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'क्या आप स्टार हैं?

मैनेजमेंट की रिसर्च के अनुसार प्रत्येक संगठन पांच से सात प्रतिशत कार्मिक स्टार परफोरमर्स होते हैं। इन्हीं कर्मचारियों के कार्य के प्रति समर्पण के दम पर संगठन को विशेष पहचान मिल पाती है। स्टार परफोरमर्स के पास सिर्फ स्वप्न ही नहीं अपितु क्रियान्वित करने की शक्ति भी होती है। उसमे आंतरिक विश्वास की शक्ति होती है जहाँ कुछ भी असंभव नहीं होता। उद्यमिता को अपने व्यवहार में उतारने वाला, मुश्किलें आने पर मैदान में डटे रहने वाला और नव सृजन व परिवर्तन को स्वीकारने वाला ही स्टार होता है। जरा सोचिये, क्या आप संगठन के स्टार हैं? यदि आप स्टार नहीं हैं तो आप एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अपनी कार्यक्षमता, अधुनातन सोच, प्रोएक्टिव एप्रोच द्वारा एक स्टार कर्मचारी संगठन को उच्च स्तर पर ले जाता है। उसकी ऊर्जा का प्रवाह, नैतिक बल और विषय पर पकड़ अन्यों से श्रेष्ठ होती है। वही उसे स्टार बनाती है।

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'कष्ट देने हेतु आभार'

एक गर्भवती भूखी प्यासी महिला पेड़ के नीचे बैठी थी। प्यास से उसके प्राण निकल रहे थे। कहीं भी जल नहीं था। तभी उसे लगा कि पेड़ पर से कुछ बूंदें टपक रही हैं। उसने पास ही पड़ा मिट्टी का दीपक लिया और उसमे बूंदों को इकठ्ठा करने लगी। जैसे ही दीपक भरा तो महिला उसे पीने लगी। तभी एक चिडिय़ा आई और उसने दीपक को गिरा दिया। महिला क्रोधित हो गयी। उसने गुस्से में पास पड़ी लाठी से चिडिय़ा पर प्रहार किया। महिला ने ईश्वर को भला बुरा कहते हुए कई अपशब्द कहे। चिडिय़ा घायल हो गई और ज्यों त्यों उड़कर अपने घोंसले में चली गई। तभी महिला ने देखा कि जिसे वह निर्मल जल समझकर इकठ्ठा कर रही थी वो असल में एक सांप का जहर था जो उसके मुंह से टपक रहा था। यह देखते ही महिला की आँखों में अशु्र थे। उसने ईश्वर का आभार जताया और अपने कृत्य पर ईश्वर से क्षमा मांगी।

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नोट के साथ वोट

भारत में पहले आम चुनाव 1952 में हुए। इसी क्रम में बीकानेर में पहले सांसद का चुनाव बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा करणीसिंह ने लड़ा था। करणीसिंह महाराजा गंगासिंह के पौत्र और महाराजा सार्दुलसिंह के पुत्र थे। आजादी के बाद पहले आम चुनाव तक राजा-महाराजाओं के प्रति विशेष सम्मान व प्रेम नजर आता था। तब राजा-महाराजाओं से जब भी कोई व्यक्ति मिलता था तो अपनी हैसियत के अनुसार कुछ न कुछ लेकर जरूर जाता था, जिसको नजराना या भेंट कहा करते थे। राजा महाराजा से खाली हाथ मिलने का रिवाज उस समय नहीं था। इसी सोच व भावना के साथ बीकानेर की जनता ने महाराजा करणीसिंह को वोट दिए तो वोट के साथ एक नोट भी डाला। सोच यह थी कि महाराजा को खाली वोट कैसे दें! आखिर तो राजा है और राजा को पहली बार बिना मिले ही मिलना था तो खाली हाथ नहीं मिला जा सकता था।

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'प्राथमिकता क्या है?

एक महिला ने एक तोता खरीदा। विक्रेता ने कहा कि तोता बड़ा वाचाल है। पहले दिन जब तोता एक शब्द नहीं बोला तो महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की। विक्रेता ने महिला को कहा कि वो पिंजरे में शीशा लगा दे तो तोता बोल पड़ेगा। तोता नहीं बोला। दूसरे दिन विक्रेता ने एक छोटी सीढ़ी पिंजरे में रखने को कहा। तोता फिर भी नहीं बोला। तीसरे दिन विक्रेता ने पिंजरे में झूला रखने को कहा लेकिन तोता झूला देख कर भी नहीं बोला। चौथे दिन तोता मर गया। जब महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की तो विक्रेता ने महिला से तोते को दिये गये आहार की जानकारी मांगी। महिला ने धीरे से दुखी होकर कहा कि उसने तोते को आहार तो दिया ही नहीं। जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी- आहार। वह नहीं दिया तो बाकी सब दिया जाना निरर्थक रहा। महिला प्राथमिकता नहीं तय कर सकी कि तोते को क्या देना है।

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मदद: क्या सभी को नहीं चाहिये?

