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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (57)

'हारिये न हिम्मत'

एक वैज्ञानिक ने एक पानी की टंकी में शार्क छोड़ी। कुछ समय बाद वैज्ञानिक ने उस टंकी में एक छोटी मछली को छोड़ा। शार्क ने तुरंत छोटी मछली पर आक्रमण किया और उसे खा गई। थोड़ी देर बाद वैज्ञानिक ने उस टंकी के बीचों बीच एक ग्लास की मोटी शीट लगा कर उस टंकी को दो भागों में बाँट दिया। अब टंकी के एक भाग में शार्क थी और दूसरा भाग खाली था। वैज्ञानिक ने खाली भाग में एक छोटी मछली डाली। मछली देख शार्क ने आक्रमण प्रारम्भ किया लेकिन शार्क हर बार ग्लास की शीट से टकरा जाती और मछली खाने में असफल रह जाती। अब वैज्ञानिक ने टंकी में से ग्लास की शीट को हटा दिया। वैज्ञानिक अब यह देखकर आश्चर्यचकित था कि शार्क अब उस छोटी मछली पर आक्रमण कर ही नहीं रही थी। यहां ये सिद्ध हुआ कि शार्क हिम्मत हार गई। शार्क ने मानसिक पराजय स्वीकार कर यह सोच लिया कि अब वो उस छोटी मछली को नहीं खा सकती। इसी को "मेंटल बेरियर" कहते हैं। 

इस कथा से हमें यह समझना चाहिये कि:
* वास्तविक बाधाएं सिर्फ मानसिक ही होती हैं। यदि आपके मस्तिष्क ने यह ठान लिया है कि अमुक कार्य असम्भव है तो वो असम्भव ही होगा।
* मेंटल बेरियर्स वे बाधाएं होती हैं जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं होती हैं लेकिन मस्तिष्क में होती हैं। इसका अर्थ है कि उसे भी बाधा मान लेना जो वास्तव में है ही नहीं। मैनेजमेंट एक्सपर्ट्स "मेंटल बेरियर्स" को सबसे खतरनाक बाधा मानते हैं।
* हार मान लेने का भाव ही संसार का सबसे घटिया भाव है। यहां शार्क ने मानसिक रूप से हार मान ली। हार मान लेना ही व्यक्ति की मानसिक मृत्यु होना होता है। अत: जीवन की मुश्किल परिस्थितियों से जमकर लडिय़े।
* आप और हम जब भी पराजित या असफल होते हैं तो भावनात्मक रूप से टूटा हुआ महसूस करते हैं। इस कारण आगे प्रयास करना ही बंद कर देते हैं। प्रयास किये बिना कुछ भी प्राप्त हो नहीं पाता। अंतत: हम परास्त मानसिकता के शिकार होकर हिम्मत हार जाते हैं।
यहां मन्त्र यही है कि हिम्मत हार जाना कायरता का संकेत है। हिम्मत हारना तो अपराध है। हिम्मत हारकर बैठना और खुद को कोसना - स्वयं का, परिवार का, समाज का और ईश्वरीय सत्ता का अपमान है। इससे बचिये। हार से जमकर लडऩे वाले हिम्मती व्यक्तियों को मंजिल मिलना तय है। यही सेल्फ मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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'बहानासाइटिस'

एड्स, कैन्सर और हार्ट अटैक से भी भीषण बीमारी है - बहानासाईटिस.। बहानासाईटिस बीमारी के लक्षण हैं - बहाने बनाना, अपनी असफलता हेतु अन्यों को दोष देना, कुंठाग्रस्त होकर अपनी विफलता के लिये भाग्य को कोसना और सदा कुढ़ते रहना। यदि बुरा वक्त आ जाये तो बहाने नहीं बनायें। ऐसा नहीं सोचें कि बुरा वक्त सिर्फ आपका ही आया है। आप अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिसे मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया है। मुश्किल काल में अपने आस पास देखें कि अन्य कई व्यक्तियों के जीवन में भी मुश्किलें आई हैं। आवश्यक नहीं है कि सौभाग्यशाली या 'चांदी का चम्मच लेकर जन्मेÓ लोग ही सफल हुए हैं। असफलता को चुनौती मानकर उससे डटकर मुकाबला करने वालों की भी संसार में कमी नहीं है। अत: बहाने बनाने छोडिये। मुश्किलों से जमकर लडिय़े और विजयी बनिये।

