इस विरोध का समाज पर गहरा प्रभाव पडा और वह तीन धडे का भोज इतिहास का अंतिम भोज ही रहा।

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बिजनेस में माइंड लड़ाने वाले पढ़ें यह किस्सा

'फ्री है क्या?'

एक राजा ने मंत्रियों को यह लक्ष्य दिया कि वे सभी किसी भी तरीके से प्रजाजनों की बौद्धिक क्षमता का विकास करें। मंत्रियों ने तुरंत एक हजार पुस्तकें खरीदी और प्रजा को उन पुस्तकों को पड़ाने की बात कही। राजा ने कहा कि इसमें बहुत समय लगेगा। मंत्रियों ने उन हजार पुस्तकों में से सौ पुस्तकें छांट ली। राजा ने कहा कि यह भी बहुत मुश्किल है क्योंकि प्रत्येक प्रजाजन को सौ पुस्तकें पढ़ाना मुश्किल है। मंत्रियों से संख्या घटा कर दस कर दी। राजा संतुष्ट नहीं हुआ। अब मंत्रियों ने एक पुस्ता ले ली। राजा अब भी असंतुष्ट था। इसके पश्चात मंत्रियों ने सिर्फ एक वाक्य समस्त प्रजाजनों को सिखाने का लक्ष्य ले लिया। राजा संतुष्ट हो गया। वो एक वाक्य था - "संसार में मुफ्त कुछ भी नहीं मिलता, उसकी कीमत चुकानी ही होती है"। 

यह सांकेतिक कथा बड़ा ही गूढ़ सन्देश सिखाती है। संसार में कुछ भी फ्री नहीं होता है। प्रत्येक वस्तु/सेवा का मूल्य चुकाना होता है। प्रत्येक वस्तु/ सेवा या सुख को प्राप्त करने हेतु कठोर परिश्रम, समर्पण और ईमानदारी की आवश्यकता होती है। मुफ्त में कुछ प्राप्त हो जाये की बात सोचना ही मूर्खता है। मनुष्य वो प्रत्येक वस्तु प्राप्त कर सकता है जिसका मूल्य वो चुका सकता हो।
* यदि आपको प्रशासनिक अधिकारी बनना है तो उसका मूल्य है लोकप्रिय होने की बजाय प्रभावी होने की चाहत, उत्तम निर्णय क्षमता और वस्तुनिष्ठ सोच।
* यदि आप चिकित्सक बनना चाहते हैं तो उसका मूल्य है नित्य 14 से 16 घंटे अध्ययन, निस्वार्थ सेवा का भाव और दूसरों की पीड़ा समझने की शक्ति।
आप और हम सिर्फ यह वाक्य समझ लेवें कि "मुफ्त कुछ नहीं है" तो उसी क्षण आपकी बुद्धि का विकास हो जाता है। परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता। मुफ्तखोरी अपराध है, कलंक है। याद रखें कि मुफ्त का माल सबसे महंगा होता है। यहां मन्त्र यही है कि कठोर परिश्रम और कार्य के प्रति आपके जुनून से ही सारे कार्य सिद्ध होते हैं। यही शाश्वत सत्य है।

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'इंट्रोस्पेक्शन'

एक बड़े संत थे। बुजुर्ग हो गये थे। एक दिन उन्होंने सभी शिष्यों की परीक्षा लेकर यह तय करने का सोचा कि उनके पश्चात गुरु की पदवी पर कौन बैठे? संत ने सभी शिष्यों को बुलाकर प्रश्न पत्र दिया। प्रश्न पत्र में एक ही प्रश्न था। वो प्रश्न था कि गुरु की पदवी के लिये कौन सबसे योग्य है? इसके उत्तर में अधिकतर शिष्यों ने सबसे ऊपर स्वयं का नाम लिखा और उसके बाद दो तीन नाम और लिखे। जब संत ने ऐसे उत्तरों का कारण पूछा तो शिष्यों ने दूसरे शिष्यों के दोष गिनवा दिये। इसका अर्थ था कि वे सैकड़ों शिष्यों में सिर्फ दोष देखते थे और उनकी नजर में सिर्फ दो या तीन शिष्य ही गुरु की पदवी के लायक थे। एक शिष्य जिसे गुरु की पदवी मिली उसने बड़ा विचित्र उत्तर लिखा। उसने लिखा कि उसके अलावा सभी इस गुरु की पदवी को धारण कर सकते हैं क्योंकि उसमे कई सारे दोष हैं और बाकी सब श्रेष्ठ हैं। गुरूजी ने कहा कि जो अपने दोष देख सकता है, वही गुरु बन सकता है।

