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जीवन और चुनौती

जापान के लोग ताज़ी मछली खाने के शौक़ीन हैं। जब मछुआरे कई किलोमीटर दूर से मछली पकड़कर लाते और उसके बाद उसे बेचते तो ग्राहकों को वे मछलियाँ ताज़ी नहीं लगती थीं। इस समस्या के समाधान हेतु मछुआरों ने नौकाओं में फ्रीज़ रखने शुरू किये। अब वे मछली पकड़कर उसे डीप फ्रीजऱ में रखते ताकि मछलियाँ ताज़ी रहें। ग्राहक अब भी संतुष्ट नहीं थे। उन्हें फ्रोजऩ मछली का स्वाद ताज़ी मछली जैसा नहीं लगा। अब इस समस्या से निराकरण हेतु मछुआरों ने पानी का बड़ा टैंक नौका में रखना शुरू किया ताकि मछलियां पानी में ही रहें। ऐसा करने के बाद भी मछलियां एक सीमित टैंक में होने के कारण ऊर्जाहीन और आलसी हो जाती थीं और उनका स्वाद भी ग्राहकों को जम नहीं रहा था। अब इस समस्या को सुलझाने के लिये जापानियों ने राउन हबर्ड के सिद्धांत का पालन किया। हबर्ड के सिद्धांत के अनुसार चुनौतीपूर्ण वातावरण में ही व्यक्ति श्रेष्ठ और ऊर्जावान बन सकता है। इस सिद्धांत को क्रियान्वित करते हुए अब मछुआरों ने नौका में रखें पानी के टैंक में एक छोटी शार्क भी डाल दी। वह शार्क कुछ मछलियों को तो खा जाती लेकिन मछलियाँ चुनौती के कारण अपने आप को सक्रिय रखती थी। अब ग्राहकों ने कहा कि मछलियाँ ताज़ा है। कथा का सन्देश जीवन निर्माण का सन्देश है।
चुनौतियों से बचने के बजाय उन्हें स्वीकारें और उनसे लड़ें। यह जीवन का खेल है। यहाँ संघर्ष का होना स्वाभाविक है। उससे डरने के बजाय उसका आनंद लीजिये। यदि चुनौतियां बहुत बड़ी हैं तो भी पराजय स्वीकार न करें। पराजय की स्वीकारोक्ति ही पराजय की जन्मदात्री है।
जब आप किसी कार्य को करने में फेल हो जाते हैं तो पराजय स्वीकार करने के बजाय स्वयं का पुनर्गठन करें। अच्छा प्लान बनायें। ज्ञान बढायें। क्रिएटिव समाधान की बात सोचें। यही प्रगति का मार्ग है।
शार्क के साथ किया गया संघर्ष ही मछलियों को चुस्त रखता है। यदि जीवन में ऊर्जा चाहिये तो चुनातियों और संघर्षों का होना आवश्यक है।
आप जितने ज़्यादा बुद्धिमान, कौशल संपन्न और कर्मठ होते हैं; आप समस्याओं का सामना करने में उतना ही ज़्यादा आनंद महसूस करते हैं। इन्हीं चुनौतियों का सामना कर आप एक श्रेष्ठ मानव बन सकते हैं।
यहाँ मन्त्र यही है कि संघर्ष है तो जीवन्तता है। संघर्ष स्वीकारें। एक लक्ष्य प्राप्त हो जाने के बाद उससे बड़े लक्ष्य की प्राप्ति में जुट जायें। नया सोचें। आउट ऑफ़ द बॉक्स सोचें। यही जीवन का शाश्वत सत्य है।

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एक अक्षर भी बन जाता है कई बार विकराल

