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बेचैनियों से भरे अंनंत इंतजार का गीत- तुम पुकार लो

1969 के साल संगीतकार और गायक हेमंत कुमार की फिल्म कम्पनी गीतांजलि द्वारा असित सेन के निर्देशन में फिल्म खामोशी परदें पर आई। खामोशी हर मानक पर अपने समय से बहुत आगे की फिल्म थी। संगीत से लेकर अपने कंटेट तक, रूपक से लेकर किरदार की डिजाइन, हर बात में अपने जमाने का बहुत मॉडर्न सिनेमा था और "तुम पुकार लो" इस प्यारे चितेरे प्रोजेक्ट का एक बेहद खास "मिदास" टच। वो रंग, जिसके बिना खामोशी की हर बात बेमानी है, बेनूर है। वो रंग, जिससे ही शायद सबसे ज्यादा हमें खामोशी याद आती है। 
 
खामोशी बंगाली उपन्यासकार आशुतोश मुखर्जी के लिखे उपन्यास "नर्स मित्र' पर बनाई फिल्म थी। फिल्म में वहीदा रहमान एक नर्स है जो प्यार की चोट से डिप्रेशन में गए मरीजो के लिये बने हाॅस्पिटल में काम करती है। हाॅस्पिटल के मालिक के कहने पर वो देव नाम के आदमी जिसका किरदार धर्मेंद्र ने निभाया, से प्यार का अभिनय कर उसे डिप्रेशन से बाहर लाती है और बाद में प्रेम का नाटक करते करते उसे सच में देव से प्यार हो जाता है। कालिदास की मेघदूत की किताब पर अपने "प्यार" को अपना "प्रणय" बताने उसके घर गई है जहां उसे पता लगता है कि वो वापिस उसी लड़की से शादी कर रहा है जिसके कारण वो डिप्रेशन में गया था। दिल में उठी हुक के साथ इसी उदास और मायूसी भरी सिचुवेशन में ये गाना बजना शुरू होता है। सिचुवेशन की खूबसूरती यह भी है कि नायिका के दर्द की आवाज नायक बनता हैै माने जो कुछ नायिका के भीतर चल रहा है उसे स्वर नायक देता है जबकि फिल्म में नायक की जिंदगी में फिलहाल ऐसा कोई रंज या अफसोस है नही जिसके लिए वो ऐसा गा रहा है। ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र चैक का बुशर्ट पहने कैमरे की और पीठ किये हेमंत दा की मदहोश करती नशीली हमिंग में एक उदास पर रुहानी अहसास जगा रहे है। हिन्दी सिनेमा के फाॅल्स बहुत बार खूबसूरती बनकर भी सामने आते है जैसे इस टैक्नीकल फाॅल्स को अपने आभा में चमत्कृत किये हेमंत दा और धर्मेंद्र। ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र। सुशील, सुसंस्कृत और पौराणिक से। अनपढ, अनुपमा, बंदिनी, दिल ने फिर याद किया वाले ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र। तकनीक से हिन्दी सिनेमा में रंग क्या आयें, चितेरे धर्मेन्द बेरंग हो गयें। उनकी गंभीरता और रोमांस जाता रहा और ढिशुम ढिशुम परवान चढ़ता गया। खैर, गाने की सिग्नेचर ओपनिंग ट्यून के साथ हेमंत दा की गुनगुनाहट वाली हमिंग से गाने की टोन सैट होती है जिसका जादू पूरे आगे तक कायम रहता है। 
तुम पुकार लो/ तुम्हारा इंतजार है/ तुम पुकार लो
ख्वाब चुन रही है रात/ बेकरार है / तुम्हारा इंतजार है 
होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम/ जागते रहे और कितनी रात हम/ रात बेकरार थी, बेकरार है/ तुम्हारा इंतजार है।
 
ये गीत बेचैनियों से भरे अंनंत इंतजार का गीत है। हेमंत कुमार की आवाज में लंबी उदासियों की अनसुनी प्रार्थनाये दर्ज है। नैराश्य में डूबने को तैयार हो चुके मन की छटपटाहट है। अधूरे रतजगों का आलाप है। ये उस अवस्था का गीत है जब आप अपना सब कुछ किसी को सौपने की तैयार हो और बस उसकी एक हां की जगमगाहट को सुनने को बेकरार हो। इधर उसकी एक हां हो और आपको सांस मिलें। लंबे जीवन के बीच किसी एक निश्चित पल पर रूकने की इच्छा लियें उम्मीदों भरा ऐसा मन है जो अनंत यात्रा से भटक आने से आनिंद है और अब उसे वाजिब एक ठौर की तलाश है। मिले न मिले, ये दीगर बात। 
 
