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'ऑर्थोडॉक्स संस्थान'

आपने देखा होगा कि दफ्तर में कई कर्मचारी अत्यधिक व्यस्त और कार्य से घिरे हुए दिखते हैं। ये कर्मचारी देर तक दफ्तर में डटे रहते हैं। ऐसा करने से उनके सीनियर्स को लगता है कि वे बड़ी निष्ठा से अपना कत्र्तव्य पालन कर रहे हैं। भारत में अधिकांश संस्थान ऑर्थोडॉक्स आधार पर कार्य करते हैं। ऑर्थोडॉक्स संस्थान को देसी भाषा में लाला की दुकान भी कहा जाता है। ऐसे संस्थानों में संस्थान गौरव, कार्य संस्कृति, कार्मिक उत्पादकता आदि शब्दों का प्रयोग वर्जित है। यहां तो लाला जी का फायदा और उनके निकट रहना ही हर कर्मचारी का प्रथम और आखिरी लक्ष्य होता है। ऐसी अवस्था में यदि आप बहुत तेज गति से अपने सभी कार्यों को पूर्ण कर लेते हैं अर्थात ओवर एफिशिएंसी रोग के शिकार हैं तो सावधान होने का समय आ गया है। ऐसे संस्थानों में आपको सिर्फ कार्य पूर्ण नहीं करना है अपितु हर पल कार्य कर रहे हो - ऐसा दिखाना भी जरूरी है। आप क्या हैं-यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह यह है कि आप स्वयं के कार्य व्यवहार से स्वयं को कैसा दिखाते या प्रस्तुत करते हैं। स्वयं को व्यस्त और कार्य में डूबा हुआ दिखाना भी कॉर्पोरेट में जरूरी है। यह आपको सीखना ही होगा।

स्वयं को सदा कार्य से परेशान दिखाना, कार्य से त्रस्त दिखाना - आज की आवश्यकता है। याद रहे कि श्रेष्ठ कार्य का एक जोरदार परिणाम है - और ज्यादा कार्य। स्वयं को कार्य में व्यस्त दिखाने का यह अर्थ कतई नहीं कि आप कार्य न करें। आप खूब मेहनत से कार्य करें लेकिन ऑर्थोडॉक्स संस्थान में व्यस्त न दिखना भी अपराध है। अत: ऑर्थोडॉक्स संस्थानों में अपना कार्य पूर्ण हो जाने के बाद भी स्वयं को निम्नलिखित तरीकों से व्यस्त दर्शायें -
* बॉस और कर्मचारियों के मध्य ज्यादा वर्कलोड का रोना सदा रोते रहें।
* सप्ताह में कुछ दिन देर तक ऑफिस में रुकें। लगना चाहिये कि बहुत काम है और आप जुटे पड़े हैं।
* अंतिम तिथि से पूर्व कोई एसाइन्मेंट जमा नहीं करें। भले ही वो पूर्ण हो चुका हो।
* ऑफिस के कम्प्यूटर पर सदा एक अधखुली ईमेल रखें ताकि लगे कि आप मेल करने में व्यस्त हैं।
* अपनी टेबल पर सदा 2 या 3 फाइल्स फैलाये रखें ताकि लगे कि आप बहुत व्यस्त हैं।
यहां मन्त्र यही है कि कार्य तो अवश्य करें लेकिन ये भी जतायें कि आप बहुत ही व्यस्त और कार्य से घिरे हुए कार्मिक हैं। कुर्सी से बंधे रहकर, स्वयं को अति व्यस्त दिखाकर और निस्संदेह श्रेष्ठ कार्य करके ही आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यही कॉर्पोरेट मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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'दिमाग में कूदता बन्दर'

एक निर्धन आलसी किसान बिना किसी प्रयत्नऔर मेहनत के तुरंत अमीर बन जाना चाहता था। एक दिन गांव में एक बड़े सिद्ध महात्मा जी आये। वे हर समस्या को हल करने के लिये अचूक मन्त्र देने वाले विख्यात संत थे। किसान ने उनसे अमीर हो जाने का मन्त्र मांगा। महात्मा जी ने किसान को अमीर बनने का अचूक मन्त्र लिखकर दे दिया और कहा कि यह अचूक मन्त्र करोड़ों अरबों रूपए ला सकता है। साथ ही महात्मा जी ने कहा कि यह मन्त्र सिर्फ तभी काम करेगा जब किसान को कोई भी बन्दर परेशान नहीं कर रहा हो। किसान ने सुनिश्चित किया कि मंत्रोच्चार के दौरान बन्दर उसे परेशान नहीं करेगा। घर जाकर ज्यों ही किसान ने मंत्रोच्चार शुरू किया, उसके दिमाग में बन्दर की आकृति छप गई। मन्त्र व्यर्थ गया। ऐसा सैकड़ों बार हुआ क्योंकि जब भी किसान मन्त्र जपता, तो दिमाग में, उसके विचार में उपस्थित बन्दर उसे याद आ जाता और मन्त्र अधूरा रह जाता। अन्ततोगत्वा उसने महात्मा जी से कहा कि चाहे उसे रूपए न मिलें लेकिन उसके दिमाग के बन्दर को बाहर निकालें। 

