Menu

'कार्यस्थल राजनीति का अखाड़ा नहीं'

 

संगठन कार्य करने की जगह है, राजनीति का अखाड़ा नहीं। आपकी पूछ काम से होती है। यदि आप राजनीति करते हैं तो लोग आपसे डरते हैं और इसी कारण आपको सम्मानित करते हैं। भय को सम्मान न समझें। कार्यस्थल पर राजनीति करके संगठन को तबाह करने वाले लोगों के कुछ गुण/दुर्गुण निम्नलिखित हैं।
कृपा कर इनसे दूर रहें -
* अन्यों को काम करने दें और उनके काम में सहयोग नहीं करें। फिर यह कहें कि हमारी तो कोई सुनता ही नहीं और किसी को हमारी जरूरत नहीं है।
* किसी मीटिंग, कोर्स, महत्वपूर्ण एकत्रीकरण में नहीं जाएं। फिर सुझाव देवें कि यदि ऐसा होता तो ठीक रहता।
* यदि आपको कोई महत्वपूर्ण काम बताया जाये तो उसे कई दिन तक ना करें। यदि वो काम बॉस किसी अन्य से करा लेवे तो बॉस को तानाशाह कहकर अन्यों से कहें कि संस्थान में कार्य करना दूभर है। यहां डेमोक्रेसी नहीं है।
* मीटिंग में यदि जाना ही पड़े तो जानते समझते हुए भी कोई नया विचार, अच्छी बात ना कहें। औरों द्वारा दिए गए विचारों का घृणित पोस्टमार्टम करें क्योंकि आप ये जानते हैं कि कोई विचार अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होता और हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इस अवस्था में छिद्रान्वेषण करते चले जायें।
* ईमेल, पत्र, नोटिस इत्यादि ना पड़ें। यदि कोई सूचना पत्र लाया हो तो उसपर अपने हस्ताक्षर ना करें और फिर कहें कि यहाँ तो सूचना ही नहीं मिलती।
* संगठन के बारे में बाहर तो नकारात्मक बात फैलाएं और भीतर सर्वोच्च बॉस के आगे यह जताएं कि हमसे बड़ा संगठन भक्त यदा कदा ही जन्म लेता है।
यदि इतने घृणित कार्य करने के बावजूद भी संगठन बढिय़ा चल निकले तो तुरंत ही स्वयं को अति सीनियर जताकर समूचा श्रेय ले लेवें कि आज जो श्रेष्ठता देख रहे हो वो हमारी दिव्य तपस्या का फल है। राजनीति करने वालों से लोग डरते हैं। उन्हें दूर से नमस्ते करते हैं। कार्य करें, ओछी राजनीति से दूर रहें।
यहां मन्त्र यही है कि संगठन में राजनीति कर के आप कुछ क्षणों के लिये तो ऊपरी पायदान पर चढ़ सकते हैं लेकिन जिस ऊंचाई पर आप विराजित होते हैं, वह बड़ी चिकनी और तीक्ष्ण होती है। वहां जितना आसान चढ़ जाना है, फिसल जाना और भी आसान है। यही कॉर्पोरेट सत्य है।

Read more...

'बनें जगत के अतुल विजेता'

आल्प्स यूरोप की सबसे बड़ी पर्वत श्रृंखला है। रूस के विरुद्ध युद्ध छिड़ जाने पर नेपोलियन की सेना के लिये सबसे बड़ी चुनौती आल्प्स को पार करना ही थी। नेपोलियन ने इस समस्या को ताड़ लिया। आगे बढ़ती सेना को नेपोलियन ने कहा कि यहाँ कोई आल्प्स नहीं है और दिखने वाली पहाडी एक लघु पर्वत है। आल्प्स तो काफी बड़ा है। सत्य बात यह है कि ऐसा सुनकर सेना आल्प्स को पार कर गई। दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। यही है आत्मविश्वास। स्वयं पर, स्वयं की काबिलियत पर विश्वास। इसे स्ट्रांग डिजायर या विल पॉवर या सेल्फ एस्टीम आदि भी कहा जाता है। यह आत्मविश्वास ही सफलता का मर्म है। केवल आत्मविश्वास के सहारे एक विकलांग व्यक्ति इंग्लिश चैनल पार कर लेता है। नैतिक मूल्यों से जन्मे इसी आत्मविश्वास के सहारे एक साधारण दिखने वाला संत- महात्मा गाँधी - भारत देश को अंग्रेजों से आज़ाद करा देता है। इसी आत्मविश्वास के दम पर अपने दोनों पैरों के कट जाने के बावजूद बैसाखियों के दम पर वॉरेन मेक्डोनाल्ड नामक व्यक्ति अफ्रीका की सबसे ऊंची छोटी किलिमान्जारो पर फतह हासिल कर लेता है। संसार में आत्मविश्वास और अंतर्मन की शक्ति से बड़ा कुछ भी नहीं है। हमारी नकारात्मक सोच हमारे आत्मविश्वास को कम कर देती है। नकारात्मक सोच और हर बात में रोने की नकारात्मक प्रवृत्ति ही वास्तविक नरक है। यहाँ यह समझना चाहिये कि जब भी हम नकारात्मक बात करते हैं, नकारात्मक सोचते हैं तो हम नरक की ओर यात्रा कर रहे होते हैं। ऐसी अवस्था में हमें सकारात्मक सोच के साथ, ईश्वर में विश्वास रखकर, प्रत्येक कार्य में जीवटता से जुट जाना चाहिये। यही तो जीवन है। 