हेमंत कुमार की आवाज हिन्दी सिनेमा की सबसे अलग आवाज होगी। इतनी अलग कि किशोर, मुकेश, मन्ना डे और रफी की अद्भूत प्रतिभा और लोकस्वीकार्यता के बावजूद अपने वजूद और क्लास के साथ कायम रही। जिन गानो को हेमंत दा ने अपने कंठ दिये, वो उन्ही के लिये बने थे। उनके बिना वो गीत अधूरे रहते। उनका गला पवित्रता लिए था। गायकी का नोट इतना मंद पर सधा हुआ था कि आपको यकीन हो जायें कि अगर हाड मांस के इस शरीर में बसी अंतरआत्मा का स्वर कोई होता होगा तो शायद वो ऐसा ही होता होगा। रवीन्द्र संगीत से सराबोर गुनगुनाहटो से भरा स्वर। ऐसा स्वर जो ना पूरा खुले और ना दबे। प्यार के मानिंद। शायद पूरा प्यार ही। 
खामोशी की कहानी और मूल कंटेट बहुत धाकड था। राधा बनी वहीदा रहमान को जब देव के बाद राजेश खन्ना को डिप्रेशन से बाहर लाने के लिये फिर से कहा जाता है तो वो चीख चीख कर मना कर देती है कि वो अब प्यार की एक्टिंग नही कर सकती। प्यार का अभिनय करना और फिर प्यार के अभिनय को करते करते ही अचानक प्यार का उपजना, फिर इस असली और नकली, अभिनय और हकीकत के बीच भावनात्मक रूप से जूझना काफी साहसिक विषय था। प्यार का अभिनय और हकीकत के बीच की कश्मकश को लेकर लाभशंकर ठक्कर ने एक बहुत मनौवैज्ञानिक नाटक लिखा था- पीला गुलाब और मैं। एक अभिनेत्री की कहानी जो बहुत छोटी उम्र से मंच पर प्रेम का अभिनय कर रही है। उस समय से, जब उसे प्रेम का ककहरा भी नही पता होता है फिर भी लोग कहते है कि वाह, क्या गजब नेचुरल एक्टिंग की है और जब वो सचमुच में किसी के प्रेम में होती है तो उसे लगता है कि ये सब तो वो ही है जो कि वो अभिनय में कर रही थी। इसमें नया क्या है। ये भाव तो वो मंच पर तब भी जी रही थी जब वो इसके बारे में नही जानती थी, एकदम फीलिंगलैस थी, तो अब जो वास्तव में कर रही है वो क्या है। अभिनय या हकीकत। खामोशी का मूल कंटेट यही था। बाद बाकी इसके आस-पास। वैसे तो रिश्तों में प्यार की हकीकत या प्यार का अभिनय हमेशा का ही विषय है पर अभी की काल और परिस्थितियों में ये और ज्यादा प्रासंगिक है। प्रेम जटिल विषय है। इस पर लंबे आख्यान लिखे जा सकते है।
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हसीना पारकर- आखिर इस बॉयोपिक को बनाने की जरूरत ही क्या थी?

