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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (21)

'सबको खुश करना नामुमकिन'

एक व्यापारी के तीन पुत्रों ने अलग अलग व्यापार प्रारम्भ किये। एक ने खेती, दूसरे ने कुम्भकार और तीसरे ने हिल स्टेशन पर होटल चलाने का कार्य प्रारम्भ किया। व्यापारी ने एक दिन तीनों के हाल चाल जानने हेतु यात्रा की। जब वह पहले पुत्र के घर पहुंचा तो उसने पिता से वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। वह किसान था। उसका कार्य वर्षा पर आधारित था। दूसरे पुत्र के घर जाते ही पुत्र ने पिता को भीषण गर्मी पड़ते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। जब किसान को उसने वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते पाया तो वह आगबबूला हो गया और तुरंत ही प्रार्थना बंद करने को कहा। दुसरे पुत्र के कहने पर पिता ने गर्मी पडऩे की प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। अब व्यापारी तीसरे पुत्र के घर पहुंचा। व्यापारी पिता भीषण गर्मी पडऩे की प्रार्थना कर रहा था। यह देख तीसरा पुत्र क्रोधित हो गया और उसने अपने पिता को बसंत काल जैसे मौसम की प्रार्थना करते रहने को कहा। पिता को यह समझ नहीं आया कि आखिर वो ईश्वर से किस मौसम के लिये प्रार्थना करे?

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'क्या आप स्टार हैं?

मैनेजमेंट की रिसर्च के अनुसार प्रत्येक संगठन पांच से सात प्रतिशत कार्मिक स्टार परफोरमर्स होते हैं। इन्हीं कर्मचारियों के कार्य के प्रति समर्पण के दम पर संगठन को विशेष पहचान मिल पाती है। स्टार परफोरमर्स के पास सिर्फ स्वप्न ही नहीं अपितु क्रियान्वित करने की शक्ति भी होती है। उसमे आंतरिक विश्वास की शक्ति होती है जहाँ कुछ भी असंभव नहीं होता। उद्यमिता को अपने व्यवहार में उतारने वाला, मुश्किलें आने पर मैदान में डटे रहने वाला और नव सृजन व परिवर्तन को स्वीकारने वाला ही स्टार होता है। जरा सोचिये, क्या आप संगठन के स्टार हैं? यदि आप स्टार नहीं हैं तो आप एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अपनी कार्यक्षमता, अधुनातन सोच, प्रोएक्टिव एप्रोच द्वारा एक स्टार कर्मचारी संगठन को उच्च स्तर पर ले जाता है। उसकी ऊर्जा का प्रवाह, नैतिक बल और विषय पर पकड़ अन्यों से श्रेष्ठ होती है। वही उसे स्टार बनाती है।

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'कष्ट देने हेतु आभार'

एक गर्भवती भूखी प्यासी महिला पेड़ के नीचे बैठी थी। प्यास से उसके प्राण निकल रहे थे। कहीं भी जल नहीं था। तभी उसे लगा कि पेड़ पर से कुछ बूंदें टपक रही हैं। उसने पास ही पड़ा मिट्टी का दीपक लिया और उसमे बूंदों को इकठ्ठा करने लगी। जैसे ही दीपक भरा तो महिला उसे पीने लगी। तभी एक चिडिय़ा आई और उसने दीपक को गिरा दिया। महिला क्रोधित हो गयी। उसने गुस्से में पास पड़ी लाठी से चिडिय़ा पर प्रहार किया। महिला ने ईश्वर को भला बुरा कहते हुए कई अपशब्द कहे। चिडिय़ा घायल हो गई और ज्यों त्यों उड़कर अपने घोंसले में चली गई। तभी महिला ने देखा कि जिसे वह निर्मल जल समझकर इकठ्ठा कर रही थी वो असल में एक सांप का जहर था जो उसके मुंह से टपक रहा था। यह देखते ही महिला की आँखों में अशु्र थे। उसने ईश्वर का आभार जताया और अपने कृत्य पर ईश्वर से क्षमा मांगी।

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'प्राथमिकता क्या है?

एक महिला ने एक तोता खरीदा। विक्रेता ने कहा कि तोता बड़ा वाचाल है। पहले दिन जब तोता एक शब्द नहीं बोला तो महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की। विक्रेता ने महिला को कहा कि वो पिंजरे में शीशा लगा दे तो तोता बोल पड़ेगा। तोता नहीं बोला। दूसरे दिन विक्रेता ने एक छोटी सीढ़ी पिंजरे में रखने को कहा। तोता फिर भी नहीं बोला। तीसरे दिन विक्रेता ने पिंजरे में झूला रखने को कहा लेकिन तोता झूला देख कर भी नहीं बोला। चौथे दिन तोता मर गया। जब महिला ने विक्रेता से इसकी शिकायत की तो विक्रेता ने महिला से तोते को दिये गये आहार की जानकारी मांगी। महिला ने धीरे से दुखी होकर कहा कि उसने तोते को आहार तो दिया ही नहीं। जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी- आहार। वह नहीं दिया तो बाकी सब दिया जाना निरर्थक रहा। महिला प्राथमिकता नहीं तय कर सकी कि तोते को क्या देना है।

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मदद: क्या सभी को नहीं चाहिये?

