Menu

गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (104)

'रिस्क लेना सीखें'

एक गांव की गुफा को लोग मौत की गुफा कहते थे क्योंकि आज तक जो भी उस गुफा में दाखिल हुआ, वह कई दिनों बाद भी वापिस नहीं लौटा था. जब एक माह बीतने पर भी कोई नहीं लौटा तब गाँव के एक वीर नौजवान ने गुफा में जाने की सोची. सभी ने उसे समझाया कि वह ऐसा जोखिम न लेवे लेकिन वो अडिग रहा. जैसे ही वह नौजवान गुफा में घुसा तो उसे किसी ने धक्का दिया. युवक एक बगीचे में गिरा. तभी उसने देखा कि वह स्थान तो स्वर्ग से भी सुन्दर लग रहा था और जो ग्रामीण व्यक्ति अब तक गुफा में गए थे, वे सभी वहां बड़े ही आनंदित थे. युवक के पूछने पर उन सभी ने एक स्वर में कहा कि उन्होंने गुफा में जाने का जोखिम जरूर उठाया लेकिन गुफा में इतनी सुखद जिन्दगी थी कि उनका वापिस आने का मन ही नहीं किया. युवक के आग्रह पर वे सभी वापिस गाँव गए और लोगों को समझाया कि औसत जोखिम लेने से ही सुख और आनंद की प्राप्ति संभव है. 

समस्या यही है कि हम किसी भी तरह का जोखिम या रिस्क तो लेना ही नहीं चाहते. सच तो यह है कि हमने अपने उपजाऊ मस्तिष्क पर एक बड़ा सा ताला जड़ रखा है. जैसे ही हमारे मस्तिष्क में कोई नया विचार या नया कार्य करने की योजना तैयार होती है, वो योजना क्रियान्वित होने के लिये बाहर आ ही नहीं पाती क्योंकि मस्तिष्क पर तो ताला लगा हुआ है. यदि अपना व्यवसाय या कार्य प्रारम्भ करना हो तो रिस्क तो लेना ही पड़ेगा. यदि आप रिस्क नहीं ले सकते हैं तो आप कुछ भी नया, अधुनातन और समाजोपयोगी कार्य कर ही नहीं पायेंगे.
समस्त महान बिजनेस लीडर्स ने रिस्क लेकर ही अपने उद्यम और संस्थान का विकास किया है. स्टीव जॉब्स जैसे व्यक्ति को जब स्वयं द्वारा स्थापित कम्पनी से ही निकलना पड़ा तो भी उन्होंने रिस्क लेकर पिक्चर इंक की स्थापना कर सफलता अर्जित की. सोनी समूह के प्रमुख एकियो मोरिटा ने वॉकमेन बनाया तो उन्होंने भी बहुत जोखिम उठाया लेकिन अन्ततोगत्वा उत्पाद सफल रहा. यहाँ मन्त्र यही है कि भले ही उद्यम हो या निजी जीवन; जो जोखिम लेने का दम रखता है, वो ही सफलता के शिखर पर पहुंच पाता है. यही उद्यमिता का शाश्वत सत्य है.

Read more...

'बुराई ढूंढना ही पतन'

एक चिडिय़ा थी. वो दिन भर मेहनत करती और अपना पेट भरती थी. उसकी एक आदत थी. उसके साथ पूरे दिन में जो भी बुरा हुआ होता, वो उतने ही कंकड़ अपनी पोटली में डालती जाती थी. शाम को उन कंकड़ों को देखकर दुखी होती रहती और सभी को कोसती. यह उसका नित नियम था. थोड़े दिनों में वो पोटली बहुत भारी हो गई. कुछ दिन बाद उसे भरी पोटली के साथ उडऩे में दिक्कत होने लगी. अब पोटली इतनी ज्यादा भारी हो गई कि उसे लेकर चलना भी दुश्वार था. एक दिन ऐसा आया कि उस पोटली को ढ़ोने की कोशिश में वो पोटली फट गई. सारे कंकड़ चिडिय़ा पर गिरे और उसकी मृत्यु हो गई. 

