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सिनेमा स्कोप (नवल व्यास) (16)

जाने भी दो यारो से अनुपम खेर का गायब होना

हिन्दी सिनेमा पर बहुत सी किताबें लिख चुके जय अर्जुन सिंह ने जाने भी दो यारो पर लिखी अपनी एक किताब में ये बताया कि इस फिल्म में अभिनय करने वाले गुणी लोगो में से एक अनुपम खेर भी थे। फिल्म में डिस्को किलर नाम के साइको का एक बेहद दिलचस्प किरदार अनुपम खेर के हिस्से में आया। उस समय तक अनुपम को सारांश नही मिली थी और ये उनकी पहली फिल्म होने जा रही थी। शूटिंग करते हुए बाकी सभी अभिनेताओं को अनुपम से रश्क हो गया। इतना खूबसूरती से डवलप किया हुआ किरदार जिसमे अभिनेता के हिस्से में बहुत कुछ आया था और अनुपम खेर उम्दा नही तो कम से कम इतना बुरा अभिनेता भी नही था। सबको यही लग रहा था कि फिल्म रिलीज के बाद इसी रोल की सबसे ज्यादा चर्चा होने वाली है।

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और कुंदन ने कहा जाने भी दो यारों

फिल्मकार कुंदन शाह का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनकी अंतिम फिल्म 2014 में आई पी से पीएम तक थी पर हम सभी उन्हें उनकी बनाई दो फिल्में जाने भी दो यारो और कभी हाँ कभी ना के लिए हमेशा याद रखेंगे। ये दो फिल्में लंबे समय तक उनके नाम के साथ टिमटिमाएँगी। 1983 से लेकर 2014 के 31 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने केवल आठ फिल्में और तीन सीरियल बनाये। विधु विनोद चोपड़ा की निर्देशक के रूप में बनी पहली फिल्म खामोश की स्क्रिप्ट लिखी और दूरदर्शन के लिए नुक्कड़, ये जो है जिन्दगी और वागले की दुनिया जैसे लाजवाब सीरियल बनाये। जाने भी दो यारो के बाद टीवी के सक्रिय रहे और फिर 1993 में कभी हाँ कभी ना के साथ फिल्मो में वापसी की। इसके बाद के कुंदन शाह को न जाने तो ही बेहतर। इसके बाद आई उनकी फिल्में क्या कहना, हम तो मोहब्बत करेगा, दिल है तुम्हारा, एक से बढ़कर एक जैसी फिल्मों को देख कर किसे यकीन होगा कि इसी निर्देशक ने 1983 के साल को क्रिकेट का विश्वविजेता बनने के अलावा इस वजह से भी याद करने का मौका दिया कि इस साल क्लासिक कल्ट जाने भी दो यारो रिलीज हुई थी। 
कुंदन शाह ने फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, पुणे से निर्देशन का कोर्स किया था और इस संस्थान से ये उनका प्रेम ही था कि विवादों से हमेशा दूर रहने वाले शाह ने इस संस्थान के छात्रों की हड़ताल को सप्पोर्ट करने के लिए जाने भी दो यारो के लिए मिले नेशनल अवार्ड को लौटाने की घोषणा की थी और अब उनके निधन पर ट्विटर के वीर लोगो द्वारा बेहद असंवेदनशील टिप्पणी की जा रही है और उसे बड़ी निर्ममता के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है। हम बची खुची संवेदनाओं को भी खत्म करते जा रहे है। किसी की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने की बजाय छीटाकशी होना बेहद शर्मनाक है। भक्ति और विरोध की आड़ में हम धीरे धीरे सभी शिष्टाचार, नैतिकता और तर्क को भूलते जा रहे है। कुंदन शाह और जाने भी दो यारों से जुडे लोग वो है जिन्होंने हमें आज तक हंसने और सोचने का मौका दिया है। इस फिल्म को बनाने में किसी बड़े निर्माता का हाथ नही था। एनएफडीसी के सहयोग से बनी इस फिल्म को बनाने में लगे सात लाख रुपये जुटाने में भी टीम को पसीना आ गया। सभी कलाकारों ने अपनी और से फिल्म को सहयोग दिया। फिल्म में फोटोग्राफर बने नसीर का कैमरा नसीर का ही था और शूटिंग के दौरान ही चोरी हो गया था। आज कौन यकीन करेगा कि इस फिल्म के लिए नसीर को केवल पंद्रह हजार रुपये मिले। जब नसीर को पंद्रह हजार ही मिले तो पंकज कपूर, रवि वासवानी, ओम पुरी, सतीश शाह को कितने कम पैसे मिले होंगे, अंदाजा लगाना आसान है। इस फिल्म को थिएटर की मशहूर सख्शियत रंजीत कपूर ने अभिनेता सतीश कौशिक के साथ मिलकर लिखा था। जब रंजीत कपूर ने सतीश कौशिक को इस फिल्म में अपने साथ लिखने को कहा तो सतीश कौशिक का कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में चैक साइन करने के अलावा कभी कुछ नही लिखा पर रंजीत कपूर को उसके ऊपर विश्वास था। रंजीत कपूर ने अपने मिले छह हजार रुपये में से सतीश को लिखने के तीन हजार दिए और इस तरह अभिनय के दो हजार मिलाकर कुल पांच हजार रुपये उसे मिले। कुछ इसी तरह की आपसी सहूलियत से फिल्म बनकर तैयार हुई। फिर आया प्रीमियर का दिन। कुंदन शाह ने फिल्म के प्रीमियम के फ्री पास किसी भी कलाकार को नही दिए माने हर अभिनेता और तकनीशियन को अपनी ही फिल्म को देखने के लिए टिकट खरीदनी पड़ी। प्रीमियर के बाद कोई पार्टी नही हुई, जैसा कि आम तौर पर होता है। सब खाना खाने अपने अपने घर को ही गए। सतीश कौशिक बताते है कि वो उस रात स्टेशन के पास एक छोटे से ढाबे में गए और कहते भी है कि उस रोटी जैसा स्वाद उन्हें फिर न आया। रंगमंच और रंगकर्म संस्कारित करता है। ऐसे उदाहरण आदमी की गहराई को बताता है। इस गहराई और कमिटमेंट को फिल्म देखते हुए हम महसूस कर सकते है। ये फिल्म यारी दोस्ती में बनी थी। एक दूसरे को उत्साहित करते हुए बनी थी। नसीर और रवि के किरदारों के नाम तक फिल्म के दो सहायक निर्देशक विधु विनोद चौपडा और सुधीर मिश्रा के नाम से विनोद-सुधीर रखे गए थे। आज इस गुणी टीम का कप्तान भी चला गया है। ओमपुरी और रवि वासवानी पहले ही जा चुके है। इन सभी बड़े शहरी से दिखने वाले लोगो में अभी भी कस्बा जिन्दा है। ये कस्बाई जमीन के लोग इस एक एक करके हो रहे बिछोह को किस तरह देखते होंगे। संघर्ष के दिन और उन दिनों के साथी हमें बेहद अजीज होते है और
विदा तो हमेशा से दुखदाई होती है। हर विदाई व्यक्तिगत आख्यानो की अनुगूंज से भरी होती हैं।
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मिश्री सी मीठी धुनों वाले मदन मोहन