जरा सोचिये -
* अनेकानेक बार चुनाव हारने और व्यावसायिक असफलता के बावजूद ट्रुमेन निराश नहीं हुए और अमरीका के राष्ट्रपति बने।
* उत्पीडन का शिकार होने के बावजूद ओपेरा महान उदघोषक बनी।
* निराशा के कारण आत्महत्या का विचार कर चुके स्वामी प्रेम आनंद रामकृष्ण परमहंस के समझाने पर बेहतरीन साहित्यकार बन गये।
* फ्रेंक्लिन रूजवेल्ट ने व्हील चेयर पर होने के बावजूद अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में सेवायें दी।
इन उदाहरणों से साफ है कि सफल वही हुए हैं जिन्होंने जीवटता से जीवन का संग्राम लड़ा और कभी भी बहानासाईटिस की बीमारी से ग्रस्त नहीं हुए।
क्या आप इन वाक्यों का प्रयोग करते हैं?
* देखते हैं।
* कल बात करते हैं।
* इसपर कमेटी बना देते हैं।
* मेरा तो भाग्य ही खोटा है।
यदि आप इन वाक्यों का प्रयोग करते हैं तो आप बहानासाईटिस बीमारी से ग्रस्त हैं। इस बीमारी से बचने हेतु :
* अपनी मुसीबतें अन्यों पर या भाग्य पर थोपना बंद कर दीजिये। आज से ही अमल कीजिये।
* अपने भाग्य को स्वीकारिये। प्रतिकूल परिस्थिति को स्वीकारिये। ये जीवन का अंग है।
* विकटतम परिस्थितियों में जीवटता से जमे रहिये।
* स्वयं की मदद स्वयं करें। अन्य मदद करेंगे, ये भाव बेकार है।
यहां मन्त्र यही है कि अपनी ताकत पर भरोसा रखकर समस्त समस्याओं का हल निकालने का प्रयास ही मैनेजमेंट का प्राण तत्व है।
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या दोस्त;
दीवारों में ही तो दरवाजे निकाले जाते हैं।

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'मेन्टल ब्लॉकेज'

मेन्टल ब्लॉकेज वर्तमान समय की बहुत बड़ी समस्या है. मेन्टल ब्लॉकेज का अर्थ है मस्तिष्क को एक दिशा में ही सोचने हेतु मजबूर करना, अपनी कार्यविधि को ही श्रेष्ठ मानना और विरोधी विचारधारा को बिलकुल स्वीकार न करना. यह गलत है. हाल ही में मैं अपने मित्र के घर गया. उसकी पुत्री ने मुझसे कहा कि वो अपने कमरे और स्टडी टेबल को सही ढंग से रखने का बहुत प्रयास करती है लेकिन दो दिन बाद ही कमरा वापिस अस्त व्यस्त हो जाता है. मैंने उसके कमरे में पड़ी एक पुस्तक को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया. ऐसा करते ही वो तुरंत बोली कि यह तो गलत है. ऐसा कहकर उसने पुस्तक को वापिस अपने द्वारा तय किये गये स्थान पर रख दिया. अब मैंने उसे समझाया कि उसने अपने मस्तिष्क में यह तय कर लिया है कि किस वस्तु को कहाँ रखना है. जब ऐसा नहीं हो पाता तो उसे लगता है कि सब अस्त व्यस्त है. अत: इससे बचे. मस्तिष्क को नया प्रयोग करने दे. जरूरी नहीं कि जो वो सोचती है, वही सही हो. अस्त व्यस्त कमरा नहीं अपितु हमारा मस्तिष्क है. इसपर सोचे. 