अपने घर के आगे एक दिन मुझे एक भिक्षुक दिखा. मैं अपनी बाइक को स्टार्ट करने के जद्दोजहद में था। मुझे लग रहा था कि इससे पहले कि यह भिक्षुक मुझसे कुछ मांगे, मैं घर से निकल जाऊं। इसी बीच मैंने देखा कि भिक्षुक अचानक फिसल कर गिर पड़ा है। मैंने तुरंत ही उससे पूछा कि क्या उसे कुछ मदद की ज़रूरत है? इस प्रश्न पर उसने जो उत्तर दिया उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। भिक्षुक ने मुझे उत्तर देते हुए कहा कि ' क्या सभी को ज़रुरत नहीं है - मदद की, प्रेम की, दया कीÓ। यह सुनकर मुझे लगा मानो मेरा समूचा ज्ञान व्यर्थ है। मेरी स्थिति काटो तो खून नहीं जैसी थी। भिक्षुक मुझे जीवन जीने का सार समझा गया। मुझे लगा कि ईश्वरीय वेश में वो भिक्षुक मुझे जीने की नई राह बता गया।

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'जो बोयेगा वही काटेगा'

एक छोटे अनाथ बच्चा भूख और प्यास से परेशान था। उस दिन उसे मजदूरी भी नहीं मिली अत: उसके पास एक पैसा भी नहीं था। लड़का खुद्दार था। एक मकान के बाहर खड़ी महिला से उसने एक ग्लास पानी मांगा। महिला समझ गयी कि बच्चा भूखा- प्यासा है। महिला ने पानी की जगह बच्चे को एक ग्लास दूध दे दिया। बच्चे ने धीरे-धीरे दूध पिया और उसका मूल्य पूछा। महिला ने कहा कि मदद का पैसा नहीं लिया जाना चाहिये। बच्चे ने महिला का आभार जताया। कई वर्ष बाद वही महिला गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी। डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया। तभी डॉक्टर्स ने सुपर स्पेशिअलिस्ट डॉ. होवार्ड से मदद लेने की सोची। डॉ होवार्ड इस बीमारी का सबसे बड़ा डॉक्टर था। डॉ होवार्ड ने महिला का दस दिन तक पूर्ण मनोयोग से इलाज किया। डॉ होवार्ड अपने जूनियर्स से कहा कि इलाज का बिल उस महिला से नहीं लिया जाये। जब महिला ने स्वस्थ होने के बाद बिल की प्रति माँगी तो अस्पताल प्रशासन ने कहा कि बिल का भुगतान हो चुका है। महिला आश्चर्यचकित थी। जब बिल की प्रति महिला को मिली तो उसपर लिखा था 'मैडम, इस बिल की राशि उस एक ग्लास दूध से काफी कम है जो वर्षों पूर्व आपने मुझे पिलाया था। यदि वो एक ग्लास दूध नहीं मिलता तो आज डॉ होवार्ड जीवित नहीं होता। आपका ही डॉ होवार्डÓ। महिला की आंखों में अशु्र थे। सच है, जैसा आप अन्यों के साथ करोगे, अन्य भी आपके साथ वैसा ही करेंगे।

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कलाओं का कोलाज है नाटक

नाट्य-कर्म कलाओं का कोलाज है। यहां संगीत, नृत्य, गायन, वादन, चित्र और काव्य का एक ऐसा मंडल बनता है जो दर्शकों को भाव-विभोर करने की क्षमता रखे। इसी लिए नाट्य-मंडली या रंग-मंडल जैसे शब्द प्रचलन में आए। एक ऐसा वातावरण जहां सभी कलाओं के ज्ञाता हों और एक दिशा में चलने के अभ्यस्त हों। ध्येय एक हो, नाटक खेलना। वस्तुत: यह खुद को साधने की कला होती है और समस्त कलाएं मंच के इस साधक को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए होती है। इसीलिए नाटक को अभिनेता का माध्यम कहा गया है। अभिनेता नाटक का वह चेहरा होता है, जिसके बूते पूरा परिदृश्य अभिव्यक्त होता है और हम देखते हैं कि बहुत सारे नाटक अपने पात्रों की वजह से सदियों तक याद रखे जाते हैं। बहुत सारे नाटकों के निर्देशक तो क्या लेखकों के नाम भी याद नहीं रहते लेकिन उनके पात्रों का नाम याद रहता है। थैंक यू मिस्टर ग्लाड, अंधायुग, तुगलक, भोमा, कोर्ट मार्शल, सखाराम बाइंडर, अजातघर, खबसूरत बहू, बिन बाती के दीप, आत्मकथा, तीडोराव और ऐसे ही कई नाटक अपने पात्रों की वजह से, अभिनेता की वजह से पहचाने गए।

