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और एक दिन अचानक उनकी स्मृतियों में से खुद का यूं गायब हो जाना

जिस पियानो पर उसकी उंगलियां रेशम सी मुलायम दौडती थी। लोग कहते थे कि उसका जन्म ही पियानो के बोर्ड से निकलने वाली मधुर स्वर लहरियों के लिये हुआ है पर एक दिन ऐसा भी आये कि अचानक उसकी उंगुलिया उस साज के लिये सदा के लिये अजनबी बन जायें। उसे बजाना भूल जायें। एक प्यारा कवि, जिसकी प्रेम कविताओं को सुन लोग प्रेम में भीग जाया करते थे, एक दिन अचानक प्रेम से ही रिक्त हो जायें। प्रेम कवितायें लिखना भूल जायें। अब प्रेम की बजाय विरह उसका विषय है। लाख कोशिश करें पर प्रेम फिर से लिख न पायें। उसे जता न पायें। भूल जायें। अब यह जीवन की एक पीडा है और जीवन की ये पीडा इसलियें हरी नही कि वो कुछ भूला चुका है। पीडा ये है कि दरअसल जो कुछ वो भूला है, वास्तव में वो ही जीवन था। विलोप उसका ही हुआ है।  
दक्षिण के फिल्मकार बालू महेन्द्रु की उन्नीस सौ तिरासी में कमल हसन और श्रीदेवी के यादगार अभिनय से सजी फिल्म सदमा का जादूई क्लामैक्स इसी पीडा को समेटे हुए है। सदमा सदमा नही होती अगर ये क्लाईमैक्स नही होता और सदमा का क्लाईमैक्स भी इतना जादूई क्लाईमैक्स भी नही होता अगर इसमें कमल हसन का अप्रतिम अभिनय शामिल नही होता। फिल्म के अंतिम कुछ मिनटो में कमल हसन फिल्म के किरदार सोमू की तड़प को अपने अभिनय सेे चरम पर ले जाते है। ये उस आदमी की तडप है जिसका सब कुछ उससे ‘रूठकर‘ नही, उसे हमेषा के लिये ‘भूलकर‘ जा रहा है। हिन्दी सिनेमा में ट्रेन और बरसात हमेषा से विदाई का प्रतीक बनकर इस्तेमाल होते आये है और सदमा के इस बरसाती क्लाईमैक्स में छूटती हुई ट्रेन इस तरह के दृष्यों का सिरमौर दृष्य है। सदमा का मुख्य किरदार रेशमी जो एक्सीडेंट के बाद बचपने में चली गई है, स्कूल मास्टर सोमू को अजीब से हालात में मिलती है और अब सोमू उसे अपने साथ ले आता है। उसके बचपने को खुद बच्चा बनकर उसके साथ जीता है। बंदर बनता है। सिर पर मटकी रख कर नाचता है, ताकि रेशमी खिलखिला उठे। उसको लोरी गाकर सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना सपना परोसता है और उसका ख्याल रखते रखते उसके प्यार में पड जाता है। रेशमी जो कभी उसका हाथ पकडकर कहती है कि सोमू, मुझे कभी छोडकर मत चले जाना और आज उसकी पुरानी स्मृति लौटने पर अब वो अपने उसी सोमू को छोडकर जा रही है। उसे अब सोमू और सोमू के साथ बिताया हुआ समय याद नही है। उसकी स्मृतियों में अब वो जगह खाली है जो दरअसल अब सोमू की पूरे जीवन की स्मृति बन चुकी है। स्मृति का ये एकतरफा लोप सोमू के लिये दुखदायी है। बरसते मौसम में स्टेशन पर छूट रही इस ट्रेन में अब रेषमी हमेशा के लिये जा रही है और उसको खुद की याद दिलाने के लिये सोमू गिरते पडते हुए खुद की याद दिलाने की कोशिश कियें जा रहा है पर रेषमी की आंखों में उसके लिये कुछ भी नही है। ना प्रेम, ना पहचान, ना घृणा, ना कसक और ना पीडा। वो अब जा रही है और उसके लौट आने की कोई उम्मीद नही है। सोमू के हिस्से में कमबख्त इंतजार भी तो नही है। कमल हसन अपनी डायलाॅग डिलीवरी और स्पीच में जितने साधारण है, किरदार को उसकी भावना के पूरे वेग के साथ अपने भीतर तक उतारने में उतने ही जीनियस है। सदमा के क्लाईमैक्स के अलावा कमल हसन पूरी फिल्म में बेहद संयमित है और क्लाईमैक्स में अपने पूरे हूनर के साथ उफान पर है।
प्रेम मे सबसे बुरे हो जाने के बीच सबसे अच्छी बात ये होती है कि हम अपने प्रिय की स्मृतियों में याद के रूप में दर्ज रहते हैं। उसकी स्मृतियों का एक जरूरी हिस्सा होते है। उसकी स्मतियों से खुद का खत्म हो जाना सबसे ज्यादा पीडा देने वाले पल है। कभी अपनी और देखे जाने वाली आंखे शुष्क और ठंडी ना हो। प्रेम नही तो कम से कम बीते प्रेम की एक आत्मीयता हो, एक गरमाहट हो। और आत्मीयता और गरमाहट नही भी हो तो क्रोध हो, जलन हो, घृणा हो, कुछ भी हो बस अपने लिये स्मृति लोप न हो। प्रेम के लंबे और पथरीले निबन्ध का उपसंहार यही पल है। आप घृणा के रूप में ही सही, पर अपने प्रियतम की स्मृतियों का हिस्सा रहें। स्मृतियों और साथ बितायें पलो का लोप कभी लोप नही हो।
हर देवदास को अपनी पारो के सिर पर हाथ रखकर ये कहने का मौका मिलना ही चाहिए कि अगर मेरी सेवा से तुम्हारे दिल को खुषी मिलती है तो ठीक है, मरने से पहले तुम्हारी चैखट पर जरूर आउंगा और हर पारो की चैखट अपने प्रेमी देवदास के अंतिम मिलन के आगमन की प्रतीक्षा मे आबाद रहनी चाहिए।

