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रचना के पीछे चलती है आलोचना

अगर कोई आलोचक किसी विधा में रचना भी करता है तो क्या वह इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसने जो रचा है, वह उस विधा का आदर्श और कालजयी स्वरूप है। समीक्षा, आलोचना, समालोचना थोड़े-बहुत अंतरों के साथ लगभग एक ही जगह पर आकर खड़े हो जाते हैं। आलोचना वस्तुत: रचना पर आश्रित विधा है। रचना के बगैर आलोचना का अस्तित्व ही नहीं। साहित्य में इस विधा की सृष्टि उन लोगों के लिए हुई जो नीर-क्षीर विवेक के साथ, तटस्थ रहते हुए शास्त्रीय आधार पर अपनी बात को रखना जानते हैं। परंपरा का ज्ञान हो, प्रयोगों की पहचान हो और जिस विधा में आलोचना करे, उसके शास्त्रीय पक्ष से जान-पहचान हों। भाषा की दक्षता के साथ-साथ वर्तनी की शुद्धता का पता हो और सबसे महत्वपूर्ण बात नवाचारों को समझने की सकारात्मक दृष्टि हो। 

इन सब के अभाव में आलोचना, समीक्षा और समालोचना के नाम पर जो भी हो रहा है, वह पत्रवाचन की सीमा से बाहर नहीं निकल पाता। आलोचना वही कर सकता है, जो निर्भय लेकिन न्यायसंगत हो। ऐसा विद्वान जिसे अपनी बात विनम्रता से कहनी आती हो, आलोचना के क्षेत्र में प्रिय हो जाता है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में भले ही कोई आलोचक स्वयं को खारा या क्रूर साबित करने की कोशिश करता रहे, उसे जन-मन में मान्यता नहीं मिलती। एक आलोचक के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह जन-मन की मान्यता को साथ लेकर अपनी बात कहे।
जैसे ही कोई आलोचक जन-मन को अल्पज्ञ या नासमझ मानकर अपनी बात के साथ हावी होने की कोशिश करता है, उसका जलवा बिखरने लगता है। यहां जन-कवि भीम पांडिया की एक बात बड़ी गहरी लेकिन समीचीन मालूम होती है। वे अपनी बात को रोचक अंदाज में ऐसे कहते थे कि रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हैं। जैसे ही कोई यह सुनता, दो प्रतिक्रियाएं होती। पहली बात में उसे लगता कि यह तुकबंदी के अलावा कुछ नहीं है, दूसरा इस बात पर मंथन होता कि एक जिम्मेदार कवि अगर यह कह रहा है तो कुछ न कुछ तो बात होगी है।
भीम पांडिया समझाते कि जो जीव है, प्राणी है उसमें कवित्व इस रूप में है कि वह बात को समझ सकता है, कहने की कला भले ही नहीं आए लेकिन कवि सम्मेलन में अंतिम-छोर पर बैठा कोई सामान्य सा श्रोता अगर किसी कवि की कविता पर वाह-वाह करता है तो यह अकारण नहीं है। इसका कारण यह है कि उसके पास समझ है, संवेदना है, अनुभूति है लेकिन अभिव्यक्ति के मामले में वह मंच पर बैठे कवि से कमजोर है। इस रूप में रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हुए।
भीम पांडिया से असहमत होने का अधिकार ठीक वैसा ही है, जैसा कोई उनसे सहमत होने में अपना अधिकार माने, लेकिन उनकी बात को खारिज नहीं किया जा सकता। समझदार होने का हक सभी को है। सहमत-असहमत होने का अधिकार सभी के पास है। ऐसे में एक आलोचक के सामने यह चुनौती होती है कि वह किस तरह सभी लोगों के ग्रहण करने के तरीके को समझते हुए अपनी बात को रखे। इसके लिए ्रएक तरफ जहां आलोचक को जन-मन की बात को समझने के लिए एक दृष्टिबोध चाहिए होता है तो दूसरी ओर, जिस विधा में वह अपनी बात कह रहा है, उसमें अब तक हुए प्रतिनिधि रचनाकारों से भी परिचित होना जरूरी होता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश वाद-विचार या सम्प्रदायों की स्थापना में आलोचकों का ही बड़ा योगदान रहा है। रचनाकार ने तो अपनी बात कह दी। उसे एक दृष्टिबोध के साथ समझते हुए उसे श्रेणियों में समझाने का काम आलोचक ने ही किया। कोई भी रचनाकार अव्वल तो किसी वाद-विचार या विमर्श के खाके खड़े करके रचना कर ही नहीं सकता। अगर वह करता भी है तो वह रचनाकार के नाते सबसे पहले खारिज होता है और राजनीति का हथियार भर बनकर रह जाता है।
फिर रचनाकार तो यह घोषणा भी कर सकता है कि उसकी कोई रचना किस वाद-विचार या विमर्श से प्रेरित है, उसे नहीं पता लेकिन आलोचक यह नहीं कह सकता कि उसे किसी रचना-विधान के मूल-सूत्रों की जानकारी नहीं है। वह किसी भी रचनाकार को इस तरह खारिज नहीं कर सकता कि फलां रचनाएं अच्छी है और फलां बेकार। यह तो सामान्य समझ वाला श्रोता भी कर सकता है। आलोचक के सामने अच्छी को अच्छी साबित करने की चुनौती होती है तो खराब को खराब साबित करने का साहस। बहुत सारे आलोचकों ने ऐसा किया भी है और उन्हें मान्यता भी मिली है, लेकिन कमी के कारण यहां भी पक्षपात होने लगा है।
अपनों को प्रतिष्ठा दिलाने और जानबूझकर आंखें बंद करके किसी और को समानांतर खड़ा करने की कोशिश की जाने लगी। यही वजह है कि आलोचना अस्वीकार होने लगी है। इससे जो प्रतिरोध का स्वर उभर रहा है, उसका हासिल यह है कि ऐसे आलोचकों को तो पूरी तरह से खारिज किया जाने लगा है जो खुद भी उसी विधा में सृजनरत हैं। वस्तुत: आलोचना का काम रचनाकारों का कभी रहा ही नहीं। आलोचना का अपना एक शास्त्र है, सिद्धांत है। रचनाकर्म से बहुत बाद की बल्कि रचना पर आश्रित विधा है आलोचना।

