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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (95)

'ईश्वर सदा साथ'

एक केकड़ा समुद्र के किनारे-किनारे चल रहा था। उसके चलने के कारण रेत पर उसके पैरों के सुन्दर निशान बनते जा रहे थे। उन कलात्मक निशानों को देखकर वो फूला नहीं समा रहा था। तभी अचानक सागर की एक लहर आई और उसने केकड़े के पैरों से बने सभी सुंदर निशानों को मिटा दिया। केकड़ा लहर को भला-बुरा कहने लगा और इस बात पर आपत्ति जताने लगा कि लहर ने निशानों को क्यों मिटाया? केकड़े ने लहर को अपना शत्रु करार देते हुए कहा कि लहर उसके द्वारा बनाये गये कलात्मक पद चिन्हों से जलती है अत: उसने निशान मिटा दिये। लहर ने शांत चित्त से उत्तर देते हुए कहा कि एक मछुआरा केकड़े के पद चिन्हों का लगातार पीछा कर रहा था। यदि लहर इन निशानों को न मिटाती तो शायद केकड़ा अब तक मछुआरे द्वारा पकड़ा जा चुका होता और अपनी जान गंवा चुका होता। केकड़े को पश्चाताप हुआ। 

* यह सांकेतिक कथा जीवन में भी लागू होती है। यह शाश्वत सत्य है। ईश्वर कभी भी हमें अकेला नहीं छोड़ता। वो किसी न किसी रूप में हमारी रक्षा करता है। यहां ईश्वर ने लहर बनकर केकड़े के जीवन की रक्षा की। इसी को मारवाड़ में 'भगवान आडो आवेÓ कहा जाता है।
* रिश्तों में पूर्वाग्रह रखना कष्टप्रद हो सकता है। कई बार आप सोचते कुछ हो लेकिन होता कुछ और है। आप किसी के लिये पहले से ही धारणाएं बना लेते हैं। किसी के मन की सच्चाई जाने बिना, उस व्यक्ति का प्रयोजन जाने बिना उसके बारे में पहले से राय न बनायें। कई बार हम जाति, लिंग, आयु, समाज आदि के आधार पर पूर्वाग्रह पाल लेते हैं। यही तो समस्या है। इससे बचिये। बिना शोध के कुछ भी स्वीकार न करें। केकड़े का पूर्वाग्रह भी कुछ इसी प्रकार का था।
* माता-पिता कई बार हमसे हमारे भले के लिये कुछ कहते हैं। कई बार स्वर में तल्खी भी होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें हमसे प्रेम नहीं है। इसका अर्थ है कि उन्हें हमारी बहुत ज्यादा परवाह है। क्या आपने कभी भी अपने माता-पिता को रेल में, बस में या सार्वजनिक स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को टोकते हुए देखा है? शायद नहीं। यही तो आपके प्रति परवाह कहलाती है। परवाह करने वाले मित्र-बन्धु मिलते ही कहां हैं? इनकी कद्र कीजिये। इन्हें अपना शत्रु या आजादी में बाधक मानने की भूल न करें।
यहां मन्त्र यही है कि रिश्तों से पूर्वाग्रह निकालिये और ईश्वर पर विश्वास रखिये। जीवन सुखमय रहेगा। यही सत्य है।

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'आदर्श और फैशन'

