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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (70)

'सफलता और समाज'

एक साधु कुछ लोगों को पड़ा रहे थे। तभी साधु के गांव के दो व्यक्ति पधारे। दोनों व्यक्ति साधु के गाँव के होने के कारण साधु को भली भांति जानते थे। वे दोनों ही साधु के वर्तमान आभामंडल और उपलब्धियों से परिचित नहीं थे। अत: उन्होंने तुरंत ही साधु को कहा कि "गणपतिये, तू यहां बैठा क्या पाखण्ड कर रहा है। तुझ जैसा व्यक्ति यदि साधु है तो देश का क्या होगा"। यह कहकर वे हंसने लगे। 

यहां यह स्पष्ट हो गया है कि:
* व्यक्ति चाहकर भी अपनी पुरानी छवि को समाप्त नहीं कर सकता।
* समझने की बात यह है कि हमारे बचपन में, या सफलता के शिखर छूने से पूर्व जिन व्यक्तियों ने हमें जिस रूप में देखा होता है; वे बाद में भी हमें उसी रूप में देखते हैं। हमें उन्हें अन्यथा नहीं लेना चाहिये।
* लोगों के विषय में नकारात्मक बातें बोलना समाज की आदत है। इससे घबराएं नहीं।
* सफल व्यक्तियों को ज्यादा कष्ट, समस्या, व्यंग्यबाण और मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। जैसा कि उदाहरण से स्पष्ट है कि यदि गणपतिया साधु न बना होता तो उसे भी प्रतिकूल टिप्पणी नहीं सुननी पड़ती।
गोस्वामी तुलसीदास ने इस सन्दर्भ में कहा है कि:
तुलसी वहां न जाइये, जन्मभूमि के ठाम,
गुण - अवगुण चीन्हें नहीं, लेत पुरानो नाम।
इसका अर्थ है कि व्यक्ति को बड़ा या सफल बनकर अपने गाँव नहीं जाना चाहिये। उस गांव के लोग, उस व्यक्ति के बचपन के प्रेमीजन, उस सफल व्यक्ति के गुणों और क्वालिटी को नहीं समझ सकेंगे। उनके लिये तो वह ज्ञानी सफल व्यक्ति अब भी वही होगा जो वह बचपन में था।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ हद तक समाज को सफल व्यक्तियों को कोसने की आदत सी है। यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगा। फुटबॉल खेलते समय कुछ बालक एक बच्चे को जानबूझकर परेशान करते थे। उसे टंगड़ी मारते, परेशान करते और हंसते रहते। वो बच्चा उस राज्य के सूबेदार का पुत्र था और तथा खेलकूद में निपुण था। जब उन बालकों से किसी ने पूछा कि वे उस बालक को तंग क्यों करते हैं तो उन लड़कों ने जवाब दिया कि सूबेदार पुत्र भविष्य में सूबेदार बनेगा। चाहे वो भविष्य में कुछ भी बन जाये लेकिन हम तो यही कहते रहेंगे कि हमने इसे खूब टंगड़ी मारी थे। यह निकृष्ट भाव है। ऐसे भाव होने से आप अपनी प्रगति को रोकते हैं। यहां मन्त्र यही है कि लोगों की, समाज की प्रतिकूल टिप्पणियों से न घबराकर कार्य करते रहें और यह स्वीकार कर लेवें कि जिस व्यक्ति ने आपको जिस दशा में देखा होगा, आप उसके लिये ताउम्र वही रहेंगे। जिस पेड़ पर सर्वाधिक आम लगे होंगे, उसी पेड़ पर सबसे ज्यादा पत्थर मारे जायेंगे। यही शाश्वत सत्य है।

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'उम्र सिर्फ एक अंक'

्रएक पत्रकार ने किसी राजनेता का इंटरव्यू समाप्त करके कहा कि यह उसका अंतिम इंटरव्यू है क्योंकि वो पैंसठ साल का हो चुका है और रिटायर हो रहा है। यह सुनते ही राजनेता ने कहा कि वो भी पैंसठ साल का है और इस बार वो राजनीति के साथ-साथ समाजसेवा हेतु एक नया एनजीओ प्रारम्भ कर रहा है। उसने कहा कि उम्र का सीखने से कोई सम्बन्ध नहीं है। 

