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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (104)

'अहंकार यानि नाश'

एक महान संत और उनके शिष्य किसी गांव में पहुंचे। संध्या काल था। संत और उनके शिष्य अत्यंत थके हुए और भूखे थे। किसी व्यापारी ने सुना कि गांव में संत आये हैं। उसने तुरंत ही भोजन, जल, निवास आदि की व्यवस्था की और संत से जाकर कहा कि समस्त संत और महात्माओं के लिये आवास और भोजन की व्यवस्था की गई है। व्यापारी बोला कि ऐसे सिद्ध संतों के आने से गाँव धन्य हो गया। व्यापारी वापिस चला गया। संत ने अपने सभी शिष्यों से कहा कि उन्हें आज भी भूखा सोना पडेगा। शिष्यों ने इसका कारण पूछा तो संत ने कहा कि 'यह भोजन तो सिद्धस्थ संतों और महात्माओं के लिये है। मैं तो अभी कुछ भी नहीं हूँ। संत तो वो है जिसने सभी इच्छाओं का अंत कर दिया हो। मैं तो अभी तक पूरा मनुष्य भी नहीं हूंÓ। यह कहकर संत सो गये। कथा समझाती है कि जो कुछ भी नहीं है वही सब कुछ है। कथा अहंकार को समाप्त करने और सदा अन्यों के प्रति कृतज्ञ भाव रखने का सन्देश देती है। कथा से निम्नलिखित मूल मन्त्र सीखे जा सकते हैं-

* मैं कुछ नहीं हूं। सब कुछ समाज का है। जो सीखा, जो पाया, जो भी हासिल किया, सब समाज से ही प्राप्त किया। मेरा क्या है? शायद कुछ भी नहीं। नाम, धन, रूतबा , शोहरत - सब समाज से यानि दूसरों से मिली अत: मैं तो कुछ हूं ही नहीं। जिसने यह स्वीकार कर लिया, वह उसी क्षण महानता की ओर चल पड़ा और ईश्वर से जुड़ गया।
* 'मैं हूं और मैं तो बहुत कुछ हूंÓ। जिसमे यह अहं आ गया, वो ईश्वर से, समाज से, और यहां तक कि अपने निकट जनों से भी कट जायेगा। यह मन का अहंकार है। यही मृत्यु का मार्ग है। यह कष्ट का, समस्या का, द्वेष का सबसे बड़ा जनक है।
जरा सोचिये कि क्या आप दिखावे में विश्वास करते हैं? आपके लिये क्या महत्त्वपूर्ण है - स्वयं का अहंकार या प्रेमपूर्ण सम्बन्ध? यदि स्वयं का अहंकार ही आपके लिये सर्वोपरि है तो यकीन मानिये कि आपने निचले स्तर की ओर यात्रा करना प्रारम्भ कर दिया है। बाली , रावण, दुर्योधन, यहां तक कि भीम और अर्जुन भी अहंकार करने के बाद शर्मसार हुए हैं तो आपकी और हमारी क्या बिसात? यहां मन्त्र यही है कि अहंकार आपको ईश्वरत्व से, श्रेष्ठता से, प्रेम से और शान्ति से दूर ले जाकर आपके ही भीतर एक युद्ध छेड़ देता है और आपके अंतर्मन के सदगुणों को परास्त कर देता है। अहंकार को पराजित कीजिये। यही जीवन को जीने का श्रेष्ठ तरीका है।

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लालन पालन के सूत्र

डॉ स्पेंसर जॉनसन की पुस्तक 'द वन मिनिट फादर' के अनुसार यदि आपने अपने बच्चे में आत्मानुशासन और आत्मसम्मान का भाव जागृत कर दिया, तो यकीन मानिये कि आपने पिता होने का दायित्व भी निभा दिया। आत्मानुशासन की पहली शर्त है माता-पिता का स्वयं अनुशासित होना। बच्चे आपसे सीखते हैं. आप उनके रोल मॉडल हैं। जऱा सोचिये कि:

• क्या आपका जीवन अनुशासित है?
• आपकी उम्मीद है कि बच्चा नित्य स्वाध्याय करे. क्या आप रोजाना नियम से अध्ययन करते हैं?
• आप चाहते हैं कि बच्चा सभी का सम्मान करे. क्या आपके कम्युनिकेशन में अन्यों के लिये सम्मान का भाव है?
बच्चे आपको बहुत कुछ सिखा सकते हैं. उन्हें थोड़ी लिबर्टी या स्वतंत्रता देकर देखिये. वे इतने अपडेटेड हैं कि कई बार आप उनके आगे स्वयं को ज्ञान विहीन महसूस करने लगेंगे। बच्चों का तकनीकी ज्ञान , वार्ता कौशल और सामान्य जानकारी का स्तर बहुत बेहतरीन है अत: उनसे कुछ सीखने में गुरेज़ न करें।
बच्चे बड़े ही इम्पल्सिव होते हैं। उन्हें अपनी भावनाओं को दबाना नहीं आता। एक पल में उन्हें एक खिलौना चाहिये और दूसरे ही पल वे उस खिलौने को छोड़ भी सकते हैं। ऐसी अवस्था में हमें उनके साथ प्रेमपूर्वक नेगोसिएशन करना चाहिये. इसे इस कथा से समझें:
• एक बच्चा भोजन नहीं कर रहा था और कोल्ड ड्रिंक की जिद किये जा रहा था। बच्चा चाहता था कि पहले कोल्ड ड्रिंक पिलाई जाये तभी वो भोजन करेगा। माँ को लग रहा था कि कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद बच्चा भोजन नहीं करेगा। माँ के कई बार समझाने पर भी जब बच्चा नहीं माना तो माँ ने एक तरकीब लगाई। माँ ने कहा कि भोजन और कोल्ड ड्रिंक साथ-साथ ली जायेगी यानि एक कौर भोजन का और एक घूँट कोल्ड ड्रिंक का। बच्चा मान गया. इसे कहते हैं सकारात्मक नेगोसिएशन। जऱा सोचिये कि आप सकारात्मक नेगोसिएशन करते हैं या अपनी चौधराहट जताकर बच्चे से वही करवाते हैं जो आप चाहते हैं? यहाँ मन्त्र यही है कि आप बच्चों में ऊर्जा प्रवाहित करके उन्हें सपनों को साकार करने के लिये प्रेरित करें. उनमे राष्ट्रभक्ति, स्त्री सम्मान, भोजन, जल और बिजली संरक्षण के लिये प्रारम्भिक काल से ही तैयार करें। बच्चों के समक्ष हम यह रट लगाए रहते हैं कि 'यह नहीं करना हैÓ। इसके स्थान पर यदि हम उन्हें यह सिखाएं कि 'यह करना हैÓ तो शायद और भी श्रेष्ठ परिणाम आयेंगे. यही लालन पालन का सिद्ध सूत्र है।

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'नकारात्मकता के बादशाह'

रोवणखारा अर्थात नकारात्मकता का वो बादशाह जो प्रति पल नकारात्मक सन्देश देता हुआ रोनी सूरत बनाए बैठा रहता है। यह व्यक्ति वह होता है जो हर बेहतर से बेहतर बात का भी नेगेटिव पोस्टमार्टम कर देता है। पत्नी के जन्मदिन पर जब पत्नी नींद से जागी तो देखा एक दिव्य माहौल है। चारों ओर सजावट है और गुब्बारे लगे हैं। वो बहुत खुश हुई। ज्यों ही बाहर गयी तो खुशी के आंसू छलक पड़े। बाहर उसके माता पिता आशीर्वाद देने खड़े थे। वो पति से बड़ी खुश थी। इतनी खुश कि मानो समूचा संसार कदमों में हो। परन्तु उसी समय उसकी नई साडी पर हल्दी का दाग लग गया। यहीं से दु:ख शुरू। इसके बाद पति, माता-पिता आदि ने पूरा दिन हंस खेल के बिताया परन्तु दाग के दु:ख ने उसकी सारी खुशी छीन ली। 