* एक शराब के तस्कर पर बनी फिल्म ने रिकॉर्ड कमाई की।
* अंडरवल्र्ड डॉन पर बनी फिल्में सुपरहिट रही हैं।
* वर्तमान में नशा करने वाले, हथियार रखने के कारण जेल में रहने वाले अभिनेता पर बनी फिल्म हिट रही है।
* अब पोर्नस्टार पर फिल्म निर्माणाधीन है।
ये एक संकेत है। समाज कैसा बनना चाहता है? समाज का आदर्श कौन है? समाज किसकी नकल कर रहा है? यदि समाज में सम्मान टैक्स चोरोंए पोर्नस्टार्सए अपराधियों का होगा तो इनके जैसा बन जाना फैशन बनता चला जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि यह मनोरंजन है। आप भी यही कहेंगे कि यह तो मनोरंजन मात्र है। इसका आपके मस्तिष्क पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यह सोच तो ठीक नहीं है। कई विश्वविद्यालयों ने शोध के द्वारा 'अवचेतन मन के परसेप्शनÓ की व्याख्या की है जिसके अनुसार अवचेतन मन पर प्रभाव तो पड़ता ही है। यदि ऐसा न होता तो वषों पूर्व एक सिनेमा को देखकर सैकड़ों प्रेमी युगल घर से न भागे होत। एक फिल्म में नायक ने गले पर खोद-खोद कर अपना नाम लिखा था। उसे कॉपी करते हुए कई युवा घायल हुए थे।
हम समझते हैं कि यह सब व्यवसाय है। व्यवसाय में नैतिकता की उम्मीद करना मुश्किल होता जा रहा है। हम सभी यह समझ चुके हैं कि व्यवसाय 'ईगोइस्मÓ के सिद्धांत पर चल रहा है जिसका अर्थ है कि मेरा मुनाफा हो जाये, मैं सुखी हो जाऊं, शेष से मुझे सरोकार नहीं है। जिस समाज में 'ईगोइस्मÓ फैशन है, वहां राष्ट्रप्रेम, निर्बल की सेवा और देश के लिये कुछ कर गुजरने का भाव पैदा करना मुश्किल होता जायेगा।
जरा सोचिये कि:
* देशप्रेम फैशन कब बनेगा?
* शहीदों के चित्र हमारे घरों की दीवारों की शोभा कब बढ़ाएंगे? फिल्म स्टार्स के बजाय इन्हें राष्ट्र नायक माना जाना फैशन कब बनेगा?
* बाल विवाह नहीं करनाए दहेज नहीं लेना, मृत्यु भोज को नकारना फैशन कब बनेगा?
* निकृष्ट व्यक्तियों को नायक नहीं मानकर उन्हें दुत्कारना फैशन क्यों नहीं बन पा रहा?
* स्त्री संरक्षणए आर्थिक रूप से सशक्त महिला बनकर राष्ट्र की सेवा करना फैशन क्यों नहीं है?
* देशभक्तों की कथाओं को सुनाना, उनसे सीखना, अपनी संतान को राष्ट्र गौरव का पाठ पढ़ाना फैशन कब बनेगा?
* हेयर स्टाइल संवारने के बजाय ब्रेन की स्टाइल सुधारना फैशन क्यों नहीं है?
जरा सोचिये कि यदि हमारे आदर्श और प्रेरणा स्रोत ही चोर, डकैत, देशद्रोही, टैक्स को खुर्द-बुर्द करने वालेए बदमाश व्यक्ति होंगे तो समाज भी तो उन्हीं के जैसा बनेगा? समाज जिसका सम्मान करता है, व्यक्ति वैसा ही बनना चाहते हैं। यह शाश्वत सत्य है। यहां मन्त्र यही है कि राष्ट्र और समाज के लिये कुछ कीजिये। यही जीवन को सार्थक बनाता है।

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'बुजुर्ग और युवा'

एक प्रतापी राजा था। उसने बड़ी मेहनत और लगन से अपना राज्य स्थापित किया था। इस कारण उसे राज कार्य से मोह था। उसका युवा पुत्र अब सर्वगुणसंपन्न था और राजा के पद को धारण करने के योग्य था। राजा पुत्र को बच्चा समझता था और मोह के चलते उसे उत्तराधिकारी घोषित नहीं कर रहा था। समस्त मंत्रियों के कहने पर भी राजा नहीं माना। एक दिन उस राज्य के राजगुरु ने राजा को सत्ता हस्तांतरण के लिये कहाण् राजगुरु ने कहा कि यदि समय रहते युवाओं को सत्ता नहीं सौंपोगे तो नष्ट हो जाओगे। अहंकार से भरे राजा ने कहा कि उसने अपनी बुद्धि, तप, श्रम और योग्यता से राज्य को बनाया है। उसका तो यमराज भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसी क्षण आसमान से बिजली गिरी और महल की छत का एक पत्थर राजा के सिर पर आकर गिरा। राजा की मृत्यु हो गई।
कथा विचार करने पर मजबूर करती है। भारतीय परिवारों में क्लेश की एक बड़ी वजह यह भी है कि बुजुर्ग जन रिटायरमेंट लेना ही नहीं चाहते। उम्दराज हो चुके हैं, अपनी पारी खेल चुके हैं लेकिन उन्हें यह विश्वास ही नहीं है कि उनकी संतान अब योग्य हो चुकी है और उस पर भार डालना भी आवश्यक है। अस्सी साल के पार बुजुर्ग व्यक्ति फिक्स्ड डिपोजिट के हिसाबए विवाह में साथियों और वस्त्रों के लेन- देन के हिसाब और किसके ससुराल से कितनी मिठाई आई आदि समीकरणों में उलझे पड़े हैं। अब इन्हें छोडऩे का समय है। यह काम अपने पुत्रों, नाती-पोतों को करने देवें। यदि ऐसा नहीं किया तो पुत्र, पुत्रियां आदि. बुजुर्गों को जबरन रिटायर करके मार्गदर्शक मंडल में बिठा देंगी। यह दर्दनाक होता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि बुजुर्गों का सम्मान न हो। वे देव समान है। उनकी इज्जत करना युवाओं का धर्म है। समस्या सिर्फ यही है कि बुजुर्गों को भी यह समझना चाहिये कि अब स्थान को रिक्त करने का समय आ चुका है। महत्तवपूर्ण मामलों पर परामर्श देवें लेकिन हर छोटी बात में पार्टिसिपेट करना कष्टप्रद हो सकता है। भारतीय समाज में वानप्रस्थ का अर्थ वन में जाना नहीं था। इसका अर्थ था-सत्ता और निर्णय लेने के अधिकारों का हस्तांतरण। यह आवश्यक है। यहां मन्त्र यही है कि युवाओं पर विश्वास
रखें। उनसे गलती हो तो 'शॉक एबजोर्बरÓ बनें। उन्हें सिखायें। गाइड करें। ये सब करें लेकिन समय पर उन पर जिम्मेदारी का बोझ डालना न भूलें। यही परिवार प्रबंध का मूल हैं।