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डॉ. विश्वनाथ मौन क्यों है..?

अनुराग हर्ष। एक बार फिर प्रदेश के सभी चिकित्सक हड़ताल पर है। हड़ताल भी ऐसी है कि चिकित्सक और सरकार जैसे आपस में युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसे में बीकानेर के एक डॉक्टर साब की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन वो खुद ही ज्यादा रुचि नहीं ले रहे या सरकार उनका उपयोग नहीं कर रही। खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक और संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल सरकार के प्रतिनिधि है। पिछले दिनों हड़ताल से हालात ज्यादा बिगड़े तो डॉक्टरों से मेल मुलाकात कर मामले को निपटाने के बजाय स्वयं ही अस्पताल में जाकर मरीजो को देखने लगे। मरीजों को देखने के बाद दवा खुद नहीं लिख रहे थे बल्कि किसी साथ खड़े व्यक्ति से लिखवा रहे थे। मजे की बात है कि डॉक्टर साब स्वयं आंदोलनरत सेवारत चिकित्सक संघ के बीकानेर अध्यक्ष रहे हैं। तब भी आंदोलन में खूब आगे रहे। सरकार पर आरोपों झड़ी लगाने में पीछे नहीं रहे। अब जब स्वयं सरकार में है तो कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं? न तो हड़ताल खत्म करने में रुचि है और न अपने साथियों की बात को सरकार तक पहुंचवाने में। सही भी है 'बळती' में हाथ डालने के बजाय दूर खड़े रहकर ही हाथ सैक लें तो बेहतर है। यहां यह भी कहना चाहूंगा कि डॉक्टर सॉब के डॉक्टर मित्र भी बड़े 'सयाने' हैं। वो भी नहीं चाहते कि उन्हें किसी विवाद में फंसाया जाए। जब प्रदेश की मुख्यमंत्री विधायकों को अपने अपने क्षेत्र के चिकित्सकों से बात करने का जिम्मा सौंप रही है तो अपने ही पास पड़े इस 'तुरुप के पत्ते' को आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा। हकीकत तो यह है कि अत्यंत मृदुभाषी डॉ. साब अगर कोशिश करेंगे तो यह हड़ताल दो दिन से ज्यादा नहीं चलने वाली। आखिर एक ही जमात के लोग हैं, एक ही विचारधारा के साथी है।