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हसीना पारकर- आखिर इस बॉयोपिक को बनाने की जरूरत ही क्या थी?

अपूर्व लखिया की दाऊद इब्राहिम की बहिन के जीवन पर बनी फिल्म हसीना पारकर को सिनेमा के विधार्थियो को इस रूप में दिखाना जाना चाहिए कि फिल्म या कला के किसी भी माध्यम से विषय या कहानी को पोएट्रेट और एज्यूक्यूट करते समय किन-किन गलतियों से बचना ही चाहिए। ये फिल्म सिनेमाई गलतियों से सजा-धजा एक बहुत बुरा हादसा है जिसे खुद अपूर्व लखिया जितनी जल्दी भूल जाये, बेहतर होगा। फिल्म बनाना एक बेहद जटिल, कलात्मक और बौद्धिक विचार प्रक्रिया है जिसमे कई सारे अलग अलग कला पक्ष मिलकर एक प्रोजेक्ट पर काम करते है। इसे इतना हल्के में नही लिया जाना चाहिए जितना शायद इस फिल्म के जरिये इसके निर्माता-निर्देशको ने ले लिया है। इस फिल्म में सारे तकनीकी पक्ष कमजोर है। स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले, डायलॉग्स, फिल्म के चरित्र, घटनाये, घटनाओं की ग्रेवेटी, कथ्य, ड्रामा, अभिनय, बैकग्राउंड स्कोर,पृष्ठभूमि और स्थानीयता सभी पर ठोस काम किये जाने की जरूरत थी, जिसको हर स्तर पर नजरअंदाज किया गया जिससे फिल्म और किरदार असरदार न होकर कॉस्टमेटिक और कैरीकेचर बन गए। फिल्म तो खराब कास्टिंग के उदाहरण के तौर पर भी याद रखी जाएगी। हसीना के रोल में श्रद्धा कपूर, दाऊद के रोल में उसके भाई सिद्धांत कपूर, वकील केशवानी के रोल में राजेश तैलंग, एब्राहिम पारकर के रोल मे अखिल भाटिया के साथ-साथ बहुत से छोटे किरदार तक मिसफिट थे। श्रद्धा कपूर ने बहुत सी जगह ठीक बेस और स्पीच से डायलॉग बोले पर लगातार उसी एक नोट पर ही बोलने रहने से मामला मोनोटोनस हो गया। वॉइस मोडूलेशन की कमी साफ तौर पर दिखी। दाऊद के रोल में सिद्धान्त कपूर बहुत खराब चयन था। फिल्म में उसकी आवाज तक नही है। वो भी किसी और से डब कराई गई है। उसने अपनी खराब बॉडी लैंग्वेज से दाऊद के किरदार को उतना ही हल्का बना दिया जितना कि फिल्म थी। दाऊद पर बनी फिल्मों में ये अब तक का सबसे कमजोर दाऊद था। जॉनी एलएलबी, शाहिद और अलीगढ़ के उम्दा कोर्ट रूम के बाद इस कोर्ट रूम को झेलना मुश्किल था। हसीना के पुलिस की पूछताछ से बाहर आने पर लोगो का उसकी और उंगली उठाकर ताने मारने का सीन बेहद बचकाना था और फिल्म ऐसे बचकाने दृश्यों से भरी पड़ी है।
 
