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राजमार्ग पर पसरा अंधेरे का साया, प्रशासन नींद में

डीएनआर रिपोर्टर. बीकानेर, शहर में गंदगी और सफाई समेत अन्य मुद्दों पर लगभग फेल हो चुका निगम प्रशासन राजमार्ग पर लाइटें जगाने के नाम पर भी जीरो साबित होता नजर आ रहा है। दरअसल पुरानी गजनेर रोड के साथ ही शहर से निकलने वाले अन्य राजमार्गों पर भी रात्रि में अंधेरा नजर आता है। राजमार्गों पर डिवाइडर में लगे बिजली के पोल केवल नाम के लिए लगे हुए साबित हो रहे हैं। कोई इक्का दुक्का पोल पर ही लाइटें चालू हैं इसके अलावा लभगल पोल पूरी तरह से बंद पड़े हैं। राजमार्गों पर अंधेरा होने और इस पूरे मामले में निगम की लापरवाही से से हादसे होने का डर है।

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और कुंदन ने कहा जाने भी दो यारों

फिल्मकार कुंदन शाह का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनकी अंतिम फिल्म 2014 में आई पी से पीएम तक थी पर हम सभी उन्हें उनकी बनाई दो फिल्में जाने भी दो यारो और कभी हाँ कभी ना के लिए हमेशा याद रखेंगे। ये दो फिल्में लंबे समय तक उनके नाम के साथ टिमटिमाएँगी। 1983 से लेकर 2014 के 31 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने केवल आठ फिल्में और तीन सीरियल बनाये। विधु विनोद चोपड़ा की निर्देशक के रूप में बनी पहली फिल्म खामोश की स्क्रिप्ट लिखी और दूरदर्शन के लिए नुक्कड़, ये जो है जिन्दगी और वागले की दुनिया जैसे लाजवाब सीरियल बनाये। जाने भी दो यारो के बाद टीवी के सक्रिय रहे और फिर 1993 में कभी हाँ कभी ना के साथ फिल्मो में वापसी की। इसके बाद के कुंदन शाह को न जाने तो ही बेहतर। इसके बाद आई उनकी फिल्में क्या कहना, हम तो मोहब्बत करेगा, दिल है तुम्हारा, एक से बढ़कर एक जैसी फिल्मों को देख कर किसे यकीन होगा कि इसी निर्देशक ने 1983 के साल को क्रिकेट का विश्वविजेता बनने के अलावा इस वजह से भी याद करने का मौका दिया कि इस साल क्लासिक कल्ट जाने भी दो यारो रिलीज हुई थी। 
कुंदन शाह ने फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, पुणे से निर्देशन का कोर्स किया था और इस संस्थान से ये उनका प्रेम ही था कि विवादों से हमेशा दूर रहने वाले शाह ने इस संस्थान के छात्रों की हड़ताल को सप्पोर्ट करने के लिए जाने भी दो यारो के लिए मिले नेशनल अवार्ड को लौटाने की घोषणा की थी और अब उनके निधन पर ट्विटर के वीर लोगो द्वारा बेहद असंवेदनशील टिप्पणी की जा रही है और उसे बड़ी निर्ममता के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है। हम बची खुची संवेदनाओं को भी खत्म करते जा रहे है। किसी की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने की बजाय छीटाकशी होना बेहद शर्मनाक है। भक्ति और विरोध की