यह कथा एक श्रेष्ठ पाठ पढ़ाती है। जो भी स्वयं के दोषों को देखता है, उनपर विचार करता है और उन दोषों को दूर करने का प्रयास करता है वही वास्तव में सर्वश्रेष्ठ भी होता है। माना कि आज के युग में सेल्फ मार्केटिंग जरूरी है लेकिन इसके लिये भी आवश्यक यह है कि आप स्वयं की शक्तियों का विस्तार करें। यदि आप दूसरों के दोषों को ही देखते रहेंगे तो फिर आप स्वयं श्रेष्ठ कैसे बन पायेंगे? दूसरों को कुपात्र ठहराने की बजाय स्वयं सुपात्र बनना ज्यादा अच्छा होता है। श्रेष्ठता की शुरुआत ही इंट्रोस्पेक्शन से होती है।
-जरा सोचिये कि क्या आप :
* स्वयं से वार्ता करते हैं?
* आप अपनी शक्तियों, कमजोरियों, अवसरों और समस्याओं का चार्ट सदा अपडेटेड रखते हैं?
* अंतर्मन के विचारों को सुनकर फैसले करते हैं?
* दूसरों को नीचा दिखाने के बजाय स्वयं को सुधारने का प्रयास करते हैं?
यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर ना है तो यकीन मानिये कि अभी तक आपने श्रेष्ठता की ओर यात्रा प्रारम्भ ही नहीं की है। यही आज की सबसे बड़ी समस्या है। अत: यहां मन्त्र यही है कि स्वयं के दोषों को समझें, उन्हें दूर करें, इंट्रोस्पेक्शन करें तथा अन्यों के दोष ढूंढने से पहले स्वयं के दोषों पर नजर डालें। यही सेल्फ मैनेजमेंट का मर्म है।

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कसमसाहट, इधर भी-उधर भी

जिले के एक बड़े नेता भाजपा में वापस आ रहे हैं। इस आशय की खबर चर्चा में आई तो इधर और उधर दोनों तरफ कसमसाहट चालू हो गई। नेताजी की अभी वाली पार्टी के नेता तो यह सोचकर खुश थे कि अगले चुनाव में एक दावेदार कम हो जाएगा, उधर वाले इसलिए खुश थे कि उनके बिना कुछ युवा नेताओं का मन है कि लगता नहीं। हालांकि कुछ बड़े नेताओं के पेट में दर्द भी होने लगा कि यह फिर आ गए तो हमारा क्या होगा? राजनीति में दोस्त कभी दोस्त नहीं होता और दुश्मन हमेशा के लिए दुश्मन नहीं होता। अब यह खबर आई तो पुष्टि के लिए हमने इधर-उधर झांकने के बजाय सीधे नेताजी को ही फोन लगा दिया। उनका जवाब इतना जबर्दस्त था कि 'मेरी किस्मत में विपक्ष ही थोड़े लिखा है?Ó बात भी सही है जिस जहाज में सवार हो, वो किनारे पहुंच रहा है तो डूबने वाले जहाज में सवार क्यों हो? हालांकि यह भविष्य के गर्त में है कि जहाज डूबेगा या नहीं? पिछले दिनों जहाज में पानी आने की बात पता चली। १७ छेद तो पूरी तरह से सामने आ गए, बाकी का पता लगाया जा रहा है। ऐसे में नेताजी के इस कथन को समझदारी भरा निर्णय कहना ही पड़ेगा। यह भी कह सकते हैं कि बार बार गलती नहीं होती।

