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और कुंदन ने कहा जाने भी दो यारों

फिल्मकार कुंदन शाह का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनकी अंतिम फिल्म 2014 में आई पी से पीएम तक थी पर हम सभी उन्हें उनकी बनाई दो फिल्में जाने भी दो यारो और कभी हाँ कभी ना के लिए हमेशा याद रखेंगे। ये दो फिल्में लंबे समय तक उनके नाम के साथ टिमटिमाएँगी। 1983 से लेकर 2014 के 31 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने केवल आठ फिल्में और तीन सीरियल बनाये। विधु विनोद चोपड़ा की निर्देशक के रूप में बनी पहली फिल्म खामोश की स्क्रिप्ट लिखी और दूरदर्शन के लिए नुक्कड़, ये जो है जिन्दगी और वागले की दुनिया जैसे लाजवाब सीरियल बनाये। जाने भी दो यारो के बाद टीवी के सक्रिय रहे और फिर 1993 में कभी हाँ कभी ना के साथ फिल्मो में वापसी की। इसके बाद के कुंदन शाह को न जाने तो ही बेहतर। इसके बाद आई उनकी फिल्में क्या कहना, हम तो मोहब्बत करेगा, दिल है तुम्हारा, एक से बढ़कर एक जैसी फिल्मों को देख कर किसे यकीन होगा कि इसी निर्देशक ने 1983 के साल को क्रिकेट का विश्वविजेता बनने के अलावा इस वजह से भी याद करने का मौका दिया कि इस साल क्लासिक कल्ट जाने भी दो यारो रिलीज हुई थी। 
कुंदन शाह ने फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, पुणे से निर्देशन का कोर्स किया था और इस संस्थान से ये उनका प्रेम ही था कि विवादों से हमेशा दूर रहने वाले शाह ने इस संस्थान के छात्रों की हड़ताल को सप्पोर्ट करने के लिए जाने भी दो यारो के लिए मिले नेशनल अवार्ड को लौटाने की घोषणा की थी और अब उनके निधन पर ट्विटर के वीर लोगो द्वारा बेहद असंवेदनशील टिप्पणी की जा रही है और उसे बड़ी निर्ममता के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है। हम बची खुची संवेदनाओं को भी खत्म करते जा रहे है। किसी की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने की बजाय छीटाकशी होना बेहद शर्मनाक है। भक्ति और विरोध की आड़ में हम धीरे धीरे सभी शिष्टाचार, नैतिकता और तर्क को भूलते जा रहे है। कुंदन शाह और जाने भी दो यारों से जुडे लोग वो है जिन्होंने हमें आज तक हंसने और सोचने का मौका दिया है। इस फिल्म को बनाने में किसी बड़े निर्माता का हाथ नही था। एनएफडीसी के सहयोग से बनी इस फिल्म को बनाने में लगे सात लाख रुपये जुटाने में भी टीम को पसीना आ गया। सभी कलाकारों ने अपनी और से फिल्म को सहयोग दिया। फिल्म में फोटोग्राफर बने नसीर का कैमरा नसीर का ही था और शूटिंग के दौरान ही चोरी हो गया था। आज कौन यकीन करेगा कि इस फिल्म के लिए नसीर को केवल पंद्रह हजार रुपये मिले। जब नसीर को पंद्रह हजार ही मिले तो पंकज कपूर, रवि वासवानी, ओम पुरी, सतीश शाह को कितने कम पैसे मिले होंगे, अंदाजा लगाना आसान है। इस फिल्म को थिएटर