आड़ में हम धीरे धीरे सभी शिष्टाचार, नैतिकता और तर्क को भूलते जा रहे है। कुंदन शाह और जाने भी दो यारों से जुडे लोग वो है जिन्होंने हमें आज तक हंसने और सोचने का मौका दिया है। इस फिल्म को बनाने में किसी बड़े निर्माता का हाथ नही था। एनएफडीसी के सहयोग से बनी इस फिल्म को बनाने में लगे सात लाख रुपये जुटाने में भी टीम को पसीना आ गया। सभी कलाकारों ने अपनी और से फिल्म को सहयोग दिया। फिल्म में फोटोग्राफर बने नसीर का कैमरा नसीर का ही था और शूटिंग के दौरान ही चोरी हो गया था। आज कौन यकीन करेगा कि इस फिल्म के लिए नसीर को केवल पंद्रह हजार रुपये मिले। जब नसीर को पंद्रह हजार ही मिले तो पंकज कपूर, रवि वासवानी, ओम पुरी, सतीश शाह को कितने कम पैसे मिले होंगे, अंदाजा लगाना आसान है। इस फिल्म को थिएटर की मशहूर सख्शियत रंजीत कपूर ने अभिनेता सतीश कौशिक के साथ मिलकर लिखा था। जब रंजीत कपूर ने सतीश कौशिक को इस फिल्म में अपने साथ लिखने को कहा तो सतीश कौशिक का कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में चैक साइन करने के अलावा कभी कुछ नही लिखा पर रंजीत कपूर को उसके ऊपर विश्वास था। रंजीत कपूर ने अपने मिले छह हजार रुपये में से सतीश को लिखने के तीन हजार दिए और इस तरह अभिनय के दो हजार मिलाकर कुल पांच हजार रुपये उसे मिले। कुछ इसी तरह की आपसी सहूलियत से फिल्म बनकर तैयार हुई। फिर आया प्रीमियर का दिन। कुंदन शाह ने फिल्म के प्रीमियम के फ्री पास किसी भी कलाकार को नही दिए माने हर अभिनेता और तकनीशियन को अपनी ही फिल्म को देखने के लिए टिकट खरीदनी पड़ी। प्रीमियर के बाद कोई पार्टी नही हुई, जैसा कि आम तौर पर होता है। सब खाना खाने अपने अपने घर को ही गए। सतीश कौशिक बताते है कि वो उस रात स्टेशन के पास एक छोटे से ढाबे में गए और कहते भी है कि उस रोटी जैसा स्वाद उन्हें फिर न आया। रंगमंच और रंगकर्म संस्कारित करता है। ऐसे उदाहरण आदमी की गहराई को बताता है। इस गहराई और कमिटमेंट को फिल्म देखते हुए हम महसूस कर सकते है। ये फिल्म यारी दोस्ती में बनी थी। एक दूसरे को उत्साहित करते हुए बनी थी। नसीर और रवि के किरदारों के नाम तक फिल्म के दो सहायक निर्देशक विधु विनोद चौपडा और सुधीर मिश्रा के नाम से विनोद-सुधीर रखे गए थे। आज इस गुणी टीम का कप्तान भी चला गया है। ओमपुरी और रवि वासवानी पहले ही जा चुके है। इन सभी बड़े शहरी से दिखने वाले लोगो में अभी भी कस्बा जिन्दा है। ये कस्बाई जमीन के लोग इस एक एक करके हो रहे बिछोह को किस तरह देखते होंगे। संघर्ष के दिन और उन दिनों के साथी हमें बेहद अजीज होते है और
विदा तो हमेशा से दुखदाई होती है। हर विदाई व्यक्तिगत आख्यानो की अनुगूंज से भरी होती हैं।
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मिश्री सी मीठी धुनों वाले मदन मोहन

