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'जीवन एक उत्सव'

जीवन क्या है और इसकी परिभाषा क्या है? जीवन की परिभाषा देना आसान नहीं है. क्या भोजन करना, प्रजनन करना, मकान बनवा लेना, बच्चों का विवाह कर देना और समाज में सुख - दु:ख के अवसरों में भाग लेना ही जीवन है? अधिकांश व्यक्ति इसी को जीवन मानते हैं. कुछ लोग धनार्जन को तो कुछ लोग आनंद के साथ जीने को ही जीवन मान लेते हैं. यह जीवन नहीं है. ये सभी कार्य (भोजन व्यवस्था आदि) तो पशु, पक्षी और कीट - पतंगे तक भी करते हैं. वास्तविक जीवन को हम जैसा परिभाषित करते हैं, हमारा जीवन वैसा ही बनता जाता है. 

जीवन एक संग्राम है : जो व्यक्ति ऐसा सोचते हैं उन्हें लगता है कि जीवन एक 'गला काटÓ प्रतिस्पर्धा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर जीत हासिल करना चाहता है. ऐसा सोचना गलत नहीं है लेकिन ऐसे में प्रतिस्पर्धा का भाव महत्वपूर्ण हो जाता है. जहां प्रतिस्पर्धा है वहां टीमवर्क, सहयोग और समन्वय का लोप हो जाता है. ऐसे व्यक्ति पल प्रति पल और अधिक हासिल करने, प्राप्त करने और ऊंचा चढऩे की लिप्सा से आगे बढ़ते जाते हैं. उनमे अत्यधिक महत्वाकांक्षा होती है. जीवन को संग्राम या प्रतिस्पर्धा मानने वालों को सोचना चाहिये कि यदि वे शहर की सारी सीढिय़ों को मिलाकर एक ऊंचाई पर पहुँच भी जायें तो वे यह पायेंगे कि ऐसी ऊंचाई पर कोई भी नहीं रहता. अत: जीवन को सिर्फ संग्राम न समझें.
जीवन एक संघर्ष है : कुछ व्यक्ति जीवन को संघर्ष मानकर चलते हैं. जब संघर्ष का भाव होता है तो व्यक्ति को लगता है प्रत्येक संसाधन की प्राप्ति हेतु अथाह श्रम और संघर्ष करना ही पडेगा. यह उसकी नियति बन जाती है. यही से व्यक्ति में परस्पर द्वेष, क्लेश और कुटिलता का जन्म होता जाता है. यदि आप जीवन को संघर्ष मानते हैं तो यह कुछेक अर्थों में तो सही है लेकिन पूर्ण रूप से सत्य नहीं है.
जीवन एक उत्सव : तो आखिर जीवन क्या है? जीवन एक उत्सव है. इस उत्सव रूपी जीवन में हमें समाज और राष्ट्र के लिये कुछ योगदान देना चाहिये. जीवन की सार्थकता यह समझने में है कि-
* आपने अपने कर्तव्यों का कितनी उत्कृष्टता से पालन किया?
* आपके कारण कितने लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट आई?
* आपने अपने माता पिता की सेवा किस मनोयोग से की?
* आप अपने बच्चों के लिए एक रोल मॉडल या हीरो बन पाये क्या?
यहां मन्त्र यही है कि जीवन का प्रति पल ईश्वर का आशीर्वाद है. प्रति पल जीयें. समाज के लिये जियें. राष्ट्र के लिये जियें. दूसरों की खुशी के लिये जियें. सुबह उठते ही आपके पैरों तले जमीन मिलना एक उत्सव से बढ़कर है क्योंकि इससे सिद्ध होता है कि आप जीवित हैं. जीवन के हानि - लाभ आदि को त्यागिये और जीवन्तता से जीना सीखिये. यही जीवन है.

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ये बहस बड़ी है मस्त

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***' को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवा' दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचारा' काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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उम्मीद से ज्यादा खरी सुन गए

भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी रणभेरी कांग्रेस के मुकाबले जल्दी भर दी है। कांग्रेस अभी रणनीति तय कर रही है लेकिन भाजपा ने टूटते जनाधार को संभालने के लिए अपनी फौज को मैदान में उतार दिया है। इसी फौज के कप्तान अशोक परनामी तीन दिन की यात्रा पर बीकानेर आए। श्रीगणेश ही ऐसा हुआ कि पहले ही दिन उन्हें यात्रा बीच में छोड़कर वापस जाना पड़ा। कयास लगाए गए कि उन्हें अब अध्यक्ष के रूप में वापस देखने का अवसर नहीं मिलेगा लेकिन ऊपर ऐसा कुछ नहीं था, जैसा नीचे सोचा गया था। परनामी अगले दिन ही वापस लौट आए। एक-एक विधानसभा की क्लास ली। मास्टरजी की तरह एक नहीं बल्कि दो दो विधायकों को अच्छी खासी डांट लगा दी। पहले बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपाल जोशी को और दूसरी खाजूवाला के विधायक डॉ. विश्वनाथ को। जोशी ने अपने ही कार्यकर्ताओं को विरोधी बताया था तो डॉ. विश्वनाथ ने अपने क्षेत्र में अतिक्रमण के नाम पर तोड़े गए मकानों के बारे में कोई जानकारी नहीं होने की बात कह दी। अध्यक्षजी ने कहा आपको अपने विधानसभा क्षेत्र की जानकारी नहीं है तो फिर क्या कर रहे हैं आप? एक विधायक ने बैठक में नहीं आने का साहस भी दिखा दिया। बीकानेर पूर्व की बैठक हुई, चर्चा हुई, बहस हुई लेकिन विधायक सिद्धि कुमारी नहीं थी। अध्यक्ष की बैठक में नहीं आने को हिम्मत ही कहा जाएगा। शिकायतों का सबसे बड़ा अंबार लेकर जो नेताजी हाजिर हुए वो हमारे महापौर नारायण चौपड़ा थे। चौपड़ा जी के बारे में पार्षदों ने इतनी शिकायतें की, जितने दिन उन्होंने महापौरी नहीं की। रही सही कसर पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी ने पूरी कर दी। देशनोक के मंच पर उन्होंने जितनी खरी कही, उतनी तो उम्मीद भी नहीं की होगी।

परिवर्तन यात्रा की चर्चा तेज

कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा अब चर्चा में आ रही है। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. बी.डी. कल्ला ने प्रत्येक वार्ड में पहुंचकर जन समस्याओं को सुनना शुरू किया तो क्षेत्र के लोगों का दर्द उभर कर सामने आ गया। अब भाजपा नेता इसे चुनावी तैयारी बता रहे हैं तो कांग्रेस इसे सधी हुई शुरूआत बता रहे हैं। इतना तय है कि प्रदेश में भले ही कांग्रेस की तैयारी मंद गति से चल रही है लेकिन बीकानेर में पार्टी एकजुट होकर लडऩे की कोशिश में है। जिस वार्ड में परिवर्तन यात्रा पहुंच रही है, वहां उसी वार्ड के लोगों को साथ लिया जा रहा है। भाजपा नेता अभी तक तो इस यात्रा का जवाब दे नहीं पा रहे हैं।