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'कार्यस्थल की आलोचना न करें'

मेरा का भाव होना, संगठन को अपना खुद का संगठन मानना ही अभिप्रेरणा या मोटिवेशन का मर्म है। जब आप यह महसूस करते हैं कि संगठन परिवार की तरह ही है तभी आप उसमे कुछ अच्छा योगदान दे पाते हैं। यह मेरा संगठन है और मैं इस संगठन का जिम्मेदार सदस्य हूं। भारतीय प्रबंध प्रणाली में इसे सर्वोत्कृष्ट मोटिवेशन माना जाता है। भारतीय प्रबंध प्रणाली में मोटिवेशन केवन आंतरिक होता है और यह अन्दर से बाहर की ओर यात्रा करता है। 

संगठन से जुड़ाव अत्यावश्यक है। अपनत्व की कमी के कारण वर्तमान कर्मचारी, संगठन के साथ जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता और डी - मोटिवेट होता जाता है। कर्मचारी अन्यजनों के समक्ष अपने संगठन की बुराई, अपने संगठन की समस्याओं के विषय में बड़े ही आनंद से चर्चा करता है।
जरा सोचिये-
* यदि आप आज अपने संगठन से टूट जायें या निकाल दिए जायें तो आपकी पहचान क्या होगी?
* संगठन को आपकी जरूरत है या आपको संगठन की?
* यदि आपका संगठन इतना ही नाकारा, घटिया और वाहियात है और आप सभी के सामने चटखारे लेकर उसकी बुराई कर रहे हो तो प्रश्न यह है कि आप जैसा श्रेष्ठ, सज्जन, कर्मठ, जीवट महामानव व्यक्ति इस घटिया संस्थान में क्या कर रहा है?
* क्या आप अपने माता पिता, परिवार और घर की आलोचना अन्यों के समक्ष करते हो? क्यों नहीं करते? क्योंकि आप यह जानते हो कि स्वयं के परिवार की आलोचना तो स्वयं की आलोचना है। तो यह बात अपने संस्थान के लिए लागू क्यों नहीं करते?
* जिस संस्थान से हमें समस्त सुख मिलते हैं, जिस संस्थान के कारण हमारी टेबल पर भोजन आता है, हमारे बच्चों की फीस भरी जाते है, हमारे स्नेहीजनो को चिकित्सा सुविधा प्राप्त होती है और हम उसी संस्थान को बुरा कहते हैं?
यहां मन्त्र यही है कि आपको पहचान, पैसा, और सामाजिक इज्जत देने वाला और कोई नहीं बल्कि आपका वही संगठन है जहां आप काम करते हैं। संगठन के हित को ही अपना हित मानें। यही कार्यालय प्रबंध का मर्म है।

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'ईश्वर सर्वश्रेष्ठ मित्र'

एक फार्म में दो घोड़े रहते थे। वे एक से दिखते थे लेकिन उनमे से एक घोड़ा अंधा था। मालिक ने एक दूसरे घोड़े के गले में एक घंटी बांध रखी थी। घंटी की आवाज सुनकर अंधा घोड़ा उसके पास पहुंच जाता और उसके पीछे - पीछे बाड़े में घूमता। घंटी वाला घोड़ा भी अपने अंधे मित्र की परेशानी समझता था और उसका पूरा ख्याल रखता था। वह बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखता और इस बात को सुनिश्चित करता कि कहीं अंधा घोड़ा रास्ता न भटक जाये। वह ये भी सुनिश्चित करता कि उसका मित्र सुरक्षित रहे। 

इसी को कहते हैं 'ईश्वर की मददÓ। ईश्वर कष्ट में पड़े जीव को कभी भी अकेला नहीं छोड़ता। ईश्वर मनुष्य का सबसे अच्छा मित्र होता है। हम भले ही नासमझी में ईश्वर को भला-बुरा कहें लेकिन वो कभी भी, किसी भी स्थिति में हमारा साथ नहीं छोड़ता। यदि कोई मुसीबत है तो वो उसका समाधान अवश्य ही देता है। दृष्टिहीन घोड़े में एक ही कमी थी कि वो देख नहीं सकता था। ईश्वर ने उसे 'अनअटेंडेडÓ नहीं छोड़ा। उसकी समस्या का भी निराकरण किया। उसे मित्र दिया जो उसकी मदद करता था। ईश्वर हमारा पूरा ख्याल रखता हैं। कवि प्रेम भाटिया कहते हैं-
तू मेरा कितना ख्याल रखता है,
मेरे ख्याल का भी ख्याल रखता है,
जमाना कहता है तुझमें बड़ा कमाल है,
मुझे तो सब कुछ ही कमाल लगता है.
हमें जब भी जरुरत होती है, तो वो किसी न किसी को हमारी मदद के लिए भेज देता हैं। कभी-कभी हम वो अंधे घोड़े होते हैं, जो भगवान द्वारा बांधी गयी घंटी की मदद से अपनी परेशानियों से निजात पाते हैं तो कभी हम अपने गले में बंधीघंटी द्वारा यानि अपनी कुशलता द्वारा दूसरों को रास्ता दिखाने के काम आते हैं। यही तो जीवन है। मदद करो और मदद दो। यदि दोनों ही काम न किये तो जीवन का क्या मोल है? यहां मन्त्र यही है कि ईश्वर पर विश्वास रखें। वो गलत नहीं कर सकता। वो जो करता है, सही है। इसी को मानने से जीवन सुखद और संतुलित रहता है।