मदन मोहन ने विधिवत संगीत की कोई ट्रेनिंग नही ली थी पर अजीब बात है कि नौशाद के बाद शायद मदन मोहन की धुने ही सबसे ज्यादा शास्त्रीय, टेक्निकली करेक्ट और विशुद्ध भारतीय रागों पर आधारित थी। संगीतकार बनने की इच्छा के बावजूद अपने पिता का मन रखने के लिए मदन मोहन एक समय फौज में भर्ती हुए, बाद में लखनऊ और दिल्ली के रेडियो स्टेशन पर प्रोग्रामर बने। फिल्मो में छोटे मोटे रोल करते रहे। गायक के रूप में भी हाथ-पैर मारे। संगीतकार एस डी बर्मन से ये देखा न गया। एक दिन बिठाकर कहा कि आखिर तुम अपनी प्रतिभा के साथ इतनी ज्यादती क्यों कर रहे हो। सब काम छोड़ दो और धुनें बनाने पर काम करो। इस तरह मदन मोहन अपने काम को लेकर गम्भीर हुए। एस डी बर्मन का ज्ञान न मिलता तो शायद मदन मोहन फिल्मो के छोटे मोटे एक्टर ही रह जाते। उनकी शुरुआत की किसी फिल्म की गजल को सुनकर खुद बेगम अख्तर ने फोन करके मदन मोहन से पूछा था कि ये कम्पोजिशन बहुत अच्छी है पर तुमने इसे बनाया कैसे? इस धुन को बनाने का प्रोसेस मुझे समझाओ। और आज मदन मोहन की जितनी भी धुनें है, उनका आनंद लेते हुए ये भी सोचना चाहिए कि बिना संगीत की फॉर्मल ट्रेनिंग लिए इस बन्दे ने ऐसी मुश्किल धुनें तैयार कैसे की होगी?
जिस दौर में मदन मोहन थे, उस दौर में हर गाने के दो अंतरे होते है जिसकी ट्यून एक जैसी ही होती थी। उस दौर में भी मदन मोहन और सी रामचन्द्र संभवत दो ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने हर अंतरे की अलग ट्यून बनाने की नई रवायत शुरू की। हंसते जख्म के गाने तुम जो मिल गए हो में तो मदन मोहन ने तीन अंतरे तीन अलग अलग मूड और ट्यून में बनाएँ। इस तरह की रवायत को रहमान ने परवान चढ़ाया जिसने गाने के ओपनिंग पीस, अंतरे, इंट्रो जैसी शास्त्रीयता और तय चीजो को अपनी प्रतिभा से बदल कर रख दिया। मदन मोहन के मुरीद हर दौर में रहें। अभी के कलाकारों को कभी एक दूसरे की खुल कर तारीफ करते देखना कम ही होता है पर पहले का माहौल इस मायने में बहुत खास था। अच्छे काम की खुल कर तारीफ की जाती थी और कलाकार होता ही वही है जो खुलकर किसी दूसरे के अच्छे काम की सराहना करें। दूसरों के श्रेष्ठ की रक्षा करने का भाव हर कलाकार में ही नही, हर इंसान में भी होना निहित है। संगीतकार खय्याम जो खुद मदन मोहन के संगीत और उस संगीत में छिपे आराम और मिठास के सबसे ज्यादा करीब थे, ने कभी एक मंच पर मदन मोहन को याद करते हुए कहा था-
‘मदन जी अपने सभी समकक्ष और सीनियर कम्पोजर के पसंदीदा थे। ऐसे गुणी शास्त्रीय लोग जिनका फिल्म संगीत से कोई लेना-देना नही था, वो भी मदन जी के मुरीद थे और उनके गानो को सुना करते थे। और तो और, लता मंगेशकर जिनको हम सभी पसन्द करते है, उनके भी पसंदीदा मदन जी थे। लता जी जैसा उनके लिए गाती थी, सुनकर सच में जलन होने लगती थी कि ऐसा वो हमारे लिए क्यों नही गाती।‘
और फिर कभी लता ने जब एक बार जब अपने गाये पसन्दीदा दस गीतों के बारे में बताया तो भी केवल मदन मोहन ही अकेले ऐसे संगीतकार थे, जिनके दो गीतों को लता ने इसमें शामिल किया था।
मदन मोहन जिनके काम का मुरीद वो जमाना भी था और ये जमाना भी है, जिनकी फिल्म अनपढ़ के दो गानो आपकी नजरो ने समझाश् और है इसी में प्यार की आबरू को सुनकर नौशाद ने कहा था कि इन दो धुनों पर उनका सारा रचा हुआ संगीत कुर्बान है उस मदन मोहन के काम को कभी अवार्ड के लायक नही समझा गया। दुःखद है पर सत्य है। खुद मदन मोहन बहुत गैरत वाले थे पर उनको अवार्ड नही मिलने पर सबसे ज्यादा दुःखी होती थी लता मंगेशकर। एक बार बोली- मदन भईया। आपके इतने अच्छे काम को अवार्ड नही मिलता तो सचमुच बड़ा अफसोस होता है। मदन मोहन हंसते हुए बोले- इससे बड़ा मेरा अवार्ड क्या होगा कि मेरे लिए अफसोस खुद लता मंगेशकर कर रही है।
फिर आया वो दिन जब फिल्म दस्तक के लिए संजीव कुमार को बेस्ट एक्टर और मदन मोहन को पहली बार संगीतकार का नेशनल अवार्ड घोषित हुआ। ठसक से भरे मदन मोहन ने सोच लिया कि वो अब अवार्ड नही लेंगे पर संजीव कुमार ने उन्हें मना लिया। बोले, में सूट का कपड़ा लाया हूँ। दोनों एक साथ एक जैसे सूट में अवार्ड लेने जाएंगे। और आज तक भी मदन मोहन को केवल दस्तक के लिए मिला एकमात्र पुरस्कार दर्ज है।
इस देश में प्रतिभाओं के साथ हुई अविरल बदतमीजियों में से ये भी एक बेहद खूबसूरत बदतमीजी है।

