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अनु मलिक होने के मायने

संगीतकार अनु मलिक की ऊर्जा और काम करते रहने की ललक अचंभित करती है। इतने नये उम्दा युवा संगीतकारों के बीच भी अब तक संगीत देते रहने के उनकी कोशिश और खुद को हर एक से श्रेष्ठ साबित करने की अभिलाषा गजब है। अनु मलिक की इस बेमिसाल सकारात्मकता का ही परिणाम है कि इस ढलान पर भी उनके कम्पोज किये गए गाने मोह मोह के धागे की गायिका मोनाली ठाकुर को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है। ये अनु की रचनात्मकता से ज्यादा काम के लिए उनकी श्रद्धा और जज्बे की जीत है।
 
अनु मलिक अस्सी के दशक के उस दौर में फिल्म उद्योग में आये जब लक्ष्मी-प्यारे, बप्पी, कल्याण जी आनंद जी और आर डी बर्मन का जमाना था। अभी काम करने के जितने दस्तक-दरवाजे और अवसर उपलब्ध है, उस दौर में मिलना मुश्किल था। सुनते है कि उसने जुहू के बीच पर जॉगिंग करते और बाथरूम में बंद हुए निर्माताओं को अपने गाने जबरदस्ती सुनाए ताकि उसे काम मिल सके। सुभाष घई के पीछे निहायती बेशर्मी से पीछे पड़े तब जाकर यादें मिली। ये अनु का स्टाइल है। उसे काम मांगने में और खुद को सबसे श्रेष्ठ बताने में कोई शर्म नही आती। अनु ने अपना कोई नया ट्रेंड सेट नही किया जैसे कि आम तौर पर नए संगीतकार करते ही है बल्कि उस दौर के संगीतकारों की स्टाइल को ही अपना कर अपनी दुकान स्थापित करने की कोशिश की। स्थापित होने को कई बार करना पड़ता है, साधारण सी व्यावसायिक बात है, समझ सकते है पर हैरानी ये है कि वो आज तक यही करते रहे है। अपने से लगभग आधी उम्र और अनुभव के संगीतकार की स्टाइल भी हर दौर में कॉपी मारते रहे, धुनों की कॉपी तो खैर थोड़ी थोड़ी सभी ने ही की ही है, किसी ने कम तो किसी ने ज्यादा। अस्सी के दशक की फिल्म एक जान है हम फिल्म के संगीत का स्टाइल पूरा आर डी बर्मन का था। मिथुन का गाना जूली जूली यानी फिल्म जीते है शान से जैसी फिल्म में स्टाइल बप्पी लहरी का। मर्द, गंगा जमुना सरस्वती, सोहनी महिवाल और अनिल कपूर की आवारगी जैसी फिल्मो में स्टाइल लक्ष्मी-प्यारे की। सबका म्यूजिक थोडा-थोडा लेकर दुकान चलाते रहे। फिर आया नब्बे का दशक जिसमे उनसे काफी जूनियर आनंद मिलिंद, नदीम श्रवण और दिलीप सेन समीर सेन की चलताऊ स्टाइल का समीर के दिल-जिगर-नजर वाला दौर। इस दौर में भी खुद के अस्तित्व को जिन्दा रखने के लिए इसी गाडी को पकड़ अनु मलिक ने सर, फिर तेरी कहानी याद आई, तहलका, नाराज, विजयपथ जैसी बहुत सी फिल्मो का संगीत रचा। नदीम श्रवण दौर मद्धम हुआ तब केवल रहमान नाम के जादूगर की ही चर्चाये थी तो नदीम-श्रवण स्टाइल को छोड कर अशोका और यादें में रहमान जैसी कोशिश की। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की अक्स में विशाल भारद्वाज को पकड़ने की कोशिश की। टेक्नो प्रीतम युग में अगली और पगली, मान गए मुगल-ऐ-आजम और शूटआउट एट वडाला का म्यूजिक दिया। अभी की आयुष्मान की फिल्म जोर लगा के हइसा का गाना ये मोह मोह के धागे भी अभी के संगीतकारों के ट्रेंड का लग रहा है। एक और मजेदार बात, उसका स्टाइल कॉपी का कॉन्सेप्ट केवल फिल्मो तक नही रहा, नब्बे के शानदार इंडियन पॉप के युग मे भी उसने जो प्राइवेट अल्बम निकाले वो भी उस पॉप गुरु बिद्दू से प्रेरित थे। 
 
