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लक्ष्य संधान

* क्या आप प्रतिदिन अपनी ऊर्जा का पच्चीस प्रतिशत हिस्सा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु खर्च करते हैं।
* क्या आप प्रति पल यह हिसाब लगाते हैं कि आपके द्वारा किया गया कोई भी कार्य आपको आपके लक्ष्य के पास ले जाये।
* क्या आप अपने लक्ष्यों की सूची सदा अपने पास रखते हैं।
* क्या आप भावनात्मक रूप से अपने लक्ष्य से जुड़े हैं।
यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर ''नाÓÓ है तो यह तय है कि आप अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ कार्य में नहीं जुटे हैं। लक्ष्य संधान करने हेतु आपको सम्पूर्ण निष्ठा के साथए अंतरात्मा के साथ लक्ष्य संधान हेतु जुटना पडेगा। स्वर्ग किसी का बाहें फैलाये इंतजार नहीं करता। अपना स्वर्ग स्वयं अपनी शक्ति से बनाना होता है। लक्ष्य संधान हेतु जुटे रहना पड़ता है। यदि आप लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं तो इस सीढ़ी या पांच स्टेप्स का प्रयोग करें:
* लक्ष्य निर्धारण और लेखन : जो आप वास्तव में चाहते हों, उसे लक्ष्य मानें। उसको लिखें। बिना लिखा लक्ष्य उसी वार्तालाप की तरह होता है जिसे आप कुछ दिनों में भूल जाते हैं। बिना लिखा लक्ष्य अस्पष्ट और शक्तिहीन होता है। लिखित लक्ष्य को पडऩा संभव है और वह प्रेरित भी करता है।
* लक्ष्य प्राप्ति डेडलाइन बनाना : डेडलाइन का दबाव कार्य की गति को आश्चर्यजनक रूप से बड़ा देता है। अत: प्रत्येक कार्य के सामने यह लिखना न भूलें कि इसे कब तक संपन्न करना है। यही तिथि डेडलाइन है।
* कार्य के छोटे टुकड़े करें : डेडलाइन बनाने के बाद कार्य को अत्यंत ही छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट लेवें। यह स्विस चीज टेक्नीक है। इसमें प्रत्येक बड़े कार्य को छोटे टुकड़ों में बांट दिया जाता है। ऐसा करने से वो बड़ा काम आसान लगने लगता है।
* लक्ष्य प्राप्ति हेतु या कार्य संपन्न करने हेतु आपको जिन-जिन संसाधनों की जरुरत होगी उसकी सूची भी तैयार कर लेवें। ''एवरीथिंग शुड बी एट रीचÓÓ का सिद्धांत अपनाएँ।
* लक्ष्यों को प्राथमिकता के आधार पर जमायें और तुरंत क्रियान्विति प्रारम्भ करें।
यहां मन्त्र यही है कि 365 दिन लक्ष्य संधान हेतु कुछ न कुछ करते रहने से आप एक लय में आ जाते हैं। यह लय आपको आंतरिक रूप से प्रेरित करती है। इसी सकारात्मक ऊर्जा व प्रेरणा से आप लक्ष्य का संधान कर लेते हैं। यही लक्ष्य संधान का मन्त्र है।

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'नियाग्रा सिन्ड्रोम'

क्या आप वास्तव में जीवन जी रहे हैं या जीवन जीने की तैयारी में लगे हैं? अधिकांश व्यक्ति जीवन जीने की तैयारी करते - करते ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं? जीवन में उनके द्वारा किये गए गलत और घटिया निर्णयों के कारण वे सिर्फ जीवन जीने की तैयारी करते हैं। जीवन जीने की तैयारी का अर्थ है "नियाग्रा सिंड्रोम" के रोग से ग्रस्त होना। अब जरा सोचिये। जीवन एक नदी के समान है। अधिकांश व्यक्ति इस जीवन रूपी नदी में बिना तैयारी के कूद पड़ते हैं। उनकी कोई ठोस प्लानिंग नहीं होती। उनमे निर्णय लेने की ताकत भी नहीं होती। अब बिना तैयारी नदी में कूद पड़े हैं तो उन्हें "करंट" लगते रहते हैं। ये सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक या कोई भी अन्य "करंट" या समस्याएं हो सकती हैं। वे इससे जूझते हैं। जूझते - जूझते उन्हें पता चलता है कि जीवन रूपी नदी का कुछ समय में अंत होने वाला है। वो नदी कुछ समय बाद विश्व के सबसे बड़े जल प्रपात "नियाग्रा फाल्स" में गिर जायेगी। अब वे कुछ करने की तैयारी करते हैं लेकिन बहुत देर हो चुकी होती है। अंतत: वे "नियाग्रा सिंड्रोम" के कारण समाप्त हो जाते हैं। कहीं आप भी "नियाग्रा सिंड्रोम" से ग्रस्त तो नहीं हैं? विचार कीजिये:
* क्या आप सदा पैसे के अर्जन, वर्धन और रक्षण में लगे हैं?
* क्या आपके पेशे के अलावा आपकी कोई अन्य पहचान नहीं है?
* क्या समाजोपयोगी कार्य को आप "डेड इन्वेस्टमेंट" मानते हैं?
* क्या आपको लगता है कि जीवन के बहुमूल्य वर्ष कष्ट, क्लेश, लड़ाई, धनार्जन, पैसे के लेन –देन आदि के लिये नष्ट कर दिये?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है तो आप भी "नियाग्रा सिंड्रोम" से ग्रस्त हैं। इस सिंड्रोम से खुद को निकालिये। जीवन बहुत छोटा है। अगले पल का पता नहीं है। अत: श्रेष्ठ समाजोपयोगी कार्य करते चले जायें। ऐसे निर्णय लेवें जिनसे आपके साथ - साथ समाज और राष्ट्र का भी कल्याण हो। अपनी अलग पहचान बनाने का प्रयास करें। खेलें। अच्छा खाएं और खिलायें। महफिलें जमाते रहें ताकि मृत्यु के समय कंधा कम न पड़े। जनमानस से निस्वार्थ होकर मिलें। जो सच हो उसे बेहिचक कह देवें। व्यवहार को साफ रखें। देने का भाव रखें। याद रहे, जितना देंगे उसका दोगुना प्राप्त होगा। यही तो जीवन का सच है। आप पायेंगे कि जीवन अचानक सुखद सुगंध से भर गया है। जीवन का आनंद देने में है, प्राप्ति में नहीं। यही शाश्वत जीवन प्रबंध है।

