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फिल्म सिमरन से ज्यादा किरदार सिमरन की जीत है ये

कंगना रानावत इन दिनों फेमिनिस्ट का नया और मजबूत प्रतीक हैं। वो कंगना जिसने अपनी बेबाकी से सभी को नचा रखा है। जिन हरकतों को फिल्म उधोग में अक्सर बचकाना कहा जाता है, उसी हरकतों से उसने कइयों की ढकी परते उघाड़ दी है। इंग्लिश नही आती तो इसका शोक न मनाकर शुद्ध हिंदी में बोल बोल कर उसका जश्न मना रही है। बड़े बैनर फिल्म नही देते, तो उसका जवाब भी बाकी सभी जवाबो की तरह उसके पास है। क्वीन के क्लाइमैक्स में जिस तरह वो थेँक्यू बोल कर आगे बढ़ी थी, वैसे जीवन में बढ़ नही पा रही। अटक गई है। जिन-जिन से उसके बुरे अनुभव है, उन सब को उसने कटघरे में खड़ा किया है। हालांकि ये सब एक पक्षीय बयानबाजी है, पर इसके लिए भी जो जरूरी साहस चाहिए था, वो कंगना ने दिखाया है। उसी क्वीन कंगना की फिल्म को देखने के लिए उस दिन के शो में मेरे अलावा कोई नही था। पूरा का पूरा हॉल खाली था। समझ में आया कि सोशल मीडिया और चैनल पर बना माहौल बहुत बार उससे बाहर नही आता। फिल्म रिलीज से ठीक पहले कंगना का सनसनी वाला इंटरव्यू फिल्म को चर्चा में न ला सका। वैसे ही जैसे दंगल को लेकर राष्ट्रवादियों के फतवे और बहिष्कार का फिल्म पर कोई फर्क नही दिखा। दंगल हिन्दी सिनेमा की सबसे सफल फिल्म बनकर सामने आई। इस देश के जनतंत्र का लोकतंत्र उतना सरल दिखता नही, जितना लोगो ने समझ लिया है। 
 