अनु संगीतकार के तौर तो कभी नहीं जमे पर जीवन के प्रति उनकी जिजीविषा और उत्साह ने हमेशा प्रेरित किया। अपनी सीमित प्रतिभा के बावजूद उसने खुद को किसी से कमतर नही समझा। आज भी कॉरप्रेट और मार्केटिंग वाले अनु से सकारात्मक एनर्जी ले सकते है। अपने आस पास, ऑफिस, पड़ोस में ऐसे बहुत लोग देखने को मिल  जाएंगे जिन्होंने अपनी प्रतिभा से ज्यादा उसकी मार्केटिंग कर खुद को जिन्दा रखा है। जे पी दत्ता की बोर्डर और रिफ्यूजी में अनु ज्यादा मुखर है जो उस दौर के संगीत से प्रेरित होने के बावजूद भी अपनी एक छाप लिए था। जे पी दत्ता ने नई फिल्म बनाने की घोषणा की है और शायद अनु मलिक का कुछ और बेहतर काम सुनने को मिले।
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रहमान रिबेल पर हिन्दी पर नो कंट्रोल

संगीतकार ए आर रहमान को हिन्दी में बोलना, लिखना और बात करना नही आता है। उनका ज्यादातर काम तमिल और इंग्लिष से ही होता है। हां, गुजरे कुछ सालों में थोडा बहुत उर्दू लिखने पढने की कोषिष की थी जिसका नतीजा ये निकला कि अब बोली हुई उर्दू को वे थोडा बहुत समझ सकते है पर अभी तक भीे उसे हिन्दी और उर्दू को समझने में काफी तकलीफ होती है। पत्नी साईरा जो इन दोनो भाषाओ की अच्छी जानकार उससे रहमान अटकने पर पूछ लेते है पर हिन्दी-उर्दू कभी सीख नही पाये। वैसे रहमान की बेसिक पढाई कभी पूरी हुर्ह भी नही और अच्छा ही हुआ। पढा लिखा रहमान शायद इतना अप्रतिम न हो पाता जितना आज है। सुभाष घई ने भी कभी रहमान से कहा था कि आप हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हो। आपको हिन्दी तो सीखनी ही चाहिए। ये आपको आपके काम में और ज्यादा मदद करेगा। इस पर रहमान ने बडा मजेदार जवाब दिया। कहा कि दरअसल जीवन में जानना और नही जानना दोनो ही आपको फायदा पहुचाते हैं। अब, जबकि मै हिन्दी और उर्दू को पहले से ज्यादा अच्छा समझता हूं तब भी किसी भी गाने पर काम करते समय सबसे पहले उसकी धुन ही बनाता हूं। पोएट्री उस घुन के मुताबिक बनाई जाती है। मेरे लिये आज भी धुन ज्यादा महत्व रखती है। मेरे बहुत से गाने आज वैसे नही होते जैसे कि वो है अगर में उस गाने के सभी शब्दों को समझ पाता। उस समय, जब आप किसी भाषा के अच्छे जानकार हो जाते हो, बहुत संभव है कि किसी भी म्यूजिक सिटिंग और आइडिया में वो भाषा आपको डिक्टेटर की तरह ये बताये कि आपको क्या करना है और आप खतरनाक तरीके से ट्रेडिषनल घिसे पिटी चीजो के सृजन तक सीमित रह जायें।
यह टिप्पणी रहमान जैसे जीनियस ने कही तब ही इसे महत्व दिया जा सकता है वरना व्यावहारिक तौर पर तो किसी भाषा को जानना और वो उस भाषा को जानना श्रेयस्कर ही होता है जिसमें आपको काम करना है। रहमान के दिये संगीत में हालांकि उसकी कही बात सही भी साबित होती है। रहमान के लिये लिखे से ज्यादा धुन महत्व रखती है और ये कोई नई बात नही है। उन्होने मजरूह सुल्तानपुरी साहब, आनंद बक्षी, गुलजार, जावेद अख्तर, प्रसून जोषी जैसे गुणी लोगो के साथ काम किया है पर आज भी वो अपनी धुन में एक निष्चित शब्द के अर्थ से ज्यादा धुन में उस शब्द के साउंड को ज्यादा महत्व देते है। फिल्म रंग दे बसंती के गाने मस्ती की पाठषाला को याद करें। उसे लिखा प्रसून जोषी ने था पर गाने में रहमान को ओपनिंग पीस के साथ कुछ कैची सा चाहिए था जिसके लिये उसने अपने दोस्त रैप सिंगर ब्लैज से कहा और उसने उस ओपनिंग पीस के लिये दो लाइन बनाई- बी ए रिबेल, लूज कंट्रोल। यहां इन दो लाइनो का उस गाने में बना साउंड प्रसून के लिखे पूरे गाने पर भारी है। आज रहमान हिन्दी सीखे हुए होते तो हो सकता है कि उसके गानो का वो खास साउंड हमें नही मिलता जिसके लिये भी हम सब रहमान को जानते है। खुद रहमान मानते है कि दक्षिण में आज भी आर डी बर्मन के गाने दम मारो दम को लोग खूब सुनते और गाते है जबकि उसके एक भी शब्द का मतलब उन्हे पता नही होता है। उस धुन और साउंड से ही लोग इतना प्यार करते है कि भाषा यहां कोई मायने नही रखती। और आज जब हिन्दी का बोलबाला फिर से बढ रहा है, फेसबुक के लेखको ने हिन्दी को ग्लोबल लेवल पर नये फलेवर में पहुचाने का काम किया है, इसी दौर में संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म पदमावती का पहला पोस्टर हिन्दी में जारी किया है। ये क्या कम बडी बात है। भाषा को लेकर रहमान की कही बातें पर एक स्वस्थ बहस के रूप में तो देखी ही जा सकती है।