एक अच्छा काम ये भी

वैसे तो सोशल मीडिया महज चर्चा का केंद्र है, अपनी भड़ास निकालने का माध्यम है या फिर स्वयं की तारीफ करवाने का जरिया है लेकिन इस बीच कुछ काम अच्छे भी हो जाते हैं। टीम बीकानेर से जुड़े लक्ष्मण मोदी ऐसे ही मुद्दे फेसबुक पर डालते रहते हैं। पिछले दिनों पीबीएम अस्पताल के आगे टूटी हुई जालियों को उन्होंने खुद ठीक किया तो इस बार अम्बेडकर सर्किल पर हो रहे बेतरतीब निर्माण कार्य की तरफ ध्यान आकर्षित करवाया। उन्होंने बताया कि ऊंची दीवार सर्किल पर बनी तो दुर्घटनाएं बढ़ेगी। न्यास अध्यक्ष महावीर रांका ने जब इस पोस्ट को देखा तो तुरंत काम रुकवाया और इंजीनियर भेजकर इसे दुरुस्त करवाया। वैसे शिकायत सांसद अर्जुन मेघवाल से भी की गई थी। खैर काम किसी ने भी करवाया तो लक्ष्मण मोदी के प्रयास से दुर्घटना की आशंका कम जरूर हो गई।

नतीजा क्या होगा

अब अध्यक्षजी की यात्रा के बाद कार्यकर्ताओं का सवाल है कि इतनी सुनी है, उसका नतीजा क्या होगा? जवाब भी एक कार्यकर्ता ने ही दिया कि अध्यक्षजी को पता है कि इनकी एक बार सुन लो। न तो हमारे पास नए कार्यकर्ता आने वाले हैं और न हमारे कार्यकर्ताओं को कोई दूसरी पार्टी पकडऩे वाली है। ऐसे में दोनों को यही रहकर काम करना है। भाजपा कार्यकर्ताओं की यह विशेषता है कि वो लड़ाई कितनी भी कर लें लेकिन जब राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार और कांग्रेस का नाम लिया जाता है तो तुरंत प्रभाव से एक भी हो जाते हैं। अच्छी बात है। पार्टी इसी भावना का फायदा उठाकर अपने लोगों को आगे ले आती है और कार्यकर्ता हमेशा पीछे रह जाता है। भाजपा की यात्रा का नतीजा क्या होगा? जवाब तो आप समझ ही गए होंगे।

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'जीना सिखाते हैं श्रीराम'

सत्य और धर्म के पथ पर दृढ़ रहने वाले, नैतिकता की परिसीमा भगवान श्री राम ही सच्चे अर्थों में मनुष्यों को जीवन जीना सिखाते हैं। स्वधर्म पालन कर्ता श्री राम को जब महर्षि जवाली ने काफी समय तक समझाया कि एक महिला के कह देने से और पिता की भावुकता के चलते चौदह वर्ष तक गृह त्याग तर्कसंगत नहीं है। इस पर श्री राम ने अपने स्वधर्म को नहीं छोड़ा। श्री राम ने कहा कि प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपयश की प्राप्ति करोड़ों मृत्यु के समान संताप देने वाली होती है और वे अपने किसी कृत्य से अपने पिता और राज्य को अपयश नहीं देना चाहते। भगवान श्री राम ने अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम धर्म माता पिता की आज्ञा पालन है और उससे पीछे हटना अधर्म है। उन्होंने वन में उनके पीछे आये आर्य सुमंत, भाई भरत और अयोध्या वासियों को भी यही सन्देश दिया। 

भगवान श्री राम नैतिकता और समर्पण की ही नहीं अपितु प्रेरणा प्रदान करने की भी परिसीमा है। खेलों में हर बार अपने सबसे प्रिय भ्राता भरत को विजेता बना देने के गुण ने उनके सभी भाइयों में प्रेम और उत्साह का संचार किया। इसी गुण को मोटिवेशन गुरु का लक्षण कहते हैं। छोटों को खेल में जिताने से उन छोटे भ्राताओं में श्रद्धा बोध बढ़ता है। श्रीराम से हमें प्रशंसा करने की कला सीखनी चाहिये। आजकल मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में हमें संकोच होता है। यह उचित नहीं है। भगवान श्री राम अपने भाइयों की, राज्य कर्मचारियों की और यहाँ तक कि अपने शत्रु की वीरता की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में समर्थ थे। श्रीराम द्वारा मेघनाद, कुम्भकर्ण और राक्षसराज खर के वीर पुत्र मकराक्ष की प्रशंसा करना उनके विराट व्यक्तित्व को दर्शाता है। वर्तमान में हम ऐसा करने से हिचकते हैं क्योंकि हमें असुरक्षा का भय सताता रहता है।
विनम्रता की प्रतिमूर्ति और अहंकार से शून्य व्यवहार श्रीराम का मूल लक्षण है। शिव धनुष के टूटने पर उन्होंने अपनी विनम्रता को बनाये रखा। महर्षि परशुराम के समक्ष उनकी विनम्रता एक महान उदाहरण है। समुद्र द्वारा रास्ता ना देने पर तीन दिवस तक विनम्र निवेदन करना उनके पर्यावरण से प्रेम, उसके संरक्षण और संवर्धन की महत्ता को दिखाता है। शबरी के झूठे बेर खाना सिद्ध करता है कि नि:स्वार्थ भाव से की गई भक्ति से बढ़कर कुछ नहीं। सामजिक समरसता के प्रणेता श्री राम ने शबरी के झूठे बेर ग्रहण कर यह सिद्ध किया कि सभी मनुष्य बराबर हैं और जातियों आदि का कोई महत्व नहीं है। अहिल्या उद्धार उनके अहंकार शून्य शुद्ध सात्विक प्रेम को दर्शाता है। यही तो जीवन प्रबंध है। यही सत्य, धर्म, प्रेम, दया और नैतिकता के गुण वर्तमान समय की आवश्यकता हैं।

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चाहने भर से नहीं बन जाता कोई कवि

सृजनशील व्यक्तिके लिए जरूरी है कि 'चांदमारी' की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है।