कुछ कहती है भाटी की यह भूमिका

आमतौर पर बीकानेर शहर की राजनीति से दूर रहने वाले कद्दावर नेता देवी सिंह भाटी की शहर में बढ़ी सक्रियता कुछ कहती है। देवी सिंह भाटी ने पिछले दिनों नगर निगम महापौर, पार्षदों और अधिकारियों के साथ जिस तेवर के साथ बातचीत की, वो हर किसी को प्रभावित कर रही है। शहरी क्षेत्र की राजनीतिक शून्यता के बीच भाटी की बढ़ती सक्रियता ने विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर चिंतन शुरू हो जाना चाहिए। माना जा रहा है कि इस बार भाटी 'किंग मेकर' की भूमिका में नजर आएंगे। इसी कारण वो श्रीकोलायत के साथ बीकानेर पूर्व और पश्चिम दोनों सीटों पर गंभीरता से और पूरी तरह सोच विचार कर काम कर रहे हैं। सोनगिरी पटाखा कांड के बाद मकान बनवाकर देने की उनकी सोच मानवीय तो है ही, सकारात्मक राजनीति को बढ़ावा भी दे रही है। इतना ही नहीं बीकानेर पश्चिम क्षेत्र में उनके इक्का दुक्का नहीं सैकड़ों कट्टर कार्यकर्ता तैयार हो रहे हैं। अगर प्रतिद्वंद्वि पार्टी इसे हलके में ले रही है तो यह उनकी राजनीतिक समझ की कमजोरी है। उनकी सक्रियता कुछ कहती है, समझो।

सोशल मीडिया की नेतागिरी

यह नेतागिरी है, गांधीगिरी है, सोशल मीडियागिरी है या फिर कुछ करने की ललक है। कुछ भी हो, इन दिनों शहर के युवा सोशल मीडिया पर जमकर नेता गिरी कर रहे हैं। जो कर रहे हैं, उनमें दो-तीन तरह के सोशलमीडिया नेता है। एक वो नेता है, जो करते कुछ नहीं है, बस भाषण देते हैं। यह होना चाहिए, वो नहीं होना चाहिए, ऐसा क्यों किया गया, यह राष्ट्रद्रोह है, यह राष्ट्रभक्ति है, ऐसा नहीं करना चाहिए। कुछ ऐसे हैं जो गलत को गलत बताते हैं और उसे साबित करने का प्रयास भी करते हैं। ऐसे ही नेताओं ने पिछले दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से जनजागृति का प्रयास भी किया। समय समय पर इनकी टिप्पणी कुछ बेहतर भविष्य की परिकल्पना करने को प्रोत्साहित करती है।

जनसम्पर्क अभियान शुरू

अभी न तो विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई है, न किसी पार्टी ने अपनी रणनीति तय की है, उम्मीदवार बनाने का काम तो शायद आठ दस महीने में शुरू होगा। इसके बाद भी बीकानेर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से शायद एक बार फिर गोपाल गहलोत दावेदारी ठोकने वाले हैं। 'ठोकने' वाला शब्द इसलिए काम में लिया गया है कि पार्टी टिकट दें न दे। वो तो हर हाल में चुनाव लड़ेंगे। कुछ भाजपाई रंग में और कुछ कांग्रेसी रंग में रंगे गहलोत ने गौ रक्षा का ऐसा एजेंडा हाथ में लिया है, जैसा गुजरात चुनाव में उनकी पार्टी ने लिया था। 'सॉफ्ट हिन्दुत्व' के साथ चुनाव लड़ेंगे, इतना तय है। इसीलिए आजकल गली-गली पहुंचकर लोगों से संपर्क कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपनी यात्रा को जमकर प्रचारित कर रहे हैं। ये तो लड़ेगा भाई....।

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टिकट की दौड़ में कहां दौड़ें

