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मिश्री सी मीठी धुनों वाले मदन मोहन

मदन मोहन ने विधिवत संगीत की कोई ट्रेनिंग नही ली थी पर अजीब बात है कि नौशाद के बाद शायद मदन मोहन की धुने ही सबसे ज्यादा शास्त्रीय, टेक्निकली करेक्ट और विशुद्ध भारतीय रागों पर आधारित थी। संगीतकार बनने की इच्छा के बावजूद अपने पिता का मन रखने के लिए मदन मोहन एक समय फौज में भर्ती हुए, बाद में लखनऊ और दिल्ली के रेडियो स्टेशन पर प्रोग्रामर बने। फिल्मो में छोटे मोटे रोल करते रहे। गायक के रूप में भी हाथ-पैर मारे। संगीतकार एस डी बर्मन से ये देखा न गया। एक दिन बिठाकर कहा कि आखिर तुम अपनी प्रतिभा के साथ इतनी ज्यादती क्यों कर रहे हो। सब काम छोड़ दो और धुनें बनाने पर काम करो। इस तरह मदन मोहन अपने काम को लेकर गम्भीर हुए। एस डी बर्मन का ज्ञान न मिलता तो शायद मदन मोहन फिल्मो के छोटे मोटे एक्टर ही रह जाते। उनकी शुरुआत की किसी फिल्म की गजल को सुनकर खुद बेगम अख्तर ने फोन करके मदन मोहन से पूछा था कि ये कम्पोजिशन बहुत अच्छी है पर तुमने इसे बनाया कैसे? इस धुन को बनाने का प्रोसेस मुझे समझाओ। और आज मदन मोहन की जितनी भी धुनें है, उनका आनंद लेते हुए ये भी सोचना चाहिए कि बिना संगीत की फॉर्मल ट्रेनिंग लिए इस बन्दे ने ऐसी मुश्किल धुनें तैयार कैसे की होगी?
जिस दौर में मदन मोहन थे, उस दौर में हर गाने के दो अंतरे होते है जिसकी ट्यून एक जैसी ही होती थी। उस दौर में भी मदन मोहन और सी रामचन्द्र संभवत दो ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने हर अंतरे की अलग ट्यून बनाने की नई रवायत शुरू की। हंसते जख्म के गाने तुम जो मिल गए हो में तो मदन मोहन ने तीन अंतरे तीन अलग अलग मूड और ट्यून में बनाएँ। इस तरह की रवायत को रहमान ने परवान चढ़ाया जिसने गाने के ओपनिंग पीस, अंतरे, इंट्रो जैसी शास्त्रीयता और तय चीजो को अपनी प्रतिभा से बदल कर रख दिया। मदन मोहन के मुरीद हर दौर में रहें। अभी के कलाकारों को कभी एक दूसरे की खुल कर तारीफ करते देखना कम ही होता है पर पहले का माहौल इस मायने में बहुत खास था। अच्छे काम की खुल कर तारीफ की जाती थी और कलाकार होता ही वही है जो खुलकर किसी दूसरे के अच्छे काम की सराहना करें। दूसरों के श्रेष्ठ की रक्षा करने का भाव हर कलाकार में ही नही, हर इंसान में भी होना निहित है। संगीतकार खय्याम जो खुद मदन मोहन के संगीत और उस संगीत में छिपे आराम और मिठास के सबसे ज्यादा करीब थे, ने कभी एक मंच पर मदन मोहन को याद करते हुए कहा था-
‘मदन जी अपने सभी समकक्ष और सीनियर कम्पोजर के पसंदीदा थे। ऐसे गुणी शास्त्रीय लोग जिनका फिल्म संगीत से कोई लेना-देना नही था, वो भी मदन जी के मुरीद थे और उनके गानो को सुना करते थे। और तो और, लता मंगेशकर जिनको हम सभी पसन्द करते है, उनके भी पसंदीदा मदन जी थे। लता जी जैसा उनके लिए गाती थी, सुनकर सच में जलन होने लगती थी कि ऐसा वो हमारे लिए क्यों नही गाती।‘
और फिर कभी लता ने जब एक बार जब अपने गाये पसन्दीदा दस गीतों के बारे में बताया तो भी केवल मदन मोहन ही अकेले ऐसे संगीतकार थे, जिनके दो गीतों को लता ने इसमें शामिल किया था।
मदन मोहन जिनके काम का मुरीद वो जमाना भी था और ये जमाना भी है, जिनकी फिल्म अनपढ़ के दो गानो आपकी नजरो ने समझाश् और है इसी में प्यार की आबरू को सुनकर नौशाद ने कहा था कि इन दो धुनों पर उनका सारा रचा हुआ संगीत कुर्बान है उस मदन मोहन के काम को कभी अवार्ड के लायक नही समझा गया। दुःखद है पर सत्य है। खुद मदन मोहन बहुत गैरत वाले थे पर उनको अवार्ड नही मिलने पर सबसे ज्यादा दुःखी होती थी लता मंगेशकर। एक बार बोली- मदन भईया। आपके इतने अच्छे काम को अवार्ड नही मिलता तो सचमुच बड़ा अफसोस होता है। मदन मोहन हंसते हुए बोले- इससे बड़ा मेरा अवार्ड क्या होगा कि मेरे लिए अफसोस खुद लता मंगेशकर कर रही है।
फिर आया वो दिन जब फिल्म दस्तक के लिए संजीव कुमार को बेस्ट एक्टर और मदन मोहन को पहली बार संगीतकार का नेशनल अवार्ड घोषित हुआ। ठसक से भरे मदन मोहन ने सोच लिया कि वो अब अवार्ड नही लेंगे पर संजीव कुमार ने उन्हें मना लिया। बोले, में सूट का कपड़ा लाया हूँ। दोनों एक साथ एक जैसे सूट में अवार्ड लेने जाएंगे। और आज तक भी मदन मोहन को केवल दस्तक के लिए मिला एकमात्र पुरस्कार दर्ज है।
इस देश में प्रतिभाओं के साथ हुई अविरल बदतमीजियों में से ये भी एक बेहद खूबसूरत बदतमीजी है।

 

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