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नैना बरसे रिमझिम रिमझिम

कोई-कोई सुबह ऐसी भी होती है जब लगता है कि पिछली रात को आप किसी जंगलों, पहाड़ो और समन्दरों से चल के आये है। यात्रा थी पर कही जाना नही हुआ। कुछ ढूँढने की फिराक में थे पर पता ही ना था कि ढूंढना किसे था। और फिर आंख खुले। आप के पैर उस थकान को महसूस करें। पसीने से भीगी काया हो। बैचैन हो अवचेतन। उन जगहों से फिर से ढूंढने की कोशिशे हो। उस यात्रा को उनींदी आंखों में फिर से लाने की कोशिश हो। खाली खाली सा पिंजर अचानक ऐसे भाव से भर जाए जो आपने अब तक महसूस नही किया हो। आप अपने भीतर तक उतरते चले जाए। सारा बिखराव सिमट जाये। अचानक आप लबालब होते जाते है। भाव से। प्यार से। भर जाए। इतने लबालब हो जाये कि कोई हाथ रखे और आप फूट पड़े।
कोई-कोई सुबह अपने भरे हुए मन के लिए ऐसे किसी गीत को दवा बनानी पड़ती है जो आपको छलकने का मौका दें और ऐसे में लता के गाये नैना बरसे को एक बार फिर सुनना पड़ता है। जाने कितने बरसो से सुनते ही आ रहे है। संगीतकार मदन मोहन की ये कमाल धुन राज खोसला की फिल्म वो कौन थी मे दर्ज है पर इस धुन के इस्तेमाल की कहानी भी कम लाजवाब नही। नैना बरसे की धुन को मदन मोहन रिकार्ड करने से अठारह साल पहले ही बना चुके थे पर जाने क्या था कि लगातार हर निर्माता-निर्देशक इसे रिजेक्ट किये जा रहे थे। इतना रिजेक्ट कि मदन मोहन ने सोच लिया कि अगर राज खोसला भी इस धुन को ना कर देंगे तो इस फिर धुन के बारे में सोचना बंद कर देंगे पर राज खोसला को ये धुन बहुत पसन्द आई। सुनते ही हाँ कर दी पर अब फिल्म की एक दूसरी धुन लग जा गले उन्हें बहुत साधारण लगी। उसे रिजेक्ट कर दिया। अजीब था पर सच यही है कि रिजेक्ट हों रही धुन सलेक्ट हो गई और लगभग सलेक्ट होने वाली धुन हो गई रिजेक्ट। बाद में फिल्म के हीरो मनोज कुमार ने ये लग जा गले की धुन सुनी और सुनकर ठीक वैसे ही उस खुमार में चले गए जिस खुमार में हम सब आज तक इस गाने को सुनकर हैं। उन्होने ही राज खोसला को फिर इस गाने को फिल्म में रखने के लिए राजी किया और गाने फिल्म में रहे। आज इन दोनों गानो को सुन सुन कर हमने जमाने बदल दिए। ये गीत अब तक हम सब की सुप्त होती भावनाओ को सहलाते रहते है।
खुद मदन मोहन ने फिर इस पर बोलते हुए एक रेडियो इंटरव्यू में कहा- 'फीलिंग कैसी भी हो, किसी भी कला में ढली हुई हो, उसे वक्त और जमाना कैद नही कर सकता। वह हर समय ताजा बनी रहती है।Ó मदन मोहन साहब, कितने सही थे आप।
और फिर ये सब जानने के बाद अक्सर इस गाने को सुनते हुए एक डर मन में हमेशा हरा रहता है कि अगर उस दिन, उस रोज राज खोसला भी नैना बरसे को रिजेक्ट कर देते तो.....