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'गृहिणी - देश का गौरव'

एक व्यक्ति को कहीं से खजाना मिल गया। उसे लगा कि यदि उसकी पत्नी को यह पता चल गया तो शायद वो सारे मोहल्ले में इसका ढिंढोरा पीट देगी। पत्नियों पर बेकार के चुटकुले पड़-पड़ कर उस व्यक्ति ने यह धारणा बना ली थी कि महिलाएं धन की प्रेमी होती हैं। यह सोच कर उस व्यक्ति ने खजाने को अपने बरामदे मे गाड़ा और फिर उसपर मिट्टी डालने लगा। तभी उसकी पत्नी वहां पहुंची। उसने पूछताछ की तो पति ने खजाने के बारे में बताया। पत्नी का जवाब भारतीय राष्ट्र जीवन की महान परंपरा और गृहिणी के त्याग को दर्शाता है। पत्नी बोली कि 'यह तो अवैध तरीके से कमाया धन है। यह धन हमारे लिये मिट्टी है। आप इस मिट्टी पर और मिट्टी क्यों डाल रहे होÓ? यह है हमारे राष्ट्र की गृहिणी। 

भारतीय गृहिणियों का त्याग, उनका बलिदान, उनकी कार्यक्षमता और अद्भुत श्रम कर सकने की ताकत का तो विदेशी भी लोहा मानते हैं। वर्तमान में अनेकानेक मीडिया साधनों में पत्नियों पर जोक्स, चुटकुले आदि भेजने का चलन या ट्रेंड सा बन गया है। यह सही नहीं है। भारतीय गृहिणियां बचत, सेवा, संस्कार और त्याग की जीवंत देव प्रतिमाएं हैं। यह शाश्वत सत्य भी है। भारतीय समाज में नारी और विशेषतया पत्नी को सदा से ही उच्च स्थान प्राप्त है। सिन्धु घाटी सभ्यता में सर्वाधिक मूर्तियां स्त्रियों की मिली हैं। इतिहासकार कहते हैं कि सिन्धु घाटी सभ्यता मातृसतात्मक थी यानि महिलाओं का प्रभुत्व था। वैदिक काल को खंगालने पर पता चलता है कि महिलाएं सक्रीय रूप से सामजिक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भागीदारी निभाती रही हैं। भारतीय बौद्ध शास्त्रों में गृहिणी या पत्नी के चार रूप बताये गये हैं-
1. मातृसमा अर्थात जो सभी के साथ सद्व्यवहार करे और माता के सामान व्यवहार रखे।
2. भागिनीसमा अर्थात जो सभी से भाई-बहन जैसा स्नेह रखे और सदा अन्यों की प्रसन्नता हेतु स्वयं का सुख न्योछावर करे।
3. चोरसमा अर्थात जो सम्पत्ति केन्द्रित हो और उपभोग करने मात्र को श्रेयस्कर समझे।
4. बधिकसमा अर्थात क्रोधी और अन्यों का अपमान करने को तत्पर।
भारतीय समाज में सिर्फ मातृसमा या भागिनीसमा गृहिणियां होती हैं। विदेशी उपभोक्तावाद से प्रभावित चोरसमा गृहिणियां परिवार को एक सूत्र में पिरो नहीं पाती। वर्तमान समय में यह सोचा जाना अनिवार्य है कि हमारा व्यवहार कैसा है? स्वान्त: सुखाय यानि सिर्फ मैं सुखी हो जाऊं तो विदेशी परम्परा है। यहां मन्त्र यही है कि भारतीय गृहिणी तो आज भी घर, समाज और राष्ट्र के कल्याण को ही सर्वोपरि मानती है। देश के विकास में इनकी सबसे बड़ी भूमिका है।

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'पति, पत्नी और क्रोध'