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कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस से

सत्ता से पहले सत्ता की लड़ाई कांग्रेस में नजर आ रही है। कांग्रेस अगर यह मानकर चल रही है कि सत्ता खुद चलकर उनके पास आ रही है, तो उन्हें इस गलतफहमी को त्याग देना चाहिए। प्रदेश में भाजपा की जड़े इतनी मजबूत है कि वो किसी एक नेता के खराब प्रदर्शन के बाद भी अपनी वापसी करने में अब अक्षम नहीं है। ऐसे में कांग्रेस को आपसी मनमुटाव छोड़कर अपनी नीति और रीति को संभालना होगा।

पिछले दिनों राजनीतिक दृष्टि से कई बड़े घटनाक्रम सामने आए। संयोग है कि दोनों ही घटनाक्रम कांग्रेस के थे और आपसी फूट से जुड़े थे। यह साबित हो गया कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता देने का मानस बनाया है या नहीं बनाया है, यह भविष्य के गर्त में है लेकिन स्वयं कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि उनकी सरकार आ रही है। पार्टी में जीत का कोई सवाल नहीं है, मुद्दा तो सिर्फ मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इसका है। यही कारण है कि हाल ही में जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर आए तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री का मुद्दा खड़ा हो गया। पहले उन्होंने सीकर में जो कुछ कहा, वो खबर का हिस्सा बना और बाद में उनकी उपस्थिति में रामेश्वर डूडी जिंदाबाद के नारे चर्चा का केंद्र बने। दरअसल, कांग्रेस में इन दिनों तीन नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार है। पहले स्वयं अशोक गहलोत, दूसरे प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और तीसरे नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी। ऐसे में डूडी समर्थक पूरे जोश के साथ जिंदाबाद के नारे लगाने से नहीं चूक रहे थे। लोकतंत्र में इस तरह की स्वतंत्रता हर किसी को है लेकिन चुनाव से दस महीने पहले इसे जल्दबाजी कहा जाएगा। पार्टी को अभी अपनी जीत सुनिश्चित करनी है, जिसके लिए माहौल बनता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
दूसरा मामला था खाजूवाला का। यहां भी कांग्रेस खुद से उलझती नजर आई। एक तरफ तो कांग्रेस के देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत प्रदर्शन में जुटे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता गोविन्द मेघवाल। इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने अपनी फूट चुनाव से पहले ही स्पष्ट कर दी। देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने जिस तरह का प्रदर्शन यहां किया है, उससे साफ है कि वो व्यक्तिगत राजनीति में विश्वास रखते हैं।


पत्रबाजी का सिलसिला शुरू हुआ

कांग्रेस के अंदरुनी कलह का ही नमूना है कि पार्टी के नेता अपने ही पदाधिकारियों के खिलाफ जमकर पत्रबाजी कर रहे हैं। खासकर खाजूवाला मामले के बाद देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत को घेरने की तैयारी पूरी हो रही है। एक ही दिन में दो आयोजन से पहले भी गहलोत के खिलाफ प्रदेशाध्यक्ष को पत्र लिखा गया था और नए सिरे से फिर गहलोत की शिकायत की जा रही है। इस बार प्रदेश अध्यक्ष के साथ नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तक बात पहुंचाने का प्रयास हो रहा है कि यहां पार्टी को अपने ही पदाधिकारियों से नुकसान हो रहा है। यह बात अलग है कि गहलोत भी पूरी तैयारी करके मैदान में है।