मदन मोहन ने विधिवत संगीत की कोई ट्रेनिंग नही ली थी पर अजीब बात है कि नौशाद के बाद शायद मदन मोहन की धुने ही सबसे ज्यादा शास्त्रीय, टेक्निकली करेक्ट और विशुद्ध भारतीय रागों पर आधारित थी। संगीतकार बनने की इच्छा के बावजूद अपने पिता का मन रखने के लिए मदन मोहन एक समय फौज में भर्ती हुए, बाद में लखनऊ और दिल्ली के रेडियो स्टेशन पर प्रोग्रामर बने। फिल्मो में छोटे मोटे रोल करते रहे। गायक के रूप में भी हाथ-पैर मारे। संगीतकार एस डी बर्मन से ये देखा न गया। एक दिन बिठाकर कहा कि आखिर तुम अपनी प्रतिभा के साथ इतनी ज्यादती क्यों कर रहे हो। सब काम छोड़ दो और धुनें बनाने पर काम करो। इस तरह मदन मोहन अपने काम को लेकर गम्भीर हुए। एस डी बर्मन का ज्ञान न मिलता तो शायद मदन मोहन फिल्मो के छोटे मोटे एक्टर ही रह जाते। उनकी शुरुआत की किसी फिल्म की गजल को सुनकर खुद बेगम अख्तर ने फोन करके मदन मोहन से पूछा था कि ये कम्पोजिशन बहुत अच्छी है पर तुमने इसे बनाया कैसे? इस धुन को बनाने का प्रोसेस मुझे समझाओ। और आज मदन मोहन की जितनी भी धुनें है, उनका आनंद लेते हुए ये भी सोचना चाहिए कि बिना संगीत की फॉर्मल ट्रेनिंग लिए इस बन्दे ने ऐसी मुश्किल धुनें तैयार कैसे की होगी?
जिस दौर में मदन मोहन थे, उस दौर में हर गाने के दो अंतरे होते है जिसकी ट्यून एक जैसी ही होती थी। उस दौर में भी मदन मोहन और सी रामचन्द्र संभवत दो ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने हर अंतरे की अलग ट्यून बनाने की नई रवायत शुरू की। हंसते जख्म के गाने तुम जो मिल गए हो में तो मदन मोहन ने तीन अंतरे तीन अलग अलग मूड और ट्यून में बनाएँ। इस तरह की रवायत को रहमान ने परवान चढ़ाया जिसने गाने के ओपनिंग पीस, अंतरे, इंट्रो जैसी शास्त्रीयता और तय चीजो को अपनी प्रतिभा से बदल कर रख दिया। मदन मोहन के मुरीद हर दौर में रहें। अभी के कलाकारों को कभी एक दूसरे की खुल कर तारीफ करते देखना कम ही होता है पर पहले का माहौल इस मायने में बहुत खास था। अच्छे काम की खुल कर तारीफ की जाती थी और कलाकार होता ही वही है जो खुलकर किसी दूसरे के अच्छे काम की सराहना करें। दूसरों के श्रेष्ठ की रक्षा करने का भाव हर कलाकार में ही नही, हर इंसान में भी होना निहित है। संगीतकार खय्याम जो खुद मदन मोहन के संगीत और उस संगीत में छिपे आराम और मिठास के सबसे ज्यादा करीब थे, ने कभी एक मंच पर मदन मोहन को याद करते हुए कहा था-
‘मदन जी अपने सभी समकक्ष और सीनियर कम्पोजर के पसंदीदा थे। ऐसे गुणी शास्त्रीय लोग जिनका फिल्म संगीत से कोई लेना-देना नही था, वो भी मदन जी के मुरीद थे और उनके गानो को सुना करते थे। और तो और, लता मंगेशकर जिनको हम सभी पसन्द करते है, उनके भी पसंदीदा मदन जी थे। लता जी जैसा उनके लिए गाती थी, सुनकर सच में जलन होने लगती थी कि ऐसा वो हमारे लिए क्यों नही गाती।‘
और फिर कभी लता ने जब एक बार जब अपने गाये पसन्दीदा दस गीतों के बारे में बताया तो भी केवल मदन मोहन ही अकेले ऐसे संगीतकार थे, जिनके दो गीतों को लता ने इसमें शामिल किया था।
मदन मोहन जिनके काम का मुरीद वो जमाना भी था और ये जमाना भी है, जिनकी फिल्म अनपढ़ के दो गानो आपकी नजरो ने समझाश् और है इसी में प्यार की आबरू को सुनकर नौशाद ने कहा था कि इन दो धुनों पर उनका सारा रचा हुआ संगीत कुर्बान है उस मदन मोहन के काम को कभी अवार्ड के लायक नही समझा गया। दुःखद है पर सत्य है। खुद मदन मोहन बहुत गैरत वाले थे पर उनको अवार्ड नही मिलने पर सबसे ज्यादा दुःखी होती थी लता मंगेशकर। एक बार बोली- मदन भईया। आपके इतने अच्छे काम को अवार्ड नही मिलता तो सचमुच बड़ा अफसोस होता है। मदन मोहन हंसते हुए बोले- इससे बड़ा मेरा अवार्ड क्या होगा कि मेरे लिए अफसोस खुद लता मंगेशकर कर रही है।
फिर आया वो दिन जब फिल्म दस्तक के लिए संजीव कुमार को बेस्ट एक्टर और मदन मोहन को पहली बार संगीतकार का नेशनल अवार्ड घोषित हुआ। ठसक से भरे मदन मोहन ने सोच लिया कि वो अब अवार्ड नही लेंगे पर संजीव कुमार ने उन्हें मना लिया। बोले, में सूट का कपड़ा लाया हूँ। दोनों एक साथ एक जैसे सूट में अवार्ड लेने जाएंगे। और आज तक भी मदन मोहन को केवल दस्तक के लिए मिला एकमात्र पुरस्कार दर्ज है।
इस देश में प्रतिभाओं के साथ हुई अविरल बदतमीजियों में से ये भी एक बेहद खूबसूरत बदतमीजी है।

 

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और एक दिन अचानक उनकी स्मृतियों में से खुद का यूं गायब हो जाना