एक सिद्ध फकीर था। एक दिन फकीर से मिलने एक व्यक्ति पहुंचा। फकीर घर पर नहीं था। उस व्यक्ति ने जब फकीर की पत्नी से फकीर के बारे में पूछा तो पत्नी ने भड़ककर जवाब दिया कि उसका निखट्टू निकृष्ट पति तो जंगल में लकडियां काटने गया है। व्यक्ति को लगा कि इतने सिद्ध फकीर की पत्नी ऐसी कैसे है? वह व्यक्ति फकीर की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। थोड़ी ही देर बाद उसे फकीर नजर आया लेकिन फकीर को देखकर वो व्यक्ति डर गया। फकीर के साथ-साथ एक चीता था जिस पर फकीर ने अपनी लकडिय़ों का ग_र लाद रखा था। व्यक्ति ने फकीर से कहा कि उसकी पत्नी तो उसे निकृष्ट कह रही थी और फकीर तो चमत्कारी है। ऐसा कैसे हुआ? फकीर बोला कि यदि वो अपनी पत्नी के क्रोध और दुव्र्यवहार का बोझ नहीं उठाये तो क्या यह चीता उसके सामान का बोझ उठाएगा? इसका भावार्थ यह है कि चीता इसलिए बोझ उठा रहा है क्योंकि फकीर ने क्रोध पर नियंत्रण कर रखा है। उसका भाव शुद्ध सात्विक निर्मल है। उसके मन में किसी के लिये द्वेष नहीं है। इसीलिए चीता उसका बोझ भी उठा रहा है। 

यही तो सुखी दाम्पत्य का अद्भुत सूत्र है। क्रोध पर नियंत्रण रखने मात्र से नब्बे फीसदी समस्याएं तो वैसे ही समाप्त हो जाती हैं। क्रोध आते ही विचार कीजिये कि यदि भावुकता में जबरदस्त प्रतिक्रिया दे दी जाये तो क्या कुछ फयदा होगा? शायद नहीं। सिर्फ नुकसान होगा। क्लेश बढेगा। छिद्रान्वेषण शुरू हो जायेगा और गलतियां निकालने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जायेगी। सुखी दाम्पत्य के लिये आवश्यक है कि :
* सहन करना सीखिये। उन बातों को सहन कीजिये जिन पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। इसे अन्यथा न लेवें। इसका अर्थ सिद्धांतों से समझौता नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन साथी को हर पल एक कंट्रोलर की तरह कंट्रोल करने की प्रवृत्ति से छुटकारा। कुछ लिबर्टी देंवे अर्थात खुला भी छोड़ें। कुछ गलतियों को नजरअंदाज करना भी सीखें।
* रिश्ते बोझ नहीं हैं। उन्हें ढोने की नौबत न आ जाये। इसके लिये जरूरी है एक दूसरे को समझना, और विपरीत बातों और विचारों को भी अपनाने का प्रयास। असहमति होना आम बात है। असहमत अवश्य होवें। मतभेद भी होने देवें परन्तु असहमति इतनी ज्यादा न बढ़ावें कि ईष्र्या और युद्ध की नौबत आ जावे।
यहां मन्त्र यही है कि दाम्पत्य जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम एक दूसरे के विपरीत विचारों को भी समझें। डिसएग्री (असहमत) होने के लिये एग्री (सहमत) हो जाना और असहमति होने के बावजूद कलह न होने देना ही सुखद दाम्पत्य का प्राण सत्व है।

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'पति, पत्नी और क्रोध'

एक सिद्ध फकीर था। एक दिन फकीर से मिलने एक व्यक्ति पहुंचा। फकीर घर पर नहीं था। उस व्यक्ति ने जब फकीर की पत्नी से फकीर के बारे में पूछा तो पत्नी ने भड़ककर जवाब दिया कि उसका निखट्टू निकृष्ट पति तो जंगल में लकडियां काटने गया है। व्यक्ति को लगा कि इतने सिद्ध फकीर की पत्नी ऐसी कैसे है? वह व्यक्ति फकीर की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। थोड़ी ही देर बाद उसे फकीर नजर आया लेकिन फकीर को देखकर वो व्यक्ति डर गया। फकीर के साथ-साथ एक चीता था जिस पर फकीर ने अपनी लकडिय़ों का ग_र लाद रखा था। व्यक्ति ने फकीर से कहा कि उसकी पत्नी तो उसे निकृष्ट कह रही थी और फकीर तो चमत्कारी है। ऐसा कैसे हुआ? फकीर बोला कि यदि वो अपनी पत्नी के क्रोध और दुव्र्यवहार का बोझ नहीं उठाये तो क्या यह चीता उसके सामान का बोझ उठाएगा? इसका भावार्थ यह है कि चीता इसलिए बोझ उठा रहा है क्योंकि फकीर ने क्रोध पर नियंत्रण कर रखा है। उसका भाव शुद्ध सात्विक निर्मल है। उसके मन में किसी के लिये द्वेष नहीं है। इसीलिए चीता उसका बोझ भी उठा रहा है। 