उदाहरण से यह स्पष्ट है कि उम्र सिर्फ एक अंक है। सीखने की, नया कर गुजरने की, समझने की कोई उम्र नहीं होती हैअ हमने मनोवैज्ञानिक रूप से हमारे प्रत्येक कार्य को उम्र से बांध दिया है। धार्मिक व आध्यात्मिक पुस्तकें पढऩे की उम्र है युवावस्था। हमने यह सोच रखा है कि इनका अध्ययन तो रिटायरमेंट के बाद ही श्रेयस्कर है। क्या इसे हम सही ठहरा सकते हैं? खेलकूद, व्यायाम आदि में हमारी कम दिलचस्पी का भी यही कारण है कि हमने यह मान लिया है कि खेलकूद तो सिर्फ बच्चे ही कर सकते हैं। इस जाल से निकलना होगा। यह स्वीकारना होगा कि उम्र सिर्फ एक अंक से ज्यादा कुछ नहीं है। बढ़ती उम्र नहीं अपितु मानसिक बुढापा घातक होता है जहां आप नया सीखने के लिये तत्पर नहीं होते हैं।
जरा सोचिये कि-
* श्री प्रभुपाद ने भी बहुत बड़ी उम्र में इस्कॉन सोसायटी को स्थापित किया था। उन्होंने अमरीका जाकर बड़ी उम्र में कई ग्रन्थ लिखे और लोगों को जागृत किया।
* एक असफल गरीब बालक था होर्लंड सेंडर्स। उसकी मां उसको और उसके भाई बहन को छोड़कर मजदूरी पर जाती। वह रोज खाना बनाता। सातवीं तक पड़ा, सेल्समेन बना, कई नौकरियां की, पत्राचार से कानून की डिग्री ली और उसके पश्चात ट्रक ड्राइवरों के लिए खाना पकाकर पहुंचाने लगा। उम्र हो चली परन्तु समर्पित भाव से लगा रहा। थोड़ी सी आय से सेंडर्स केफे खोला और डेढ़ सौ लोगों का रेस्तरां खोला जिसमे फ्राईड चिकन प्रमुख आइटम था। ग्यारह तरह के चिकन बनाए। केन्चुकी के गवर्नर ने उन्हें कर्नल की उपाधि दी। छियासठ साल की उम्र में समर्पण से जमे रहे सेंडर्स को भारी मुनाफा हुआ और देखते ही देखते विशिष्ट चिकन रेसिपी के कारण समूचे विश्व में दो सौ रेस्तरां केन्चुकी फ्राइड चिकन के खुल गए और कल का फटेहाल - तेहत्तर साल का सेंडर्स आज प्रति माह तीन लाख डॉलर कमाने लगा।
जरा सोचिये कि तेहत्तर साल तक किया गया श्रम क्या सिद्ध करता है। छियासठ साल की उम्र में नया उपक्रम लगाना क्या सिद्ध करता है? क्या उम्र किसी कार्य को करने में बाधक है? यही सोचना महत्वपूर्ण है।
यहां मन्त्र यही है कि उम्रदराज होकर कुछ नया करना गुनाह नहीं है। उम्रदराज होने के बाद यदि आपको सफलता मिलती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि पहले का जीवन बेकार गया। पहले का जीवन मानो उस पल की तैयारी करवा रहा था जो आप आज जी रहे हो। यही सेल्फ मैनेजमेंट है।

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'जीवन की यात्रा'