अब उधर, बैठे एक नेताजी घर वापस आने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। वो मान गए कि उनका मन इधर लगता ही नहीं। वो डेढ़ सौ से ज्यादा छेद वाला जहाज छोड़कर दौड़ते जहाज में चढ़े थे लेकिन उन्हें मनपसंद जगह नहीं मिल पाई। जो जहाज डूबा था, उसमें वो आगे की सीट पर थे लेकिन अब बहुत पीछे की सीट नसीब हो पा रही है। यह भी चाहते हैं कि एक बार सत्तासीन जहाज पर ही सवारी की जाए। पुराने रसूख काम आने ही चाहिए।

युवाओं पर रहेगी नजर

अब हर काम चुनावी है। बड़े नेता तो अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों में जुट भी गए हैं। बूथ स्तर पर कामकाज शुरू हो गया है। मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि इसी का परिणाम है। लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में तीस से चालीस हजार के बीच नए मतदाता है। यह सभी मतदाता १८ वर्ष से २२ वर्ष की आयु के हैं, जिन्हें संभवत: पहली बार मतदान करने का अधिकार मिलेगा। ऐसे में इन युवाओं को ध्यान में रखकर ही बड़े नेता अपनी योजनाएं बना रहे हैं। कार्यक्रमों में उपस्थिति की बात हो या फिर अपने व्यक्तिगत आयोजन हो, हर कहीं युवा शक्ति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। चुनाव में जरूरी भी है।

एक गैर राजनीतिक अच्छा प्रयास

चुनावी दौर में हर काम चुनावी होता है लेकिन शहर की एक कॉलोनी ने राजनीति को किनारे रखकर अपना मंच बना लिया है। मुरलीधर व्यास कॉलोनी के युवाओं के प्रयास से यहां व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से सभी लोगों को जोडऩे का प्रयास किया गया। व्हाट्सएप से बाहर निकलकर ग्रुप के सदस्यों ने पिछले दिनों 'फेस टू फेसÓ मुलाकात की। इसके बाद ही एक 'गेट टू गेदरÓ रखा गया है। कुछ ही दिनों में सभी सदस्य मिलेंगे। अच्छी बात है कि गैर राजनीतिक रूप से एक समूह अपने क्षेत्र के विकास की बात कर रहा है। पूरी तरह से उपेक्षित इस कॉलोनी के लोगों को इस एकजुटता का परिणाम भी मिलेगा। जिन लोगों को यहां राजनीति करने का शौक है, उन्हें भी संयम बरतना होगा। कई बार अच्छे काम कुछ लोगों के कारण बिगड़ जाते हैं, सब मिलकर सकारात्मक सोच रखेंगे तो विकास भी होगा।

बीकानेर पूर्व से कौन?

बीकानेर पूर्व विधानसभा सीट से इस बार कौन कौन दावेदार होगा? यह सवाल इन दिनों चर्चा में है। हालांकि सोशल मीडिया पर पूर्व के बजाय पश्चिम पर ज्यादा चर्चा होती है लेकिन पूर्व से कांग्रेस उम्मीदवार को लेकर कयास का दौर तेज हो गया है। जो भी राजनीति में थोड़ा बहुत सक्रिय होने की कोशिश करता है, वो ही पूर्व का दावेदार घोषित हो जाता है। दरअसल, बीकानेर पूर्व एक ऐसी सीट है, जहां जातीय और धार्मिक राजनीति संभव नहीं है। वहां सभी जातियों के लोग हैं, सभी आर्थिक तबके के लोग हैं। ऐसे में कांग्रेस को भी ऐसे नेता की जरूरत है जो पूर्व राजपरिवार की सदस्या और दो बार की विधायक सिद्धि कुमारी को टक्कर दे सके। मामला इतना आसान नहीं है, जितना कांग्रेस के नेता समझ रहे हैं।