क्रिकेट के बहाने राजनीति

क्रिकेट के बहाने राजनीति उच्च स्तर पर तो होती रही है लेकिन जिला स्तर पर ऐसा मामला पहली बार ही सामने आया है। पिछले दिनों पुष्करणा स्टेडियम पर आयोजित एक क्रिकेट प्रतियोगिता के शानदार आयोजन के बाद एक नेताजी ने मंच पर खड़े होकर जमकर भाषण दिए। अपनी जाति के लिए काफी जोश और खरोश के साथ बात रखी। अच्छी बात है। इसके साथ ही उन्हें यह भी बताना था कि वो इस मैदान के लिए क्या कर रहे हैं। दुखद बात है कि बीकानेर पश्चिम विधानसभा में एक भी ऐसा खेल मैदान नहीं है जहां खिलाड़ी पूरे विश्वास के साथ अपना समय दे सकें। पुष्करणा स्टेडियम में ुसुविधा नहीं है, एमएम ग्राऊंड में जगह नहीं है। धरणीधर मैदान में कुछ कोशिश हो रही है लेकिन इंडोर गेम वाले खिलाड़ी को मन मसोसना ही पड़ेगा।

गहलोत की राजनीति

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार साबित कर गए कि बीकानेर के बड़े राजनेताओं के बावजूद उनकी फेन फॉलोविंग यहां कम नहीं है। उन्होंने 'अपनोंÓ से जुडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ा। वो यहां अपने मित्र भवानीशंकर शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करने आए थे लेकिन आ ही गए तो कई अन्य काम भी निपटा गए। रिश्तेदार रवि गहलोत के निधन पर शोक जताया तो पुराने समय के मित्र प्रोफेसर अशोक आचार्य के घर पहुंचकर उनके पुत्र संजय आचार्य से भी मिले। इतना ही नहीं गहलोत बाद में कांग्रेस नेता और माली समाज के प्रदेशाध्यक्ष गुलाब गहलोत के घर भी पहुंचे। गुलाब अशोक गहलोत के नजदीकी रहे हैं। दरअसल, गहलोत ने जिले के बड़े कांग्रेसी नेताओं को बता दिया कि उनके क्षेत्र में भी वो वजूद रखते हैं।

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खाजूवाला में होगा राजनीतिक दंगल

विधानसभा चुनाव में असली दंगल तो पांच और छह महीने बाद देखने को मिलेगा लेकिन खेल के पासे फैंकने का काम अभी शुरू हो गया है। बीकानेर की सात विधानसभा सीटों में से इस बार जिस सीट पर चुनाव से पहले दंगल होने वाला है वो हैं खाजूवाला की सीट। इस बार सीट पर दलित नेताओं की बाढ़ आने वाली है। जितने भी दावेदार है, सभी दमदार है, मजबूत है। यहां से भाजपा के विधायक डॉ. विश्वनाथ है लेकिन इस बार उन्हें अपनी पार्टी के सांसद पुत्र से चुनाव से पहले दो-दो हाथ करने पड़ेंगे। दरअसल, यहां से सांसद अर्जुन राम मेघवाल के पुत्र रवि मेघवाल भी दावेदार है। दरअसल, रवि स्वयं खाजूवाला में काफी सक्रिय है और पिछले दिनों हॉर्डिंग्स लगाकर उन्होंने साफ कर दिया कि पिता की विरासत लेने के लिए पूरी तरह से तैयार है। वैसे डॉ. विश्वनाथ का काम भी कच्चा नहीं है। वो भी पूरी मजबूती के साथ इन दिनों अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे हुए हैं। अगर रवि मेघवाल विधानसभा में टिकट के दावेदार है तो चर्चा है कि डॉ. विश्वनाथ की पत्नी डॉ. विमला भी सांसद की उम्मीदवार है। अगर किसी भी स्थिति में प्रधानमंत्री मोदी अपने सांसदों को रिपोट्र्स के आधार पर बदलते हैं तो विमला डुकवाल का नाम सबसे आगे चल रहा है। चुनाव से पहले की यह मशक्कत सिर्फ भाजपा में ही नहीं है बल्कि कांग्रेस में भी मची हुई है। यहां गोविन्द मेघवाल ने पिछला चुनाव लड़ा था। इस बार उनका टिकट कटवाने वालों की कमी नहीं है। राजनीतिक रूप से गोविन्द के प्रतिद्वंद्वी रहे नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश की राजनीति में इन दिनों काफी आगे चल रहे रामेश्वर डूडी के खास और देहात कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने गोविन्द की अनुपस्थिति में ही आन्दोलन कर नए समीकरण पैदा कर दिए।

विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे पर कई बार बात हो गई लेकिन लगातार खाजूवाला में ही टिकट के लिए दौड़भाग हो रही है। इस आरक्षित सीट पर कांग्रेस बहुत कम अंतर से पिछला विधानसभा चुनाव हार गई थी। इस बार भी वहां कांग्रेस एक जुट नजर नहीं आ रही है। एकता के मामले में भाजपा की हालत यहां और भी ज्यादा बदतर है। भाजपा के कई धड़े वहां आमने सामने चुनाव से पहले हो गए हैं।


