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'ईश्वर सदा साथ'

एक केकड़ा समुद्र के किनारे-किनारे चल रहा था। उसके चलने के कारण रेत पर उसके पैरों के सुन्दर निशान बनते जा रहे थे। उन कलात्मक निशानों को देखकर वो फूला नहीं समा रहा था। तभी अचानक सागर की एक लहर आई और उसने केकड़े के पैरों से बने सभी सुंदर निशानों को मिटा दिया। केकड़ा लहर को भला-बुरा कहने लगा और इस बात पर आपत्ति जताने लगा कि लहर ने निशानों को क्यों मिटाया? केकड़े ने लहर को अपना शत्रु करार देते हुए कहा कि लहर उसके द्वारा बनाये गये कलात्मक पद चिन्हों से जलती है अत: उसने निशान मिटा दिये। लहर ने शांत चित्त से उत्तर देते हुए कहा कि एक मछुआरा केकड़े के पद चिन्हों का लगातार पीछा कर रहा था। यदि लहर इन निशानों को न मिटाती तो शायद केकड़ा अब तक मछुआरे द्वारा पकड़ा जा चुका होता और अपनी जान गंवा चुका होता। केकड़े को पश्चाताप हुआ। 

* यह सांकेतिक कथा जीवन में भी लागू होती है। यह शाश्वत सत्य है। ईश्वर कभी भी हमें अकेला नहीं छोड़ता। वो किसी न किसी रूप में हमारी रक्षा करता है। यहां ईश्वर ने लहर बनकर केकड़े के जीवन की रक्षा की। इसी को मारवाड़ में 'भगवान आडो आवेÓ कहा जाता है।
* रिश्तों में पूर्वाग्रह रखना कष्टप्रद हो सकता है। कई बार आप सोचते कुछ हो लेकिन होता कुछ और है। आप किसी के लिये पहले से ही धारणाएं बना लेते हैं। किसी के मन की सच्चाई जाने बिना, उस व्यक्ति का प्रयोजन जाने बिना उसके बारे में पहले से राय न बनायें। कई बार हम जाति, लिंग, आयु, समाज आदि के आधार पर पूर्वाग्रह पाल लेते हैं। यही तो समस्या है। इससे बचिये। बिना शोध के कुछ भी स्वीकार न करें। केकड़े का पूर्वाग्रह भी कुछ इसी प्रकार का था।
* माता-पिता कई बार हमसे हमारे भले के लिये कुछ कहते हैं। कई बार स्वर में तल्खी भी होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें हमसे प्रेम नहीं है। इसका अर्थ है कि उन्हें हमारी बहुत ज्यादा परवाह है। क्या आपने कभी भी अपने माता-पिता को रेल में, बस में या सार्वजनिक स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को टोकते हुए देखा है? शायद नहीं। यही तो आपके प्रति परवाह कहलाती है। परवाह करने वाले मित्र-बन्धु मिलते ही कहां हैं? इनकी कद्र कीजिये। इन्हें अपना शत्रु या आजादी में बाधक मानने की भूल न करें।
यहां मन्त्र यही है कि रिश्तों से पूर्वाग्रह निकालिये और ईश्वर पर विश्वास रखिये। जीवन सुखमय रहेगा। यही सत्य है।

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'आदर्श और फैशन'

* एक शराब के तस्कर पर बनी फिल्म ने रिकॉर्ड कमाई की।
* अंडरवल्र्ड डॉन पर बनी फिल्में सुपरहिट रही हैं।
* वर्तमान में नशा करने वाले, हथियार रखने के कारण जेल में रहने वाले अभिनेता पर बनी फिल्म हिट रही है।
* अब पोर्नस्टार पर फिल्म निर्माणाधीन है।
ये एक संकेत है। समाज कैसा बनना चाहता है? समाज का आदर्श कौन है? समाज किसकी नकल कर रहा है? यदि समाज में सम्मान टैक्स चोरोंए पोर्नस्टार्सए अपराधियों का होगा तो इनके जैसा बन जाना फैशन बनता चला जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि यह मनोरंजन है। आप भी यही कहेंगे कि यह तो मनोरंजन मात्र है। इसका आपके मस्तिष्क पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यह सोच तो ठीक नहीं है। कई विश्वविद्यालयों ने शोध के द्वारा 'अवचेतन मन के परसेप्शनÓ की व्याख्या की है जिसके अनुसार अवचेतन मन पर प्रभाव तो पड़ता ही है। यदि ऐसा न होता तो वषों पूर्व एक सिनेमा को देखकर सैकड़ों प्रेमी युगल घर से न भागे होत। एक फिल्म में नायक ने गले पर खोद-खोद कर अपना नाम लिखा था। उसे कॉपी करते हुए कई युवा घायल हुए थे।
हम समझते हैं कि यह सब व्यवसाय है। व्यवसाय में नैतिकता की उम्मीद करना मुश्किल होता जा रहा है। हम सभी यह समझ चुके हैं कि व्यवसाय 'ईगोइस्मÓ के सिद्धांत पर चल रहा है जिसका अर्थ है कि मेरा मुनाफा हो जाये, मैं सुखी हो जाऊं, शेष से मुझे सरोकार नहीं है। जिस समाज में 'ईगोइस्मÓ फैशन है, वहां राष्ट्रप्रेम, निर्बल की सेवा और देश के लिये कुछ कर गुजरने का भाव पैदा करना मुश्किल होता जायेगा।
जरा सोचिये कि:
* देशप्रेम फैशन कब बनेगा?
* शहीदों के चित्र हमारे घरों की दीवारों की शोभा कब बढ़ाएंगे? फिल्म स्टार्स के बजाय इन्हें राष्ट्र नायक माना जाना फैशन कब बनेगा?
* बाल विवाह नहीं करनाए दहेज नहीं लेना, मृत्यु भोज को नकारना फैशन कब बनेगा?
* निकृष्ट व्यक्तियों को नायक नहीं मानकर उन्हें दुत्कारना फैशन क्यों नहीं बन पा रहा?
* स्त्री संरक्षणए आर्थिक रूप से सशक्त महिला बनकर राष्ट्र की सेवा करना फैशन क्यों नहीं है?
* देशभक्तों की कथाओं को सुनाना, उनसे सीखना, अपनी संतान को राष्ट्र गौरव का पाठ पढ़ाना फैशन कब बनेगा?
* हेयर स्टाइल संवारने के बजाय ब्रेन की स्टाइल सुधारना फैशन क्यों नहीं है?
जरा सोचिये कि यदि हमारे आदर्श और प्रेरणा स्रोत ही चोर, डकैत, देशद्रोही, टैक्स को खुर्द-बुर्द करने वालेए बदमाश व्यक्ति होंगे तो समाज भी तो उन्हीं के जैसा बनेगा? समाज जिसका सम्मान करता है, व्यक्ति वैसा ही बनना चाहते हैं। यह शाश्वत सत्य है। यहां मन्त्र यही है कि राष्ट्र और समाज के लिये कुछ कीजिये। यही जीवन को सार्थक बनाता है।