विधानसभा चुनाव की घंटी बजने वाली है। गुजरात में जैसे चुनावी नतीजे आएंगे, वैसे ही राजस्थान में चुनावी तैयारियां परवान पर पहुंच जाएगी। इससे पहले वो लोग अपना होमवर्क कर रहे हैं, जो टिकट के दावेदार है। सबसे ज्यादा तैयारी भारतीय जनता पार्टी में हो रही है, जहां दावेदारों की संख्या दिन दुनी और रात चौगुनी बढ़ रही है। न सिर्फ शहर में बल्कि ग्रामीण अंचल की विधानसभा सीटों पर भी जोरदार लॉबिंग का खेल शुरू हो गया है। वर्तमान विधायकों को अपने कामों से फुर्सत नहीं है और नए विधायक बनने के दावेदारों ने उनकी जमीन हिलानी शुरू कर दी है।बात लूणकरनसर की हो या फिर नोखा की। हर कहीं नए दावेदार सामने आ रहे हैं। लूणकरनसर में एक दावेदार ने तो गांव गांव चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं। जातिगत राजनीति के आंकड़े दिमाग में सेट करके वो निकल पड़े है सफर पर। हर हाल में इस बार टिकट लाना है। इन नेताजी का तय रूप से मानना है कि अगर मानिकचंद सुराना को टिकट नहीं मिला तो सबसे बड़े दावेदार भाजपा से ये ही है। लूणकरनसर में प्रवेश करने के साथ ही सबसे पहले इनका ही चित्र वहां नजर आता है। लोकतंत्र की यही सुंदरता है कि यहां हर कोई अपनी दावेदारी जता सकता है। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि बीकानेर के एक वरिष्ठ नेता बड़े ओहदे वाले नोखा से चुनाव लड़ सकते हैं। अब तक तो उनकी बीकानेर पूर्व और पश्चिम से ही चुनाव लडऩे की अटकले आ रही थी लेकिन पाटे पर अब इनके नोखा से चुनाव लडऩे की खबर ने कुछ को परेशान कर दिया और शहर वालों को कुछ राहत दे दी। समझ नहीं आ रहा इस एक नेता को भारतीय जनता पार्टी कहां कहां पर दावेदार बनाएगी। इस नगर का विकास फिर कौन करेगा?
कांग्रेस का हिन्दूवादी प्रेम
कांग्रेस आजकल हिन्दूवाद में शायद भाजपा से भी आगे निकलने की कोशिश में है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर मंदिर मत्था टेक रहे हैं तो स्थानीय स्तर तक इसका असर दिख रहा है। एक कांग्रेस नेता गौ सेवा में व्यस्त है। सुबह उठने के साथ ही गायों की सेवा में लग जाते हैं। बताया जाता है कि गाय की सेवा से फल मिल जाता है। इनका तो बस एक ही लक्ष्य है कि एक बार जैसे-तैसे विधायक बनना है। गौ सेवा ऐसा मुद्दा है, जिस पर हिन्दू भी साथ है और पार्टी से नए मतदाता भी जुड़ रहे हैं। वैसे बता दें कि कुछ और कांग्रेसी नेता इन दिनों हिन्दू और सनातन विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। अच्छी बात है।
नमो विजय मंच
राजनीति के लिए मंच की जरूरत होती है, इसलिए हर कोई इसी जुगत में लगा है कि उसे टिकट मिल जाए। अब टिकट लेने के लिए अपना दमखम भी दिखाना पड़ता है। बाकी दावेदारों ने अपना काम किया, एक नेताजी ने अपना काम शुरू कर दिया है। बकायदा एक मंच गठित किया गया है, कार्यालय खोला गया है। नाम भी ऐसा दिया गया है जो कई अर्थ लिए हुए हैं। नमो विजय मंच। नमो यानी नरेंद्र मोदी और विजय यानी जीत। नरेंद्र मोदी को जीत मिले इसके लिए इस मंच का गठन किया है। या फिर यूं कहें कि भाजपा के एक 'विजयÓ को विजय दिलाने के लिए जतन अभी से शुरू हो गए हैं। अच्छी बात है। राजनीति में भी आजकल ऐसा ही है, जो दिखता है वो चलता है।
छवि सुधारने में लगे हैं
बात लूणकरनसर की चल पड़ी है तो बड़े वाले नेताजी की भी बात कर लेते हैं। सुनने में आया है कि वो आज कल काफी 'लिबरलÓ हो गए हैं। लोगों के बीच बैठते हैं, बात करते हैं, उनकी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। विधानसभा चुनाव में इस बार भी अपनी पार्टी से वो इकलौते दावेदार है। पिछले चुनाव में अपने ओहदे और जिम्मेदारियों के कारण ठेठ ग्रामीण परिवेश वाले 'अपनोंÓ को नाराज कर बैठे थे। इस बार इस छवि को बदलने में लगे हैं कि वो कुछ अलग अंदाज में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में जो भी रूस गए हैं, अरे... वो विदेश वाला रूस नहीं...। रूस गए यानी जो नाराज हो गए हैं, उन्हें वापस राजी करने में लगे हैं। छोटी छोटी बातों की नाराजगी दूर हो जाती है तो बड़ी बड़ी सफलताएं मिल ही जाती है।

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'सबको खुश करना नामुमकिन'

