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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (104)

'गृहिणी - देश का गौरव'

एक व्यक्ति को कहीं से खजाना मिल गया। उसे लगा कि यदि उसकी पत्नी को यह पता चल गया तो शायद वो सारे मोहल्ले में इसका ढिंढोरा पीट देगी। पत्नियों पर बेकार के चुटकुले पड़-पड़ कर उस व्यक्ति ने यह धारणा बना ली थी कि महिलाएं धन की प्रेमी होती हैं। यह सोच कर उस व्यक्ति ने खजाने को अपने बरामदे मे गाड़ा और फिर उसपर मिट्टी डालने लगा। तभी उसकी पत्नी वहां पहुंची। उसने पूछताछ की तो पति ने खजाने के बारे में बताया। पत्नी का जवाब भारतीय राष्ट्र जीवन की महान परंपरा और गृहिणी के त्याग को दर्शाता है। पत्नी बोली कि 'यह तो अवैध तरीके से कमाया धन है। यह धन हमारे लिये मिट्टी है। आप इस मिट्टी पर और मिट्टी क्यों डाल रहे होÓ? यह है हमारे राष्ट्र की गृहिणी। 

भारतीय गृहिणियों का त्याग, उनका बलिदान, उनकी कार्यक्षमता और अद्भुत श्रम कर सकने की ताकत का तो विदेशी भी लोहा मानते हैं। वर्तमान में अनेकानेक मीडिया साधनों में पत्नियों पर जोक्स, चुटकुले आदि भेजने का चलन या ट्रेंड सा बन गया है। यह सही नहीं है। भारतीय गृहिणियां बचत, सेवा, संस्कार और त्याग की जीवंत देव प्रतिमाएं हैं। यह शाश्वत सत्य भी है। भारतीय समाज में नारी और विशेषतया पत्नी को सदा से ही उच्च स्थान प्राप्त है। सिन्धु घाटी सभ्यता में सर्वाधिक मूर्तियां स्त्रियों की मिली हैं। इतिहासकार कहते हैं कि सिन्धु घाटी सभ्यता मातृसतात्मक थी यानि महिलाओं का प्रभुत्व था। वैदिक काल को खंगालने पर पता चलता है कि महिलाएं सक्रीय रूप से सामजिक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भागीदारी निभाती रही हैं। भारतीय बौद्ध शास्त्रों में गृहिणी या पत्नी के चार रूप बताये गये हैं-
1. मातृसमा अर्थात जो सभी के साथ सद्व्यवहार करे और माता के सामान व्यवहार रखे।
2. भागिनीसमा अर्थात जो सभी से भाई-बहन जैसा स्नेह रखे और सदा अन्यों की प्रसन्नता हेतु स्वयं का सुख न्योछावर करे।
3. चोरसमा अर्थात जो सम्पत्ति केन्द्रित हो और उपभोग करने मात्र को श्रेयस्कर समझे।
4. बधिकसमा अर्थात क्रोधी और अन्यों का अपमान करने को तत्पर।
भारतीय समाज में सिर्फ मातृसमा या भागिनीसमा गृहिणियां होती हैं। विदेशी उपभोक्तावाद से प्रभावित चोरसमा गृहिणियां परिवार को एक सूत्र में पिरो नहीं पाती। वर्तमान समय में यह सोचा जाना अनिवार्य है कि हमारा व्यवहार कैसा है? स्वान्त: सुखाय यानि सिर्फ मैं सुखी हो जाऊं तो विदेशी परम्परा है। यहां मन्त्र यही है कि भारतीय गृहिणी तो आज भी घर, समाज और राष्ट्र के कल्याण को ही सर्वोपरि मानती है। देश के विकास में इनकी सबसे बड़ी भूमिका है।

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'पति, पत्नी और क्रोध'

एक सिद्ध फकीर था। एक दिन फकीर से मिलने एक व्यक्ति पहुंचा। फकीर घर पर नहीं था। उस व्यक्ति ने जब फकीर की पत्नी से फकीर के बारे में पूछा तो पत्नी ने भड़ककर जवाब दिया कि उसका निखट्टू निकृष्ट पति तो जंगल में लकडियां काटने गया है। व्यक्ति को लगा कि इतने सिद्ध फकीर की पत्नी ऐसी कैसे है? वह व्यक्ति फकीर की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। थोड़ी ही देर बाद उसे फकीर नजर आया लेकिन फकीर को देखकर वो व्यक्ति डर गया। फकीर के साथ-साथ एक चीता था जिस पर फकीर ने अपनी लकडिय़ों का ग_र लाद रखा था। व्यक्ति ने फकीर से कहा कि उसकी पत्नी तो उसे निकृष्ट कह रही थी और फकीर तो चमत्कारी है। ऐसा कैसे हुआ? फकीर बोला कि यदि वो अपनी पत्नी के क्रोध और दुव्र्यवहार का बोझ नहीं उठाये तो क्या यह चीता उसके सामान का बोझ उठाएगा? इसका भावार्थ यह है कि चीता इसलिए बोझ उठा रहा है क्योंकि फकीर ने क्रोध पर नियंत्रण कर रखा है। उसका भाव शुद्ध सात्विक निर्मल है। उसके मन में किसी के लिये द्वेष नहीं है। इसीलिए चीता उसका बोझ भी उठा रहा है। 

