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'जो बोयेगा वही काटेगा'

एक छोटे अनाथ बच्चा भूख और प्यास से परेशान था। उस दिन उसे मजदूरी भी नहीं मिली अत: उसके पास एक पैसा भी नहीं था। लड़का खुद्दार था। एक मकान के बाहर खड़ी महिला से उसने एक ग्लास पानी मांगा। महिला समझ गयी कि बच्चा भूखा- प्यासा है। महिला ने पानी की जगह बच्चे को एक ग्लास दूध दे दिया। बच्चे ने धीरे-धीरे दूध पिया और उसका मूल्य पूछा। महिला ने कहा कि मदद का पैसा नहीं लिया जाना चाहिये। बच्चे ने महिला का आभार जताया। कई वर्ष बाद वही महिला गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी। डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया। तभी डॉक्टर्स ने सुपर स्पेशिअलिस्ट डॉ. होवार्ड से मदद लेने की सोची। डॉ होवार्ड इस बीमारी का सबसे बड़ा डॉक्टर था। डॉ होवार्ड ने महिला का दस दिन तक पूर्ण मनोयोग से इलाज किया। डॉ होवार्ड अपने जूनियर्स से कहा कि इलाज का बिल उस महिला से नहीं लिया जाये। जब महिला ने स्वस्थ होने के बाद बिल की प्रति माँगी तो अस्पताल प्रशासन ने कहा कि बिल का भुगतान हो चुका है। महिला आश्चर्यचकित थी। जब बिल की प्रति महिला को मिली तो उसपर लिखा था 'मैडम, इस बिल की राशि उस एक ग्लास दूध से काफी कम है जो वर्षों पूर्व आपने मुझे पिलाया था। यदि वो एक ग्लास दूध नहीं मिलता तो आज डॉ होवार्ड जीवित नहीं होता। आपका ही डॉ होवार्डÓ। महिला की आंखों में अशु्र थे। सच है, जैसा आप अन्यों के साथ करोगे, अन्य भी आपके साथ वैसा ही करेंगे।

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कलाओं का कोलाज है नाटक

नाट्य-कर्म कलाओं का कोलाज है। यहां संगीत, नृत्य, गायन, वादन, चित्र और काव्य का एक ऐसा मंडल बनता है जो दर्शकों को भाव-विभोर करने की क्षमता रखे। इसी लिए नाट्य-मंडली या रंग-मंडल जैसे शब्द प्रचलन में आए। एक ऐसा वातावरण जहां सभी कलाओं के ज्ञाता हों और एक दिशा में चलने के अभ्यस्त हों। ध्येय एक हो, नाटक खेलना। वस्तुत: यह खुद को साधने की कला होती है और समस्त कलाएं मंच के इस साधक को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए होती है। इसीलिए नाटक को अभिनेता का माध्यम कहा गया है। अभिनेता नाटक का वह चेहरा होता है, जिसके बूते पूरा परिदृश्य अभिव्यक्त होता है और हम देखते हैं कि बहुत सारे नाटक अपने पात्रों की वजह से सदियों तक याद रखे जाते हैं। बहुत सारे नाटकों के निर्देशक तो क्या लेखकों के नाम भी याद नहीं रहते लेकिन उनके पात्रों का नाम याद रहता है। थैंक यू मिस्टर ग्लाड, अंधायुग, तुगलक, भोमा, कोर्ट मार्शल, सखाराम बाइंडर, अजातघर, खबसूरत बहू, बिन बाती के दीप, आत्मकथा, तीडोराव और ऐसे ही कई नाटक अपने पात्रों की वजह से, अभिनेता की वजह से पहचाने गए।