अपूर्व लखिया की दाऊद इब्राहिम की बहिन के जीवन पर बनी फिल्म हसीना पारकर को सिनेमा के विधार्थियो को इस रूप में दिखाना जाना चाहिए कि फिल्म या कला के किसी भी माध्यम से विषय या कहानी को पोएट्रेट और एज्यूक्यूट करते समय किन-किन गलतियों से बचना ही चाहिए। ये फिल्म सिनेमाई गलतियों से सजा-धजा एक बहुत बुरा हादसा है जिसे खुद अपूर्व लखिया जितनी जल्दी भूल जाये, बेहतर होगा। फिल्म बनाना एक बेहद जटिल, कलात्मक और बौद्धिक विचार प्रक्रिया है जिसमे कई सारे अलग अलग कला पक्ष मिलकर एक प्रोजेक्ट पर काम करते है। इसे इतना हल्के में नही लिया जाना चाहिए जितना शायद इस फिल्म के जरिये इसके निर्माता-निर्देशको ने ले लिया है। इस फिल्म में सारे तकनीकी पक्ष कमजोर है। स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले, डायलॉग्स, फिल्म के चरित्र, घटनाये, घटनाओं की ग्रेवेटी, कथ्य, ड्रामा, अभिनय, बैकग्राउंड स्कोर,पृष्ठभूमि और स्थानीयता सभी पर ठोस काम किये जाने की जरूरत थी, जिसको हर स्तर पर नजरअंदाज किया गया जिससे फिल्म और किरदार असरदार न होकर कॉस्टमेटिक और कैरीकेचर बन गए। फिल्म तो खराब कास्टिंग के उदाहरण के तौर पर भी याद रखी जाएगी। हसीना के रोल में श्रद्धा कपूर, दाऊद के रोल में उसके भाई सिद्धांत कपूर, वकील केशवानी के रोल में राजेश तैलंग, एब्राहिम पारकर के रोल मे अखिल भाटिया के साथ-साथ बहुत से छोटे किरदार तक मिसफिट थे। श्रद्धा कपूर ने बहुत सी जगह ठीक बेस और स्पीच से डायलॉग बोले पर लगातार उसी एक नोट पर ही बोलने रहने से मामला मोनोटोनस हो गया। वॉइस मोडूलेशन की कमी साफ तौर पर दिखी। दाऊद के रोल में सिद्धान्त कपूर बहुत खराब चयन था। फिल्म में उसकी आवाज तक नही है। वो भी किसी और से डब कराई गई है। उसने अपनी खराब बॉडी लैंग्वेज से दाऊद के किरदार को उतना ही हल्का बना दिया जितना कि फिल्म थी। दाऊद पर बनी फिल्मों में ये अब तक का सबसे कमजोर दाऊद था। जॉनी एलएलबी, शाहिद और अलीगढ़ के उम्दा कोर्ट रूम के बाद इस कोर्ट रूम को झेलना मुश्किल था। हसीना के पुलिस की पूछताछ से बाहर आने पर लोगो का उसकी और उंगली उठाकर ताने मारने का सीन बेहद बचकाना था और फिल्म ऐसे बचकाने दृश्यों से भरी पड़ी है।
 
दाऊद की बहिन हसीना पारकर पर फिल्म क्यों बनाई गई है, इस पर भी बात होनी चाहिए। हसीना पारकर कोई ऐसा किरदार नही है जिसको लेकर आम लोगो में कोई उत्सुकता थी और न उसके जीवन या उसके चरित्र का कोई ऐसा खास मजबूत सबल पक्ष है जिसको लेकर बात होनी चाहिए। मुम्बई अंडरवर्ल्ड पर काफी किताबे लिख चुके पत्रकार हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई' में हसीना पारकर को लेकर कुछ खुलासे किए थे जिसमे कहा गया कि दाऊद की बहन का दक्षिण मुंबई के कुछ इलाकों में दबदबा था और इस वजह से उसे नागपाड़ा की 'गॉडमदर' के नाम से भी बुलाया जाता था। हसीना का जुर्म से सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था और उस पर पूरे जीवन मे केवल एक केस चला जिसमें भी वो बरी हो गई। फिल्म में उसी एक केस का जिक्र है। उसे केवल लोगो में दाऊद के आतंक का फायदा मिला। कहा जाता है कि हसीना को नागपाड़ा में एक घर इतना पसंद आया था कि उसने सीधे घर का ताला तोड़कर उसमें रहना शुरू कर दिया था। दाऊद के डर से किसी ने किसी ने कोई भी शिकायत नहीं की उनके खिलाफ। इन सब के अलावा कोई विशेष घटनाएं या ड्रामा था ही नही उसके जीवन में और जब ड्रामा था नही तो फिर फिर स्क्रिप्ट को रबर की तरह बेवजह खींचा जाना ही था।  
 