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'बुजुर्ग और युवा'

एक प्रतापी राजा था। उसने बड़ी मेहनत और लगन से अपना राज्य स्थापित किया था। इस कारण उसे राज कार्य से मोह था। उसका युवा पुत्र अब सर्वगुणसंपन्न था और राजा के पद को धारण करने के योग्य था। राजा पुत्र को बच्चा समझता था और मोह के चलते उसे उत्तराधिकारी घोषित नहीं कर रहा था। समस्त मंत्रियों के कहने पर भी राजा नहीं माना। एक दिन उस राज्य के राजगुरु ने राजा को सत्ता हस्तांतरण के लिये कहाण् राजगुरु ने कहा कि यदि समय रहते युवाओं को सत्ता नहीं सौंपोगे तो नष्ट हो जाओगे। अहंकार से भरे राजा ने कहा कि उसने अपनी बुद्धि, तप, श्रम और योग्यता से राज्य को बनाया है। उसका तो यमराज भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसी क्षण आसमान से बिजली गिरी और महल की छत का एक पत्थर राजा के सिर पर आकर गिरा। राजा की मृत्यु हो गई।
कथा विचार करने पर मजबूर करती है। भारतीय परिवारों में क्लेश की एक बड़ी वजह यह भी है कि बुजुर्ग जन रिटायरमेंट लेना ही नहीं चाहते। उम्दराज हो चुके हैं, अपनी पारी खेल चुके हैं लेकिन उन्हें यह विश्वास ही नहीं है कि उनकी संतान अब योग्य हो चुकी है और उस पर भार डालना भी आवश्यक है। अस्सी साल के पार बुजुर्ग व्यक्ति फिक्स्ड डिपोजिट के हिसाबए विवाह में साथियों और वस्त्रों के लेन- देन के हिसाब और किसके ससुराल से कितनी मिठाई आई आदि समीकरणों में उलझे पड़े हैं। अब इन्हें छोडऩे का समय है। यह काम अपने पुत्रों, नाती-पोतों को करने देवें। यदि ऐसा नहीं किया तो पुत्र, पुत्रियां आदि. बुजुर्गों को जबरन रिटायर करके मार्गदर्शक मंडल में बिठा देंगी। यह दर्दनाक होता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि बुजुर्गों का सम्मान न हो। वे देव समान है। उनकी इज्जत करना युवाओं का धर्म है। समस्या सिर्फ यही है कि बुजुर्गों को भी यह समझना चाहिये कि अब स्थान को रिक्त करने का समय आ चुका है। महत्तवपूर्ण मामलों पर परामर्श देवें लेकिन हर छोटी बात में पार्टिसिपेट करना कष्टप्रद हो सकता है। भारतीय समाज में वानप्रस्थ का अर्थ वन में जाना नहीं था। इसका अर्थ था-सत्ता और निर्णय लेने के अधिकारों का हस्तांतरण। यह आवश्यक है। यहां मन्त्र यही है कि युवाओं पर विश्वास
रखें। उनसे गलती हो तो 'शॉक एबजोर्बरÓ बनें। उन्हें सिखायें। गाइड करें। ये सब करें लेकिन समय पर उन पर जिम्मेदारी का बोझ डालना न भूलें। यही परिवार प्रबंध का मूल हैं।

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'कार्यस्थल की आलोचना न करें'

मेरा का भाव होना, संगठन को अपना खुद का संगठन मानना ही अभिप्रेरणा या मोटिवेशन का मर्म है। जब आप यह महसूस करते हैं कि संगठन परिवार की तरह ही है तभी आप उसमे कुछ अच्छा योगदान दे पाते हैं। यह मेरा संगठन है और मैं इस संगठन का जिम्मेदार सदस्य हूं। भारतीय प्रबंध प्रणाली में इसे सर्वोत्कृष्ट मोटिवेशन माना जाता है। भारतीय प्रबंध प्रणाली में मोटिवेशन केवन आंतरिक होता है और यह अन्दर से बाहर की ओर यात्रा करता है। 