शब्द का निर्माण अक्षरों के जोड़ का परिणाम है। यह जोड़ 'कहीं की ईंट कहीं का रोड़ाÓ जैसे मुहावरे से बहुत दूर पूर्णतया शास्त्रीय होते हैं बल्कि भाषा विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो वैज्ञानिक भी। शब्दों से वाक्य बनते हैं, जिनका भी अपना विधान है। किसी भी वाक्य की गुणवत्ता की बेहतर लेखन की कसौटी है। हम सामान्य बातचीत में शब्द की सत्ता की बात करते हैं, लेकिन कभी इस सत्ता को शक्तिशाली बनाने वाले शब्दों में नहीं उतरते। अगर इस दृष्टि से देखने की कोशिश करें तो हर अक्षर अपने आप में एक शब्द जितनी सामथ्र्य रखता है और जब इस शब्द में किसी मात्रा का लगा दिया जाता है वह सूक्ष्म-स्तर पर एक वाक्य जितना व्यापक होता है। एक शब्द क पर छोटी ई और बड़ी ई की मात्रा लगाने भर से वाक्य में बड़ा परिवर्तन हो जाता है। कई बार तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। इसी वजह से सृजन करने वालों से वर्तनी, भाषा और व्याकरण के ज्ञान की अपेक्षा की जाती है। इन सभी का ज्ञान होने के बावजूद सोच-समझकर जो किसी अक्षर या शब्द को अपने रचना-संसार में इस्तेमाल करता है, उसी का शब्द कालांतर में शब्दकोश में समाहित किया जाता है। शब्दकोश निर्माण की यही प्रक्रिया प्रकारांतर से समाज में शब्द को स्वीकारने की है। समाज भी इसी तरह शब्द को स्वीकार करता है और इसी तरह से समाज से कई शब्द गुम भी हो जाते हैं। बहुत सारी आंचलिक भाषाएं इसी प्रक्रिया में गुम हो चुकी है। लिपियों के भी यही हाल है। नई भाषा बनने की भी यही प्रक्रिया है। सोशल मीडिया के इस दौर में हिंग्लिश इसी का रूप है। नहीं चाहते हुए भी हमारे आम जीवन में शॉर्ट-फार्म इस कदर प्रचलित हो चुकी है कि भले ही कुछ लोग इसे स्वीकारें नहीं, लेकिन अधिसंख्य समाज द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के कारण इसका ज्ञान बहुत जरूरी हो गया है। अगर इनका ज्ञान नहीं हुआ तो हमारी समझ पर भी सवालिया निशान लग चुका है। सिर्फ शॉर्ट-फार्म ही नहीं इमोजी भी ऐसे-ऐसे रच दिए गए हैं, जिससे मन के भावों को अभिव्यक्त किया जा सके। लोग धड़ाधड़ इनका उपयोग कर रहे हैं, जो नहीं समझ पा रहे हैं-उनके पिछडऩे की आशंका जताई जा रही है। 

देखा जाए तो इसमें नया कुछ भी नहीं है। चित्रलिपियां प्राचीन समय में भी प्रचलित रही है। कूट-भाषाओं का अपना महत्व रहा है। राजकाज की भाषा और लोकभाषा हमेशा अलग-अलग रही है। इन दोनों को जो ज्ञान रखता वही विद्वान माना जाता। यही अपेक्षा आज भी है। मूल बात यह है कि परिवर्तन भले ही स्वीकार नहीं करें, लेकिन परिवर्तनों पर नजर तो रखनी ही पड़ेगी। परिवर्तन स्वीकार नहीं करने का साहस भी तब ही आएगा, जब पूर्व की गुणवत्ता और उसकी सम-सामयिकता को स्थापित करने के लिए तथ्य और तर्क होंगे। तर्क और तथ्य की जानकारी के लिए अक्षरों को जानना होगा, उनकी ध्वनि को पहचानना पड़ेगा। अक्षरों से बने हुए शब्दों को समझना होगा। समझने के लिए जहां दो अक्षरों के मेल के सवाल से निकलना होगा तो इस मेल से बनी हुई चित्रात्मकता को भी उकेरना होगा। इतने भर से ही बहुत सारे शब्दों का अर्थ सामने आ जाएगा। अगर सही-सही तरीके से हमें अपनी भाषा, वर्तनी और व्याकरण का ज्ञान है तो यह ज्यादा मुश्किल काम नहीं है, लेकिन नहीं होने की स्थिति में शब्द तो क्या एक अक्षर का विकराल बन सकता है। इस चुनौती को स्वीकार करने वाला ही कालांतर में अच्छा रचनाकार बन सकता है।
एक बेहतर रचनाकार शब्द की सत्ता को समझता है और उसके अर्थ में से अर्थ निकालने के प्रयास में सदा लगा रहता है। उसे पता होता है कि अपनी बात को कहने में शब्द ही उसके शस्त्र है, जिसका जितना निपुणता से उपयोग करेगा, वांछित परिणाम को प्राप्त करेगा। अगर किसी रचनाकार को अक्षर और शब्द के मेल से निकलने वाली ध्वनि और दृश्यात्मकता का एहसास होना शुरू हो जाए तो फिर अर्थ स्वत: ही प्रकट हो जाता है। किसी भी शब्द से उसका अर्थ लेने की यही एक प्रक्रिया है, क्योंकि इसी प्रक्रिया से शब्द बनते हैं।
शब्द को समझे बगैर किया गया कोई भी प्रयोग रचना को न सिर्फ संदिग्ध बनाता है बल्कि रचनाकार को भी कठघरे में खड़ा करता है, क्योंकि सृजन का उद्देश्य समाज को दिशा देना होता है और गलत शब्द का उपयोग समाज को भ्रमित कर सकता है। रचनाकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने शब्द या वाक्य से निकलने वाले तमाम तरह के अर्थों से भिज्ञ हो। उसे पता होना चाहिए कि उसके द्वारा लिखे गए वाक्य की उस भाषा में कितनी-कितनी व्यंजना हो सकती है। अगर वह अपने लिखे हुए वाक्य की व्यंजना से अनभिज्ञ है तो यह रचना का बड़ा दोष हो सकती है। यह तब ही संभव है कि रचनाकार को अपने शब्द की शक्ति का ज्ञान हो।
इस संदर्भ में जब हम हिंदी की बात करते हैं तो इसका सबसे बड़ा सुख यह है कि यह जैसे बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है। यही वजह है कि इसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी मान्यता मिली हुई है। अब किसी का उच्चारण दोष हो तो संभव है कि लिखते समय भी दोष सामने आए, लेकिन अगर कोई शुद्ध हिंदी बोलना जानता है तो उसे लिखने में दिक्कत नहीं आएगी। फिर हिंदी ही क्यों, किसी भी भाषा की बात करें, पहला काम तो बोलना ही है। अगर इस मोर्चे पर ही कोई असफल है तो फिर वह लेखन के स्तर पर तो फिसड्डी रहना ही है। जरूरत इस बात की है कि निरंतर रियाज करते रहें।