यही तो सुखी दाम्पत्य का अद्भुत सूत्र है। क्रोध पर नियंत्रण रखने मात्र से नब्बे फीसदी समस्याएं तो वैसे ही समाप्त हो जाती हैं। क्रोध आते ही विचार कीजिये कि यदि भावुकता में जबरदस्त प्रतिक्रिया दे दी जाये तो क्या कुछ फयदा होगा? शायद नहीं। सिर्फ नुकसान होगा। क्लेश बढेगा। छिद्रान्वेषण शुरू हो जायेगा और गलतियां निकालने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जायेगी। सुखी दाम्पत्य के लिये आवश्यक है कि :
* सहन करना सीखिये। उन बातों को सहन कीजिये जिन पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। इसे अन्यथा न लेवें। इसका अर्थ सिद्धांतों से समझौता नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन साथी को हर पल एक कंट्रोलर की तरह कंट्रोल करने की प्रवृत्ति से छुटकारा। कुछ लिबर्टी देंवे अर्थात खुला भी छोड़ें। कुछ गलतियों को नजरअंदाज करना भी सीखें।
* रिश्ते बोझ नहीं हैं। उन्हें ढोने की नौबत न आ जाये। इसके लिये जरूरी है एक दूसरे को समझना, और विपरीत बातों और विचारों को भी अपनाने का प्रयास। असहमति होना आम बात है। असहमत अवश्य होवें। मतभेद भी होने देवें परन्तु असहमति इतनी ज्यादा न बढ़ावें कि ईष्र्या और युद्ध की नौबत आ जावे।
यहां मन्त्र यही है कि दाम्पत्य जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम एक दूसरे के विपरीत विचारों को भी समझें। डिसएग्री (असहमत) होने के लिये एग्री (सहमत) हो जाना और असहमति होने के बावजूद कलह न होने देना ही सुखद दाम्पत्य का प्राण सत्व है।

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'गैली बहू'

दादा- दादी के साथ खेलना और सीखना नब्बे फीसदी अंक लाने से भी ज्यादा जरूरी है। जो वे सिखायेंगे, वे शायद किताबें न सिखा सकें। जीवन जीने का सलीका संयुक्त परिवार सिखाता है। कहीं आप 'गैली बहू' यानि मूर्ख बहू बनकर संयुक्त परिवार को जाने या अनजाने में तोड़ तो नहीं रही हैं? 

जरा इन प्रश्नों पर गौर कीजिये.
* क्या आप रोजाना नियम से तीन से चार बार अपनी माताजी से फोन पर या सोशल मीडिया पर बातचात करती हैं?
* क्या आप अपने पीहर वालों के साथ अंतहीन गपशप करते हुए उन्हें जेठ-जेठानी की लड़ाई, ननद के लिये आये रिश्ते की डीटेल्स, भोजन का मेन्यू, सास की प्रत्येक बात आदि घरेलू बातें बताती हैं?
* क्या आप अपने सास-ससुर के साथ खेल रहे बच्चों को देखकर यह सोचती हैं कि यह सब बेकार है और अध्ययन करना ही श्रेष्ठ है?
यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर हां है तो आप 'गैली बहू' का खिताब जीत सकती हैं. ऊपर लिखे सारे काम 'गैली बहुओंÓ के हैं. परिवार की निजता बचाना आपके हाथ में हैं. अपने माता-पिता, पीहर के सदस्यों से भरपूर प्रेम रखें लेकिन ये न भूलें कि अब पति का घर ही आपकी कर्मभूमि है. परिवार की निजी बातों को बताने से आपके पीहर वालों को लगेगा कि आप बहुत ही दुखी हैं. प्रत्येक मां को यह लगता है कि ससुराल में उसकी बेटी दुखी है. ऊपर से आपकी मूर्खतापूर्ण गपशप परिवार का विनाश करने को काफी है. इन सब पर कोढ़ में खाज है सोशल मीडिया. आपने अपनी मौसी की लडकी का व्हाट्सएप स्टेटस देखा जिसमे फोटो के साथ लिखा है 'एन्जोयिंग एट खजियारÓ. अब यह देखते ही आपने अपने पति की शिकायत अपनी मां और अनेकानेक लोगों से कर दी.
जरा सोचिये, इससे क्लेश और कष्ट के अलावा क्या प्राप्त हो सकता है? गैली बहू न बनकर सुघ? बहू बनें जिसके निम्नलिखित लक्षण हैं-
* घर की समस्याएं चारदीवारी के अन्दर ही रखें.
* बच्चों पर यह अधिकार न जतायें कि वे आपकी संतान हैं. दादा-दादी, काका-काकी के लिये भी स्कोप छोडिये.
* अपने ससुराल की जितनी ज्यादा चर्चा आप अपनी माँ के साथ करेंगी, पति और ससुराल से उतनी ही दूर होती चली जायेंगी.
यहां मन्त्र यही है कि सभी कपडे सार्वजनिक स्थान पर धोये या सुखाये नहीं जा सकते. कुछ कपड़ों को सिर्फ बाथरूम में ही सुखाया जाता है. घर की निजी बातों को बाहर कहने से परिवार टूटते हैं. इसे रोकिये वरना दाम्पत्य जीवन और घर-नरक सामान हो जायेगा. यह कठोर कटु सत्य है।

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'पर्यावरण संरक्षण और भारतीय चिंतन'

यह 'गुरु मन्त्र' स्तम्भ का तीन सौवां (300 वां) लेख है। डॉ. गौरव बिस्सा के नियमित लेखनीय प्रयास के लिए दैनिक नेशनल राजस्थान परिवार उनका आभार व्यक्त करता है।