उपचुनाव में बीकानेर का सीधा जुड़ाव

प्रदेश में दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट पर बीकानेर की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी हुई है। कैसे? वो ऐसे कि अलवर में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में डॉ. करण सिंह यादव मैदान में है। वो बीकानेर के उदयरामसर के निवासी है और बीकानेर के काफी करीब है। इसके अलावा अजमेर में भाजपा ने जिन इक्का दुक्का लोगों को जीत की जिम्मेदारी सौंपी है, उनमें बीकानेर के पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष विजय आचार्य भी है। दोनों ही जगह अलग-अलग पार्टी से बीकानेरी कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। वैसे तीसरे विधानसभा क्षेत्र मांडलगढ़ से हमारे ही शहर के गोकुल प्रसाद पुरोहित पहले विधायक रह चुके हैं।

गुजरात का हिसाब तो दो...

गुजरात में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए। सरकार भी बन गई। इसके बाद उपमुख्यमंत्री नाराज भी हो गए, उन्हें मनचाहे विभाग भी मिल गए। कहने का मतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव की बात अब पुरानी होने वाली है लेकिन हमारे यहां से गए नेताओं ने अब तक अपना हिसाब नहीं दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेता काफी जोश खरोश के साथ गुजरात में जुटे थे। कोई राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में तो कोई जातीय आधार पर अपनी पार्टी को टिकट दिलाने के लिए। वहां से खूब फोटो भी फेसबुक पर डाले लेकिन परिणाम आने के बाद किसी ने नहीं बताया कि उनके प्रचार वाले क्षेत्र में पार्टी को जीत मिली या फिर हार। हां...यह भी संभव है कि कुछ बताने लायक होगा ही नहीं तो क्या बताएं?


युवा नेता निष्क्रिय क्यों?


पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि शहर के कई युवा नेता अचानक से निष्क्रिय हो गए हैं। आखिर क्यों? राजनीति में रहना है तो कुछ न कुछ करना होगा। शहर भाजपा में भी कई नए और युवा चेहरों को अवसर दिया गया है लेकिन उनकी सक्रियता फिलहाल नजर नहीं आई है। वेद व्यास भी ऐसे ही नेताओं में है,जिनकी लंबी चौड़ी टीम निष्क्रिय सी नजर आ रही है। इसी तरह लूणकरनसर में टिकट के दावेदार माने जा रहे डॉ. भागीरथ मूंड भी इन दिनों कम नजर आ रहे हैं। इनकी कम सक्रियता से न सिर्फ राजनीतिक मैदान सूना नजर आ रहा है बल्कि समीकरण भी बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीति में ऐसे युवाओं की जरूरत है और उन्हें अपने दम पर अपना रास्ता बनाएं। किसी नेता की बैसाखी पकड़कर आगे नहीं आना है, उन्हें।

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रचना के पीछे चलती है आलोचना

अगर कोई आलोचक किसी विधा में रचना भी करता है तो क्या वह इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसने जो रचा है, वह उस विधा का आदर्श और कालजयी स्वरूप है। समीक्षा, आलोचना, समालोचना थोड़े-बहुत अंतरों के साथ लगभग एक ही जगह पर आकर खड़े हो जाते हैं। आलोचना वस्तुत: रचना पर आश्रित विधा है। रचना के बगैर आलोचना का अस्तित्व ही नहीं। साहित्य में इस विधा की सृष्टि उन लोगों के लिए हुई जो नीर-क्षीर विवेक के साथ, तटस्थ रहते हुए शास्त्रीय आधार पर अपनी बात को रखना जानते हैं। परंपरा का ज्ञान हो, प्रयोगों की पहचान हो और जिस विधा में आलोचना करे, उसके शास्त्रीय पक्ष से जान-पहचान हों। भाषा की दक्षता के साथ-साथ वर्तनी की शुद्धता का पता हो और सबसे महत्वपूर्ण बात नवाचारों को समझने की सकारात्मक दृष्टि हो। 