एक व्यापारी के तीन पुत्रों ने अलग अलग व्यापार प्रारम्भ किये। एक ने खेती, दूसरे ने कुम्भकार और तीसरे ने हिल स्टेशन पर होटल चलाने का कार्य प्रारम्भ किया। व्यापारी ने एक दिन तीनों के हाल चाल जानने हेतु यात्रा की। जब वह पहले पुत्र के घर पहुंचा तो उसने पिता से वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। वह किसान था। उसका कार्य वर्षा पर आधारित था। दूसरे पुत्र के घर जाते ही पुत्र ने पिता को भीषण गर्मी पड़ते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। जब किसान को उसने वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते पाया तो वह आगबबूला हो गया और तुरंत ही प्रार्थना बंद करने को कहा। दुसरे पुत्र के कहने पर पिता ने गर्मी पडऩे की प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। अब व्यापारी तीसरे पुत्र के घर पहुंचा। व्यापारी पिता भीषण गर्मी पडऩे की प्रार्थना कर रहा था। यह देख तीसरा पुत्र क्रोधित हो गया और उसने अपने पिता को बसंत काल जैसे मौसम की प्रार्थना करते रहने को कहा। पिता को यह समझ नहीं आया कि आखिर वो ईश्वर से किस मौसम के लिये प्रार्थना करे?

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मानो ना मानो, दावेदार तो हो

कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रियता पचास तरह की चर्चाओं को जन्म दे देती है। ऐसे में आप मानो या ना मानो, लोग के जुबां पर बात आ ही जाती है। पिछले दिनों संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल की पत्नी गृह विज्ञान महाविद्यालय की वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. विमला डुकवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ समय से उनकी सक्रियता को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने कोई बात नहीं बोली। यहां तक कि स्वयं उनके निर्देशन में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में भी किसी ने मंच से इस तरह की बात नहीं की लेकिन मोहता भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ता ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि आप राजनीति में भी आ रही है तो हम आपका पूरा सहयोग करेंगे। अब उनके पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं। पास में बैठे लोगों से जरूर कहा कि उनका ऐसा कोई मानस नहीं है। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम के बाद वो बाहर निकले तो एक महिला ने भी उन्हें बड़े पद पर जाने का आशीर्वाद दे डाला। अब यह सब कुछ पत्रकारों के सामने होगा तो चर्चा ए आम तो होगी ही। वैसे आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी डॉ. विमला का नाम चर्चा में आया था और एक बार फिर इसी नाम पर चर्चा हो रही है। हालांकि स्वयं डॉ. विमला कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि वो चुनाव लडऩे के लिए सक्रिय नहीं है। जैसे हालात नजर आ रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार भी भाजपा के एक दल विशेष की ओर से उनका नाम आगे किया जाएगा। अगर ऐसा हो जाता है तो कोई गलत भी नहीं। पढ़ी लिखी सांसद आखिर किसको नहीं चाहिए? हां, वैसे वर्तमान वाले सांसद भी कहां कम है, वो तो आईएएस अधिकारी थे।

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'क्या आप स्टार हैं?

मैनेजमेंट की रिसर्च के अनुसार प्रत्येक संगठन पांच से सात प्रतिशत कार्मिक स्टार परफोरमर्स होते हैं। इन्हीं कर्मचारियों के कार्य के प्रति समर्पण के दम पर संगठन को विशेष पहचान मिल पाती है। स्टार परफोरमर्स के पास सिर्फ स्वप्न ही नहीं अपितु क्रियान्वित करने की शक्ति भी होती है। उसमे आंतरिक विश्वास की शक्ति होती है जहाँ कुछ भी असंभव नहीं होता। उद्यमिता को अपने व्यवहार में उतारने वाला, मुश्किलें आने पर मैदान में डटे रहने वाला और नव सृजन व परिवर्तन को स्वीकारने वाला ही स्टार होता है। जरा सोचिये, क्या आप संगठन के स्टार हैं? यदि आप स्टार नहीं हैं तो आप एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अपनी कार्यक्षमता, अधुनातन सोच, प्रोएक्टिव एप्रोच द्वारा एक स्टार कर्मचारी संगठन को उच्च स्तर पर ले जाता है। उसकी ऊर्जा का प्रवाह, नैतिक बल और विषय पर पकड़ अन्यों से श्रेष्ठ होती है। वही उसे स्टार बनाती है।

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'कष्ट देने हेतु आभार'