भारतीय साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में जहां कवित्त ही बरामद होता है, उसी देश में आज कविता को सबसे उपेक्षित विधा करार दे दिया गया है। प्रकाशक काव्य-संग्रहों के प्रकाशन को मांग और आपूर्ति के सिद्धांत विपरीत मानते हैं तो मंचों पर चोरी और चुटकले बाजी से आगे बढ़ते हुए मजमेबाजी तक के आरोप कवियों पर लगने लगे हैं। इस दौर में कविता पर आलोचना की जगह व्यंग्य होने लगा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि आकाश में कंकर फेंको, नीचे जिस पर भी गिरेगा-कवि होगा। अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास के सेलिब्रिटी बन जाने से परेशान लोग भले ही आदर्श के रूप में तुलसी, सूर, मीरा, रसखान, निराला, गुप्त, दिनकर के नाम गिनाएं लेकिन कवि सम्मेलनों में आधे से अधिक कवि अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास की शैली की नकल करने वाले फॉलोअर ही मिलते है। कुछ लोग जो कविता के माध्यम से कुछ संजीदा करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे किसी को कोई सरोकार नहीं है और यही वजह है कि कवियों के भी जन-सरोकार खत्म होते जा रहे हैं। इस बढ़ती हुई खाई में कुछ ऐसे लोगों की बन आई है, जो ऑन-लाइन कविता सिखा सकते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे गुरुओं ने कविता की कुछ 'झटपट-विधियोंÓ का आविष्कार किया है, जो रातोंरात कवि बनाने का सामथ्र्य पैदा कर सकती है। रोचक तथ्य यह है कि ऐसे लोगों को धन और समर्थन भी खूब मिल रहा है। नव-रचनाकार इनके ईजाद किए हुए फार्मूलों से कविताएं रच रहे हैं, छप रहे हैं और सराहे जा रहे हैं। दावा यह है कि इस इंस्टेट-फार्मूले से तैयार अठारह हजार कवियों के बूते जल्द ही एक युग का प्रवत्र्तन होने वाला है! यह ये समकालीन कविता का परिदृश्य। भले ही इसे इस रूप में निराशाजनक नहीं कहा जा सकता कि कविता कर रहे समाज में संवेदना होती है, लेकिन उस आरोप का क्या जब कविता समाज में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए की जाए। गोया कविता करना सामाजिक प्रतिबद्धता नहीं होकर ग्लैमर हो गई। लोक-कल्याण की बजाय लोकप्रियता का माध्यम बन गई। किसी युग में युवकों द्वारा शरीर-सौष्ठव का प्रदर्शन इसीलिए किया जा सकता था कि भीड़ से अलग दिखाई दे। इसी तरह एक-दो किताबें प्रकाशित होते ही विद्वान और बुद्धिजीवी का तमगा मिल जाता है। सच तो यह है कि विद्वता और रचनाशीलता का आपस में कोई सीधा ताल्लुक नहीं है। बहुत सारे विद्वान रचनात्मकता के पेेटे सिफर साबित हुए हैं। रचनाशीलता के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है। वाल्मीकी और रामायण के बीच संबंधों की भविष्यवाणी कोई कर सकता था? कबीर कहां पढऩे गए थे? सूर ने कौनसे कृष्ण को देखा था? लेकिन इनके जीवन में रचनाशीलता ने निर्णायक भूमिका निभाई। कहा जा सकता है कि इस रचनाशीलता ने इनके जीवन को कविता बना दिया। कविता के रूप में इन्हें जीवन मिल गया। अनुभूति के जिस स्तर पर इन कवियों ने यात्रा की, सच तो यह है कि उसे भी पूरा व्यक्त नहीं कर पाए। क्योंकि, अन्वेषण और अभिव्यक्ति अदृश्य और अनिवर्चनीय है। यह पूर्णत: व्यक्तिगत है और कोई भी दूसरा व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि फलां व्यक्ति ने इतना पाया और उसमें से इतना ही दे पाया। यहां तो पात्रता स्वयं की है। हां, स्वयं को यह अच्छे से पता चलता रहता है कि उसकी अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों के बीच कितना झोल है। यह कसमसाहट स्तरहीनता के एहसास से जुड़ी होती है। सच्चा रचनाकार इस तरह से अपनी सीमाएं पहचानता है और अपनी रचनात्मकता के जरिये, फिर मैं फिर से फिरकर आता कि तर्ज पर खुद को अभिव्यक्त करता है। इसी को सीमा तोडऩा कहते हैं। इसी को बार-बार एक नए सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया कहते हैं और इस तरह एक से दूसरे सत्य की टोह लेते हुए रचनाकार कई बार खुद को खारिज करता है तो कई बार अब तक के अनुभव को। इसलिए अनुभवों का परिमार्जन जारी रहना चाहिए। अनुभव का फलक जितना व्यापक होगा, अभिव्यक्त नहीं हो पाने का असंतोष उतना ही बढ़ेगा। यह असंतोष अगर रचनात्मक हो जाए तो फिर क्या तो कविता और क्या कहानी। साहित्य की किसी भी विधा में रचे हुए साहित्य को सराहना मिल सकती है। यह जो एक निराशाजनक माहौल है, उसमें आशा का संचार हो सकता है। बस, यह जान लेना जरूरी है कि रचनात्मक होने का कोई शॉर्ट-कट नहीं है। सच तो यह है कि इसका कोई निर्धारित-पैमाना भी नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ चाहने भर से कोई कवि-साहित्यकार बन भी नहीं सकता। सबसे अच्छी बात यह है कि कवि-साहित्यकार होने का दम भरने वाले भी इस सत्य को स्वीकार करते हैं और नैतिक रहते हैं। हम देखते हैं कि भले ही कवियों की संख्या के बारे में कुछ भी कहा जाता रहा हो, लेकिन इन सभी कवियों को यह पता है कि कविता के क्षेत्र में उनकी उड़ान कितनी है।
यहां विज्ञान का शोध पूरी तरह से लागू होता है, जिसमें कहा गया है जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव कम होने लगता है और एक स्थान तो ऐसा आ जाता है, जहां हम स्थिर हो जाते हैं। न ऊपर जा सकते हैं और न नीचे आ सकते हैं। साहित्य में भी ऐसा ही होता है। सामान्य अनुभवों से भले ही हम धरती पर कूद-फांद कर लें। लिख-छप लें, लेकिन अनुभवों का अन्वेषण हमें जिस यात्रा पर ले जाएगा, वहां जाने के बाद स्पेस जैसे हालात पेश आएंगे। यहीं से निकलना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को पार करने वाले की प्रतीक्षा विस्तृत आकाश करता है। इसलिए हर सृजनशील व्यक्ति के लिए जरूरी है कि 'चांदमारीÓ की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है। नाटक- संगीत, नृत्य, शिल्प तथा अन्य ललित कलाओं का भी कोष है, लेकिन काव्य में अनुभूतियों में पिरोए हुए शब्द जन-मन तक पहुंचते हैं।