हमारी मूल समस्या यही है कि हमने अपने मस्तिष्क को एक ही प्रकार से कंडीशन कर दिया है. यह आवश्यक कतई नहीं है कि जिसे आप सही समझते हों या जो आपका निजी दृष्टिकोण हो, वही शाश्वत सत्य भी हो. मस्तिष्क को नये तरीकों से विचार करने दीजिये. क्या आप जानते हैं कि :
*आपका मस्तिष्क लगभग छ हजार मील जितनी लम्बी वायरिंग के रूप में गुंथे न्यूरोन्स के माध्यम से कम्युनिकेट करता है.
• आपका तंत्रिका तंत्र लगभग 28 लाख न्यूरोन्स से बना है जो शरीर के किसी भी भाग की सूचना को मात्र 20 मिलीसेकेंड में मस्तिष्क को पहुंचा देते हैं.
• आपका मस्तिष्क कई सुपर कम्प्यूटर्स से भी ?्यादा ते? और बेहतर है क्योंकि वो 30 लाख बिट्स की सूचना एक सेकंड में याद रख लेता है.

अब ?रा सोचिये:

• ईश्वर द्वारा दिये गये इस अनमोल तोहफे का क्या आप सही इस्तेमाल कर रहे हैं?
• कहीं आपने अपने मस्तिष्क में कुत्सित और घृणित विचार तो नहीं भर दिये हैं?
• क्या आप विरोधी विचारों को सहन करते हैं?

इनपर विचार करें और मस्तिष्क को खुला रखें. नये विचारों को ग्रहण करें. "सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार मेरे पास आते रहें" – भारतीय शास्त्र के इसी वाक्य को अपना आदर्श मानें. नया सीखना ही जीवन है अत: मेन्टल ब्लॉकेज से बचिये.

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'दिमाग में पड़े पत्थर'

एक अध्यापक सड़क किनारे बैठा जोर - जोर से हंस रहा था। लोग आश्चर्यचकित होकर उसे देख रहे थे। जब लोगों ने उसके हंसने का कारण पूछा तो उसने सभी से प्रश्न किया कि सामने कितने पत्थर पड़े हैं? सभी ने कहा कि वहां एक पत्थर पडा है। यह सुनकर वो फिर हंसने लगा। उसने हंसते - हंसते कहा कि वहां तो दो पत्थर हैं। लोगों को लगा कि वो मानसिक संतुलन खो चुका है। ऐसे में एक व्यक्ति ने हिम्मत करके पूछा कि जब वहां एक ही पत्थर है तो वो उसे दो पत्थर क्यों कह रहा है? अध्यापक ने जवाब देते हुए कहा कि एक पत्थर तो वास्तविक पत्थर है जो यहाँ पडा है और सभी को दिख रहा है। लेकिन दूसरा पत्थर सभी लोगों की अक्ल पर पडा हुआ है। उस अध्यापक ने कहा कि इस रास्ते से सैकड़ों लोग गये, उन्हें पत्थर से ठोकर लगी लेकिन किसी ने भी इस पत्थर को हटाने की कोशिश नहीं की। अक्ल पर पड़े पत्थर को क्या पत्थर नहीं कहेंगे? क्या जो दिखता है वही सत्य है? क्या अदृश्य बाधाओं और समस्याओं को नहीं देखना चाहिये? क्या प्रत्येक व्यक्ति जिसे पत्थर से ठोकर लगी उसे पत्थर हटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिये? कॉर्पोरेट जगत की सबसे बड़ी समस्या – अदृश्य बाधाओं को नहीं देख पाना। दृश्य बाधाएं और समस्याएँ तो नजर आ जाती हैं। बात तो तब है जब आप अदृश्य को भी देख सकने का माद्दा रखते हों। इसी को मैनेजमेंट में सुपर विजऩ कहते हैं जिसका अर्थ है सुपीरियर विजऩ या उसे भी देख लेना जिसे अन्य नहीं देख सकें। आपको याद रखना चाहिये कि छिपी हुई बाधाओं और समस्याओं का निराकरण ही प्रगति के मार्ग खोलता है। इसी को मैनेजमेंट में 'रूट कॉज़ एनेलिसिसÓ कहते हैं। इसका अर्थ है समस्या की जड़ में पहुंचना और फिर इसका स्थायी समाधान ढूंढना। यदि इस समय आप रोगी को ठन्डे पानी में बैठा देंगे तो इसका नतीज़ा आप समझ सकते हैं। अत: 'रूट कॉज़ एनेलिसिसÓ आवश्यक है। यहाँ मन्त्र यही है कि सबसे पहले अदृश्य छिपी वास्तविक समस्या को पहचानो और उसका समाधान खोजो। कई बार वास्तविक समस्या कुछ और होती है लेकिन दिमाग में पड़े पत्थरों के कारण हम उसकी जड़ तक नहीं पहुँच पाते। समस्या का समाधान निकालिये और जड़ तक जाने का प्रयास कीजिये। यही जीवन है।