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'शक्तिशाली सकारात्मक सोच'

दो व्यक्ति भजन कर रहे थे। नारदजी वहां से निकले। दोनों ने एक-एक करके पूछा कि मोक्ष कब मिलेगा? पहले व्यक्ति से नारद जी ने कहा कि चार जन्म बाद मोक्ष प्राप्ति होगी। यह सुनते ही वो व्यक्ति जोरदार तरीके से विलाप करने लगा। उसने कहा कि इतना भजन करने के बाद भी चार जन्म? यह तो अनीति है। उसने भजन त्याग दिया और नकारात्मक सोच को अपने ऊपर हावी होने दिया। दूसरे को नारद जी ने कहा कि जितने पत्ते इस पीपल के पेड पर हैं उतने जन्मों के बाद मोक्ष मिलेगा। दूसरा भक्त बोल उठा कि 'वाह, इतनी जल्दी मोक्ष मिल जाएगा'। उसी क्षण ईश्वर ने भविष्यवाणी कर दूसरे भक्त से कहा कि 'तुम्हें तुरंत मोक्ष मिलेगा। तुम सकारात्मक सोच की परिसीमा हो।'
सकारात्मक सोच की शक्ति विचारों में नूतन उत्साह और चेतना जगा कर व्यक्ति को जीवन के संघर्षों से लडऩे की प्रेरणा देती है। व्यवहार विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रो अर्थात मानवीय गुण मैक्रो अर्थात किताबी (ज्ञान) के गुणों से अधिक महत्व रखते हैं। इन माइक्रो गुणों का सरताज है-सकारात्मक सोच जो व्यक्ति में कुछ कर गुजरने की असीम शक्ति प्रदान कर देता है।
जरा समझिए। हमारी सोच कैसी है? क्या हम किसी को खुश देखकर प्रसन्न होते हैं या दुखी देखकर घ् किसी व्यक्ति के पुरस्कृत होने पर उसे बधाई देने का साहस करते हैं या यह सोचते हैं कि यदि बधाई दी तो अन्यों को उसके श्रेष्ठ कार्य का पता चल जाएगा तो क्यों कुछ कहूं? क्या हम हमारे संगठन में मन से किसी व्यक्ति के नए विचार की तारीफ करते हैं या उसे जुगाडू कहकर दरकिनार कर देते हैं? कहीं हमारी सोच राक्षसी तो नहीं है कि हम दूसरों के प्रति इतनी नकारात्मक सोच रखें जैसा राक्षसों में होता है कि मेरी एक आंख भले ही फूट जाए पर दूसरे व्यक्ति की दोनों आंखे फूटनी चाहिए?
निकृष्टतम व्यक्ति में भी कुछ उत्कृष्ट गुण होते हैं। उन्हें स्वीकारें। सड़क पर दुर्घटना में मरे हुए कुत्ते को सभी घृणा से देखते हैं परन्तु एक बालक कहता है कि कुत्ते के दांत तो हीरे जैसे चमक रहे हैं। यही सकारात्मता की सीमा है। यहां मन्त्र यही है कि हम प्रत्येक व्यक्ति, घटना और स्थान में सकारात्मक बात ढूंढें। सदा मानें कि जो होता है, वो अच्छे के लिये होता है। यह सोच संतोष देती है और जीवन को चलायमान रखती है। यही सेल्फ मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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जब एक कांस्टेबल ने कलक्टर को कहा: बाहर ही रहो भीड मत करो