यही तो सुखी दाम्पत्य का अद्भुत सूत्र है। क्रोध पर नियंत्रण रखने मात्र से नब्बे फीसदी समस्याएं तो वैसे ही समाप्त हो जाती हैं। क्रोध आते ही विचार कीजिये कि यदि भावुकता में जबरदस्त प्रतिक्रिया दे दी जाये तो क्या कुछ फयदा होगा? शायद नहीं। सिर्फ नुकसान होगा। क्लेश बढेगा। छिद्रान्वेषण शुरू हो जायेगा और गलतियां निकालने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जायेगी। सुखी दाम्पत्य के लिये आवश्यक है कि :
* सहन करना सीखिये। उन बातों को सहन कीजिये जिन पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। इसे अन्यथा न लेवें। इसका अर्थ सिद्धांतों से समझौता नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन साथी को हर पल एक कंट्रोलर की तरह कंट्रोल करने की प्रवृत्ति से छुटकारा। कुछ लिबर्टी देंवे अर्थात खुला भी छोड़ें। कुछ गलतियों को नजरअंदाज करना भी सीखें।
* रिश्ते बोझ नहीं हैं। उन्हें ढोने की नौबत न आ जाये। इसके लिये जरूरी है एक दूसरे को समझना, और विपरीत बातों और विचारों को भी अपनाने का प्रयास। असहमति होना आम बात है। असहमत अवश्य होवें। मतभेद भी होने देवें परन्तु असहमति इतनी ज्यादा न बढ़ावें कि ईष्र्या और युद्ध की नौबत आ जावे।
यहां मन्त्र यही है कि दाम्पत्य जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम एक दूसरे के विपरीत विचारों को भी समझें। डिसएग्री (असहमत) होने के लिये एग्री (सहमत) हो जाना और असहमति होने के बावजूद कलह न होने देना ही सुखद दाम्पत्य का प्राण सत्व है।

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'पति, पत्नी और क्रोध'

एक सिद्ध फकीर था। एक दिन फकीर से मिलने एक व्यक्ति पहुंचा। फकीर घर पर नहीं था। उस व्यक्ति ने जब फकीर की पत्नी से फकीर के बारे में पूछा तो पत्नी ने भड़ककर जवाब दिया कि उसका निखट्टू निकृष्ट पति तो जंगल में लकडियां काटने गया है। व्यक्ति को लगा कि इतने सिद्ध फकीर की पत्नी ऐसी कैसे है? वह व्यक्ति फकीर की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। थोड़ी ही देर बाद उसे फकीर नजर आया लेकिन फकीर को देखकर वो व्यक्ति डर गया। फकीर के साथ-साथ एक चीता था जिस पर फकीर ने अपनी लकडिय़ों का ग_र लाद रखा था। व्यक्ति ने फकीर से कहा कि उसकी पत्नी तो उसे निकृष्ट कह रही थी और फकीर तो चमत्कारी है। ऐसा कैसे हुआ? फकीर बोला कि यदि वो अपनी पत्नी के क्रोध और दुव्र्यवहार का बोझ नहीं उठाये तो क्या यह चीता उसके सामान का बोझ उठाएगा? इसका भावार्थ यह है कि चीता इसलिए बोझ उठा रहा है क्योंकि फकीर ने क्रोध पर नियंत्रण कर रखा है। उसका भाव शुद्ध सात्विक निर्मल है। उसके मन में किसी के लिये द्वेष नहीं है। इसीलिए चीता उसका बोझ भी उठा रहा है। 

यही तो सुखी दाम्पत्य का अद्भुत सूत्र है। क्रोध पर नियंत्रण रखने मात्र से नब्बे फीसदी समस्याएं तो वैसे ही समाप्त हो जाती हैं। क्रोध आते ही विचार कीजिये कि यदि भावुकता में जबरदस्त प्रतिक्रिया दे दी जाये तो क्या कुछ फयदा होगा? शायद नहीं। सिर्फ नुकसान होगा। क्लेश बढेगा। छिद्रान्वेषण शुरू हो जायेगा और गलतियां निकालने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जायेगी। सुखी दाम्पत्य के लिये आवश्यक है कि :
* सहन करना सीखिये। उन बातों को सहन कीजिये जिन पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। इसे अन्यथा न लेवें। इसका अर्थ सिद्धांतों से समझौता नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन साथी को हर पल एक कंट्रोलर की तरह कंट्रोल करने की प्रवृत्ति से छुटकारा। कुछ लिबर्टी देंवे अर्थात खुला भी छोड़ें। कुछ गलतियों को नजरअंदाज करना भी सीखें।
* रिश्ते बोझ नहीं हैं। उन्हें ढोने की नौबत न आ जाये। इसके लिये जरूरी है एक दूसरे को समझना, और विपरीत बातों और विचारों को भी अपनाने का प्रयास। असहमति होना आम बात है। असहमत अवश्य होवें। मतभेद भी होने देवें परन्तु असहमति इतनी ज्यादा न बढ़ावें कि ईष्र्या और युद्ध की नौबत आ जावे।
यहां मन्त्र यही है कि दाम्पत्य जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम एक दूसरे के विपरीत विचारों को भी समझें। डिसएग्री (असहमत) होने के लिये एग्री (सहमत) हो जाना और असहमति होने के बावजूद कलह न होने देना ही सुखद दाम्पत्य का प्राण सत्व है।