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अति विनम्रता घातक

विनम्रता सद्गुण है लेकिन जरूरत से ज्यादा विनम्र होना कॉर्पोरेट जगत में घातक सिद्ध होता है। अति विनम्र होने से आप सभी के लिए सुलभ लक्ष्य हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सभी आपको सुलभ, सरल मानकर अपने काम भी आपसे करवाते जाते हैं। आप यह सोचकर अन्यों के भी काम करते जाते हैं ताकि सम्बन्ध नहीं बिगड़ जाये। नतीजा यह निकलता है कि आप स्वयं के कामों में उत्कृष्ट रूप से परफॉर्म नहीं कर पाते. अत: कॉर्पोरेट जगत में अति विनम्र होना या अत्यधिक सदाशयता का परिचय देना बहुत घातक सिद्ध हो सकता है। सभी के लिये उपलब्ध सज्जन मैनेजर की लोग प्रशंसा तो करते हैं लेकिन उसे परिणाम नहीं देते। परिणाम नहीं दे पाने के कारण अति विनम्र मैनेजर लोकप्रिय तो हो जाता है लेकिन प्रभावी नहीं हो पाता। अन्ततोगत्वा उस मैनेजर पर अप्रभावी होने का लेबल लगाकर उसे निकाल दिया जाता है। यही कठोर निर्मम मैनेजमेंट का स्याह सच है। यहां हमें मैनेजमेंट के सिद्धांत 'मंकी ऑन योर शोल्डरÓ सिद्धांत से प्रेरणा लेनी चाहिये। 'मंकीÓ का अर्थ है आपके मूल काम। यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि:
हम उतने मंकी ही अपने पास रखें जिन्हें हम फीड कर सकते हैं अर्थात उतने काम ही हाथ में लेवें जिन्हें आप सफलता पूर्वक कर सकते हों।
सदा विनम्र रहें लेकिन अपनी रीढ़ की हड्डी के केल्शियम को बनाये रखें। इसका अर्थ है कि रीढ़ विहीन 'एस मेनÓ नहीं बनें।
दूसरों के मंकी अर्थात दूसरों के कार्य स्वयं कदापि न करें। ऐसा करने पर आपको बेगार मिलती रहेगी क्योंकि सहकर्मियों को लगेगा कि आपको मंकीज की जरूरत है।
दूसरों के मंकीज यानि कामों को स्वयं ले लेने पर आप यह कहते हैं कि अब वह काम आपका है और आप अपने सहकर्मी को उसकी प्रगति रिपोर्ट भी देंगे।
विनम्र व्यवहार उन्हीं के साथ रखें जो इस विनम्रता का मूल्य समझते हों। जो विनम्रता और सदाशयता को कमजोरी मानते हों, उनके साथ पेशेवर व्यवहार ही उचित और तर्कसंगत है।
प्रशंसा और चापलूसी में अंतर करना सीखिये. चापलूसी को प्रशंसा समझकर हम कई बार अन्यों के कामों को भी कर डालते हैं, इससे बचिये।
मन्त्र यह है कि विनम्रता, प्रेम, दया आदि सद्गुण हैं। इन्हें समझने के लिए परिपक्वता की ज़रूरत होती है। अपरिपक्वों से ये उम्मीद न रखें कि वे आपके विनम्र व्यवहार को समझेंगे। अत: अति विनम्र न बनें।

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