'मुश्किलें हैं मुश्किलों से घबराना क्या दोस्त, दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैंÓ।
आत्मविश्वास को बढाने के लिए सर्वप्रथम खुद के जीवन की एक 'विजेता पुस्तिकाÓ बनाइये। इसमें आप अपनी प्रत्येक जीत, उपलब्धि, पुरस्कार को लिखिये। यह जोश वर्धक टॉनिक का काम करेगी और आपको निराश होकर निकृष्ट नरक में जाने से रोकेगी। स्वयं को कमज़ोर, निर्बल, नाकारा समझना ईश्वरीय कृति का अर्थात स्वयं का भारी अपमान है। ऐसा न करें। आप जैसे हैं, अच्छे हैं। यह भाव भी संबल देता है।

Read more...

साहित्य समाज में भी है वर्ण-व्यवस्था

साहित्य में संभ्रांत या मुख्यधारा के साहित्यकार की श्रेणियों का आविष्कार वैसा ही है, जैसे समाज में वर्ण-व्यवस्था या साफ शब्दों में कहें तो ऊंच-नीच और इसी के चलते जब कुछ अनपढ़ या कम पढ़े हुए बहुत अच्छा लिख गए तो यहां तक कहा गया कि संभवतया इन्हें खुद को पता नहीं है कि इन्होंने कितना अच्छा लिख दिया है। यह व्यक्ति पर फब्ती थी। समझ पर संशय था। यह इस बात को जताने की चेष्टा थी कि सही तरीके से शिक्षा-दीक्षा या ज्ञानार्जन के बगैर साहित्य रचना संभव तो है लेकिन यह संदिग्ध है कि जो रचा जा रहा है, उसके प्रभाव और क्षमता से खुद रचनाकार भी परिचित भी है या नहीं। और इस तरह से साहित्य शिक्षाविदों, जानकारों और समझदारों का हो गया। 

यह बात स्थापित हो गई कि जो कहा जाए, उसके प्रभावों का ज्ञान होना चाहिए और जो पढ़ा जाए, उसे एक नए तरीके से समझने-समझाने की क्षमता भी रचनाकार में होनी चाहिए। उसकी बात में एक चमत्कृति होनी चाहिए। भले ही इस चमत्कार को समझने वाले बहुत कम हो लेकिन बात का वजन बढ़ा-चढ़ा होना चाहिए। इस वजह से एक तरफ जहां पांडित्यपूर्ण साहित्य की रचना होने लगी। गूढ़ार्थी कविताएं लिखी जाने लगी। लालित्यपूर्ण गद्य रचा जाने लगा और इसी आधार पर समालोचना और आलोचनाएं होने लगी। यही वह दौर था जब एक बड़ा हादसा यह हुआ कि आलोचना को बुराई माना जाने लगा। कोई शब्द किस तरह से कुछ भ्रांतियों की वजह से अपना अस्तित्व खो सकता है, आलोचना शब्द के साथ हुए हादसे से जाना-पहचाना जा सकता है।
आलोचना शब्द लोचन यानी आंखों से बना है, जिसका अर्थ समग्र दृष्टि से है। नए संदर्भ में बात करें तो तीन सौ साठ डिग्री पर कसा हुआ विवेचन। इस के तहत समीक्ष्य कृति की विधा के परिप्रेक्ष्य में जांच होती और समीक्षक अपनी बात कहता। यह बात जैसे-जैसे बुरी लगने लगी, आलोचना का अर्थ भी बुराई से लिया जाने लगा। हालांकि इसके लिए जिम्मेदार तत्कालीन वाद या विचार हैं। पंडितों ने विधा की अपनी दृष्टि से समीक्षा की जबकि समग्र दृष्टि से बात होनी चाहिए थी और यहीं से आलोचना शब्द का अर्थ बदलने लगा। बदले हुए अर्थ पर मुहर तब लग गई जब समीक्ष्य कृति को आम जन में तो स्वीकृति मिली लेकिन समीक्षकों से नहीं।
इसका बहुत बड़ा उदाहरण हमें रामचरित मानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास के प्रसंग से मिलता है कि एक बार वे ऐसे हताश हुए कि मानस की पांडुलिपि को पानी में बहाने का विचार तक कर लिया। तुलसीदास की पांडुलिपि तो बच गई लेकिन जाने कितनी पांडुलिपियां संभ्र्रांत और मुख्यधारा के साहित्य के काबिल नहीं होने की वजह से वक्त के प्रवाह में बह गई और बाद में कभी बरामद नहीं हो सकी।
हालांकि, इसका एक अच्छा प्रभाव यह पड़ा कि कुछ वाद और विचार के स्तर पर बड़ा काम हुआ। बहुत सारे पंडितों ने एकराय होकर वाद और विचारों पर बड़ा काम करते हुए सम्प्रदाय तक खड़ा किया। अपनी बात को रखने के लिए न सिर्फ वाद आधारित चिंतन हुआ बल्कि सृजन भी हुआ। एक कवि हुए मम्मट। उनके समय का एक किस्सा जो बहुत ही चाव से आज भी खराब-कविता को खराब नहीं कहने की एवज में सुनाया जाता है। यह किस्सा कुछ इस तरह है कि मम्मट के पास एक युवक अपनी कविताओं की पांडुलिपि लेकर पहुंचा और बोला कि इसमें आवश्यक सुधार बता दीजिए। मम्मट ने वह पांडुलिपि रख ली और कुछ दिन बाद आने के लिए कहा। कुछ दिन बाद युवक आया तो उसे देखते ही मम्मट उसकी ओर दौड़े और उसे अपनी बाहों में भरते हुए कहा कि जो काम मैं पिछले कई सालों में नहीं कर सका, वह तुमने इस पांडुलिपि में कर दिया। यह सुनकर युवक उत्साह में भरकर पूछा, 'वह कैसे आदरणीय?Ó
मम्मट ने कहा, 'मैं एक ऐसी कृति रचना चाहता था, जिसमें सभी तरह के काव्यदोष हों, तुमने यह पांडुलिपि ऐसी बनाई है कि अब मुझे काव्यदोष बताने के लिए किसी भी तरह के दूसरे उदाहरणों की जरूरत ही नहीं है!Ó
यह एक उदाहरण है, जिससे यह पता चलता है कि साहित्य के पंडित सृजन को लेकर कितने सजग रहते थे और सृजन कैसा होना चाहिए, इस पर निरंतर बात करते रहते थे। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कहने का अधिकार उसी को मिला जिसके पास समझ है और समझ का पैरामीटर भी श्रेष्ठ स्तर पर भाषा और व्याकरण की शिक्षा-दीक्षा स्थापित किया गया। ऐसे में वर्तनी को नहीं समझने वाले, शब्द के प्रभावों से अनभिज्ञ और अभिधा-व्यंजना की ताकत से बचकर मध्यममार्ग तलाशने वाले कभी भी संभ्रांत या मुख्यधारा के रचनाकार नहीं बन सके। बहुत हद तक यह सही भी था लेकिन धीरे-धीरे इन सभी का रूप-स्वरूप बिगडऩे लगा और कालांतर में हम देखते हैं कि वाद का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका है तो विमर्श के नाम पर नित-नए नाम सामने आ रहे हैं। इनका सबसे अधिक बिगड़ा हुआ स्वरूप लॉबियों से पहचाना जाता है, जिसके उदाहरण भारत भवन से लेकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और साहित्य अकादमियों तो इधर लिटरेचर फेस्टीवल और जश्ने-रेखता तक बिखरे हैं।