यह सांकेतिक कथा आज के संस्थानों का स्याह और भयावह सत्य है. नौकरी कर रहे लोगों के बीच की छोटी - बड़ी राजनीति - कब निजी शत्रुता में बदल जाती है; इसका पता ही नहीं चलता है. इस चिडिय़ा की भांति प्रत्येक कर्मचारी दूसरे के गुण - दोषों का लेखा - जोखा लेकर बैठा है. दूसरों के दोषों और कमियों को निकालते - निकालते कर्मचारी इतने ज्यादा नकारात्मक और निकृष्ट बन जाते हैं कि उन्हें निजी और पारिवारिक संबंधों का भी भान नहीं रहता.
जरा सोचिये-
* जो बुरा हुआ उसी को याद रखना और कोसते रहने की प्रवृत्ति कष्टों को जन्म देती है.
* यहीं से मन में कुंठा उपजती है.
* यह कुंठा युद्ध को जन्म देती है जहाँ व्यक्ति किसी भी प्रकार से जीतना चाहता है.
* येन केन प्रकारेण जीत की इच्छा अधर्म और अनैतिक आचरण को भी जाय? मानती है. और यहीं से शुरू होता है पतन.
दूसरों के दोषों को गिनना प्रारम्भ करने का अर्थ है पतन. किसी को इसलिये गिराना क्योंकि आप चढ़ नहीं सकते - इसे ही कहते हैं पतन. बदला लेने का भाव, दोषों को स्मरण करने की प्रवृत्ति और प्रति पल स्वयं को कोसना है पतन. यहां मन्त्र यही है कि स्वयं को श्रेष्ठ बनाने में इतना ज्यादा समय खर्च करें कि दूसरे क्या कर रहे हैं; यह जानने में आपकी दिलचस्पी ही न रहे. यही उन्नति का मार्ग है -चाहे निजी जीवन हो या नौकरी. शाश्वत सत्य यही है.

Read more...

'जीवन, मृत्यु और योगदान'

प्राचीन कथा के अनुसार भगवान विष्णु शिवजी से मिलने गये। विष्णु के वाहन गरुड़ बाहर उनका इंतजार कर रहे थे। तभी गरुडज़ी की नजर द्वार के ऊपर बैठे कबूतर पर पड़ी। कबूतर भय से कांप रहा था। गरुडज़ी के पूछने पर कबूतर ने कहा कि कुछ देर पूर्व यमराज भी भगवान शिव से मिलने गये थे। उस समय उन्होंने कबूतर को देखकर अपने यमपाश को झटकाया और मुस्कुराकर कबूतर को देखा। इसका अर्थ है कबूतर की मृत्यु सुनिश्चित है। यह सुनकर गरुडज़ी ने कहा कि कबूतर को घबराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गरुडज़ी उसे ऐसे पर्वत पर ले कर जायेंगे जहाँ कोई जीव रहता ही नहीं है। अत: वहां मृत्यु का भय ही नहीं रहेगा। यह कहकर गरुडज़ी कबूतर को बिठाकर उस पर्वत पर ले गये और उसे वहां छोड़ दिया। थोड़ी देर बाद जब यमराज आये तो उन्होंने गरुडज़ी से कबूतर के बारे में पूछा। गरुडज़ी ने बताया कि वो कबूतर अभी दिव्य पर्वत पर है। यमराज ने प्रसन्न होकर कहा कि उनकी चिंता यही थी कि वो कबूतर उस पर्वत पर कैसे पहुँच पायेगा क्योंकि उसी पर्वत से गिरकर उसकी मृत्यु होनी है। यमराज ने गरुडज़ी का धन्यवाद दिया। 