एक गर्भवती भूखी प्यासी महिला पेड़ के नीचे बैठी थी। प्यास से उसके प्राण निकल रहे थे। कहीं भी जल नहीं था। तभी उसे लगा कि पेड़ पर से कुछ बूंदें टपक रही हैं। उसने पास ही पड़ा मिट्टी का दीपक लिया और उसमे बूंदों को इकठ्ठा करने लगी। जैसे ही दीपक भरा तो महिला उसे पीने लगी। तभी एक चिडिय़ा आई और उसने दीपक को गिरा दिया। महिला क्रोधित हो गयी। उसने गुस्से में पास पड़ी लाठी से चिडिय़ा पर प्रहार किया। महिला ने ईश्वर को भला बुरा कहते हुए कई अपशब्द कहे। चिडिय़ा घायल हो गई और ज्यों त्यों उड़कर अपने घोंसले में चली गई। तभी महिला ने देखा कि जिसे वह निर्मल जल समझकर इकठ्ठा कर रही थी वो असल में एक सांप का जहर था जो उसके मुंह से टपक रहा था। यह देखते ही महिला की आँखों में अशु्र थे। उसने ईश्वर का आभार जताया और अपने कृत्य पर ईश्वर से क्षमा मांगी।

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नोट के साथ वोट

भारत में पहले आम चुनाव 1952 में हुए। इसी क्रम में बीकानेर में पहले सांसद का चुनाव बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा करणीसिंह ने लड़ा था। करणीसिंह महाराजा गंगासिंह के पौत्र और महाराजा सार्दुलसिंह के पुत्र थे। आजादी के बाद पहले आम चुनाव तक राजा-महाराजाओं के प्रति विशेष सम्मान व प्रेम नजर आता था। तब राजा-महाराजाओं से जब भी कोई व्यक्ति मिलता था तो अपनी हैसियत के अनुसार कुछ न कुछ लेकर जरूर जाता था, जिसको नजराना या भेंट कहा करते थे। राजा महाराजा से खाली हाथ मिलने का रिवाज उस समय नहीं था। इसी सोच व भावना के साथ बीकानेर की जनता ने महाराजा करणीसिंह को वोट दिए तो वोट के साथ एक नोट भी डाला। सोच यह थी कि महाराजा को खाली वोट कैसे दें! आखिर तो राजा है और राजा को पहली बार बिना मिले ही मिलना था तो खाली हाथ नहीं मिला जा सकता था।

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'प्राथमिकता क्या है?

एक महिला ने एक तोता खरीदा। विक्रेता ने कहा कि तोता बड़ा वाचाल है। पहले दिन जब तोता एक शब्द नहीं बोला तो महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की। विक्रेता ने महिला को कहा कि वो पिंजरे में शीशा लगा दे तो तोता बोल पड़ेगा। तोता नहीं बोला। दूसरे दिन विक्रेता ने एक छोटी सीढ़ी पिंजरे में रखने को कहा। तोता फिर भी नहीं बोला। तीसरे दिन विक्रेता ने पिंजरे में झूला रखने को कहा लेकिन तोता झूला देख कर भी नहीं बोला। चौथे दिन तोता मर गया। जब महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की तो विक्रेता ने महिला से तोते को दिये गये आहार की जानकारी मांगी। महिला ने धीरे से दुखी होकर कहा कि उसने तोते को आहार तो दिया ही नहीं। जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी- आहार। वह नहीं दिया तो बाकी सब दिया जाना निरर्थक रहा। महिला प्राथमिकता नहीं तय कर सकी कि तोते को क्या देना है।

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मदद: क्या सभी को नहीं चाहिये?

अपने घर के आगे एक दिन मुझे एक भिक्षुक दिखा. मैं अपनी बाइक को स्टार्ट करने के जद्दोजहद में था। मुझे लग रहा था कि इससे पहले कि यह भिक्षुक मुझसे कुछ मांगे, मैं घर से निकल जाऊं। इसी बीच मैंने देखा कि भिक्षुक अचानक फिसल कर गिर पड़ा है। मैंने तुरंत ही उससे पूछा कि क्या उसे कुछ मदद की ज़रूरत है? इस प्रश्न पर उसने जो उत्तर दिया उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। भिक्षुक ने मुझे उत्तर देते हुए कहा कि ' क्या सभी को ज़रुरत नहीं है - मदद की, प्रेम की, दया कीÓ। यह सुनकर मुझे लगा मानो मेरा समूचा ज्ञान व्यर्थ है। मेरी स्थिति काटो तो खून नहीं जैसी थी। भिक्षुक मुझे जीवन जीने का सार समझा गया। मुझे लगा कि ईश्वरीय वेश में वो भिक्षुक मुझे जीने की नई राह बता गया।

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