संगठन से जुड़ाव अत्यावश्यक है। अपनत्व की कमी के कारण वर्तमान कर्मचारी, संगठन के साथ जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता और डी - मोटिवेट होता जाता है। कर्मचारी अन्यजनों के समक्ष अपने संगठन की बुराई, अपने संगठन की समस्याओं के विषय में बड़े ही आनंद से चर्चा करता है।
जरा सोचिये-
* यदि आप आज अपने संगठन से टूट जायें या निकाल दिए जायें तो आपकी पहचान क्या होगी?
* संगठन को आपकी जरूरत है या आपको संगठन की?
* यदि आपका संगठन इतना ही नाकारा, घटिया और वाहियात है और आप सभी के सामने चटखारे लेकर उसकी बुराई कर रहे हो तो प्रश्न यह है कि आप जैसा श्रेष्ठ, सज्जन, कर्मठ, जीवट महामानव व्यक्ति इस घटिया संस्थान में क्या कर रहा है?
* क्या आप अपने माता पिता, परिवार और घर की आलोचना अन्यों के समक्ष करते हो? क्यों नहीं करते? क्योंकि आप यह जानते हो कि स्वयं के परिवार की आलोचना तो स्वयं की आलोचना है। तो यह बात अपने संस्थान के लिए लागू क्यों नहीं करते?
* जिस संस्थान से हमें समस्त सुख मिलते हैं, जिस संस्थान के कारण हमारी टेबल पर भोजन आता है, हमारे बच्चों की फीस भरी जाते है, हमारे स्नेहीजनो को चिकित्सा सुविधा प्राप्त होती है और हम उसी संस्थान को बुरा कहते हैं?
यहां मन्त्र यही है कि आपको पहचान, पैसा, और सामाजिक इज्जत देने वाला और कोई नहीं बल्कि आपका वही संगठन है जहां आप काम करते हैं। संगठन के हित को ही अपना हित मानें। यही कार्यालय प्रबंध का मर्म है।

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'जहां न पहुंचे रवि' उक्ति नहीं, चुनौती है कवि को : हरीश बी. शर्मा

सूर्य की पहुंच से भी अधिक तीव्रता से, गहरे तक और विस्तार से पहुंचने की क्षमता है तो वह कवि है। संकट यह है कि, थी तो यह चुनौती और इसे कीर्ति मान लिया गया। कवि को सूर्य से बड़ा मान लिया गया जबकि सूर्य से तो उसकी दौड़ थी। उसे सूर्य से आगे निकलना था।

