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रहमान रिबेल पर हिन्दी पर नो कंट्रोल Featured

संगीतकार ए आर रहमान को हिन्दी में बोलना, लिखना और बात करना नही आता है। उनका ज्यादातर काम तमिल और इंग्लिष से ही होता है। हां, गुजरे कुछ सालों में थोडा बहुत उर्दू लिखने पढने की कोषिष की थी जिसका नतीजा ये निकला कि अब बोली हुई उर्दू को वे थोडा बहुत समझ सकते है पर अभी तक भीे उसे हिन्दी और उर्दू को समझने में काफी तकलीफ होती है। पत्नी साईरा जो इन दोनो भाषाओ की अच्छी जानकार उससे रहमान अटकने पर पूछ लेते है पर हिन्दी-उर्दू कभी सीख नही पाये। वैसे रहमान की बेसिक पढाई कभी पूरी हुर्ह भी नही और अच्छा ही हुआ। पढा लिखा रहमान शायद इतना अप्रतिम न हो पाता जितना आज है। सुभाष घई ने भी कभी रहमान से कहा था कि आप हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हो। आपको हिन्दी तो सीखनी ही चाहिए। ये आपको आपके काम में और ज्यादा मदद करेगा। इस पर रहमान ने बडा मजेदार जवाब दिया। कहा कि दरअसल जीवन में जानना और नही जानना दोनो ही आपको फायदा पहुचाते हैं। अब, जबकि मै हिन्दी और उर्दू को पहले से ज्यादा अच्छा समझता हूं तब भी किसी भी गाने पर काम करते समय सबसे पहले उसकी धुन ही बनाता हूं। पोएट्री उस घुन के मुताबिक बनाई जाती है। मेरे लिये आज भी धुन ज्यादा महत्व रखती है। मेरे बहुत से गाने आज वैसे नही होते जैसे कि वो है अगर में उस गाने के सभी शब्दों को समझ पाता। उस समय, जब आप किसी भाषा के अच्छे जानकार हो जाते हो, बहुत संभव है कि किसी भी म्यूजिक सिटिंग और आइडिया में वो भाषा आपको डिक्टेटर की तरह ये बताये कि आपको क्या करना है और आप खतरनाक तरीके से ट्रेडिषनल घिसे पिटी चीजो के सृजन तक सीमित रह जायें।
यह टिप्पणी रहमान जैसे जीनियस ने कही तब ही इसे महत्व दिया जा सकता है वरना व्यावहारिक तौर पर तो किसी भाषा को जानना और वो उस भाषा को जानना श्रेयस्कर ही होता है जिसमें आपको काम करना है। रहमान के दिये संगीत में हालांकि उसकी कही बात सही भी साबित होती है। रहमान के लिये लिखे से ज्यादा धुन महत्व रखती है और ये कोई नई बात नही है। उन्होने मजरूह सुल्तानपुरी साहब, आनंद बक्षी, गुलजार, जावेद अख्तर, प्रसून जोषी जैसे गुणी लोगो के साथ काम किया है पर आज भी वो अपनी धुन में एक निष्चित शब्द के अर्थ से ज्यादा धुन में उस शब्द के साउंड को ज्यादा महत्व देते है। फिल्म रंग दे बसंती के गाने मस्ती की पाठषाला को याद करें। उसे लिखा प्रसून जोषी ने था पर गाने में रहमान को ओपनिंग पीस के साथ कुछ कैची सा चाहिए था जिसके लिये उसने अपने दोस्त रैप सिंगर ब्लैज से कहा और उसने उस ओपनिंग पीस के लिये दो लाइन बनाई- बी ए रिबेल, लूज कंट्रोल। यहां इन दो लाइनो का उस गाने में बना साउंड प्रसून के लिखे पूरे गाने पर भारी है। आज रहमान हिन्दी सीखे हुए होते तो हो सकता है कि उसके गानो का वो खास साउंड हमें नही मिलता जिसके लिये भी हम सब रहमान को जानते है। खुद रहमान मानते है कि दक्षिण में आज भी आर डी बर्मन के गाने दम मारो दम को लोग खूब सुनते और गाते है जबकि उसके एक भी शब्द का मतलब उन्हे पता नही होता है। उस धुन और साउंड से ही लोग इतना प्यार करते है कि भाषा यहां कोई मायने नही रखती। और आज जब हिन्दी का बोलबाला फिर से बढ रहा है, फेसबुक के लेखको ने हिन्दी को ग्लोबल लेवल पर नये फलेवर में पहुचाने का काम किया है, इसी दौर में संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म पदमावती का पहला पोस्टर हिन्दी में जारी किया है। ये क्या कम बडी बात है। भाषा को लेकर रहमान की कही बातें पर एक स्वस्थ बहस के रूप में तो देखी ही जा सकती है।

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