कविता शब्दों का गुम्फन नहीं

कविता वस्तुत: शब्दों का गुम्फन नहीं है। कुछ अक्षरों का समूह नहीं है, जिसे विराम चिह्नों ने अधिक सुंदर बना दिया हो। कविता को समझने वाले शब्द से शब्द के बीच में बचे हुए खाली स्थान (स्पेस) मेंं से कविता का अर्थ बरामद करते हैं। व्यक्ति के मन में यह खाली स्थान उनका एकांत होता है। यहीं पर प्रकट होता है कि अपनी बात को कहने के लिए कवि कितना उत्साही लेकिन सजग है। समय की अनुगूंज के बीच कवि बहुत सारे रहस्यों पर से भी पर्दा उठाता है। इस दृष्टि को समझना ही विषय की गहराई को समझना है। तेजी से बदलती घटनाओं को कोई कवि जिस तरह से संबद्ध करता है, उसे समझना जरूरी है। वेद-पुराणों के आख्यानों, कला-संगीत के प्रतीकों, बातों-मुहावरों की रोचकता से अपनी बात को रखने वाला कवि अपने साथ इस रूप में एक परंपरा का संवाहक होता है।

कविता मन की तृप्ति का साधन

इन सब में वह एक समूचा जीवन अभिव्यक्ति करता है। कला, संस्कृति, सभ्यता के पुनरावलोकन का अवसर देता है। वह जब किसी घटना या व्यक्ति का उल्लेख करता है तो वह उल्लेख भर नहीं होकर एक पूरा संदर्भ होता है। ये छोटे-छोटे संदर्भ विराट फलक की रचना करते हैं। यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि कई बार कवियों को जागरण का अग्रदूत भी बता दिया जाता है।
कवि अपने मौलिक रूप में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। हां, यह संभव है कि बाजार उसका इस रूप में उपयोग कर ले, लेकिन वस्तुत: एक कवि जन-मन के स्पंदन का कारण सिर्फ उसी अर्थ में बनता है, जब उसे पढ़ा या सुना जाए। कवि किसी के कान में अपनी कविता तो फूंकने से रहा। कवि घर-घर जाकर दूधवाले की बंधी की तरह तो कविताएं बांटने से रहा। कविता तो मन की तृप्ति का साधन है। यह समय जब लोग मन को मारकर बैठे हैं, कविता उन्हें क्या दे सकती है? कविता में तो आदमी स्वयं को ढूंढ़े तो बात बने। जिसने कविता में खुद को पा लिया, उसे जीवन मिल गया। इसलिए हर रचनाकार के लिए जरूरी है कि वह राजनीति की बजाय रचने पर केंद्रित हो। यह दिखाने करने की बजाय कि वह अच्छा लेखक है, अच्छा लिखने की ओर प्रवृत्त हो।

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'दान का महत्व'

एक भिखारी भीख मांगने निकला. उसे एक गृहिणी ने दो मु_ी अनाज दिया. वहां से निकला तो उसने देखा कि राजा की सवारी आ रही है. राजा की सवारी भिखारी के पास आकर रुकी और राजा ने भिखारी से दान मांगते हुए कहा कि राज ज्योतिषी के अनुसार राज्य पर संकट आने वाला है और भिखारी द्वारा दिये गये दान से ही इसका निराकरण संभव है. भिखारी ने झोले में मु_ी डाली और भरी. भरते ही सोचा कि इतना ज्यादा अनाज क्यों दूं और उसने मु_ी गीली कर दी. अब मु_ी में अनाज के दो चार दाने ही थे. उसे लगा इतना भी क्यों दूंज यह सोचकर उसने अन्न का सिर्फ एक दाना निकाला और राजा को सौंप दिया. राजा चला गया. वो खुश था कि उसका अन्न सुरक्षित था. घर जाकर उसने झोला खोला तो वो दंग रह गया. झोले में अन्न के साथ सोने का एक सिक्का भी था. उसे अफसोस हुआ कि यदि वो सारा अन्न दे देता तो उसकी निर्धनता सदा के लिये समाप्त हो जाती. इस सांकेतिक कथा से हमें स्व प्रबंध के निम्नलिखित सिद्धांत सीखने चाहिये-

* दान देने से दीर्घकालीन सुख और संतोष मिलता है. जितना अधिक देते हैं, उससे चौगुना ईश्वर हमें देता है. इस भाव से दान करना चाहिये कि दान लेने वाला दान लेकर हमें कृतार्थ कर रहा है. उदारता से दान करने पर दीर्घ लाभ की प्राप्ति होती है.
* अन्न बिखरना चाहिये. इसका अर्थ है परिवारजनों, प्रेमीजनों और मित्र - बंधुओं से निरंतर मेल - मिलाप और उनके साथ इस भाव से भोजन करना कि भोजन ईश्वरीय प्रसाद है. अन्न बिखरने का तात्पर्य संयुक्त परिवार प्रणाली से भी है. पहले मित्रों से मिलने जाना, यों ही किसी के घर पर हाल - चाल जानने के लिये जाना आम बात थी. अब सिर्फ आभासी दुनिया और सोशियल मीडिया है. इसमें आत्मीयता का अभाव है. जो आत्मीयता मित्र या बंधुजनों के घर जाकर उनके साथ बैठकर वार्तालाप में, भोजन करने में, चर्चा करने में है वो फोन पर चैट करने या गुलाबजामुन का फोटो भेजने में नहीं हो सकती.
* जब भी आप किसी की उन्नति, विकास, या जीवन में बढ़ोतरी हेतु दान करते हैं तो ईश्वर उसका प्रसाद आपको अवश्य ही देता है. जैसा भिखारी को स्वर्ण का सिक्का देकर किया.सकारात्मक उद्देश्यों के लिये किया गया दान सबसे महत्वपूर्ण होता है.
यहां मन्त्र यही है कि खुले दिल से दान करें. जिसे आवश्यकता हो, उसे कुछ देवें. ईश्वर का आभार जतायें कि उसने आपको देने के काबिल बनाया. देने में जो आननद है वो लेने में नहीं है. यही जीवन है.