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'संतुलित अर्थ पिशाच'

एक उद्योगपति था। उसने अरबों रुपया कमाया। जब वो मरने वाला था तो उसने अपने सेक्रेटरी को बुलाकर पूछा कि वो अगले जन्म में अमीर उद्योगपति बनना चाहेगा या उस अमीर उद्योगपति का सेक्रेटरी? सेक्रेटरी ने जवाब दिया कि वो तो सेक्रेटरी ही बनना चाहता है। सेक्रेटरी ने कहा कि वो देख रहा है कि उद्योगपति पिछले चालीस सालों से सिर्फ धन कमाने में लगा है। इसके अलावा क्या कमाया? क्या परिवार को, समाज को समय दे पाया? यदि ऐसा नहीं कर पाया तो उद्योगपति बनने से क्या लाभ हुआ? इस बात को सुनकर उस उद्योगपति को मरते - मरते ज्ञान प्रात हो गया।
धन के लिये आप दिन - रात बहुत दौड़ लगा रहें हैं लेकिन उस दौड़ के समाप्त होने पर कहाँ पहुँच पाये हैं? पैसे की, यश प्राप्ति की, समाज पर अपनी धाक जमाने की अंधी दौड़ से क्या प्राप्त होगा? कहीं उस उद्योगपति की भांति आपका जीवन भी असंतुलित तो नहीं रह गया? दिन रात लालच, एक रूपए को दो रुपया बनाने का जुनून कहीं आपके व्यक्तित्व को असंतुलित न कर दे? यदि आपके पास आपके माता-पिता, पत्नी, और बच्चों के लिये समय नहीं है तो इस धन का क्या मोल? विचार कीजिये। क्या आपके पास मित्रों की अंतहीन सूची है? क्या आपके एक कहे पर बीस मित्र आपकी मदद हेतु आगे आयेंगे? यदि ऐसा नहीं है तो आप सिर्फ एक असंतुलित अर्थ पिशाच हैं। आप वास्तव में संतुलित जीवन नहीं जी रहे हैं।
अधिकांश व्यक्ति असंतुलित जीवन जीते - जीते ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं। कहीं आप भी धन की अंधी दौड़ के चलते चिंता, क्लेश और ईष्या रूपी जंजालों में फंस चुके हैं? जरा विचार अवश्य कीजिये। चिंताएं आपको मनोरोगी बना देंगी। आप एक शुद्ध सार्थक जीवन नहीं जी पायेंगे। जीवन में संतुलन का होना आवश्यक है। आप जो आज कर रहे हैं, उससे आपके भविष्य का निर्माण होता है। अत: धन मात्र के संचय पर ही स्थान न देवें। धन के साथ साथ परिवार, सामाजिक नेटवर्क और प्रेमीजनों का भी विशेष ध्यान रखें। ऐसा नहीं करने पर आप एक धन कमाने वाले रोबोट से ज्यादा कुछ नहीं होंगे। याद रखें, कि रोबोट्स के अंतिम संस्कार में कोई नहीं जाता। यह मार्मिक सन्देश समझना ही प्रभावी सेल्फ
मैनेजमेंट है।

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'मेन्टल ब्लॉकेज'