एक तथ्य ये भी है कि फिल्म खराब होने के साथ साथ गैर जिम्मेदार भी है। बहुत सी जगह फिल्म दाऊद और हसीना के चरित्र का महिमामंडन करने लग जाती है। उनके हिंसक अपराधो को उनके हालात का हवाला देकर बचाव करती दिखती है। अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता पर जरूर बहस होनी चाहिए। इतने गंभीर अपराधो और देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त देश के सबसे बडे मुजरिमो को कैसे आप उठकर अचानक से हीरो बनाने की कोशिश में लग जाएंगे। सिनेमा केवल सपने दिखाने और मनोरंजन करने का ही माध्यम नही है। विषयो और चरित्रों को गलत तथ्यो के साथ परोसना भी घोर लापरवाही है जो कि इस फिल्म में हुई है। कम से कम इसकी कड़ी निंदा तो की ही जा सकती है। जब देश के जरूरी मसले और गंभीर चूक केवल कड़ी निन्दा से निकल जाते है तो ये तो एक फिल्म ही है। अच्छी बात ये है कि इस माध्यम को पहले से ही कड़ी निन्दा की आदत है। ये ज्यादा बुरा नही मानेगा।
 
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न्यूटन फिल्म नही एक विचार प्रक्रिया है

अमित मसूरकर की फिल्म न्यूटन का विचार अद्भुत और पावन है। यह लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव कहे जाने वाले चुनाव और देश के दूरदराज, मुख्य धारा के शहरों से दूर बैठे उस आम वोटर की पूरी विचार प्रक्रिया है। फिल्म की कहानी कहने भर को इतनी सी है कि छतीसगढ में नक्सलवाद से प्रभावित एक छोटे से पोलिंग बूथ में मतदान होना है जिसके लिये न्यूटन राजकुमार राव, रधुबीर यादव और अन्य लोगो की सरकारी ड््यूटी लगती है। सुबह नौ बजे से तीन बजे तक के इस मतदान के समय के बहाने फिल्म लोकतंत्र से शुरू होती है और जन के मन तक पहुच जाती है। यहां ये बताना बेहद जरूरी हो जाता है कि हिन्दी सिनेमा ने इससे पहले कभी चुनाव प्रक्रिया पर फिल्म नही बनाई है। हिन्दी सिनेमा में चुनाव का मुख्य विषय चुनाव जीतना और हारना से लेकर इसमें किये जाने वाले जोड तोड, भ्रष्टाचार और दूसरे तथ्यो पर ध्यान दिया है। इस बार सिनेमा पोलिंग पहली बार पोलिंग बूथ के अंदर घुसा है। फिल्म का तनाव दरअसल इस बात पर है कि उस बूथ के सत्तर से ज्यादा लोगो के वोट कास्ट किये जायें जबकि तनाव इस पर आकर खत्म होता है कि क्या लोकतंत्र का मतलब हम सभी ने ज्यादा से ज्यादा वोट कास्टिंग और शांतिपूर्ण मतदान से मान लिया है जबकि लोकतंत्र तो वास्तव ये होना चाहिए कि सरकार या उम्मीदवार ये जाने कि उस इलाके में रहने वाले लोगो की समस्याएं क्या है। उसकी अपने प्रतिनिधि से क्या उम्मीदें है और क्या उसने चुनाव जीतने के बाद वो सब किया जाता है, जो उसने वादा किया था। फिल्म में एक जगह जब न्यूटन आम लोगो से पूछता है कि तुम अपने जनप्रतिनिधि से क्या चाहते हो तो आम आदमी का जवाब मिलता है कि क्या वो उसकी फसल का सही भाव उसे दिला देगा। आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर आम जन को सरकार ये बुनियादी जरूरतें ही नही दे पा रही है तो फिर इस देष मे बुलेट ट्रेन की बात करना गरीबो का जमकर उडाया गया मजाक लगता है। लोकतंत्र का मजाक ये भी है कि आज तक भी आम वोटर को अच्छे उम्मीदवार नही मिलते जिसका नतीजा ये है कि वोटर को अच्छे या बुरे में से एक नही चुनना होता। दरअसल उसे बुरे और कम बुरे में से