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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (44)

'जो बोयेगा वही काटेगा'

एक छोटे अनाथ बच्चा भूख और प्यास से परेशान था। उस दिन उसे मजदूरी भी नहीं मिली अत: उसके पास एक पैसा भी नहीं था। लड़का खुद्दार था। एक मकान के बाहर खड़ी महिला से उसने एक ग्लास पानी मांगा। महिला समझ गयी कि बच्चा भूखा- प्यासा है। महिला ने पानी की जगह बच्चे को एक ग्लास दूध दे दिया। बच्चे ने धीरे-धीरे दूध पिया और उसका मूल्य पूछा। महिला ने कहा कि मदद का पैसा नहीं लिया जाना चाहिये। बच्चे ने महिला का आभार जताया। कई वर्ष बाद वही महिला गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी। डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया। तभी डॉक्टर्स ने सुपर स्पेशिअलिस्ट डॉ. होवार्ड से मदद लेने की सोची। डॉ होवार्ड इस बीमारी का सबसे बड़ा डॉक्टर था। डॉ होवार्ड ने महिला का दस दिन तक पूर्ण मनोयोग से इलाज किया। डॉ होवार्ड अपने जूनियर्स से कहा कि इलाज का बिल उस महिला से नहीं लिया जाये। जब महिला ने स्वस्थ होने के बाद बिल की प्रति माँगी तो अस्पताल प्रशासन ने कहा कि बिल का भुगतान हो चुका है। महिला आश्चर्यचकित थी। जब बिल की प्रति महिला को मिली तो उसपर लिखा था 'मैडम, इस बिल की राशि उस एक ग्लास दूध से काफी कम है जो वर्षों पूर्व आपने मुझे पिलाया था। यदि वो एक ग्लास दूध नहीं मिलता तो आज डॉ होवार्ड जीवित नहीं होता। आपका ही डॉ होवार्डÓ। महिला की आंखों में अशु्र थे। सच है, जैसा आप अन्यों के साथ करोगे, अन्य भी आपके साथ वैसा ही करेंगे।

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सबसे महत्वपूर्ण अंग कौन?

माँ ने अपने सात वर्षीय पुत्र से पूछा कि हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग कौनसा है। पुत्र ने जवाब में कान को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इसे गलत ठहराया। कुछ वर्ष बाद माँ ने पुन: यही प्रश्न किया और पुत्र ने आँख को सबसे महत्वपूर्ण बताया। माँ ने इस उत्तर को भी गलत बताया। अब पुत्र सोलह वर्ष का था और अध्ययन हेतु विदेश जा रहा था। आज माँ ने अपने पुत्र को सही उत्तर बताते हुए कहा कि शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है कंधा। इसलिये नहीं क्योंकि उसपर हमारा सर टिका है बल्कि इसलिये क्योंकि विपत्ति काल में हमारे मित्र इसी कंधे पर सर रखकर रो सकते हैं और अपनी पीड़ा हमें कह सकते हैं। कन्धा ही मनुष्य शरीर का ऐसा अंग है जो स्वार्थी नहीं होता और मुश्किल काल में फंसे अपने मित्रों के सिरों को सहारा देता है।

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'कृतघ्नता एक अपराध'

एक शिकारी शिकार के लिये गया और रास्ता भटक गया। चार दिन तक भटकता रहा लेकिन कुछ भी खाने को नहीं मिला। थक कर अधमरा सा शिकारी भगवान से भोजन मिलने की मिन्नतें करने लगा। थोड़ी ही देर बाद शिकारी ने एक आम का पेड़ देखा। प्रसन्नता से भरा शिकारी आम के पेड़ के पास पहुंचा और तुरंत आम खाने लगा। जब शिकारी को पहला आम मिला तो उसके नेत्र भीग गये और उसने तुरंत ही ईश्वर का अत्यधिक आभार जताया। दूसरा आम खाते हुए भी शिकारी ईश्वर वंदना करता रहा। छठे और सातवें आम को खाते हुए शिकारी ईश्वर ने धीरे धीरे ईश्वर को उलाहना देना शुरू किया क्योंकि वो चार दिन से भूखा था। दसवां आम तो शिकारी ने फैंक दिया और यह जताया कि आम भोजन थोड़े ही है। हमारी स्थिति भी यही है। यहां हम शिकारी की भूमिका में हैं। आम वे उपहार हैं जो ईश्वर, देश, समाज, परिवार से हमें प्राप्त होते हैं। हम नियमित तौर पर उपहार प्राप्त करते जाते हैं और हमारा लालच लगातार बढ़ता जाता है। दसवां आम भी पहले जितना मीठा था लेकिन उसके लिये धन्यवाद नहीं दिया गया। यह घटिया प्रवृत्ति है।

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'जब संसार कहे ना'