* अन्धकार से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले 

* हम अन्धकार से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
यहां हमें यह विचार करना है कि हमारी श्रेणी कौनसी है? अन्धकार का अर्थ है तामसिक, बेकार घटिया मनोवृत्तियां जहां सिर्फ दु:ख, विषाद, तुलना, क्लेश और समस्याएँ हों और हम उनका रस ले - लेकर विश्लेषण करते हों। यदि हमारी श्रेणी अन्धकार से वापिस अन्धकार में जाने वाली है तो इसका सीधा अर्थ है कि हमने समूचा जीवन व्यर्थ नष्ट कर दिया। हमने कुछ भी नया नहीं सीखा। हमारी शिक्षा ने हमें सिर्फ जीविका कमाना सिखाया है। ऐसी शिक्षा को श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
यदि हम अन्धकार से प्रकाश के ओर यात्रा कर रहे हैं तो इससे तात्पर्य है कि हम वैचारिक दरिद्रता और द्वेष के भाव को छोड़कर श्रेष्ठता की ओर यात्रा कर रहे हैं। इससे तात्पर्य है कि हम सिर्फ जीविकोपार्जन को ही नहीं अपितु राष्ट्र और समाज के हित को भी वरीयता देते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने का अर्थ है श्रेष्ठता से निम्नता की तरफ जाना। इससे तात्पर्य है कि अपनी विद्या का गलत इस्तेमाल करना। प्रकाश से प्रकाश की ओर की यात्रा का तात्पर्य है श्रेष्ठता को और निखारना तथा ईश्वरीय निकटता स्थापित करना।
इसे यदि कॉर्पोरेट सेक्टर से जोड़े तो हम यह पायेंगे कि अधिकतर कर्मचारी तो अन्धकार से प्रकाश की तरफ जाते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें और सीखना है अत: वे अपने हुनर, क्षमता, ज्ञान को बढाते हैं और इसमें इजाफा करते रहते हैं। कुछ निकृष्ट कार्मिक ऐसे भी होते हैं जो प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा प्रारम्भ कर देते हैं। उच्च शिक्षण के बाद प्राप्त नौकरी को करते हुए वे संगठन के प्रति निष्ठावान न होकर, परस्पर द्वेष और झगड़ों की राजनीति करते हैं। ऐसी अवस्था में उन्हें हम तामसिक कर्मचारी कहते हैं क्योंकि वे शिक्षण, हुनर, परिवार आदि में श्रेष्ठ थे लेकिन नौकरी में आकर अपना व्यक्तित्त्व खराब करते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वालों से अन्य कर्मचारी भयभीत रहते हैं। इनका मस्तिष्क बड़ा तेज होता है लेकिन वे अपना मस्तिष्क नकारात्मक दिशा में खर्च करते हैं। मैनेजमेंट में प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा वर्जित है। कर्मचारियों का चयन तकनीकी योग्यता के माध्यम से होता है लेकिन उनका निष्कासन मानवीय गुणों की कमी के कारण होता है। हमें यह समझना चाहिये। यहां मन्त्र यही है कि अपनी विद्या का प्रयोग जनकल्याण, संगठन के कल्याण हेतु करें और सदा नया सीखने हेतु तत्पर रहें। यही वास्तविक मैनेजमेंट है।

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'क्यों धन संचय?'

एक सेठ ने साधु को अपना बंगला, संसाधन और एक तहखाने में जमा किया हुआ खजाना दिखाया। सेठ ने साधु के समक्ष अहंकार के साथ पूछा कि साधु को खजाना और उसके द्वारा एकत्र किये गये संसाधान कैसे लगे? साधु ने निर्लिप्त भाव से सेठ से पूछा कि वह इस खजाने से और संसाधनों से कितना कमा लेता है? सेठ ने कहा कि कमाना तो दूर, उलटा उसने चार चौकीदार इस खजाने और संसाधनों की रक्षार्थ नियुक्त कर रखे हैं। यह सुनकर साधु ने कहा कि उसके गांव में एक वृद्ध महिला है जिसके पास संसाधन के नाम पर सिर्फ एक चक्की है। वो चक्की से धान पीसने का काम करती है और अपना गुजारा चलाती है। वो भी अपना और बच्चों का पेट तो भर ही रही है। वो खजाना न होते हुए भी सेठ से कम चिंतित है और बहुत सुखी है। ऐसे में बुद्धिमान कौन हुआ? साधु ने कहा कि अगर खजाने और संसाधनों से कोई कमाई नहीं हो रही है तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल? क्या इस खजाने और संसाधनों को जरुरतमंदों को नहीं दे दिया जाना चाहिये? 

कथा सांकेतिक है। मूर्खतापूर्ण रूप से धन संचय की प्रवृत्ति पर चोट करती है। यह बात सत्य है कि हमने 'खजाने की रक्षाÓ को ही जीवन का मूल ध्येय मान लिया है। क्या संसाधनों का संवर्धन, उनका संरक्षण और उनकी बढ़ोतरी ही जीवन है? यदि यही जीवन है तो हमें कई अपराधियों, कुख्यात चोरों को भी आदर के साथ याद करना चाहिये क्योंकि संसाधनों का भंडारण और संरक्षण तो उन्होंने भी किया था। क्या धन के भंडारण कर लेने के कारण आप और हम उन अपराधियों को सम्मान और आदर दे सकते हैं?
समस्या यह है कि हमारे मन में भविष्य को लेकर बहुत ही ज्यादा डर व्याप्त है। वर्तमान को सुखपूर्वक जीने के बजाय हम भविष्य हेतु संचयन में अधिक इच्छुक रहते हैं। क्या यह सही है? क्या अगले पल का कोई भरोसा है? जो है वह आज है। यदि हमारे द्वारा अर्जित संसाधनों से ही हमें कष्ट हो रहा हो तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल है? हमने अपने जीवन में यह तय कर रखा है कि जो भी सर्वश्रेष्ठ वस्तु होगी उसे 'बाद मेंÓ या 'समय आने परÓ इस्तेमाल करेंगे। ऐसा इंतजार करने में ही जीवन समाप्त हो जाता है। यहां मन्त्र यही है कि संसाधनों के भंडारण के बजाय उसे समाजोपयोगी कार्यों में लगाना श्रेयस्कर है। धनगैला अर्थात पैसे के लिये पागल होना वाकई मूर्खता की पराकाष्ठा है। धनगैले बनने से बचें। यही जीवन प्रबंध है।