हमारी समस्या यही है कि हम खुशी को एक सीमा में बांध लेते हैं और छोटे से दु:ख को ओढकर, पुरानी खुशी को भूलकर, रोनी सूरत बना रोवणखारे बन जाते हैं। संगठनों में भी हम अपने अच्छे कार्यों के समाचारों से ज्यादा खुश नहीं होते अपितु छोटी सी नकारात्मक बात की चटखारे लेकर विस्तार से चर्चा करते हैं। यही रोवणखारे या नकारात्मक बादशाह बनने की पहली सीढी है।
संगठन में यदि ऐसे पांच फीसदी नकारात्मक बादशाह हों, तो संगठन स्वत: नष्ट हो जाता है। ये महान नेगेटिव दार्शनिक होते हैं। एक व्यक्ति दुकान पर चादर खरीदने पहुंचा। चादर में सुई के जितना छेद था। छेद देखकर वो तुरंत बोल पड़ा- चादर में ये इतना बड़ा गड्ढा कैसे है? यानि हर बात का नकारात्मक छिद्रान्वेषण।
ऐसे कार्मिक संगठनों के लिये कलंक हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे या नकारात्मक बादशाह सिर्फ निचले स्टाफ में होते हों। ऐसे व्यक्ति अधिकारी भी होते हैं जो हर पल संगठन के मुखिया का सहयोग किये बिना, मन में कुड़कर, उसके द्वारा किये गए कामों की आलोचना अपने जूनियर्स से करते हैं और एक दिव्य नकारात्मक माहौल बनाकर मुखिया को काम करने से रोकते हैं। ऐसे लोग संगठन में कुछ भावुक कर्मचारियों को ढूंढकर, उन्हें सब्जबाग दिखाकर मुखिया के विरुद्ध उनका इस्तेमाल करते हैं और स्वयं परदे के पीछे रहते हैं। यही रोवणखारे संगठन के कलंक होते हैं। ऐसे रोवणखारों से बचिये। यहां मन्त्र यही है कि यदि कोई आपका भोजन प्रदूषित कर दे तो क्या आप उसे खायेंगे? यदि नहीं, तो नकारात्मक बातों पर चटखारे लगाने वाले या नकारात्मक बादशाह क्यों बनते हैं? जरा सोचिये।

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'सीधा या टेढा मार्ग?'

एक राजा ने कसरत करना त्याग दिया और जमकर भोजन करना प्रारम्भ कर दिया। इस कारण उसका वजन तेजी से बढऩे लगा और उसे अनेकानेक रोगों और व्याधियों ने जकड़ लिया। मंत्रियों, रिश्तेदारों, पत्नी और परिवार के समझाने के बाद भी राजा नहीं माना और उसने कसरत करना प्रारम्भ नहीं किया। जब राजा मंत्रियों और प्रजा द्वारा दी गई सलाह से परेशान हो गया तो उसने फरमान जारी करते हुए कहा कि जो भी उसे वजन कम करने की सलाह देगा, उसे एक माह में राजा का वजन कम करवा के दिखाना होगा और यदि ऐसा न हुआ तो उस व्यक्ति का सिर कटवा दिया जाएगा। डर के कारण अब राजा को कोई भी सलाह नहीं दे पा रहा था। एक मंत्री ने एक दिन राजा के सामने एक ज्योतिषी को बुलवाया। ज्योतिषी ने कुछ मन्त्र पढ़कर कहा कि राजा की आयु सिर्फ एक माह ही बची है। अब राजा चिंता में डूब गया। एक माह तक उसे भोजन की इच्छा ही नहीं हुई। राजा डरा हुआ था। एक माह बीत गया। जब एक माह बाद भी राजा नहीं मरा तो उसने उसी ज्योतिषी को वापिस बुलाकर सभा में कहा कि उस ज्योतिषी को मृत्युदंड दिया जाये। तभी मंत्री ने कहा कि यह व्यक्ति असल में ज्योतिषी नहीं बल्कि एक वैद्य है और उस मंत्री ने राजा का वजन कम करने के लिये यह चाल चली थी। राजा ने जब आईने में देखा तो वाकई उसका वजन काफी कम हो गया था। 