मृत्यु सुनिश्चित है और यही शाश्वत सत्य भी है। जीवन के प्रारम्भ होने का दूसरा अर्थ है मृत्यु का तय होना। जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है अत: मृत्यु को स्वीकारने में कैसा भय या संशय? यह तो अवश्यम्भावी है। मूल प्रश्न यह नहीं है कि जीवन की सीमा कितनी लम्बी है या आप कितने वर्षों तक जीवित रहे? प्रश्न यह है कि इस जन्म और मृत्यु होने के अंतराल में आपने ऐसे क्या कार्य किये जिससे परिवार, समाज और राष्ट्र को कुछ प्राप्त हुआ? पूर्वजों पर गौरव करने की बात कहने वाले यह कब समझेंगे कि हमने ऐसा क्या किया है कि हमारी संतान हम पर गर्व कर सके।
जरा सोचिये कि-
* आज दिन तक आपने समाज को क्या दिया?
* आपका ऐसा कौनसा कृत्य है जो मृत्यु के उपरान्त लोगों को याद रहेगा?
* यदि इसी पल आपकी मृत्यु हो जाये तो आपको किस रूप में जाना जायेगा?
* क्या परिवार के अलावा ऐसा एक भी व्यक्ति है जिसके जीवन के निर्माता आप हैं?
* आपकी मृत्यु होने पर परिवार, मित्र और रिश्तेदारों के अलावा कितने लोगों की आँखों में आंसू होंगे?
* मृत्यु होने से पूर्व क्या आपने अपने महान राष्ट्र हेतु कुछ किया है?
इन प्रश्नों का उत्तर यह तय करता है कि आपका योगदान क्या है? यहां मन्त्र यही है कि जीवन - जन्म से मृत्यु तक की एक यात्रा है जिसका समय निश्चित है। इस यात्रा के दौरान समाज और राष्ट्र को इतना ज्यादा दीजिये ताकि आप युगों - युगों तक लोगों के हृदयों में बसे रह सकें। यही जीवन का सार है।

Read more...

'विजेता कौन?'

एक विश्वविजेता सम्राट ने एक तपस्वी को तपस्या करते देखा. सेनानायक ने बताया कि तपस्वी बहुत बड़ा संत है. सम्राट ने तुरंत ही तपस्वी को प्रस्थान हेतु तैयार होने को कहा. सम्राट ने तपस्वी से कहा कि उसके चमत्कारों के कारण वो उसे अपने साथ लेकर जाना चाहता है. तपस्वी ने मुस्कुराते हुए ना कह दिया. सम्राट क्रोधित हो गया और उसने अपनी तलवार तपस्वी की गर्दन पर रख दी और गुस्से में पूछने लगा कि तपस्वी चलेगा या नहीं? तपस्वी ने कहा कि वो गुलामों के साथ नहीं जा सकता. आश्चर्यचकित सम्राट ने पूछा कि यहाँ गुलाम कौन है? तपस्वी ने कहा कि सम्राट अपने क्रोध और अपनी इन्द्रियों का गुलाम है. जो सम्राट अपनी इन्द्रियों पर और अपने क्रोध पर ही विजय प्राप्त न कर सका वो विश्वविजेता कैसे हुआ? वह तो पराजित गुलाम ही हुआ. सम्राट शांत हो गया और चला गया. वह समझ गया कि विजेता वही है जिसने अपनी इन्द्रियों और क्रोध को वश में रखना सीखा हो. 

कथा से स्पष्ट है कि विजेता वह नहीं है जिसने अन्यों को जीत लिया हो. विजेता वह है जिसने अपनी इन्द्रियों को, मन को और अपने क्रोध को जीत लिया हो. इन्द्रिय निग्रह आसान नहीं है. मन को वश में करना या क्रोध प्रकट नहीं करना; बहुत मुश्किल है लेकिन हम यह कर सकते हैं. यदि हमें अपने क्रोध पर नियंत्रण करना हो या अपनी इन्द्रियों पर विजय पानी हो तो उसके निम्नलिखित उपाय हैं-
* उत्तम स्वाध्याय करना, अच्छी पुस्तकें पडऩा. श्रेष्ठ साहित्य जीता जागता देवता होता है. इनके अध्ययन से परिपक्वता और चरित्र का निर्माण होता है.
ड़ कुंठित होने से बचना अत्यावश्यक है. कुंठा क्रोध को जन्म देती है. कुंठा का प्रमुख कारण है ईर्ष्या, तुलना, और नकारात्मक नजरिया. इससे बचने के लिए योग, प्राणायाम किया जा सकता है. मैदान में जाकर खेलना भी तनाव और क्रोध को कम कर सकता है.
* स्वयं अपने कार्य में इतनी उत्कृष्टता लाने का प्रयत्न करना कि दूसरों के कृत्यों का ख्याल ही न रहे अर्थात तुलना, ईष्र्या, अन्य जनों के कृत्य आदि के लिए कोई समय शेष नहीं रहना चाहिये.
* सामाजिक कार्यों में दिलचस्पी से भाग लेना. समाज से जुड़कर समाजोत्थान का कार्य करने से मन में लगता है कि हम समाज को कुछ दे रहे हैं. यह भाव आनंद का संचार करता है.
यहां मन्त्र यही है कि कोध पर नियंत्रण और इन्द्रियों पर जीत ही व्यक्ति को स्थिरचित्त और परिपक्व बनाती है. बिना वजह छोटी - छोटी बातों पर क्रोध करने से बचें. ईष्र्या न रखें. विजेता वही होगा जो क्रोध को जीतेगा. यही सत्य है.

