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मूल समस्या समझना आवश्यक

चार नेत्रहीन व्यक्तियों को को एक हाथी के समक्ष छोड़ दिया गया। एक ने हाथी के कान पर स्पर्श कर कहा कि यह तो बहुत बड़ी टोकरी है। दूसरे ने पंूछ पकड़ी और खा कि यह एक रस्सी है। तीसरे ने पैर पकड़ा और उसे खम्भा बताया। चौथे ने पेट पर हाथ लगाकर कहा कि यह तो बहुत बड़ा टैंक है। अब चारों आपस में अपने अपने मत को लेकर भिड पड़े। तब वहां एक समझदार व्यक्तिने उन चारों को समझाया कि वे सब अपनी अपनी जगह सही हैं लेकिन वास्तव में यह एक हाथी है।

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जब राधाकृष्णनन के भाषण का अनुवाद छगन मोहता ने किया

बात 1959 की है जब श्री बीकानेर महिला मण्डल स्कूल के शिलान्यास का समारोह तत्कालीन उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णनन के मुख्य आतिथ्य में हुआ था। राधाकृष्णनन को तमिल और अंग्रेजी ही बोलनी आती थी। इसलिए समस्या यह थी कि राधाकृष्णनन के भाषण को कौन अनुवादित कर उनकी बात जनता तक पहुॅंचाएं। तत्कालीन जिला कलक्टर और अन्य अधिकारियों ने डूंगर कॉनेज और एमएस कॉलेज सहित कईं कॉलेज व्याख्याताओं व शहर के अंग्रेजी विद्वानों से संपर्क किया लेकिन किसी ने भी राधाकृष्णनन के अंग्रेजी भाषण का अनुवाद करने की हां नहीं भरी।

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उद्यमेव जयते

दो बीज मिट्टी में पड़े थे। पहले बीज ने जब दूसरे से कहा कि हमें बाहर निकलकर वट वृक्ष बनना है अत: हमें जमीन को फाड़कर बाहर निकलना चाहिये। दूसरा बीज महाआलसी था। उसने कहा कि बाहर की मिट्टी, हवा, चिलचिलाती धूप और जंगली जानवर हमसे बनने वाले पौधे को नष्ट कर देंगे अत: हमें जमीन में ही पड़ा रहना चाहिये। पहला बीज पुरुषार्थी था। धरती का सीना चीरकर आगे बढ़ा, सूर्य से रोशनी ली, जल लिया, वायु का संपर्क लिया और वट वृक्ष बन गया। इस वट वृक्ष ने सैंकड़ो वर्ष तक मानव कल्याण का कार्य अपने फलों, छाया व शुद्ध हवा को देकर किया। यही सच्चा पुरुषार्थ है। दूसरा बीज जमीन में ही पड़ा रहा और नष्ट हो गया। ज़मीन में पड़े बीज को कोई नहीं जानता। पुरुषार्थी बीज वृक्ष बना, हज़ारों बीजों का उत्पादक बना और समाज हेतु काम आया। उसे हम याद करते हैं। यही जीवन का सार है। शास्त्र कहता है - 'हे पुरुष तू पुरुषार्थ कर, यह धर्म है तेरा अमरÓ। ये पंक्तियाँ हमें नित्य प्रति मेहनत करने और आलस्य को त्यागने का सन्देश देती हैं। हमारे भारतीय चिंतन के अनुसार यदि हमें स्वर्ग और नरक देखने हों तो यह कहना उचित है कि उद्यम स्वर्ग है और आलस्य कुम्भीपाक नरक। भर्तृहरि के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है। जऱा इन वाक्यों पर गौर करें:

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मेन्टल फिल्टर्स

यदि ईश्वर ने सभी को सामान शक्ति, ऊर्जा और सामथ्र्य देकर भेजा है तो अधिकांश जन इस शक्ति का भरपूर उपयोग क्यों नहीं कर पाते हैं? ऐसा क्या है जो हमें उत्कृष्ट बनने से रोकता है? यह यक्ष प्रश्न हैं। एक सुन्दर नौजवान शादी के मंडप में बैठा। संस्कारी, सुन्दर, अच्छा कमाने वाला युवक। स्वयं से खुश। तभी उसने यह पाया कि दुल्हन की लम्बाई उतनी नहीं थी जितनी उसने सोच रखी थी। वहीं से दूल्हा तनावग्रस्त हो गया। दुल्हन जो अच्छी पढी लिखी, संस्कारी, श्रेष्ठ परिवार की, जान पहचान वाली उत्तम चरित्र की युवती थी लेकिन दूल्हे को केवल उसकी लम्बाई कम होना ही नजर आ रहा था। यहाँ हमें यह समझना चाहिये कि ऐसा क्यों हुआ? ऐसा होने की वजह है हमारे दिमाग के भीतर एक मेन्टल फिल्टर का लगा होना जो लगातार विचारों को फिल्टर करता रहता है। यह फिल्टर उसी सूचना या डेटा को मस्तिष्क में जाने देता है जिसे आप सही या अनुकूल मानते हैं। यहाँ दूल्हे ने सकारात्मक गुणों के स्थान पर एकमात्र लम्बाई के पहलू पर ही गौर किया। यहां दूल्हे का फिल्टर केवल लम्बाई के गुण पर टिका था अत: उसने वही देखा। हम सिर्फ वही सुनना, देखना या समझना चाहते हैं जो हमारे फिल्टर के अनुसार सही हों। जरा सोचिये, आपको यह विश्वास है कि :

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परिवार ही सर्वोपरि

भारतीय समाज में परिवार को सर्वोच्च और सर्वोपरि माना गया है। एक दिन जब मैं अपनी पत्नी को मशहूर गायिका की गौरवशाली जीवनी बता रहा था। जीवनी सुनने के बाद पत्नी ने संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि उसे गायिका पर इसलिये दया आ रही है क्योंकि गायिका के पास पैसा, बल सम्मान तो है लेकिन उसका कोई परिवार ही नहीं है। यह सुनकर मुझे लगा कि सब कुछ हो जाने के बाद भी यदि परिवार न हो तो सब कुछ बेकार है। इससे मैंने यह समझ लिया कि कष्ट, समस्या और परेशानी के काल में जो संबल देता है वह परिवार ही है। अत: हमें परिवार की छोटी छोटी खुशियों का विशेष ख्याल रखना चाहिये। जरा स्वयं से प्रश्न पूछें कि :-

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कह दिया, जो कविता को कहना था...

मेरी बात कविता के एक बड़े पाठक की उस जिज्ञासा से शुरू होती है, जब वह अपनी पसंद के एक कवि को पढ़ते हुए उसमें रीपीटेशन की शिकायत एक अन्य कवि से करते हुए अपना सवाल रखते हैं। पाठक को जवाब मिलता है कि तुम ठीक कह रहे हो। फलां कवि खुद की कविताओं में अपने पहले कहे हुए को ही रीपीट कर रहा है, क्योंकि अब कविता के माध्यम से कुछ कहा जाना शेष नहीं रहा है। कविता के माध्यम से जो कुछ कहा जाना था, वह कह दिया गया है। अब तो सिर्फ तरीका है कि आप अपनी बात को कैसे कहते हैं। इन दो विद्वानों के बीच हुई बात मुझे तुरंत पांच हजार साल पहले रचे महाकाव्य 'जय संहिताÓ तक पहुंचा देती है। जय संहिता, जो बाद में महाभारत के नाम से लोकप्रिय हुई। इस गंं्रथ के रचयिता वेदव्यास ने पहले श्लोक में लिखा है कि जो जय में है, वह सृष्टि में है और जो सृष्टि में नहीं है, वह जय में भी नहीं है।

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जाने भी दो यारो से अनुपम खेर का गायब होना

हिन्दी सिनेमा पर बहुत सी किताबें लिख चुके जय अर्जुन सिंह ने जाने भी दो यारो पर लिखी अपनी एक किताब में ये बताया कि इस फिल्म में अभिनय करने वाले गुणी लोगो में से एक अनुपम खेर भी थे। फिल्म में डिस्को किलर नाम के साइको का एक बेहद दिलचस्प किरदार अनुपम खेर के हिस्से में आया। उस समय तक अनुपम को सारांश नही मिली थी और ये उनकी पहली फिल्म होने जा रही थी। शूटिंग करते हुए बाकी सभी अभिनेताओं को अनुपम से रश्क हो गया। इतना खूबसूरती से डवलप किया हुआ किरदार जिसमे अभिनेता के हिस्से में बहुत कुछ आया था और अनुपम खेर उम्दा नही तो कम से कम इतना बुरा अभिनेता भी नही था। सबको यही लग रहा था कि फिल्म रिलीज के बाद इसी रोल की सबसे ज्यादा चर्चा होने वाली है।