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'नैतिकता से कमायें धन'

एक अमीर सेठ ने साधु महाराज से पूछा कि वह ऐसा क्या करे कि उसे गृहस्थ होते हुए भी साधु की भांति शांत और सुखी जीवन जी सके। साधु ने कहा कि ऐसा करना बड़ा ही आसान है। यदि व्यक्ति सुखी और शांत रहना चाहता है तो उसे दो उपाय करने होंगे:

1. नैतिकता और ईमानदारी के साथ धन कमाना होगा। धन किसी को संताप, कष्ट, दु:ख देकर नहीं अपितु लोगों का भला करके, उनकी समस्या का समाधान देकर कमाया जाये।
2. जो धन कमाया है उसका एक बड़ा हिस्सा पुन: समाजोत्थान के कार्यों में लगाया जाये क्योंकि धन कमाया तो समाज से ही है।
अब हमें अपने आप से यह प्रश्न करना चाहिये कि:
* क्या हम नैतिक रूप से दृढ रहकर जीविका कमा रहे हैं?
* कहीं हमने अनैतिक आचरण से धनार्जन करने को अपने अंतर्मन में स्वीकार तो नहीं कर लिया?
* क्या हम अनैतिक रूप से धन कमाने के बाद "सब चलता है, सभी ऐसे ही तो करते हैं" का जाप प्रारम्भ कर देते हैं?
* क्या हम हमारे द्वारा कमाये गये धन का कुछ हिस्सा समाजोत्थान के लिये या असहाय निर्बलों के लिये खर्च करते हैं?
* दान देने के नाम पर क्या हम सिर्फ अपनी बहन - बेटी के ससुराल तक मेवा-मिष्टान्न पहुंचाने हेतु लालयित रहते हैं या वास्तव में जिसे आवश्यकता है उसे दान देते हैं?
इन प्रश्नों का स्वयं से जवाब मांगिये। अपने पुत्र या पुत्री से पूछिये कि उन्हें कैसा पिता चाहिये? वह अमीर पिता जिसने येन केन प्रकारेण अनैतिकता का सहारा लेकर धन कमाया है या वह पिता जिसकी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता एक मिसाल हो? हर बच्चा यह चाहेगा कि उसका पिता स्वधर्म के पथ पर चलता हो।
जरा सोचिये कि आखिर हम किसके लिये अथाह मात्रा में कमाना चाहते हैं? क्या हमें यह लगता है कि हमारी अगली पीढ़ी इतनी निकृष्ट है कि वो अपना भरण पोषण नहीं कर सकेगी? क्या हमें अपनी पीढ़ी पर विश्वास नहीं है? हम किसे दिखाना चाहते हैं कि हमारे पास रुपयों का अम्बार है? उस रुपयों के पहाड़ रूपी अम्बार से क्या जीवन का एक पल भी खरीदा जा सकता है? यहां मन्त्र यही है कि अनैतिक कमाई सदा विषाद, दु:ख, क्लेश और रोगों को जन्म देती है। धन बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन सब कुछ नहीं है। अत: खूब कमायें लेकिन जरुरतमंदों की मदद भी करें। यही तो जीवन है।

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'प्रदर्शन या वास्तविक कार्य?'