की मशहूर सख्शियत रंजीत कपूर ने अभिनेता सतीश कौशिक के साथ मिलकर लिखा था। जब रंजीत कपूर ने सतीश कौशिक को इस फिल्म में अपने साथ लिखने को कहा तो सतीश कौशिक का कहना था कि उन्होंने अपने जीवन में चैक साइन करने के अलावा कभी कुछ नही लिखा पर रंजीत कपूर को उसके ऊपर विश्वास था। रंजीत कपूर ने अपने मिले छह हजार रुपये में से सतीश को लिखने के तीन हजार दिए और इस तरह अभिनय के दो हजार मिलाकर कुल पांच हजार रुपये उसे मिले। कुछ इसी तरह की आपसी सहूलियत से फिल्म बनकर तैयार हुई। फिर आया प्रीमियर का दिन। कुंदन शाह ने फिल्म के प्रीमियम के फ्री पास किसी भी कलाकार को नही दिए माने हर अभिनेता और तकनीशियन को अपनी ही फिल्म को देखने के लिए टिकट खरीदनी पड़ी। प्रीमियर के बाद कोई पार्टी नही हुई, जैसा कि आम तौर पर होता है। सब खाना खाने अपने अपने घर को ही गए। सतीश कौशिक बताते है कि वो उस रात स्टेशन के पास एक छोटे से ढाबे में गए और कहते भी है कि उस रोटी जैसा स्वाद उन्हें फिर न आया। रंगमंच और रंगकर्म संस्कारित करता है। ऐसे उदाहरण आदमी की गहराई को बताता है। इस गहराई और कमिटमेंट को फिल्म देखते हुए हम महसूस कर सकते है। ये फिल्म यारी दोस्ती में बनी थी। एक दूसरे को उत्साहित करते हुए बनी थी। नसीर और रवि के किरदारों के नाम तक फिल्म के दो सहायक निर्देशक विधु विनोद चौपडा और सुधीर मिश्रा के नाम से विनोद-सुधीर रखे गए थे। आज इस गुणी टीम का कप्तान भी चला गया है। ओमपुरी और रवि वासवानी पहले ही जा चुके है। इन सभी बड़े शहरी से दिखने वाले लोगो में अभी भी कस्बा जिन्दा है। ये कस्बाई जमीन के लोग इस एक एक करके हो रहे बिछोह को किस तरह देखते होंगे। संघर्ष के दिन और उन दिनों के साथी हमें बेहद अजीज होते है और
विदा तो हमेशा से दुखदाई होती है। हर विदाई व्यक्तिगत आख्यानो की अनुगूंज से भरी होती हैं।
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और एक दिन अचानक उनकी स्मृतियों में से खुद का यूं गायब हो जाना

जिस पियानो पर उसकी उंगलियां रेशम सी मुलायम दौडती थी। लोग कहते थे कि उसका जन्म ही पियानो के बोर्ड से निकलने वाली मधुर स्वर लहरियों के लिये हुआ है पर एक दिन ऐसा भी आये कि अचानक उसकी उंगुलिया उस साज के लिये सदा के लिये अजनबी बन जायें। उसे बजाना भूल जायें। एक प्यारा कवि, जिसकी प्रेम कविताओं को सुन लोग प्रेम में भीग जाया करते थे, एक दिन अचानक प्रेम से ही रिक्त हो जायें। प्रेम कवितायें लिखना भूल जायें। अब प्रेम की बजाय विरह उसका विषय है। लाख कोशिश करें पर प्रेम फिर से लिख न पायें। उसे जता न पायें। भूल जायें। अब यह जीवन की एक पीडा है और जीवन की ये पीडा इसलियें हरी नही कि वो कुछ भूला चुका है। पीडा ये है कि दरअसल जो कुछ वो भूला है, वास्तव में वो ही जीवन था। विलोप उसका ही हुआ है।  