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'गैली बहू'

दादा- दादी के साथ खेलना और सीखना नब्बे फीसदी अंक लाने से भी ज्यादा जरूरी है। जो वे सिखायेंगे, वे शायद किताबें न सिखा सकें। जीवन जीने का सलीका संयुक्त परिवार सिखाता है। कहीं आप 'गैली बहू' यानि मूर्ख बहू बनकर संयुक्त परिवार को जाने या अनजाने में तोड़ तो नहीं रही हैं? 

जरा इन प्रश्नों पर गौर कीजिये.
* क्या आप रोजाना नियम से तीन से चार बार अपनी माताजी से फोन पर या सोशल मीडिया पर बातचात करती हैं?
* क्या आप अपने पीहर वालों के साथ अंतहीन गपशप करते हुए उन्हें जेठ-जेठानी की लड़ाई, ननद के लिये आये रिश्ते की डीटेल्स, भोजन का मेन्यू, सास की प्रत्येक बात आदि घरेलू बातें बताती हैं?
* क्या आप अपने सास-ससुर के साथ खेल रहे बच्चों को देखकर यह सोचती हैं कि यह सब बेकार है और अध्ययन करना ही श्रेष्ठ है?
यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर हां है तो आप 'गैली बहू' का खिताब जीत सकती हैं. ऊपर लिखे सारे काम 'गैली बहुओंÓ के हैं. परिवार की निजता बचाना आपके हाथ में हैं. अपने माता-पिता, पीहर के सदस्यों से भरपूर प्रेम रखें लेकिन ये न भूलें कि अब पति का घर ही आपकी कर्मभूमि है. परिवार की निजी बातों को बताने से आपके पीहर वालों को लगेगा कि आप बहुत ही दुखी हैं. प्रत्येक मां को यह लगता है कि ससुराल में उसकी बेटी दुखी है. ऊपर से आपकी मूर्खतापूर्ण गपशप परिवार का विनाश करने को काफी है. इन सब पर कोढ़ में खाज है सोशल मीडिया. आपने अपनी मौसी की लडकी का व्हाट्सएप स्टेटस देखा जिसमे फोटो के साथ लिखा है 'एन्जोयिंग एट खजियारÓ. अब यह देखते ही आपने अपने पति की शिकायत अपनी मां और अनेकानेक लोगों से कर दी.
जरा सोचिये, इससे क्लेश और कष्ट के अलावा क्या प्राप्त हो सकता है? गैली बहू न बनकर सुघ? बहू बनें जिसके निम्नलिखित लक्षण हैं-
* घर की समस्याएं चारदीवारी के अन्दर ही रखें.
* बच्चों पर यह अधिकार न जतायें कि वे आपकी संतान हैं. दादा-दादी, काका-काकी के लिये भी स्कोप छोडिये.
* अपने ससुराल की जितनी ज्यादा चर्चा आप अपनी माँ के साथ करेंगी, पति और ससुराल से उतनी ही दूर होती चली जायेंगी.
यहां मन्त्र यही है कि सभी कपडे सार्वजनिक स्थान पर धोये या सुखाये नहीं जा सकते. कुछ कपड़ों को सिर्फ बाथरूम में ही सुखाया जाता है. घर की निजी बातों को बाहर कहने से परिवार टूटते हैं. इसे रोकिये वरना दाम्पत्य जीवन और घर-नरक सामान हो जायेगा. यह कठोर कटु सत्य है।

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'पर्यावरण संरक्षण और भारतीय चिंतन'

यह 'गुरु मन्त्र' स्तम्भ का तीन सौवां (300 वां) लेख है। डॉ. गौरव बिस्सा के नियमित लेखनीय प्रयास के लिए दैनिक नेशनल राजस्थान परिवार उनका आभार व्यक्त करता है।