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हर बॉल को हुक कर गए सीपी

एयरपोर्ट बनने से बीकानेर वालों को जयपुर और दिल्ली जाने का लाभ तो हुआ ही है यहां के पत्रकारों को भी खूब फायदा हुआ है। एयरपोर्ट बना है तो नेता अब यहीं से होकर आसपास के शहरों में जाते हैं। हमारे पत्रकार भाई भी पहुंच जाते हैं अपना माइक लेकर। आदत से मजबूर है सवाल ऐसा करेंगे कि सामने वाले के तीर सा चुभे। अब सी पी जोशी आये तो उनसे हजार सवाल किए जा सकते थे लेकिन पूछे वो ही सवाल जिसका दर्द साफ नजर आ जाये। पहला सवाल था कि गुजरात मे क्या होगा? अब अच्छा बताए तो संकट बुरा बताए तो संकट। सो बोल दिया अशोक जी से पूछो। अरे भाई आप ही अच्छा बता देते तो कौनसा अशोक जी सर्वसम्मति से विधायक दल के नेता घोषित हो रहे थे।
दूसरा सवाल किया तो वो भी बाउंसर था। जोशी क्रिकेट के प्रशसनिक खिलाड़ी है तो इस बॉल को भी हुक कर दिया। सवाल था राजस्थान में अगले चुनाव में चेहरा कौन होगा। जवाब था कांग्रेस तय करेगी। हम तो सोच रहे थे आप ही कांग्रेस है लेकिन यहां भी कुछ उत्साहजनक जवाब नहीं दिया। खैर हम खबरनवीस तो इसे भी खबर बना लेते हैं। रवि की हर बॉल पर सीपी ने बचाव किया लेकिन खबर तो फिर भी बनी।
2 स्वागत में कमी नहीं
कहते हैं दिल मिले ना मिले हाथ मिलने चाहिए। पिछले दिनों कांग्रेस नेताओं ने ऐसा ही जज़्बा दिखाया। एयरपोर्ट पर जोशी का स्वागत करने वालों में अधिकांश वो थे जो हाथ मिलाने गए थे ताकि आगे रोड़ा ना डालें। अच्छी पहल है।
3
भाजपा इन दिनों सदस्यता अभियान में व्यस्त है। खूब कार्यक्रम करवा रहे हैं। हर कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं । ये भी नही देख रहे कि अपने वोटर है या नहीं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में अध्यक्ष जी काफी सक्रिय नज़र आये। तालाब में खूब पानी बजी डलवाया। पूजा भी करवाई। बाद में किसी ने बताया कि उनमें से कोई भी अपना वोटर नहीं है। अधिकांश का तो वोटर लिस्ट में ही नाम नहीं है। खैर कभी कभार भगवान ही अच्छा काम करवा लेते हैं । जाने अनजाने ही सही।
यहां पार्टी मायने नहीं रखती
विचार बड़ा हो तो मानसिकता बदल लेनी चाहिए। अच्छे काम के लिए समझौता कर लेना चाहिए। सिद्धान्त भी किनारे रख देने चाहिए। अभी कांग्रेस और भाजपा के नेता दो मामलों में ये सदाशयता दिखा रहे हैं। अब आपको उन मुद्दों से क्या मतलब कि कहां दोनों ने समझौता किया। आप नहीं मानों तो बता देते हैं। दीमापुर औऱ दे माताजी वाला मामले में दोनों एक थे।

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हर बॉल को हुक कर गए सीपी

एयरपोर्ट बनने से बीकानेर वालों को जयपुर और दिल्ली जाने का लाभ तो हुआ ही है यहां के पत्रकारों को भी खूब फायदा हुआ है। एयरपोर्ट बना है तो नेता अब यहीं से होकर आसपास के शहरों में जाते हैं। हमारे पत्रकार भाई भी पहुंच जाते हैं अपना माइक लेकर। आदत से मजबूर है सवाल ऐसा करेंगे कि सामने वाले के तीर सा चुभे। अब सी पी जोशी आये तो उनसे हजार सवाल किए जा सकते थे लेकिन पूछे वो ही सवाल जिसका दर्द साफ नजर आ जाये। पहला सवाल था कि गुजरात मे क्या होगा? अब अच्छा बताए तो संकट बुरा बताए तो संकट। सो बोल दिया अशोक जी से पूछो। अरे भाई आप ही अच्छा बता देते तो कौनसा अशोक जी सर्वसम्मति से विधायक दल के नेता घोषित हो रहे थे।

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सबसे महत्वपूर्ण अंग कौन?