सृजनधर्मी होने के नाते एक मानवीय-आग्रह होता है कि हमारी पहचान के आगे भी कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार या ऐसा ही कोई संबोधन लगे। इस संबोधन के पीछे मूल-भावना यही होती है कि उस व्यक्ति को उस रूप में पहचाना जाए। जैसे किसी के आगे डॉक्टर, इंजीनियर या मेजर लग जाता है तो उसके क्षेत्र का मोटा-मोटा अंदाजा हो जाता है। उसी तरह एक सृजनधर्मी भी अपने होने का अंदाजा इस रूप में देता है कि वह लिखता तो है, लेकिन दक्षता उसकी फलां-फलां विधा में है। यह दक्षता ही कालांतर में विशेषज्ञता बन जाती है। इतना ही नहीं, बहुत सारे लोग तो अपने आगे उपाधियां और विशेषण तक जोड़ लेते हैं। हां, कुछ मामलों में उनके अनुयायियों द्वारा भी यह कृत्य किया जाता है, जिसे बड़ी सहजता से ग्रहण भी कर लिया जाता है। अगर एक रचनाकार का मन है। सृजन का संकल्प है तो इस तरह के आग्रहों से जो जितना बच पाएगा, श्रेष्ठ रच पाएगा। कविता या कहानी करना एक बात है, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इतना करना सभी का हक है, लेकिन इस हक में अपने आपको कवि या कहानीकार के रूप में स्थापित करने का हठ कहीं भी शामिल नहीं है। इतिहास में देखें, किसी भी सृजनधर्मी ने खुद को कवि या कहानीकार नहीं कहा। मिलता है तो सिर्फ यह कि जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि और इस कथन के साथ कवि के सामने एक बड़ी चुनौती मिलती है। दरअसल, यह उक्ति है ही नहीं। यह आह्वान है कि जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि यानी कवि वहां पहुंचे, जहां तक रवि भी नहीं पहुंच पाए।
इस रूप में एक सूत्र-वाक्य मिलता है कि अगर किसी में सूर्य की पहुंच से भी अधिक तीव्रता से, गहरे तक और विस्तार से पहुंचने की क्षमता है तो वह कवि है। संकट यह है कि, थी तो यह चुनौती और इसे कीर्ति मान लिया गया। कवि को सूर्य से बड़ा मान लिया गया जबकि सूर्य से तो उसकी दौड़ थी। उसे सूर्य से आगे निकलना था।
          जैसे ही इस सत्य का पता चलता है, स्वयं को कवि कहने वाले अंदर तक कांप जाते हैं। इतना बड़ा लक्ष्य! सूर्य के तो स्थूल प्रभावों को भी पार करना संभव नहीं है, ऐसे में अगर सूर्य के सूक्ष्म और सिर्फ वैज्ञानिक प्रभावों की ही बात करें तो क्या किसी कवि की क्षमता है, उससे आगे निकलने की? वहां जाने की जहां अब तक सूर्य नहीं पहुंचा हो? अगर नहीं है तो कैसे हम इन संबोधनों में स्वयं को सहज रख सकते हैं?
तो, तय यह हुआ कि अगर हमें कवि कहलाना है तो पहले सूरज को हराना होगा। सूरज से आगे निकलना होगा। कुछ ऐसी अभिव्यक्ति देनी होगी, जहां तक अभी तक कोई इंसान तो क्या सूरज भी नहीं पहुंचा हो। फिर, समाज खुद ही कह देगा कि आप कवि हैं। कहानीकार या व्यंग्यकार है। अगर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो सृजन की उत्कट आकांक्षा लिए लेखन को धर्म मानकर कर्मरत रहना अच्छी बात है, लेकिन फल मिलने से पहले ही खुद को महिमामंडित कर देना प्राणघातक ही नहीं, आत्मघाती भी है। सनद रहे! यहां प्राण और आत्मा का अभिप्राय किसी व्यक्ति के सृजनधर्मी होने से है, सामान्य-व्यक्ति के रूप में इस बात को फिलहाल लागू करने का फिलहाल मंतव्य नहीं है।
इसलिए कर्म करते रहें। सृजनरत रहें। अभिव्यक्ति होते रहें। एक फिल्मी गीत है ना 'गाना आए या ना आए गाना चाहिए...Ó कि तर्ज पर जरूरी नहीं कि कविता, कहानी आए ही आए। करते रहें, क्योंकि यह संवेदनशील मन की निशानी है, लेकिन खुद ही खुद पर कवि होने का ठप्पा लगाने से बचें। यह काम समाज के लिए छोड़ दें। समाज में जब मानवीयता खत्म हो रही है। अपराध बढ़ रहे हैं तो कविता ही है तो करुणा को स्वर देगी। कोई बात नहीं। आज नहीं बनी है तो कल बन जाएगी कविता। परेशान मत होइये। समय से बड़ा न्यायाधिकारी कोई नहीं है। समय स्वयं तय करेगा कि उसे किसने सही-सही अभिव्यक्त किया। क्योंकि उसे भी अपने समय में एक कवि चाहिए। इसलिए इस आग्रह से मुक्ति पा लीजिये कि आप अपने समय के सबसे बड़े कवि हैं। टॉप-टेन हैं या हंडे्रेड-वन हैं। किसी युग में हैं या युग्म में।
         बहुत जल्द ही पता चल जाने वाला है कि यह सब ढकोसले थे। असली सृजन तो कुछ और ही था। जो मौन भाव से हो रहा था। भवभूति का धैर्य देखिये ना, उन्होंने कहा था-होगा कोई जो सदियों बाद आएगा और मेरी कविता को समझेगा। समझा गया ना भवभूति को। आज भी उन्हें याद किया जाता है। जरूरत है भवभूति के उस विश्वास की, जिस के चलते उन्हें पता था कि वे जो रच रहे हैं कालजयी है, लेकिन हड़बड़ाहट नहीं थी।
अब यह जरूरी नहीं कि जो लिखा जाए वह तात्कालिक रूप से सभी को समझ आ ही जाए। फिर इस बात को भी ध्यान में रखें कि समझ में नहीं आने का कारण सिर्फ ना-समझी ही नहीं होती। अधिक समझदारी भी इसके बड़े कारणों में से एक है। ऐसे हालात में विचलन, हताशा या कुंठा की जरूरत नहीं। ना ही ढिंढोरा पीट-पीटकर यह जताने की कोशिश की जाए कि उसका रचा हुआ इस-इस तरीके से श्रेष्ठ है। यह जिम्मेदारी समाज की है, क्योंकि यह सब खुद के लिए नहीं रचा। समाज के लिए रचा गया है। सदियों के लिए रचा है। जैसे ही कवि को लगता है, वह खुद के लिए रच रहा है। दंद-फंद में लग जाता है या लगा दिया जाता है। लिखते ही छपना, छपते ही चर्चा में आना, चर्चा में आते ही कवि बन जाना, कुछ इनाम-इकराम का बंदोबस्त जुटाना।
अगर किसी को समाज कवि के रूप में प्रतिष्ठा नहीं देता तो इन सब का कोई मोल नहीं है। मोल समाज की मान्यता का है। बेहतर रचा जाएगा तो देर-सवेर ही सही, मान्यता भी मिलेगी और प्रतिष्ठा भी। आज नहीं तो कल समाज कहेगा। अगर नहीं कहेगा तो मान लीजिये, अभी बहुत कुछ करना बाकी है। समाज सूरज को भी जानता है और कवि को भी, उसे यह समझाने की कोशिश बेमानी है कि कविता क्या होती है।

'कहानी की तलाश में कहानी'
बीकानेर आकाशवाणी ने श्रोताओं को जोडऩे के लिए एक बार फिर से कहानी विधा को सहारा लिया है। 'कहानी की तलाश में कहानी' कार्यक्रम का प्रसारण शुक्रवार को किया जाएगा, जिसमें कहानी को गीत-संगीत के प्रभाव के साथ प्रस्तुत किए जाने की योजना है।