नौ कृतियों का लोकार्पण

बीता रविवार पुस्तकों के लोकार्पण की दृष्टि से ऐतिहासिक रहा। एक ही दिन में नौ किताबों का लोकार्पण हुआ। धरणीधर रंगमंच पर मधु आचार्य 'आशावादीÓ का व्यंग्य कथा संग्रह 'साहित्य की सीआरपीसीÓ, प्रितपाल कौर द्वारा संपादित कहानी संग्रह 'परिवेश के स्वरÓ और डॉ.ब्रजरतन जोशी द्वारा संपादित कहानी संग्रह 'हिंदी कहानी : नया स्वरÓ का लोकार्पण हुआ। संस्कार सदन में नारायण सिंह गाडण जन्म शताब्दी समारोह में कवि केसादास गाडण की 'नीसाणी विवेकवारÓ, गिरधारीदान रतनू की दो कृतियां 'चारण चंद्रिकाÓ और ढलगी रातां, बहगी बातां-2, सुरेश सोनी की 'तोगा री तरवारÓ, मनोज गाडण की कृति 'मणिधर माणमरदनÓ और चारण समाज निर्देशिक का लोकार्पण हुआ।

महिला रचनाकारों का संवाद
अपने कहानी संकलन के लोकार्पण समारोह में बीकानेर आईं प्रख्यात लेखिका प्रितपाल कौर के साथ महिला रचनाकारों का संवाद भी काफी उपलब्धिपरक माना गया। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि दो घंटे के इस संवाद के कार्यक्रम में एक भी पुरुष शामिल नहीं हुआ। सिर्फ महिला रचनाकारों ने समसामयिक लेखन, स्त्रियों के लिए वर्जनाएं, सवाल और परिस्थितियों पर बात की। इस संवाद से यह भी उभर कर आया कि महिला रचनाकारों को समय-समय पर इस तरह मिलते रहना चाहिए।

महिला रचनाकारों का संवाद

अपने कहानी संकलन के लोकार्पण समारोह में बीकानेर आई लेखिका प्रितपाल कौर के साथ महिला रचनाकारों का संवाद भी काफी उपलब्धिपरक माना गया। इस कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि दो घंटे के इस संवाद के कार्यक्रम में एक भी पुरुष शामिल नहीं हुआ। सिर्फ महिला रचनाकारों ने समसामयिक लेखन, स्त्रियों के लिए वर्जनाएं, सवाल और परिस्थितियों पर बात की। इस संवाद से यह भी उभर कर आया कि महिला रचनाकारों को समय-समय पर इस तरह मिलते रहना चाहिए।

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माता-पिता और प्रेम

एक व्यक्ति जल्दबाजी में डॉक्टर के पास चेकअप करवाने पहुंचा। डॉक्टर ने उससे अत्यधिक जल्दबाजी का कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि उसे अपनी माँ के साथ नाश्ता करने जाना है और यह अत्यावश्यक है। डॉक्टर ने उससे कहा कि यदि एक दिन साथ नाश्ता न करे तो क्या फर्क पड़ जायेगा? व्यक्ति ने बताया कि उसकी माँ पांच साल से अस्पताल में भर्ती है और वो रोज़ सुबह दफ्तर जाने से पहले उसके साथ नाश्ता करता है। डॉक्टर ने उसकी माँ की बीमारी पूछी तो व्यक्ति ने कहा कि उसकी माँ अल्जीमर्स रोग से पीडि़त है। अल्जीमर्स रोग यानि भूलने की बीमारी। उसने कहा कि उसकी माँ उसे पिछले पांच साल से पहचान नहीं पाई है। डॉक्टर ने विस्मित होकर कहा कि जब माँ उसे पहचान ही नहीं पा रही है तो साथ नाश्ता नहीं हुआ तो क्या फर्क पडेगा? व्यक्ति ने कहा कि उसकी माँ भले ही उसे न पहचाने लेकिन वो तो अपनी माँ को पहचानता है। इतना काफी है। 