Read more...

'बुरी आदतें'

एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा कि वो दिन - रात मेहनत से पढाई करता है लेकिन फिर भे उसका मन भटका हुआ रहता है। उसे पढाई के दौरान सिनेमा, वीडियो गेम, सोशल मीडिया आदि नजर आते रहते हैं। गुरु ने समस्या सुनी और बड़े ही प्रेम से कहा कि 'जम कर पिटाई करोÓ। शिष्य समझ न सका तो गुरूजी ने बताया एक आदमी ने एक कुत्ता पाला और रात - दिन उसी के साथ रहता। उसके इस मूर्खतापूर्ण आचरण को देख एक दिन किसी जानकार व्यक्ति ने कहा कि कुत्ते से इतना प्यार न रखे क्योंकि आखिर यह जानवर ही है और कभी भी काट सकता है। आदमी इस बात को समझ गया और उसने प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी कुत्ते को गोद में नहीं लेगा। कुत्ता यह समझ न सका और मालिक को देखते ही दौड़कर उसकी गोद पर चढऩे लग जाता। आखिर मालिक को कुछ दिनों तक कुत्ते को पीट - पीट कर भगाना पड़ा तब कहीं उसकी यह आदत छूटी। 

इस कथा का तात्पर्य है कि कुछ बुरी आदतें सोचने से नहीं अपितु छड़ी से छूट पाती हैं। हम लोग भी बुरी आदतों, बुरी बातों को लम्बे समय तक छाती से लगाये रखते हैं। अब अगर उस बुरी बात से छुटकारा पाना भी चाहें, तो वे हमें इतनी आसानी से नहीं छोड़ती हैं।
अत: बुरी मूर्खतापूर्ण आदतों को छोड़ो और यदि फिर भी वे आदतें आप पर चढ़ाई करना चाहें तो उन आदतों की भली भांति पिटाई करो अर्थात दृढ निश्चयी हो जाओ। ऐसा करने से कुछ ही दिनों के अन्दर आप बुरी आदतों से पूरी तरह छुटकारा पा जायेंगे।
जरा सोचिये कि-
* क्या आप नहीं जानते कि तम्बाकू सेवन या धूम्रपान या शराब सेवन जानलेवा है?
* क्या आप ऐसे किसी भी शख्स को नहीं जानते जिसकी मृत्यु तम्बाकू, गुटखे, शराब या धूम्रपान के कारण हुई है?
* क्या आप नहीं जानते कि हेलमेट लगाना या सीट बेल्ट पहनना आपकी सुरक्षा है?
* क्या आप नहीं जानते कि गाली-गलौच करना और 'हेल्पिंग वर्बÓ की तरह गालियां निकालना गलत है?
आप सब जानते हैं। आप जानते समझते हुए भी गलती कर रहे हैं? यह तो आश्चर्य ही है? इसे क्या कहा जा सकता है? जरा विचार कीजिये।
यहां मन्त्र यही है कि बुरी आदतों को 'डिफेंड करनाÓ और इन्हें शान समझना मूर्खता ही है। बुरी आदतें सिर्फ और सिर्फ छड़ी से अर्थात भय से या दृढ निश्चय से ही छोडी जा सकती हैं। यही शाश्वत सत्य है।

Read more...