* बुरी आदतें बड़ी ही मुश्किल से जाती हैं। जब तक कोई डर न हो , बुरी आदत या व्यसन हमें छोड़ता ही नहीं है। कथा से यह स्पष्ट है कि कुछ आदतें जुबान की समझाइश से नहीं अपितु छड़ी के डर के कारण छूटती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि सिर्फ सकारात्मक बातें करने, बढिय़ा तरीके से काउंसलिंग करने से ही परिणाम नहीं मिलते। कई बार काउंसलिंग के साथ - साथ व्यक्ति को भयभीत भी करना पड़ता है।
* कई बार यथेष्ट कार्य करवाने के लिये उल्टा मार्ग भी अपनाना पड़ता है। जो व्यक्ति आपके श्रेष्ठ और मृदु व्यवहार से नहीं सुधरे, उसके साथ टेढा मार्ग भी अपनाना पड़ता है।
* कॉर्पोरेट जगत में ऐसे किस्से आम होते हैं। कर्मचारियों को भयभीत करने, उनकी बुरी आदतों के कारण उन्हें निकाले जाने का भय दिखाने और कभी - कभी औचक रूप से सख्त कार्यवाही करना भी अत्यावश्यक होता है। यदि ऐसा नहीं किया तो आपको "फॉर ग्रांटेड" ले लिया जायेगा जिसका अर्थ है कि आपकी इज्जत में कमी आती जायेगी।
यहां मन्त्र यही है कि जहां तक हो सके, सीधे मार्ग पर चलें लेकिन जब सीधे मार्ग पर चलने से मंजिल नहीं मिले तो थोड़ा सा परिवर्तन करें। इसका अर्थ नैतिक मूल्यों से समझौता करना नहीं है। इसका अर्थ है कि आप दूसरे मार्ग से मंजिल की ओर जा रहे हैं।

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'क्या आप बच्चे हैं?'

क्या आपने किसी बच्चे के व्यवहार को गौर से देखा है? उसमे कुछ गुण जैसे नकल करना, तुरंत प्रतिक्रिया देना, आदि आम बात होती है. हम सभी अपने जीवन में किसी न किसी पल बच्चे होते हैं. यहां बच्चा होने का तात्पर्य उम्र से नहीं है. आप पचास साल के बच्चे भी हो सकते हैं यानि आपकी आयु चाहे जो भी हो लेकिन यदि आपके निम्नलिखित गुण हैं तो आप बच्चे ही हैं-

1. तुरंत प्रतिक्रिया देने की आदत : किसी भी बात को सुनकर, उसे समझे और विश्लेषण किये बिना ही अपना मत रख देना बच्चे का विशेष गुण होता है. आप बच्चे से जो भी कहेंगे, वो तुरंत प्रतिक्रिया देगा. उसमे इतनी समझ ही नहीं है कि पहले सुने, फिर उस बात को समझे और और उसके बाद अपना मत रखे. यदि आप भी बिना सोचे समझे तुरंत ही प्रतिक्रियाएं देते हैं तो आप भी बच्चे ही हैं और आपका बचपना अभी गया नहीं है. इसे सुधारिये. प्रतिक्रिया देने से पहले चार बार सोचिये. यह जानने की कोशिश कीजिये कि यहां बोलना जरूरी है या नहीं? हर जगह बच्चे की तरह मुंह न खोलिये.
2. इम्पल्सिव व्यवहार : इम्पल्सिव व्यवहार बच्चे का दूसरा गुण है. इम्पल्सिव व्यवहार का अर्थ है-भावनाओं पर, शब्दों पर और अपनी क्रियाओं पर नियंत्रण न रख पाना. उदाहरण के तौर पर आपको किसी ने कहा कि आज तो नए कपड़े पहने हैं , क्या बात है? आपने इम्पल्सिव व्यवहार के साथ तुरंत ही जवाब दिया कि 'क्यों, रोज गंदे कपडे पहनते हैं क्याÓ? समाज में कई व्यक्ति इम्पल्सिव व्यवहार का शिकार हैं. उन्हें आप चाहे जितना धैर्य रखने के लिये कहें लेकिन कुछ मुद्दों पर तो वो एकदम से आक्रामक हो उठते हैं. यही इम्पल्सिव व्यवहार कहलाता है. इससे बचिये. धीरज रखिये. एकदम से आक्रामक होना पशु के समतुल्य हो जाना है. विवेक से निर्णय लीजिये. यह अत्यावश्यक है.
यहां मन्त्र यही है कि अपने मन में छिपे बच्चे को तभी बाहर निकालें जब आपके उसकी तरह निश्छल और सच्चे बनना चाहते हैं. एकदम से रियेक्ट करना, कभी भी किसी से कुछ भी कह देना, कहने के बाद अफसोस करना , आदि दुर्गुणों से बचिये. यह बचपना है. बच्चे होने से बचिये क्योंकि यह रोजमर्रा के जीवन में सुखी रहने और नौकरी के दौरान शांत चित्त से काम करने के लिये अति आवश्यक है.