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कामचोर घटिया कार्मिक

एक बार एक संगठन में काम करने वाले सभी कछुओं ने पिकनिक मनाने की सोची. प्लान बनाने में, पिकनिक स्थल को चुनने में और स्थल तक पहुंचने में छह दिन लग गये. पिकनिक स्थल पर पहुंचने पर जब सारा सामान जमाया गया तो पता चला कि नमक और चीनी तो लाना ही भूल गये. नमक और चीनी बिना क्या स्वाद आता. अब यह निर्णय लिया गया कि सबसे जूनियर कछुए को नमक और चीनी लेने भेज दिया जाये. सबसे जूनियर कछुए ने यह शर्त रखी कि उसके वापस लौटने तक कोई अन्य कछुआ भोजन न करे. सभी ने मान लिया. जूनियर कछुआ चला गया. घंटों बीत गये लेकिन कछुआ न लौटा. एक दिन बीत गया फिर भी कछुआ न लौटा. अब सीनियर कछुए के भूख के मारे प्राण निकलने लगे और उसने खाना प्रारंभ किया. ज्यों ही सीनियर कछुए ने खाना शुरू किया तो खोखले पेड़ में छिपा जूनियर कछुआ बाहर निकला और कहने लगा कि वह जानता था कि सीनियर उसका इंतजार नहीं करेंगे अत: वह नमक और चीनी लेने गया ही नहीं.
इस कथा से मैनेजर्स को निम्न लिखित सिद्धांत सीखने चाहिये :

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सोशल मीडिया पर किचकिच

सोशल मीडिया ने जहां नेताओं के लिए प्रचार के रास्ते खोले हैं, वहीं जनता को भी एक जरिया दे दिया, जहां वो तुरंत प्रभाव से अपनी बात कह देते हैं। कई बार अच्छी बात कमेंट बॉक्स में होती है तो कई बार भड़ास डॉट कॉम।

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और कुंदन ने कहा जाने भी दो यारों