दरबारों-हवेलियों से होते हुए...

समाज में सृजनधर्मियों का सम्मान सदैव होता रहा है। पहले राजदरबारों में कवियों-शायरों का सम्मान होता था। फिर यह जिम्मेदारी सेठ-साहूकारों ने उठा ली। बीकानेर में दसेक साल पहले ही रामपुरिया हवेली में साहित्यकार सम्मान की परंपरा बंद हुई है। सन् 2000 से पहले सक्रिय साहित्यकारों के पास आज भी हवेली से मिली स्वेटर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिल जाएगी। शब्द-ऋषि सम्मान भी होता था। राजा-महाराजा गए और सेठ साहूकार भी थक गए तो संस्थाओं ने यह भार उठाया। लिहाजा, जाते साल तीन सम्मान समारोह की सूचना है, एक हो चुका। डूंगर कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद हुसैन की सरपरस्ती में एक संस्था बनी है-बज्में फिक्रो फन। इस संस्था की ओर से आनंद निकेतन में बीते रविवार पांच साहित्यकारों का सम्मान हुआ। टोंक के शायर डॉ.अरशद अब्दुल हमीद को गालिब अवार्ड दिया गया। आबिद हसन को शेख निसार अहमद निसार अवार्ड, अल्ला बख्श साहिल को शेख मोहम्मद इब्राहिम अवार्ड और अल्लाबख्श सर्वा तथा अमीनुद्दीन शौकजामी को बेदिल अवार्ड से नवाजा गया। अब प्रेरणा प्रतिष्ठान डॉ.उषाकिरण सोनी को सुंदर सुरभि सम्मान, राजेंद्र जोशी को राजरत्न सम्मान और डॉ.गौरव बिस्सा अमरकीर्ति सम्मान प्रदान करेगी। यह संस्था वरिष्ठ कवि भवानीशंकर व्यास 'विनोदÓ के निर्देशन में चल रही है। इस बीच कथाकार नदीम अहमद नदीम और शायर वली मोहम्मद गौरी के प्रयासों से प्रारंभ हुए शहीद अशफाकउल्ला खां सम्मान से विभूषित होने वाले साहित्यकारों की सूची भी जारी हो गई है। हिंदी साहित्य के लिए बुलाकी शर्मा, राजस्थानी साहित्य के लिए मोनिका गौड़ और उर्दू साहित्य के लिए जियाउलहसन कादरी सहित रंगकर्म हेतु सुरेश हिंदुस्तानी, समाजसेवा के क्षेत्र में हीरालाल हर्ष और पत्रकारिता के लिए इसरार हसन कादरी को सम्मानित किया जाएगा।

Read more...