प्राचीन ग्रंथों में छिपे हैं पर्यावरण संरक्षण सिद्धांत-
घास का तिनका कैसे उगता है? एक सात वर्षीय बालक को इसका उत्तर देना विद्वानों के लिए भी मुश्किल है। एक घास के तिनके को उगाने के लिए पूरी सृष्टि अपना अतुलनीय योगदान देती है। मिट्टी या पृथ्वी में फूटा अंकुर, जल से सिंचित होकर सूर्य की रोशनी से परिपक्व होता अंकुर, प्राणवायु के सहयोग से आकाश की ओर बढ़ता है। समूचे पञ्च महाभूतों के योगदान से एक तिनका उगता है। इस एक तिनके को अनुपम ईश्वरीय कृति मानकर उसका संरक्षण करना ही हमारे राष्ट्र जीवन की परंपरा है। जब सभी देवताओं की अनुपम कृति एक पौधा है। उसका फल अर्थात अन्न का एक दाना ईश्वरीय अंश है, देव तुल्य है और यही हमारे देश की थाती है। ऋग्वेद में समूचे जगत और पर्यावरण के संतुलन का दायित्व मित्र, वरुण, इंद्र, मरुत और आदित्य आदि देवों का माना गया है।
पर्यावरण का प्रभावी संरक्षण और उसे कदापि हानि न पहुंचाने का सम्पूर्ण विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में समझाया गया है। ऋग्वेद का सन्देश है 'मित्रस्यहम चक्षुषा सर्वानि भूतानि समीक्षेÓ अर्थात हम प्रकृति की समूची कृतियों को मित्र की दृष्टि से देखें। ऋग्वेद में अश्विन से प्रार्थना में उनका आभार जताते हुए कहा गया है कि है कि हमें सूर्य की अत्यंत घातक हानिकारक किरणों तथा ताप से बचाने हेतु आपने जो संरक्षण प्रदान किया उसके हम ऋणी हैं। यह वर्तमान ओजोन परत के सिद्धांत से जुड़ता प्रतीत होता है। चारों वेदों में मनुष्यों द्वारा प्रकृति से की गयी छेड़छाड़ के कारण बिगड़ते ऋतु चक्र का वर्णन है।
अथर्व वेद के पृथ्वी सूक्त में 'माँ भूमि: पुत्रोहम पृथ्विया:Ó अर्थात मैं पृथ्वी माता का पुत्र हूं और समस्त वन और वनस्पति माता का उपहार है। पर्वतों के संरक्षण, जल के विवेकपूर्ण उपयोग, मृदा संरक्षण पर वेदों में प्रार्थनाएं हैं।
पंचवटी रखेगी सभी को नीरोग-
भगवान श्रीराम ने वनवास के चौदह वर्ष पूर्ण स्वस्थ और नीरोग रहते हुए बिताये। इसका मूल मन्त्र भी पर्यावरण के वैज्ञानिक सिद्धांतों की श्रेष्ठ क्रियान्विति थी। भगवान श्रीराम अपने चौदह वर्ष के वनवास में काफी समय पंचवटी में रहे। स्कन्द (स्कन्न) पुराण के हिमाद्रीय व्रत खंड के अनुसार पंचवटी अर्थात सुनिश्चित दूरी पर लगाए गए पांच वृक्षों का समूह है। पंचवटी का विशिष्ट वैज्ञानिक, औषधीय और पौराणिक महत्त्व है। पूर्व दिशा में पीपल, पश्चिम दिशा में बरगद, दक्षिण दिशा में आंवला, उत्तर दिशा में बेल और दक्षिण-पूर्व दिशा में अशोक के वृक्ष लगाने की वैज्ञानिक क्रिया ही पंचवटी है। सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोध के अनुसार-
* पीपल 1800 किलोग्राम ऑक्सीजन प्रति घंटे की दर से उत्सर्जन करता है।
* बरगद प्राकृतिक वातानुकूलन (एयर कंडिशनर) के रूप में कार्य करता है।
* विटामिन सी से भरपूर आंवला रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है।
* बेल पाचन तंत्र सुधारता है।
* अशोक वृक्ष महिलाओं को नीरोग रखता है।
प्राचीन इतिहास में पर्यावरण संरक्षण सन्देश : राजा परिवल्लाल की कथा
पर्यावरण प्रेम का सर्वोकृष्ट उदाहरण हमारे प्राचीन इतिहास में चोल राजा परिवल्लाल का है। राजा परिवल्लाल अपने कुशल नेतृत्व, पारदर्शिता और बेहतरीन निर्णय क्षमता हेतु विख्यात थे। एक दिन वन में अपने रथ को एक स्थान पर छोड़कर किसी सन्यासी से मिलने पहुंचे। वापस लौटने पर उन्होंने देखा कि दो छोटी लताएं (बेल) उनके रथ के पहिये से सर्पिलाकार आकार में जुड़ गई। रथ चलने से दोनों लताएं टूट जाती। राजा परिवल्लाल रथ वहीं छोड़कर, वहां से पैदल लौटे। उन्होंने सारथी से कहा कि वृक्ष, फूल और लताएं ईश्वर का अंश हैं, जीवन देने वाली संपत्ति हैं और इनका संरक्षण प्रत्येक राजा का कर्तव्य है। यह निर्णय सही है या नहीं; मूल बात ये नहीं है। मूल विषय राजा परिवल्लाल का पर्यावरण प्रेम, कर्तव्यपरायणता और संस्कार है जो हमें सोच की नई दिशा देता है। यह घटना हमारे राष्ट्र नायक की सोच और दूरदृष्टि को दर्शाती है।
सस्टेनेबल डेवलपमेंट : हमारे राष्ट्र जीवन की परम्परा
पर्यावरण संरक्षण के साथ सस्टेनेबल डेवलपमेंट (संपोषणीय विकास) की चर्चा वर्तमान में होती रही है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का उद्भव और विकास भारत में ही हुआ है। हमारे गौरवशाली देश ने कभी भी भोगवादी संस्कृति को श्रेष्ठ नहीं माना। 'तेन तक्तेन भुंजीथाÓ अर्थात प्रत्येक वस्तु का त्यागपूर्वक उपभोग करना हमारे देश की परंपरा है। 'जितना मुझे चाहिये, मैं प्रकृति से उतना ही लूं और शेष प्रकृति को लौटा दूंÓ। यह हमारी जीवन शैली है। वर्तमान भौतिक युग में उपभोक्तावाद की संस्कृति हावी है जो अत्यधिक मात्र में संग्रहण, अथाह धन के खर्च, आवश्यक ना होने पर भी खरीद और बिना बात ही पुरानी वस्तु को त्याग नई वस्तु खरीदने को प्रेरित करती है। ऐसा करने पर पुरानी वस्तुओं का कबाड़ इकठ्ठा होता जाता है, उनके निर्माण में लगा श्रम व्यर्थ जाता है और पर्यावरण को हानि होती है। हमारी वैदिक संस्कृति 'अपरिग्रहÓ अर्थात आवश्यकता से अधिक का संग्रह न करने और जितना प्राप्त हो, उससे ज्यादा लौटाने में विश्वास करती है। इसे समझिये। आपके पास एक मोबाइल है। ठीक चल रहा है। आपने विज्ञापनों के प्रभाव या स्टेटस सिम्बल के चलते उसे रखकर नया मोबाइल ले लिया। अब पुराने मोबाइल का क्या? उसे बनाने में, उसकी तकनीक विकसित करने में, हजारों लोगों का श्रम लगा था। आपने एक पल में ही इसे त्याग दिया। अब वो मोबाईल कबाड़ है। यह पाश्चात्य सभ्यता है। इसे छोडऩे की प्रेरणा भारतीय शास्त्र देता है।