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'ईश्वर पर रखें विश्वास'

एक पर्वतारोही अपने देश की पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने ही वाला था. गहन अन्धकार था. रात के दो बज चुके थे. तभी अचानक पर्वतारोही का पैर फिसला और वो नीचे की ओर गिरने लगा. गिरते हुए उसने अपने अंतर्मन से ईश्वर को याद किया और प्रार्थना की कि ईश्वर उसकी रक्षा करे. थोड़ी देर बाद उसने पाया कि वो लटका हुआ है. पर्वतारोही के कमर पर सुरक्षा हेतु रस्सी बंधी थी और वो उसी से लटका हुआ था. तभी आकाशवाणी हुई. आकाशवाणी से पर्वतारोही को कहा गया कि वो अपने दोनों हाथों में पकड़ी रस्सी को छोड़ दे और चाकू निकालकर अपने कमर से बंधी रस्सी को काट डाले. पर्वतारोही भयभीत था. उसने आकाशवाणी की नहीं सुनी और रात भर हाथों से रस्सी को पकडे रहा. सुबह जब रेस्क्यू टीम पहुंची तो उस टीम ने पर्वतारोही को मरा हुआ पाया. खास बात यह थी कि जमीन उस पर्वतारोही से सिर्फ एक फुट नीचे थी. यदि उसने ईश्वर के संकेत रूपी आकाशवाणी को मान लिया होता तो वो जमीन पर होता. ईश्वर पर विश्वास नहीं करने के कारण उसे अपने प्राण गंवाने पड़े. इससे यह स्पष्ट है कि: 

* ईश्वर की मदद पर संदेह करना मूर्खता है. जब तक हम हैं, ईश्वर सदा हमारी सहायता करने के लिये तत्पर रहता है. समस्या यह है कि हमें ही इस पर विश्वास नहीं होता. मुसीबत में, कष्ट में, समस्या में वो कभी हमें अकेला नहीं छोड़ता. वो हमें कष्टों को सहन करने का प्रशिक्षण देता है और इसी प्रशिक्षण को पाकर हम जीवन की मुसीबतों का सामना करने हेतु तैयार होते हैं.
* ईश्वर से कभी गलती नहीं हो सकती. उसका प्लान हम समझ ही नहीं सकते. रामायण में हमें लगता है कि कैकेयी के कहने के कारण श्रीराम राजा नहीं बने. यह अर्ध सत्य है. श्रीराम का जन्म तो राक्षस राज्य और अहंकारी रावण को समाप्त कर राम राज्य बनाने हेतु हुआ था. अब यदि हम सिर्फ कथा को देखें तो कैकेयी और मंथरा खलनायिका नजर आती हैं लेकिन वे तो निमित मात्र थीं. ईश्वर का प्लान तो राक्षस राज मिटाना था और यह देख पाने में हम असमर्थ हैं.
* ईश्वर विविध रूपों में, पल प्रतिपल हमारा सहयोग करता है. एक द्वार बंद होते ही चार नये द्वार हमारे लिये खोलता है. ऐसी असंख्य संघर्ष कथाएं हैं जिनमे व्यक्ति एक स्थान पर फेल होने के बाद दूसरे स्थान पर जबरदस्त सफलता हासिल करता है.
यहां मन्त्र यही है कि ईश्वर पर संदेह न करें. ईश्वर पर दृढ़ विश्वास हमें संबल देता है, जीवन जीने की प्रेरणा देता है और सदा सकारात्मक रहकर समाजोपयोगी कार्य करने हेतु प्रवृत्त करता है. यही जीवन का सत्य है.

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'जैसा करोगे, वैसा भरोगे'

एक व्यक्ति चोरी की नीयत से रात के समय किसी मकान की खिड़की से भीतर जाने लगा। तभी खिड़की की चौखट टूट जाने से वह गिर पड़ा और उसकी टांग टूट गयी। अगले दिन उसने अदालत में जाकर अपनी टांग के टूटने का दोष उस मकान के मालिक पर लगाया। मकान मालिक को बुलाकर पूछा गया तो उसने अपनी सफाई में कहा कि इसका जिम्मेदार वह बढ़ई है जिसने खिड़की बनाई थी। बढ़ई को बुलाया गया तो उसने कहा कि उससे यह गलती एक औरत की वजह से हुई जो उस दिन वहां से गुजर रही थी। उस औरत ने बढ़ई का ध्यान खींचा था। जब उस औरत को अदालत में पेश किया गया तो औरत ने कहा कि उस समय उसने बहुत बढिय़ा ड्रेस पहन रखी थी अत: कसूर उस ड्रेस का है जो इतनी बढिय़ा सिली हुई थी। न्यायाधीश ने कहा कि दर्जी ही अपराधी है अत: उसे बुलाया जाये। वह दर्जी उस स्त्री का पति निकला और वही वह चोर भी था जिसकी टांग टूटी थी। सांकेतिक कथा से यह सन्देश मिलता है कि-