कथा के इस पात्र का माता के प्रति प्रेम वन्दनीय है। शुद्ध प्रेम की परिभाषा है - सम्पूर्ण समर्पण और त्याग। हमारा समर्पण कितना है? जिन माता - पिता ने हमें आज की स्थिति के लायक बनाया, आज हम उन्हें बदले में क्या ऑफर कर रहें हैं? क्या हमने कभी अपने आप से यह प्रश्न पूछा? जिसके कारण व्यक्ति इस धरती पर आया और उसी की सेवा न की तो जीवन का क्या मोल? यदि जीवन के प्रथम विश्वविद्यालय जहाँ से जीवन की सीख मिली, उसी को गुरु दक्षिणा नहीं दी तो जीवन का क्या मोल? जीवन का प्रथम विश्वविद्यालय माँ ही है।
भारतीय शास्त्र तो माता - पिता की सेवा को स्वर्गीय सुख मानता है। श्री गणेश जी की प्रचलित कथा के अनुसार श्री गणेश जी ने सिर्फ अपने माता - पिता की प्रदक्षिणा को ही संसार की प्रदक्षिणा कहा था और समझाया था कि माता - पिता ही संसार हैं। इससे हमें यह सीख भी मिलती है कि जिसने अपने माता - पिता की सेवा की, उन्हें समय दिया और उनका कहा माना - वे सभी सर्वोत्कृष्ट हैं। यहाँ मन्त्र यही है कि धन, यश, वैभव, कीर्ति, संसाधन तो जुटाए जा सकते हैं या समाप्त होने पर पुन: प्राप्त हो सकते हैं लेकिन माता - पिता का साथ जीवन में एक बार ही मिलता है। यदि हमारे किसी कृत्य से इन्हें दु:ख पहुंचता हो तो यह दुखद है। यही शाश्वत सत्य है।

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'सोचो मत, करो'

तीन दोस्तों को यात्रा पर निकलना था. उन्हें अपने साथ एक ऐसे कर्मचारी को भी रखना था जो उन्हें सही मार्ग बताता जाये और उनके भोजन आदि का प्रबंध कर सके. योग्य कर्मचारी के चुनाव हेतु उन्होंने एक परीक्षा ली. तीनों दोस्तों ने दो कार्मिकों को बुलाया और कहा कि तीन किलोमीटर बाद यह सड़क दो भागों में विभक्त हो जायेगी. एक रास्ता सही है और दूसरा गलत. जो सही रास्ते पर जायेगा उसी का चयन होगा. दोनों ने यात्रा शुरू की. पहला कार्मिक बाएं हाथ वाले रास्ते पर निकल पड़ा लेकिन दूसरा कार्मिक वहीं रुक गया और विश्लेषण करने लगा कि कौनसा रास्ता सही हो सकता है? दो घंटे बाद पहला कार्मिक वापिस लौटकर आया और कहने लगा कि उसके द्वारा चयन किया गया रास्ता गलत था. दूसरे कार्मिक को लगा कि उसका चयन पक्का है लेकिन तीनों दोस्तों ने पहले कार्मिक का चयन किया. दोस्तों ने कहा कि पहला कार्मिक इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वो कुछ करता है, सिर्फ विश्लेषण करने का काम नहीं करता. याद रहे, विश्लेषण से ज्यादा जरूरी है - क्रियान्विति.
कहीं ऐसा न हो जाये कि सही रास्ते के चयन करने की प्रक्रिया में हम इतना ज्यादा समय नष्ट कर देवें कि उस रास्ते पर जाने का महत्व ही समाप्त हो जाये. वर्तमान विद्यार्थियों में यह समस्या आम हो चुकी है. वे सदा यही कहते रहते हैं कि उन्हें इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि उन्हें किस क्षेत्र में करियर बनाना चाहिये? समस्या मात्र यही नहीं है. वास्तविक समस्या है मेहनत करने में जोर आना. उनसे श्रम नहीं हो रहा. सभी कोर्से? आपकी रूचि के हों, यह तो आवश्यक नहीं हैं. भोजन की थाली में क्या आपको सभी व्यंजन सामान रूप से पसंद होते हैं? उसी प्रकार प्रत्येक विषय में कुछ रुचिकर और कुछ तथाकथित अरुचिकर विषय होते हैं. समझ नहीं आता, गाइडेंस नहीं है, इंटरेस्ट नहीं है जैसे मूर्खतापूर्ण जुमलों से बाहर आइये और श्रम कीजिये. यही सत्य है.
जीवन में भी कभी न कभी ऐसा अवसर आता है जहाँ हम निर्णय नहीं कर पाते कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत? ऐसे में हम सोच-विचार करने में अपना काफी समय बर्बाद कर देते हैं. जबकि, जरुरत इस बात की है कि चीजों को अत्यधिक विश्लेषण करने की बजाय अपने विकल्पों पर विचार करके उनपर क्रियान्विति करना प्रारम्भ करें. यहां मन्त्र यही है कि बैठकर सोचते रहने से, विश्लेषण करते रहने से और अपनी कमजोरी को 'इंटरेस्ट नहीं हैÓ की ढाल से ढकने से आपका जीवन बर्बाद हो सकता है. क्रियान्विति ही जीवन में सफलता पाने का महामंत्र है.