यह प्राचीन काल की सांकेतिक कथा है। यहां बन्दर हमारी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन को दर्शाता है। ये बन्दर चिंता करते रहने की प्रवृत्ति को भी दर्शाता है। हम चाहे जो काम कर रहे हों, हमें व्यर्थ की चिंता सताती रहती है। ऐसी अवस्था में हम परिणामों की चिंता में बड़े मगन हो जाते हैं। कई बार तो हम मूल कार्य को पूर्णतया भूल जाते हैं क्योंकि हम तो त्वरित परिणाम चाहते हैं। दिमाग का बन्दर यानि हमारे दिमाग की चंचलता हमें श्रेष्ठ निर्णय लेने से रोकती है। इसी दिमागी चंचलता और मस्तिष्क में छुपे बन्दर रूपी उथल पुथल को उन्प्रोडक्टिव थिंकिंग कहते हैं। इस तकनीक में समस्या का वृथा विश्लेषण चलता रहता है। समाधान कुछ नहीं मिलता। भारतीय प्रणाली इससे विपरीत "ब्रेन स्टिलिंग" अर्थात स्थिरचित्त मस्तिष्क की वकालात करती है। यहां निर्णय लेने हेतु स्थिरचित्त होकर समस्त पहलुओं पर गौर करने को प्राथमिक आवश्यकता बताया गया है। यह आवश्यक भी है।
इस कथा का दूसरा संकेत है कि साधन (मन्त्र का जाप) का भी उतना ही महत्व है जितना कि लक्ष्य (धन प्राप्ति) का। हमें समझना चाहिये कि सिर्फ सोचने से, ठान लेने से, या मोटिवेट हो जाने से ही लक्ष्य प्राप्त नहीं होते। लक्ष्य प्राप्ति हेतु अथक परिश्रम और जीवटता की आवश्यकता है। यहां मन्त्र यही है कि ब्रेन स्टिलिंग और परिश्रम ही सफलता का मर्म है।

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'प्रत्येक वस्तु महत्वपूर्ण

 

एक बड़े वट वृक्ष पर तुरई की बेल चढऩे लगी। वृक्ष बड़ा अहंकारी था। वृक्ष ने सोचा कि इतने सबल, उच्च और विराट वृक्ष पर बेल का क्या काम? अत: वो बेल को अत्यंत ही तुच्छ समझने लगा। वृक्ष ने बेल को तुच्छ और निर्बल बताकर उसे भला बुरा भी कहा। बेल ने कोई जवाब नहीं दिया। एक दिन कुछ व्यक्ति पेड़ के निकट पहुंचे। उन व्यक्तियों ने वार्तालाप करते हुए यह तय किया कि वृक्ष को काट दिया जाये। वृक्ष को काटना इसलिए आवश्यक था क्योंकि उस वृक्ष के फल बड़े कड़वे थे तथा मनुष्य के लिये अच्छे नहीं थे। जब तुरई के बेल ने ये सूना कि वृक्ष कटने को है तो उसने तुरंत ही कहा कि ये वृक्ष उसका सहारा है अत: इसे ने काटा जाये। बेल ने कहा कि वृक्ष के फल भले ही कड़वे हों लेकिन तुरई तो मीठी है अत: वृक्ष न काटा जाये। लोगों ने बात मान ली। वृक्ष लज्जित हुआ। वृक्ष जिसे निकृष्ट समझता था उसी बेल ने वृक्ष के प्राण बचाये। वृक्ष समझ गया कि असली जीवन सभी के सम्मान को बनाये रखने में है।
इस कथा से स्पष्ट है कि है कोई भी व्यक्ति तुच्छ नहीं होता। प्रत्येक का अपना अलग महत्व होता है। किसी को कमजोर, नाकारा या बेकार समझना मानसिक दरिद्रता का प्रतीक है। आप नहीं जानते हैं कि कब, कहां आपको किस व्यक्ति से क्या काम पड़ सकता है? अत: किसी भी व्यक्ति के लिये तिरस्कार या घृणा का भाव न रखें। यही जीवन जीने का श्रेष्ठ तरीका है। भारतीय समाज किसी को भी तुच्छ नहीं मानताण् भारतीय दर्शन तो कहता है कि जो ब्रह्म भाव या ईश्वरतत्व का अंश मेरे पास है वही तुम्हारे पास भी है। यदि दोनों मनुष्यों में एक ही ईश्वर निवास करता है तो भेदभाव कैसा? शक्ति, पैसा, रूतबा आदि के बल पर समाज को बांटना मूर्खता है। प्रतिपल यह याद रखना चाहिये कि इस संसार में उपस्थित प्रत्येक सजीव या निर्जीव वस्तु का अपना महत्व है। ईश्वर किसी की भी रचना व्यर्थ में नहीं करता। ऐसा भाव लेकर समाज में जीना चाहिये। सभी को समान और समतुल्य मानने का भाव ही संतोष और आनंद को जन्म देता है। यही सफल सेल्फ मैनेजमेंट का मर्म है।