 

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बेचैनियों से भरे अंनंत इंतजार का गीत- तुम पुकार लो

1969 के साल संगीतकार और गायक हेमंत कुमार की फिल्म कम्पनी गीतांजलि द्वारा असित सेन के निर्देशन में फिल्म खामोशी परदें पर आई। खामोशी हर मानक पर अपने समय से बहुत आगे की फिल्म थी। संगीत से लेकर अपने कंटेट तक, रूपक से लेकर किरदार की डिजाइन, हर बात में अपने जमाने का बहुत मॉडर्न सिनेमा था और "तुम पुकार लो" इस प्यारे चितेरे प्रोजेक्ट का एक बेहद खास "मिदास" टच। वो रंग, जिसके बिना खामोशी की हर बात बेमानी है, बेनूर है। वो रंग, जिससे ही शायद सबसे ज्यादा हमें खामोशी याद आती है। 
 
खामोशी बंगाली उपन्यासकार आशुतोश मुखर्जी के लिखे उपन्यास "नर्स मित्र' पर बनाई फिल्म थी। फिल्म में वहीदा रहमान एक नर्स है जो प्यार की चोट से डिप्रेशन में गए मरीजो के लिये बने हाॅस्पिटल में काम करती है। हाॅस्पिटल के मालिक के कहने पर वो देव नाम के आदमी जिसका किरदार धर्मेंद्र ने निभाया, से प्यार का अभिनय कर उसे डिप्रेशन से बाहर लाती है और बाद में प्रेम का नाटक करते करते उसे सच में देव से प्यार हो जाता है। कालिदास की मेघदूत की किताब पर अपने "प्यार" को अपना "प्रणय" बताने उसके घर गई है जहां उसे पता लगता है कि वो वापिस उसी लड़की से शादी कर रहा है जिसके कारण वो डिप्रेशन में गया था। दिल में उठी हुक के साथ इसी उदास और मायूसी भरी सिचुवेशन में ये गाना बजना शुरू होता है। सिचुवेशन की खूबसूरती यह भी है कि नायिका के दर्द की आवाज नायक बनता हैै माने जो कुछ नायिका के भीतर चल रहा है उसे स्वर नायक देता है जबकि फिल्म में नायक की जिंदगी में फिलहाल ऐसा कोई रंज या अफसोस है नही जिसके लिए वो ऐसा गा रहा है। ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र चैक का बुशर्ट पहने कैमरे की और पीठ किये हेमंत दा की मदहोश करती नशीली हमिंग में एक उदास पर रुहानी अहसास जगा रहे है। हिन्दी सिनेमा के फाॅल्स बहुत बार खूबसूरती बनकर भी सामने आते है जैसे इस टैक्नीकल फाॅल्स को अपने आभा में चमत्कृत किये हेमंत दा और धर्मेंद्र। ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र। सुशील, सुसंस्कृत और पौराणिक से। अनपढ, अनुपमा, बंदिनी, दिल ने फिर याद किया वाले ब्लैक एण्ड व्हाईट धर्मेंद्र। तकनीक से हिन्दी सिनेमा में रंग क्या आयें, चितेरे धर्मेन्द बेरंग हो गयें। उनकी गंभीरता और रोमांस जाता रहा और ढिशुम ढिशुम परवान चढ़ता गया। खैर, गाने की सिग्नेचर ओपनिंग ट्यून के साथ हेमंत दा की गुनगुनाहट वाली हमिंग से गाने की टोन सैट होती है जिसका जादू पूरे आगे तक कायम रहता है। 
तुम पुकार लो/ तुम्हारा इंतजार है/ तुम पुकार लो
ख्वाब चुन रही है रात/ बेकरार है / तुम्हारा इंतजार है 
होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम/ जागते रहे और कितनी रात हम/ रात बेकरार थी, बेकरार है/ तुम्हारा इंतजार है।
 