दक्षिण के फिल्मकार बालू महेन्द्रु की उन्नीस सौ तिरासी में कमल हसन और श्रीदेवी के यादगार अभिनय से सजी फिल्म सदमा का जादूई क्लामैक्स इसी पीडा को समेटे हुए है। सदमा सदमा नही होती अगर ये क्लाईमैक्स नही होता और सदमा का क्लाईमैक्स भी इतना जादूई क्लाईमैक्स भी नही होता अगर इसमें कमल हसन का अप्रतिम अभिनय शामिल नही होता। फिल्म के अंतिम कुछ मिनटो में कमल हसन फिल्म के किरदार सोमू की तड़प को अपने अभिनय सेे चरम पर ले जाते है। ये उस आदमी की तडप है जिसका सब कुछ उससे ‘रूठकर‘ नही, उसे हमेषा के लिये ‘भूलकर‘ जा रहा है। हिन्दी सिनेमा में ट्रेन और बरसात हमेषा से विदाई का प्रतीक बनकर इस्तेमाल होते आये है और सदमा के इस बरसाती क्लाईमैक्स में छूटती हुई ट्रेन इस तरह के दृष्यों का सिरमौर दृष्य है। सदमा का मुख्य किरदार रेशमी जो एक्सीडेंट के बाद बचपने में चली गई है, स्कूल मास्टर सोमू को अजीब से हालात में मिलती है और अब सोमू उसे अपने साथ ले आता है। उसके बचपने को खुद बच्चा बनकर उसके साथ जीता है। बंदर बनता है। सिर पर मटकी रख कर नाचता है, ताकि रेशमी खिलखिला उठे। उसको लोरी गाकर सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना सपना परोसता है और उसका ख्याल रखते रखते उसके प्यार में पड जाता है। रेशमी जो कभी उसका हाथ पकडकर कहती है कि सोमू, मुझे कभी छोडकर मत चले जाना और आज उसकी पुरानी स्मृति लौटने पर अब वो अपने उसी सोमू को छोडकर जा रही है। उसे अब सोमू और सोमू के साथ बिताया हुआ समय याद नही है। उसकी स्मृतियों में अब वो जगह खाली है जो दरअसल अब सोमू की पूरे जीवन की स्मृति बन चुकी है। स्मृति का ये एकतरफा लोप सोमू के लिये दुखदायी है। बरसते मौसम में स्टेशन पर छूट रही इस ट्रेन में अब रेषमी हमेशा के लिये जा रही है और उसको खुद की याद दिलाने के लिये सोमू गिरते पडते हुए खुद की याद दिलाने की कोशिश कियें जा रहा है पर रेषमी की आंखों में उसके लिये कुछ भी नही है। ना प्रेम, ना पहचान, ना घृणा, ना कसक और ना पीडा। वो अब जा रही है और उसके लौट आने की कोई उम्मीद नही है। सोमू के हिस्से में कमबख्त इंतजार भी तो नही है। कमल हसन अपनी डायलाॅग डिलीवरी और स्पीच में जितने साधारण है, किरदार को उसकी भावना के पूरे वेग के साथ अपने भीतर तक उतारने में उतने ही जीनियस है। सदमा के क्लाईमैक्स के अलावा कमल हसन पूरी फिल्म में बेहद संयमित है और क्लाईमैक्स में अपने पूरे हूनर के साथ उफान पर है।
प्रेम मे सबसे बुरे हो जाने के बीच सबसे अच्छी बात ये होती है कि हम अपने प्रिय की स्मृतियों में याद के रूप में दर्ज रहते हैं। उसकी स्मृतियों का एक जरूरी हिस्सा होते है। उसकी स्मतियों से खुद का खत्म हो जाना सबसे ज्यादा पीडा देने वाले पल है। कभी अपनी और देखे जाने वाली आंखे शुष्क और ठंडी ना हो। प्रेम नही तो कम से कम बीते प्रेम की एक आत्मीयता हो, एक गरमाहट हो। और आत्मीयता और गरमाहट नही भी हो तो क्रोध हो, जलन हो, घृणा हो, कुछ भी हो बस अपने लिये स्मृति लोप न हो। प्रेम के लंबे और पथरीले निबन्ध का उपसंहार यही पल है। आप घृणा के रूप में ही सही, पर अपने प्रियतम की स्मृतियों का हिस्सा रहें। स्मृतियों और साथ बितायें पलो का लोप कभी लोप नही हो।