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सभापति होने के नाते मैं नगर का प्रथम नागरिक हूं कलक्टर साहब

बात तब की है जब बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बीकानेर आने वाले थे। इस हेतु कार्यक्रम की रूपरेखा बन रही थी और उसमें कांग्रेस के नेताओं सहित नगर परिषद बीकानेर के तत्कालीन अध्यक्ष द्वारका प्रसाद पुरोहित भी सक्रिय रूप से लगे हुए थे। जब पंडित नेहरू के स्वागत भाषण की बात आई तो तत्कालीन जिला कलक्टर ने कहा कि जिले का सर्वोच्च अधिकारी कलक्टर होने के नाते भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत मैं करूंगा और स्वागत भाषण मैं ही दूंगा। उनकी इस बात का समर्थन वहां बैठे नेताओं ने भी किया। परंतु जिला कलक्टर की यह बात सुनते ही वहां बैठे नगर परिषद के अध्यक्ष द्वारका प्रसाद पुरोहित ने बड़े सख्त लहजे में कहा कि कलक्टर साहब आप जनता के सेवक है और अधिकारी भले सर्वोच्च हैं लेकिन आपको प्रधानमंत्री का सर्वप्रथम स्वागत करने का अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री का स्वागत करने का अधिकार नगर परिषद का सभापति होने के नाते मेरा है क्योंकि मैं ही इस नगर का प्रथम नागरिक हूं और पूरे बीकानेर की जनता का प्रतिनिधित्व करता हूं। इस नाते बीकानेर में प्रधानमंत्री का स्वागत मैं ही करूंगा, स्वागत भाषण मैं ही दूंगा और इस हेतु मुझे आपसे कोई आपत्ति नहीं है। सभापति होने के नाते मैं नगर का प्रथम नागरिक हूं कलक्टर साहब या पूछताछ नहीं करनी है और जनप्रतिनिधि होने के नाते आपको ये मेरा आदेश है। इतना सुनते ही वहां बैठे सब लोग हतप्रद रह गए और जिलाधीश भी सर झुकाकर बैठ गए। इस तरह पंडित नेहरू का स्वागत जनप्रतिनिधि द्वारका प्रसाद पुरोहित ने किया। अपने होने की स्थिति को लेकर इतने सजग लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि का यह किस्सा आज भी बीकानेर के लोगों की जुबान पर है।

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लोकतांत्रिक संस्थाएं कब स्वीकार करेगी संविधान को