अपने घर के आगे एक दिन मुझे एक भिक्षुक दिखा. मैं अपनी बाइक को स्टार्ट करने के जद्दोजहद में था। मुझे लग रहा था कि इससे पहले कि यह भिक्षुक मुझसे कुछ मांगे, मैं घर से निकल जाऊं। इसी बीच मैंने देखा कि भिक्षुक अचानक फिसल कर गिर पड़ा है। मैंने तुरंत ही उससे पूछा कि क्या उसे कुछ मदद की ज़रूरत है? इस प्रश्न पर उसने जो उत्तर दिया उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। भिक्षुक ने मुझे उत्तर देते हुए कहा कि ' क्या सभी को ज़रुरत नहीं है - मदद की, प्रेम की, दया कीÓ। यह सुनकर मुझे लगा मानो मेरा समूचा ज्ञान व्यर्थ है। मेरी स्थिति काटो तो खून नहीं जैसी थी। भिक्षुक मुझे जीवन जीने का सार समझा गया। मुझे लगा कि ईश्वरीय वेश में वो भिक्षुक मुझे जीने की नई राह बता गया।

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'जो बोयेगा वही काटेगा'

एक छोटे अनाथ बच्चा भूख और प्यास से परेशान था। उस दिन उसे मजदूरी भी नहीं मिली अत: उसके पास एक पैसा भी नहीं था। लड़का खुद्दार था। एक मकान के बाहर खड़ी महिला से उसने एक ग्लास पानी मांगा। महिला समझ गयी कि बच्चा भूखा- प्यासा है। महिला ने पानी की जगह बच्चे को एक ग्लास दूध दे दिया। बच्चे ने धीरे-धीरे दूध पिया और उसका मूल्य पूछा। महिला ने कहा कि मदद का पैसा नहीं लिया जाना चाहिये। बच्चे ने महिला का आभार जताया। कई वर्ष बाद वही महिला गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी। डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया। तभी डॉक्टर्स ने सुपर स्पेशिअलिस्ट डॉ. होवार्ड से मदद लेने की सोची। डॉ होवार्ड इस बीमारी का सबसे बड़ा डॉक्टर था। डॉ होवार्ड ने महिला का दस दिन तक पूर्ण मनोयोग से इलाज किया। डॉ होवार्ड अपने जूनियर्स से कहा कि इलाज का बिल उस महिला से नहीं लिया जाये। जब महिला ने स्वस्थ होने के बाद बिल की प्रति माँगी तो अस्पताल प्रशासन ने कहा कि बिल का भुगतान हो चुका है। महिला आश्चर्यचकित थी। जब बिल की प्रति महिला को मिली तो उसपर लिखा था 'मैडम, इस बिल की राशि उस एक ग्लास दूध से काफी कम है जो वर्षों पूर्व आपने मुझे पिलाया था। यदि वो एक ग्लास दूध नहीं मिलता तो आज डॉ होवार्ड जीवित नहीं होता। आपका ही डॉ होवार्डÓ। महिला की आंखों में अशु्र थे। सच है, जैसा आप अन्यों के साथ करोगे, अन्य भी आपके साथ वैसा ही करेंगे।

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सबसे महत्वपूर्ण अंग कौन?

माँ ने अपने सात वर्षीय पुत्र से पूछा कि हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग कौनसा है। पुत्र ने जवाब में कान को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इसे गलत ठहराया। कुछ वर्ष बाद माँ ने पुन: यही प्रश्न किया और पुत्र ने आँख को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इस उत्तर को भी गलत बताया। अब पुत्र सोलह वर्ष का था और अध्ययन हेतु विदेश जा रहा था। आज माँ ने अपने पुत्र को सही उत्तर बताते हुए कहा कि शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है कंधा। इसलिये नहीं क्योंकि उसपर हमारा सर टिका है बल्कि इसलिये क्योंकि विपत्ति काल में हमारे मित्र इसी कंधे पर सर रखकर रो सकते हैं और अपनी पीड़ा हमें कह सकते हैं। कन्धा ही मनुष्य शरीर का ऐसा अंग है जो स्वार्थी नहीं होता और मुश्किल काल में फंसे अपने मित्रों के सिरों को सहारा देता है।