बात दो फरवरी 1982 की है जब बीकानेर में अखिल भारतीय पंचायत राज सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा था। सम्मेलन में कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव राजीव गांधी, राजस्थान के मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी, केन्द्रीय मंत्री बूटासिंह, बलराम जाखड़ सहित कई राष्ट्रीय स्तर के नेता मौजूद थे। राजकीय स्टेडियम में आयोजित हो रहे इस सम्मेलन की पंचायत राज से संबंधित प्रदर्शनी साईकिल वेलोड्रम के मैदान पर रखी गई थी। सभी लोग इस प्रदर्शनी का अवलोकन कर रहे थे कि अचानक एक हलचल हुई और सबने देखा कि राजस्थान के कद्दावर कांग्रेसी नेता मोहनलाल सुखाडिया बेहोश होकर गिर पडे। सुखाडिया 17 साल तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे थे और उसके बाद कर्नाटक, आंध्रप्रदेश व तमिलनाडू के राज्यपाल भी रहे। सब हक्के-बक्के व हतप्रद रह गए। सुखाडिया को बेहोशी की हालत में पीबीएम अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सभी लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। सुखाडिया का शव पीबीएम था। बीकानेर के तत्कालीन जिला कलक्टर एमकेश खन्ना को जैसे ही सूचना मिली वे जहां थे जैसे थे पीबीएम की तरफ रवाना हुए। अस्पताल के बाहर भारी भीड थी। लोग अपने नेता के अंतिम दर्शन करना चाहते थे। पीबीएम के मुख्य दरवाजे के बाहर एक पुलिस कांस्टेबल को नियुक्त कर दिया गया कि किसी को भी अंदर न आने दिया जाए। उधर अपनी गाडी से उतर कर जिला कलक्टर एमकेश खन्ना अस्पताल के दरवाजे की और दौडे पर जैसे ही उन्होंने अंदर प्रवेश की कोशिश की कांस्टेबल ने हाथ पकड कर रोक लिया और बांह पकड कर किनारे कर दिया कि भीड मत करो बाहर ही रहो। जिला कलक्टर अपने साथ हुए इस व्यवहार से भौचक्के रह गए पर तुरंत संभले और दुबारा उसी तरफ बढ़े इस बार फिर कांस्टेबल ने कलक्टर साहब को रोक दिया कि समझ नहीं आता एक बार कह दिया बाहर ही रहो। इतना सुनते ही कलक्टर के साथ आए उनके स्टाफ के एक सदस्य ने कहा कि तुम नहीं जानते क्या ये खन्ना साहब है जिले के कलक्टर। इतना सुनते की कांस्टेबल के होश उए गए और उसने सेल्यूट किया और माफी मांगी परंतु खन्ना साहब ने हालात की मजबूरी समझी और उस कांस्टेबल को सराहा कि आपने कोई गलत काम नहीं किया बल्कि अपनी ड्यूटी निभाई है। इसके लिए आप बधाई के पात्र है और यहीं खडे रहकर ऐसे ही अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से करते रहिए। वहां खडे लोगों ने इस पूरे घटनाक्रम को देखा तो देखकर आश्चर्य किया कि कैसे जिले के सुप्रीम अधिकारी ने बजाय बुरा मानने के एक छोटे कर्मचारी को उसकी कत्र्तव्यनिष्ठा के लिए सराहा।

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'चेन्ज योरसेल्फ'