गणतंत्र दिवस पर सभी को शुभकामनाएं। उनको विशेष रूप से बधाई है, जो न तो गण को मानते हैं और न तंत्र को स्वीकार करते हैं। वर्ष 1950 में हम जिस संविधान को लेकर भारत को गरीब से विकासशील देश बनाने की जुगत में जुटे थे और आज जिस विकासशील भारत को विकसित बनाने का सपना संजो रहे हैं, उस संविधान को धार्मिक ग्रंथ की तरह लेते तो भारत आज अमेरिका, चीन और दूसरे विकसित राष्ट्रों से कमजोर नहीं होता। नि:संदेह वर्ष 1947 के भारत को बहुत पीछे छोड़कर हमने नए भारत को बनाया है, लेकिन दुख की बात है कि जिन लोगों पर संविधान को लागू करने का जिम्मा था, उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपना कर्म नहीं किया। हमारी तरक्की के मुख्य कारक देशवासी ही है। जिन संस्थाओं (लोकसभा, राÓयसभा और विधानसभाओं) को यह जिम्मा सौंप रखा है वो देशवासियों की मानवशक्ति का सही उपयोग करने के बजाय दुरुपयोग करती है। सवा सौ करोड़ भारतीयों का यह देश ऐसे विवादों में उलझा रहता है, जिसका न सिर है न पैर। यह चर्चाएं किसी बाहरी देश से नहीं आती, बल्कि हमारे नेता ही उठाते हैं। एक नेताजी कुछ ऊटपटांग बोलेंगे और पूरा देश और मीडिया उसकी बकवास पर चर्चा करना शुरू कर देती है। आखिर क्यों, राष्ट्र की मानवशक्ति सकारात्मक के बजाय नकारात्मक दिशा में बढ़ती जा रही है। ताजा उदाहरण 'पद्मावत' की ही ले सकते हैं। जब देशवासी और जाति विशेष के लोग नहीं चाहते कि उनकी भावनाओं को आहत किया जाए तो क्या जरूरी है, ऐसे विषय पर फिल्म बनाई जाए? क्या हम पद्मावत फिल्म को नहीं देखेंगे तो कुछ उम्र कम हो जाएगी। आखिर क्यों ऐसे विषयों को ढूंढा जाता है, जिस पर आपत्ति हो, झगड़ा हो, फसाद हो। पूरी तरह से मार्केटिंग और प्रोफेशनल हो चुके फिल्म निर्माता और न्यूज चैनल इस देश की भोली भाली जनता को बातों में उलझा देते हैं और हर कोई बस उसी मामले में शामिल होने में जुट जाता है। विरोध है, विरोध है, समर्थन है, समर्थन है, समर्थन है। क्यों विरोध है और क्यों समर्थन है, अधिकांश लोग नहीं जानते। 

हमारे संविधान के प्रथम पृष्ठ बताया गया है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या सच में यह हालात है? शायद नहीं है। टीवी चैनल की बहस (अमूमन बकवास भी) में लड़ते हिन्दू और मुसलमान साफ बयां करते हैं कि देश में सभी के मन में सभी भावनाओं का सम्मान नहीं है। आखिर कोई व्यक्ति इस मुद्दे पर उ"ातम न्यायालय में क्यों नहीं जाता कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धार्मिक मुद्दों पर सार्वजनिक बहस क्यों होती है? क्यों हम किसी भी व्यक्ति को दूसरे धर्म के खिलाफ बोलने की आजादी दे देते हैं और वो भी एक ऐसे राष्ट्रीय चैनल पर, जिसे लाइव हजारों-लाखों लोग देख रहे हैं।
युवाओं की समस्याओं को निपटाने के लिए देश की संसद क्या कर रही है। जिस देश की सरकारें युवाओं को नौकरी देने के नाम पर हर साल अरबों रुपए की कमाई करती है, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? आश्चर्य की बात है कि हम किसान का कर्ज माफ कर रहे हैं, बैंक में समय पर ऋण की किश्त जमा नहीं कर रहे लोगों को ब्याज माफ कर रहे हैं, अमीर गरीब देखे बगैर दवाएं मुफ्त बांट रहे हैं और स्कूलों में फ्री पढ़वा रहे हैं, वहां युवा को नौकरी के लिए निशुल्क आवेदन करने की छूट नहीं है। बेहतर होगा कि सरकार यह तय कर दें कि एक तय प्राप्तांक तक पहुंचने वाले युवा को तो कम से कम शुल्क वापस कर देंगे। वो एक पद के लिए एक बार पंजीयन कर लें और बाद में उस पद के लिए आवेदन निशुल्क कर दें। दुख की बात है कि इस मुद्दे पर देश का कोई नेता नहीं बोलता। किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में ऐसा साहस नहीं है। वैसे भी घोषणा पत्र तो महज मुर्ख बनाने का जरिया रह गया है। कांग्रेस हो या फिर भाजपा, सभी हजारों, लाखों युवाओं को रोजगार देने की घोषणा करती है लेकिन चार साल बाद जब हिसाब देने का वक्त आता है तो निजी स्कूलों में दो-तीन हजार रुपए की नौकरी करने वालों की संख्या भी सरकार अपने आंकड़ों में जोड़कर दिखा देती है।
संविधान में कहां बताया गया है कि नेता को सिर्फ अपनी पार्टी के पक्ष में बोलना है? वो सांसद, विधायक यहां तक कि पार्षद बनने के बाद भी गलत को गलत कहने की हिम्मत खो देता है। जो पार्टी के हित में है, वो ही सही है। पार्टी लाइन पर चलने वाले हमारे जनप्रतिनिधि देश की लाइन पर कब चलेंगे? आज हमें ही तय करना होगा कि हम गण और तंत्र दोनों का सम्मान करेंगे। नेताओं के लिए पार्टी पहले हो सकती है, लेकिन हम देशवासियों के लिए देश ही सबसे पहले हैं। आज शपथ लें कि धार्मिक ग्रंथ की तरह हम संविधान का भी सम्मान करेंगे।