एक विद्यार्थी को गुरूजी ने आत्मविश्वास का पाठ सिखाया। गुरूजी ने विद्यार्थी से कक्षा के समक्ष विज्ञान का सिद्धांत बोलने के लिये कहा। ज्यों ही विद्यार्थी ने बोलना प्रारम्भ किया, शिक्षक ने जोर से चिल्लाते हुए कहा "नहीं, नहीं"। विद्यार्थी डरकर बैठ गया। शिक्षक ने दूसरे विद्यार्थी से बोलने को कहा। ज्यों ही दूसरे विद्यार्थी ने बोलना प्रारम्भ किया, शिक्षक ने पुन: जोर से चिल्लाते हुए कहा "नहीं, नहीं"। दूसरे विद्यार्थी ने इस "नहीं" की परवाह न करते हुए बोलना जारी रखा। दूसरे विद्यार्थी ने अपना प्रस्तुतीकरण पूर्ण किया। गुरूजी ने शाबासी दी। पहले विद्यार्थी ने कहा कि वो भी तो यही कह रहा था। गुरूजी ने पहले विद्यार्थी से जो शब्द कहे वो कई लोगों की जिन्दगी बदल सकते हैं। गुरूजी ने कहा कि: 'तुम्हारे मन में अनिश्चितता थी इसलिये तुम रुक गये। जब संसार कहे ना तो इसका जवाब अपने कार्य से दो। संसार के आदत ना कहने की है। इसे चुनौती दो। इन वाक्यों को गलत ठहराओ :

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'बलि के बकरे न तलाशें'

एक राजा को शिकार करने बहुत शौक था। एक दिन वो शिकार पर निकला तो पूरे दिन में उसे एक भी जानवर नहीं मिला। भूखा-प्यासा राजा शिकार की तलाश में भटकता रहा। जब उसे कोई शिकार न मिला तो वो भाग्य को कोसता रहा और महल लौट आया। महल में उसे याद आया कि सुबह उसने एक दीन हीन निर्बल किसान का देखा था। राजा ने सोचा कि उस किसान के शगुन सही नहीं थे और उसके दुर्भाग्यशाली होने के कारण राजा को शिकार न मिला। राजा ने तुरंत सिपाही भेजकर किसान को गिरफ्तार करवाया। राजा ने किसान को अत्यंत दुर्भाग्यशाली ठहराते हुए कहा कि किसान के अपशकुनी होने की वजह से शिकार न मिला अत: किसान को तुरंत मृत्युदंड दे दिया जाये। किसान ने बुद्धिमत्ता से जवाब दिया जिससे उसके प्राण बच गये। किसान ने कहा कि जिस प्रकार राजा ने सुबह किसान को देखा उसी प्रकार सुबह सबसे पहले किसान ने राजा को देखा। राजा को देखने के कारण आज किसान अपने प्राण गंवा रहा है तो ज्यादा बड़ा दुर्भाग्यशाली कौन हुआ? यहाँ हमें निम्नाकित बिन्दुओं को समझना चाहिये:

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''डेढ़ होशियार कर्मचारी"

डेढ़ होशियार कर्मचारी अर्थात वे कार्मिक जो कोई काम ठीक से नहीं करते हैं और जो कर रहा है उसे प्रति पल नियमों काए कायदों का हवाला देकर काम करने से रोकते हैं। ये संगठन के लिए पनौती हैं। स्वयं कुछ करो नहीं, किसी को अच्छा काम करने दो नहीं और यदि कोई अच्छा काम कर बैठे तो उसमे नुक्स निकालना इनका परम धर्म होता है। डेढ़ होशियार निकृष्ट कर्मचारियों के कुछ आदर्श वाक्य हैं जिनसे आप इनकी पहचान कर सकते हैं :

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'सांचे में न ढाले'

एक राजा अपनी श्वास सम्बन्धी बीमारी से बड़ा ही दुखी था। अपने दुखों के निवारण हेतु वो गुरूजी से मिलने पहुंचा। गुरूजी ने उसे सलाह दी कि वह हरे रंग की चीजों को ज्यादा से ज्यादा देखे। राजा ने मंर्तियों से कहकर राज्य की हर इमारत, फर्नीचर, वृक्ष के तने आदि को हरे रंग से पुतवा दिया। प्रजा हेतु शहर में हरे रंग के वस्त्र पहनकर चलना कानूनन लागू कर दिया। इतना होने के बावजूद जब बीमारी ठीक नहीं हुई तो राजा वापिस गुरूजी के पास गया। गुरूजी ने राजा को समझाया कि हरे रंग की चीजों को ज्यादा देखने का अर्थ था - प्रकृति से जुड़ाव और बाग बगीचों व जंगल आदि में घूमना ताकि फेफड़ों को ताजा वायु मिले और श्वास सम्बन्धी रोगों का निदान हो। गुरूजी ने कहा कि समूचे राज्य को हरा पुतवाने की बजाय हरा चश्मा भी तो पहना जा सकता था।
यह एक मैनेजमेंट सिखाने वाली प्रेरक कथा है। इस कथा का मर्म यह है कि :