दाऊद की बहिन हसीना पारकर पर फिल्म क्यों बनाई गई है, इस पर भी बात होनी चाहिए। हसीना पारकर कोई ऐसा किरदार नही है जिसको लेकर आम लोगो में कोई उत्सुकता थी और न उसके जीवन या उसके चरित्र का कोई ऐसा खास मजबूत सबल पक्ष है जिसको लेकर बात होनी चाहिए। मुम्बई अंडरवर्ल्ड पर काफी किताबे लिख चुके पत्रकार हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई' में हसीना पारकर को लेकर कुछ खुलासे किए थे जिसमे कहा गया कि दाऊद की बहन का दक्षिण मुंबई के कुछ इलाकों में दबदबा था और इस वजह से उसे नागपाड़ा की 'गॉडमदर' के नाम से भी बुलाया जाता था। हसीना का जुर्म से सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था और उस पर पूरे जीवन मे केवल एक केस चला जिसमें भी वो बरी हो गई। फिल्म में उसी एक केस का जिक्र है। उसे केवल लोगो में दाऊद के आतंक का फायदा मिला। कहा जाता है कि हसीना को नागपाड़ा में एक घर इतना पसंद आया था कि उसने सीधे घर का ताला तोड़कर उसमें रहना शुरू कर दिया था। दाऊद के डर से किसी ने किसी ने कोई भी शिकायत नहीं की उनके खिलाफ। इन सब के अलावा कोई विशेष घटनाएं या ड्रामा था ही नही उसके जीवन में और जब ड्रामा था नही तो फिर फिर स्क्रिप्ट को रबर की तरह बेवजह खींचा जाना ही था।  
 
एक तथ्य ये भी है कि फिल्म खराब होने के साथ साथ गैर जिम्मेदार भी है। बहुत सी जगह फिल्म दाऊद और हसीना के चरित्र का महिमामंडन करने लग जाती है। उनके हिंसक अपराधो को उनके हालात का हवाला देकर बचाव करती दिखती है। अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता पर जरूर बहस होनी चाहिए। इतने गंभीर अपराधो और देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त देश के सबसे बडे मुजरिमो को कैसे आप उठकर अचानक से हीरो बनाने की कोशिश में लग जाएंगे। सिनेमा केवल सपने दिखाने और मनोरंजन करने का ही माध्यम नही है। विषयो और चरित्रों को गलत तथ्यो के साथ परोसना भी घोर लापरवाही है जो कि इस फिल्म में हुई है। कम से कम इसकी कड़ी निंदा तो की ही जा सकती है। जब देश के जरूरी मसले और गंभीर चूक केवल कड़ी निन्दा से निकल जाते है तो ये तो एक फिल्म ही है। अच्छी बात ये है कि इस माध्यम को पहले से ही कड़ी निन्दा की आदत है। ये ज्यादा बुरा नही मानेगा।
 
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रहमान रिबेल पर हिन्दी पर नो कंट्रोल