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उसूल सर्वोपरि

जब भी बात आपके उसूलों, सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों पर आन पड़े, तो समझौता श्रेयस्कर नहीं होता। वे व्यक्ति सर्वोत्कृष्ट हैं जो सिद्धांत विहीन कार्य करके धनार्जन करने के बजाय उस कार्य को त्याग देने का दम रखते हैं। ये दम आपके पास है क्या? यही मूल प्रश्न है। आपकी सफलता आपके विश्वसनीय व्यवहार से जुड़ी होती है। जिस कार्य को करने से आपकी विश्वसनीयता और मूल्यों पर आंच आये, उसे कदापि न करें। 

आप और हम उन्हीं का नाम श्रद्धा और गर्व से लेते हैं जिन्होंने अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया। जऱा सोचिये
• अतिथि सेवी राजा रंतिदेव का उसूल अतिथि सत्कार था। उन्होंने अतिथियों के श्वानों को भी अपना भोजन दान किया। आज वे अतिथि सेवी के रूप में अमर हैं।
• महात्मा गांधी ने चौरी चौरा काण्ड की हिंसा के तुरंत बाद अपना आन्दोलन वापिस वे लिया। वे चाहते तो ऐसा न भी करते। कुछेक इतिहासविद इसे गलती भी मानते हैं लेकिन हिंसा उनके मूल्यों के खिलाफ थी। उन्होंने ऐसा करके अहिंसा का बड़ा सन्देश देते हुए समझाया कि उन्हें हिंसा के दम पर प्राप्त स्वतन्त्रता नहीं चाहिये।
• वीर विनायक दामोदर सावरकर ने अंडमान जेल में ब्रिटिश सत्ता के भीषणतम अत्याचार सहे लेकिन स्वतंत्रता के लक्ष्य की प्राप्ति के मूल्य से समझौता नहीं किया।
• सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के आगे पुत्र का शव पड़ा होने के बावजूद उन्होंने अपने कर्त्तव्य पथ को सबसे बड़ा माना और कर्त्तव्यपरायणता की मिसाल बने।
क्या आप जानते हैं कि सिद्धांतों से समझौता और सकारात्मक सोच की कमी; संगठन में इन दो कारणों से सर्वाधिक कर्मचारी बर्खास्त होते हैं। यह निष्कर्ष एक विदेशी प्रबंध विश्वविद्यालय का है। श्रेष्ठ नैतिक आचरण और सिद्धांतों के लिये सर्वस्व न्योछावर कर देने की शक्ति ही मनुष्य की सफलता का आधार तत्व है। यहाँ मन्त्र यही है कि नैतिकता और जिम्मेदारी महानता की कीमत है। अपने मूल्यों से समझौता करके जीना वास्तव में श्वास लेने वाला शव बन जाने जैसा है।
उसूलों पर गर आंच आये,
टकराना ज़रूरी है।
जि़ंदा हो तो फिर,
जि़ंदा नजर आना ज़रूरी है।

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'मूर्खतापूर्ण संघर्ष'

एक नदी के तट पर पीपल का पेड़ था. एक दिन पीपल के पेड़ से दो पत्ते नदी में गिरे. एक पत्ता सीधा गिरा और दूसरा पत्ता उलटा गिरा. जो पत्ता सीधा गिरा वो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा था. सीधा पत्ता कहता कि नदी कईयों की प्यास बुझाती है अत: इस श्रेष्ठ कार्य में वो नदी का साथ देगा और नदी को उसके लक्ष्य अर्थात समुद्र तक पहुंचा कर ही दम लेगा. उलटा गिरा पत्ता अड़ गया कि वो नदी की धारा को रोककर ही दम लेगा. वो बिना वजह नदी से संघर्ष करता रहा और कई बार नष्ट होते-होते बचा. अन्ततोगत्वा वो पत्ता कटकर, जगह जगह से फटकार सागर में जा मिला. वो अपने जीवन के एक भी पल का आनंद न ले सका. 

दोनों पत्ते यहां पर मनुष्यों का रूप हैं. उलटा गिरा पत्ता विपरीत बुद्धि का और सीधा गिरा पत्ता सुबुद्धि का प्रतीक है. जिस प्रकार दोनों पत्तों को नदी के साथ सागर तक जाना है , उसी प्रकार मनुष्यों को भी एक दिन परमात्मा रूपी सागर में मिल जाना है.
1. उलटा गिरा पत्ता कुबुद्धि का संकेत है. व्यर्थ में संघर्ष करते रहने का संकेत है. जरा सोचिये कि बिना बात ही, अकारण संघर्ष करना आपका व्यवहार तो नहीं बन गया है? आप पायेंगे कि ऐसे कई व्यक्ति हैं जो बहुत बड़े 'शिकायातचंदÓ हैं. उन्हें हर बात से, हर कृत्य से शिकायत है. वे भली - भांति जानते हैं कि नदी के बहाव को रोकना अर्थात इस श्रेष्ठ कार्य को रोकना असंभव है लेकिन फिर भी अच्छे कार्य को रोकते हैं. नदी का बहना एक श्रेष्ठ कार्य है. उसे बिना वजह रोकने का भाव रखेंगे तो जीवन का आनंद नहीं ले सकेंगे. कई बार विरोधी या बागी होते-होते, बगावत करना और बिना वजह अन्यों के रास्ते में रोड़े अटकाना मनुष्य का स्वभाव बन जाता है. इससे बचिये.
2. सीधा गिरा पत्ता श्रेष्ठ कार्यों का विरोध नहीं करता. उसमे बिना बात का अहंकार नहीं है. वह लहरों के साथ बहता है. जीवन का आनंद लेता है. यही तो सुबुद्धि है. बुरे का प्रतिकार और श्रेष्ठता से प्यार-यही तो जीवन है. यह परमात्मा तक पहुंचने का श्रेष्ठ मार्ग है.
जरा सोचिये कि आप कौनसे पत्ते हैं? यहाँ मन्त्र यही है कि उलटे पत्ते की तरह वृथा अहंकार, लोभ, विरोध करने की प्रवृत्ति को त्यागिये वरना आपका समूचा जीवन एक युद्ध बन जाएगा और अंत में आप पायेंगे कि जीवन तो व्यर्थ के संघर्षों में ही नष्ट कर दिया. यह जीवन का सबसे बड़ा सच है.