जिस पियानो पर उसकी उंगलियां रेशम सी मुलायम दौडती थी। लोग कहते थे कि उसका जन्म ही पियानो के बोर्ड से निकलने वाली मधुर स्वर लहरियों के लिये हुआ है पर एक दिन ऐसा भी आये कि अचानक उसकी उंगुलिया उस साज के लिये सदा के लिये अजनबी बन जायें। उसे बजाना भूल जायें। एक प्यारा कवि, जिसकी प्रेम कविताओं को सुन लोग प्रेम में भीग जाया करते थे, एक दिन अचानक प्रेम से ही रिक्त हो जायें। प्रेम कवितायें लिखना भूल जायें। अब प्रेम की बजाय विरह उसका विषय है। लाख कोशिश करें पर प्रेम फिर से लिख न पायें। उसे जता न पायें। भूल जायें। अब यह जीवन की एक पीडा है और जीवन की ये पीडा इसलियें हरी नही कि वो कुछ भूला चुका है। पीडा ये है कि दरअसल जो कुछ वो भूला है, वास्तव में वो ही जीवन था। विलोप उसका ही हुआ है।  
दक्षिण के फिल्मकार बालू महेन्द्रु की उन्नीस सौ तिरासी में कमल हसन और श्रीदेवी के यादगार अभिनय से सजी फिल्म सदमा का जादूई क्लामैक्स इसी पीडा को समेटे हुए है। सदमा सदमा नही होती अगर ये क्लाईमैक्स नही होता और सदमा का क्लाईमैक्स भी इतना जादूई क्लाईमैक्स भी नही होता अगर इसमें कमल हसन का अप्रतिम अभिनय शामिल नही होता। फिल्म के अंतिम कुछ मिनटो में कमल हसन फिल्म के किरदार सोमू की तड़प को अपने अभिनय सेे चरम पर ले जाते है। ये उस आदमी की तडप है जिसका सब कुछ उससे ‘रूठकर‘ नही, उसे हमेषा के लिये ‘भूलकर‘ जा रहा है। हिन्दी सिनेमा में ट्रेन और बरसात हमेषा से विदाई का प्रतीक बनकर इस्तेमाल होते आये है और सदमा के इस बरसाती क्लाईमैक्स में छूटती हुई ट्रेन इस तरह के दृष्यों का सिरमौर दृष्य है। सदमा का मुख्य किरदार रेशमी जो एक्सीडेंट के बाद बचपने में चली गई है, स्कूल मास्टर सोमू को अजीब से हालात में मिलती है और अब सोमू उसे अपने साथ ले आता है। उसके बचपने को खुद बच्चा बनकर उसके साथ जीता है। बंदर बनता है। सिर पर मटकी रख कर नाचता है, ताकि रेशमी खिलखिला उठे। उसको लोरी गाकर सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना सपना परोसता है और उसका ख्याल रखते रखते उसके प्यार में पड जाता है। रेशमी जो कभी उसका हाथ पकडकर कहती है कि सोमू, मुझे कभी छोडकर मत चले जाना और आज उसकी पुरानी स्मृति लौटने पर अब वो अपने उसी सोमू को छोडकर जा रही है। उसे अब सोमू और सोमू के साथ बिताया हुआ समय याद नही है। उसकी स्मृतियों में अब वो जगह खाली है जो दरअसल अब सोमू की पूरे जीवन की स्मृति बन चुकी है। स्मृति का ये एकतरफा लोप सोमू के लिये दुखदायी है। बरसते मौसम में स्टेशन पर छूट रही इस ट्रेन में अब रेषमी हमेशा के लिये जा रही है और उसको खुद की याद दिलाने के लिये सोमू गिरते पडते हुए खुद की याद दिलाने की कोशिश कियें जा रहा है पर रेषमी की आंखों में उसके लिये कुछ भी नही है। ना प्रेम, ना पहचान, ना घृणा, ना कसक और ना पीडा। वो अब जा रही है और उसके लौट आने की कोई उम्मीद नही है। सोमू के हिस्से में कमबख्त इंतजार भी तो नही है। कमल हसन अपनी डायलाॅग डिलीवरी और स्पीच में जितने साधारण है, किरदार को उसकी भावना के पूरे वेग के साथ अपने भीतर तक उतारने में उतने ही जीनियस है। सदमा के क्लाईमैक्स के अलावा कमल हसन पूरी फिल्म में बेहद संयमित है और क्लाईमैक्स में अपने पूरे हूनर के साथ उफान पर है।
प्रेम मे सबसे बुरे हो जाने के बीच सबसे अच्छी बात ये होती है कि हम अपने प्रिय की स्मृतियों में याद के रूप में दर्ज रहते हैं। उसकी स्मृतियों का एक जरूरी हिस्सा होते है। उसकी स्मतियों से खुद का खत्म हो जाना सबसे ज्यादा पीडा देने वाले पल है। कभी अपनी और देखे जाने वाली आंखे शुष्क और ठंडी ना हो। प्रेम नही तो कम से कम बीते प्रेम की एक आत्मीयता हो, एक गरमाहट हो। और आत्मीयता और गरमाहट नही भी हो तो क्रोध हो, जलन हो, घृणा हो, कुछ भी हो बस अपने लिये स्मृति लोप न हो। प्रेम के लंबे और पथरीले निबन्ध का उपसंहार यही पल है। आप घृणा के रूप में ही सही, पर अपने प्रियतम की स्मृतियों का हिस्सा रहें। स्मृतियों और साथ बितायें पलो का लोप कभी लोप नही हो।
हर देवदास को अपनी पारो के सिर पर हाथ रखकर ये कहने का मौका मिलना ही चाहिए कि अगर मेरी सेवा से तुम्हारे दिल को खुषी मिलती है तो ठीक है, मरने से पहले तुम्हारी चैखट पर जरूर आउंगा और हर पारो की चैखट अपने प्रेमी देवदास के अंतिम मिलन के आगमन की प्रतीक्षा मे आबाद रहनी चाहिए।

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फिल्म सिमरन से ज्यादा किरदार सिमरन की जीत है ये

कंगना रानावत इन दिनों फेमिनिस्ट का नया और मजबूत प्रतीक हैं। वो कंगना जिसने अपनी बेबाकी से सभी को नचा रखा है। जिन हरकतों को फिल्म उधोग में अक्सर बचकाना कहा जाता है, उसी हरकतों से उसने कइयों की ढकी परते उघाड़ दी है। इंग्लिश नही आती तो इसका शोक न मनाकर शुद्ध हिंदी में बोल बोल कर उसका जश्न मना रही है। बड़े बैनर फिल्म नही देते, तो उसका जवाब भी बाकी सभी जवाबो की तरह उसके पास है। क्वीन के क्लाइमैक्स में जिस तरह वो थेँक्यू बोल कर आगे बढ़ी थी, वैसे जीवन में बढ़ नही पा रही। अटक गई है। जिन-जिन से उसके बुरे अनुभव है, उन सब को उसने कटघरे में खड़ा किया है। हालांकि ये सब एक पक्षीय बयानबाजी है, पर इसके लिए भी जो जरूरी साहस चाहिए था, वो कंगना ने दिखाया है। उसी क्वीन कंगना की फिल्म को देखने के लिए उस दिन के शो में मेरे अलावा कोई नही था। पूरा का पूरा हॉल खाली था। समझ में आया कि सोशल मीडिया और चैनल पर बना माहौल बहुत बार उससे बाहर नही आता। फिल्म रिलीज से ठीक पहले कंगना का सनसनी वाला इंटरव्यू फिल्म को चर्चा में न ला सका। वैसे ही जैसे दंगल को लेकर राष्ट्रवादियों के फतवे और बहिष्कार का फिल्म पर कोई फर्क नही दिखा। दंगल हिन्दी सिनेमा की सबसे सफल फिल्म बनकर सामने आई। इस देश के जनतंत्र का लोकतंत्र उतना सरल दिखता नही, जितना लोगो ने समझ लिया है। 
 