संगीतकार ए आर रहमान को हिन्दी में बोलना, लिखना और बात करना नही आता है। उनका ज्यादातर काम तमिल और इंग्लिष से ही होता है। हां, गुजरे कुछ सालों में थोडा बहुत उर्दू लिखने पढने की कोषिष की थी जिसका नतीजा ये निकला कि अब बोली हुई उर्दू को वे थोडा बहुत समझ सकते है पर अभी तक भीे उसे हिन्दी और उर्दू को समझने में काफी तकलीफ होती है। पत्नी साईरा जो इन दोनो भाषाओ की अच्छी जानकार उससे रहमान अटकने पर पूछ लेते है पर हिन्दी-उर्दू कभी सीख नही पाये। वैसे रहमान की बेसिक पढाई कभी पूरी हुर्ह भी नही और अच्छा ही हुआ। पढा लिखा रहमान शायद इतना अप्रतिम न हो पाता जितना आज है। सुभाष घई ने भी कभी रहमान से कहा था कि आप हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हो। आपको हिन्दी तो सीखनी ही चाहिए। ये आपको आपके काम में और ज्यादा मदद करेगा। इस पर रहमान ने बडा मजेदार जवाब दिया। कहा कि दरअसल जीवन में जानना और नही जानना दोनो ही आपको फायदा पहुचाते हैं। अब, जबकि मै हिन्दी और उर्दू को पहले से ज्यादा अच्छा समझता हूं तब भी किसी भी गाने पर काम करते समय सबसे पहले उसकी धुन ही बनाता हूं। पोएट्री उस घुन के मुताबिक बनाई जाती है। मेरे लिये आज भी धुन ज्यादा महत्व रखती है। मेरे बहुत से गाने आज वैसे नही होते जैसे कि वो है अगर में उस गाने के सभी शब्दों को समझ पाता। उस समय, जब आप किसी भाषा के अच्छे जानकार हो जाते हो, बहुत संभव है कि किसी भी म्यूजिक सिटिंग और आइडिया में वो भाषा आपको डिक्टेटर की तरह ये बताये कि आपको क्या करना है और आप खतरनाक तरीके से ट्रेडिषनल घिसे पिटी चीजो के सृजन तक सीमित रह जायें।
यह टिप्पणी रहमान जैसे जीनियस ने कही तब ही इसे महत्व दिया जा सकता है वरना व्यावहारिक तौर पर तो किसी भाषा को जानना और वो उस भाषा को जानना श्रेयस्कर ही होता है जिसमें आपको काम करना है। रहमान के दिये संगीत में हालांकि उसकी कही बात सही भी साबित होती है। रहमान के लिये लिखे से ज्यादा धुन महत्व रखती है और ये कोई नई बात नही है। उन्होने मजरूह सुल्तानपुरी साहब, आनंद बक्षी, गुलजार, जावेद अख्तर, प्रसून जोषी जैसे गुणी लोगो के साथ काम किया है पर आज भी वो अपनी धुन में एक निष्चित शब्द के अर्थ से ज्यादा धुन में उस शब्द के साउंड को ज्यादा महत्व देते है। फिल्म रंग दे बसंती के गाने मस्ती की पाठषाला को याद करें। उसे लिखा प्रसून जोषी ने था पर गाने में रहमान को ओपनिंग पीस के साथ कुछ कैची सा चाहिए था जिसके लिये उसने अपने दोस्त रैप सिंगर ब्लैज से कहा और उसने उस ओपनिंग पीस के लिये दो लाइन बनाई- बी ए रिबेल, लूज कंट्रोल। यहां इन दो लाइनो का उस गाने में बना साउंड प्रसून के लिखे पूरे गाने पर भारी है। आज रहमान हिन्दी सीखे हुए होते तो हो सकता है कि उसके गानो का वो खास साउंड हमें नही मिलता जिसके लिये भी हम सब रहमान को जानते है। खुद रहमान मानते है कि दक्षिण में आज भी आर डी बर्मन के गाने दम मारो दम को लोग खूब सुनते और गाते है जबकि उसके एक भी शब्द का मतलब उन्हे पता नही होता है। उस धुन और साउंड से ही लोग इतना प्यार करते है कि भाषा यहां कोई मायने नही रखती। और आज जब हिन्दी का बोलबाला फिर से बढ रहा है, फेसबुक के लेखको ने हिन्दी को ग्लोबल लेवल पर नये फलेवर में पहुचाने का काम किया है, इसी दौर में संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म पदमावती का पहला पोस्टर हिन्दी में जारी किया है। ये क्या कम बडी बात है। भाषा को लेकर रहमान की कही बातें पर एक स्वस्थ बहस के रूप में तो देखी ही जा सकती है।