'रोयें नहीं, समाधान निकालें'

अमरीकाज मोस्ट वांटेड टीवी शो के होस्ट जॉन वॉल्श के छ वर्षीय बेटे का अपहरण शौपिंग मॉल के बाहर से हो गया। कुछ दिन बाद उस बच्चे की लाश वॉल्श को मिली। घटना दुखद हृदय विदारक थी। वॉल्श दंपत्ति चाहता तो निराशा, अवसाद, दु:ख में डूब जाता। चाहता तो केस दर्ज करके मुआवजा लेता। लेकिन वॉल्श दंपत्ति ने मुकदमा छोड़ दिया। उन्होंने चाहा कि जो उनके बेटे के साथ हुआ, वो किसी अन्य के साथ न हो। अत: वॉल्श ने अपने जीवन का एक नया मिशन बनाया और उसपर क्रियान्विति प्रारम्भ की। वॉल्श ने दिन रात मेहनत करके नेशनल कंप्यूटर सिस्टम बनाया ताकि सभी गुमशुदा बच्चों की खोज जल्द से जल्द हो सके। उसके बाद वॉल्श ने नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एण्ड एक्सप्लोइटेड चिल्ड्रन सोसायटी की स्थापना की। इस संस्था में वॉल्श ने 'कोड एडमÓ नामक सुविधा प्रारम्भ कर उसे समूचे देश के डिपार्टमेंटल स्टोर्स से जोड़ दिया ताकि गुमशुदा बच्चे को तुरंत ढूंढ लिया जाये। आज इस संथा में 125 कर्मचारी हैं ओर वे अब तक लगभग पचास हजार से ज्यादा गुमशुदा बच्चों को अपने परिजनों तक पहुंचा चुके हैं। 

इसे कहते हैं समाधान केन्द्रित एप्रोच। रोना रोते रहने वाले को जीवन में कुछ प्राप्त नहीं होता। जो समाधान की सोचता है, वही वास्तविकता में मनुष्य कहलाने का अधिकारी है। 'क्या होना चाहिएÓ कह देने से राष्ट्र, समाज या संगठन की प्रगति असंभव है। हमें तो सदैव समाधान केन्द्रित होकर 'क्या हो सकता हैÓ और 'मैं क्या कर सकता हूंÓ पर बल देना होगा। मैनेजमेंट का मूल तत्व क्रियान्विति है। क्रियान्विति के बिना प्लानिंग बेकार है। महात्मा गांधी ने कहा है कि सौ श्रेष्ठ विचारों को सोचते रहने से अच्छा है एक विचार की क्रियान्विति हो। समस्या यह है कि क्रियान्विति करे कौन? दरअसल सभी ज्ञानदेव की भांति उमड़ घुमड़ के सलाह तो देना चाहते हैं लेकिन कार्य करना नहीं चाहते। अत: कार्य अवस्य करें।
समस्या, बाधा, विपत्ति, क्लेश, झंझट, असफलता तो जीवन का अंग है। इन्हें लेकर न बैठें। इनसे लड़ें, भिड़ें और पराजित करने का दम रखें। रोना आसान है। समस्या से भिड जाना और भिड़कर उसे मात देना ही जीवन का आनंद है। ये बड़ा मुश्किल तो है लेकिन यही तो जीवन है। यहां मन्त्र यही है कि हमें समस्या या कष्ट आने पर समाधान और अवसर तलाशने चाहिये। दीन हीन निर्बल की भांति समस्याओं पर रोना - स्वयं का और मनुष्य जाति का अपमान है।

Read more...

'कर्म का चक्रीय रूप'

एक राजा ने अपने तीन मंत्रियों की कार्यक्षमता और ईमानदारी की परीक्षा लेने की सोची। उसने तीनों मंत्रियों को बुलाकर कहा कि वे राजकोष से एक लाख रूपया ले लेवें। उसके बाद उस एक लाख रुपये से जितना श्रेष्ठतम क्वालिटी का राशन और खाने पीने का सामान खरीद सकते हों, वो खरीद लेवें। पहले मंत्री ने ईमानदारी से एक लाख रुपये का श्रेष्ठ सामान खरीदा। दूसरे मंत्री ने सोचा कि क्यों न वो सिर्फ पच्चीस हजार का सामान लेवे और एक लाख का बिल बनवा ले तो राजा को क्या पता चलेगा? अत: उसने घटिया क्वालिटी का सामान खरीद लिया। तीसरे ने तो अनैतिकता की पराकाष्ठा ही पार कर दी। उसने मात्र पांच हजार का घटिया सामान खरीदा और एक लाख का बिल बनवा दिया। सभी राजा के पास पहुंचे। राजा ने तुरंत ही तीनों को एक महीने के लिये जेल भेजने का हुक्म सुना दिया। राजा ने कहा कि वे एक महीने तक उन्ही के द्वारा खरीदे गये राशन से भोजन बनाकर अपना पेट भरेंगे। पहले मंत्री को कष्ट नहीं हुआ क्योंकि उसके खाद्यान्न की क्वालिटी और क्वांटिटी सही थी। दूसरा मंत्री गंदे खाद्य के कारण बीमार हो गया। तीसरे मंत्री के पास खाने को कुछ था ही नहीं अत: वो स्वर्ग सिधार गया। 