इन सब के अभाव में आलोचना, समीक्षा और समालोचना के नाम पर जो भी हो रहा है, वह पत्रवाचन की सीमा से बाहर नहीं निकल पाता। आलोचना वही कर सकता है, जो निर्भय लेकिन न्यायसंगत हो। ऐसा विद्वान जिसे अपनी बात विनम्रता से कहनी आती हो, आलोचना के क्षेत्र में प्रिय हो जाता है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में भले ही कोई आलोचक स्वयं को खारा या क्रूर साबित करने की कोशिश करता रहे, उसे जन-मन में मान्यता नहीं मिलती। एक आलोचक के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह जन-मन की मान्यता को साथ लेकर अपनी बात कहे।
जैसे ही कोई आलोचक जन-मन को अल्पज्ञ या नासमझ मानकर अपनी बात के साथ हावी होने की कोशिश करता है, उसका जलवा बिखरने लगता है। यहां जन-कवि भीम पांडिया की एक बात बड़ी गहरी लेकिन समीचीन मालूम होती है। वे अपनी बात को रोचक अंदाज में ऐसे कहते थे कि रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हैं। जैसे ही कोई यह सुनता, दो प्रतिक्रियाएं होती। पहली बात में उसे लगता कि यह तुकबंदी के अलावा कुछ नहीं है, दूसरा इस बात पर मंथन होता कि एक जिम्मेदार कवि अगर यह कह रहा है तो कुछ न कुछ तो बात होगी है।
भीम पांडिया समझाते कि जो जीव है, प्राणी है उसमें कवित्व इस रूप में है कि वह बात को समझ सकता है, कहने की कला भले ही नहीं आए लेकिन कवि सम्मेलन में अंतिम-छोर पर बैठा कोई सामान्य सा श्रोता अगर किसी कवि की कविता पर वाह-वाह करता है तो यह अकारण नहीं है। इसका कारण यह है कि उसके पास समझ है, संवेदना है, अनुभूति है लेकिन अभिव्यक्ति के मामले में वह मंच पर बैठे कवि से कमजोर है। इस रूप में रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हुए।
भीम पांडिया से असहमत होने का अधिकार ठीक वैसा ही है, जैसा कोई उनसे सहमत होने में अपना अधिकार माने, लेकिन उनकी बात को खारिज नहीं किया जा सकता। समझदार होने का हक सभी को है। सहमत-असहमत होने का अधिकार सभी के पास है। ऐसे में एक आलोचक के सामने यह चुनौती होती है कि वह किस तरह सभी लोगों के ग्रहण करने के तरीके को समझते हुए अपनी बात को रखे। इसके लिए ्रएक तरफ जहां आलोचक को जन-मन की बात को समझने के लिए एक दृष्टिबोध चाहिए होता है तो दूसरी ओर, जिस विधा में वह अपनी बात कह रहा है, उसमें अब तक हुए प्रतिनिधि रचनाकारों से भी परिचित होना जरूरी होता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश वाद-विचार या सम्प्रदायों की स्थापना में आलोचकों का ही बड़ा योगदान रहा है। रचनाकार ने तो अपनी बात कह दी। उसे एक दृष्टिबोध के साथ समझते हुए उसे श्रेणियों में समझाने का काम आलोचक ने ही किया। कोई भी रचनाकार अव्वल तो किसी वाद-विचार या विमर्श के खाके खड़े करके रचना कर ही नहीं सकता। अगर वह करता भी है तो वह रचनाकार के नाते सबसे पहले खारिज होता है और राजनीति का हथियार भर बनकर रह जाता है।
फिर रचनाकार तो यह घोषणा भी कर सकता है कि उसकी कोई रचना किस वाद-विचार या विमर्श से प्रेरित है, उसे नहीं पता लेकिन आलोचक यह नहीं कह सकता कि उसे किसी रचना-विधान के मूल-सूत्रों की जानकारी नहीं है। वह किसी भी रचनाकार को इस तरह खारिज नहीं कर सकता कि फलां रचनाएं अच्छी है और फलां बेकार। यह तो सामान्य समझ वाला श्रोता भी कर सकता है। आलोचक के सामने अच्छी को अच्छी साबित करने की चुनौती होती है तो खराब को खराब साबित करने का साहस। बहुत सारे आलोचकों ने ऐसा किया भी है और उन्हें मान्यता भी मिली है, लेकिन कमी के कारण यहां भी पक्षपात होने लगा है।
अपनों को प्रतिष्ठा दिलाने और जानबूझकर आंखें बंद करके किसी और को समानांतर खड़ा करने की कोशिश की जाने लगी। यही वजह है कि आलोचना अस्वीकार होने लगी है। इससे जो प्रतिरोध का स्वर उभर रहा है, उसका हासिल यह है कि ऐसे आलोचकों को तो पूरी तरह से खारिज किया जाने लगा है जो खुद भी उसी विधा में सृजनरत हैं। वस्तुत: आलोचना का काम रचनाकारों का कभी रहा ही नहीं। आलोचना का अपना एक शास्त्र है, सिद्धांत है। रचनाकर्म से बहुत बाद की बल्कि रचना पर आश्रित विधा है आलोचना।

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डॉ. विश्वनाथ मौन क्यों है..?