1। इस जगत का सर्वाधिक आश्चर्यजनक नियम है- 'जो गड्ढे आप दूसरों के लिये खोदते हो, उनमें स्वयं गिरना पड़ता हैÓ। यह शाश्वत सत्य है। जो षड्यंत्र, राजनीति, ओछापन आप दूसरों के लिये करते हो, वही पलटकर आपके पास लौटता है। जीवन एक गूंज या ईको की तरह है। आप पहाडी से एक बार कुछ चिल्लाते हो-वही आवाज कई बार पुन: आपको सुनाई पड़ती है।
2। कार्यालयों में कई कर्मचारी तो समूचा जीवन इसी कार्य में खपा देते हैं। बॉस की 'मक्खन पॉलिशÓ, उसके समस्त निजी कार्यों को करने वाले इन विलक्षण कर्मचारियों में एक खास बात यह भी होती है कि ये सदा निर्दोष ही होते हैं। दूसरों को फंसाना, उन्हें कष्ट देना, बॉस के कान भरना, दूसरों के लिये षड्यंत्र करना, स्वयं शक्ति का भंडारण करना आदि इनकी खास अदा होती है। कुछ समय तक तो ये शक्तिमान रहते हैं लेकिन कुछ समय बाद इनकी कोई इज्जत नहीं रहती।
3। संगठनों में ऐसे वाकये होना आम बात है। जिम्मेदारी से बचने के लिये दूसरे पर दोष मढने वाले कर्मचारियों को आजकल की भाषा में 'स्मार्ट, कूल, फास्टट्रेकÓ आदि संबोधन दिये जाते हैं। जब सभी जिम्मेदारी से बचना चाहेंगे तो कार्य कौन करेगा?
4। आपने देखा होगा कि सड़क के टूटे होने के कारण यदि दुर्घटना हो जाये तो उसका दोषी क्या आज तक पकड़ा गया है? यह फुटबॉल के उस खेल की तरह होता है जहां एक खिलाड़ी दूसरे को पास देता रहता है, गोल कभी नहीं करता और मैच का कोई निर्णय नहीं निकल पाता।
यहां मन्त्र यही है कि जिम्मेदारी लीजिये। जिम्मेदारी से बचने का प्रयास आपको छोटा बनाता है। दूसरों के लिये किये गये षड्यंत्र आपको ही नेस्तोनाबूत कर देते हैं। यही जीवन का सत्य है।

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'सास, बहु और प्रतिक्रिया'

एक विवाहिता अपनी सास की शिकायत लेकर एक साधु के पास गई। उसने साधु से कहा कि सास दिन भर उसे कार्य करने, व्यवस्था सुदृढ करने आदि पर कुछ न कुछ समझाती रहती है। इसी कारण उसकी रोज सास से लड़ाई होती रहती है। साधु ने विवाहिता को पानी की एक बोतल देकर कहा कि इस बोतल में देश की सभी पवित्र नदियों का पानी मिला है। साधु ने कहा कि 'जब भी सास कुछ कहे तो इस बोतल से एक घूंट पानी अपने मुंह में डालना और दो मिनिट तक उस पानी को मुंह में ही रखना। न पानी को निगलना और न ही कुल्ला करना। दो मिनिट बाद पानी पी लेना। समस्या हल हो जायेगीÓ। विवाहिता ने वैसा ही किया। जब भी सास कुछ उपदेश देती, तो बहु मुंह में पानी डाल कर बैठ जाती। अब लड़ाई कम होने लगी। एक माह बाद वो साधु के पास आई और कहा कि पवित्र नदियों के पानी में जादू है अत: उसे एक और बोतल चाहिये। साधु ने एक बोतल और दे दी। दो माह बाद जब विवाहिता फिर से बोतल लेने आई तो साधु ने कहा कि अब वो बोतल का निर्माण घर पर ही कर लेवे क्योंकि यह सामान्य जल ही है। प्रतिक्रिया नहीं देने की प्रवृत्ति को सिखाने के लिए साधु ने यह खेल खेला था। 