एक चुनना होता है। लोकतंत्र और चुनाव को हमने बुलेट और बटन तक सीमित कर दिया है। पिछले कुछ समय मे बड़े शहरों में वोट कास्टिंग बढ़ी है पर भारत केवल दिल्ली-मुम्बई-बेंगलोर नही है। ठेठ गांव तक में कास्टिंग बढी है पर लोगो के वोट करने के पीछे कारण भी जानने होंगे। जानना ये होगा कि क्या हम सभी वोट का इस्तेमाल अपना जीवनस्तर सुधारने के लिये कर रहे है या फिर सत्ता के चेहरे बदलने के लिये। हम आम आदमी के जीवन में सत्ता बदलने पर कोई महत्वूपर्ण बदलाव आता है या नही, ये जानना बेहद जरूरी है। क्या हम लोकतंत्र की जुगाली करते जॉम्बी तो नही बन गये है। जॉम्बी की तरह चुनाव तो नही हो रहे है। जॉम्बी की तरह वोट कास्ट और जॉम्बी की ही क्या हम लोग भक्ति या विरोध तो नही करने लगे है। क्या हमारे विचार खत्म होते जा रहे है और लोकतंत्र में क्या व्यक्ति विचार से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चले है। फिल्म न्यूटन ऐसे ही तीखे सवाल उठाती जो बेहद महत्वपूर्ण है, समझने लायक है। सहेजने लायक है।
फिल्म न्यूटन कमाल है इसमें कोई दो राय नही। हम फिल्म के तकनीकी पक्ष की बजाय इसके विचार में घुसने की जरा कोषिष करते है। एक आदर्षवादी किरदार न्यूटन जो हर स्थिति में भी ईमानदार और सही रहना चाहता है। ऐसे बहुत से देष में युवा होंगे जो सिस्टम में है या सिस्टम से बाहर है पर अपना संघर्ष कर रहे है। एक पुलिस अधिकारी आत्मा सिंह का चरित्र है जो सही गलत का न सोचकर परिणाम के बारे में सोच रहा है। एक अपने रिटायरमेंट के नजदीक पहुचा सरकारी बाबू है जो अपनी नौकरी के आखिरी चुनाव मे ड्यूटी दे रहा है और एक दूसरा बाबू जो कि केवल इसलिये नक्सलवाद से प्रभावित इलाके मे चुनाव ड्यूटी को पहुचा है क्योंकि उसको केवल हेलीकॉप्टर में सफर करना है। पहले ही दृष्य मे चुनाव प्रचार के सीन में एक एक फ्रेम में लोगो के चेहरे देखिये। कुछ गुलाल रंगे समर्थन में। कोई मोबाइल रिकार्डिंग में। कुछ हैरान परेषान और बाकी सभी तटस्थ। बिना किसी भाव के। ऐसा लग रहा है कि तटस्थ वाले वो लोग है जो अब इस प्रक्रिया से बेहद उदासीन हो चुका है। चुनाव और सत्ता इनके लिये रस्म अदायगी रह गई है। आम आदमी क्या हम काले और सफेद के बीच फर्क करना भूल गया है। अमित मसूरकर और मयंक तिवारी ने इस पटकथा को फिल्मी नही बनाया है। इसे बेहद जिम्मेदारी से लिखा है और गंभीर सिनेमा बनाया है। सब कुछ हमारे सामने घटता हुआ दिखता है। बिना गोलियों की आवाज के, बिना किसी तरह की हिंसा दिखाए फिल्म उस माहौल का तनाव को बहुत अच्छे से दिखाती है। फिल्म ब्लैक हयूमर है और इसके वन लाइनर तो और भी उम्दा है। चुटीली है, हंसाती है और बहुत बार तिलमिला भी देती है। अभिनेता राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी और रधुबीर यादव ने बहुत उम्दा काम किया है। बेहद संयमित होकर बात कही है सारी। ये सभी प्रतिभाये देष की धरोहर है। अभिनय आसान नही होता पर ये करते है तो लगता है कि आसान ही होगा। फिल्म ऑस्कर के लिये भारत की अधिकारिक एंट्री है और नेकनीयती से बने इस सिनेमा को सभी दुआएं है। अंत साहिर के शेर के साथ। हम सभी के लिये जो आज तक इस चुनाव प्रणाली के बहाने छले ही जा रहे है।
हमीं से रंग-ए-गुलिस्तां, हमीं से रंग-ए-बहार
हमीं को नज्म एं गुलिस्तां पे इख्तियार नही