सड़क पर चलते समय कोई हमारे सामने थूक दे, बिना वजह होर्न बजाये, या ट्रेन-बस में बैठा यात्री सिगरेट पिए और गन्दगी करे तो यकायक हमारा खून गर्म हो जाता है और हृदय में दर्द होने लगता है। बहुत गुस्सा आता है? मन में आता है कि क्या ये लोग आदमी कहलाने लायक हैं? ऐसी बातों पर नाराजगी न जतायें। यही शपथ लेते जायें कि आप तो ऐसा कदापि नहीं करेंगे। जरा सोचिये कि -
* क्या आप समाज को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर सकते हैं?
* क्या आप प्रत्येक व्यक्ति को नैतिकता का पाठ पड़ा सकते हैं?
* क्या आपको लगता है कि सिविक सेन्स का प्रशिक्षण दिया जा सकता है?
* क्या आपको लगता है कि आप एक ही दिन में राष्ट्र को स्वच्छ, समृद्ध और शक्तिशाली बना देंगे?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर ना है। परिवर्तन होने में सदियों लग जाती हैं। परिवर्तन करने का सबसे अच्छा उपाय है स्वयं को बदलना। दूसरे व्यक्ति बदलेंगे, बॉस बदलेगा, संसार बदलेगा ये सभी निर्मूल अवधारणाएं मात्र हैं। कोई नहीं बदलेगा। सिर्फ हम बदलेंगे। अत: समाज को अच्छी दिशा में परिवर्तन करने का मूल मन्त्र है - 'चेंज योरसेल्फ'। स्वयं को बदलना श्रेष्ठता की दिशा में पहला कदम है। एक अकेले की शक्ति भी बहुत होती है। स्वाधीनता संग्राम के नायक सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, बिरसा मुंडा, मंगल पांडे ने अकेले ही क्रांति का अलख जगाया थाण् अत: आज से 'सेल्फ चेंज या सेल्फ ट्रांस्फोर्मेशन' की शपथ लेवें। बड़े-बड़े व्रत न लेवें। उन्हें निभाना मुश्किल है। अणुव्रत अर्थात छोटे-छोटे व्रत लेवें। उन्हें निभावें। इससे अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी। छोटे व्रत जैसे पब्लिक प्लेस पर गंदगी नहीं फैलाना, कचरा डस्टबिन में ही डालना, मूल्यों का त्याग न करना आदि।
इसी का एक जीता जागता उदाहरण बीकानेर शहर के पुष्करणा वेलफेयर बोर्ड ने दिया। एक विवाह समारोह में उन्होंने काउन्टर लगाकर लिखा कि जूठन छोडऩा बहुत गलत है। यदि जूठा छूट भी जाये तो उस मिठाई को उन्हें काउन्टर पर सौंप देवें ताकि उसे भी किसी उपयोग में लिया जा सके। इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों ने जूठन नहीं छोड़ी। पूर्व में जहां कई किलोग्राम भोजन का नाश होता था, पुष्करणा वेलफेयर बोर्ड के इस छोटे से प्रयास का परिणाम ये हुआ कि दो किलोग्राम जितनी जूठन भी नहीं बची। यही है परिवर्तन का मार्ग। इसी को सेल्फ चेंज कह सकते हैं।
यहां मन्त्र यही है कि हम स्वयं अपने कर्तव्य को श्रेष्ठ ढंग सेए ईमानदारी से निभाएं और दूसरों के बदलने की आस किये बिना नित्य प्रति अपना कार्य-व्यवहार सुधारें तो संगठन और समाज अवश्य ही बदलेगाय यही प्रबंध का मर्म है।

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'जे फेक्टर'

मैनेजमेंट में एक बड़ा ही प्रचलित मुहावरा है - 'जे फेक्टर' जहां जे का अर्थ है जैलौसी अर्थात ईष्र्या। व्यक्तिस्वयं सुखी होने के स्थान पर अन्यों की प्रसन्नता पर दुखी है और यही 'जे फेक्टर' कहलाता है जो हमें सुखीराम की जगह दुखीराम बना देता है। दुखीराम का आदर्श वाक्य है कि मेरी एक आंख भले ही फूट जाये पर दूसरे के दोनों आंखें फूटनी चाहिए। पराई थाली में ज्यादा घी नजर आना ही ईष्र्या की प्रथम अभिव्यक्ति है। तुलना करना, हर बात में छोटे बच्चों की तरह काम के भार को तौलना और तनिक भी समझौता नहीं करने की प्रवृत्ति बिना वजह की ईष्र्या को जन्म देती है।
दो महान प्रोफेसर्स एक परिचित के यहां अतिथि के रूप में गये। जब पहले प्रोफेसर स्नान के लिए गये तो उस घर के मालिक ने दूसरे प्रोफेसर से पहले प्रोफेसर के बारे में पूछा। दूसरे प्रोफेसर ने कहा कि पहला वाला प्रोफेसर तो बिलकुल ही गधा है। रिसर्च और डेवेलोपमेंट में बिलकुल ही बेकार है। जब दूसरा प्रोफेसर स्नान के लिए गया तो पहले प्रोफेसर ने गृह स्वामी से कहा कि पहला प्रोफेसर तो बिलकुल बैल है और बिलकुल ही अडिय़ल मूर्ख है। दो अति बुद्धिमान विद्वानों की ईष्र्या को मिटाने के लिए गृह स्वामी ने एक तरकीब लगाई। ज्यों ही दोनों प्रोफेसर भोजन के लिए बैठे तो उसने एक की थाली में भूसा और दूसरे की थाली में घास रख दी। तदुपरांत उनसे कहा कि गधे और बैल का भोजन प्रस्तुत है। इस जे फेक्टर की वजह से दोनों प्रोफेसर अत्यधिक शर्मिंदा हुए।
निंदा और ईष्र्या का भाव अमानवीयता का प्रतीक है। तुलना, निन्दा, हर छोटी बात पर बेवजह का क्रोध व्यक्तित्व का नाश कर देता है। ईष्या अकरने से आपके जीवन का दायरा छोटा हो जाता है जिस कारण सोच भी छोटी हो जाती है। इससे बचिये। याद रहे, भगवान सभी को एक दिन में चौबीस घंटे का समय देता है। यदि उन चौबीस घंटों में कोई व्यक्तिआपसे ज्यादा अच्छा और उत्पादक कार्य कर रहा है तो इसमें प्रेरणा लेवें और ईष्र्या नहीं करें। जे फेक्टर का त्याग ही हमें मनुष्यत्व की ओर ले जाता है।