बहरहाल, फिल्म सिमरन अपनी शर्तों पर जीने वाली एक तलाकशुदा गुजराती लड़की प्रफुल्ल पटेल की कहानी है जो होटल में सफाई का काम करती है पर सबको बताती ये है कि वह ‘हाउसकीपिंग’ के जॉब में है। घर खरीदना है पर पैसे कम है। लोन नही मिलता और एक दिन जुए में अपने सारे पैसे भी हार जाती है। गलत आदमी से कर्जा लेती है और उसे फिर उसे चुकाने के लिए बैंक लूटने लग जाती है। कहानी संदीप कौर नामक एक एनआरआई महिला की कहानी पर आधारित है जो बैंल लूट के मामले में अमेरिका में जेल की सजा काट रही हैं उन्हें वहां बॉम्बशैल बेंडिट के नाम से भी जाना जाता था। इस स्टोरीलाइन से ही फिल्म कमजोर लग रही है पर एक बात साफ है कि इसकी मेकिंग आम फिल्मों जैसी नही है। कथ्य से ज्यादा ये अनुभवों की कहानी है। इस वजह से ही ये एक प्रॉपर शेप में नही है। बिखरी हुई है। इसलिए ही इसे ज्यादा पसंद नही किया जा रहा। दरअसल प्रॉपर शेप किसी कहानी का होता है, अनुभवों का नही। ये अनुभवों और ऑब्जर्वेशन की फिल्म है। ये हम सब से होने वाली गलतियों की फिल्म हैं। फिल्म ये नही बताती कि आप अच्छे बनो। फिल्म ये बताती है कि जमकर गलतियां करो। गलतियों से सीखो और अगर न भी सीख पाओ तो भी क्या बड़ी बात। फिर से गलती कर दो। जीवन स्वेत मारडेन या शिव खेड़ा की प्रेरणादायक किताब नही होती। जीवन हमारे छोटे छोटे खट्टे-मीठे अनुभवों की दैनिक डायरी होती है जिसमे हमारी कमजोरियों को जगह मिलती है। इसमें हमारी बुराइयां, हमारी असफलताएं, हताशाएँ दर्ज होती है। हम ताउम्र ग्रे शेड में ही जीवन निकालते है। सिनेमा और किताबो ने हमारे जीवन के ग्रे शेड को खा लिया है। फिल्में और किताबे हमें महामानव बनने की दौड़ में खड़ा करती है जबकि धरातल पर हम सब ऐसे नही है। हम थोड़े अच्छे, थोड़े बुरे लोग है। गलतियां करने वाले लोग है। ठोकरे खा खा कर संभलने वाले लोग है। प्रफुल्ल पटेल उर्फ सिमरन भी जीवन में बार बार गलतियां करती है। लगातार गलती करती है। मुसीबतों में पड़ती है पर अकेले ही इस जद्दोजहद में जूझती रहती है। ये कहानी यूएस की जमीन पर उगी है पर उसकी मुसीबतों में पड़ना और उससे बाहर आने की जद्दोजहद हमें कामकाजी भारतीय महिलाओं और लड़कियों की याद भी दिलाती है। फिल्म में सिमरन को अंत तक महान या आदर्श की तरह नही दिखाया गया है जैसा कि आम तौर पर दिखाया जाता है। वो अंत तक गलतियां करने वाली लड़की ही बनी रहती है। ये विचार और ये अंत फिल्म की जान है। सिमरन फिल्म से ज्यादा सिमरन किरदार की जीत है। निर्देशक हंसल मेहता और कँगना से भी ज्यादा की ये प्रफुल्ल पटेल नाम के किरदार की जीत है। निर्देशक हंसल मेहता का थोड़ा साथ और इसे मिलता तो ये और ज्यादा समय तक याद रखे जाने वाली फिल्म होती। फिल्म के बहुत से दृश्य सहेजने वाले है। पुलिस को चकमा देकर भागना और फिर आगे जाकर एक सूनसान सड़क पर खुद ही पुलिस को फोन करके बुलाना और इसका कारण पूछने पर बताना कि जहा से भागी, वहां मा-बाप का घर था। वहां पकड़ी जाती तो माँ-बाप की इज्जत खराब होती। फिल्म के क्लाइमैक्स में जब नाराज बाप आम फिल्मों की तरह अब अच्छा बाप बनकर बेटी से ये कह रहा होता है कि अब तुम मेरा बिजनेस संभालो और अब वही होगा जो तुम चाहती हो। ये आदर्श भारतीय क्लाइमेक्स की आदर्श टोन और शेड है। अब कंगना अपने स्वभाव वाला जवाब देती है कि वो ये बिजनेस बेच कर शेयर मार्केट में पैसा लगाएगी और बाप अच्छी टोन से वापिस बाहर आकर फिर से लड़ाई शुरू कर देता है। ये ही असली जीवन के किरदार है। हमारे अपने आस पास के किरदार। घूम-फिर कर अपने मूल स्वभाव की और लौटते किरदार। अच्छाई-बुराई के व्याकरण से दूर ग्रे शेड के किरदार। अच्छे होते होते बुरे बन जाते किरदार और बुराई से बहुत बार रोशनी की टार्च फेंक चौंकाने वाले किरदार। कंगना के अलावा फिल्म में कोई बड़ा नाम नही था और फिल्म थी भी कंगना के ऊपर ही। कंगना इस तरह की फिल्मो की खिलाड़ी हो गई है। फेमिनिस्ट सब्जेक्ट उसके पाले में आई हुई बॉल है जिसपर वो हमेशा आगे बढ़ कर छक्का लगाती है। कंगना ने फिल्म में खूबसूरत काम किया है। वो इन दिनों फेमिनिस्ट का नया और मजबूत प्रतीक हैं और इसका लाभ भी इस तरह की फिल्म को मिल जाता है।
कंगना को ध्यान में रख कर अब फेमिनिस्ट सब्जेक्ट की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। थोड़े समय बाद फेमिनिस्ट की सबसे बड़े प्रतीक लक्ष्मी बाई के रूप में भी वो पर्दे पर आ ही रही है। कंगना के साथ सबसे गलत यही हो रहा है कि वो क्वीन के अपने किरदार रानी पर ठहर गई है। उससे बाहर नही आ पा रही। उसे क्वीन को अपना जरूरी पड़ाव मानना था पर वो उसके मोह में पड़ गई है। उसे इस फेमिनिस्ट के तमगे को थेँक्यू बोल कर आगे बढ़ने की जरूरत है।
 
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बेचैनियों से भरे अंनंत इंतजार का गीत- तुम पुकार लो

1969 के साल संगीतकार और गायक हेमंत कुमार की फिल्म कम्पनी गीतांजलि द्वारा असित सेन के निर्देशन में फिल्म खामोशी परदें पर आई। खामोशी हर मानक पर अपने समय से बहुत आगे की फिल्म थी। संगीत से लेकर अपने कंटेट तक, रूपक से लेकर किरदार की डिजाइन, हर बात में अपने जमाने का बहुत मॉडर्न सिनेमा था और "तुम पुकार लो" इस प्यारे चितेरे प्रोजेक्ट का एक बेहद खास "मिदास" टच। वो रंग, जिसके बिना खामोशी की हर बात बेमानी है, बेनूर है। वो रंग, जिससे ही शायद सबसे ज्यादा हमें खामोशी याद आती है। 
 
खामोशी बंगाली उपन्यासकार आशुतोश मुखर्जी के लिखे उपन्यास "नर्स मित्र' पर बनाई फिल्म थी। फिल्म में वहीदा रहमान एक नर्स है जो प्यार की चोट से डिप्रेशन में गए मरीजो के लिये बने हाॅस्पिटल में काम करती है। हाॅस्पिटल के मालिक के कहने पर वो देव नाम के आदमी जिसका किरदार धर्मेंद्र ने निभाया, से प्यार का अभिनय कर उसे डिप्रेशन से बाहर लाती है और बाद में प्रेम का नाटक करते करते उसे सच में देव से प्यार हो जाता है। कालिदास की मेघदूत की किताब पर अपने "प्यार" को अपना "प्रणय" बताने उसके घर गई है जहां उसे पता लगता है कि वो वापिस उसी लड़की से शादी कर रहा है जिसके कारण वो डिप्रेशन में गया था। दिल में उठी हुक के साथ इसी उदास और मायूसी भरी सिचुवेशन में ये गाना बजना शुरू होता है। सिचुवेशन की खूबसूरती यह भी है कि नायिका के दर्द की आवाज नायक बनता हैै माने जो कुछ नायिका के भीतर चल रहा है उसे स्वर नायक देता है जबकि फिल्म में नायक की जिंदगी में फिलहाल ऐसा कोई रंज या अफसोस है नही जिसके लिए वो ऐसा गा रहा है। ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र चैक का बुशर्ट पहने कैमरे की और पीठ किये हेमंत दा की मदहोश करती नशीली हमिंग में एक उदास पर रुहानी अहसास जगा रहे है। हिन्दी सिनेमा के फाॅल्स बहुत बार खूबसूरती बनकर भी सामने आते है जैसे इस टैक्नीकल फाॅल्स को अपने आभा में चमत्कृत किये हेमंत दा और धर्मेंद्र। ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र। सुशील, सुसंस्कृत और पौराणिक से। अनपढ, अनुपमा, बंदिनी, दिल ने फिर याद किया वाले ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र। तकनीक से हिन्दी सिनेमा में रंग क्या आयें, चितेरे धर्मेन्द बेरंग हो गयें। उनकी गंभीरता और रोमांस जाता रहा और ढिशुम ढिशुम परवान चढ़ता गया। खैर, गाने की सिग्नेचर ओपनिंग ट्यून के साथ हेमंत दा की गुनगुनाहट वाली हमिंग से गाने की टोन सैट होती है जिसका जादू पूरे आगे तक कायम रहता है। 
तुम पुकार लो/ तुम्हारा इंतजार है/ तुम पुकार लो
ख्वाब चुन रही है रात/ बेकरार है / तुम्हारा इंतजार है 
होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम/ जागते रहे और कितनी रात हम/ रात बेकरार थी, बेकरार है/ तुम्हारा इंतजार है।
 