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शिक्षा मंत्री को हरा देता तो सरकार की बेइज्जती हो जाती

बात तब की है जब बीडी कल्ला शिक्षा मंत्री थे। उनके बाल सखा शिक्षक खुशालचंद व्यास अपने काम से उनके पास जयपुर पहुंचे। बचपन के मित्र से मिलकर डॉ. कल्ला खुश हुए और बचपन की याद ताजा करते हुए पूछा, कैसे आना हुआ। व्यास जी ने अपना काम कल्ला जी को बताया और सहयोग का आग्रह किया। डॉ. कल्ला व्यास जी को बोले कि काम तो हो जाएगा मगर एक बार दोस्ती की याद ताजा करो और कुश्ती लड़ो। व्यासजी दंग रह गए कि आज ये मित्र शिक्षामंत्री है और कुश्ती लडऩे का उनका मानस भी नहीं था। परंतु दोस्ती के आग्रह को अस्वीकार भी नहीं कर सकते थे। इसलिए उपस्थित लोगों के समक्ष अखाड़ा लगा और दंगल शुरू हुआ। सभी लोग शिक्षामंत्री और उनके दोस्त को एक दूसरे पर जोर आजमाईश करते देखकर दंग रह गए। थोड़ी ही देर में मंत्री जी ने व्यास जी को हरा दिया। हराने पर मंत्री बोले, आज भी पटक दिया न। खुशालचंद व्यास ने हाजिर जवाब दिया, हारा हूं हराया नहीं क्योंकि मेरा ध्यान आपके गनमैन की तरफ था। अगर मैं आपको चोट पहुंचाता तो गनमैन अपनी ड्यूटी निभा लेता। व्यास जी के इस जवाब से सभी खिल खिलाकर हंस पड़े। कल्ला जी ने कहा कोई नहीं दंगल दुबारा होगा और इस बार स्टाफ और गनमैन दोनों नहीं होंगे। कुश्ती पुन: हुई और इस बार फिर कल्ला जी ने अपने मित्र को चित कर दिया। कल्ला अपने मित्र से बोले क्यों अब तो हार मानते हो न। हाजिर जवाब व्यास जी बोले नहीं मंत्री महोदय इस बार भी मैं हारा हूं क्योंकि अगर लोगों को पता चलता कि प्रदेश का शिक्षामंत्री एक शिक्षक से हार गया तो आपकी बेइज्जती हो जाती और दोस्त की इज्जत रखना मेरा कत्र्तव्य है। इतना सुनकर वहां खड़े सब लोग ठहाका लगाए बिना नहीं रहे। जब ये किस्सा डॉ. कल्ला ने बताया तो अपने दिवंगत मित्र को याद कर उनकी आंखें भर आई।

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'हारिये न हिम्मत'

एक वैज्ञानिक ने एक पानी की टंकी में शार्क छोड़ी। कुछ समय बाद वैज्ञानिक ने उस टंकी में एक छोटी मछली को छोड़ा। शार्क ने तुरंत छोटी मछली पर आक्रमण किया और उसे खा गई। थोड़ी देर बाद वैज्ञानिक ने उस टंकी के बीचों बीच एक ग्लास की मोटी शीट लगा कर उस टंकी को दो भागों में बाँट दिया। अब टंकी के एक भाग में शार्क थी और दूसरा भाग खाली था। वैज्ञानिक ने खाली भाग में एक छोटी मछली डाली। मछली देख शार्क ने आक्रमण प्रारम्भ किया लेकिन शार्क हर बार ग्लास की शीट से टकरा जाती और मछली खाने में असफल रह जाती। अब वैज्ञानिक ने टंकी में से ग्लास की शीट को हटा दिया। वैज्ञानिक अब यह देखकर आश्चर्यचकित था कि शार्क अब उस छोटी मछली पर आक्रमण कर ही नहीं रही थी। यहां ये सिद्ध हुआ कि शार्क हिम्मत हार गई। शार्क ने मानसिक पराजय स्वीकार कर यह सोच लिया कि अब वो उस छोटी मछली को नहीं खा सकती। इसी को "मेंटल बेरियर" कहते हैं। 