वृक्षों से सीखें जीवन का मैनेजमेंट :
हमारे देश में तो सदैव वृक्षों से जीवन प्रबंध सीखने की बात कही गयी है। मनुष्यों को वृक्षों की मति अर्थात सीख लेने को कहा गया है।
* जितना बड़ा वृक्ष उतनी ज्यादा छाया अर्थात समाज में उच्च स्थान मिल जाने पर भी जगत कल्याण का भाव।
* वृक्ष सभी को सामान छाया देता है और लिंग, जाति, सम्प्रदाय से परे है। मनुष्य भी परोपकारी भाव से सभी का हित करे।
* वृक्ष पर जितने ज्यादा फल उतना ही नीचे की ओर झुकाव अर्थात अहंकार के भाव को त्यागना और समाज के अंतिम व्यक्ति का विकास।
* वृक्षों पर फलों के लिए मारे जाने वाले पत्थर का भी प्रेम से स्वागत कर मीठे फल देने की प्रकृति अर्थात निंदकों और आलोचकों का भी हित करने का भाव।
* वृक्षों द्वारा पतझड़ के बाद नए पत्तों का उगना अर्थात पुराने विचारों को त्यागकर नए और आधुनिक विचारों को जीवन में स्थान देना व रूढि़वादी नहीं होना।
यही तो चेंज मैनेजमेंट है। यही तो जीवन का मर्म है। वृक्षों से सीख ले लेवें तो हमारा जीवन सफल होना निश्चित है।
वेद , पुराण , उपनिषद, ज्ञानी जन कुछ भी कहें और भले ही हमारी परम्परा गौरवशाली हो; इतना ही काफी नहीं है। मूल प्रश्न है क्रियान्विति। जरा सोचिये कि :
* क्या मैं पर्यावरण संरक्षण मिशन का हिस्सा बनना चाहता हूँ?
* क्या मैं अपने आसपास के इलाके में वृक्षारोपण करूंगा और करवाऊंगा?
* क्या मैं प्रतिवर्ष अपने जन्मदिन, विवाह वर्षगाँठ पर पौधा लगाऊंगा और उपहार स्वरुप दूंगा?
* क्या मैं आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करके महात्मा गांधी के सिद्धांतों का वाहक बनूंगा?
यहाँ मन्त्र यही है कि यदि इन सभी पर हमारी सोच सकारात्मक है तो निश्चित रूप से हम प्रभावी संरक्षण कर अपनी आने वाली पीढिय़ों को सुन्दर पर्यावरण का तोहफा दे पायेंगे।

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'धन की गतियाँ'

धन कमाना, संसाधनों का भंडारण करना बुरा नहीं है। धन जीवन की आवश्यकता है और सभी को चाहिये भी। सिर्फ धन कमाना और उसे खर्च करना ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। शास्त्रों में धन की तीन गतियां बताई गई हैं। दान, भोग और नाश। 