हर देवदास को अपनी पारो के सिर पर हाथ रखकर ये कहने का मौका मिलना ही चाहिए कि अगर मेरी सेवा से तुम्हारे दिल को खुषी मिलती है तो ठीक है, मरने से पहले तुम्हारी चैखट पर जरूर आउंगा और हर पारो की चैखट अपने प्रेमी देवदास के अंतिम मिलन के आगमन की प्रतीक्षा मे आबाद रहनी चाहिए।

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फिल्म सिमरन से ज्यादा किरदार सिमरन की जीत है ये

कंगना रानावत इन दिनों फेमिनिस्ट का नया और मजबूत प्रतीक हैं। वो कंगना जिसने अपनी बेबाकी से सभी को नचा रखा है। जिन हरकतों को फिल्म उधोग में अक्सर बचकाना कहा जाता है, उसी हरकतों से उसने कइयों की ढकी परते उघाड़ दी है। इंग्लिश नही आती तो इसका शोक न मनाकर शुद्ध हिंदी में बोल बोल कर उसका जश्न मना रही है। बड़े बैनर फिल्म नही देते, तो उसका जवाब भी बाकी सभी जवाबो की तरह उसके पास है। क्वीन के क्लाइमैक्स में जिस तरह वो थेँक्यू बोल कर आगे बढ़ी थी, वैसे जीवन में बढ़ नही पा रही। अटक गई है। जिन-जिन से उसके बुरे अनुभव है, उन सब को उसने कटघरे में खड़ा किया है। हालांकि ये सब एक पक्षीय बयानबाजी है, पर इसके लिए भी जो जरूरी साहस चाहिए था, वो कंगना ने दिखाया है। उसी क्वीन कंगना की फिल्म को देखने के लिए उस दिन के शो में मेरे अलावा कोई नही था। पूरा का पूरा हॉल खाली था। समझ में आया कि सोशल मीडिया और चैनल पर बना माहौल बहुत बार उससे बाहर नही आता। फिल्म रिलीज से ठीक पहले कंगना का सनसनी वाला इंटरव्यू फिल्म को चर्चा में न ला सका। वैसे ही जैसे दंगल को लेकर राष्ट्रवादियों के फतवे और बहिष्कार का फिल्म पर कोई फर्क नही दिखा। दंगल हिन्दी सिनेमा की सबसे सफल फिल्म बनकर सामने आई। इस देश के जनतंत्र का लोकतंत्र उतना सरल दिखता नही, जितना लोगो ने समझ लिया है। 
 
बहरहाल, फिल्म सिमरन अपनी शर्तों पर जीने वाली एक तलाकशुदा गुजराती लड़की प्रफुल्ल पटेल की कहानी है जो होटल में सफाई का काम करती है पर सबको बताती ये है कि वह ‘हाउसकीपिंग’ के जॉब में है। घर खरीदना है पर पैसे कम है। लोन नही मिलता और एक दिन जुए में अपने सारे पैसे भी हार जाती है। गलत आदमी से कर्जा लेती है और उसे फिर उसे चुकाने के लिए बैंक लूटने लग जाती है। कहानी संदीप कौर नामक एक एनआरआई महिला की कहानी पर आधारित है जो बैंल लूट के मामले में अमेरिका में जेल की सजा काट रही हैं उन्हें वहां बॉम्बशैल बेंडिट के नाम से भी जाना जाता था। इस स्टोरीलाइन से ही फिल्म कमजोर लग रही है पर एक बात साफ है कि इसकी मेकिंग आम फिल्मों जैसी नही है। कथ्य से ज्यादा ये अनुभवों