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चाहने भर से नहीं बन जाता कोई कवि

सृजन सरोकार 
 
सृजनशील व्यक्ति के लिए जरूरी है कि 'चांदमारीÓ की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है। 
विश्व कविता दिवस (21 मार्च) के संदर्भ में इस बात हरीश कर रहे हैं कविता पर बात।  
- हरीश बी.शर्मा
भारतीय साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में जहां कवित्त ही बरामद होता है, उसी देश में आज कविता को सबसे उपेक्षित विधा करार दे दिया गया है। प्रकाशक काव्य-संग्रहों के प्रकाशन को मांग और आपूर्ति के सिद्धांत विपरीत मानते हैं तो मंचों पर चोरी और चुटकले बाजी से आगे बढ़ते हुए मजमेबाजी तक के आरोप कवियों पर लगने लगे हैं। इस दौर में कविता पर आलोचना की जगह व्यंग्य होने लगा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि आकाश में कंकर फेंको, नीचे जिस पर भी गिरेगा-कवि होगा। अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास के सेलिब्रिटी बन जाने से परेशान लोग भले ही आदर्श के रूप में तुलसी, सूर, मीरा, रसखान, निराला, गुप्त, दिनकर के नाम गिनाएं लेकिन कवि सम्मेलनों में आधे से अधिक कवि अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास की शैली की नकल करने वाले फॉलोअर ही मिलते है। 
कुछ लोग जो कविता के माध्यम से कुछ संजीदा करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे किसी को कोई सरोकार नहीं है और यही वजह है कि कवियों के भी जन-सरोकार खत्म होते जा रहे हैं। इस बढ़ती हुई खाई में कुछ ऐसे लोगों की बन आई है, जो ऑन-लाइन कविता सिखा सकते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे गुरुओं ने कविता की कुछ 'झटपट-विधियोंÓ का आविष्कार किया है, जो रातोंरात कवि बनाने का सामथ्र्य पैदा कर सकती है। रोचक तथ्य यह है कि ऐसे लोगों को धन और समर्थन भी खूब मिल रहा है। नव-रचनाकार इनके ईजाद किए हुए फार्मूलों से कविताएं रच रहे हैं, छप रहे हैं और सराहे जा रहे हैं। दावा यह है कि इस इंस्टेट-फार्मूले से तैयार अठारह हजार कवियों के बूते जल्द ही एक युग का प्रवत्र्तन होने वाला है! यह ये समकालीन कविता का परिदृश्य।  
भले ही इसे इस रूप में निराशाजनक नहीं कहा जा सकता कि कविता कर रहे समाज में संवेदना होती है, लेकिन उस आरोप का क्या जब कविता समाज में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए की जाए। गोया कविता करना सामाजिक प्रतिबद्धता नहीं होकर ग्लैमर हो गई। लोक-कल्याण की बजाय लोकप्रियता का माध्यम बन गई। किसी युग में युवकों द्वारा शरीर-सौष्ठव का प्रदर्शन इसीलिए किया जा सकता था कि भीड़ से अलग दिखाई दे। इसी तरह एक-दो किताबें प्रकाशित होते ही विद्वान और बुद्धिजीवी का तमगा मिल जाता है। सच तो यह है कि विद्वता और रचनाशीलता का आपस में कोई सीधा ताल्लुक नहीं है। बहुत सारे विद्वान रचनात्मकता के पेेटे सिफर साबित हुए हैं। 
रचनाशीलता के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है। वाल्मीकी और रामायण  के बीच संबंधों की भविष्यवाणी कोई कर सकता था? कबीर कहां पढऩे गए थे? सूर ने कौनसे कृष्ण को देखा था? लेकिन इनके जीवन में रचनाशीलता ने निर्णायक भूमिका निभाई। कहा जा सकता है कि इस रचनाशीलता ने इनके जीवन को कविता बना दिया। कविता के रूप में इन्हें जीवन मिल गया। अनुभूति के जिस स्तर पर इन कवियों ने यात्रा की, सच तो यह है कि उसे भी पूरा व्यक्त नहीं कर पाए। क्योंकि , अन्वेषण और अभिव्यक्ति अदृश्य और अनिवर्चनीय है। यह पूर्णत: व्यक्तिगत है और कोई भी दूसरा व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि फलां व्यक्ति ने इतना पाया और उसमें से इतना ही दे पाया। यहां तो पात्रता स्वयं की है। 
हां, स्वयं को यह अच्छे से पता चलता रहता है कि उसकी अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों के बीच कितना झोल है। यह कसमसाहट स्तरहीनता के एहसास से जुड़ी होती है। सच्चा रचनाकार इस तरह से अपनी सीमाएं पहचानता है और अपनी रचनात्मकता के जरिये, फिर मैं फिर से फिरकर आता कि तर्ज पर खुद को अभिव्यक्त करता है। इसी को सीमा तोडऩा कहते हैं। इसी को बार-बार एक नए सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया कहते हैं और इस तरह एक से दूसरे सत्य की टोह लेते हुए रचनाकार कई बार खुद को खारिज करता है तो कई बार अब तक के अनुभव को। इसलिए अनुभवों का परिमार्जन जारी रहना चाहिए। 
अनुभव का फलक जितना व्यापक होगा, अभिव्यक्त नहीं हो पाने का असंतोष उतना ही बढ़ेगा। यह असंतोष अगर रचनात्मक हो जाए तो फिर क्या तो कविता और क्या कहानी। साहित्य की किसी भी विधा में रचे हुए साहित्य को सराहना मिल सकती है। यह जो एक निराशाजनक माहौल है, उसमें आशा का संचार हो सकता है। 
बस, यह जान लेना जरूरी है कि रचनात्मक होने का कोई शॉर्ट-कट नहीं है। सच तो यह है कि इसका कोई निर्धारित-पैमाना भी नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ चाहने भर से कोई कवि-साहित्यकार बन भी नहीं सकता। सबसे अच्छी बात यह है कि कवि-साहित्यकार होने का दम भरने वाले भी इस सत्य को स्वीकार करते हैं और नैतिक रहते हैं। हम देखते हैं कि भले ही कवियों की संख्या के बारे में कुछ भी कहा जाता रहा हो, लेकिन इन सभी कवियों को यह पता है कि कविता के क्षेत्र में उनकी उड़ान कितनी है। यहां विज्ञान का शोध पूरी तरह से लागू होता है, जिसमें कहा गया है जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव कम होने लगता है और एक स्थान तो ऐसा आ जाता है, जहां हम स्थिर हो जाते हैं। न ऊपर जा सकते हैं और न नीचे आ सकते हैं। साहित्य में भी ऐसा ही होता है। सामान्य अनुभवों से भले ही हम धरती पर कूद-फांद कर लें। लिख-छप लें, लेकिन अनुभवों का अन्वेषण हमें जिस यात्रा पर ले जाएगा, वहां जाने के बाद स्पेस जैसे हालात पेश आएंगे। यहीं से निकलना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को पार करने वाले की प्रतीक्षा विस्तृत आकाश करता है। 
इसलिए हर सृजनशील व्यक्ति के लिए जरूरी है कि 'चांदमारीÓ की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है। नाटक- संगीत, नृत्य, शिल्प तथा अन्य ललित कलाओं का भी कोष है, लेकिन काव्य में अनुभूतियों में पिरोए हुए शब्द जन-मन तक पहुंचते हैं। कविता वस्तुत: शब्दों को गुम्फन नहीं है। कुछ अक्षरों का समूह नहीं है, जिसे विराम चिह्नों ने अधिक सुंदर बना दिया हो। कविता को समझने वाले शब्द से शब्द के बीच में बचे हुए खाली स्थान (स्पेस) मेंं से कविता का अर्थ बरामद करते हैं। व्यक्ति के मन में यह खाली स्थान उनका एकांत होता है। यहीं पर प्रकट होता है कि अपनी बात को कहने के लिए कवि कितना उत्साही लेकिन सजग है।  समय की अनुगूंज के बीच कवि बहुत सारे रहस्यों पर से भी पर्दा उठाता है। इस दृष्टि को समझना ही विषय की गहराई को समझना है। तेजी से बदलती घटनाओं को कोई कवि जिस तरह से संबद्ध करता है, उसे समझना जरूरी है। वेद-पुराणों के आख्यानों, कला-संगीत के प्रतीकों, बातों-मुहावरों की रोचकता से अपनी बात को रखने वाला कवि अपने साथ इस रूप में एक परंपरा का संवाहक होता है। 
इन सब में वह एक समूचा जीवन अभिव्यक्ति करता है। कला, संस्कृति, सभ्यता के पुनरावलोकन का अवसर देता है। वह जब किसी घटना या व्यक्ति का उल्लेख करता है तो वह उल्लेख भर नहीं होकर एक पूरा संदर्भ होता है। ये छोटे-छोटे संदर्भ विराट फलक की रचना करते हैं।  यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि कई बार कवियों को जागरण का अग्रदूत या क्रांतिचेता भी बता दिया जाता है। कवि अपने मौलिक रूप में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। हां, यह संभव है कि बाजार उसका इस रूप में उपयोग कर ले, लेकिन वस्तुत: एक कवि जन-मन के स्पंदन का कारण सिर्फ उसी अर्थ में बनता है, जब उसे पढ़ा या सुना जाए। कवि किसी के कान में अपनी कविता तो फूंकने से रहा। कवि घर-घर जाकर दूधवाले की बंधी की तरह तो कविताएं बांटने से रहा। कविता तो मन की तृप्ति का साधन है। यह समय जब लोग मन को मारकर बैठे हैं, कविता उन्हें क्या दे सकती है? कविता में तो आदमी स्वयं को ढूंढ़े तो बात बने। जिसने कविता में खुद को पा लिया, उसे जीवन मिल गया। इसलिए हर रचनाकार के लिए जरूरी है कि वह राजनीति की बजाय रचने पर केंद्रित हो। यह दिखाने करने की बजाय कि वह अच्छा लेखक है, अच्छा लिखने की ओर प्रवृत्त हो। 
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आओ 'सुराना जी' से सीखें