माँ ने अपने सात वर्षीय पुत्र से पूछा कि हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग कौनसा है। पुत्र ने जवाब में कान को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इसे गलत ठहराया। कुछ वर्ष बाद माँ ने पुन: यही प्रश्न किया और पुत्र ने आँख को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इस उत्तर को भी गलत बताया। अब पुत्र सोलह वर्ष का था और अध्ययन हेतु विदेश जा रहा था। आज माँ ने अपने पुत्र को सही उत्तर बताते हुए कहा कि शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है कंधा। इसलिये नहीं क्योंकि उसपर हमारा सर टिका है बल्कि इसलिये क्योंकि विपत्ति काल में हमारे मित्र इसी कंधे पर सर रखकर रो सकते हैं और अपनी पीड़ा हमें कह सकते हैं। कन्धा ही मनुष्य शरीर का ऐसा अंग है जो स्वार्थी नहीं होता और मुश्किल काल में फंसे अपने मित्रों के सिरों को सहारा देता है।

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'कृतघ्नता एक अपराध'

एक शिकारी शिकार के लिये गया और रास्ता भटक गया। चार दिन तक भटकता रहा लेकिन कुछ भी खाने को नहीं मिला। थक कर अधमरा सा शिकारी भगवान से भोजन मिलने की मिन्नतें करने लगा। थोड़ी ही देर बाद शिकारी ने एक आम का पेड़ देखा। प्रसन्नता से भरा शिकारी आम के पेड़ के पास पहुंचा और तुरंत आम खाने लगा। जब शिकारी को पहला आम मिला तो उसके नेत्र भीग गये और उसने तुरंत ही ईश्वर का अत्यधिक आभार जताया। दूसरा आम खाते हुए भी शिकारी ईश्वर वंदना करता रहा। छठे और सातवें आम को खाते हुए शिकारी ईश्वर ने धीरे धीरे ईश्वर को उलाहना देना शुरू किया क्योंकि वो चार दिन से भूखा था। दसवां आम तो शिकारी ने फैंक दिया और यह जताया कि आम भोजन थोड़े ही है। हमारी स्थिति भी यही है। यहां हम शिकारी की भूमिका में हैं। आम वे उपहार हैं जो ईश्वर, देश, समाज, परिवार से हमें प्राप्त होते हैं। हम नियमित तौर पर उपहार प्राप्त करते जाते हैं और हमारा लालच लगातार बढ़ता जाता है। दसवां आम भी पहले जितना मीठा था लेकिन उसके लिये धन्यवाद नहीं दिया गया। यह घटिया प्रवृत्ति है।

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मक्खन अली महबूब जोशी

बात 1977 के चुनावों की है। इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के निर्णय के बाद जयप्रकाश नारायण के उम्मीदवारों का देश में जीतना तय था और इंदिरा विरोध की लहर अपने परवान पर थी। इस समय बीकानेर में मक्खन जोशी बड़ा समाजवादी चेहरा माना जाता था और एक लोकप्रिय नेता के रूप में पहचान बना चुके थे। 1977 के राजस्थान विधानसभा चुनावों में मक्खन जोशी को टिकट मिलना तय था और तत्कालीन नेता चंद्रशेखर से मक्खन जोशी की नजदीकी और आश्वासन के बाद मक्खन जोशी के टिकट को लेकर संशय नहीं था। मक्खन जोशी दिल्ली से आश्वस्त होकर जयपुर रवाना हुए और बीच में रामगढ बांध पर दोस्तों के साथ पिकनिक के लिए रूक गए।