निर्मल और रईस का सम्मान

उत्तर पश्चिम रेलवे के मुख्य अभियंता निर्मल कुमार शर्मा का पिछले दिनों जयपुर में तबादला हो गया। अपने नाम के अनुरूप व्यवहार वाले निर्मल कुमार शर्मा मधुर कंठ के कवि हैं और काफी सराहे जाते हैं। उनके सम्मान में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन नालंदा पब्लिक स्कूल के सृजन सदन में प्रज्ञालय संस्थान व बीकानेर साहित्य-संस्कृति कला संगम की ओर से किया गया। इन्हीं दोनों संस्थानों की ओर से 30 जून को 'मै शबाना' नाम से चर्चित उपन्यास के रचयिता यूसुफ रईस का बीकानेर आगमन पर अभिनंदन किया गया।

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'ईश्वर सर्वश्रेष्ठ मित्र'

एक फार्म में दो घोड़े रहते थे। वे एक से दिखते थे लेकिन उनमे से एक घोड़ा अंधा था। मालिक ने एक दूसरे घोड़े के गले में एक घंटी बांध रखी थी। घंटी की आवाज सुनकर अंधा घोड़ा उसके पास पहुंच जाता और उसके पीछे - पीछे बाड़े में घूमता। घंटी वाला घोड़ा भी अपने अंधे मित्र की परेशानी समझता था और उसका पूरा ख्याल रखता था। वह बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखता और इस बात को सुनिश्चित करता कि कहीं अंधा घोड़ा रास्ता न भटक जाये। वह ये भी सुनिश्चित करता कि उसका मित्र सुरक्षित रहे। 

इसी को कहते हैं 'ईश्वर की मददÓ। ईश्वर कष्ट में पड़े जीव को कभी भी अकेला नहीं छोड़ता। ईश्वर मनुष्य का सबसे अच्छा मित्र होता है। हम भले ही नासमझी में ईश्वर को भला-बुरा कहें लेकिन वो कभी भी, किसी भी स्थिति में हमारा साथ नहीं छोड़ता। यदि कोई मुसीबत है तो वो उसका समाधान अवश्य ही देता है। दृष्टिहीन घोड़े में एक ही कमी थी कि वो देख नहीं सकता था। ईश्वर ने उसे 'अनअटेंडेडÓ नहीं छोड़ा। उसकी समस्या का भी निराकरण किया। उसे मित्र दिया जो उसकी मदद करता था। ईश्वर हमारा पूरा ख्याल रखता हैं। कवि प्रेम भाटिया कहते हैं-
तू मेरा कितना ख्याल रखता है,
मेरे ख्याल का भी ख्याल रखता है,
जमाना कहता है तुझमें बड़ा कमाल है,
मुझे तो सब कुछ ही कमाल लगता है.
हमें जब भी जरुरत होती है, तो वो किसी न किसी को हमारी मदद के लिए भेज देता हैं। कभी-कभी हम वो अंधे घोड़े होते हैं, जो भगवान द्वारा बांधी गयी घंटी की मदद से अपनी परेशानियों से निजात पाते हैं तो कभी हम अपने गले में बंधीघंटी द्वारा यानि अपनी कुशलता द्वारा दूसरों को रास्ता दिखाने के काम आते हैं। यही तो जीवन है। मदद करो और मदद दो। यदि दोनों ही काम न किये तो जीवन का क्या मोल है? यहां मन्त्र यही है कि ईश्वर पर विश्वास रखें। वो गलत नहीं कर सकता। वो जो करता है, सही है। इसी को मानने से जीवन सुखद और संतुलित रहता है।

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पश्चिम में बदलेगा समीकरण

क्या बीकानेर पश्चिम में भारतीय जनता पार्टी समीकरण बदलने के मूड में है? क्या किसी ऐसे समीकरण पर पार्टी विचार कर सकती है, जिस पर अब तक कोई बड़ा काम नहीं हुआ है। दरअसल, बीकानेर पश्चिम में भाजपा के दावेदारों में एक नाम आता है महावीर रांका का। महावीर रांका नगर विकास न्यास के चैयरमेन है। वर्तमान में बीकानेर पश्चिम विधानसभा सीट पर दोनों ही बड़ी पार्टियां किसी न किसी ब्राह्मण वो भी पुष्करणा को टिकट देती रही है। शहर के भीतरी क्षेत्र में पुष्करणा बाहुल्य होने के कारण माना जाता रहा है कि इस सीट पर पुष्करणा नेता ही जीत सकता है, क्योंकि तीन दशक पहले मानिक चंद सुराना को जीती हुई बाजी में हार देखनी पड़ी थी। हालांकि इसके बाद समीकरण बदल गए, परिसीमन ने इस सीट को सर्वाधिक प्रभावित किया। जो क्षेत्र पहले श्रीकोलायत विधानसभा में आते थे, वो अब बीकानेर पश्चिम का हिस्सा हो गए। जिसमें श्रीगंगाशहर और भीनासर शामिल है। इन दोनों क्षेत्रों में वैश्य और माली समाज का बोलबाला है। वहीं बीकानेर पश्चिम के कुछ हिस्से में पहले से वैश्य समाज के वोट है। माना जा रहा है कि महावीर रांका और उनकी टीम इसी आधार पर बीकानेर पश्चिम से अपनी दावेदारी जता सकती है। भाजपा के एक गुट ने स्वयं टिकट की दावेदारी को प्रमुखता से आगे रखा है और इस गुट को अगर टिकट नहीं मिलता है तो वो रांका का नाम आगे कर सकते हैं। रांका भी इन दिनों शहर के भीतरी क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाए हुए हैं। रात-रात भर पाटों पर बैठकर हथाई करने के साथ ही भोजन भी पाटों पर हो रहा है। शहर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रामकिसन आचार्य भी पार्टी से दावेदार है, फिर भी उनका पूरा स्नेह रांका को मिल रहा है। हालांकि 'नेशनल राजस्थानÓ से बातचीत में कहा कि वो टिकट के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पार्टी आदेश करेगी, वो स्वीकार है। टिकट देगी तो लड़ेंगे, नहीं तो दूसरे प्रत्याशी के साथ जुटेंगे।