विधानसभा में जब मानिकचंद सुराना को श्रेष्ठ विधायक का सम्मान दिया जा रहा था, तब उनके प्रशसंक खुश हो रहे थे लेकिन भाजपा में कई लोगों के चेहरे उदास थे। दरसअल, इस वयोवृद्ध नेता ने कई युवा चेहरों को हराकर विधानसभा में फिर अपना स्थान बनाया था। ऐसे में उनके प्रतिद्वंद्वियों का नाराज होना तो जायज था। कुछ नेता इस बार भाजपा से टिकट लेना चाहते हैं, वो भी सुराना की इस उपलब्धि से ज्यादा खुश नहीं हो रहे थे, उन्हें लगा कि सुराना वापस पार्टी में आए तो उन्हें नुकसान हो सकता है। किसी का खुश होना और नाराज होना अपनी जगह है लेकिन मानिक चंद सुराना के व्यक्तित्व, राजनीतिक जीवन और उनकी दृढ़ता से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनका सम्मान वर्ष २०१४ के लिए हुआ है लेकिन उनकी लड़ाई और हर लड़ाई में जीत उनके लंबे राजनीतिक जीवन का हिस्सा है। ऐसे में सिर्फ वर्ष २०१४ तक उन्हें सीमित करना भी उचित नहीं है। कई बार शिकायतों के चलते कार्यकर्ता और वोटर उनसे नाराज भी होते हैं लेकिन हर बार वो किसी न किसी जन मुद्दे पर ही अपनी शिकायत को अंजाम देते हैं। सुराना की लड़ाईयों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने किसान, गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आवाज उठाई है। पिछले दिनों उन्हें सम्मान मिलने के बाद सोशल मीडिया में यह मुद्दा भी उठाया गया कि लूणकरनसर में विकास नहीं हो रहा। वो शायद यह भूल रहे हैं कि उसी लूणकरनसर से दूसरे विधायक भी निकले हैं, मंत्री भी बने हैं लेकिन जो दर्जा इस क्षेत्र को मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला। सुराना के कार्यकाल पर सवाल तो उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक इच्छा शक्ति पर सवाल उठाना बेमानी है।

बधाईयों में भी राजनीति है

अब बधाई तो बधाई है, लेकिन सोशल मीडिया पर बधाई में भी राजनीति नजर आती है। कई बड़े नेताओं के बड़े सिपहसालार फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर सक्रिय है। वो हर रोज कुछ न कुछ पोस्ट करते हैं लेकिन करते वो ही है, जो उनके नेताजी को पसंद हो। न सिर्फ वो पोस्ट करते हैं बल्कि पार्टी को किनारे रखकर अपने नेताजी के विचारों का ही समर्थन करते हैं। अब राज्यसभा की सीटों की घोषणा होने के बाद कई नेताओं ने बधाई बांटी लेकिन इसमें राजनीति साफ नजर आई। जिस तरह के शब्दों का उपयोग हुआ, उसका उनकी ही पोस्ट पर जमकर विरोध भी हुआ।

अब धर्मयात्रा की चर्चा

बीकानेर में एक बार फिर धर्मयात्रा को लेकर चर्चा जोरों पर हैं। १८ मार्च को होने वाली इस धर्म यात्रा को लेकर उन नेताओं के लिए हर बार उहापोह की स्थिति बन जाती है, जो हिन्दू धर्म यात्रा में शामिल तो होना चाहते हैं लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित अन्य संगठनों के झंडे के नीचे नहीं आना चाहते। आयोजक बार बार इसे गैर राजनीतिक बता रहे हैं लेकिन राजनीति है कि आड़े आ ही जाती है। पिछली बार भी इस इस यात्रा में सभी पार्टियों के लोग शामिल हुए थे और इस बार भी सभी को जोडऩे का प्रयास है। अच्छी बात देखने को मिली कि विचारधारा को किनारे रखकर इस यात्रा का वैभव बढ़ाने के लिए कई दिग्गज नेताओं के परिजन सार्वजनिक मंच पर भी आए हैं। यात्रा अच्छा संदेश दे, सद्भाव को बढ़ावा दें यह सभी चाहते हैं। प्रशासन भी ऐसा ही कुछ चाहता है।

रैली में कितने गए?