की कहानी है। इस वजह से ही ये एक प्रॉपर शेप में नही है। बिखरी हुई है। इसलिए ही इसे ज्यादा पसंद नही किया जा रहा। दरअसल प्रॉपर शेप किसी कहानी का होता है, अनुभवों का नही। ये अनुभवों और ऑब्जर्वेशन की फिल्म है। ये हम सब से होने वाली गलतियों की फिल्म हैं। फिल्म ये नही बताती कि आप अच्छे बनो। फिल्म ये बताती है कि जमकर गलतियां करो। गलतियों से सीखो और अगर न भी सीख पाओ तो भी क्या बड़ी बात। फिर से गलती कर दो। जीवन स्वेत मारडेन या शिव खेड़ा की प्रेरणादायक किताब नही होती। जीवन हमारे छोटे छोटे खट्टे-मीठे अनुभवों की दैनिक डायरी होती है जिसमे हमारी कमजोरियों को जगह मिलती है। इसमें हमारी बुराइयां, हमारी असफलताएं, हताशाएँ दर्ज होती है। हम ताउम्र ग्रे शेड में ही जीवन निकालते है। सिनेमा और किताबो ने हमारे जीवन के ग्रे शेड को खा लिया है। फिल्में और किताबे हमें महामानव बनने की दौड़ में खड़ा करती है जबकि धरातल पर हम सब ऐसे नही है। हम थोड़े अच्छे, थोड़े बुरे लोग है। गलतियां करने वाले लोग है। ठोकरे खा खा कर संभलने वाले लोग है। प्रफुल्ल पटेल उर्फ सिमरन भी जीवन में बार बार गलतियां करती है। लगातार गलती करती है। मुसीबतों में पड़ती है पर अकेले ही इस जद्दोजहद में जूझती रहती है। ये कहानी यूएस की जमीन पर उगी है पर उसकी मुसीबतों में पड़ना और उससे बाहर आने की जद्दोजहद हमें कामकाजी भारतीय महिलाओं और लड़कियों की याद भी दिलाती है। फिल्म में सिमरन को अंत तक महान या आदर्श की तरह नही दिखाया गया है जैसा कि आम तौर पर दिखाया जाता है। वो अंत तक गलतियां करने वाली लड़की ही बनी रहती है। ये विचार और ये अंत फिल्म की जान है। सिमरन फिल्म से ज्यादा सिमरन किरदार की जीत है। निर्देशक हंसल मेहता और कँगना से भी ज्यादा की ये प्रफुल्ल पटेल नाम के किरदार की जीत है। निर्देशक हंसल मेहता का थोड़ा साथ और इसे मिलता तो ये और ज्यादा समय तक याद रखे जाने वाली फिल्म होती। फिल्म के बहुत से दृश्य सहेजने वाले है। पुलिस को चकमा देकर भागना और फिर आगे जाकर एक सूनसान सड़क पर खुद ही पुलिस को फोन करके बुलाना और इसका कारण पूछने पर बताना कि जहा से भागी, वहां मा-बाप का घर था। वहां पकड़ी जाती तो माँ-बाप की इज्जत खराब होती। फिल्म के क्लाइमैक्स में जब नाराज बाप आम फिल्मों की तरह अब अच्छा बाप बनकर बेटी से ये कह रहा होता है कि अब तुम मेरा बिजनेस संभालो और अब वही होगा जो तुम चाहती हो। ये आदर्श भारतीय क्लाइमेक्स की आदर्श टोन और शेड है। अब कंगना अपने स्वभाव वाला जवाब देती है कि वो ये बिजनेस बेच कर शेयर मार्केट में पैसा लगाएगी और बाप अच्छी टोन से वापिस बाहर आकर फिर से लड़ाई शुरू कर देता है। ये ही असली जीवन के किरदार है। हमारे अपने आस पास के किरदार। घूम-फिर कर अपने मूल स्वभाव की और लौटते किरदार। अच्छाई-बुराई के व्याकरण से दूर ग्रे शेड के किरदार। अच्छे