फिल्मकार कुंदन शाह का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनकी अंतिम फिल्म 2014 में आई पी से पीएम तक थी पर हम सभी उन्हें उनकी बनाई दो फिल्में जाने भी दो यारो और कभी हाँ कभी ना के लिए हमेशा याद रखेंगे। ये दो फिल्में लंबे समय तक उनके नाम के साथ टिमटिमाएँगी। 1983 से लेकर 2014 के 31 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने केवल आठ फिल्में और तीन सीरियल बनाये। विधु विनोद चोपड़ा की निर्देशक के रूप में बनी पहली फिल्म खामोश की स्क्रिप्ट लिखी और दूरदर्शन के लिए नुक्कड़, ये जो है जिन्दगी और वागले की दुनिया जैसे लाजवाब सीरियल बनाये। जाने भी दो यारो के बाद टीवी के सक्रिय रहे और फिर 1993 में कभी हाँ कभी ना के साथ फिल्मो में वापसी की। इसके बाद के कुंदन शाह को न जाने तो ही बेहतर। इसके बाद आई उनकी फिल्में क्या कहना, हम तो मोहब्बत करेगा, दिल है तुम्हारा, एक से बढ़कर एक जैसी फिल्मों को देख कर किसे यकीन होगा कि इसी निर्देशक ने 1983 के साल को क्रिकेट का विश्वविजेता बनने के अलावा इस वजह से भी याद करने का मौका दिया कि इस साल क्लासिक कल्ट जाने भी दो यारो रिलीज हुई थी। 
कुंदन शाह ने फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, पुणे से निर्देशन का कोर्स किया था और इस संस्थान से ये उनका प्रेम ही था कि विवादों से हमेशा दूर रहने वाले शाह ने इस संस्थान के छात्रों की हड़ताल को सप्पोर्ट करने के लिए जाने भी दो यारो के लिए मिले नेशनल अवार्ड को लौटाने की घोषणा की थी और अब उनके निधन पर ट्विटर के वीर लोगो द्वारा बेहद असंवेदनशील टिप्पणी की जा रही है और उसे बड़ी निर्ममता के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है। हम बची खुची संवेदनाओं को भी खत्म करते जा रहे है। किसी की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने की बजाय छीटाकशी होना बेहद शर्मनाक है। भक्ति और विरोध की आड़ में हम धीरे धीरे सभी शिष्टाचार, नैतिकता और तर्क को भूलते जा रहे है। कुंदन शाह और जाने भी दो यारों से जुडे लोग वो है जिन्होंने हमें आज तक हंसने और सोचने का मौका दिया है। इस फिल्म को बनाने में किसी बड़े निर्माता का हाथ नही था। एनएफडीसी के सहयोग से बनी इस फिल्म को बनाने में लगे सात लाख रुपये जुटाने में भी टीम को पसीना आ गया। सभी कलाकारों ने अपनी और से फिल्म को सहयोग दिया। फिल्म में फोटोग्राफर बने नसीर का कैमरा नसीर का ही था और शूटिंग के दौरान ही चोरी हो गया था। आज कौन यकीन करेगा कि इस फिल्म के लिए नसीर को केवल पंद्रह हजार रुपये मिले। जब नसीर को पंद्रह हजार ही मिले तो पंकज कपूर, रवि वासवानी, ओम पुरी, सतीश शाह को कितने कम पैसे मिले होंगे, अंदाजा लगाना आसान है। इस फिल्म को थिएटर की मशहूर सख्शियत रंजीत कपूर ने अभिनेता सतीश कौशिक के साथ मिलकर लिखा था। जब रंजीत कपूर ने सतीश कौशिक को इस फिल्म में अपने साथ लिखने को कहा तो सतीश कौशिक का कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में चैक साइन करने के अलावा कभी कुछ नही लिखा पर रंजीत कपूर को उसके ऊपर विश्वास था। रंजीत कपूर ने अपने मिले छह हजार रुपये में से सतीश को लिखने के तीन हजार दिए और इस तरह अभिनय के दो हजार मिलाकर कुल पांच हजार रुपये उसे मिले। कुछ इसी तरह की आपसी सहूलियत से फिल्म बनकर तैयार हुई। फिर आया प्रीमियर का दिन। कुंदन शाह ने फिल्म के प्रीमियम के फ्री पास किसी भी कलाकार को नही दिए माने हर अभिनेता और तकनीशियन को अपनी ही फिल्म को देखने के लिए टिकट खरीदनी पड़ी। प्रीमियर के बाद कोई पार्टी नही हुई, जैसा कि आम तौर पर होता है। सब खाना खाने अपने अपने घर को ही गए। सतीश कौशिक बताते है कि वो उस रात स्टेशन के पास एक छोटे से ढाबे में गए और कहते भी है कि उस रोटी जैसा स्वाद उन्हें फिर न आया। रंगमंच और रंगकर्म संस्कारित करता है। ऐसे उदाहरण आदमी की गहराई को बताता है। इस गहराई और कमिटमेंट को फिल्म देखते हुए हम महसूस कर सकते है। ये फिल्म यारी दोस्ती में बनी थी। एक दूसरे को उत्साहित करते हुए बनी थी। नसीर और रवि के किरदारों के नाम तक फिल्म के दो सहायक निर्देशक विधु विनोद चौपडा और सुधीर मिश्रा के नाम से विनोद-सुधीर रखे गए थे। आज इस गुणी टीम का कप्तान भी चला गया है। ओमपुरी और रवि वासवानी पहले ही जा चुके है। इन सभी बड़े शहरी से दिखने वाले लोगो में अभी भी कस्बा जिन्दा है। ये कस्बाई जमीन के लोग इस एक एक करके हो रहे बिछोह को किस तरह देखते होंगे। संघर्ष के दिन और उन दिनों के साथी हमें बेहद अजीज होते है और
विदा तो हमेशा से दुखदाई होती है। हर विदाई व्यक्तिगत आख्यानो की अनुगूंज से भरी होती हैं।
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