अनुराग हर्ष। एक बार फिर प्रदेश के सभी चिकित्सक हड़ताल पर है। हड़ताल भी ऐसी है कि चिकित्सक और सरकार जैसे आपस में युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसे में बीकानेर के एक डॉक्टर साब की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन वो खुद ही ज्यादा रुचि नहीं ले रहे या सरकार उनका उपयोग नहीं कर रही। खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक और संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल सरकार के प्रतिनिधि है। पिछले दिनों हड़ताल से हालात ज्यादा बिगड़े तो डॉक्टरों से मेल मुलाकात कर मामले को निपटाने के बजाय स्वयं ही अस्पताल में जाकर मरीजो को देखने लगे। मरीजों को देखने के बाद दवा खुद नहीं लिख रहे थे बल्कि किसी साथ खड़े व्यक्ति से लिखवा रहे थे। मजे की बात है कि डॉक्टर साब स्वयं आंदोलनरत सेवारत चिकित्सक संघ के बीकानेर अध्यक्ष रहे हैं। तब भी आंदोलन में खूब आगे रहे। सरकार पर आरोपों झड़ी लगाने में पीछे नहीं रहे। अब जब स्वयं सरकार में है तो कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं? न तो हड़ताल खत्म करने में रुचि है और न अपने साथियों की बात को सरकार तक पहुंचवाने में। सही भी है 'बळती' में हाथ डालने के बजाय दूर खड़े रहकर ही हाथ सैक लें तो बेहतर है। यहां यह भी कहना चाहूंगा कि डॉक्टर सॉब के डॉक्टर मित्र भी बड़े 'सयाने' हैं। वो भी नहीं चाहते कि उन्हें किसी विवाद में फंसाया जाए। जब प्रदेश की मुख्यमंत्री विधायकों को अपने अपने क्षेत्र के चिकित्सकों से बात करने का जिम्मा सौंप रही है तो अपने ही पास पड़े इस 'तुरुप के पत्ते' को आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा। हकीकत तो यह है कि अत्यंत मृदुभाषी डॉ. साब अगर कोशिश करेंगे तो यह हड़ताल दो दिन से ज्यादा नहीं चलने वाली। आखिर एक ही जमात के लोग हैं, एक ही विचारधारा के साथी है।

कुछ कहती है भाटी की यह भूमिका

आमतौर पर बीकानेर शहर की राजनीति से दूर रहने वाले कद्दावर नेता देवी सिंह भाटी की शहर में बढ़ी सक्रियता कुछ कहती है। देवी सिंह भाटी ने पिछले दिनों नगर निगम महापौर, पार्षदों और अधिकारियों के साथ जिस तेवर के साथ बातचीत की, वो हर किसी को प्रभावित कर रही है। शहरी क्षेत्र की राजनीतिक शून्यता के बीच भाटी की बढ़ती सक्रियता ने विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर चिंतन शुरू हो जाना चाहिए। माना जा रहा है कि इस बार भाटी 'किंग मेकर' की भूमिका में नजर आएंगे। इसी कारण वो श्रीकोलायत के साथ बीकानेर पूर्व और पश्चिम दोनों सीटों पर गंभीरता से और पूरी तरह सोच विचार कर काम कर रहे हैं। सोनगिरी पटाखा कांड के बाद मकान बनवाकर देने की उनकी सोच मानवीय तो है ही, सकारात्मक राजनीति को बढ़ावा भी दे रही है। इतना ही नहीं बीकानेर पश्चिम क्षेत्र में उनके इक्का दुक्का नहीं सैकड़ों कट्टर कार्यकर्ता तैयार हो रहे हैं। अगर प्रतिद्वंद्वि पार्टी इसे हलके में ले रही है तो यह उनकी राजनीतिक समझ की कमजोरी है। उनकी सक्रियता कुछ कहती है, समझो।

सोशल मीडिया की नेतागिरी

यह नेतागिरी है, गांधीगिरी है, सोशल मीडियागिरी है या फिर कुछ करने की ललक है। कुछ भी हो, इन दिनों शहर के युवा सोशल मीडिया पर जमकर नेता गिरी कर रहे हैं। जो कर रहे हैं, उनमें दो-तीन तरह के सोशलमीडिया नेता है। एक वो नेता है, जो करते कुछ नहीं है, बस भाषण देते हैं। यह होना चाहिए, वो नहीं होना चाहिए, ऐसा क्यों किया गया, यह राष्ट्रद्रोह है, यह राष्ट्रभक्ति है, ऐसा नहीं करना चाहिए। कुछ ऐसे हैं जो गलत को गलत बताते हैं और उसे साबित करने का प्रयास भी करते हैं। ऐसे ही नेताओं ने पिछले दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से जनजागृति का प्रयास भी किया। समय समय पर इनकी टिप्पणी कुछ बेहतर भविष्य की परिकल्पना करने को प्रोत्साहित करती है।

जनसम्पर्क अभियान शुरू

अभी न तो विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई है, न किसी पार्टी ने अपनी रणनीति तय की है, उम्मीदवार बनाने का काम तो शायद आठ दस महीने में शुरू होगा। इसके बाद भी बीकानेर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से शायद एक बार फिर गोपाल गहलोत दावेदारी ठोकने वाले हैं। 'ठोकने' वाला शब्द इसलिए काम में लिया गया है कि पार्टी टिकट दें न दे। वो तो हर हाल में चुनाव लड़ेंगे। कुछ भाजपाई रंग में और कुछ कांग्रेसी रंग में रंगे गहलोत ने गौ रक्षा का ऐसा एजेंडा हाथ में लिया है, जैसा गुजरात चुनाव में उनकी पार्टी ने लिया था। 'सॉफ्ट हिन्दुत्व' के साथ चुनाव लड़ेंगे, इतना तय है। इसीलिए आजकल गली-गली पहुंचकर लोगों से संपर्क कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपनी यात्रा को जमकर प्रचारित कर रहे हैं। ये तो लड़ेगा भाई....।