कांग्रेस के बढ़ गए टिकट दावेदार

हालांकि कांग्रेस के बजाय भाजपा में टिकट दावेदारों की संख्या अधिक है लेकिन कांग्रेस में भी धीरे धीरे टिकट दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। बीकानेर की सातों विधानसभा क्षेत्रों में बीकानेर पश्चिम और नोखा को छोड़ दें तो शेष पांचों सीटों पर दावेदारों की संख्या एक दर्जन तक पहुंच रही है। सबसे बड़ी भिडंत खाजूवाला में होने जा रही है, जहां गोविन्दराम मेघवाल के सामने टिकट मांगने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। नोखा में रामेश्वर डूडी और बीकानेर पश्चिम में बी.डी. कल्ला के सामने में टिकटार्थियों की संख्या कम है। लूणकरनसर में पूर्व गृह राज्य मंत्री वीरेंद्र बेनीवाल और नोखा में मंगलाराम के सामने भी कई लोग टिकट के लिए अंदरखाने कोशिश कर रहे हैं।

युवा चेहरे अभी भी कम

कांग्रेस में युवा चेहरों की कमी अभी भी खल रही है, वहीं भाजपा में टिकट पाने के इच्छुक लोगों में युवाओं की कतार ज्यादा लंबी है। कांगे्रेस में युवाओं का एक बड़ा गुट नोखा विधायक रामेश्वर डूडी के साथ है। स्वयं डूडी नोखा से दावेदार है, ऐसे में उनके सामने कोई भी टिकट पाने की इच्छा नहीं रखता। वहीं दूसरी तरफ भाजपा में युवा चेहरे सर्वाधिक सामने आए हैं। इनमें बीकानेर पश्चिम से अविनाश जोशी सबसे युवा चेहरा है। इसके अलावा लूणकरनसर से डॉ. भागीरथ मूंड भाग्य आजमा रहे हैं। वहीं हनुमान बेनीवाल के साथ राजनीतिक मैदान में उतरे विजयपाल बेनीवाल भी किसी विधानसभा क्षेत्र से भाग्य आजमा सकते हैं। यह दोनों कॉलेज स्तर की राजनीति से निकल आए जनप्रतिनिधि है, जिन्होंने पार्टियां तो अलग अलग चुनी है लेकिन फेन फॉलोविंग दोनों की बेहतर है।

दो युवा नेताओं का अनोखा ब्याह

एक तरफ जहां राजनीति में दिखावा बढ़ गया है। बात बात पर लाखों रुपए खर्च करने वाले युवाओं के बीच बीकानेर में दो नेताओं ने बहुत ही प्रेरणास्पद काम किया है। कुछ महीने पहले भाजपा के युवा चेहरे डॉ. भागीरथ मूंड ने अपने विवाह में दहेज तो दूर सामान्य खर्चों पर भी पूरी तरह लगाम लगा दी। बहुत ही साधारण परिवेश में शादी करके डॉ. भागीरथ ने जहां युवाओं को प्रेरित करने वाला काम किया, वहीं हनुमान बेनीवाल के साथ जुड़े विजयपाल बेनीवाल ने कुछ दिन पूर्व ही अपने विवाह में ऐसी ही सादगी दिखाई। विवाह में आने वाले लोगों को पेड़ पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया गया। इतना ही नहीं कुछ रीति रिवाज में तो पौधे लगाने का ही संकल्प लिया गया। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर विवाह के उपलक्ष्य में न सिर्फ पौधारोपण करवाया बल्कि इन पौधों को पेड़ के रूप में बड़ा करने के लिए तमाम व्यवस्थाओं को भी पुख्ता किया है। बीकानेर के इन दो चेहरों को देखकर लगता है कि राजनीति में सुधार का दौर जारी है। अब इन दो चेहरों को देखकर ही अन्य को सीख लेनी चाहिए। न सिर्फ राजनीति में बल्कि सामाजिक रूप से भी स्वयं को इतना सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए कि आने वाली पीढिय़ां उनका उदाहरण दे सके। राजनीति को जो लोग आय का माध्यम समझते हैं, उन्हें सामाजिक उदाहरण भी पेश करने चाहिए। यहां तक कि राजनीतिक दलों को भी ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। दागी नेताओं को टिकट देने के बजाय ऐसे सामाजिक काम करने वाले नेताओं को किसी ने किसी तरह लाभान्वित करना चाहिए ताकि आने वाली पीढिय़ां भी सामाजिक सरोकारों के साथ आगे बढ़ती हुई नजर आए, न कि गुंडागर्दी और अवसरवादिता के कारण पहचानी जाए।