मेन्टल ब्लॉकेज वर्तमान समय की बहुत बड़ी समस्या है। मेन्टल ब्लॉकेज का अर्थ है मस्तिष्क को एक दिशा में ही सोचने हेतु मजबूर करना, अपनी कार्यविधि को ही श्रेष्ठ मानना और विरोधी विचारधारा को बिलकुल स्वीकार न करना। यह गलत है। हाल ही में मैं अपने मित्र के घर गया। उसकी पुत्री ने मुझसे कहा कि वो अपने कमरे और स्टडी टेबल को सही ढंग से रखने का बहुत प्रयास करती है लेकिन दो दिन बाद ही कमरा वापिस अस्त व्यस्त हो जाता है। मैंने उसके कमरे में पड़ी एक पुस्तक को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया। ऐसा करते ही वो तुरंत बोली कि यह तो गलत है। ऐसा कहकर उसने पुस्तक को वापिस अपने द्वारा तय किये गये स्थान पर रख दिया। अब मैंने उसे समझाया कि उसने अपने मस्तिष्क में यह तय कर लिया है कि किस वस्तु को कहाँ रखना है। जब ऐसा नहीं हो पाता तो उसे लगता है कि सब अस्त व्यस्त है। अत: इससे बचे। मस्तिष्क को नया प्रयोग करने दे। जरूरी नहीं कि जो वो सोचती है, वही सही हो। अस्त व्यस्त कमरा नहीं अपितु हमारा मस्तिष्क है। इसपर सोचे।
हमारी मूल समस्या यही है कि हमने अपने मस्तिष्क को एक ही प्रकार से कंडीशन कर दिया है। यह आवश्यक कतई नहीं है कि जिसे आप सही समझते हों या जो आपका निजी दृष्टिकोण हो, वही शाश्वत सत्य भी हो। मस्तिष्क को नये तरीकों से विचार करने दीजिये। क्या आप जानते हैं कि :
*आपका मस्तिष्क लगभग छ हजार मील जितनी लम्बी वायरिंग के रूप में गुंथे न्यूरोन्स के माध्यम से कम्युनिकेट करता है।
* आपका तंत्रिका तंत्र लगभग 28 लाख न्यूरोन्स से बना है जो शरीर के किसी भी भाग की सूचना को मात्र 20 मिलीसेकेंड में मस्तिष्क को पहुंचा देते हैं।
* आपका मस्तिष्क कई सुपर कम्प्यूटर्स से भी ज्यादा तेज और बेहतर है क्योंकि वो 30 लाख बिट्स की सूचना एक सेकंड में याद रख लेता है।
अब जरा सोचिये :
* ईश्वर द्वारा दिये गये इस अनमोल तोहफे का क्या आप सही इस्तेमाल कर रहे हैं?
* कहीं आपने अपने मस्तिष्क में कुत्सित और घृणित विचार तो नहीं भर दिये हैं?
* क्या आप विरोधी विचारों को सहन करते हैं?
इन पर विचार करें और मस्तिष्क को खुला रखें। नये विचारों को ग्रहण करें। 'सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार मेरे पास आते रहेंÓ भारतीय शास्त्र के इसी वाक्य को अपना आदर्श मानें। नया सीखना ही जीवन है अत: मेन्टल ब्लॉकेज से बचिये।