प्राचीन ग्रंथों में छिपे हैं पर्यावरण संरक्षण सिद्धांत-
घास का तिनका कैसे उगता है? एक सात वर्षीय बालक को इसका उत्तर देना विद्वानों के लिए भी मुश्किल है। एक घास के तिनके को उगाने के लिए पूरी सृष्टि अपना अतुलनीय योगदान देती है। मिट्टी या पृथ्वी में फूटा अंकुर, जल से सिंचित होकर सूर्य की रोशनी से परिपक्व होता अंकुर, प्राणवायु के सहयोग से आकाश की ओर बढ़ता है। समूचे पञ्च महाभूतों के योगदान से एक तिनका उगता है। इस एक तिनके को अनुपम ईश्वरीय कृति मानकर उसका संरक्षण करना ही हमारे राष्ट्र जीवन की परंपरा है। जब सभी देवताओं की अनुपम कृति एक पौधा है। उसका फल अर्थात अन्न का एक दाना ईश्वरीय अंश है, देव तुल्य है और यही हमारे देश की थाती है। ऋग्वेद में समूचे जगत और पर्यावरण के संतुलन का दायित्व मित्र, वरुण, इंद्र, मरुत और आदित्य आदि देवों का माना गया है।
पर्यावरण का प्रभावी संरक्षण और उसे कदापि हानि न पहुंचाने का सम्पूर्ण विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में समझाया गया है। ऋग्वेद का सन्देश है 'मित्रस्यहम चक्षुषा सर्वानि भूतानि समीक्षेÓ अर्थात हम प्रकृति की समूची कृतियों को मित्र की दृष्टि से देखें। ऋग्वेद में अश्विन से प्रार्थना में उनका आभार जताते हुए कहा गया है कि है कि हमें सूर्य की अत्यंत घातक हानिकारक किरणों तथा ताप से बचाने हेतु आपने जो संरक्षण प्रदान किया उसके हम ऋणी हैं। यह वर्तमान ओजोन परत के सिद्धांत से जुड़ता प्रतीत होता है। चारों वेदों में मनुष्यों द्वारा प्रकृति से की गयी छेड़छाड़ के कारण बिगड़ते ऋतु चक्र का वर्णन है।
अथर्व वेद के पृथ्वी सूक्त में 'माँ भूमि: पुत्रोहम पृथ्विया:Ó अर्थात मैं पृथ्वी माता का पुत्र हूं और समस्त वन और वनस्पति माता का उपहार है। पर्वतों के संरक्षण, जल के विवेकपूर्ण उपयोग, मृदा संरक्षण पर वेदों में प्रार्थनाएं हैं।
पंचवटी रखेगी सभी को नीरोग-
भगवान श्रीराम ने वनवास के चौदह वर्ष पूर्ण स्वस्थ और नीरोग रहते हुए बिताये। इसका मूल मन्त्र भी पर्यावरण के वैज्ञानिक सिद्धांतों की श्रेष्ठ क्रियान्विति थी। भगवान श्रीराम अपने चौदह वर्ष के वनवास में काफी समय पंचवटी में रहे। स्कन्द (स्कन्न) पुराण के हिमाद्रीय व्रत खंड के अनुसार पंचवटी अर्थात सुनिश्चित दूरी पर लगाए गए पांच वृक्षों का समूह है। पंचवटी का विशिष्ट वैज्ञानिक, औषधीय और पौराणिक महत्त्व है। पूर्व दिशा में पीपल, पश्चिम दिशा में बरगद, दक्षिण दिशा में आंवला, उत्तर दिशा में बेल और दक्षिण-पूर्व दिशा में अशोक के वृक्ष लगाने की वैज्ञानिक क्रिया ही पंचवटी है। सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोध के अनुसार-
* पीपल 1800 किलोग्राम ऑक्सीजन प्रति घंटे की दर से उत्सर्जन करता है।
* बरगद प्राकृतिक वातानुकूलन (एयर कंडिशनर) के रूप में कार्य करता है।
* विटामिन सी से भरपूर आंवला रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है।
* बेल पाचन तंत्र सुधारता है।
* अशोक वृक्ष महिलाओं को नीरोग रखता है।
प्राचीन इतिहास में पर्यावरण संरक्षण सन्देश : राजा परिवल्लाल की कथा
पर्यावरण प्रेम का सर्वोकृष्ट उदाहरण हमारे प्राचीन इतिहास में चोल राजा परिवल्लाल का है। राजा परिवल्लाल अपने कुशल नेतृत्व, पारदर्शिता और बेहतरीन निर्णय क्षमता हेतु विख्यात थे। एक दिन वन में अपने रथ को एक स्थान पर छोड़कर किसी सन्यासी से मिलने पहुंचे। वापस लौटने पर उन्होंने देखा कि दो छोटी लताएं (बेल) उनके रथ के पहिये से सर्पिलाकार आकार में जुड़ गई। रथ चलने से दोनों लताएं टूट जाती। राजा परिवल्लाल रथ वहीं छोड़कर, वहां से पैदल लौटे। उन्होंने सारथी से कहा कि वृक्ष, फूल और लताएं ईश्वर का अंश हैं, जीवन देने वाली संपत्ति हैं और इनका संरक्षण प्रत्येक राजा का कर्तव्य है। यह निर्णय सही है या नहीं; मूल बात ये नहीं है। मूल विषय राजा परिवल्लाल का पर्यावरण प्रेम, कर्तव्यपरायणता और संस्कार है जो हमें सोच की नई दिशा देता है। यह घटना हमारे राष्ट्र नायक की सोच और दूरदृष्टि को दर्शाती है।
सस्टेनेबल डेवलपमेंट : हमारे राष्ट्र जीवन की परम्परा
पर्यावरण संरक्षण के साथ सस्टेनेबल डेवलपमेंट (संपोषणीय विकास) की चर्चा वर्तमान में होती रही है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का उद्भव और विकास भारत में ही हुआ है। हमारे गौरवशाली देश ने कभी भी भोगवादी संस्कृति को श्रेष्ठ नहीं माना। 'तेन तक्तेन भुंजीथाÓ अर्थात प्रत्येक वस्तु का त्यागपूर्वक उपभोग करना हमारे देश की परंपरा है। 'जितना मुझे चाहिये, मैं प्रकृति से उतना ही लूं और शेष प्रकृति को लौटा दूंÓ। यह हमारी जीवन शैली है। वर्तमान भौतिक युग में उपभोक्तावाद की संस्कृति हावी है जो अत्यधिक मात्र में संग्रहण, अथाह धन के खर्च, आवश्यक ना होने पर भी खरीद और बिना बात ही पुरानी वस्तु को त्याग नई वस्तु खरीदने को प्रेरित करती है। ऐसा करने पर पुरानी वस्तुओं का कबाड़ इकठ्ठा होता जाता है, उनके निर्माण में लगा श्रम व्यर्थ जाता है और पर्यावरण को हानि होती है। हमारी वैदिक संस्कृति 'अपरिग्रहÓ अर्थात आवश्यकता से अधिक का संग्रह न करने और जितना प्राप्त हो, उससे ज्यादा लौटाने में विश्वास करती है। इसे समझिये। आपके पास एक मोबाइल है। ठीक चल रहा है। आपने विज्ञापनों के प्रभाव या स्टेटस सिम्बल के चलते उसे रखकर नया मोबाइल ले लिया। अब पुराने मोबाइल का क्या? उसे बनाने में, उसकी तकनीक विकसित करने में, हजारों लोगों का श्रम लगा था। आपने एक पल में ही इसे त्याग दिया। अब वो मोबाईल कबाड़ है। यह पाश्चात्य सभ्यता है। इसे छोडऩे की प्रेरणा भारतीय शास्त्र देता है।