बहरहाल, फिल्म सिमरन अपनी शर्तों पर जीने वाली एक तलाकशुदा गुजराती लड़की प्रफुल्ल पटेल की कहानी है जो होटल में सफाई का काम करती है पर सबको बताती ये है कि वह ‘हाउसकीपिंग’ के जॉब में है। घर खरीदना है पर पैसे कम है। लोन नही मिलता और एक दिन जुए में अपने सारे पैसे भी हार जाती है। गलत आदमी से कर्जा लेती है और उसे फिर उसे चुकाने के लिए बैंक लूटने लग जाती है। कहानी संदीप कौर नामक एक एनआरआई महिला की कहानी पर आधारित है जो बैंल लूट के मामले में अमेरिका में जेल की सजा काट रही हैं उन्हें वहां बॉम्बशैल बेंडिट के नाम से भी जाना जाता था। इस स्टोरीलाइन से ही फिल्म कमजोर लग रही है पर एक बात साफ है कि इसकी मेकिंग आम फिल्मों जैसी नही है। कथ्य से ज्यादा ये अनुभवों की कहानी है। इस वजह से ही ये एक प्रॉपर शेप में नही है। बिखरी हुई है। इसलिए ही इसे ज्यादा पसंद नही किया जा रहा। दरअसल प्रॉपर शेप किसी कहानी का होता है, अनुभवों का नही। ये अनुभवों और ऑब्जर्वेशन की फिल्म है। ये हम सब से होने वाली गलतियों की फिल्म हैं। फिल्म ये नही बताती कि आप अच्छे बनो। फिल्म ये बताती है कि जमकर गलतियां करो। गलतियों से सीखो और अगर न भी सीख पाओ तो भी क्या बड़ी बात। फिर से गलती कर दो। जीवन स्वेत मारडेन या शिव खेड़ा की प्रेरणादायक किताब नही होती। जीवन हमारे छोटे छोटे खट्टे-मीठे अनुभवों की दैनिक डायरी होती है जिसमे हमारी कमजोरियों को जगह मिलती है। इसमें हमारी बुराइयां, हमारी असफलताएं, हताशाएँ दर्ज होती है। हम ताउम्र ग्रे शेड में ही जीवन निकालते है। सिनेमा और किताबो ने हमारे जीवन के ग्रे शेड को खा लिया है। फिल्में और किताबे हमें महामानव बनने की दौड़ में खड़ा करती है जबकि धरातल पर हम सब ऐसे नही है। हम थोड़े अच्छे, थोड़े बुरे लोग है। गलतियां करने वाले लोग है। ठोकरे खा खा कर संभलने वाले लोग है। प्रफुल्ल पटेल उर्फ सिमरन भी जीवन में बार बार गलतियां करती है। लगातार गलती करती है। मुसीबतों में पड़ती है पर अकेले ही इस जद्दोजहद में जूझती रहती है। ये कहानी यूएस की जमीन पर उगी है पर उसकी मुसीबतों में पड़ना और उससे बाहर आने की जद्दोजहद हमें कामकाजी भारतीय महिलाओं और लड़कियों की याद भी दिलाती है। फिल्म में सिमरन को अंत तक महान या आदर्श की तरह नही दिखाया गया है जैसा कि आम तौर पर दिखाया जाता है। वो अंत तक गलतियां करने वाली लड़की ही बनी रहती है। ये विचार और ये अंत फिल्म की जान है। सिमरन फिल्म से ज्यादा सिमरन किरदार की जीत है। निर्देशक हंसल मेहता और कँगना से भी ज्यादा की ये प्रफुल्ल पटेल नाम के किरदार की जीत है। निर्देशक हंसल मेहता का थोड़ा साथ और इसे मिलता तो ये और ज्यादा समय तक याद रखे जाने वाली फिल्म होती। फिल्म के बहुत से दृश्य सहेजने वाले है। पुलिस को चकमा देकर भागना और फिर आगे जाकर एक सूनसान सड़क पर खुद ही पुलिस को फोन करके बुलाना और इसका कारण पूछने पर बताना कि जहा से भागी, वहां मा-बाप का घर था। वहां पकड़ी जाती तो माँ-बाप की इज्जत खराब होती। फिल्म के क्लाइमैक्स में जब नाराज बाप आम फिल्मों की तरह अब अच्छा बाप बनकर बेटी से ये कह रहा होता है कि अब तुम मेरा बिजनेस संभालो और अब वही होगा जो तुम चाहती हो। ये आदर्श भारतीय क्लाइमेक्स की आदर्श टोन और शेड है। अब कंगना अपने स्वभाव वाला जवाब देती है कि वो ये बिजनेस बेच कर शेयर मार्केट में पैसा लगाएगी और बाप अच्छी टोन से वापिस बाहर आकर फिर से लड़ाई शुरू कर देता है। ये ही असली जीवन के किरदार है। हमारे अपने आस पास के किरदार। घूम-फिर कर अपने मूल स्वभाव की और लौटते किरदार। अच्छाई-बुराई के व्याकरण से दूर ग्रे शेड के किरदार। अच्छे होते होते बुरे बन जाते किरदार और बुराई से बहुत बार रोशनी की टार्च फेंक चौंकाने वाले किरदार। कंगना के अलावा फिल्म में कोई बड़ा नाम नही था और फिल्म थी भी कंगना के ऊपर ही। कंगना इस तरह की फिल्मो की खिलाड़ी हो गई है। फेमिनिस्ट सब्जेक्ट उसके पाले में आई हुई बॉल है जिसपर वो हमेशा आगे बढ़ कर छक्का लगाती है। कंगना ने फिल्म में खूबसूरत काम किया है। वो इन दिनों फेमिनिस्ट का नया और मजबूत प्रतीक हैं और इसका लाभ भी इस तरह की फिल्म को मिल जाता है।
कंगना को ध्यान में रख कर अब फेमिनिस्ट सब्जेक्ट की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। थोड़े समय बाद फेमिनिस्ट की सबसे बड़े प्रतीक लक्ष्मी बाई के रूप में भी वो पर्दे पर आ ही रही है। कंगना के साथ सबसे गलत यही हो रहा है कि वो क्वीन के अपने किरदार रानी पर ठहर गई है। उससे बाहर नही आ पा रही। उसे क्वीन को अपना जरूरी पड़ाव मानना था पर वो उसके मोह में पड़ गई है। उसे इस फेमिनिस्ट के तमगे को थेँक्यू बोल कर आगे बढ़ने की जरूरत है।
 
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जीएसटी का विनिर्माण पर प्रतिकूल असर, निवेश पटरी पर आने में हो सकती है देरी: आरबीआई

नई दिल्ली,  भारतीय रिजर्व बैंक ने आज कहा कि माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के कार्यान्वयन से विनिर्माण पर प्रतिकूल असर पड़ा है और इससे निवेश को पटरी पर आने में देरी हो सकती है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने उम्मीद जताई है कि इस नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का सरलीकरण होगा ताकि कारोबारी प्रक्रिया को आसान बनाया जा सके।
रिजर्व बैंक ने 2017-18 के लिए अपनी चौथी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा आज जारी की। इसमें इसने मौजूदा वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है जो पहले 7.3 प्रतिशत था।
बैंक ने कहा है कि जीएसटी से जुड़ी शुरुआती दिक्कतों व दायरे संबंधी बाधाओं को अपेक्षाकृत जल्दी सुलझा लिया जाएगा जिससे दूसरी छमाही में वृद्धि को बल देने में मदद होगी।
केंद्रीय बैंक ने कहा है,जीएसटी के कार्यान्वयन का अब तक तो प्रतिकूल असर ही नजर आ रहा है जिससे विनिर्माण क्षेत्र का परिदृश्य फौरी तौर पर अनिश्चित हुआ है। इससे निवेश गतिविधियों के पटरी पर आने में और देरी हो सकती है जो कि पहले ही बैंकों व कारपोरेट कंपनियों की बैलेंस शीट को प्रभावित कर चुकी है।
उल्लेखनीय है कि विनिर्माण क्षेत्र विशेषकर पूंजीगत सामान खंड के खराब प्रदर्शन के चलते औद्योगिक उत्पादन जुलाई महीने में सिर्फ 1.2 प्रतिशत बढ़ा जबकि एक साल पहले यह बढ़ोतरी 4.5 प्रतिशत रही थी।
औद्योगिक उत्पादन को दर्शाने वाले सूचकांक में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा 77.6 प्रतिशत है। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर जुलाई में घटकर 0.1 प्रतिशत रही जो कि 2016 के जुलाई महीने में 5.3 प्रतिशत थी।
उल्लेखनीय है कि जीएसटी का कार्यान्वयन एक जुलाई से किया गया है।
सरकार ने जीएसटी के कार्यान्वयन के पहले ही दो महीने में जीएसटी के रूप में लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपए का संग्रहण किया हालांकि छोटे कारोबारी व निर्यातक कड़े अनुपालन नियमों के खिलाफ शिकायत कर रहे हैं।