एक आश्रम में दो विद्यार्थियों ने अनेक विद्याएं सीखीं। एक दिन पूजन के समय एक शिष्य को चमत्कार करने की सूझी। उसने मन्त्र जपा और उसकी चटाई पानी पर तैरने लगी। उसने अपनी विद्या का अहंकारपूर्वक प्रदर्शन करते हुए कहा कि आज पूजा इस चटाई पर खड़े होकर करेंगे क्योंकि वो चटाई अब नौका बन चुकी है। दूसरे शिष्य के अहंकार पर चोट पहुंची। वह भी स्वयं को बड़ा विद्वान मानता था। उसने मन्त्र जपकर अपनी चटाई को हवा में उड़ाया और उसे विमान का रूप दे दिया। उसने कहा कि आज पूजा चटाई रूपी विमान में बैठकर करेंगे। दोनों के इस अहंकारपूर्ण रवैये को देखकर उस गुरुकुल के गुरूजी ने दोनों को डांटा। गुरूजी ने कहा कि विद्या का वास्तविक उद्देश्य उसका वृथा प्रदर्शन या अहंकार के साथ किया गया चमत्कार नहीं हो सकता। अत: वे दोनों भविष्य में ऐसा न करें। यदि वे चमत्कार करना ही चाहते हैं तो समाज हेतु वास्तविक कार्य करें तथा पीडि़त जनों के दु:ख दूर करने हेतु चमत्कार करें। 

जो आडम्बर, अहंकार, शक्ति प्रदर्शन इन दोनों साधुओं ने किया वह वाकई गलत है। हमारे जीवन का मूल उद्देश्य समाज को यह दिखाना नहीं है कि हम कितने ताकतवर या शक्तिसंपन्न या गुणों से युक्त हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य यह होना चाहिये कि हम अपनी शक्तियों और सामथ्र्य से समाज के लिये कुछ उपयोगी कार्य करें और समाज का उत्थान करें।
जरा सोचिये कि इस शक्ति प्रदर्शन से क्या हासिल हुआ? क्या इससे किसी नई समाजोपयोगी तकनीक का जन्म हुआ? क्या समाज और राष्ट्र को इन दोनों के अहंकार से और प्रदर्शन से कुछ हासिल हुआ? क्या इन्होने प्रदर्शन करके विद्या के वास्तविक उद्देश्य को नहीं झुठला दिया?
विद्या का वास्तविक उद्देश्य चमत्कार करना, शेखी बघारना या प्रदर्शन करना नहीं है। विद्या का वास्तविक उद्देश्य जनमानस की सेवा और राष्ट्र की रक्षार्थ समर्पण करने के भाव की जागृति है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या ईश्वर आडम्बर से, प्रदर्शन से या शेखी बघारने की प्रवृत्ति से खुश होता है? शायद ऐसा नहीं है। भारतीय शास्त्र तो 'कामये दु:ख तप्नानाम, प्राणिनाम आर्तिनाशनमÓ के सिद्धांत को मानता है जिसके अनुसार मनुष्य जीवन का लक्ष्य है दु:ख से पीडि़त जनों की सेवा। ऐसे आडम्बरों से भय फैलता है। चमत्कार करना भी हो तो किसी व्यक्ति या समाज के सुधार हेतु करना चाहिये, अहंकार की पूर्ति के लिए नहीं। अत: यहां मन्त्र यही है कि आडम्बर, अहंकार, और प्रदर्शन से मुक्त रहकर ही हम मानवमात्र की सेवा करें। वास्तविक ठोस कार्यों को, धरातल के कार्यों को अंजाम दें। यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।

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'उद्देश्यपूर्ण जीवन'

एक राजा ने विद्वानों से पूछा कि संसार के तीन सबसे बड़े दु:ख क्या हैं. विद्वानों ने बताया कि पहला दु:ख है किसी का ऋणी होना. ऋण लेते ही आप 'रीसीविंग ऐंड पर आ जाते हैं. यही से दु:ख प्रारंभ होता है. दूसरा दु:ख है ऐसा रोग होना जिसका उपचार असंभव हो. यहाँ व्यक्ति पल-पल मृत्यु का एहसास करता है. तीसरा सबसे बड़ा भयानक दु:ख है कि जीवन के अंतिम छोर पर पहुंच जाना और वहां पहुंचकर यह समझना कि पूरा जीवन तो बेकार के कामों में ही नष्ट कर दिया. यह सबसे बड़ा दु:ख है. जब पूरा जीवन ही निरर्थक रह जाये तो इसी को सबसे बड़ा दु:ख कहा जाता है. दूसरों से घृणा करने, नाराजगी जताने, नफरत का बहीखाता बनाने, षड्यंत्र रचने में जीवन को नष्ट न करें. यह निरुद्देश्य जीवन है. 