वृक्षों से सीखें जीवन का मैनेजमेंट :
हमारे देश में तो सदैव वृक्षों से जीवन प्रबंध सीखने की बात कही गयी है। मनुष्यों को वृक्षों की मति अर्थात सीख लेने को कहा गया है।
* जितना बड़ा वृक्ष उतनी ज्यादा छाया अर्थात समाज में उच्च स्थान मिल जाने पर भी जगत कल्याण का भाव।
* वृक्ष सभी को सामान छाया देता है और लिंग, जाति, सम्प्रदाय से परे है। मनुष्य भी परोपकारी भाव से सभी का हित करे।
* वृक्ष पर जितने ज्यादा फल उतना ही नीचे की ओर झुकाव अर्थात अहंकार के भाव को त्यागना और समाज के अंतिम व्यक्ति का विकास।
* वृक्षों पर फलों के लिए मारे जाने वाले पत्थर का भी प्रेम से स्वागत कर मीठे फल देने की प्रकृति अर्थात निंदकों और आलोचकों का भी हित करने का भाव।
* वृक्षों द्वारा पतझड़ के बाद नए पत्तों का उगना अर्थात पुराने विचारों को त्यागकर नए और आधुनिक विचारों को जीवन में स्थान देना व रूढि़वादी नहीं होना।
यही तो चेंज मैनेजमेंट है। यही तो जीवन का मर्म है। वृक्षों से सीख ले लेवें तो हमारा जीवन सफल होना निश्चित है।
वेद , पुराण , उपनिषद, ज्ञानी जन कुछ भी कहें और भले ही हमारी परम्परा गौरवशाली हो; इतना ही काफी नहीं है। मूल प्रश्न है क्रियान्विति। जरा सोचिये कि :
* क्या मैं पर्यावरण संरक्षण मिशन का हिस्सा बनना चाहता हूँ?
* क्या मैं अपने आसपास के इलाके में वृक्षारोपण करूंगा और करवाऊंगा?
* क्या मैं प्रतिवर्ष अपने जन्मदिन, विवाह वर्षगाँठ पर पौधा लगाऊंगा और उपहार स्वरुप दूंगा?
* क्या मैं आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करके महात्मा गांधी के सिद्धांतों का वाहक बनूंगा?
यहाँ मन्त्र यही है कि यदि इन सभी पर हमारी सोच सकारात्मक है तो निश्चित रूप से हम प्रभावी संरक्षण कर अपनी आने वाली पीढिय़ों को सुन्दर पर्यावरण का तोहफा दे पायेंगे।

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