ये कथा जीवन का शाश्वत सत्य है। आज आप जो भी हैं उसके लिये सिर्फ आपके कर्म जिम्मेदार हैं। कर्म सिद्धांत के अनुसार आप जो भी करते हैं वही लौट कर आपके पास आता है। इस कथा में भी तीनों पात्रों को वही प्राप्त हुआ जो उन्होंने पहले कभी अपने लिये बोया था। यहां यह समझना जरूरी है कि नैतिकता का कोई विकल्प नहीं है। अनैतिक आचरण सभी समस्याओं का मूल है। अनैतिक आचरण से क्षणिक सुख या आनद तो मिल सकता है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम अति घातक और गंभीर होते हैं।
हमें समझना चाहिये कि नैतिकता और जिम्मेदारी महानता की कीमत है। अनैतिक आचरण के कारण बेहतरीन शिक्षाविद रावण, पराक्रमी बाली और बलवान दुर्योधन का दुखद अंत हुआ। शास्त्र कहता है कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। अत: हमें ईश्वर में विश्वास रख, उसके न्याय से डरकर अपने सभी कर्म करने चाहिये। स्वयं में नैतिक मूल्यों का विकास करना और अपनी नई पीढी को नैतिक मूल्यों से सिंचित करना हमारे जीवन का परम ध्येय होना चाहिये। यहां मन्त्र यही है कि हमें सत्य और धर्म से ही अर्थ की प्राप्ति करनी चाहिए वर्ना अनैतिक आचरण की बड़ी बुरी गत होती है। यही स्व प्रबंध का मूल मन्त्र है।

Read more...

'ऑर्थोडॉक्स संस्थान'

आपने देखा होगा कि दफ्तर में कई कर्मचारी अत्यधिक व्यस्त और कार्य से घिरे हुए दिखते हैं। ये कर्मचारी देर तक दफ्तर में डटे रहते हैं। ऐसा करने से उनके सीनियर्स को लगता है कि वे बड़ी निष्ठा से अपना कत्र्तव्य पालन कर रहे हैं। भारत में अधिकांश संस्थान ऑर्थोडॉक्स आधार पर कार्य करते हैं। ऑर्थोडॉक्स संस्थान को देसी भाषा में लाला की दुकान भी कहा जाता है। ऐसे संस्थानों में संस्थान गौरव, कार्य संस्कृति, कार्मिक उत्पादकता आदि शब्दों का प्रयोग वर्जित है। यहां तो लाला जी का फायदा और उनके निकट रहना ही हर कर्मचारी का प्रथम और आखिरी लक्ष्य होता है। ऐसी अवस्था में यदि आप बहुत तेज गति से अपने सभी कार्यों को पूर्ण कर लेते हैं अर्थात ओवर एफिशिएंसी रोग के शिकार हैं तो सावधान होने का समय आ गया है। ऐसे संस्थानों में आपको सिर्फ कार्य पूर्ण नहीं करना है अपितु हर पल कार्य कर रहे हो - ऐसा दिखाना भी जरूरी है। आप क्या हैं-यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह यह है कि आप स्वयं के कार्य व्यवहार से स्वयं को कैसा दिखाते या प्रस्तुत करते हैं। स्वयं को व्यस्त और कार्य में डूबा हुआ दिखाना भी कॉर्पोरेट में जरूरी है। यह आपको सीखना ही होगा।

स्वयं को सदा कार्य से परेशान दिखाना, कार्य से त्रस्त दिखाना - आज की आवश्यकता है। याद रहे कि श्रेष्ठ कार्य का एक जोरदार परिणाम है - और ज्यादा कार्य। स्वयं को कार्य में व्यस्त दिखाने का यह अर्थ कतई नहीं कि आप कार्य न करें। आप खूब मेहनत से कार्य करें लेकिन ऑर्थोडॉक्स संस्थान में व्यस्त न दिखना भी अपराध है। अत: ऑर्थोडॉक्स संस्थानों में अपना कार्य पूर्ण हो जाने के बाद भी स्वयं को निम्नलिखित तरीकों से व्यस्त दर्शायें -
* बॉस और कर्मचारियों के मध्य ज्यादा वर्कलोड का रोना सदा रोते रहें।
* सप्ताह में कुछ दिन देर तक ऑफिस में रुकें। लगना चाहिये कि बहुत काम है और आप जुटे पड़े हैं।
* अंतिम तिथि से पूर्व कोई एसाइन्मेंट जमा नहीं करें। भले ही वो पूर्ण हो चुका हो।
* ऑफिस के कम्प्यूटर पर सदा एक अधखुली ईमेल रखें ताकि लगे कि आप मेल करने में व्यस्त हैं।
* अपनी टेबल पर सदा 2 या 3 फाइल्स फैलाये रखें ताकि लगे कि आप बहुत व्यस्त हैं।
यहां मन्त्र यही है कि कार्य तो अवश्य करें लेकिन ये भी जतायें कि आप बहुत ही व्यस्त और कार्य से घिरे हुए कार्मिक हैं। कुर्सी से बंधे रहकर, स्वयं को अति व्यस्त दिखाकर और निस्संदेह श्रेष्ठ कार्य करके ही आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यही कॉर्पोरेट मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

Read more...