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लक्ष्य संधान

* क्या आप प्रतिदिन अपनी ऊर्जा का पच्चीस प्रतिशत हिस्सा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु खर्च करते हैं।
* क्या आप प्रति पल यह हिसाब लगाते हैं कि आपके द्वारा किया गया कोई भी कार्य आपको आपके लक्ष्य के पास ले जाये।
* क्या आप अपने लक्ष्यों की सूची सदा अपने पास रखते हैं।
* क्या आप भावनात्मक रूप से अपने लक्ष्य से जुड़े हैं।
यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर ''नाÓÓ है तो यह तय है कि आप अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ कार्य में नहीं जुटे हैं। लक्ष्य संधान करने हेतु आपको सम्पूर्ण निष्ठा के साथए अंतरात्मा के साथ लक्ष्य संधान हेतु जुटना पडेगा। स्वर्ग किसी का बाहें फैलाये इंतजार नहीं करता। अपना स्वर्ग स्वयं अपनी शक्ति से बनाना होता है। लक्ष्य संधान हेतु जुटे रहना पड़ता है। यदि आप लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं तो इस सीढ़ी या पांच स्टेप्स का प्रयोग करें:
* लक्ष्य निर्धारण और लेखन : जो आप वास्तव में चाहते हों, उसे लक्ष्य मानें। उसको लिखें। बिना लिखा लक्ष्य उसी वार्तालाप की तरह होता है जिसे आप कुछ दिनों में भूल जाते हैं। बिना लिखा लक्ष्य अस्पष्ट और शक्तिहीन होता है। लिखित लक्ष्य को पडऩा संभव है और वह प्रेरित भी करता है।
* लक्ष्य प्राप्ति डेडलाइन बनाना : डेडलाइन का दबाव कार्य की गति को आश्चर्यजनक रूप से बड़ा देता है। अत: प्रत्येक कार्य के सामने यह लिखना न भूलें कि इसे कब तक संपन्न करना है। यही तिथि डेडलाइन है।
* कार्य के छोटे टुकड़े करें : डेडलाइन बनाने के बाद कार्य को अत्यंत ही छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट लेवें। यह स्विस चीज टेक्नीक है। इसमें प्रत्येक बड़े कार्य को छोटे टुकड़ों में बांट दिया जाता है। ऐसा करने से वो बड़ा काम आसान लगने लगता है।
* लक्ष्य प्राप्ति हेतु या कार्य संपन्न करने हेतु आपको जिन-जिन संसाधनों की जरुरत होगी उसकी सूची भी तैयार कर लेवें। ''एवरीथिंग शुड बी एट रीचÓÓ का सिद्धांत अपनाएँ।
* लक्ष्यों को प्राथमिकता के आधार पर जमायें और तुरंत क्रियान्विति प्रारम्भ करें।
यहां मन्त्र यही है कि 365 दिन लक्ष्य संधान हेतु कुछ न कुछ करते रहने से आप एक लय में आ जाते हैं। यह लय आपको आंतरिक रूप से प्रेरित करती है। इसी सकारात्मक ऊर्जा व प्रेरणा से आप लक्ष्य का संधान कर लेते हैं। यही लक्ष्य संधान का मन्त्र है।

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'नियाग्रा सिन्ड्रोम'

क्या आप वास्तव में जीवन जी रहे हैं या जीवन जीने की तैयारी में लगे हैं? अधिकांश व्यक्ति जीवन जीने की तैयारी करते - करते ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं? जीवन में उनके द्वारा किये गए गलत और घटिया निर्णयों के कारण वे सिर्फ जीवन जीने की तैयारी करते हैं। जीवन जीने की तैयारी का अर्थ है "नियाग्रा सिंड्रोम" के रोग से ग्रस्त होना। अब जरा सोचिये। जीवन एक नदी के समान है। अधिकांश व्यक्ति इस जीवन रूपी नदी में बिना तैयारी के कूद पड़ते हैं। उनकी कोई ठोस प्लानिंग नहीं होती। उनमे निर्णय लेने की ताकत भी नहीं होती। अब बिना तैयारी नदी में कूद पड़े हैं तो उन्हें "करंट" लगते रहते हैं। ये सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक या कोई भी अन्य "करंट" या समस्याएं हो सकती हैं। वे इससे जूझते हैं। जूझते - जूझते उन्हें पता चलता है कि जीवन रूपी नदी का कुछ समय में अंत होने वाला है। वो नदी कुछ समय बाद विश्व के सबसे बड़े जल प्रपात "नियाग्रा फाल्स" में गिर जायेगी। अब वे कुछ करने की तैयारी करते हैं लेकिन बहुत देर हो चुकी होती है। अंतत: वे "नियाग्रा सिंड्रोम" के कारण समाप्त हो जाते हैं। कहीं आप भी "नियाग्रा सिंड्रोम" से ग्रस्त तो नहीं हैं? विचार कीजिये:
* क्या आप सदा पैसे के अर्जन, वर्धन और रक्षण में लगे हैं?
* क्या आपके पेशे के अलावा आपकी कोई अन्य पहचान नहीं है?
* क्या समाजोपयोगी कार्य को आप "डेड इन्वेस्टमेंट" मानते हैं?
* क्या आपको लगता है कि जीवन के बहुमूल्य वर्ष कष्ट, क्लेश, लड़ाई, धनार्जन, पैसे के लेन –देन आदि के लिये नष्ट कर दिये?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है तो आप भी "नियाग्रा सिंड्रोम" से ग्रस्त हैं। इस सिंड्रोम से खुद को निकालिये। जीवन बहुत छोटा है। अगले पल का पता नहीं है। अत: श्रेष्ठ समाजोपयोगी कार्य करते चले जायें। ऐसे निर्णय लेवें जिनसे आपके साथ - साथ समाज और राष्ट्र का भी कल्याण हो। अपनी अलग पहचान बनाने का प्रयास करें। खेलें। अच्छा खाएं और खिलायें। महफिलें जमाते रहें ताकि मृत्यु के समय कंधा कम न पड़े। जनमानस से निस्वार्थ होकर मिलें। जो सच हो उसे बेहिचक कह देवें। व्यवहार को साफ रखें। देने का भाव रखें। याद रहे, जितना देंगे उसका दोगुना प्राप्त होगा। यही तो जीवन का सच है। आप पायेंगे कि जीवन अचानक सुखद सुगंध से भर गया है। जीवन का आनंद देने में है, प्राप्ति में नहीं। यही शाश्वत जीवन प्रबंध है।