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अंतर्मन की अद्भुत शक्ति

भारतीय शास्त्र कहते हैं कि हम किसी को भी प्रेरित नहीं कर सकते हैं। हम केवल उस व्यक्ति को उसके अंतर्मन की शक्ति की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं। आंतरिक प्रेरणा रूपी शक्ति का सच्चा बोध व्यक्ति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा देता है। प्रोत्साहन पर आधारित सकारात्मक प्रेरणा और डर पर आधारित नकारात्मक प्रेरणा एक स्तर तक ही काम करती हैं। इन दोनों प्रेरणा की सीमाएं हैं। आंतरिक प्रेरणा या अंतर्मन की शक्ति असीम है। मैनेजमेंट साइंस कहता है कि व्यक्ति धन से प्रेरित होता है। धन से ज़्यादा प्रेरणा लीडर देता है। सर्वाधिक प्रेरणा विश्वास अर्थात अपने अंतर्मन की भावनाओं से होती है। अल्बर्ट आइन्स्टीन को कक्षा में सभी स्टुपिड (मूर्ख) कहते थे। उसके शर्ट पर पीछे स्टुपिड लिखते थे. शिक्षकों का आकलन था कि वो सात जन्म में भी विज्ञान और गणित नहीं सीख सकेगा। आइन्स्टीन ने इन शब्दों की परवाह नहीं की। उसने अपने अनार्मन की सुनी जो सदा कहता था कि भीतर एक महान वैज्ञानिक छिपा है। आइन्स्टीन की हकीकत आज हम सब जानते हैं। यह प्रेरणा न तो धन आधारित थी और ना ही लीडर से सम्बंधित। यह आंतरिक प्रेरणा थी। शिक्षक द्वारा दी गई सकारात्मक प्रेरणा के फलस्वरूप डॉ कलाम देश को मिले तो वहीं दूसरी ओर माता द्वारा दी गई प्रेरणा ने इडियट कहे जाने वाले व्यक्ति को महान वैज्ञानिक एडिसन बना दिया। अंतर्मन की शक्ति का जागरण कर प्रेरित होने हेतु हमें स्वयं से कुछ प्रश्न पूछने चाहिये:

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मूल समस्या समझना आवश्यक

चार नेत्रहीन व्यक्तियों को को एक हाथी के समक्ष छोड़ दिया गया। एक ने हाथी के कान पर स्पर्श कर कहा कि यह तो बहुत बड़ी टोकरी है। दूसरे ने पंूछ पकड़ी और खा कि यह एक रस्सी है। तीसरे ने पैर पकड़ा और उसे खम्भा बताया। चौथे ने पेट पर हाथ लगाकर कहा कि यह तो बहुत बड़ा टैंक है। अब चारों आपस में अपने अपने मत को लेकर भिड पड़े। तब वहां एक समझदार व्यक्तिने उन चारों को समझाया कि वे सब अपनी अपनी जगह सही हैं लेकिन वास्तव में यह एक हाथी है।

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उद्यमेव जयते

दो बीज मिट्टी में पड़े थे। पहले बीज ने जब दूसरे से कहा कि हमें बाहर निकलकर वट वृक्ष बनना है अत: हमें जमीन को फाड़कर बाहर निकलना चाहिये। दूसरा बीज महाआलसी था। उसने कहा कि बाहर की मिट्टी, हवा, चिलचिलाती धूप और जंगली जानवर हमसे बनने वाले पौधे को नष्ट कर देंगे अत: हमें जमीन में ही पड़ा रहना चाहिये। पहला बीज पुरुषार्थी था। धरती का सीना चीरकर आगे बढ़ा, सूर्य से रोशनी ली, जल लिया, वायु का संपर्क लिया और वट वृक्ष बन गया। इस वट वृक्ष ने सैंकड़ो वर्ष तक मानव कल्याण का कार्य अपने फलों, छाया व शुद्ध हवा को देकर किया। यही सच्चा पुरुषार्थ है। दूसरा बीज जमीन में ही पड़ा रहा और नष्ट हो गया। ज़मीन में पड़े बीज को कोई नहीं जानता। पुरुषार्थी बीज वृक्ष बना, हज़ारों बीजों का उत्पादक बना और समाज हेतु काम आया। उसे हम याद करते हैं। यही जीवन का सार है। शास्त्र कहता है - 'हे पुरुष तू पुरुषार्थ कर, यह धर्म है तेरा अमरÓ। ये पंक्तियाँ हमें नित्य प्रति मेहनत करने और आलस्य को त्यागने का सन्देश देती हैं। हमारे भारतीय चिंतन के अनुसार यदि हमें स्वर्ग और नरक देखने हों तो यह कहना उचित है कि उद्यम स्वर्ग है और आलस्य कुम्भीपाक नरक। भर्तृहरि के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है। जऱा इन वाक्यों पर गौर करें:

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