हम में से कई लोग निरुद्देश्य जीवन जी रहे हैं. हमें जीवन के अंतिम छोर पर पहुंचकर बहुत दु:ख होगा जब हम यह महसूस करेंगे कि जीवन तो बेकार के लड़ाई-झगड़ों, रोटी कमाने की मशक्कत और द्वेष-क्लेश-कष्ट आदि के विश्लेषण करने में ही व्यतीत कर दिया. आखिर हमें किस रूप में याद किया जाएगा? हमारा नामलेवा कौन होगा? हमें समाज सम्मान क्यों देगा? क्या हम ऐसा कुछ कर गुजरेंगे जिससे हमारे बच्चे हमारे नाम को गर्व के साथ बोल सकें? हमें अपने पूर्वजों पर, समाज की थातियों पर, राष्ट्र पर गर्व है. यह अच्छा है. लेकिन हमने ऐसा क्या किया है कि समाज हम पर गर्व कर सके? यह सोचना अत्यावश्यक है. इसी क्षण इस प्रश्न का उत्तर सोचिये. आपको वास्तविक जवाब मिल जाएगा. अपनी स्थिति समझ आ जायेगी.
जीवन बड़ा होना चाहिये, लम्बा नहीं. ज्यादा आयु नहीं चाहिये. जितनी आयु मिली है उसी आयु में सार्थक, समाजोपयोगी, श्रेष्ठ कर्म होने चाहिये. बड़े जीवन से तात्पर्य है समाजोपयोगी, राष्ट्रोपयोगी जीवन जहां आप निस्स्वार्थ भाव से, स्वयं की प्रेरणा से राष्ट्र के लिए कार्य करने हेतु तैयार हों. लम्बे जीवन का अर्थ है बड़ी आयु लेकिन समाजोपयोगी कार्यों की सूची का अभाव. ईश्वरीय कृपा है यदि आप लम्बे जीवन के साथ जीवन को बड़ा भी बना सकें. यहाँ मन्त्र यही है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार करें. सिर्फ जियें नहीं, क्वालिटी के साथ जियें.
धर्म के लिये जियें, समाज के लिये जियें
ये धड़कनें ये श्वास हों, पुण्यभूमि के लिये,
मातृभूमि के लिये.

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'लोग तो कहेंगे ही'

एक मूर्तिकार ने दो एक जैसी मूर्तियाँ बनाई। एक मूर्ति को उसने छिपाकर रख दिया। दूसरी मूर्ति को उसने प्रदर्शनी में सजाया और उसके नीचे लिखा कि इस मूर्ति में कमियाँ बताई जावें। अनेकानेक लोगों ने मूर्ति को देखा और अपनी टिप्पणी दी। मूर्तिकार ने प्रत्येक व्यक्ति ने जो कहा उसके हिसाब से मूर्ति में परिवर्तन कर दिया। सभी खुश थे। अब सौ से ज़्यादा परिवर्तन मूर्ति में हो चुके थे। मूर्ति का मूल स्वरुप नष्ट हो गया था। अब उस मूर्तिकार ने दूसरी छिपाई गई मूर्ति को इस मूर्ति के पास रखकर पूछा कि कौनसी मूर्ति श्रेष्ठ है। सभी ने छिपाई हुई मूर्ति को श्रेष्ठ बताया। 