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हर बॉल को हुक कर गए सीपी

एयरपोर्ट बनने से बीकानेर वालों को जयपुर और दिल्ली जाने का लाभ तो हुआ ही है यहां के पत्रकारों को भी खूब फायदा हुआ है। एयरपोर्ट बना है तो नेता अब यहीं से होकर आसपास के शहरों में जाते हैं। हमारे पत्रकार भाई भी पहुंच जाते हैं अपना माइक लेकर। आदत से मजबूर है सवाल ऐसा करेंगे कि सामने वाले के तीर सा चुभे। अब सी पी जोशी आये तो उनसे हजार सवाल किए जा सकते थे लेकिन पूछे वो ही सवाल जिसका दर्द साफ नजर आ जाये। पहला सवाल था कि गुजरात मे क्या होगा? अब अच्छा बताए तो संकट बुरा बताए तो संकट। सो बोल दिया अशोक जी से पूछो। अरे भाई आप ही अच्छा बता देते तो कौनसा अशोक जी सर्वसम्मति से विधायक दल के नेता घोषित हो रहे थे।
दूसरा सवाल किया तो वो भी बाउंसर था। जोशी क्रिकेट के प्रशसनिक खिलाड़ी है तो इस बॉल को भी हुक कर दिया। सवाल था राजस्थान में अगले चुनाव में चेहरा कौन होगा। जवाब था कांग्रेस तय करेगी। हम तो सोच रहे थे आप ही कांग्रेस है लेकिन यहां भी कुछ उत्साहजनक जवाब नहीं दिया। खैर हम खबरनवीस तो इसे भी खबर बना लेते हैं। रवि की हर बॉल पर सीपी ने बचाव किया लेकिन खबर तो फिर भी बनी।
2 स्वागत में कमी नहीं
कहते हैं दिल मिले ना मिले हाथ मिलने चाहिए। पिछले दिनों कांग्रेस नेताओं ने ऐसा ही जज़्बा दिखाया। एयरपोर्ट पर जोशी का स्वागत करने वालों में अधिकांश वो थे जो हाथ मिलाने गए थे ताकि आगे रोड़ा ना डालें। अच्छी पहल है।
3
भाजपा इन दिनों सदस्यता अभियान में व्यस्त है। खूब कार्यक्रम करवा रहे हैं। हर कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं । ये भी नही देख रहे कि अपने वोटर है या नहीं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में अध्यक्ष जी काफी सक्रिय नज़र आये। तालाब में खूब पानी बजी डलवाया। पूजा भी करवाई। बाद में किसी ने बताया कि उनमें से कोई भी अपना वोटर नहीं है। अधिकांश का तो वोटर लिस्ट में ही नाम नहीं है। खैर कभी कभार भगवान ही अच्छा काम करवा लेते हैं । जाने अनजाने ही सही।
यहां पार्टी मायने नहीं रखती
विचार बड़ा हो तो मानसिकता बदल लेनी चाहिए। अच्छे काम के लिए समझौता कर लेना चाहिए। सिद्धान्त भी किनारे रख देने चाहिए। अभी कांग्रेस और भाजपा के नेता दो मामलों में ये सदाशयता दिखा रहे हैं। अब आपको उन मुद्दों से क्या मतलब कि कहां दोनों ने समझौता किया। आप नहीं मानों तो बता देते हैं। दीमापुर औऱ दे माताजी वाला मामले में दोनों एक थे।

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हर बॉल को हुक कर गए सीपी

एयरपोर्ट बनने से बीकानेर वालों को जयपुर और दिल्ली जाने का लाभ तो हुआ ही है यहां के पत्रकारों को भी खूब फायदा हुआ है। एयरपोर्ट बना है तो नेता अब यहीं से होकर आसपास के शहरों में जाते हैं। हमारे पत्रकार भाई भी पहुंच जाते हैं अपना माइक लेकर। आदत से मजबूर है सवाल ऐसा करेंगे कि सामने वाले के तीर सा चुभे। अब सी पी जोशी आये तो उनसे हजार सवाल किए जा सकते थे लेकिन पूछे वो ही सवाल जिसका दर्द साफ नजर आ जाये। पहला सवाल था कि गुजरात मे क्या होगा? अब अच्छा बताए तो संकट बुरा बताए तो संकट। सो बोल दिया अशोक जी से पूछो। अरे भाई आप ही अच्छा बता देते तो कौनसा अशोक जी सर्वसम्मति से विधायक दल के नेता घोषित हो रहे थे।

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सबसे महत्वपूर्ण अंग कौन?

माँ ने अपने सात वर्षीय पुत्र से पूछा कि हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग कौनसा है। पुत्र ने जवाब में कान को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इसे गलत ठहराया। कुछ वर्ष बाद माँ ने पुन: यही प्रश्न किया और पुत्र ने आँख को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इस उत्तर को भी गलत बताया। अब पुत्र सोलह वर्ष का था और अध्ययन हेतु विदेश जा रहा था। आज माँ ने अपने पुत्र को सही उत्तर बताते हुए कहा कि शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है कंधा। इसलिये नहीं क्योंकि उसपर हमारा सर टिका है बल्कि इसलिये क्योंकि विपत्ति काल में हमारे मित्र इसी कंधे पर सर रखकर रो सकते हैं और अपनी पीड़ा हमें कह सकते हैं। कन्धा ही मनुष्य शरीर का ऐसा अंग है जो स्वार्थी नहीं होता और मुश्किल काल में फंसे अपने मित्रों के सिरों को सहारा देता है।

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