ये गीत बेचैनियों से भरे अंनंत इंतजार का गीत है। हेमंत कुमार की आवाज में लंबी उदासियों की अनसुनी प्रार्थनाये दर्ज है। नैराश्य में डूबने को तैयार हो चुके मन की छटपटाहट है। अधूरे रतजगों का आलाप है। ये उस अवस्था का गीत है जब आप अपना सब कुछ किसी को सौपने की तैयार हो और बस उसकी एक हां की जगमगाहट को सुनने को बेकरार हो। इधर उसकी एक हां हो और आपको सांस मिलें। लंबे जीवन के बीच किसी एक निश्चित पल पर रूकने की इच्छा लियें उम्मीदों भरा ऐसा मन है जो अनंत यात्रा से भटक आने से आनिंद है और अब उसे वाजिब एक ठौर की तलाश है। मिले न मिले, ये दीगर बात। 
 
हेमंत कुमार की आवाज हिन्दी सिनेमा की सबसे अलग आवाज होगी। इतनी अलग कि किशोर, मुकेश, मन्ना डे और रफी की अद्भूत प्रतिभा और लोकस्वीकार्यता के बावजूद अपने वजूद और क्लास के साथ कायम रही। जिन गानो को हेमंत दा ने अपने कंठ दिये, वो उन्ही के लिये बने थे। उनके बिना वो गीत अधूरे रहते। उनका गला पवित्रता लिए था। गायकी का नोट इतना मंद पर सधा हुआ था कि आपको यकीन हो जायें कि अगर हाड मांस के इस शरीर में बसी अंतरआत्मा का स्वर कोई होता होगा तो शायद वो ऐसा ही होता होगा। रवीन्द्र संगीत से सराबोर गुनगुनाहटो से भरा स्वर। ऐसा स्वर जो ना पूरा खुले और ना दबे। प्यार के मानिंद। शायद पूरा प्यार ही। 
खामोशी की कहानी और मूल कंटेट बहुत धाकड था। राधा बनी वहीदा रहमान को जब देव के बाद राजेश खन्ना को डिप्रेशन से बाहर लाने के लिये फिर से कहा जाता है तो वो चीख चीख कर मना कर देती है कि वो अब प्यार की एक्टिंग नही कर सकती। प्यार का अभिनय करना और फिर प्यार के अभिनय को करते करते ही अचानक प्यार का उपजना, फिर इस असली और नकली, अभिनय और हकीकत के बीच भावनात्मक रूप से जूझना काफी साहसिक विषय था। प्यार का अभिनय और हकीकत के बीच की कश्मकश को लेकर लाभशंकर ठक्कर ने एक बहुत मनौवैज्ञानिक नाटक लिखा था- पीला गुलाब और मैं। एक अभिनेत्री की कहानी जो बहुत छोटी उम्र से मंच पर प्रेम का अभिनय कर रही है। उस समय से, जब उसे प्रेम का ककहरा भी नही पता होता है फिर भी लोग कहते है कि वाह, क्या गजब नेचुरल एक्टिंग की है और जब वो सचमुच में किसी के प्रेम में होती है तो उसे लगता है कि ये सब तो वो ही है जो कि वो अभिनय में कर रही थी। इसमें नया क्या है। ये भाव तो वो मंच पर तब भी जी रही थी जब वो इसके बारे में नही जानती थी, एकदम फीलिंगलैस थी, तो अब जो वास्तव में कर रही है वो क्या है। अभिनय या हकीकत। खामोशी का मूल कंटेट यही था। बाद बाकी इसके आस-पास। वैसे तो रिश्तों में प्यार की हकीकत या प्यार का अभिनय हमेशा का ही विषय है पर अभी की काल और परिस्थितियों में ये और ज्यादा प्रासंगिक है। प्रेम जटिल विषय है। इस पर लंबे आख्यान लिखे जा सकते है।
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हसीना पारकर- आखिर इस बॉयोपिक को बनाने की जरूरत ही क्या थी?

अपूर्व लखिया की दाऊद इब्राहिम की बहिन के जीवन पर बनी फिल्म हसीना पारकर को सिनेमा के विधार्थियो को इस रूप में दिखाना जाना चाहिए कि फिल्म या कला के किसी भी माध्यम से विषय या कहानी को पोएट्रेट और एज्यूक्यूट करते समय किन-किन गलतियों से बचना ही चाहिए। ये फिल्म सिनेमाई गलतियों से सजा-धजा एक बहुत बुरा हादसा है जिसे खुद अपूर्व लखिया जितनी जल्दी भूल जाये, बेहतर होगा। फिल्म बनाना एक बेहद जटिल, कलात्मक और बौद्धिक विचार प्रक्रिया है जिसमे कई सारे अलग अलग कला पक्ष मिलकर एक प्रोजेक्ट पर काम करते है। इसे इतना हल्के में नही लिया जाना चाहिए जितना शायद इस फिल्म के जरिये इसके निर्माता-निर्देशको ने ले लिया है। इस फिल्म में सारे तकनीकी पक्ष कमजोर है। स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले, डायलॉग्स, फिल्म के चरित्र, घटनाये, घटनाओं की ग्रेवेटी, कथ्य, ड्रामा, अभिनय, बैकग्राउंड स्कोर,पृष्ठभूमि और स्थानीयता सभी पर ठोस काम किये जाने की जरूरत थी, जिसको हर स्तर पर नजरअंदाज किया गया जिससे फिल्म और किरदार असरदार न होकर कॉस्टमेटिक और कैरीकेचर बन गए। फिल्म तो खराब कास्टिंग के उदाहरण के तौर पर भी याद रखी जाएगी। हसीना के रोल में श्रद्धा कपूर, दाऊद के रोल में उसके भाई सिद्धांत कपूर, वकील केशवानी के रोल में राजेश तैलंग, एब्राहिम पारकर के रोल मे अखिल भाटिया के साथ-साथ बहुत से छोटे किरदार तक मिसफिट थे। श्रद्धा कपूर ने बहुत सी जगह ठीक बेस और स्पीच से डायलॉग बोले पर लगातार उसी एक नोट पर ही बोलने रहने से मामला मोनोटोनस हो गया। वॉइस मोडूलेशन की कमी साफ तौर पर दिखी। दाऊद के रोल में सिद्धान्त कपूर बहुत खराब चयन था। फिल्म में उसकी आवाज तक नही है। वो भी किसी और से डब कराई गई है। उसने अपनी खराब बॉडी लैंग्वेज से दाऊद के किरदार को उतना ही हल्का बना दिया जितना कि फिल्म थी। दाऊद पर बनी फिल्मों में ये अब तक का सबसे कमजोर दाऊद था। जॉनी एलएलबी, शाहिद और अलीगढ़ के उम्दा कोर्ट रूम के बाद इस कोर्ट रूम को झेलना मुश्किल था। हसीना के पुलिस की पूछताछ से बाहर आने पर लोगो का उसकी और उंगली उठाकर ताने मारने का सीन बेहद बचकाना था और फिल्म ऐसे बचकाने दृश्यों से भरी पड़ी है।
 