इस कथा से यह तो स्पष्ट हो गया है कि:
- सभी को खुश रखना नामुमकिन कायज़् है।
- लोग क्या कहेंगे - ऐसा सोचना बेकार है। लोग तो टीका - टिप्पणी करेंगे ही। इसकी अत्यधिक परवाह न करें।
- यदि हम प्रत्येक कार्य को लोगों की टिप्पणी के अनुसार करेंगे तो वह कार्य बहुत ही बुरे तरीके से संपादित होगा, जैसा मूर्तिं के साथ हुआ।
यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि हम लोगों की कही गई वृथा टिप्पणियों को इतना महत्त्व क्यों देते हैं? लोगों का काम ही टिप्पणी करना है। यहाँ हमें स्वविवेक से निर्णय करना चाहिये। 'सुनिये सब की, करिये मन कीÓ का सिद्धान्त यहाँ पर अपनाया जाना मुफीद है।
इस स्थिति को हमें वतज़्मान विद्यार्थियों से जोडऩा चाहिये। विद्यार्थियों को हर व्यक्ति सलाह देता है कि उन्हें श्रेष्ठ करियर हेतु क्या करना चाहिये।यहाँ विद्यार्थी मूर्ति के भूमिका में है और समाज टिप्पणीकार के रूप में। विद्याथीज़् इतने ज़्यादा विकल्प सुन चुका होता है कि उसे यह समझ ही नहीं आता कि उसके लिये श्रेष्ठ विकल्प क्या होगा? यहीं से उनमें तनाव उपजता जाता है। ऐसी स्थिति में स्वयं की बुद्धि, विवेक और विश्लेष्ण के आधार पर निणर्य करना चाहिये। माता - पिता को चाहिये कि वे अपने बालक से वृहद् चर्चा करे, उसके व्यवहार का आकलन करे और उसके बाद निर्णय करें। सुनी - सुनाई बातों के आधार पर, किसी के भी कह देने के आधार पर निणज़्य करना घातक हो सकता है। विद्यार्थी के दिलचस्पी के क्षेत्र में उसका हौसला बढायें। अन्यों से तुलना न करें।
जऱा सोचिये कि यदि बच्चों ने आपकी तुलना अन्य माता - से करना प्रारंभ कर दिया तो क्या होगा? यहाँ मन्त्र यही है कि जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, आत्मावलोकन के बिना, औरों के कहे जाने से प्रेरित निणज़्य सदा ही दु:ख देता है। अत: तसल्ली से स्वयं के आधार पर
निर्णय लेवें। लोग तो कहेंगे ही, कहते रहेंगे ही अत: उनकी ज़्यादा परवाह न करें। यही सेल्फ मैनेजमेंट है।

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'जीवन एक उत्सव'

जीवन क्या है और इसकी परिभाषा क्या है? जीवन की परिभाषा देना आसान नहीं है. क्या भोजन करना, प्रजनन करना, मकान बनवा लेना, बच्चों का विवाह कर देना और समाज में सुख - दु:ख के अवसरों में भाग लेना ही जीवन है? अधिकांश व्यक्ति इसी को जीवन मानते हैं. कुछ लोग धनार्जन को तो कुछ लोग आनंद के साथ जीने को ही जीवन मान लेते हैं. यह जीवन नहीं है. ये सभी कार्य (भोजन व्यवस्था आदि) तो पशु, पक्षी और कीट - पतंगे तक भी करते हैं. वास्तविक जीवन को हम जैसा परिभाषित करते हैं, हमारा जीवन वैसा ही बनता जाता है. 

जीवन एक संग्राम है : जो व्यक्ति ऐसा सोचते हैं उन्हें लगता है कि जीवन एक 'गला काटÓ प्रतिस्पर्धा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर जीत हासिल करना चाहता है. ऐसा सोचना गलत नहीं है लेकिन ऐसे में प्रतिस्पर्धा का भाव महत्वपूर्ण हो जाता है. जहां प्रतिस्पर्धा है वहां टीमवर्क, सहयोग और समन्वय का लोप हो जाता है. ऐसे व्यक्ति पल प्रति पल और अधिक हासिल करने, प्राप्त करने और ऊंचा चढऩे की लिप्सा से आगे बढ़ते जाते हैं. उनमे अत्यधिक महत्वाकांक्षा होती है. जीवन को संग्राम या प्रतिस्पर्धा मानने वालों को सोचना चाहिये कि यदि वे शहर की सारी सीढिय़ों को मिलाकर एक ऊंचाई पर पहुँच भी जायें तो वे यह पायेंगे कि ऐसी ऊंचाई पर कोई भी नहीं रहता. अत: जीवन को सिर्फ संग्राम न समझें.
जीवन एक संघर्ष है : कुछ व्यक्ति जीवन को संघर्ष मानकर चलते हैं. जब संघर्ष का भाव होता है तो व्यक्ति को लगता है प्रत्येक संसाधन की प्राप्ति हेतु अथाह श्रम और संघर्ष करना ही पडेगा. यह उसकी नियति बन जाती है. यही से व्यक्ति में परस्पर द्वेष, क्लेश और कुटिलता का जन्म होता जाता है. यदि आप जीवन को संघर्ष मानते हैं तो यह कुछेक अर्थों में तो सही है लेकिन पूर्ण रूप से सत्य नहीं है.
जीवन एक उत्सव : तो आखिर जीवन क्या है? जीवन एक उत्सव है. इस उत्सव रूपी जीवन में हमें समाज और राष्ट्र के लिये कुछ योगदान देना चाहिये. जीवन की सार्थकता यह समझने में है कि-
* आपने अपने कर्तव्यों का कितनी उत्कृष्टता से पालन किया?
* आपके कारण कितने लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट आई?
* आपने अपने माता पिता की सेवा किस मनोयोग से की?
* आप अपने बच्चों के लिए एक रोल मॉडल या हीरो बन पाये क्या?
यहां मन्त्र यही है कि जीवन का प्रति पल ईश्वर का आशीर्वाद है. प्रति पल जीयें. समाज के लिये जियें. राष्ट्र के लिये जियें. दूसरों की खुशी के लिये जियें. सुबह उठते ही आपके पैरों तले जमीन मिलना एक उत्सव से बढ़कर है क्योंकि इससे सिद्ध होता है कि आप जीवित हैं. जीवन के हानि - लाभ आदि को त्यागिये और जीवन्तता से जीना सीखिये. यही जीवन है.