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'अहंकार यानि नाश'

एक महान संत और उनके शिष्य किसी गांव में पहुंचे। संध्या काल था। संत और उनके शिष्य अत्यंत थके हुए और भूखे थे। किसी व्यापारी ने सुना कि गांव में संत आये हैं। उसने तुरंत ही भोजन, जल, निवास आदि की व्यवस्था की और संत से जाकर कहा कि समस्त संत और महात्माओं के लिये आवास और भोजन की व्यवस्था की गई है। व्यापारी बोला कि ऐसे सिद्ध संतों के आने से गाँव धन्य हो गया। व्यापारी वापिस चला गया। संत ने अपने सभी शिष्यों से कहा कि उन्हें आज भी भूखा सोना पडेगा। शिष्यों ने इसका कारण पूछा तो संत ने कहा कि 'यह भोजन तो सिद्धस्थ संतों और महात्माओं के लिये है। मैं तो अभी कुछ भी नहीं हूँ। संत तो वो है जिसने सभी इच्छाओं का अंत कर दिया हो। मैं तो अभी तक पूरा मनुष्य भी नहीं हूंÓ। यह कहकर संत सो गये। कथा समझाती है कि जो कुछ भी नहीं है वही सब कुछ है। कथा अहंकार को समाप्त करने और सदा अन्यों के प्रति कृतज्ञ भाव रखने का सन्देश देती है। कथा से निम्नलिखित मूल मन्त्र सीखे जा सकते हैं-

* मैं कुछ नहीं हूं। सब कुछ समाज का है। जो सीखा, जो पाया, जो भी हासिल किया, सब समाज से ही प्राप्त किया। मेरा क्या है? शायद कुछ भी नहीं। नाम, धन, रूतबा , शोहरत - सब समाज से यानि दूसरों से मिली अत: मैं तो कुछ हूं ही नहीं। जिसने यह स्वीकार कर लिया, वह उसी क्षण महानता की ओर चल पड़ा और ईश्वर से जुड़ गया।
* 'मैं हूं और मैं तो बहुत कुछ हूंÓ। जिसमे यह अहं आ गया, वो ईश्वर से, समाज से, और यहां तक कि अपने निकट जनों से भी कट जायेगा। यह मन का अहंकार है। यही मृत्यु का मार्ग है। यह कष्ट का, समस्या का, द्वेष का सबसे बड़ा जनक है।
जरा सोचिये कि क्या आप दिखावे में विश्वास करते हैं? आपके लिये क्या महत्त्वपूर्ण है - स्वयं का अहंकार या प्रेमपूर्ण सम्बन्ध? यदि स्वयं का अहंकार ही आपके लिये सर्वोपरि है तो यकीन मानिये कि आपने निचले स्तर की ओर यात्रा करना प्रारम्भ कर दिया है। बाली , रावण, दुर्योधन, यहां तक कि भीम और अर्जुन भी अहंकार करने के बाद शर्मसार हुए हैं तो आपकी और हमारी क्या बिसात? यहां मन्त्र यही है कि अहंकार आपको ईश्वरत्व से, श्रेष्ठता से, प्रेम से और शान्ति से दूर ले जाकर आपके ही भीतर एक युद्ध छेड़ देता है और आपके अंतर्मन के सदगुणों को परास्त कर देता है। अहंकार को पराजित कीजिये। यही जीवन को जीने का श्रेष्ठ तरीका है।

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लालन पालन के सूत्र

डॉ स्पेंसर जॉनसन की पुस्तक 'द वन मिनिट फादर' के अनुसार यदि आपने अपने बच्चे में आत्मानुशासन और आत्मसम्मान का भाव जागृत कर दिया, तो यकीन मानिये कि आपने पिता होने का दायित्व भी निभा दिया। आत्मानुशासन की पहली शर्त है माता-पिता का स्वयं अनुशासित होना। बच्चे आपसे सीखते हैं. आप उनके रोल मॉडल हैं। जऱा सोचिये कि:

• क्या आपका जीवन अनुशासित है?
• आपकी उम्मीद है कि बच्चा नित्य स्वाध्याय करे. क्या आप रोजाना नियम से अध्ययन करते हैं?
• आप चाहते हैं कि बच्चा सभी का सम्मान करे. क्या आपके कम्युनिकेशन में अन्यों के लिये सम्मान का भाव है?
बच्चे आपको बहुत कुछ सिखा सकते हैं. उन्हें थोड़ी लिबर्टी या स्वतंत्रता देकर देखिये. वे इतने अपडेटेड हैं कि कई बार आप उनके आगे स्वयं को ज्ञान विहीन महसूस करने लगेंगे। बच्चों का तकनीकी ज्ञान , वार्ता कौशल और सामान्य जानकारी का स्तर बहुत बेहतरीन है अत: उनसे कुछ सीखने में गुरेज़ न करें।
बच्चे बड़े ही इम्पल्सिव होते हैं। उन्हें अपनी भावनाओं को दबाना नहीं आता। एक पल में उन्हें एक खिलौना चाहिये और दूसरे ही पल वे उस खिलौने को छोड़ भी सकते हैं। ऐसी अवस्था में हमें उनके साथ प्रेमपूर्वक नेगोसिएशन करना चाहिये. इसे इस कथा से समझें:
• एक बच्चा भोजन नहीं कर रहा था और कोल्ड ड्रिंक की जिद किये जा रहा था। बच्चा चाहता था कि पहले कोल्ड ड्रिंक पिलाई जाये तभी वो भोजन करेगा। माँ को लग रहा था कि कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद बच्चा भोजन नहीं करेगा। माँ के कई बार समझाने पर भी जब बच्चा नहीं माना तो माँ ने एक तरकीब लगाई। माँ ने कहा कि भोजन और कोल्ड ड्रिंक साथ-साथ ली जायेगी यानि एक कौर भोजन का और एक घूँट कोल्ड ड्रिंक का। बच्चा मान गया. इसे कहते हैं सकारात्मक नेगोसिएशन। जऱा सोचिये कि आप सकारात्मक नेगोसिएशन करते हैं या अपनी चौधराहट जताकर बच्चे से वही करवाते हैं जो आप चाहते हैं? यहाँ मन्त्र यही है कि आप बच्चों में ऊर्जा प्रवाहित करके उन्हें सपनों को साकार करने के लिये प्रेरित करें. उनमे राष्ट्रभक्ति, स्त्री सम्मान, भोजन, जल और बिजली संरक्षण के लिये प्रारम्भिक काल से ही तैयार करें। बच्चों के समक्ष हम यह रट लगाए रहते हैं कि 'यह नहीं करना हैÓ। इसके स्थान पर यदि हम उन्हें यह सिखाएं कि 'यह करना हैÓ तो शायद और भी श्रेष्ठ परिणाम आयेंगे. यही लालन पालन का सिद्ध सूत्र है।

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'नकारात्मकता के बादशाह'

रोवणखारा अर्थात नकारात्मकता का वो बादशाह जो प्रति पल नकारात्मक सन्देश देता हुआ रोनी सूरत बनाए बैठा रहता है। यह व्यक्ति वह होता है जो हर बेहतर से बेहतर बात का भी नेगेटिव पोस्टमार्टम कर देता है। पत्नी के जन्मदिन पर जब पत्नी नींद से जागी तो देखा एक दिव्य माहौल है। चारों ओर सजावट है और गुब्बारे लगे हैं। वो बहुत खुश हुई। ज्यों ही बाहर गयी तो खुशी के आंसू छलक पड़े। बाहर उसके माता पिता आशीर्वाद देने खड़े थे। वो पति से बड़ी खुश थी। इतनी खुश कि मानो समूचा संसार कदमों में हो। परन्तु उसी समय उसकी नई साडी पर हल्दी का दाग लग गया। यहीं से दु:ख शुरू। इसके बाद पति, माता-पिता आदि ने पूरा दिन हंस खेल के बिताया परन्तु दाग के दु:ख ने उसकी सारी खुशी छीन ली। 