'दिमाग में कूदता बन्दर'

एक निर्धन आलसी किसान बिना किसी प्रयत्नऔर मेहनत के तुरंत अमीर बन जाना चाहता था। एक दिन गांव में एक बड़े सिद्ध महात्मा जी आये। वे हर समस्या को हल करने के लिये अचूक मन्त्र देने वाले विख्यात संत थे। किसान ने उनसे अमीर हो जाने का मन्त्र मांगा। महात्मा जी ने किसान को अमीर बनने का अचूक मन्त्र लिखकर दे दिया और कहा कि यह अचूक मन्त्र करोड़ों अरबों रूपए ला सकता है। साथ ही महात्मा जी ने कहा कि यह मन्त्र सिर्फ तभी काम करेगा जब किसान को कोई भी बन्दर परेशान नहीं कर रहा हो। किसान ने सुनिश्चित किया कि मंत्रोच्चार के दौरान बन्दर उसे परेशान नहीं करेगा। घर जाकर ज्यों ही किसान ने मंत्रोच्चार शुरू किया, उसके दिमाग में बन्दर की आकृति छप गई। मन्त्र व्यर्थ गया। ऐसा सैकड़ों बार हुआ क्योंकि जब भी किसान मन्त्र जपता, तो दिमाग में, उसके विचार में उपस्थित बन्दर उसे याद आ जाता और मन्त्र अधूरा रह जाता। अन्ततोगत्वा उसने महात्मा जी से कहा कि चाहे उसे रूपए न मिलें लेकिन उसके दिमाग के बन्दर को बाहर निकालें। 

यह प्राचीन काल की सांकेतिक कथा है। यहां बन्दर हमारी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन को दर्शाता है। ये बन्दर चिंता करते रहने की प्रवृत्ति को भी दर्शाता है। हम चाहे जो काम कर रहे हों, हमें व्यर्थ की चिंता सताती रहती है। ऐसी अवस्था में हम परिणामों की चिंता में बड़े मगन हो जाते हैं। कई बार तो हम मूल कार्य को पूर्णतया भूल जाते हैं क्योंकि हम तो त्वरित परिणाम चाहते हैं। दिमाग का बन्दर यानि हमारे दिमाग की चंचलता हमें श्रेष्ठ निर्णय लेने से रोकती है। इसी दिमागी चंचलता और मस्तिष्क में छुपे बन्दर रूपी उथल पुथल को उन्प्रोडक्टिव थिंकिंग कहते हैं। इस तकनीक में समस्या का वृथा विश्लेषण चलता रहता है। समाधान कुछ नहीं मिलता। भारतीय प्रणाली इससे विपरीत "ब्रेन स्टिलिंग" अर्थात स्थिरचित्त मस्तिष्क की वकालात करती है। यहां निर्णय लेने हेतु स्थिरचित्त होकर समस्त पहलुओं पर गौर करने को प्राथमिक आवश्यकता बताया गया है। यह आवश्यक भी है।
इस कथा का दूसरा संकेत है कि साधन (मन्त्र का जाप) का भी उतना ही महत्व है जितना कि लक्ष्य (धन प्राप्ति) का। हमें समझना चाहिये कि सिर्फ सोचने से, ठान लेने से, या मोटिवेट हो जाने से ही लक्ष्य प्राप्त नहीं होते। लक्ष्य प्राप्ति हेतु अथक परिश्रम और जीवटता की आवश्यकता है। यहां मन्त्र यही है कि ब्रेन स्टिलिंग और परिश्रम ही सफलता का मर्म है।

Read more...

'प्रत्येक वस्तु महत्वपूर्ण

 