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धन्नो की आँखों में रात का सुरमा और चाँद का चुम्मा

गुलजार ने बच्चों के मनोविज्ञान पर फिल्म बनाई थी। नाम रखा किताब। मास्टर राजू की मासूमियत से सजी बहुत ही प्यारी और समझदार फिल्म। संगीत जाहिर सी बात है कि आर डी बर्मन का ही था। फिल्म में आरडी ने एक कमाल गाना बनाया था- धन्नो की आंखों में रात का सुरमा और चांद का चुम्मा। रेल गीत। रेल के रूट में ड्राइवर की प्रेमिका का आना और ड्राइवर का इस खुशी में गाना। इस बिल्कुल अजीब इजाद सिचुवेशन में आर डी गुलजार के बोलो को अपने खुरदरे कंठो में उतारते है। आरडी ने इस गाने में केवल एक ही इंस्टूमेंट्स को बेस रखते हुए पूरा गाना निकाल दिया था। ये साउंड किसी ने उस दौर में शायद सुना तक नही था। वो खास साउंड निकला था एक विदेशी इंस्ट्रूमेंट से जिसका नाम था फलेंगर। आर डी ने इसे भारत के बाहर किसी को बजाते सुना था और इतना पसंद आया कि इसे भारत ले आये। खास बात ये है कि इस इंस्ट्रूमेंट फलेंगर का साउंड बड़ा बेसुरा था। स्टूडियो में पहली बार सुनते ही सबकी हंसी निकल गई पर आरडी तो आरडी थे। घुन के पक्के। जिद में इसके केवल साउंड का किसी गाने में यूज नही किया, एक पूरा का पूरा गाना ही इसके ऊपर बिठा दिया और आज इस गाने को इसके इस खास इंस्ट्रूमेंट और उससे निकले खास साउंड की वजह से ही याद रखा जाता है। आरडी इसलिए भी तो बहुत जिगरी है कि उसने हर काम को करते हुए अपने उस मौजूदा समय और दौर के टेस्ट की बजाय हमेशा आगे के समय का सोचा।
 
आरडी के बाद इस तरह की कारीगरी अब ए आर रहमान करते है। सबको पता ही है कि उसके सारे गानो में जो वाद्य बजते है, ज्यादातर वो प्रोग्रामिंग से ही बजते है। सॉफ्टवेयर से। मतलब लाइव रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल रहमान ने शुरू से ही बहुत कम किया। यू कह भी सकते है कि रहमान ने ही बाकी के सभी संगीतकारों को लाइव रिकॉर्डिंग की बजाय प्रोग्रामिंग में जाने का रास्ता दिखाया। बावजूद इसके रहमान के स्टूडियो में दुनिया भर के नये तरह के वाद्य है। दुनिया के हर कोने में इस्तेमाल होने वाले किस्म-किस्म के वाद्य वो लाकर उसके साउंड का इस्तेमाल अपने इंट्रो, गैप म्यूजिक और बीट्स में करते है। हर वाद्य के साउंड और नई चीज को अपने गानो में डालने से वो कभी चूकते नही हैं। दिल्ली-6 के गाने रहना तू और मिले सुर मेरा तुम्हारा के नए वर्जन मे रहमान ने इसी तरह एक बिल्कुल नये इंस्ट्रूमेंट से हमारा परिचय कराया। इस इंस्ट्रूमेंट का नाम था कन्टिनम फिंगरबोर्ड जिसे कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक के एक इंजीनियर प्रोफेसर लिपोल्ड हेकन ने बनाया था। फलेंगर की तरह ही कन्टिनम फिंगरबोर्ड का साउंड ऐसा था कि उसे किसी फिल्मी गाने में इस्तेमाल करना मुश्किल था पर रहमान ने तो रहना तू गाने के अंत में इसे लगातार पूरे डेढ़ मिनिट तक बजाया। फिर बहुत से लाइव शो में भी रहमान इसे खुद बजाते हुए दिखे। इस तरह के प्रयोगो से कला समृद्व होती है। इस तरह के प्रयोगो का हमेशा स्वागत होना चाहिए। रहमान की पहली फिल्म रोजा 1992 में आई थी और आरडी की लास्ट फिल्म 1994 में। हो सकता है रोजा के गाने आरडी ने सुने हो या शायद ऐसा भी हुआ होगा कि न सुने हो। 92 से 94 के बीच के इन दो सालों में रहमान पर आरडी का कुछ भी कहा हुआ जानकारी में नही है पर कितना अच्छा होता अगर दोनो को एक दूसरे की सोहबत नसीब होती।
 
ये अक्टूबर के शुरूआती दिन है और मौसम में अब धीरे धीरे सर्दी की चरमराहट आना शुरू हो रही है। बदलता मौसम हमारे स्वभाव और आदतो पर असर डालता रहता है। बदलता मौसम कभी हमें रूमानी बनाता है तो कभी जज्बाती। हर बदलते मौसम में हमारे सुने जाने वाले गीतो का चयन भी बदलता रहता है। अक्टूबर के ये शुरूआती दिन और ये बदलता मौसम मुबारक हो।
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