इस कथा से हमें यह समझना चाहिये कि:
* वास्तविक बाधाएं सिर्फ मानसिक ही होती हैं। यदि आपके मस्तिष्क ने यह ठान लिया है कि अमुक कार्य असम्भव है तो वो असम्भव ही होगा।
* मेंटल बेरियर्स वे बाधाएं होती हैं जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं होती हैं लेकिन मस्तिष्क में होती हैं। इसका अर्थ है कि उसे भी बाधा मान लेना जो वास्तव में है ही नहीं। मैनेजमेंट एक्सपर्ट्स "मेंटल बेरियर्स" को सबसे खतरनाक बाधा मानते हैं।
* हार मान लेने का भाव ही संसार का सबसे घटिया भाव है। यहां शार्क ने मानसिक रूप से हार मान ली। हार मान लेना ही व्यक्ति की मानसिक मृत्यु होना होता है। अत: जीवन की मुश्किल परिस्थितियों से जमकर लडिय़े।
* आप और हम जब भी पराजित या असफल होते हैं तो भावनात्मक रूप से टूटा हुआ महसूस करते हैं। इस कारण आगे प्रयास करना ही बंद कर देते हैं। प्रयास किये बिना कुछ भी प्राप्त हो नहीं पाता। अंतत: हम परास्त मानसिकता के शिकार होकर हिम्मत हार जाते हैं।
यहां मन्त्र यही है कि हिम्मत हार जाना कायरता का संकेत है। हिम्मत हारना तो अपराध है। हिम्मत हारकर बैठना और खुद को कोसना - स्वयं का, परिवार का, समाज का और ईश्वरीय सत्ता का अपमान है। इससे बचिये। हार से जमकर लडऩे वाले हिम्मती व्यक्तियों को मंजिल मिलना तय है। यही सेल्फ मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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'बहानासाइटिस'

एड्स, कैन्सर और हार्ट अटैक से भी भीषण बीमारी है - बहानासाईटिस.। बहानासाईटिस बीमारी के लक्षण हैं - बहाने बनाना, अपनी असफलता हेतु अन्यों को दोष देना, कुंठाग्रस्त होकर अपनी विफलता के लिये भाग्य को कोसना और सदा कुढ़ते रहना। यदि बुरा वक्त आ जाये तो बहाने नहीं बनायें। ऐसा नहीं सोचें कि बुरा वक्त सिर्फ आपका ही आया है। आप अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिसे मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया है। मुश्किल काल में अपने आस पास देखें कि अन्य कई व्यक्तियों के जीवन में भी मुश्किलें आई हैं। आवश्यक नहीं है कि सौभाग्यशाली या 'चांदी का चम्मच लेकर जन्मेÓ लोग ही सफल हुए हैं। असफलता को चुनौती मानकर उससे डटकर मुकाबला करने वालों की भी संसार में कमी नहीं है। अत: बहाने बनाने छोडिये। मुश्किलों से जमकर लडिय़े और विजयी बनिये।

जरा सोचिये -
* अनेकानेक बार चुनाव हारने और व्यावसायिक असफलता के बावजूद ट्रुमेन निराश नहीं हुए और अमरीका के राष्ट्रपति बने।
* उत्पीडन का शिकार होने के बावजूद ओपेरा महान उदघोषक बनी।
* निराशा के कारण आत्महत्या का विचार कर चुके स्वामी प्रेम आनंद रामकृष्ण परमहंस के समझाने पर बेहतरीन साहित्यकार बन गये।
* फ्रेंक्लिन रूजवेल्ट ने व्हील चेयर पर होने के बावजूद अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में सेवायें दी।
इन उदाहरणों से साफ है कि सफल वही हुए हैं जिन्होंने जीवटता से जीवन का संग्राम लड़ा और कभी भी बहानासाईटिस की बीमारी से ग्रस्त नहीं हुए।
क्या आप इन वाक्यों का प्रयोग करते हैं?
* देखते हैं।
* कल बात करते हैं।
* इसपर कमेटी बना देते हैं।
* मेरा तो भाग्य ही खोटा है।
यदि आप इन वाक्यों का प्रयोग करते हैं तो आप बहानासाईटिस बीमारी से ग्रस्त हैं। इस बीमारी से बचने हेतु :
* अपनी मुसीबतें अन्यों पर या भाग्य पर थोपना बंद कर दीजिये। आज से ही अमल कीजिये।
* अपने भाग्य को स्वीकारिये। प्रतिकूल परिस्थिति को स्वीकारिये। ये जीवन का अंग है।
* विकटतम परिस्थितियों में जीवटता से जमे रहिये।
* स्वयं की मदद स्वयं करें। अन्य मदद करेंगे, ये भाव बेकार है।
यहां मन्त्र यही है कि अपनी ताकत पर भरोसा रखकर समस्त समस्याओं का हल निकालने का प्रयास ही मैनेजमेंट का प्राण तत्व है।
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या दोस्त;
दीवारों में ही तो दरवाजे निकाले जाते हैं।