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'सभी आपस में जुड़े हैं'

एक दीपक जल रहा था। वायु के वेग से लौ फडफ़ड़ा रही थी। इसे देख अहंकारवश घी बोल पड़ा कि दीपक का वजूद तो घी से है क्योंकि उसके बिना लौ जल ही नहीं सकती। यह सुनते ही दीपक बोला कि उसी ने घी को आश्रय दिया है अत: उसके बिना सब व्यर्थ है। इसी प्रकार लौ ने कहा कि जलती तो वो ही है अत: उसी का योगदान सर्वश्रेष्ठ है। तभी हवा का तेज झोंका आया और लौ बुझ गई। लौ के बुझने से अन्धेरा हो गया। तभी अंधेरे के कारण गलती से एक राहगीर का पैर दीपक पर पड़ा और दीपक चकनाचूर हो गया। अब इस प्रसंग को ऑफिस मैनेजमेंट से जोड़ के देखिये। यह प्रसंग कुछ मैनेजमेंट के तत्त्व समझाता है -
- सभी कर्मचारी एक दूसरे पर निर्भर हैं। कुछ लोगों पर ज़्यादा निर्भरता है तो कुछ पर कम लेकिन निर्भरता सभी पर है। यहाँ यह समझना अत्यावश्यक है कि सभी एक दूजे के सहयोग से ही संस्थान को चलाते हैं।
- यदि किसी भी कर्मचारी को यह अहंकार हो जाये कि संस्थान तो उसी के दम पर चल रहा है तो यह सोच गलत है। प्रत्येक कर्मचारी अपनी एक अलग पहचान रखता है। इस पहचान को सदा अन्यों के समक्ष रेखांकित करना कदापि न भूलें।
- पहचान बोध अर्थात स्वयं को उपयोगी मानने का भाव तो उत्कृष्ट है लेकिन अहंकार के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये।
- हम सभी समाज में आपस में जुड़े हुए हैं। हम ये नहीं कह सकते कि कौन बड़ा है और कौन छोटा। प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपना स्था रखता है। कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता। यह समझना ही वास्तव में व्यक्त्तित्व का विकास है। यह कदापि न सोचें कि दूसरा व्यक्ति आपके कारण जी रहा है या उसका वजूद आपसे है। आपको सदा यह सोचना चाहिए कि अन्यों के कारण ही आपका वजूद है। एकाकी एप्रोच के स्थान पर टीम एप्रोच का होना ही प्रशासन में सफलता दिलाता है। यही मैनेजमेंट का उसूल है।

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