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टिकट की दौड़ में कहां दौड़ें

विधानसभा चुनाव की घंटी बजने वाली है। गुजरात में जैसे चुनावी नतीजे आएंगे, वैसे ही राजस्थान में चुनावी तैयारियां परवान पर पहुंच जाएगी। इससे पहले वो लोग अपना होमवर्क कर रहे हैं, जो टिकट के दावेदार है। सबसे ज्यादा तैयारी भारतीय जनता पार्टी में हो रही है, जहां दावेदारों की संख्या दिन दुनी और रात चौगुनी बढ़ रही है। न सिर्फ शहर में बल्कि ग्रामीण अंचल की विधानसभा सीटों पर भी जोरदार लॉबिंग का खेल शुरू हो गया है। वर्तमान विधायकों को अपने कामों से फुर्सत नहीं है और नए विधायक बनने के दावेदारों ने उनकी जमीन हिलानी शुरू कर दी है।बात लूणकरनसर की हो या फिर नोखा की। हर कहीं नए दावेदार सामने आ रहे हैं। लूणकरनसर में एक दावेदार ने तो गांव गांव चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं। जातिगत राजनीति के आंकड़े दिमाग में सेट करके वो निकल पड़े है सफर पर। हर हाल में इस बार टिकट लाना है। इन नेताजी का तय रूप से मानना है कि अगर मानिकचंद सुराना को टिकट नहीं मिला तो सबसे बड़े दावेदार भाजपा से ये ही है। लूणकरनसर में प्रवेश करने के साथ ही सबसे पहले इनका ही चित्र वहां नजर आता है। लोकतंत्र की यही सुंदरता है कि यहां हर कोई अपनी दावेदारी जता सकता है। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि बीकानेर के एक वरिष्ठ नेता बड़े ओहदे वाले नोखा से चुनाव लड़ सकते हैं। अब तक तो उनकी बीकानेर पूर्व और पश्चिम से ही चुनाव लडऩे की अटकले आ रही थी लेकिन पाटे पर अब इनके नोखा से चुनाव लडऩे की खबर ने कुछ को परेशान कर दिया और शहर वालों को कुछ राहत दे दी। समझ नहीं आ रहा इस एक नेता को भारतीय जनता पार्टी कहां कहां पर दावेदार बनाएगी। इस नगर का विकास फिर कौन करेगा?
कांग्रेस का हिन्दूवादी प्रेम
कांग्रेस आजकल हिन्दूवाद में शायद भाजपा से भी आगे निकलने की कोशिश में है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर मंदिर मत्था टेक रहे हैं तो स्थानीय स्तर तक इसका असर दिख रहा है। एक कांग्रेस नेता गौ सेवा में व्यस्त है। सुबह उठने के साथ ही गायों की सेवा में लग जाते हैं। बताया जाता है कि गाय की सेवा से फल मिल जाता है। इनका तो बस एक ही लक्ष्य है कि एक बार जैसे-तैसे विधायक बनना है। गौ सेवा ऐसा मुद्दा है, जिस पर हिन्दू भी साथ है और पार्टी से नए मतदाता भी जुड़ रहे हैं। वैसे बता दें कि कुछ और कांग्रेसी नेता इन दिनों हिन्दू और सनातन विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। अच्छी बात है।
नमो विजय मंच
राजनीति के लिए मंच की जरूरत होती है, इसलिए हर कोई इसी जुगत में लगा है कि उसे टिकट मिल जाए। अब टिकट लेने के लिए अपना दमखम भी दिखाना पड़ता है। बाकी दावेदारों ने अपना काम किया, एक नेताजी ने अपना काम शुरू कर दिया है। बकायदा एक मंच गठित किया गया है, कार्यालय खोला गया है। नाम भी ऐसा दिया गया है जो कई अर्थ लिए हुए हैं। नमो विजय मंच। नमो यानी नरेंद्र मोदी और विजय यानी जीत। नरेंद्र मोदी को जीत मिले इसके लिए इस मंच का गठन किया है। या फिर यूं कहें कि भाजपा के एक 'विजयÓ को विजय दिलाने के लिए जतन अभी से शुरू हो गए हैं। अच्छी बात है। राजनीति में भी आजकल ऐसा ही है, जो दिखता है वो चलता है।
छवि सुधारने में लगे हैं
बात लूणकरनसर की चल पड़ी है तो बड़े वाले नेताजी की भी बात कर लेते हैं। सुनने में आया है कि वो आज कल काफी 'लिबरलÓ हो गए हैं। लोगों के बीच बैठते हैं, बात करते हैं, उनकी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। विधानसभा चुनाव में इस बार भी अपनी पार्टी से वो इकलौते दावेदार है। पिछले चुनाव में अपने ओहदे और जिम्मेदारियों के कारण ठेठ ग्रामीण परिवेश वाले 'अपनोंÓ को नाराज कर बैठे थे। इस बार इस छवि को बदलने में लगे हैं कि वो कुछ अलग अंदाज में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में जो भी रूस गए हैं, अरे... वो विदेश वाला रूस नहीं...। रूस गए यानी जो नाराज हो गए हैं, उन्हें वापस राजी करने में लगे हैं। छोटी छोटी बातों की नाराजगी दूर हो जाती है तो बड़ी बड़ी सफलताएं मिल ही जाती है।