'शिक्षक सर्वोपरि'

एक शिक्षक ने कठिन विषयों को समझाने हेतु निशुल्क कक्षाएं लगाईं। कई विद्यार्थी आये। कक्षाओं के दौरान ही एक दिन किसी छात्र को चोरी करते हुए पकड़ लिया गया। शिक्षक से बाकी छात्रों ने निवेदन किया कि चोरी की सजा के रूप में उस छात्र को कक्षाओं से निकाल दिया जाये। शिक्षक ने इस पर ध्यान नहीं दिया और उस बच्चे को पढने दिया। कुछ दिनों बाद फिर वही छात्र चोरी करते हुए पकड़ा गया । इस बार भी शिक्षक ने छात्र को कोई सजा नहीं दी। इस वजह से अन्य बच्चे क्रोधित हो उठे और सभी ने मिलकर शिक्षक को पत्र लिखा कि यदि उस छात्र को नहीं निकाला गया तो वे सब कक्षाएं छोड़ कर चले जायेंगे। शिक्षक ने सभी विद्यार्थियों को बुलाकर कहा कि-'आप सभी ज्ञानी हैं। आप सही और गलत में भेद करना जानते हैं। यदि आप कहीं और पडऩे जाना चाहते हैं तो जा सकते हैं, पर ये बेचारा तो यह भी नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत? यदि इसे मैं नहीं पढ़ाऊंगा तो और कौन पढ़ायेगा? आप सभी चले भी जाएं तो भी मैं इसे यहाँ पढ़ाऊंगाÓ। यह सुनकर चोरी करने वाले छात्र ने अपने कृत्यों पर प्रायश्चित किया और श्रेष्ठ अध्ययन करने लगा। 

यह होता है शिक्षक। शिक्षक सिर्फ सूचनाओं को देने वाला या उनका विश्लेषण कर देने वाला नहीं होता। वह समाज को पूर्ण रूप से सुधार देने का संकल्प लेकर अपने जीवन की यात्रा प्रारम्भ करता है। वह चाहता है कि राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक - सत्य, धर्म, प्रेम, ईमानदारी और देशभक्ति के जज्बे के साथ आगे बड़े। समूचे समाज में सम्मान सिर्फ उपाधि धारकों या पदों का होता है। शिक्षक ही वह एक मात्र व्यक्ति होता है जिसका मनुष्य के रूप में सम्मान होता है क्योंकि वो समाज का डॉक्टर है। वो शारीरिक समस्याओं को नहीं अपितु सामाजिक समस्याओं को उत्तम शिक्षा के द्वारा दूर करता है।
इस जेन कथा के अनुसार जब तक सबसे निचले पायदान पर बैठे विद्यार्थी के जीवन स्तर को सुधार न दिया जाये, तब तक शिक्षक चैन से बैठ ही नहीं सकता। यही तो शिक्षक के पेशे की गरिमा है। क्षमा करना, किसी को सुधरने का मौका देना, असीम धैर्य रखना और बुरे से बुरे समझे जाने वाले को भी मुख्यधारा में शामिल हो जाने का मौका देना ही तो उसे शिक्षक होने की गौरव अनुभूति देता है।
यहां मन्त्र यही है कि बुरा कोई नहीं होता। उत्तम शिक्षण, बेहतरीन प्रशिक्षण और शिक्षक का 'पर्सनल टचÓ - बुरे से बुरे विद्यार्थी का भी हृदय परिवर्तन कर सकता है। यही शिक्षक होने का गौरव माना जा सकता है।

Read more...

'लोभ और छोटी खुशी'

लीओ टॉलस्टॉय की एक प्रसिद्ध कथा है जिसमे एक व्यक्ति से कहा जाता है कि वो पूरे दिन में जितनी भूमि दौड़कर नापेगा वो उसी की हो जायेगी. कथा के अनुसार, वो व्यक्ति लालच के चलते शाम तक दौड़ता ही रहता है और लौटकर आता ही नहीं है. दौड़ते - दौड़ते ही उस व्यक्ति का देहांत हो जाता है. उस व्यक्ति को अंत में दो गज जमीन मिलती है जिसमे उसे दफना दिया जाता है. संसाधनों का भण्डार भरने की प्रवृत्ति मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है. जितना मिला उससे ज्यादा चाहिये - यही तो लोभ है. क्या इसे ही जीवन कह सकते हैं? शायद नहीं. आखिर जीवन का उद्देश्य क्या है? 