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'जीना सिखाते हैं श्रीराम'

सत्य और धर्म के पथ पर दृढ़ रहने वाले, नैतिकता की परिसीमा भगवान श्री राम ही सच्चे अर्थों में मनुष्यों को जीवन जीना सिखाते हैं। स्वधर्म पालन कर्ता श्री राम को जब महर्षि जवाली ने काफी समय तक समझाया कि एक महिला के कह देने से और पिता की भावुकता के चलते चौदह वर्ष तक गृह त्याग तर्कसंगत नहीं है। इस पर श्री राम ने अपने स्वधर्म को नहीं छोड़ा। श्री राम ने कहा कि प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपयश की प्राप्ति करोड़ों मृत्यु के समान संताप देने वाली होती है और वे अपने किसी कृत्य से अपने पिता और राज्य को अपयश नहीं देना चाहते। भगवान श्री राम ने अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम धर्म माता पिता की आज्ञा पालन है और उससे पीछे हटना अधर्म है। उन्होंने वन में उनके पीछे आये आर्य सुमंत, भाई भरत और अयोध्या वासियों को भी यही सन्देश दिया। 

भगवान श्री राम नैतिकता और समर्पण की ही नहीं अपितु प्रेरणा प्रदान करने की भी परिसीमा है। खेलों में हर बार अपने सबसे प्रिय भ्राता भरत को विजेता बना देने के गुण ने उनके सभी भाइयों में प्रेम और उत्साह का संचार किया। इसी गुण को मोटिवेशन गुरु का लक्षण कहते हैं। छोटों को खेल में जिताने से उन छोटे भ्राताओं में श्रद्धा बोध बढ़ता है। श्रीराम से हमें प्रशंसा करने की कला सीखनी चाहिये। आजकल मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में हमें संकोच होता है। यह उचित नहीं है। भगवान श्री राम अपने भाइयों की, राज्य कर्मचारियों की और यहाँ तक कि अपने शत्रु की वीरता की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में समर्थ थे। श्रीराम द्वारा मेघनाद, कुम्भकर्ण और राक्षसराज खर के वीर पुत्र मकराक्ष की प्रशंसा करना उनके विराट व्यक्तित्व को दर्शाता है। वर्तमान में हम ऐसा करने से हिचकते हैं क्योंकि हमें असुरक्षा का भय सताता रहता है।
विनम्रता की प्रतिमूर्ति और अहंकार से शून्य व्यवहार श्रीराम का मूल लक्षण है। शिव धनुष के टूटने पर उन्होंने अपनी विनम्रता को बनाये रखा। महर्षि परशुराम के समक्ष उनकी विनम्रता एक महान उदाहरण है। समुद्र द्वारा रास्ता ना देने पर तीन दिवस तक विनम्र निवेदन करना उनके पर्यावरण से प्रेम, उसके संरक्षण और संवर्धन की महत्ता को दिखाता है। शबरी के झूठे बेर खाना सिद्ध करता है कि नि:स्वार्थ भाव से की गई भक्ति से बढ़कर कुछ नहीं। सामजिक समरसता के प्रणेता श्री राम ने शबरी के झूठे बेर ग्रहण कर यह सिद्ध किया कि सभी मनुष्य बराबर हैं और जातियों आदि का कोई महत्व नहीं है। अहिल्या उद्धार उनके अहंकार शून्य शुद्ध सात्विक प्रेम को दर्शाता है। यही तो जीवन प्रबंध है। यही सत्य, धर्म, प्रेम, दया और नैतिकता के गुण वर्तमान समय की आवश्यकता हैं।

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