दाऊद की बहिन हसीना पारकर पर फिल्म क्यों बनाई गई है, इस पर भी बात होनी चाहिए। हसीना पारकर कोई ऐसा किरदार नही है जिसको लेकर आम लोगो में कोई उत्सुकता थी और न उसके जीवन या उसके चरित्र का कोई ऐसा खास मजबूत सबल पक्ष है जिसको लेकर बात होनी चाहिए। मुम्बई अंडरवर्ल्ड पर काफी किताबे लिख चुके पत्रकार हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई' में हसीना पारकर को लेकर कुछ खुलासे किए थे जिसमे कहा गया कि दाऊद की बहन का दक्षिण मुंबई के कुछ इलाकों में दबदबा था और इस वजह से उसे नागपाड़ा की 'गॉडमदर' के नाम से भी बुलाया जाता था। हसीना का जुर्म से सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था और उस पर पूरे जीवन मे केवल एक केस चला जिसमें भी वो बरी हो गई। फिल्म में उसी एक केस का जिक्र है। उसे केवल लोगो में दाऊद के आतंक का फायदा मिला। कहा जाता है कि हसीना को नागपाड़ा में एक घर इतना पसंद आया था कि उसने सीधे घर का ताला तोड़कर उसमें रहना शुरू कर दिया था। दाऊद के डर से किसी ने किसी ने कोई भी शिकायत नहीं की उनके खिलाफ। इन सब के अलावा कोई विशेष घटनाएं या ड्रामा था ही नही उसके जीवन में और जब ड्रामा था नही तो फिर फिर स्क्रिप्ट को रबर की तरह बेवजह खींचा जाना ही था।  
 
एक तथ्य ये भी है कि फिल्म खराब होने के साथ साथ गैर जिम्मेदार भी है। बहुत सी जगह फिल्म दाऊद और हसीना के चरित्र का महिमामंडन करने लग जाती है। उनके हिंसक अपराधो को उनके हालात का हवाला देकर बचाव करती दिखती है। अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता पर जरूर बहस होनी चाहिए। इतने गंभीर अपराधो और देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त देश के सबसे बडे मुजरिमो को कैसे आप उठकर अचानक से हीरो बनाने की कोशिश में लग जाएंगे। सिनेमा केवल सपने दिखाने और मनोरंजन करने का ही माध्यम नही है। विषयो और चरित्रों को गलत तथ्यो के साथ परोसना भी घोर लापरवाही है जो कि इस फिल्म में हुई है। कम से कम इसकी कड़ी निंदा तो की ही जा सकती है। जब देश के जरूरी मसले और गंभीर चूक केवल कड़ी निन्दा से निकल जाते है तो ये तो एक फिल्म ही है। अच्छी बात ये है कि इस माध्यम को पहले से ही कड़ी निन्दा की आदत है। ये ज्यादा बुरा नही मानेगा।
 
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मुझे प्यार करने वाले, तू जहां है,मै वहां हूं

यशचोपड़ाकी1981मेंआईफिल्मसिलसिलाकेगाने"येकहांगएहम/यूंहीसाथचलतेचलते"केबीचअंतरेमेलताकीआवाजमेंजावेदअख्तरकीलिखीयेलाइनआतीहै।सोचताहूंकियेलाइनगानेमेंनहीआतीतोक्याज्यादाफर्कपडजाता।हिन्दीफिल्मोंकेगीतवैसेहीतुकबंदियोकाहीमायाजालहै।येनाहोतीतोइसकीबजायकोईऔरलाइनसैटहोजाती।इसएकलाइनपरइतनाजोरक्योदेरहाहूं।परदोबातें,जोइसलाइनकेप्रतिहमेशाअनुरागजगायेरखतीहैउनमेंसेएकहैकियेबातऔरयेदिलकशसंबोधननायककीबजायनायिकासेकहलवाना।प्यारतोपुरूषऔरस्त्रीदोनोहीकरतेहै।अलगभीदोनोहीहोतेहै।दुखभीदोनोकासाझाहोताहैपरगानेमेंयेलाइनस्त्रीक्योंकहतीहै।पुरूषभीतोकहसकताथा।परनही।येबातनायिकासेहीकहलवाईगई।सोचसमझकरयाऐसेहीपतानहीपरशायदकिसीफिल्मीगीतमेंहीनहीजीवनकीहरऐसीस्थितिमेंभीयेबातकेवलऔरकेवलस्त्रीहीकहसकतीहै।दरअसलपुरूषअपनेजीवनमेंज्यादातरकिसीस्त्रीसेसम्मोहितहोकरप्यारकरतेहैपरस्त्रीज्यादातरमामलोंमेंअपनेलियेआयेप्यारकासम्मानकरतेहुएप्यारकीसंभावनाकोजन्मदेतीहै।येसंभावनापूरेप्यारमेंबदलतीहैयानहीपरस्त्रियांसंभावनाओकोबरकराररखनेमेंदक्षहोतीहै।पुरूषकेमनमेंअपनेलियेउगआयेप्रेमकोहीज्यादातरस्त्रीअपनाप्यारमानतीहै।ज्यादातरस्त्रियांआजभीप्यारकरतीनही,सामनेसेआयेप्यारकोबसस्वीकारकरतीहै।भारतीयविवाहइसलियेहीलंबेटिकतेहै।इसीलियेहीनायिकाअपनेअतीतकेप्यारको"मुझेप्यारकरनेवाले"कहकरपुकारतीहैनाकि"तुझेप्यारकरनेवाली"येसंबोधनसाधारणनहीहैै।इसकेमायनेबेहदखासहैजोजावेदअख्तरनेएकलाइनमेंतयकियेहै।औरएकदूसरीबातजोेमुझेलाइनसेइश्कजगाताहैवोहैस्त्रीकाअलगहोनेकेबादयेकहनाकि"तूजहांहै,मैवहांहूं"येदिलासाहैअपनेपूर्वप्रेमीकेलिये।उसकीतसल्लीऔरआरामकेलिये।स्त्रीकीयेदिलासा,दुआऔरअपनेलियेचिंताहरपुरूषकेजीवनकीधातीहै।ज्वरकेतापमेंसिरपरपट्टीकरतेमुलायमहाथसी।स्त्रियांउदारहोतीहैै।रिश्तेकेहरसंधिविच्छेदमेंपुरूषअपनेहल्केपनकीहरएकप्रतिक्रियाकेसाथमुखरहोताहैजबकिस्त्रीअवसादकेअपनेतमामगहरेदुखकोअपनेमेंसमेटेशांतनदीसी।स्त्रीकीमजबूतीकाअंदाजातोइसीसेहीलगायाजासकताहैकिउसकीहरप्रतिक्रियापुरूषकीखत्महुईक्रियाकेस्तरपरतोकेवलशुरूहोतीहै।