1. दान: धन का सर्वोत्कृष्ट उपयोग है अपनी आवश्यकतों के पूरे होने के बाद जो शेष बचे उसे समाज को दान में दे देना या समाज को वापिस लौटाना। यह भारतीय कांसेप्ट है जो उपनिषदों से उपजा है जिसके अनुसार आवश्यकता से अधिक का संग्रह अपराध है। इसी को अपरिग्रह भी कहते हैं जिसके अनुसार आवश्यकता से अधिक के संग्रह का अर्थ है दूसरे के हक को मारना।
2. भोग : धन की दूसरी गति भोग है। यहां से धन का दुरूपयोग प्रारम्भ होता है। हमारी वर्तमान मानसिकता यह हो चुकी है कि जो शरीर से काम लेवे या श्रम करे वो छोटा है और जो काम करवाये वो बड़ा है। यह घृणित सोच है। शारीरिक श्रम करना तो ईश्वरीय कार्य है। इसकी प्रशंसा होनी चाहिये लेकिन हम ऐसा नहीं करते। दूसरों से काम लेनाए स्वयं कम से कम शारीरिक श्रम करना और अन्यों को धन देकर उनसे अपने लिये श्रम करवाना भोग है। वृथा खर्च करनाए अनावश्यक सामान सिर्फ दिखावे के लिये खरीदना, भोग की निम्न अवस्था है। यहीं से आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता का जन्म होता है और व्यक्ति सर्वनाश की ओर यात्रा प्रारम्भ कर देता है।
3. नाश: धन की तीसरी गति है नाश। अनर्गल खर्च, विवाह या मृत्य पश्चात के भोज में दिखावा, जुआ, सट्टा, नशा, हर चीज पैसे से खरीद सकने का अहंकार आदि धन के नाश को इंगित करती हैं।
यहां मन्त्र यही है कि धन कमाना पुरुषार्थ है और अत्यावश्यक भी। समस्या है बुरे तरीके से कमाने या धन को व्यर्थ लुटाने की प्रवृत्ति में। धन का सदुपयोग करें। एक पैसा भी व्यर्थ न जाने देवें। यदि ज्यादा है तो समाज या जिन्हें आवश्यकता हो ऐसे संस्थानों को देवें। दान देवें। मन प्रसन्न रहेगा। यही जीवन है।

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'अहंकार यानि पतन'

एक बार अर्जुन को भगवान कृष्ण के सबसे प्रिय भक्त होने के कारण अहंकार हो गया. भगवान कृष्ण को जब इसका आभास हुआ तो उन्होंने उसे एक ब्राह्मण से मिलवाया जो तलवार लिए चार लोगों को खोज रहा था. अर्जुन ने ब्राह्मण से कहा कि अहिंसा का प्रतीक ब्राह्मण तलवार लिए किन्हें खोज रहा है? ब्राह्मण ने कहा कि मैं एक अदना भक्त हूँ. मेरा पहला शत्रु नारद है जो नारायण - नारायण बोल बोल कर मेरे प्रभु को जागृत रखता है और उन्हें सोने ही नहीं देता. दूसरा शत्रु हृदयहीन प्रहलाद है जिसने मेरे प्रभु को गरम तेल में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और खम्भे से निकलने की पीड़ा दी. मेरा तीसरा शत्रु द्रौपदी है जिसने भगवान को ठीक उसी समय पुकारा जब वे भोजन करने बैठे थे. द्रौपदी ने खुद को मुनिश्री दुर्वासा के श्राप से बचाने हेतु श्री कृष्ण को झूठा भोजन करवाया. अर्जुन ने जब चौथे शत्रु के बारे में पूछा तो ब्राह्मण बोला कि चौथा शत्रु तो अर्जुन है जिसने मेरे प्रभु को सारथी ही बना डाला, उन्हें अति कष्ट दिया और युद्ध में घसीटे रखा. ऐसा कहकर ब्राह्मण रोने लगा और कहने लगा कि मुझ अदने से भक्त को प्रभु की ऐसी दशा देखकर दु:ख हो रहा है. उन्हें कितना कष्ट हुआ होगा. यदि भगवान के चार प्रमुख भक्त ही भगवान की पीड़ा नहीं समझेंगे तो फिर और कौन समझेगा? ब्राह्मण के इन शब्दों को सुनकर अर्जुन का अहंकार समाप्त हो गया. 

कब्रिस्तान ऐसे अनेक लोगों से भरा पड़ा है जो सोचा करते थे कि यह दुनिया उनके बिना चल ही नहीं सकती. 'मैं ही हूंÓ का भाव अहंकार का प्रतीक है. अहंकार बुद्धि को भ्रष्ट कर व्यक्ति को समाज और स्वयं की नजरों से गिरा देता है.
जरा सोचिये-
* 'मैं बता देना चाहता हूँ कि मैं हूंÓ.
* मैं समाज को बता देना चाहता हूं कि मेरे पेशे में मैं सर्वश्रेष्ठ हूं.
* क्या कभी सोचा है कि मैं यह किसे बताना चाहता हूं कि मैं हूं और मैं अपने पेशे में सूरमा हूं?
* क्या मैं उन सभी को बताना चाहता हूं जो खुद भी यही बताने में लगे हैं कि मैं हूं?
समाज और संगठनों की मूल समस्या अहंकार ही है. किसी के कार्य को रोक देना, अच्छे कार्यों की भी नकारात्मक समीक्षा करना, यह जानते हुए भी कि कार्य अच्छा है, उसे अहंकार की संतुष्टि के लिए रोकना, और स्वयं की बात और सुझावों को दूसरों पर उंडेलना भी अहंकार ही तो है. यहां मन्त्र यही है कि 'मैं हूंÓ के भूत से निकालिए और राष्ट्र और समाज के लिये कुछ सार्थक कीजिये. यही जीवन है.