पिछले दिनों झुंझुनूं में प्रधानमंत्री की रैली के लिए बड़ा जबर्दस्त अभियान चलाया गया। हर कोई बसों के दावे करता रहा, कोई चार बस तो कोई पांच बस के लिए दावे कर रहा था। हकीकत यह थी कि जितनी बसें बीकानेर से जयपुर लिखवाई गई थी, उतनी बसें तो जिला परिवहन अधिकारी के रिकार्ड में ही नहीं थी। वैसे भी दबाव इसी महकमें पर था कि वो बसों की व्यवस्था करे। आला अधिकारियों ने कुछ बड़े नेताओं के दबाव में बसों का जुगाड़ भी करवाया लेकिन इसके बाद भी सुबह सवेरे तैयार हुए कार्यकर्ताओं को बसों के अभाव में वापस लौटना पड़ा। अब सवाल यह है कि अगर बस परिवहन विभाग ने नहीं भेजी तो अपनी ही कर लेते। कुछ नेता अपनी 'पर्सनलÓ कार से गए भी और फेस बुक पर लाइव भी चलाया कि हम जा रहे हैं।

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'साध्य और साधन'

एक गांव के आठ साधु नदी पार करने के लिए नाव पर चढ़े। नदी के उस पार देवालय था जहां उन सभी को पूजन करना था। कुछ देर बाद वे दूसरी ओर पहुंच गये। नाव से उतरकर उन्होंने तय किया कि नाव ने नदी पार करवाकर उन सभी पर अहसान किया है। अत: उन्हें इस अहसान का आभार जताना चाहिये। उन्होंने कृतज्ञता ज्ञापन का एक अद्भुत तरीका खोज निकाला। उन्होंने कहा कि उचित यही होगा कि जिस नाव पर वे सवार थे, अब वह नाव उन सभी पर सवार हो जाये। सो उन आठों साधुओं ने नाव को अपने सिर पर उठा लिया और चल दिये। वे बाजारों, गलियों आदि में घूमे। जनमानस ने उन्हें मूर्ख की उपाधि दे दी। उन साधुओं ने जनमानस को मूर्ख बताते हुए कहा कि सभी जन कृतघ्न हैं और उपकार के बदले आभार जताने का महत्त्व ही नहीं समझते हैं। 

यह सांकेतिक कथा है। यहां नाव एक साधन है, नदी को पार करने का। नाव का तो निर्माण ही नदी पार करवाने के लिये हुआ है। उसे अपने सिर पर उठाकर घूमने का क्या लाभ? इसका अर्थ है कि हम साधनों के प्रति अपनी दीवानगी इस कदर बढ़ा चुके हैं कि हमें साध्य यानि वास्तविक लक्ष्य पर पहुँचने का तो भान ही नहीं रहता। यहां साधुओं के लिये साध्य यानि लक्ष्य था देवालय पहुंचकर पूजन करना। वे इसी साध्य को भुला बैठे और साधनों को ही साध्य समझने की भूल कर बैठे।
आपकी और हमारी भी गत कुछ इस प्रकार की ही है। मकान, पैसा, गाड़ी, कम्प्यूटर, फिक्स डिपोजिट आदि साधन है। इनसे जीवन सुखमय बनता है। लेकिन क्या इन्हें प्राप्त कर लेना ही जीवन है? मकान, पैसे, गाड़ी आदि को लेकर हमारी दीवानगी इस स्तर की है कि यदि हमारे घर के आगे कोई अनजान व्यक्ति कुछ क्षणों के लिये गाड़ी पार्क कर देवे तो भी हम असहज हो जाते हैं। जीवन का वास्तविक लक्ष्य संसाधनों का भंडारण नहीं है। जीवन का लक्ष्य संसाधनों को ढ़ोना भी नहीं है। वर्तमान में हम संसाधनों को ढ़ो रहे हैं। जीवन का लक्ष्य है सुविधाओं का त्यागपूर्वक उपभोग। सुविधाओं का प्रयोग अवश्य करें लेकिन निर्लिप्त भाव के साथ। संसाधन आज मेरे हैं लेकिन कल मेरे नहीं रहेंगे : यही भाव प्रेरणा देता है। 'तेन तक्तेन भुंजीथाÓ भी यही है। यहां मन्त्र यही है कि सुविधाओं और संसाधनों के भंडारण के स्थान पर लक्ष्य अर्थात मानव कल्याण की बात सोचना और उसकी क्रियान्विति करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।