जीवन क्या है? क्या धन कमाना, रोज दफ्तर आने जाने की कसरत करना, शारीरिक सुखों को भोगना और अंत में शरीर का अंत होना ही जीवन है? शायद नहीं. जीवन इससे बढ़कर है. उसका कुछ उद्देश्य है. छोटी खुशी को खुलकर जीना, इस पल को सर्वश्रेष्ठ पल बनाना और आज में जीते रहना ही शायद जीवन है. जीवन निर्माण और धन संग्रह की आपाधापी में हम जीवन को तो भूल ही गये हैं. अत्यंत छोटी खुशियां ही वास्तव में बड़ी खुशियां होती हैं.
हम संसाधनों के भंडारण में पागल से हो गये हैं. येन केन प्रकारेण संसाधनों को भर लेने हेतु अपने चरित्र को मलिन बनाने में भी गुरेज नहीं कर रहे हैं. जब उन संसाधनों का भण्डारण हो जाता है तो हमें जो प्रसन्नता प्राप्त होती है वो वास्तविक प्रसन्नता नहीं है. संसाधनों के भंडारण के चक्कर में कहीं छोटी खुशियां हाथ से न चली जायें. ऐसा होने पर व्यक्ति सिर्फ अफसोस करता है. समय चला जाता है और लौटकर नहीं आता. ऐसे में रह जाती है तो सिर्फ याद और व्यक्ति कहता है - काश मैं भी ऐसी खुशियों का आनंद ले पाता.
समस्या यही है कि हमने लोभ के चलते छोटी खुशियों को तिलांजलि देना प्रारम्भ कर दिया है. इसी कारण समाज विघटित हो रहा है. इसे रोकना अत्यावश्यक है. धनार्जन कीजिये लेकिन संबंधों और खुशियों की कीमत पर नहीं. यहां मन्त्र यही है कि बड़े कार्य अवश्य संपादित करें लेकिन छोटी खुशियों को हाथ से न जाने देवें. जीवन का प्रति पल जीयें. यही जीवन प्रबंध है.

Read more...

'सफलता निजी अनुभूति है'

सफलता का तात्पर्य है श्रेष्ठ लक्ष्यों को निरंतर, बिना रुके प्राप्त करते जाना. सफलता प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है - मेंटल केओस या मस्तिष्क में बिखराव. हमने कुछ धारणाएं बना राखी हैं और हम उन्हीं को सत्य मान बैठे हैं. एक बच्चे ने अपने पिता से कहा कि वो रोजाना अपनी टेबल को जमाता है लेकिन अगले दिन वो फिर से बिखर जाती है. ऐसा क्यों होता है? पिता ने समझाया कि यदि वो पुस्तक को उठाकर टेढा रख दे या पेन्सिल को उठाकर इधर से उधर कर दे तो क्या होगा? बच्चे ने कहा कि उसके दोस्तों और अध्यापकों ने उसे सिखाया है कि यह बिखराव है. पिता ने समझाया कि अन्यों द्वारा बनाये गये स्टैंडड्र्स की नकल करना मूर्खता है. वास्तविक बिखराव टेबल पर नहीं अपितु बच्चे के मस्तिष्क में है क्योंकि उस बच्चे ने यह धारणा बना रखी है कि जमी हुई टेबल ही श्रेष्ठ है. दूसरों के विचारों या मानदण्डों की नकल नहीं करें. 