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कांग्रेस का यह कैसा डीएनए

न सिर्फ गाय बल्कि गौ के पूरे वंश यानी गौ वंश की रक्षा के लिए अचानक से कांग्रेसी चिंतित हो गए हैं। राहुल गांधी एक बात बार बार बताते हैं कि कांग्रेस के डीएनए में क्या-क्या है। इतना निश्चित है कि यह गाय कभी कांग्रेस के डीएनए में नहीं थी। इसके बाद भी उनकी पार्टी के बैनर तले इस तरह हिन्दूवादी नीति रीति की न सिर्फ बातें बल्कि उनकी आस्था से जुड़े मुद्दों की बात भी हो रही है, तथाकथित चिंता हो रही है और इसी चिंता का जमकर जिक्र हो रहा है। कांग्रेस के डीएनए में नहीं होते हुए भी ऐसा क्यों हो रहा है, इसका जवाब 'कींकरिया क्लबÓ के एक साथी ने दे दिया। उन्होंने कहा कि गोपाल गहलोत के डीएनए में गाय और हिन्दूवादी राजनीति थी। वो कांग्रेस में आकर भी वैसा ही कर रहे हैं। एक दूसरे नेता जो कांग्रेस से भाजपा में चले गए हैं, वो आज भी कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर रहे हैं। बताते हैं कि पिछले दिनों वो खुद यह स्वीकार कर चुके हैं कि वो कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर सकते हैं। 

दरअसल, कांग्रेस और भाजपा के जिन नेताओं ने पिछले चुनाव में पार्टी बदली थी, उनमें अधिकांश का अपनी मूल पार्टी में ही मन लगता है। एक नेताजी अब कांग्रेस में आ गए हैं लेकिन साथी और 'चेलेÓ अब भी भाजपा में ही है। ऐसे में वो स्वयं कांग्रेस में रहकर भाजपा के अपने मित्रों को अब तक संभाले हुए हैं। भाजपा के युवा नेताओं का समर्पण इन नेताजी के प्रति इतना जबर्दस्त है कि वो चाहकर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। अच्छी बात है। राजनीति किसी पार्टी की सीमाओं में बंधकर नहीं की जा सकती। प्रतिबद्धता एक पार्टी के प्रति हो सकती है लेकिन मित्रता सभी के साथ होनी चाहिए। बीकानेर में दो पार्टियों के बीच ऐसी मित्रता देखकर मन को सुकून मिलता है।


फिर से कर्मचारी नेता सक्रिय है


विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही कर्मचारी नेता फिर सक्रिय हो गए हैं। विभिन्न विभागों की राजनीति कर रहे कर्मचारी नेता जैसे ही चुनाव आते हैं अपनी राग तेज कर देते हैं। उनके साथ वाले भी समझ जाते हैं कि इन्हें चुनाव लडऩा है, वो ही उन्हें पीछे धकेलना शुरू कर देते हैं। दो कर्मचारी नेता इस बार भी टिकट की कोशिश में है। एक नेताजी बीकानेर में राजनीति करते हैं और दूसरे जयपुर में। दूसरे वाले नेताजी कभी कभार ही जयपुर से बीकानेर आते हैं। वो सत्ता के नजदीक है लेकिन सत्ता का हिस्सा अब तक नहीं बन पाए। पिछले दो विधानसभा चुनाव में उनका नाम आता है, टिकट नहीं आता।


बेनीवाल बिगाड़ रहे हैं फिल्डिंग

हनुमान बेनीवाल ने प्रदेश की राजनीति में अड़ंगा डाला है तो बीकानेर में भी उनसे कई बड़े नेता अब परेशान हो रहे हैं। लाखों युवाओं की मीटिंग करने वाले राजस्थान के इक्का दुक्का नेताओं में से एक हनुमान बेनीवाल ने जैसे ही बीकानेर में हुकार रैली करने की घोषणा की, वैसे ही कई नेताओं के चेहरे पर चिंता की लकीरे नजर आने लगी है। दरअसल, बेनीवाल अगर यहां मजबूत होते हैं तो कई विधानसभा सीटों पर असर डाल सकते हैं। उनसे सर्वाधिक कांग्रेस प्रभावित होगी। नोखा, श्रीडूंगरगढ़ और लूणकरनसर सीटों पर बेनीवाल की प्रभावी उपस्थिति रहती है तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को जाने वाला है। दरअसल, कांग्रेस विचारधारा के किसान मतों का बंटवारा ही बेनीवाल करेंगे। पिछले दिनों पत्रकार सम्मेलन में उनसे यह सीधा सवाल पूछा तो वो हंसी मजाक में टाल गए।