होते होते बुरे बन जाते किरदार और बुराई से बहुत बार रोशनी की टार्च फेंक चौंकाने वाले किरदार। कंगना के अलावा फिल्म में कोई बड़ा नाम नही था और फिल्म थी भी कंगना के ऊपर ही। कंगना इस तरह की फिल्मो की खिलाड़ी हो गई है। फेमिनिस्ट सब्जेक्ट उसके पाले में आई हुई बॉल है जिसपर वो हमेशा आगे बढ़ कर छक्का लगाती है। कंगना ने फिल्म में खूबसूरत काम किया है। वो इन दिनों फेमिनिस्ट का नया और मजबूत प्रतीक हैं और इसका लाभ भी इस तरह की फिल्म को मिल जाता है।
कंगना को ध्यान में रख कर अब फेमिनिस्ट सब्जेक्ट की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। थोड़े समय बाद फेमिनिस्ट की सबसे बड़े प्रतीक लक्ष्मी बाई के रूप में भी वो पर्दे पर आ ही रही है। कंगना के साथ सबसे गलत यही हो रहा है कि वो क्वीन के अपने किरदार रानी पर ठहर गई है। उससे बाहर नही आ पा रही। उसे क्वीन को अपना जरूरी पड़ाव मानना था पर वो उसके मोह में पड़ गई है। उसे इस फेमिनिस्ट के तमगे को थेँक्यू बोल कर आगे बढ़ने की जरूरत है।
 
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हसीना पारकर- आखिर इस बॉयोपिक को बनाने की जरूरत ही क्या थी?

अपूर्व लखिया की दाऊद इब्राहिम की बहिन के जीवन पर बनी फिल्म हसीना पारकर को सिनेमा के विधार्थियो को इस रूप में दिखाना जाना चाहिए कि फिल्म या कला के किसी भी माध्यम से विषय या कहानी को पोएट्रेट और एज्यूक्यूट करते समय किन-किन गलतियों से बचना ही चाहिए। ये फिल्म सिनेमाई गलतियों से सजा-धजा एक बहुत बुरा हादसा है जिसे खुद अपूर्व लखिया जितनी जल्दी भूल जाये, बेहतर होगा। फिल्म बनाना एक बेहद जटिल, कलात्मक और बौद्धिक विचार प्रक्रिया है जिसमे कई सारे अलग अलग कला पक्ष मिलकर एक प्रोजेक्ट पर काम करते है। इसे इतना हल्के में नही लिया जाना चाहिए जितना शायद इस फिल्म के जरिये इसके निर्माता-निर्देशको ने ले लिया है। इस फिल्म में सारे तकनीकी पक्ष कमजोर है। स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले, डायलॉग्स, फिल्म के चरित्र, घटनाये, घटनाओं की ग्रेवेटी, कथ्य, ड्रामा, अभिनय, बैकग्राउंड स्कोर,पृष्ठभूमि और स्थानीयता सभी पर ठोस काम किये जाने की जरूरत थी, जिसको हर स्तर पर नजरअंदाज किया गया जिससे फिल्म और किरदार असरदार न होकर कॉस्टमेटिक और कैरीकेचर बन गए। फिल्म तो खराब कास्टिंग के उदाहरण के तौर पर भी याद रखी जाएगी। हसीना के रोल में श्रद्धा कपूर, दाऊद के रोल में उसके भाई सिद्धांत कपूर, वकील केशवानी के रोल में राजेश तैलंग, एब्राहिम पारकर के रोल मे अखिल भाटिया के साथ-साथ बहुत से छोटे किरदार तक मिसफिट थे। श्रद्धा कपूर ने बहुत सी जगह ठीक बेस और स्पीच से डायलॉग बोले पर लगातार उसी एक नोट पर ही बोलने रहने से मामला मोनोटोनस हो गया। वॉइस मोडूलेशन की कमी साफ तौर पर दिखी। दाऊद के रोल में सिद्धान्त कपूर बहुत