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'कृतघ्नता एक अपराध'

एक शिकारी शिकार के लिये गया और रास्ता भटक गया। चार दिन तक भटकता रहा लेकिन कुछ भी खाने को नहीं मिला। थक कर अधमरा सा शिकारी भगवान से भोजन मिलने की मिन्नतें करने लगा। थोड़ी ही देर बाद शिकारी ने एक आम का पेड़ देखा। प्रसन्नता से भरा शिकारी आम के पेड़ के पास पहुंचा और तुरंत आम खाने लगा। जब शिकारी को पहला आम मिला तो उसके नेत्र भीग गये और उसने तुरंत ही ईश्वर का अत्यधिक आभार जताया। दूसरा आम खाते हुए भी शिकारी ईश्वर वंदना करता रहा। छठे और सातवें आम को खाते हुए शिकारी ईश्वर ने धीरे धीरे ईश्वर को उलाहना देना शुरू किया क्योंकि वो चार दिन से भूखा था। दसवां आम तो शिकारी ने फैंक दिया और यह जताया कि आम भोजन थोड़े ही है। हमारी स्थिति भी यही है। यहां हम शिकारी की भूमिका में हैं। आम वे उपहार हैं जो ईश्वर, देश, समाज, परिवार से हमें प्राप्त होते हैं। हम नियमित तौर पर उपहार प्राप्त करते जाते हैं और हमारा लालच लगातार बढ़ता जाता है। दसवां आम भी पहले जितना मीठा था लेकिन उसके लिये धन्यवाद नहीं दिया गया। यह घटिया प्रवृत्ति है।

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'जब संसार कहे ना'

एक विद्यार्थी को गुरूजी ने आत्मविश्वास का पाठ सिखाया। गुरूजी ने विद्यार्थी से कक्षा के समक्ष विज्ञान का सिद्धांत बोलने के लिये कहा। ज्यों ही विद्यार्थी ने बोलना प्रारम्भ किया, शिक्षक ने जोर से चिल्लाते हुए कहा "नहीं, नहीं"। विद्यार्थी डरकर बैठ गया। शिक्षक ने दूसरे विद्यार्थी से बोलने को कहा। ज्यों ही दूसरे विद्यार्थी ने बोलना प्रारम्भ किया, शिक्षक ने पुन: जोर से चिल्लाते हुए कहा "नहीं, नहीं"। दूसरे विद्यार्थी ने इस "नहीं" की परवाह न करते हुए बोलना जारी रखा। दूसरे विद्यार्थी ने अपना प्रस्तुतीकरण पूर्ण किया। गुरूजी ने शाबासी दी। पहले विद्यार्थी ने कहा कि वो भी तो यही कह रहा था। गुरूजी ने पहले विद्यार्थी से जो शब्द कहे वो कई लोगों की जिन्दगी बदल सकते हैं। गुरूजी ने कहा कि: 'तुम्हारे मन में अनिश्चितता थी इसलिये तुम रुक गये। जब संसार कहे ना तो इसका जवाब अपने कार्य से दो। संसार के आदत ना कहने की है। इसे चुनौती दो। इन वाक्यों को गलत ठहराओ :

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'बलि के बकरे न तलाशें'

एक राजा को शिकार करने बहुत शौक था। एक दिन वो शिकार पर निकला तो पूरे दिन में उसे एक भी जानवर नहीं मिला। भूखा-प्यासा राजा शिकार की तलाश में भटकता रहा। जब उसे कोई शिकार न मिला तो वो भाग्य को कोसता रहा और महल लौट आया। महल में उसे याद आया कि सुबह उसने एक दीन हीन निर्बल किसान का देखा था। राजा ने सोचा कि उस किसान के शगुन सही नहीं थे और उसके दुर्भाग्यशाली होने के कारण राजा को शिकार न मिला। राजा ने तुरंत सिपाही भेजकर किसान को गिरफ्तार करवाया। राजा ने किसान को अत्यंत दुर्भाग्यशाली ठहराते हुए कहा कि किसान के अपशकुनी होने की वजह से शिकार न मिला अत: किसान को तुरंत मृत्युदंड दे दिया जाये। किसान ने बुद्धिमत्ता से जवाब दिया जिससे उसके प्राण बच गये। किसान ने कहा कि जिस प्रकार राजा ने सुबह किसान को देखा उसी प्रकार सुबह सबसे पहले किसान ने राजा को देखा। राजा को देखने के कारण आज किसान अपने प्राण गंवा रहा है तो ज्यादा बड़ा दुर्भाग्यशाली कौन हुआ? यहाँ हमें निम्नाकित बिन्दुओं को समझना चाहिये:

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