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'नया और अलग सोचिये'

हेनरी फोर्ड ने एक क्रांतिकारी स्वप्न देखा और एक नवीन इंजन की रचना करने का सोचा। वह नया इंजन कम ईंधन से चल सके, ऐसी उसकी कल्पना थी। इन इन्जेंस को वर्तमान जगत वी 8 इंजन के नाम से जानता हैं। यह इंजन वर्तमान में अत्यंत ही बेहतरीन माना जाता है। जब फोर्ड ने इस इंजन की कई डिजाइन अपने अभियंताओं को दिखाई तो सभी श्रेष्ठ पड़े लिखों ने एक ही जवाब दिया 'असंभव-यह नहीं हो सकताÓ। हेनरी फोर्ड ने उन्हें आदेशात्मक स्वर में कहा कि अब बस जुट जाओ और कार्य पूर्ण होने तक लगे रहो। अथक परिश्रम के बाद यह कम तेल खपाने वाला इंजन तैयार हुआ। 

इस कथा में एक बहुत ही बेहतरीन प्रबंध सूक्त छिपा है। वह सूक्त है कि हर व्यक्ति का अपना एक कम्फर्ट जोन होता है जिससे बाहर वो व्यक्ति निकलना नहीं चाहता। जैसे तबादला होने पर, ऑफिस में जगह बदलने पर या जीवन के किसी भी परिवर्तन पर व्यक्ति एक बार तो ना ही कहता है। हमें यहां यह सीखना चाहिए कि दुनिया में परिवर्तन ही स्थायी है, बाकी सब अस्थायी है। जो परिवर्तन को नहीं स्वीकारता, वह नष्ट हो जाता है। अज्ञात का भय, असफल होने का भय और भीषण आलस्य हमें परिवर्तन से रोकता है। इसी को मानसिक थकावट कहते हैं। नवीन सोच और परिवर्तन को स्वीकारना ही प्रबंध की पहली शर्त है।
जरा इन प्रश्नों के उत्तर देवें। इन प्रश्नों के उत्तर से आप समझ जायेंगे कि आपमें खुद को चेंज करने की कितनी शक्ति है।
* क्या आप कम्फर्ट जोन यानि अपने आराम के क्षेत्र को छोड़कर कुछ नया करने में विश्वास करते हैं?
* क्या आपको लगता है कि जो चल रहा है वही सही है?
* क्या आप परिवर्तन को स्वीकारते हैं?
* क्या आप समाज के मूल्यों के अनुसार स्वयं में परिवर्तन लाने को तैयार हैं?
बिल्बर और और्बिल के पिता एक पादरी थे। जब उस पादरी के दोनों पुत्रों ने अपने पिता को कहा कि वे इंसान को हवा में उड़ाने का स्वप्न देखते हैं तो कुपित पिता ने उन्हें झिडकते हुए कहा कि बकवास करने वाले बालकों, उडऩे का अधिकार सिर्फ भगवान को है। उस पादरी का नाम था राईट। इसी राईट के दो पुत्रों यानि इन्ही दो भाइयों बिल्बर और ओर्बिल ने बरसों मेहनत करके हवाई जहाज का आविष्कार किया। याद रहे, वह पादरी राईट और उसके दोनों पुत्र एक ही संसार में रहते थे परन्तु राईट के पुत्रों के स्वप्न देखने और असंभव को संभव बनाकर परिवर्तन करने की प्रवृत्ति बहुत बेहतरीन थी और इसीलिए आज हम इन्हें याद कर रहे हैं। यहां मन्त्र यही है कि परिवर्तन ही जीवन का एकमात्र शाश्वत सत्य है।

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'परिवार और जिम्मेदारी'

एक गरीब मजदूर को एक दिन मजदूरी नहीं मिली। वह बड़ा परेशान था। जब कुछ न मिल सका तो उसने सामने के बिल्व पत्र के पेड़ पर चढ़कर कुछ बिल्व पत्र तोड़कर उन्हें बेचने की सोची। यह सोचकर वह पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ पर चढऩे के बाद उसे अपने सामने उसके भूख से बिलखते बच्चे, उसकी पत्नी और बूढ़े माता पिता का चेहरा घूमने लगा। यह सोचकर उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े। इसी दु:ख में उसके हाथ से एक बिल्वपत्र छिटककर नीचे गिर गया। पेड़ के नीचे जहां पर बिल्व पत्र गिरा, वहां पर एक शिवलिंग था। उस मजदूर के आंसुओं की धार ने उस शिवलिंग का अभिषेक कर दिया। तभी अचानक एक सर्प ने मजदूर को डस लिया और मजदूर मर गया। यमदूत जब मजदूर को जब स्वर्ग के द्वार पर लाये तो स्वर्ग प्रभारी ने उसे स्वर्ग में लेने से मना करते हुए कहा कि मजदूर में कई बुराइयां है और वह स्वर्ग के काबिल नहीं है। तभी भगवान शिव प्रकट हुए। भगवान शिव ने कहा कि जिस व्यक्ति का हृदय अपने परिवार के लिये धड़कता हो, जिसमे परिवार के लिये जिम्मेदारी का बोध हो, उसे तो स्वर्ग मिलना ही चाहिये। मजदूर को स्वर्ग मिला। 