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नैना बरसे रिमझिम रिमझिम

कोई-कोई सुबह ऐसी भी होती है जब लगता है कि पिछली रात को आप किसी जंगलों, पहाड़ो और समन्दरों से चल के आये है। यात्रा थी पर कही जाना नही हुआ। कुछ ढूँढने की फिराक में थे पर पता ही ना था कि ढूंढना किसे था। और फिर आंख खुले। आप के पैर उस थकान को महसूस करें। पसीने से भीगी काया हो। बैचैन हो अवचेतन। उन जगहों से फिर से ढूंढने की कोशिशे हो। उस यात्रा को उनींदी आंखों में फिर से लाने की कोशिश हो। खाली खाली सा पिंजर अचानक ऐसे भाव से भर जाए जो आपने अब तक महसूस नही किया हो। आप अपने भीतर तक उतरते चले जाए। सारा बिखराव सिमट जाये। अचानक आप लबालब होते जाते है। भाव से। प्यार से। भर जाए। इतने लबालब हो जाये कि कोई हाथ रखे और आप फूट पड़े।
कोई-कोई सुबह अपने भरे हुए मन के लिए ऐसे किसी गीत को दवा बनानी पड़ती है जो आपको छलकने का मौका दें और ऐसे में लता के गाये नैना बरसे को एक बार फिर सुनना पड़ता है। जाने कितने बरसो से सुनते ही आ रहे है। संगीतकार मदन मोहन की ये कमाल धुन राज खोसला की फिल्म वो कौन थी मे दर्ज है पर इस धुन के इस्तेमाल की कहानी भी कम लाजवाब नही। नैना बरसे की धुन को मदन मोहन रिकार्ड करने से अठारह साल पहले ही बना चुके थे पर जाने क्या था कि लगातार हर निर्माता-निर्देशक इसे रिजेक्ट किये जा रहे थे। इतना रिजेक्ट कि मदन मोहन ने सोच लिया कि अगर राज खोसला भी इस धुन को ना कर देंगे तो इस फिर धुन के बारे में सोचना बंद कर देंगे पर राज खोसला को ये धुन बहुत पसन्द आई। सुनते ही हाँ कर दी पर अब फिल्म की एक दूसरी धुन लग जा गले उन्हें बहुत साधारण लगी। उसे रिजेक्ट कर दिया। अजीब था पर सच यही है कि रिजेक्ट हों रही धुन सलेक्ट हो गई और लगभग सलेक्ट होने वाली धुन हो गई रिजेक्ट। बाद में फिल्म के हीरो मनोज कुमार ने ये लग जा गले की धुन सुनी और सुनकर ठीक वैसे ही उस खुमार में चले गए जिस खुमार में हम सब आज तक इस गाने को सुनकर हैं। उन्होने ही राज खोसला को फिर इस गाने को फिल्म में रखने के लिए राजी किया और गाने फिल्म में रहे। आज इन दोनों गानो को सुन सुन कर हमने जमाने बदल दिए। ये गीत अब तक हम सब की सुप्त होती भावनाओ को सहलाते रहते है।
खुद मदन मोहन ने फिर इस पर बोलते हुए एक रेडियो इंटरव्यू में कहा- 'फीलिंग कैसी भी हो, किसी भी कला में ढली हुई हो, उसे वक्त और जमाना कैद नही कर सकता। वह हर समय ताजा बनी रहती है।Ó मदन मोहन साहब, कितने सही थे आप।
और फिर ये सब जानने के बाद अक्सर इस गाने को सुनते हुए एक डर मन में हमेशा हरा रहता है कि अगर उस दिन, उस रोज राज खोसला भी नैना बरसे को रिजेक्ट कर देते तो.....

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