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'सबको खुश करना नामुमकिन'

एक व्यापारी के तीन पुत्रों ने अलग अलग व्यापार प्रारम्भ किये। एक ने खेती, दूसरे ने कुम्भकार और तीसरे ने हिल स्टेशन पर होटल चलाने का कार्य प्रारम्भ किया। व्यापारी ने एक दिन तीनों के हाल चाल जानने हेतु यात्रा की। जब वह पहले पुत्र के घर पहुंचा तो उसने पिता से वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। वह किसान था। उसका कार्य वर्षा पर आधारित था। दूसरे पुत्र के घर जाते ही पुत्र ने पिता को भीषण गर्मी पड़ते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। जब किसान को उसने वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते पाया तो वह आगबबूला हो गया और तुरंत ही प्रार्थना बंद करने को कहा। दुसरे पुत्र के कहने पर पिता ने गर्मी पडऩे की प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। अब व्यापारी तीसरे पुत्र के घर पहुंचा। व्यापारी पिता भीषण गर्मी पडऩे की प्रार्थना कर रहा था। यह देख तीसरा पुत्र क्रोधित हो गया और उसने अपने पिता को बसंत काल जैसे मौसम की प्रार्थना करते रहने को कहा। पिता को यह समझ नहीं आया कि आखिर वो ईश्वर से किस मौसम के लिये प्रार्थना करे?

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मानो ना मानो, दावेदार तो हो

कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रियता पचास तरह की चर्चाओं को जन्म दे देती है। ऐसे में आप मानो या ना मानो, लोग के जुबां पर बात आ ही जाती है। पिछले दिनों संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल की पत्नी गृह विज्ञान महाविद्यालय की वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. विमला डुकवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ समय से उनकी सक्रियता को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने कोई बात नहीं बोली। यहां तक कि स्वयं उनके निर्देशन में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में भी किसी ने मंच से इस तरह की बात नहीं की लेकिन मोहता भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ता ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि आप राजनीति में भी आ रही है तो हम आपका पूरा सहयोग करेंगे। अब उनके पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं। पास में बैठे लोगों से जरूर कहा कि उनका ऐसा कोई मानस नहीं है। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम के बाद वो बाहर निकले तो एक महिला ने भी उन्हें बड़े पद पर जाने का आशीर्वाद दे डाला। अब यह सब कुछ पत्रकारों के सामने होगा तो चर्चा ए आम तो होगी ही। वैसे आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी डॉ. विमला का नाम चर्चा में आया था और एक बार फिर इसी नाम पर चर्चा हो रही है। हालांकि स्वयं डॉ. विमला कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि वो चुनाव लडऩे के लिए सक्रिय नहीं है। जैसे हालात नजर आ रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार भी भाजपा के एक दल विशेष की ओर से उनका नाम आगे किया जाएगा। अगर ऐसा हो जाता है तो कोई गलत भी नहीं। पढ़ी लिखी सांसद आखिर किसको नहीं चाहिए? हां, वैसे वर्तमान वाले सांसद भी कहां कम है, वो तो आईएएस अधिकारी थे।

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'क्या आप स्टार हैं?

मैनेजमेंट की रिसर्च के अनुसार प्रत्येक संगठन पांच से सात प्रतिशत कार्मिक स्टार परफोरमर्स होते हैं। इन्हीं कर्मचारियों के कार्य के प्रति समर्पण के दम पर संगठन को विशेष पहचान मिल पाती है। स्टार परफोरमर्स के पास सिर्फ स्वप्न ही नहीं अपितु क्रियान्वित करने की शक्ति भी होती है। उसमे आंतरिक विश्वास की शक्ति होती है जहाँ कुछ भी असंभव नहीं होता। उद्यमिता को अपने व्यवहार में उतारने वाला, मुश्किलें आने पर मैदान में डटे रहने वाला और नव सृजन व परिवर्तन को स्वीकारने वाला ही स्टार होता है। जरा सोचिये, क्या आप संगठन के स्टार हैं? यदि आप स्टार नहीं हैं तो आप एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अपनी कार्यक्षमता, अधुनातन सोच, प्रोएक्टिव एप्रोच द्वारा एक स्टार कर्मचारी संगठन को उच्च स्तर पर ले जाता है। उसकी ऊर्जा का प्रवाह, नैतिक बल और विषय पर पकड़ अन्यों से श्रेष्ठ होती है। वही उसे स्टार बनाती है।

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