उदाहरण से यह स्पष्ट है कि बिखराव हमारे मस्तिष्क में होता है. हमने किसी एक आकृति या व्यवस्था या क्रम को सही मान लिया है. वही क्रम या व्यवस्था सही हो, यह जरूरी नहीं है. वह निश्चित क्रम या व्यवस्था हमने स्वयं ने नहीं अपितु किसी अन्य ने बनाकर हमारे मस्तिष्क में डाली है. हमने कुछ मानदंड बना रखे हैं. ये मानदण्ड स्वयं के द्वारा या समाज के प्रेशर के कारण बना लिये जाते हैं और हम उन मानदण्डों को पूरा करने हेतु अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं. यही तो समस्या है कि सफलता के या प्रसन्नता के पैमाने हमने खुद ने नहीं बनाये हैं. उन्हें औरों ने बनाया है. और जब हम उस पैमाने तक नहीं पहुंच पाते तो निराश हो जाते हैं.
एक विद्यार्थी जिसकी दिलचस्पी विधिवेत्ता बनने में है, उसे हम जबरन विज्ञान पड़ा कर पशुओं का डॉक्टर बना देते हैं. फिर उससे पूछते हैं कि क्या वो सफल या प्रसन्न है? वो प्रसन्न नहीं होगा क्योंकि खुशी का जो मानदंड उस विद्यार्थी ने बनाया था वह तो पूरा हुआ ही नहीं. ऐसे पैमाने नहीं बनायें जो कष्टकारी हों.
जीवन बहुत छोटा है. सफलता एक निजी अनुभूति है. प्रत्येक व्यक्ति अलग - अलग लक्ष्य प्राप्त करके सफलता महसूस करता है. प्रत्येक व्यक्ति के सफलता के पैमाने अलग - अलग होते हैं. खुद पर अत्यधिक दबाव न डालें. लोगों के बनाये पैमानों की प्रवाह न करें. स्वयं का पैमाना बनायें. प्रसन्न रहना सीखें. ईश्वर ने जो दिया वही उचित है का भाव ही संतोष देता है. संतोष के आगे सब व्यर्थ है. यही जीवन प्रबंध है.

Read more...

'स्थित चित्त'

एक हाथी गन्ना खा रहा था। तभी एक मक्खी आई और उस हाथी के कान के पास भिनभिनाने लगी। हाथी ने एक दो बार अपने कान जोरों से हिलाए लेकिन अंत में वो परेशान हो गया। हाथी ने मक्खी से पूछा कि उसे भिनभिनाने से कुछ हासिल नहीं हो रहा है। ऐसी अवस्था में बिना वजह भिनभिनाने या शोर करने या बिना वजह उडऩे का क्या लाभ? मक्खी बोली कि वो जिसे भी देखती, सुनती या सूंघती है, वो उसके प्रति आकर्षित होकर उसके पास भिनभिनाने लगती है। सब समझते हुए भी वह ऐसा करती है क्योंकि उसका मस्तिष्क अस्थिर है। मक्खी ने हाथी से पूछा कि वो इतना स्थिरचित्त कैसे रहता है? हाथी बोला कि वो एक समय में एक कार्य करता है और वो भी पूर्ण निष्ठा के साथ। उस कार्य को करते समय वह किसी से भी विचलित नहीं होता। जैसे यदि वो गन्ना खा रहा है तो उस पल उसके मस्तिष्क में सिर्फ गन्ना, उसका रस और स्वाद ही होंग, और कुछ नहीं। यही तो स्थिरचित्त होना हैण् कथा से हमें स्थिरचित्त होने के निम्नलिखित सिद्धांत सीखने को मिलते हैं- 

* पांचों इन्द्रियां हमारे मस्तिष्क के अधीन हैं और जब मस्तिष्क ही अस्थिर हो जाता है तो इन्द्रियों को वश में रखना मुश्किल सा हो जाता है। मस्तिष्क नियंत्रित रहता है तो पांचों इन्द्रियां स्वत: हमारे वश में रहती हैं। अत: मस्तिष्क को स्थिर रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
* जब हम किसी एक कार्य को कर रहे हों तो उसे पूर्ण निष्ठा से, तल्लीनता के साथ और स्थिरचित्त होकर करना चाहिये। ऐसा करने से हमारा मन स्थिर रहता है कार्य श्रेष्ठता के साथ सम्पन्न होता है।
* वर्तमान कॉर्पोरेट जगत आजकल 'ब्रेन स्टिलिंगÓ को बहुत महत्त्व दे रहा है। 'ब्रेन स्टिलिंगÓ भारतीय शास्त्रों से उपजी तकनीक है जो निर्णय लेने में सहायता कर रही है। 'ब्रेन स्टिलिंगÓ से तात्पर्य है स्थिर चित्त होकर, अत्यंत ही शांत परिवेश में बैठकर, पूर्ण रूपेण निरपेक्ष भाव के साथ, जो विचार आयें उन्हें सत्य मानते हुए निर्णय लेना। माना जाता है कि जब व्यक्ति स्थिर चित्त से निर्णय लेता है तो अधिकांश केसेज में वह निर्णय सही ही होता है।
* श्रीमद भगवद गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि मस्तिष्क बड़ा ही चंचल, विचारवान, और अस्थिर सा होता है। इसे स्थिर करने हेतु श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को नियंत्रित रखो। आपका मस्तिष्क अपने आप ही नियंत्रित हो जायेगा।
यहां मन्त्र यही है कि स्थिर मस्तिष्क के साथ एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जुटे रहना और 'ब्रेन स्टिलिंगÓ सिद्धांत को अपनाकर अपने अंतर्मन की सुनना ही व्यक्ति को सफल बनाता है।

Read more...