सास और बहु में समस्या होना निश्चित है। दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि, उम्र, अनुभव, शिक्षा, सोच का तरीका आदि अलग-अलग होता है। अत: मतभिन्नता होनी स्वाभाविक है। कथा सांकेतिक है लेकिन इसमें जीवन जीने के और परिवार को श्रेष्ठ तरीके से चलाने के कई गूढ़ सूत्र छिपे हैं-
* तुरंत प्रतिक्रिया देना घातक है। तुरंत प्रतिक्रिया देने का अर्थ बचपना है। बच्चा सुलभ रूप से तुरंत प्रतिक्रिया देता है और नकल करता है। यहां यह समझना होगा कि भले ही आप उम्र में बड़े हो गये हैं लेकिन समझ में बच्चे ही हैं क्योंकि आप तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। तुरंत प्रतिक्रिया न देवें। सबसे पहले सामने वाले की सुनें। उसके बाद विश्लेषण करें कि ऐसा क्यों कहा गया? सोचें कि इस मुद्दे पर बोलना जरूरी है या नहीं? जरूरी हो तो ही बोलें , अन्यथा नहीं।
* प्रतिक्रिया देने से कुतर्क शुरू हो जाता है। 'क्या सही हैÓ की जगह पर 'कौन सही हैÓ-का युद्ध प्रारम्भ हो जाता है। इससे बचिये।
* क्रोध को रोकने का या कम करने का एक ही तरीका है-उसे स्थगित करना, डिले करना यानि प्रतिक्रिया देने में देर करना। देर करते ही कई मुसीबतें तो अपने आप ही समाप्त हो जायेंगी।
यहां मन्त्र यही है कि यदि आप परिवार में सुख चाहते हैं तो एक नियम बना लेवें कि एक समय में एक व्यक्ति ही क्रोध कर सकेगा। जीवन और परिवार स्वत: सुखी हो जायेगा।

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'एवरी डे'

* फिलिपीन्स की मशहूर जिमनास्ट नादिया कोमान्ची को ओलंपिक में दस में से दस अंक मिले। उसने कहा कि उसकी सफलता का राज है -एवरी डे सिक्सटीन ऑवर्स प्रेक्टिसण्

* अमरीकन तैराक बियोंडी और जर्मन महिला तैराक क्रिस्टीन ऑटो से सफलता का राज पूछा गयाण् उसने कहा कि 'एवरी डे - ट्वेंटी ऑवर्स इन स्विमिंग पूल फॉर एन इयरÓ अर्थात स्विमिंग पूल में रोजाना बीस घंटे का अभ्यास एक साल तक।
* मशहूर क्रिकेटर कपिल देव से वल्र्ड कप जीतने के बाद सफलता का रहस्य पूछा गया। कपिल का एक ही जवाब था-रोजाना जमकर प्रेक्टिस, रोजाना मेहनत और नियमित अभ्यास।
* कार रेसर माइकल शूमाकर रोजाना बारह से चौदह घंटेए तेज गति के धावक कार्ल लेविस रोजाना दस से बारह घंटे अभ्यास करते रहे हैं। इन्होने अपनी सफलता का मन्त्र सिर्फ 'एवरी डेÓ को माना है।
एवरी डे अर्थात रोजाना। संसार के समस्त विद्वानों का कहना है कि एवरी डे की ताकत शायद सबसे बड़ी है।
एवरी डे का तात्पर्य हैत्न:
* नित्य नियम बनाये रखनाण् चाहे जो भी हो जाये, रोज का नियम न टूटे। स्नान, पूजा, अध्ययन, कसरत आदि में नित्य नियम बनाने चाहियेण् भले ही स्नानए पूजाए नित्य मंदिर जाना एक मशीनी पेटर्न बन जाये तो भी घबरायें नहीं। यह नियमितता कभी न कभी सकारात्मक परिणाम अवश्य देगी।
* रोजाना अभ्यास करना। रोजाना कार्य करना आसान नहीं होता। नियमितता को कदापि टूटने न देवें। खरगोश और कछुए की कथा को सदा याद रखें कि नियमित चलते रहने से कछुआ जीत गया था।
* अपना रोजाना का टाइम लॉग बनाना। टाइम लॉग का अर्थ है सुबह आठ बजे से लेकर रात दस बजे तक प्रति घंटे आपने क्या किया, उसे लिखना। ऐसा करने से पता चल जाता है कि हमारा समय कहां जा रहा है।
यही तो नियमितता है। एक अध्यापक ने अपने अनुभवों में कहा कि यदि वो एक दिन बिना तैयारी के कक्षा में जाते हैं तो उन्हें पता चल जाता है कि तैयारी नहीं की है और नियमितता टूटी है। यदि तीन दिन तक तैयारी न करें तो सभी विद्यार्थियों को पता चल जाता है कि तैयारी नहीं की है। नियमितताए रोजाना करने का भाव ही विजेता और पराजित में अंतर स्थापित करता है। यहां मन्त्र यही है कि नियमितता से किये गये कार्य ही व्यक्ति को उच्च शिखर पर ले जाते हैं।