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'सबको खुश करना नामुमकिन'

एक व्यापारी के तीन पुत्रों ने अलग अलग व्यापार प्रारम्भ किये। एक ने खेती, दूसरे ने कुम्भकार और तीसरे ने हिल स्टेशन पर होटल चलाने का कार्य प्रारम्भ किया। व्यापारी ने एक दिन तीनों के हाल चाल जानने हेतु यात्रा की। जब वह पहले पुत्र के घर पहुंचा तो उसने पिता से वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। वह किसान था। उसका कार्य वर्षा पर आधारित था। दूसरे पुत्र के घर जाते ही पुत्र ने पिता को भीषण गर्मी पड़ते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। जब किसान को उसने वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते पाया तो वह आगबबूला हो गया और तुरंत ही प्रार्थना बंद करने को कहा। दुसरे पुत्र के कहने पर पिता ने गर्मी पडऩे की प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। अब व्यापारी तीसरे पुत्र के घर पहुंचा। व्यापारी पिता भीषण गर्मी पडऩे की प्रार्थना कर रहा था। यह देख तीसरा पुत्र क्रोधित हो गया और उसने अपने पिता को बसंत काल जैसे मौसम की प्रार्थना करते रहने को कहा। पिता को यह समझ नहीं आया कि आखिर वो ईश्वर से किस मौसम के लिये प्रार्थना करे?

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'क्या आप स्टार हैं?

मैनेजमेंट की रिसर्च के अनुसार प्रत्येक संगठन पांच से सात प्रतिशत कार्मिक स्टार परफोरमर्स होते हैं। इन्हीं कर्मचारियों के कार्य के प्रति समर्पण के दम पर संगठन को विशेष पहचान मिल पाती है। स्टार परफोरमर्स के पास सिर्फ स्वप्न ही नहीं अपितु क्रियान्वित करने की शक्ति भी होती है। उसमे आंतरिक विश्वास की शक्ति होती है जहाँ कुछ भी असंभव नहीं होता। उद्यमिता को अपने व्यवहार में उतारने वाला, मुश्किलें आने पर मैदान में डटे रहने वाला और नव सृजन व परिवर्तन को स्वीकारने वाला ही स्टार होता है। जरा सोचिये, क्या आप संगठन के स्टार हैं? यदि आप स्टार नहीं हैं तो आप एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अपनी कार्यक्षमता, अधुनातन सोच, प्रोएक्टिव एप्रोच द्वारा एक स्टार कर्मचारी संगठन को उच्च स्तर पर ले जाता है। उसकी ऊर्जा का प्रवाह, नैतिक बल और विषय पर पकड़ अन्यों से श्रेष्ठ होती है। वही उसे स्टार बनाती है।

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