इसी गीत में जावेदअख्तरकीलिखीएकनज्ममैंऔरमेरीतन्हाईभीयेकहांगएहमअमिताभकीआवाजमेंहै।दरअसलजावेदनेअपनीएकदूसरीनज्मबंजाराकीअंतिमतीनचारपंक्तियोंकोउठाकरफिल्ममेंइसकाइस्तेमालकियागयाथा।पंक्तियांथी-तुमहोतीतोऐसाहोता।तुमहोतीतोवैसाहोता।तुमइसबातपेहैरांहोती।तुमउसबातपरकितनीहंसती।अपनीइसबंजारानज्मकेबारेमेजावेदकाकहनाथाकियेएकशहरसेदूसरेशहरभटकरहेकिसीयात्रीकादुःखहैजोअपनेपिछलेशहरमेछूटगएलम्होकोयादकरताहै।हमसबभीतोयात्रीहै।होसकताहैकिहमकिसीएकजगहयाशहरकेयात्रीनहीहैपरकहीनाकहीइसचलरहेसमयकेयात्रीजरूरहै।

येकहांगएहमकेपिक्चरराइजेशनमेंयशचौपड़ानेबर्फकीचादर,बरसतीस्नो,समुंद्रकाबीच,बारिश,नाव,बाग-बगीचें,पतझड,ट्यूलिप-गुलाबकेफूलऔरनाजानेकितनेमौसमऔरवादियोंकेप्रतीकोकाइस्तेमालकिया।अमिताभऔररेखाएकदूसरेमेंखोयेलगातारबदलरहेमौसममेंमैरूनस्वेटरपहनेप्यारकीपरिभाषापरदेंपरगढरहेथे।अमिताभऔररेखाप्रेमकेगहरेप्रतीकबनकरगानेमेंउभरेहै।येशिखरथा।प्रेमकाभीऔरप्रतीकोकाभी।उतरावआनाहीथाऔरआया।प्रसिद्वनाटककारआर्नोल्डवेस्करनेएकनाटकलिखाथा-फॉर सीजनस।नाटकमेंदिखायागयाकिहरबदलतामौसमआदमीकीभावनाओऔरअहसासोकोभीप्रभावितकरतारहताहै।घोषितरूपसेशरद,बारिश्,बर्फ,लालऔरगहरामेहरूनप्रेमकेप्रतीकहोचलेहैऔरगर्मीऔरलूकोहमनेअधोषितरूपसेप्रेमविच्छेदकाप्रतीकमानलियाहै।

बहरहाल सिलसिलाभीप्रेमसेज्यादाविरहकथारही।प्रेमियोकेसंबंधटूटनेपरफिरसेमिलनाभीअजबगजबस्थितिलाताहोगा।अचानकमिलनाऔरएकदूसरेकोफिरसेअजनबीकीतरहदेखना।कॉफीकेलिएपूछना।एकदूसरेकीआदतोंकाध्यानदेना।बीतासमयकैसेबीता।वोअभीभीजीवनमें,

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न्यूटन फिल्म नही एक विचार प्रक्रिया है

अमित मसूरकर की फिल्म न्यूटन का विचार अद्भुत और पावन है। यह लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव कहे जाने वाले चुनाव और देश के दूरदराज, मुख्य धारा के शहरों से दूर बैठे उस आम वोटर की पूरी विचार प्रक्रिया है। फिल्म की कहानी कहने भर को इतनी सी है कि छतीसगढ में नक्सलवाद से प्रभावित एक छोटे से पोलिंग बूथ में मतदान होना है जिसके लिये न्यूटन राजकुमार राव, रधुबीर यादव और अन्य लोगो की सरकारी ड््यूटी लगती है। सुबह नौ बजे से तीन बजे तक के इस मतदान के समय के बहाने फिल्म लोकतंत्र से शुरू होती है और जन के मन तक पहुच जाती है। यहां ये बताना बेहद जरूरी हो जाता है कि हिन्दी सिनेमा ने इससे पहले कभी चुनाव प्रक्रिया पर फिल्म नही बनाई है। हिन्दी सिनेमा में चुनाव का मुख्य विषय चुनाव जीतना और हारना से लेकर इसमें किये जाने वाले जोड तोड, भ्रष्टाचार और दूसरे तथ्यो पर ध्यान दिया है। इस बार सिनेमा पोलिंग पहली बार पोलिंग बूथ के अंदर घुसा है। फिल्म का तनाव दरअसल इस बात पर है कि उस बूथ के सत्तर से ज्यादा लोगो के वोट कास्ट किये जायें जबकि तनाव इस पर आकर खत्म होता है कि क्या लोकतंत्र का मतलब हम सभी ने ज्यादा से ज्यादा वोट कास्टिंग और शांतिपूर्ण मतदान से मान लिया है जबकि लोकतंत्र तो वास्तव ये होना चाहिए कि सरकार या उम्मीदवार ये जाने कि उस इलाके में रहने वाले लोगो की समस्याएं क्या है। उसकी अपने प्रतिनिधि से क्या उम्मीदें है और क्या उसने चुनाव जीतने के बाद वो सब किया जाता है, जो उसने वादा किया था। फिल्म में एक जगह जब न्यूटन आम लोगो से पूछता है कि तुम अपने जनप्रतिनिधि से क्या चाहते हो तो आम आदमी का जवाब मिलता है कि क्या वो उसकी फसल का सही भाव उसे दिला देगा। आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर आम जन को सरकार ये बुनियादी जरूरतें ही नही दे पा रही है तो फिर इस देष मे बुलेट ट्रेन की बात करना गरीबो का जमकर उडाया गया मजाक लगता है। लोकतंत्र का मजाक ये भी है कि आज तक भी आम वोटर को अच्छे उम्मीदवार नही मिलते जिसका नतीजा ये है कि वोटर को अच्छे या बुरे में से एक नही चुनना होता। दरअसल उसे बुरे और कम बुरे में से एक चुनना होता है। लोकतंत्र और चुनाव को हमने बुलेट और बटन तक सीमित कर दिया है। पिछले कुछ समय मे बड़े शहरों में वोट कास्टिंग बढ़ी है पर भारत केवल दिल्ली-मुम्बई-बेंगलोर नही है। ठेठ गांव तक में कास्टिंग बढी है पर लोगो के वोट करने के पीछे कारण भी जानने होंगे। जानना ये होगा कि क्या हम सभी वोट का इस्तेमाल अपना जीवनस्तर सुधारने के लिये कर रहे है या फिर सत्ता के चेहरे बदलने के लिये। हम आम आदमी के जीवन में सत्ता बदलने पर कोई महत्वूपर्ण बदलाव आता है या नही, ये जानना बेहद जरूरी है। क्या हम लोकतंत्र की जुगाली करते जॉम्बी तो नही बन गये है। जॉम्बी की तरह चुनाव तो नही हो रहे है। जॉम्बी की तरह वोट कास्ट और जॉम्बी की ही क्या हम लोग भक्ति या विरोध तो नही करने लगे है। क्या हमारे विचार खत्म होते जा रहे है और लोकतंत्र में क्या व्यक्ति विचार से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चले है। फिल्म न्यूटन ऐसे ही तीखे सवाल उठाती जो बेहद महत्वपूर्ण है, समझने लायक है। सहेजने लायक है।
फिल्म न्यूटन कमाल है इसमें कोई दो राय नही। हम फिल्म के तकनीकी पक्ष की बजाय इसके विचार में घुसने की जरा कोषिष करते है। एक आदर्षवादी किरदार न्यूटन जो हर स्थिति में भी ईमानदार और सही रहना चाहता है। ऐसे बहुत से देष में युवा होंगे जो सिस्टम में है या सिस्टम से बाहर है पर अपना संघर्ष कर रहे है। एक पुलिस अधिकारी आत्मा सिंह का चरित्र है जो सही गलत का न सोचकर परिणाम के बारे में सोच रहा है। एक अपने रिटायरमेंट के नजदीक पहुचा सरकारी बाबू है जो अपनी नौकरी के आखिरी चुनाव मे ड्यूटी दे रहा है और एक दूसरा बाबू जो कि केवल इसलिये नक्सलवाद से प्रभावित इलाके मे चुनाव ड्यूटी को पहुचा है क्योंकि उसको केवल हेलीकॉप्टर में सफर करना है। पहले ही दृष्य मे चुनाव प्रचार के सीन में एक एक फ्रेम में लोगो के चेहरे देखिये। कुछ गुलाल रंगे समर्थन में। कोई मोबाइल रिकार्डिंग में। कुछ हैरान परेषान और बाकी सभी तटस्थ। बिना किसी भाव के। ऐसा लग रहा है कि तटस्थ वाले वो लोग है जो अब इस प्रक्रिया से बेहद उदासीन हो चुका है। चुनाव और सत्ता इनके लिये रस्म अदायगी रह गई है। आम आदमी क्या हम काले और सफेद के बीच फर्क करना भूल गया है। अमित मसूरकर और मयंक तिवारी ने इस पटकथा को फिल्मी नही बनाया है। इसे बेहद जिम्मेदारी से लिखा है और गंभीर सिनेमा बनाया है। सब कुछ हमारे सामने घटता हुआ दिखता है। बिना गोलियों की आवाज के, बिना किसी तरह की हिंसा दिखाए फिल्म उस माहौल का तनाव को बहुत अच्छे से दिखाती है। फिल्म ब्लैक हयूमर है और इसके वन लाइनर तो और भी उम्दा है। चुटीली है, हंसाती है और बहुत बार तिलमिला भी देती है। अभिनेता राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी और रधुबीर यादव ने बहुत उम्दा काम किया है। बेहद संयमित होकर बात कही है सारी। ये सभी प्रतिभाये देष की धरोहर है। अभिनय आसान नही होता पर ये करते है तो लगता है कि आसान ही होगा। फिल्म ऑस्कर के लिये भारत की अधिकारिक एंट्री है और नेकनीयती से बने इस सिनेमा को सभी दुआएं है। अंत साहिर के शेर के साथ। हम सभी के लिये जो आज तक इस चुनाव प्रणाली के बहाने छले ही जा रहे है।
हमीं से रंग-ए-गुलिस्तां, हमीं से रंग-ए-बहार
हमीं को नज्म एं गुलिस्तां पे इख्तियार नही