हमारी समस्या यही है कि हम खुशी को एक सीमा में बांध लेते हैं और छोटे से दु:ख को ओढकर, पुरानी खुशी को भूलकर, रोनी सूरत बना रोवणखारे बन जाते हैं। संगठनों में भी हम अपने अच्छे कार्यों के समाचारों से ज्यादा खुश नहीं होते अपितु छोटी सी नकारात्मक बात की चटखारे लेकर विस्तार से चर्चा करते हैं। यही रोवणखारे या नकारात्मक बादशाह बनने की पहली सीढी है।
संगठन में यदि ऐसे पांच फीसदी नकारात्मक बादशाह हों, तो संगठन स्वत: नष्ट हो जाता है। ये महान नेगेटिव दार्शनिक होते हैं। एक व्यक्ति दुकान पर चादर खरीदने पहुंचा। चादर में सुई के जितना छेद था। छेद देखकर वो तुरंत बोल पड़ा- चादर में ये इतना बड़ा गड्ढा कैसे है? यानि हर बात का नकारात्मक छिद्रान्वेषण।
ऐसे कार्मिक संगठनों के लिये कलंक हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे या नकारात्मक बादशाह सिर्फ निचले स्टाफ में होते हों। ऐसे व्यक्ति अधिकारी भी होते हैं जो हर पल संगठन के मुखिया का सहयोग किये बिना, मन में कुड़कर, उसके द्वारा किये गए कामों की आलोचना अपने जूनियर्स से करते हैं और एक दिव्य नकारात्मक माहौल बनाकर मुखिया को काम करने से रोकते हैं। ऐसे लोग संगठन में कुछ भावुक कर्मचारियों को ढूंढकर, उन्हें सब्जबाग दिखाकर मुखिया के विरुद्ध उनका इस्तेमाल करते हैं और स्वयं परदे के पीछे रहते हैं। यही रोवणखारे संगठन के कलंक होते हैं। ऐसे रोवणखारों से बचिये। यहां मन्त्र यही है कि यदि कोई आपका भोजन प्रदूषित कर दे तो क्या आप उसे खायेंगे? यदि नहीं, तो नकारात्मक बातों पर चटखारे लगाने वाले या नकारात्मक बादशाह क्यों बनते हैं? जरा सोचिये।

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'सीधा या टेढा मार्ग?'

एक राजा ने कसरत करना त्याग दिया और जमकर भोजन करना प्रारम्भ कर दिया। इस कारण उसका वजन तेजी से बढऩे लगा और उसे अनेकानेक रोगों और व्याधियों ने जकड़ लिया। मंत्रियों, रिश्तेदारों, पत्नी और परिवार के समझाने के बाद भी राजा नहीं माना और उसने कसरत करना प्रारम्भ नहीं किया। जब राजा मंत्रियों और प्रजा द्वारा दी गई सलाह से परेशान हो गया तो उसने फरमान जारी करते हुए कहा कि जो भी उसे वजन कम करने की सलाह देगा, उसे एक माह में राजा का वजन कम करवा के दिखाना होगा और यदि ऐसा न हुआ तो उस व्यक्ति का सिर कटवा दिया जाएगा। डर के कारण अब राजा को कोई भी सलाह नहीं दे पा रहा था। एक मंत्री ने एक दिन राजा के सामने एक ज्योतिषी को बुलवाया। ज्योतिषी ने कुछ मन्त्र पढ़कर कहा कि राजा की आयु सिर्फ एक माह ही बची है। अब राजा चिंता में डूब गया। एक माह तक उसे भोजन की इच्छा ही नहीं हुई। राजा डरा हुआ था। एक माह बीत गया। जब एक माह बाद भी राजा नहीं मरा तो उसने उसी ज्योतिषी को वापिस बुलाकर सभा में कहा कि उस ज्योतिषी को मृत्युदंड दिया जाये। तभी मंत्री ने कहा कि यह व्यक्ति असल में ज्योतिषी नहीं बल्कि एक वैद्य है और उस मंत्री ने राजा का वजन कम करने के लिये यह चाल चली थी। राजा ने जब आईने में देखा तो वाकई उसका वजन काफी कम हो गया था। 

* बुरी आदतें बड़ी ही मुश्किल से जाती हैं। जब तक कोई डर न हो , बुरी आदत या व्यसन हमें छोड़ता ही नहीं है। कथा से यह स्पष्ट है कि कुछ आदतें जुबान की समझाइश से नहीं अपितु छड़ी के डर के कारण छूटती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि सिर्फ सकारात्मक बातें करने, बढिय़ा तरीके से काउंसलिंग करने से ही परिणाम नहीं मिलते। कई बार काउंसलिंग के साथ - साथ व्यक्ति को भयभीत भी करना पड़ता है।
* कई बार यथेष्ट कार्य करवाने के लिये उल्टा मार्ग भी अपनाना पड़ता है। जो व्यक्ति आपके श्रेष्ठ और मृदु व्यवहार से नहीं सुधरे, उसके साथ टेढा मार्ग भी अपनाना पड़ता है।
* कॉर्पोरेट जगत में ऐसे किस्से आम होते हैं। कर्मचारियों को भयभीत करने, उनकी बुरी आदतों के कारण उन्हें निकाले जाने का भय दिखाने और कभी - कभी औचक रूप से सख्त कार्यवाही करना भी अत्यावश्यक होता है। यदि ऐसा नहीं किया तो आपको "फॉर ग्रांटेड" ले लिया जायेगा जिसका अर्थ है कि आपकी इज्जत में कमी आती जायेगी।
यहां मन्त्र यही है कि जहां तक हो सके, सीधे मार्ग पर चलें लेकिन जब सीधे मार्ग पर चलने से मंजिल नहीं मिले तो थोड़ा सा परिवर्तन करें। इसका अर्थ नैतिक मूल्यों से समझौता करना नहीं है। इसका अर्थ है कि आप दूसरे मार्ग से मंजिल की ओर जा रहे हैं।

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