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'जब संसार कहे ना'

एक विद्यार्थी को गुरूजी ने आत्मविश्वास का पाठ सिखाया। गुरूजी ने विद्यार्थी से कक्षा के समक्ष विज्ञान का सिद्धांत बोलने के लिये कहा। ज्यों ही विद्यार्थी ने बोलना प्रारम्भ किया, शिक्षक ने जोर से चिल्लाते हुए कहा "नहीं, नहीं"। विद्यार्थी डरकर बैठ गया। शिक्षक ने दूसरे विद्यार्थी से बोलने को कहा। ज्यों ही दूसरे विद्यार्थी ने बोलना प्रारम्भ किया, शिक्षक ने पुन: जोर से चिल्लाते हुए कहा "नहीं, नहीं"। दूसरे विद्यार्थी ने इस "नहीं" की परवाह न करते हुए बोलना जारी रखा। दूसरे विद्यार्थी ने अपना प्रस्तुतीकरण पूर्ण किया। गुरूजी ने शाबासी दी। पहले विद्यार्थी ने कहा कि वो भी तो यही कह रहा था। गुरूजी ने पहले विद्यार्थी से जो शब्द कहे वो कई लोगों की जिन्दगी बदल सकते हैं। गुरूजी ने कहा कि: 'तुम्हारे मन में अनिश्चितता थी इसलिये तुम रुक गये। जब संसार कहे ना तो इसका जवाब अपने कार्य से दो। संसार के आदत ना कहने की है। इसे चुनौती दो। इन वाक्यों को गलत ठहराओ :

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'बलि के बकरे न तलाशें'

एक राजा को शिकार करने बहुत शौक था। एक दिन वो शिकार पर निकला तो पूरे दिन में उसे एक भी जानवर नहीं मिला। भूखा-प्यासा राजा शिकार की तलाश में भटकता रहा। जब उसे कोई शिकार न मिला तो वो भाग्य को कोसता रहा और महल लौट आया। महल में उसे याद आया कि सुबह उसने एक दीन हीन निर्बल किसान का देखा था। राजा ने सोचा कि उस किसान के शगुन सही नहीं थे और उसके दुर्भाग्यशाली होने के कारण राजा को शिकार न मिला। राजा ने तुरंत सिपाही भेजकर किसान को गिरफ्तार करवाया। राजा ने किसान को अत्यंत दुर्भाग्यशाली ठहराते हुए कहा कि किसान के अपशकुनी होने की वजह से शिकार न मिला अत: किसान को तुरंत मृत्युदंड दे दिया जाये। किसान ने बुद्धिमत्ता से जवाब दिया जिससे उसके प्राण बच गये। किसान ने कहा कि जिस प्रकार राजा ने सुबह किसान को देखा उसी प्रकार सुबह सबसे पहले किसान ने राजा को देखा। राजा को देखने के कारण आज किसान अपने प्राण गंवा रहा है तो ज्यादा बड़ा दुर्भाग्यशाली कौन हुआ? यहाँ हमें निम्नाकित बिन्दुओं को समझना चाहिये:

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''डेढ़ होशियार कर्मचारी"

डेढ़ होशियार कर्मचारी अर्थात वे कार्मिक जो कोई काम ठीक से नहीं करते हैं और जो कर रहा है उसे प्रति पल नियमों काए कायदों का हवाला देकर काम करने से रोकते हैं। ये संगठन के लिए पनौती हैं। स्वयं कुछ करो नहीं, किसी को अच्छा काम करने दो नहीं और यदि कोई अच्छा काम कर बैठे तो उसमे नुक्स निकालना इनका परम धर्म होता है। डेढ़ होशियार निकृष्ट कर्मचारियों के कुछ आदर्श वाक्य हैं जिनसे आप इनकी पहचान कर सकते हैं :

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