एक बड़े वट वृक्ष पर तुरई की बेल चढऩे लगी। वृक्ष बड़ा अहंकारी था। वृक्ष ने सोचा कि इतने सबल, उच्च और विराट वृक्ष पर बेल का क्या काम? अत: वो बेल को अत्यंत ही तुच्छ समझने लगा। वृक्ष ने बेल को तुच्छ और निर्बल बताकर उसे भला बुरा भी कहा। बेल ने कोई जवाब नहीं दिया। एक दिन कुछ व्यक्ति पेड़ के निकट पहुंचे। उन व्यक्तियों ने वार्तालाप करते हुए यह तय किया कि वृक्ष को काट दिया जाये। वृक्ष को काटना इसलिए आवश्यक था क्योंकि उस वृक्ष के फल बड़े कड़वे थे तथा मनुष्य के लिये अच्छे नहीं थे। जब तुरई के बेल ने ये सूना कि वृक्ष कटने को है तो उसने तुरंत ही कहा कि ये वृक्ष उसका सहारा है अत: इसे ने काटा जाये। बेल ने कहा कि वृक्ष के फल भले ही कड़वे हों लेकिन तुरई तो मीठी है अत: वृक्ष न काटा जाये। लोगों ने बात मान ली। वृक्ष लज्जित हुआ। वृक्ष जिसे निकृष्ट समझता था उसी बेल ने वृक्ष के प्राण बचाये। वृक्ष समझ गया कि असली जीवन सभी के सम्मान को बनाये रखने में है।
इस कथा से स्पष्ट है कि है कोई भी व्यक्ति तुच्छ नहीं होता। प्रत्येक का अपना अलग महत्व होता है। किसी को कमजोर, नाकारा या बेकार समझना मानसिक दरिद्रता का प्रतीक है। आप नहीं जानते हैं कि कब, कहां आपको किस व्यक्ति से क्या काम पड़ सकता है? अत: किसी भी व्यक्ति के लिये तिरस्कार या घृणा का भाव न रखें। यही जीवन जीने का श्रेष्ठ तरीका है। भारतीय समाज किसी को भी तुच्छ नहीं मानताण् भारतीय दर्शन तो कहता है कि जो ब्रह्म भाव या ईश्वरतत्व का अंश मेरे पास है वही तुम्हारे पास भी है। यदि दोनों मनुष्यों में एक ही ईश्वर निवास करता है तो भेदभाव कैसा? शक्ति, पैसा, रूतबा आदि के बल पर समाज को बांटना मूर्खता है। प्रतिपल यह याद रखना चाहिये कि इस संसार में उपस्थित प्रत्येक सजीव या निर्जीव वस्तु का अपना महत्व है। ईश्वर किसी की भी रचना व्यर्थ में नहीं करता। ऐसा भाव लेकर समाज में जीना चाहिये। सभी को समान और समतुल्य मानने का भाव ही संतोष और आनंद को जन्म देता है। यही सफल सेल्फ मैनेजमेंट का मर्म है।

Read more...

सभापति होने के नाते मैं नगर का प्रथम नागरिक हूं कलक्टर साहब

बात तब की है जब बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बीकानेर आने वाले थे। इस हेतु कार्यक्रम की रूपरेखा बन रही थी और उसमें कांग्रेस के नेताओं सहित नगर परिषद बीकानेर के तत्कालीन अध्यक्ष द्वारका प्रसाद पुरोहित भी सक्रिय रूप से लगे हुए थे। जब पंडित नेहरू के स्वागत भाषण की बात आई तो तत्कालीन जिला कलक्टर ने कहा कि जिले का सर्वोच्च अधिकारी कलक्टर होने के नाते भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत मैं करूंगा और स्वागत भाषण मैं ही दूंगा। उनकी इस बात का समर्थन वहां बैठे नेताओं ने भी किया। परंतु जिला कलक्टर की यह बात सुनते ही वहां बैठे नगर परिषद के अध्यक्ष द्वारका प्रसाद पुरोहित ने बड़े सख्त लहजे में कहा कि कलक्टर साहब आप जनता के सेवक है और अधिकारी भले सर्वोच्च हैं लेकिन आपको प्रधानमंत्री का सर्वप्रथम स्वागत करने का अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री का स्वागत करने का अधिकार नगर परिषद का सभापति होने के नाते मेरा है क्योंकि मैं ही इस नगर का प्रथम नागरिक हूं और पूरे बीकानेर की जनता का प्रतिनिधित्व करता हूं। इस नाते बीकानेर में प्रधानमंत्री का स्वागत मैं ही करूंगा, स्वागत भाषण मैं ही दूंगा और इस हेतु मुझे आपसे कोई आपत्ति नहीं है। सभापति होने के नाते मैं नगर का प्रथम नागरिक हूं कलक्टर साहब या पूछताछ नहीं करनी है और जनप्रतिनिधि होने के नाते आपको ये मेरा आदेश है। इतना सुनते ही वहां बैठे सब लोग हतप्रद रह गए और जिलाधीश भी सर झुकाकर बैठ गए। इस तरह पंडित नेहरू का स्वागत जनप्रतिनिधि द्वारका प्रसाद पुरोहित ने किया। अपने होने की स्थिति को लेकर इतने सजग लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि का यह किस्सा आज भी बीकानेर के लोगों की जुबान पर है।

Read more...