यही तो उत्तरदायित्व बोध या सेन्स ऑफ रेस्पोंसिबिलिटी कहलाता है। जब आप अपनी जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं, ईश्वर सदा आपके साथ होता है। हो सकता है कि आपमें कई छोटे-बड़े दुर्गुण हों लेकिन यदि अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिये आपमें जिम्मेदारी का बोध है तो निश्चित जानिये कि आप पर ईश्वर की कृपादृष्टि रहेगी।
परिवार के लिये हृदय में करुणा का भाव होना ही पारिवारिक प्रेम को जन्म देता है। परिवार के भरण पोषण, उसकी उन्नति, माता पिता की सेवा, और आपसी सामंजस्य रखने का भाव ही परिवार को श्रेष्ठ बनाता है।
जरा सोचिये कि -
* क्या आपका परिवार आपके कृत्यों पर गर्व कर सकता है?
* कहीं आपके किसी कृत्य से परिवार के गौरव पर कलंक तो नहीं लगा है?
* क्या आप परिवार में अपनी आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक जिम्मेदारियों का निर्वहन ठीक प्रकार से कर पा रहे हैं?
* क्या आप स्वयं के स्वास्थ्य का उस स्तर पर ध्यान रखते हैं कि विपत्ति काल में आप सशक्त रूप से परिवार की सेवा कर सकें?
* कहीं आप और आपका स्वास्थ्य ही परिवार के लिये समस्या तो नहीं है?
इन प्रश्नों का उत्तर आपको बहुत कुछ समझा देगा। परिवार तब सशक्त होता है जब उसका प्रत्येक सदस्य स्वयं की जिम्मेदारियों के साथ ही अन्यों की भी जिम्मेदारी उठाने हेतु प्रतिबद्ध होवे। छोटी छोटी बातों को तिलांजलि देना, परस्पर समानुभूति का भाव होना और प्रति पल अन्य परिवारजनों को क्षमा करने का भाव ही सामान्य परिवार को श्रेष्ठ परिवार में परिवर्तित करता है।

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'परिवार'

- क्या एक कुल में जन्म लेना या एक साथ एक घर में रहना परिवार होना है? यदि यह सही है तो कई जानवर भी इस श्रेणी में शामिल हो जायेंगे जो एक ही कुल के हैं और साथ भी रहते हैं। तो क्या आप इसे परिवार कहेंगे? शायद नहीं। आखिर 

क्यों नहीं?
- एक साथ कई भाई और उनकी संतानें एक ही स्थान पर रहते हैं। उनमे विषाद, ईर्ष्या, जलन, क्लेश और लडऩे का भाव प्रबल है। क्या इसे परिवार कह सकते हैं?
- एक साथ रहते तो हैं लेकिन रोज़ कलह और संघर्ष होता है। सोचिये कि इसे परिवार कहेंगे या लड़ाई का अखाड़ा?
आप सही सोच रहे हैं। ये परिवार नहीं हो सकता। जहाँ परिवार रहता है, वहां क्लेश, संघर्ष और ईर्ष्या के लिये स्थान नहीं रह जाता। परिवार तो शुद्ध सात्विक प्रेम, त्याग, आत्मीयता, सहयोग, और समानुभूति के गुणों से चलता है। परिवार का अर्थ है - परी का वार अर्थात माधुर्य का वार जिसके अनुसार प्रत्येक दिन मधुर हो। क्या आपका प्रत्येक दिन मधुरता के साथ बीतता है? यदि नहीं तो आप शायद परिवार में नहीं रह रहे।
- क्या आपको लगता है कि घर जाने से अच्छा तो कुछ पल दफ्तर या कार्यस्थल पर ही बिता दिये जायें ताकि बेकार की किच – पिच न सुननी पड़े?
- क्या आपको प्रतिपल यह चिंता सताती है कि न जाने आज किस बात पर घर में बखेड़ा हुआ होगा?
- क्या आप बाई बेटी के लेन – देन, देरानी जेठानी या सास बहु के झगड़ों के विषय में चिंतित रहते हैं?
- क्या आप और आपके परिजनों के बीच मुकदमेबाजी की नौबत आ चुकी है?
यदि इसका उत्तर हाँ है तो यकीन मानिये कि परिवार में त्याग, सद्भावना और प्रेम में कमी है और आप पाशविक जीवन जी रहे हो। इसका समाधान यही है एक दूसरे से ईर्ष्या करने या अधिकार छीनने के बजाय यह समझें कि पूरा परिवार एक गुलदस्ता है जहाँ प्रत्येक पुष्प भिन्न है। अत: प्रत्येक व्यक्ति की अपनी शक्तियां और कमियां होंगी। कमियों को भी गले लगाना ही सच्चे अर्थों में सहिष्णुता है और यही परिवार में बने रहने की पहली शर्त है। यहाँ मन्त्र यही है कि व्यक्तिगत आचरण में सुधार लाने, बच्चों के आगे स्वयं उदाहरण बनने और छोटी - छोटी बातों का बतंगड़ नहीं बनाने से ही पारिवारिक सामंजस्य बना रह सकता है। स्वयं में सुधार लाना और एडेप्टेशन करना अर्थात खुद को परिवार के नियमों के हिसाब से ढालना ही सुखी परिवार की रीढ़ है।

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