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'गृहिणी - देश का गौरव'

एक व्यक्ति को कहीं से खजाना मिल गया। उसे लगा कि यदि उसकी पत्नी को यह पता चल गया तो शायद वो सारे मोहल्ले में इसका ढिंढोरा पीट देगी। पत्नियों पर बेकार के चुटकुले पड़-पड़ कर उस व्यक्ति ने यह धारणा बना ली थी कि महिलाएं धन की प्रेमी होती हैं। यह सोच कर उस व्यक्ति ने खजाने को अपने बरामदे मे गाड़ा और फिर उसपर मिट्टी डालने लगा। तभी उसकी पत्नी वहां पहुंची। उसने पूछताछ की तो पति ने खजाने के बारे में बताया। पत्नी का जवाब भारतीय राष्ट्र जीवन की महान परंपरा और गृहिणी के त्याग को दर्शाता है। पत्नी बोली कि 'यह तो अवैध तरीके से कमाया धन है। यह धन हमारे लिये मिट्टी है। आप इस मिट्टी पर और मिट्टी क्यों डाल रहे होÓ? यह है हमारे राष्ट्र की गृहिणी। 

भारतीय गृहिणियों का त्याग, उनका बलिदान, उनकी कार्यक्षमता और अद्भुत श्रम कर सकने की ताकत का तो विदेशी भी लोहा मानते हैं। वर्तमान में अनेकानेक मीडिया साधनों में पत्नियों पर जोक्स, चुटकुले आदि भेजने का चलन या ट्रेंड सा बन गया है। यह सही नहीं है। भारतीय गृहिणियां बचत, सेवा, संस्कार और त्याग की जीवंत देव प्रतिमाएं हैं। यह शाश्वत सत्य भी है। भारतीय समाज में नारी और विशेषतया पत्नी को सदा से ही उच्च स्थान प्राप्त है। सिन्धु घाटी सभ्यता में सर्वाधिक मूर्तियां स्त्रियों की मिली हैं। इतिहासकार कहते हैं कि सिन्धु घाटी सभ्यता मातृसतात्मक थी यानि महिलाओं का प्रभुत्व था। वैदिक काल को खंगालने पर पता चलता है कि महिलाएं सक्रीय रूप से सामजिक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भागीदारी निभाती रही हैं। भारतीय बौद्ध शास्त्रों में गृहिणी या पत्नी के चार रूप बताये गये हैं-
1. मातृसमा अर्थात जो सभी के साथ सद्व्यवहार करे और माता के सामान व्यवहार रखे।
2. भागिनीसमा अर्थात जो सभी से भाई-बहन जैसा स्नेह रखे और सदा अन्यों की प्रसन्नता हेतु स्वयं का सुख न्योछावर करे।
3. चोरसमा अर्थात जो सम्पत्ति केन्द्रित हो और उपभोग करने मात्र को श्रेयस्कर समझे।
4. बधिकसमा अर्थात क्रोधी और अन्यों का अपमान करने को तत्पर।
भारतीय समाज में सिर्फ मातृसमा या भागिनीसमा गृहिणियां होती हैं। विदेशी उपभोक्तावाद से प्रभावित चोरसमा गृहिणियां परिवार को एक सूत्र में पिरो नहीं पाती। वर्तमान समय में यह सोचा जाना अनिवार्य है कि हमारा व्यवहार कैसा है? स्वान्त: सुखाय यानि सिर्फ मैं सुखी हो जाऊं तो विदेशी परम्परा है। यहां मन्त्र यही है कि भारतीय गृहिणी तो आज भी घर, समाज और राष्ट्र के कल्याण को ही सर्वोपरि मानती है। देश के विकास में इनकी सबसे बड़ी भूमिका है।

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'पति, पत्नी और क्रोध'

एक सिद्ध फकीर था। एक दिन फकीर से मिलने एक व्यक्ति पहुंचा। फकीर घर पर नहीं था। उस व्यक्ति ने जब फकीर की पत्नी से फकीर के बारे में पूछा तो पत्नी ने भड़ककर जवाब दिया कि उसका निखट्टू निकृष्ट पति तो जंगल में लकडियां काटने गया है। व्यक्ति को लगा कि इतने सिद्ध फकीर की पत्नी ऐसी कैसे है? वह व्यक्ति फकीर की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। थोड़ी ही देर बाद उसे फकीर नजर आया लेकिन फकीर को देखकर वो व्यक्ति डर गया। फकीर के साथ-साथ एक चीता था जिस पर फकीर ने अपनी लकडिय़ों का ग_र लाद रखा था। व्यक्ति ने फकीर से कहा कि उसकी पत्नी तो उसे निकृष्ट कह रही थी और फकीर तो चमत्कारी है। ऐसा कैसे हुआ? फकीर बोला कि यदि वो अपनी पत्नी के क्रोध और दुव्र्यवहार का बोझ नहीं उठाये तो क्या यह चीता उसके सामान का बोझ उठाएगा? इसका भावार्थ यह है कि चीता इसलिए बोझ उठा रहा है क्योंकि फकीर ने क्रोध पर नियंत्रण कर रखा है। उसका भाव शुद्ध सात्विक निर्मल है। उसके मन में किसी के लिये द्वेष नहीं है। इसीलिए चीता उसका बोझ भी उठा रहा है। 