खराब चयन था। फिल्म में उसकी आवाज तक नही है। वो भी किसी और से डब कराई गई है। उसने अपनी खराब बॉडी लैंग्वेज से दाऊद के किरदार को उतना ही हल्का बना दिया जितना कि फिल्म थी। दाऊद पर बनी फिल्मों में ये अब तक का सबसे कमजोर दाऊद था। जॉनी एलएलबी, शाहिद और अलीगढ़ के उम्दा कोर्ट रूम के बाद इस कोर्ट रूम को झेलना मुश्किल था। हसीना के पुलिस की पूछताछ से बाहर आने पर लोगो का उसकी और उंगली उठाकर ताने मारने का सीन बेहद बचकाना था और फिल्म ऐसे बचकाने दृश्यों से भरी पड़ी है।
 
दाऊद की बहिन हसीना पारकर पर फिल्म क्यों बनाई गई है, इस पर भी बात होनी चाहिए। हसीना पारकर कोई ऐसा किरदार नही है जिसको लेकर आम लोगो में कोई उत्सुकता थी और न उसके जीवन या उसके चरित्र का कोई ऐसा खास मजबूत सबल पक्ष है जिसको लेकर बात होनी चाहिए। मुम्बई अंडरवर्ल्ड पर काफी किताबे लिख चुके पत्रकार हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई' में हसीना पारकर को लेकर कुछ खुलासे किए थे जिसमे कहा गया कि दाऊद की बहन का दक्षिण मुंबई के कुछ इलाकों में दबदबा था और इस वजह से उसे नागपाड़ा की 'गॉडमदर' के नाम से भी बुलाया जाता था। हसीना का जुर्म से सीधे तौर पर कोई नाता नहीं था और उस पर पूरे जीवन मे केवल एक केस चला जिसमें भी वो बरी हो गई। फिल्म में उसी एक केस का जिक्र है। उसे केवल लोगो में दाऊद के आतंक का फायदा मिला। कहा जाता है कि हसीना को नागपाड़ा में एक घर इतना पसंद आया था कि उसने सीधे घर का ताला तोड़कर उसमें रहना शुरू कर दिया था। दाऊद के डर से किसी ने किसी ने कोई भी शिकायत नहीं की उनके खिलाफ। इन सब के अलावा कोई विशेष घटनाएं या ड्रामा था ही नही उसके जीवन में और जब ड्रामा था नही तो फिर फिर स्क्रिप्ट को रबर की तरह बेवजह खींचा जाना ही था।  
 
एक तथ्य ये भी है कि फिल्म खराब होने के साथ साथ गैर जिम्मेदार भी है। बहुत सी जगह फिल्म दाऊद और हसीना के चरित्र का महिमामंडन करने लग जाती है। उनके हिंसक अपराधो को उनके हालात का हवाला देकर बचाव करती दिखती है। अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता पर जरूर बहस होनी चाहिए। इतने गंभीर अपराधो और देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त देश के सबसे बडे मुजरिमो को कैसे आप उठकर अचानक से हीरो बनाने की कोशिश में लग जाएंगे। सिनेमा केवल सपने दिखाने और मनोरंजन करने का ही माध्यम नही है। विषयो और चरित्रों को गलत तथ्यो के साथ परोसना भी घोर लापरवाही है जो कि इस फिल्म में हुई है। कम से कम इसकी कड़ी निंदा तो की ही जा सकती है। जब देश के जरूरी मसले और गंभीर चूक केवल कड़ी निन्दा से निकल जाते है तो ये तो एक फिल्म ही है। अच्छी बात ये है कि इस माध्यम को पहले से ही कड़ी निन्दा की आदत है। ये ज्यादा बुरा नही मानेगा।
 
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