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सेहत के डर का कारोबार

- ऋचा तोमर -
आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान, दोनों ही यह स्थापित करते हैं कि जल ही जीवन है। इसमें कोई शक नहीं है कि सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर आज तक जल का महाभूत के रूप में प्रमुख स्थान रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से साफ पानी को ही जीवन माना जाने लगा है। नि:संदेह जीवन के लिए पानी जितना जरूरी है, स्वस्थ रहने के लिए साफ पानी भी उतना ही आवश्यक है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए छुटपुट उपायों के साथ-साथ विज्ञान में कई शोध हुए हैं, लेकिन सबसे लोकप्रिय तकनीक का नाम है- आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) तकनीक। 
संभ्रांत और मध्यम वर्ग से होते हुए आरओ अब आम घरों तक पहुंच चुका है। क्या आरओ के इस विस्तार को  वैज्ञानिक क्रांति माना जा सकता है? इस सवाल का जवाब जितना विज्ञान के पास है उससे कहीं अधिक बाजार के पास है। विज्ञान के नजरिये से देखें तो आरओ तकनीक से साफ किए गए पानी में टीडीएस (टोटली डिजॉल्व सॉलिड्स) काउंट यानी अशुद्धियों की मात्रा पांच से 40 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) होती है जबकि इंसान के पीने के पानी में अशुद्धियों की मात्रा 500 पीपीएम तक सुरक्षित मानी जाती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या इंसान को स्वस्थ रहने के लिए आवश्यकता से अधिक साफ पानी पीने की जरूरूत होती है? 
इस विषय पर विज्ञान ने खूब मंथन किया है। कई वैज्ञानिकों ने इस पर शोध किए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी इस मसले पर एक रिपोर्ट पेश कर चुका है। इन सभी अध्ययनों का निष्कर्ष एक ही है- बिना ‘अशुद्धियों’ वाला आरओ का पानी मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। दरअसल, आरओ में पानी साफ करने की जो तकनीक काम आती है वह शुद्ध और अशुद्ध तत्वों में भेद नहीं करती। वह दोनों प्रकार के तत्वों को ‘साफ’ कर देती है। यहां तक कि पानी में से 92 से 99 प्रतिशत तक मैग्नीशियम और कैल्शियम सरीखे तत्व भी साफ हो जाते हैं। इससे हृदय संबंधी समस्याएं, थकान, कमजोरी और मांसपेशियों में खिंचाव जैसी परेशानियां होना आम बात है। डब्ल्यूएचओ ने तो अपनी रिपोर्ट में यहां तक चेतावनी दी है कि कुछ महीनों के लिए भी आरओ के पानी को पीने के लंबे समय तक दुष्परिणाम होते हैं।  
भारत में भी आरओ के पानी पर कई शोध हुए हैं। पंजाब के स्वास्थ्य व विज्ञान विश्वविद्यालय में हुए ताजा शोध में भी आरओ तकनीक से साफ किए गए पानी को सेहत के लिए सही नहीं बताया। इसमें कहा गया है कि आरओ के पानी का पीएच मान (अम्लीय या क्षारीय होने की माप) सामान्य पानी से कम होता है यानी यह पानी सामान्य पानी की तुलना में अम्लीय होता है। इन शोधकर्ताओं ने भी यह दोहराया कि इस पानी से मिनरल्स निकाल दिए जाते हैं इसलिए टीडीएस काउंट कम हो जाता है। इससे शरीर में बहुत से मिनरल्स की कमी हो जाती है, जिसके कई दुष्परिणाम होते हैं। इसके जवाब में यह तर्क दिया जाता है कि मिनरल्स इंसान को भोजन से भी मिल जाते हैं इसलिए पानी में मिनरल्स की जरूरत नहीं होती, लेकिन यह अद्र्धसत्य है। भोजन से भी शरीर को मिनरल्स मिलते हैं मगर इनकी तुलना पानी से मिलने वाले मिनरल्स से नहीं की जा सकती। वैज्ञानिक यह साबित कर चुके हैं कि पानी में आयोडीन और मैग्नीशियम के कुछ ऐसे संयोजन होते हैं जो शरीर में भोजन से मिलने वाले मिनरल्स और इलेक्ट्रोलाइट्स को एब्जार्ब करने के लिए जरूरी होते हैं। इनकी अनुपस्थिति में भोजन से मिलने वाले मिनरल्स भी बिना इस्तेमाल हुए शरीर से बाहर निकल जाते हैं। 
विज्ञान तो इस मत पर लगभग एकराय है कि हमें स्वस्थ रहने के लिए आरओ जितने साफ पानी की जरूरत नहीं है, लेकिन बाजार की स्थिति इसके एकदम उलट है। आरओ बनाने वाली कंपनियां दावा करती हैं कि आरओ का पानी ही ‘शुद्ध’ होता है और ‘स्वस्थ’ रहने के लिए इसका ही इस्तेमाल करना चाहिए। लुभावने विज्ञापनों के जरिये उन्होंने अपनी यह बात जनमानस तक पहुंचा दी है। आरओ कंपनियां अब तो ‘हर-हर आरओ, हर-घर आरओ’ की तर्ज पर काम कर रही हैं। कनाडा की वाटरलू यूनिवर्सिटी ने इस बारे में हाल ही में एक रोचक अध्ययन किया है। इसमें कहा गया है कि पूरी दुनिया में शुद्ध पानी के कारोबार में शामिल कंपनियां इंसान को मरने का भय दिखाकर अपना उत्पाद बेचती हैं। पहले यह बताया जाता है कि अशुद्ध पानी के प्रयोग से कैसे मरने तक की नौबत आ सकती है। फिर यह बताया जाता है कि उनकी कंपनी का शुद्ध पानी पीकर आप कैसे अपना जीवन बचा सकते हो। यानी ये व्यक्ति को वैज्ञानिक रूप से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से निशाने पर लेते हैं। 
लोगों के डर का फायदा छोटी कंपनियां ही नहीं उठातीं, बल्कि स्थानीय स्तर के व्यापारी भी इससे खूब मुनाफा कमाते हैं। आज हर शहर और कस्बे में आरओ के पानी की आपूर्ति करने वाले कारोबारी हैं। इनमें और भी बड़ा गड़बड़झाला है। यहां से शुद्ध के नाम पर ठंडा और कैमिकल मिलाकर स्वादिष्ट पानी बेचा जाता है। यह पीने में भले ही अच्छा लगे, लेकिन सेहत के लिए अशुद्ध माने जाने वाले पानी से भी ज्यादा खतरनाक है। इससे कई गंभीर बीमारियां होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। यहां न तो साफ-सफाई का कोई ध्यान होता है और न ही पानी को सामान्य मानी जानी वाली तकनीक से फिल्टर किया जाता है। 
दुनिया के कई देश आरओ पर प्रतिबंध लगा चुके हैं, लेकिन भारत में इसका कारोबार खूब तरक्की कर रहा है। कई जगह तो सरकार ने सार्वजनिक आरओ प्लांट तैयार किए हैं। यहां मामूली दरों पर लोगों को आरओ का पानी मिलता है। क्या आरओ पर हुए वैज्ञानिक शोध सरकार के संज्ञान में नहीं हैं? सरकार को सब पता है, लेकिन वह इसे नजरअंदाज कर रही है और भविष्य में भी शायद ही इस ओर गौर करे। देश की राजनीति में इस प्रकार के मुद्दों पर विमर्श की जगह ही कहां है? संसद से लेकर सडक़ तक वे ही मुद्दे हावी हैं जो वोट बटोर सकें। शुद्ध पेयजल न तो कभी राजनीति के केंद्र में रहा है और न ही कभी होने की संभावना है। 
डर दिखाकर उत्पाद बेचने का यह कारोबारी कौशल पानी ही नहीं, कई उत्पादों पर लागू होता है। इस बार सर्दियों में दिल्ली को स्मॉग का सामना करना पड़ा था। इससे सांस की बीमारी से ग्रसित लोगों को तो समस्या आयी ही, जो स्वस्थ थे उन्हें भी सांस लेने में काफी तकलीफ हुई। बच्चों के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े इसलिए कई दिनों तक स्कूल बंद रहे। स्मॉग के आते ही बाजार में कई कंपनियों के ‘एयर प्यूरिफायर’ आ गए। इनका दावा है कि एक बिजली से चलने वाले छोटे से उपकरण को घर अथवा दफ्तर में लगाकर प्रदूषित हवा से बचा जा सकता है। क्या वाकई में ऐसा संभव है? कई वैज्ञानिक ‘एयर प्यूरिफायर’ की प्रामाणिकता पर सवाल उठा चुके हैं। विज्ञान ने अभी तक ऐसा कोई उपकरण नहीं बनाया है जो बटन दबाते ही खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो चुकी हवा को शुद्ध और ताजा कर सके। असल में लोगों को सावचेती से ऐसे उत्पादों का उपयोग करना चाहिए। लकीर का फकीर बनने की बजाय उत्पाद के गुण-दोष देखकर ही उस पर भरोसा करना चाहिए। 
(लेखिका शारदा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)
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