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'ईश्वर सदा साथ'

एक केकड़ा समुद्र के किनारे-किनारे चल रहा था। उसके चलने के कारण रेत पर उसके पैरों के सुन्दर निशान बनते जा रहे थे। उन कलात्मक निशानों को देखकर वो फूला नहीं समा रहा था। तभी अचानक सागर की एक लहर आई और उसने केकड़े के पैरों से बने सभी सुंदर निशानों को मिटा दिया। केकड़ा लहर को भला-बुरा कहने लगा और इस बात पर आपत्ति जताने लगा कि लहर ने निशानों को क्यों मिटाया? केकड़े ने लहर को अपना शत्रु करार देते हुए कहा कि लहर उसके द्वारा बनाये गये कलात्मक पद चिन्हों से जलती है अत: उसने निशान मिटा दिये। लहर ने शांत चित्त से उत्तर देते हुए कहा कि एक मछुआरा केकड़े के पद चिन्हों का लगातार पीछा कर रहा था। यदि लहर इन निशानों को न मिटाती तो शायद केकड़ा अब तक मछुआरे द्वारा पकड़ा जा चुका होता और अपनी जान गंवा चुका होता। केकड़े को पश्चाताप हुआ। 

* यह सांकेतिक कथा जीवन में भी लागू होती है। यह शाश्वत सत्य है। ईश्वर कभी भी हमें अकेला नहीं छोड़ता। वो किसी न किसी रूप में हमारी रक्षा करता है। यहां ईश्वर ने लहर बनकर केकड़े के जीवन की रक्षा की। इसी को मारवाड़ में 'भगवान आडो आवेÓ कहा जाता है।
* रिश्तों में पूर्वाग्रह रखना कष्टप्रद हो सकता है। कई बार आप सोचते कुछ हो लेकिन होता कुछ और है। आप किसी के लिये पहले से ही धारणाएं बना लेते हैं। किसी के मन की सच्चाई जाने बिना, उस व्यक्ति का प्रयोजन जाने बिना उसके बारे में पहले से राय न बनायें। कई बार हम जाति, लिंग, आयु, समाज आदि के आधार पर पूर्वाग्रह पाल लेते हैं। यही तो समस्या है। इससे बचिये। बिना शोध के कुछ भी स्वीकार न करें। केकड़े का पूर्वाग्रह भी कुछ इसी प्रकार का था।
* माता-पिता कई बार हमसे हमारे भले के लिये कुछ कहते हैं। कई बार स्वर में तल्खी भी होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें हमसे प्रेम नहीं है। इसका अर्थ है कि उन्हें हमारी बहुत ज्यादा परवाह है। क्या आपने कभी भी अपने माता-पिता को रेल में, बस में या सार्वजनिक स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को टोकते हुए देखा है? शायद नहीं। यही तो आपके प्रति परवाह कहलाती है। परवाह करने वाले मित्र-बन्धु मिलते ही कहां हैं? इनकी कद्र कीजिये। इन्हें अपना शत्रु या आजादी में बाधक मानने की भूल न करें।
यहां मन्त्र यही है कि रिश्तों से पूर्वाग्रह निकालिये और ईश्वर पर विश्वास रखिये। जीवन सुखमय रहेगा। यही सत्य है।

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