ये गीत बेचैनियों से भरे अंनंत इंतजार का गीत है। हेमंत कुमार की आवाज में लंबी उदासियों की अनसुनी प्रार्थनाये दर्ज है। नैराश्य में डूबने को तैयार हो चुके मन की छटपटाहट है। अधूरे रतजगों का आलाप है। ये उस अवस्था का गीत है जब आप अपना सब कुछ किसी को सौपने की तैयार हो और बस उसकी एक हां की जगमगाहट को सुनने को बेकरार हो। इधर उसकी एक हां हो और आपको सांस मिलें। लंबे जीवन के बीच किसी एक निश्चित पल पर रूकने की इच्छा लियें उम्मीदों भरा ऐसा मन है जो अनंत यात्रा से भटक आने से आनिंद है और अब उसे वाजिब एक ठौर की तलाश है। मिले न मिले, ये दीगर बात। 
 
हेमंत कुमार की आवाज हिन्दी सिनेमा की सबसे अलग आवाज होगी। इतनी अलग कि किशोर, मुकेश, मन्ना डे और रफी की अद्भूत प्रतिभा और लोकस्वीकार्यता के बावजूद अपने वजूद और क्लास के साथ कायम रही। जिन गानो को हेमंत दा ने अपने कंठ दिये, वो उन्ही के लिये बने थे। उनके बिना वो गीत अधूरे रहते। उनका गला पवित्रता लिए था। गायकी का नोट इतना मंद पर सधा हुआ था कि आपको यकीन हो जायें कि अगर हाड मांस के इस शरीर में बसी अंतरआत्मा का स्वर कोई होता होगा तो शायद वो ऐसा ही होता होगा। रवीन्द्र संगीत से सराबोर गुनगुनाहटो से भरा स्वर। ऐसा स्वर जो ना पूरा खुले और ना दबे। प्यार के मानिंद। शायद पूरा प्यार ही। 
खामोशी की कहानी और मूल कंटेट बहुत धाकड था। राधा बनी वहीदा रहमान को जब देव के बाद राजेश खन्ना को डिप्रेशन से बाहर लाने के लिये फिर से कहा जाता है तो वो चीख चीख कर मना कर देती है कि वो अब प्यार की एक्टिंग नही कर सकती। प्यार का अभिनय करना और फिर प्यार के अभिनय को करते करते ही अचानक प्यार का उपजना, फिर इस असली और नकली, अभिनय और हकीकत के बीच भावनात्मक रूप से जूझना काफी साहसिक विषय था। प्यार का अभिनय और हकीकत के बीच की कश्मकश को लेकर लाभशंकर ठक्कर ने एक बहुत मनौवैज्ञानिक नाटक लिखा था- पीला गुलाब और मैं। एक अभिनेत्री की कहानी जो बहुत छोटी उम्र से मंच पर प्रेम का अभिनय कर रही है। उस समय से, जब उसे प्रेम का ककहरा भी नही पता होता है फिर भी लोग कहते है कि वाह, क्या गजब नेचुरल एक्टिंग की है और जब वो सचमुच में किसी के प्रेम में होती है तो उसे लगता है कि ये सब तो वो ही है जो कि वो अभिनय में कर रही थी। इसमें नया क्या है। ये भाव तो वो मंच पर तब भी जी रही थी जब वो इसके बारे में नही जानती थी, एकदम फीलिंगलैस थी, तो अब जो वास्तव में कर रही है वो क्या है। अभिनय या हकीकत। खामोशी का मूल कंटेट यही था। बाद बाकी इसके आस-पास। वैसे तो रिश्तों में प्यार की हकीकत या प्यार का अभिनय हमेशा का ही विषय है पर अभी की काल और परिस्थितियों में ये और ज्यादा प्रासंगिक है। प्रेम जटिल विषय है। इस पर लंबे आख्यान लिखे जा सकते है।
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