जिसा छोड़ग्या, बिसा ही हां

पद के साथ व्यक्ति की विचारधारा बदल जाती है। व्यस्तता भी बढ़ जाती है। इसी विचारधारा और व्यस्तता के बीच कई बार अपने पराए होने लगते हैं। अब तक जो लोग हमारे आगे पीछे दौड़ रहे थे, वो ही लोग बोझ लगने लगते हैं। उन्हें जरा से टेढ़ा बोला नहीं कि वो किनारे हो जाते हैं। न सिर्फ किनारा करते हैं बल्कि विरोधी उसे तुरंत अपने साथ जोड़ भी लेते हैं। पिछले दिनों कांग्रेस के एक कद्दावर नेता को कुछ ऐसा ही अहसास हुआ। इनके पास सत्ता नहीं होने के बावजूद दबदबा होने के कारण स्वभाव में अंतर देखा गया। एक युवा नेता उनसे नाराज हो गए। जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उपस्थिति में इस बड़े नेता ने अपने युवा नेता से कुशलक्षेम पूछी तो युवा नेता ने यह कहकर किन्नी काट ली..'जिसा थे छोड़ग्या हा, बिसा ही हांÓ

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'मेन्टल ब्लॉकेज'

मेन्टल ब्लॉकेज वर्तमान समय की बहुत बड़ी समस्या है. मेन्टल ब्लॉकेज का अर्थ है मस्तिष्क को एक दिशा में ही सोचने हेतु मजबूर करना, अपनी कार्यविधि को ही श्रेष्ठ मानना और विरोधी विचारधारा को बिलकुल स्वीकार न करना. यह गलत है. हाल ही में मैं अपने मित्र के घर गया. उसकी पुत्री ने मुझसे कहा कि वो अपने कमरे और स्टडी टेबल को सही ढंग से रखने का बहुत प्रयास करती है लेकिन दो दिन बाद ही कमरा वापिस अस्त व्यस्त हो जाता है. मैंने उसके कमरे में पड़ी एक पुस्तक को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया. ऐसा करते ही वो तुरंत बोली कि यह तो गलत है. ऐसा कहकर उसने पुस्तक को वापिस अपने द्वारा तय किये गये स्थान पर रख दिया. अब मैंने उसे समझाया कि उसने अपने मस्तिष्क में यह तय कर लिया है कि किस वस्तु को कहाँ रखना है. जब ऐसा नहीं हो पाता तो उसे लगता है कि सब अस्त व्यस्त है. अत: इससे बचे. मस्तिष्क को नया प्रयोग करने दे. जरूरी नहीं कि जो वो सोचती है, वही सही हो. अस्त व्यस्त कमरा नहीं अपितु हमारा मस्तिष्क है. इसपर सोचे. 

हमारी मूल समस्या यही है कि हमने अपने मस्तिष्क को एक ही प्रकार से कंडीशन कर दिया है. यह आवश्यक कतई नहीं है कि जिसे आप सही समझते हों या जो आपका निजी दृष्टिकोण हो, वही शाश्वत सत्य भी हो. मस्तिष्क को नये तरीकों से विचार करने दीजिये. क्या आप जानते हैं कि :
*आपका मस्तिष्क लगभग छ हजार मील जितनी लम्बी वायरिंग के रूप में गुंथे न्यूरोन्स के माध्यम से कम्युनिकेट करता है.
• आपका तंत्रिका तंत्र लगभग 28 लाख न्यूरोन्स से बना है जो शरीर के किसी भी भाग की सूचना को मात्र 20 मिलीसेकेंड में मस्तिष्क को पहुंचा देते हैं.
• आपका मस्तिष्क कई सुपर कम्प्यूटर्स से भी ?्यादा ते? और बेहतर है क्योंकि वो 30 लाख बिट्स की सूचना एक सेकंड में याद रख लेता है.

अब ?रा सोचिये:

• ईश्वर द्वारा दिये गये इस अनमोल तोहफे का क्या आप सही इस्तेमाल कर रहे हैं?
• कहीं आपने अपने मस्तिष्क में कुत्सित और घृणित विचार तो नहीं भर दिये हैं?
• क्या आप विरोधी विचारों को सहन करते हैं?

इनपर विचार करें और मस्तिष्क को खुला रखें. नये विचारों को ग्रहण करें. "सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार मेरे पास आते रहें" – भारतीय शास्त्र के इसी वाक्य को अपना आदर्श मानें. नया सीखना ही जीवन है अत: मेन्टल ब्लॉकेज से बचिये.

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