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जिंदगी पर भारी है पीबीएम की लापरवाही...

डीएनआर रिपोर्टर. बीकानेर

बीकानेर के पीबीएम अस्पताल की लापरवाही हृदय रोगियों पर भारी पड़ती जा रही है। यहां पिछले एक महीने से बंद पड़ी कैथ लेब को शुरू करने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहा है। ऐसे में हृदयघात की शिकायत लेकर आने वाले रोगियों की जांच नहीं हो पा रही है, इन्हें हर रोज बीकानेर से जयपुर या फिर दिल्ली के लिए भागना पड़ रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कैथ लेब में लगी मशीनों की एक ट्यूब खराब हो चुकी है। इस ट्यूब को बदलने के लिए पिछले एक महीने से सिर्फ कागजों में प्रक्रिया चल रही है। हालात यह है कि ट्यूब की खरीद के लिए सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आर.पी. अग्रवाल भी कोई कार्रवाई नहंीं कर पा रहे। कागजी प्रक्रिया में खरीद को इस तरह उलझा दिया गया है कि अस्पताल में एक महीने से हृदय रोगियों की जान अटकी हुई है।

५० लाख की है ट्यूब
जिस ट्यूब के खराब होने से कैथ लेब बंद है, उसकी कीमत करीब पचास लाख रुपए बताई जा रही है। इतनी बड़ी राशि का जुगाड़ करने में ही अस्पताल प्रशासन को समय लग रहा है। आश्चर्य की बात है कि जो मशीन पिछले बारह साल से काम आ रही है, उसकी ट्यूब को अब तक बदल देना चाहिए था लेकिन किसी ने इस और ध्यान ही नहीं दिया। अब हालात बिगड़े हैं तो सब लापरवाही पर मौन है।
हर रोज बीस रोगियों की जांच
कैथ लेब में हर रोज बीस से अधिक रोगियों की विभिन्न तरह की जांच होती है। खासकर एंजियोग्राफी की जाती है लेकिन फिलहाल इस मशीन के खराब होने से कोई काम नहीं हो रहा। एक अनुमान के मुताबिक पिछले एक महीने में बीकानेर से करीब पांच सौ मरीजों को जयपुर या फिर दिल्ली के लिए भागना पड़ा है। हृदय रोग विशेषज्ञ चिकित्सक भी इस मामले में चुप्पी साधे बैठे हैं।
लापरवाही है या फिर साजिश?
पिछले एक महीने से बंद पड़ी कैथ लेब के प्रति प्रशासनिक लापरवाही जांच का विषय हो सकता है। दरअसल, किसी भी सामान की खरीद में इतना वक्त नहीं लगता। आरोप लगाया जा रहा है कि निजी अस्पतालों को लाभ पहुंचाने के लिए जानबूझकर खरीद में विलंब किया जा रहा है ताकि बीकानेर के रोगियों को मजबूरन वहां जाना पड़े। इस मामले में कई सरकारी कारिंदों पर मिली भगत के आरोप भी लग रहे हैं।
लेटलतीफी की जांच होनी चाहिए
कैथ लेब में ट्यूब खरीदने में विलंब और समय पार हो चुकी मशीनरी को समय पर दुरुस्त नहंी करवाने वाले अधिकारियों व चिकित्सकों के खिलाफ जांच होनी चाहिए। एक तरफ जहां अस्पताल में बाइपास सर्जरी करने की मांग उठ रही है, दूसरी तरफ एंजियोग्राफी की मशीने तक एक एक महीने तक खराब पड़ी रहती है।
'एक-दो दिन में दुरुस्त होगीÓ
इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों का रटा रटाया जवाब है कि एक-दो दिन में मशीन दुरुस्त हो जाएगी और कैथ लेब में फिर से रोगियों की एंजियोग्राफी व अन्य काम होने लगेंगे। इस ट्यूब की खरीद सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आर. पी. अग्रवाल के माध्यम से होनी है। स्वयं अग्रवाल कह चुके हैं कि फाइल लेखा विभाग में गई हुई है। सवाल यह है कि बारह साल मशीन की सारसंभाल क्यों नहीं हुई?

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