यही तो सुखी दाम्पत्य का अद्भुत सूत्र है। क्रोध पर नियंत्रण रखने मात्र से नब्बे फीसदी समस्याएं तो वैसे ही समाप्त हो जाती हैं। क्रोध आते ही विचार कीजिये कि यदि भावुकता में जबरदस्त प्रतिक्रिया दे दी जाये तो क्या कुछ फयदा होगा? शायद नहीं। सिर्फ नुकसान होगा। क्लेश बढेगा। छिद्रान्वेषण शुरू हो जायेगा और गलतियां निकालने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जायेगी। सुखी दाम्पत्य के लिये आवश्यक है कि :
* सहन करना सीखिये। उन बातों को सहन कीजिये जिन पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। इसे अन्यथा न लेवें। इसका अर्थ सिद्धांतों से समझौता नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन साथी को हर पल एक कंट्रोलर की तरह कंट्रोल करने की प्रवृत्ति से छुटकारा। कुछ लिबर्टी देंवे अर्थात खुला भी छोड़ें। कुछ गलतियों को नजरअंदाज करना भी सीखें।
* रिश्ते बोझ नहीं हैं। उन्हें ढोने की नौबत न आ जाये। इसके लिये जरूरी है एक दूसरे को समझना, और विपरीत बातों और विचारों को भी अपनाने का प्रयास। असहमति होना आम बात है। असहमत अवश्य होवें। मतभेद भी होने देवें परन्तु असहमति इतनी ज्यादा न बढ़ावें कि ईष्र्या और युद्ध की नौबत आ जावे।
यहां मन्त्र यही है कि दाम्पत्य जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम एक दूसरे के विपरीत विचारों को भी समझें। डिसएग्री (असहमत) होने के लिये एग्री (सहमत) हो जाना और असहमति होने के बावजूद कलह न होने देना ही सुखद दाम्पत्य का प्राण सत्व है।

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'पति, पत्नी और क्रोध'

एक सिद्ध फकीर था। एक दिन फकीर से मिलने एक व्यक्ति पहुंचा। फकीर घर पर नहीं था। उस व्यक्ति ने जब फकीर की पत्नी से फकीर के बारे में पूछा तो पत्नी ने भड़ककर जवाब दिया कि उसका निखट्टू निकृष्ट पति तो जंगल में लकडियां काटने गया है। व्यक्ति को लगा कि इतने सिद्ध फकीर की पत्नी ऐसी कैसे है? वह व्यक्ति फकीर की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। थोड़ी ही देर बाद उसे फकीर नजर आया लेकिन फकीर को देखकर वो व्यक्ति डर गया। फकीर के साथ-साथ एक चीता था जिस पर फकीर ने अपनी लकडिय़ों का ग_र लाद रखा था। व्यक्ति ने फकीर से कहा कि उसकी पत्नी तो उसे निकृष्ट कह रही थी और फकीर तो चमत्कारी है। ऐसा कैसे हुआ? फकीर बोला कि यदि वो अपनी पत्नी के क्रोध और दुव्र्यवहार का बोझ नहीं उठाये तो क्या यह चीता उसके सामान का बोझ उठाएगा? इसका भावार्थ यह है कि चीता इसलिए बोझ उठा रहा है क्योंकि फकीर ने क्रोध पर नियंत्रण कर रखा है। उसका भाव शुद्ध सात्विक निर्मल है। उसके मन में किसी के लिये द्वेष नहीं है। इसीलिए चीता उसका बोझ भी उठा रहा है। 

यही तो सुखी दाम्पत्य का अद्भुत सूत्र है। क्रोध पर नियंत्रण रखने मात्र से नब्बे फीसदी समस्याएं तो वैसे ही समाप्त हो जाती हैं। क्रोध आते ही विचार कीजिये कि यदि भावुकता में जबरदस्त प्रतिक्रिया दे दी जाये तो क्या कुछ फयदा होगा? शायद नहीं। सिर्फ नुकसान होगा। क्लेश बढेगा। छिद्रान्वेषण शुरू हो जायेगा और गलतियां निकालने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जायेगी। सुखी दाम्पत्य के लिये आवश्यक है कि :
* सहन करना सीखिये। उन बातों को सहन कीजिये जिन पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। इसे अन्यथा न लेवें। इसका अर्थ सिद्धांतों से समझौता नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन साथी को हर पल एक कंट्रोलर की तरह कंट्रोल करने की प्रवृत्ति से छुटकारा। कुछ लिबर्टी देंवे अर्थात खुला भी छोड़ें। कुछ गलतियों को नजरअंदाज करना भी सीखें।
* रिश्ते बोझ नहीं हैं। उन्हें ढोने की नौबत न आ जाये। इसके लिये जरूरी है एक दूसरे को समझना, और विपरीत बातों और विचारों को भी अपनाने का प्रयास। असहमति होना आम बात है। असहमत अवश्य होवें। मतभेद भी होने देवें परन्तु असहमति इतनी ज्यादा न बढ़ावें कि ईष्र्या और युद्ध की नौबत आ जावे।
यहां मन्त्र यही है कि दाम्पत्य जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम एक दूसरे के विपरीत विचारों को भी समझें। डिसएग्री (असहमत) होने के लिये एग्री (सहमत) हो जाना और असहमति होने के बावजूद कलह न होने देना ही सुखद दाम्पत्य का प्राण सत्व है।

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