जीवन और चुनौती

जापान के लोग ताज़ी मछली खाने के शौक़ीन हैं। जब मछुआरे कई किलोमीटर दूर से मछली पकड़कर लाते और उसके बाद उसे बेचते तो ग्राहकों को वे मछलियाँ ताज़ी नहीं लगती थीं। इस समस्या के समाधान हेतु मछुआरों ने नौकाओं में फ्रीज़ रखने शुरू किये। अब वे मछली पकड़कर उसे डीप फ्रीजऱ में रखते ताकि मछलियाँ ताज़ी रहें। ग्राहक अब भी संतुष्ट नहीं थे। उन्हें फ्रोजऩ मछली का स्वाद ताज़ी मछली जैसा नहीं लगा। अब इस समस्या से निराकरण हेतु मछुआरों ने पानी का बड़ा टैंक नौका में रखना शुरू किया ताकि मछलियां पानी में ही रहें। ऐसा करने के बाद भी मछलियां एक सीमित टैंक में होने के कारण ऊर्जाहीन और आलसी हो जाती थीं और उनका स्वाद भी ग्राहकों को जम नहीं रहा था। अब इस समस्या को सुलझाने के लिये जापानियों ने राउन हबर्ड के सिद्धांत का पालन किया। हबर्ड के सिद्धांत के अनुसार चुनौतीपूर्ण वातावरण में ही व्यक्ति श्रेष्ठ और ऊर्जावान बन सकता है। इस सिद्धांत को क्रियान्वित करते हुए अब मछुआरों ने नौका में रखें पानी के टैंक में एक छोटी शार्क भी डाल दी। वह शार्क कुछ मछलियों को तो खा जाती लेकिन मछलियाँ चुनौती के कारण अपने आप को सक्रिय रखती थी। अब ग्राहकों ने कहा कि मछलियाँ ताज़ा है। कथा का सन्देश जीवन निर्माण का सन्देश है।
चुनौतियों से बचने के बजाय उन्हें स्वीकारें और उनसे लड़ें। यह जीवन का खेल है। यहाँ संघर्ष का होना स्वाभाविक है। उससे डरने के बजाय उसका आनंद लीजिये। यदि चुनौतियां बहुत बड़ी हैं तो भी पराजय स्वीकार न करें। पराजय की स्वीकारोक्ति ही पराजय की जन्मदात्री है।
जब आप किसी कार्य को करने में फेल हो जाते हैं तो पराजय स्वीकार करने के बजाय स्वयं का पुनर्गठन करें। अच्छा प्लान बनायें। ज्ञान बढायें। क्रिएटिव समाधान की बात सोचें। यही प्रगति का मार्ग है।
शार्क के साथ किया गया संघर्ष ही मछलियों को चुस्त रखता है। यदि जीवन में ऊर्जा चाहिये तो चुनातियों और संघर्षों का होना आवश्यक है।
आप जितने ज़्यादा बुद्धिमान, कौशल संपन्न और कर्मठ होते हैं; आप समस्याओं का सामना करने में उतना ही ज़्यादा आनंद महसूस करते हैं। इन्हीं चुनौतियों का सामना कर आप एक श्रेष्ठ मानव बन सकते हैं।
यहाँ मन्त्र यही है कि संघर्ष है तो जीवन्तता है। संघर्ष स्वीकारें। एक लक्ष्य प्राप्त हो जाने के बाद उससे बड़े लक्ष्य की प्राप्ति में जुट जायें। नया सोचें। आउट ऑफ़ द बॉक्स सोचें। यही जीवन का शाश्वत सत्य है।

Read more...
Subscribe to this RSS feed

Bikaner Trusted News Portal

  • Bikaner Local News
  • National News
  • Sports News
  • Bikaner Events
  • Rajasthan News