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धन्नो की आँखों में रात का सुरमा और चाँद का चुम्मा

गुलजार ने बच्चों के मनोविज्ञान पर फिल्म बनाई थी। नाम रखा किताब। मास्टर राजू की मासूमियत से सजी बहुत ही प्यारी और समझदार फिल्म। संगीत जाहिर सी बात है कि आर डी बर्मन का ही था। फिल्म में आरडी ने एक कमाल गाना बनाया था- धन्नो की आंखों में रात का सुरमा और चांद का चुम्मा। रेल गीत। रेल के रूट में ड्राइवर की प्रेमिका का आना और ड्राइवर का इस खुशी में गाना। इस बिल्कुल अजीब इजाद सिचुवेशन में आर डी गुलजार के बोलो को अपने खुरदरे कंठो में उतारते है। आरडी ने इस गाने में केवल एक ही इंस्टूमेंट्स को बेस रखते हुए पूरा गाना निकाल दिया था। ये साउंड किसी ने उस दौर में शायद सुना तक नही था। वो खास साउंड निकला था एक विदेशी इंस्ट्रूमेंट से जिसका नाम था फलेंगर। आर डी ने इसे भारत के बाहर किसी को बजाते सुना था और इतना पसंद आया कि इसे भारत ले आये। खास बात ये है कि इस इंस्ट्रूमेंट फलेंगर का साउंड बड़ा बेसुरा था। स्टूडियो में पहली बार सुनते ही सबकी हंसी निकल गई पर आरडी तो आरडी थे। घुन के पक्के। जिद में इसके केवल साउंड का किसी गाने में यूज नही किया, एक पूरा का पूरा गाना ही इसके ऊपर बिठा दिया और आज इस गाने को इसके इस खास इंस्ट्रूमेंट और उससे निकले खास साउंड की वजह से ही याद रखा जाता है। आरडी इसलिए भी तो बहुत जिगरी है कि उसने हर काम को करते हुए अपने उस मौजूदा समय और दौर के टेस्ट की बजाय हमेशा आगे के समय का सोचा।
 
आरडी के बाद इस तरह की कारीगरी अब ए आर रहमान करते है। सबको पता ही है कि उसके सारे गानो में जो वाद्य बजते है, ज्यादातर वो प्रोग्रामिंग से ही बजते है। सॉफ्टवेयर से। मतलब लाइव रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल रहमान ने शुरू से ही बहुत कम किया। यू कह भी सकते है कि रहमान ने ही बाकी के सभी संगीतकारों को लाइव रिकॉर्डिंग की बजाय प्रोग्रामिंग में जाने का रास्ता दिखाया। बावजूद इसके रहमान के स्टूडियो में दुनिया भर के नये तरह के वाद्य है। दुनिया के हर कोने में इस्तेमाल होने वाले किस्म-किस्म के वाद्य वो लाकर उसके साउंड का इस्तेमाल अपने इंट्रो, गैप म्यूजिक और बीट्स में करते है। हर वाद्य के साउंड और नई चीज को अपने गानो में डालने से वो कभी चूकते नही हैं। दिल्ली-6 के गाने रहना तू और मिले सुर मेरा तुम्हारा के नए वर्जन मे रहमान ने इसी तरह एक बिल्कुल नये इंस्ट्रूमेंट से हमारा परिचय कराया। इस इंस्ट्रूमेंट का नाम था कन्टिनम फिंगरबोर्ड जिसे कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक के एक इंजीनियर प्रोफेसर लिपोल्ड हेकन ने बनाया था। फलेंगर की तरह ही कन्टिनम फिंगरबोर्ड का साउंड ऐसा था कि उसे किसी फिल्मी गाने में इस्तेमाल करना मुश्किल था पर रहमान ने तो रहना तू गाने के अंत में इसे लगातार पूरे डेढ़ मिनिट तक बजाया। फिर बहुत से लाइव शो में भी रहमान इसे खुद बजाते हुए दिखे। इस तरह के प्रयोगो से कला समृद्व होती है। इस तरह के प्रयोगो का हमेशा स्वागत होना चाहिए। रहमान की पहली फिल्म रोजा 1992 में आई थी और आरडी की लास्ट फिल्म 1994 में। हो सकता है रोजा के गाने आरडी ने सुने हो या शायद ऐसा भी हुआ होगा कि न सुने हो। 92 से 94 के बीच के इन दो सालों में रहमान पर आरडी का कुछ भी कहा हुआ जानकारी में नही है पर कितना अच्छा होता अगर दोनो को एक दूसरे की सोहबत नसीब होती।
 
ये अक्टूबर के शुरूआती दिन है और मौसम में अब धीरे धीरे सर्दी की चरमराहट आना शुरू हो रही है। बदलता मौसम हमारे स्वभाव और आदतो पर असर डालता रहता है। बदलता मौसम कभी हमें रूमानी बनाता है तो कभी जज्बाती। हर बदलते मौसम में हमारे सुने जाने वाले गीतो का चयन भी बदलता रहता है। अक्टूबर के ये शुरूआती दिन और ये बदलता मौसम मुबारक हो।
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