लोकतांत्रिक संस्थाएं कब स्वीकार करेगी संविधान को

गणतंत्र दिवस पर सभी को शुभकामनाएं। उनको विशेष रूप से बधाई है, जो न तो गण को मानते हैं और न तंत्र को स्वीकार करते हैं। वर्ष 1950 में हम जिस संविधान को लेकर भारत को गरीब से विकासशील देश बनाने की जुगत में जुटे थे और आज जिस विकासशील भारत को विकसित बनाने का सपना संजो रहे हैं, उस संविधान को धार्मिक ग्रंथ की तरह लेते तो भारत आज अमेरिका, चीन और दूसरे विकसित राष्ट्रों से कमजोर नहीं होता। नि:संदेह वर्ष 1947 के भारत को बहुत पीछे छोड़कर हमने नए भारत को बनाया है, लेकिन दुख की बात है कि जिन लोगों पर संविधान को लागू करने का जिम्मा था, उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपना कर्म नहीं किया। हमारी तरक्की के मुख्य कारक देशवासी ही है। जिन संस्थाओं (लोकसभा, राÓयसभा और विधानसभाओं) को यह जिम्मा सौंप रखा है वो देशवासियों की मानवशक्ति का सही उपयोग करने के बजाय दुरुपयोग करती है। सवा सौ करोड़ भारतीयों का यह देश ऐसे विवादों में उलझा रहता है, जिसका न सिर है न पैर। यह चर्चाएं किसी बाहरी देश से नहीं आती, बल्कि हमारे नेता ही उठाते हैं। एक नेताजी कुछ ऊटपटांग बोलेंगे और पूरा देश और मीडिया उसकी बकवास पर चर्चा करना शुरू कर देती है। आखिर क्यों, राष्ट्र की मानवशक्ति सकारात्मक के बजाय नकारात्मक दिशा में बढ़ती जा रही है। ताजा उदाहरण 'पद्मावत' की ही ले सकते हैं। जब देशवासी और जाति विशेष के लोग नहीं चाहते कि उनकी भावनाओं को आहत किया जाए तो क्या जरूरी है, ऐसे विषय पर फिल्म बनाई जाए? क्या हम पद्मावत फिल्म को नहीं देखेंगे तो कुछ उम्र कम हो जाएगी। आखिर क्यों ऐसे विषयों को ढूंढा जाता है, जिस पर आपत्ति हो, झगड़ा हो, फसाद हो। पूरी तरह से मार्केटिंग और प्रोफेशनल हो चुके फिल्म निर्माता और न्यूज चैनल इस देश की भोली भाली जनता को बातों में उलझा देते हैं और हर कोई बस उसी मामले में शामिल होने में जुट जाता है। विरोध है, विरोध है, समर्थन है, समर्थन है, समर्थन है। क्यों विरोध है और क्यों समर्थन है, अधिकांश लोग नहीं जानते। 

हमारे संविधान के प्रथम पृष्ठ बताया गया है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या सच में यह हालात है? शायद नहीं है। टीवी चैनल की बहस (अमूमन बकवास भी) में लड़ते हिन्दू और मुसलमान साफ बयां करते हैं कि देश में सभी के मन में सभी भावनाओं का सम्मान नहीं है। आखिर कोई व्यक्ति इस मुद्दे पर उ"ातम न्यायालय में क्यों नहीं जाता कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धार्मिक मुद्दों पर सार्वजनिक बहस क्यों होती है? क्यों हम किसी भी व्यक्ति को दूसरे धर्म के खिलाफ बोलने की आजादी दे देते हैं और वो भी एक ऐसे राष्ट्रीय चैनल पर, जिसे लाइव हजारों-लाखों लोग देख रहे हैं।
युवाओं की समस्याओं को निपटाने के लिए देश की संसद क्या कर रही है। जिस देश की सरकारें युवाओं को नौकरी देने के नाम पर हर साल अरबों रुपए की कमाई करती है, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? आश्चर्य की बात है कि हम किसान का कर्ज माफ कर रहे हैं, बैंक में समय पर ऋण की किश्त जमा नहीं कर रहे लोगों को ब्याज माफ कर रहे हैं, अमीर गरीब देखे बगैर दवाएं मुफ्त बांट रहे हैं और स्कूलों में फ्री पढ़वा रहे हैं, वहां युवा को नौकरी के लिए निशुल्क आवेदन करने की छूट नहीं है। बेहतर होगा कि सरकार यह तय कर दें कि एक तय प्राप्तांक तक पहुंचने वाले युवा को तो कम से कम शुल्क वापस कर देंगे। वो एक पद के लिए एक बार पंजीयन कर लें और बाद में उस पद के लिए आवेदन निशुल्क कर दें। दुख की बात है कि इस मुद्दे पर देश का कोई नेता नहीं बोलता। किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में ऐसा साहस नहीं है। वैसे भी घोषणा पत्र तो महज मुर्ख बनाने का जरिया रह गया है। कांग्रेस हो या फिर भाजपा, सभी हजारों, लाखों युवाओं को रोजगार देने की घोषणा करती है लेकिन चार साल बाद जब हिसाब देने का वक्त आता है तो निजी स्कूलों में दो-तीन हजार रुपए की नौकरी करने वालों की संख्या भी सरकार अपने आंकड़ों में जोड़कर दिखा देती है।
संविधान में कहां बताया गया है कि नेता को सिर्फ अपनी पार्टी के पक्ष में बोलना है? वो सांसद, विधायक यहां तक कि पार्षद बनने के बाद भी गलत को गलत कहने की हिम्मत खो देता है। जो पार्टी के हित में है, वो ही सही है। पार्टी लाइन पर चलने वाले हमारे जनप्रतिनिधि देश की लाइन पर कब चलेंगे? आज हमें ही तय करना होगा कि हम गण और तंत्र दोनों का सम्मान करेंगे। नेताओं के लिए पार्टी पहले हो सकती है, लेकिन हम देशवासियों के लिए देश ही सबसे पहले हैं। आज शपथ लें कि धार्मिक ग्रंथ की तरह हम संविधान का भी सम्मान करेंगे।

Read more...
Subscribe to this RSS feed

Bikaner Trusted News Portal

  • Bikaner Local News
  • National News
  • Sports News
  • Bikaner Events
  • Rajasthan News