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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (95)

'परिवार'

- क्या एक कुल में जन्म लेना या एक साथ एक घर में रहना परिवार होना है? यदि यह सही है तो कई जानवर भी इस श्रेणी में शामिल हो जायेंगे जो एक ही कुल के हैं और साथ भी रहते हैं। तो क्या आप इसे परिवार कहेंगे? शायद नहीं। आखिर 

क्यों नहीं?
- एक साथ कई भाई और उनकी संतानें एक ही स्थान पर रहते हैं। उनमे विषाद, ईर्ष्या, जलन, क्लेश और लडऩे का भाव प्रबल है। क्या इसे परिवार कह सकते हैं?
- एक साथ रहते तो हैं लेकिन रोज़ कलह और संघर्ष होता है। सोचिये कि इसे परिवार कहेंगे या लड़ाई का अखाड़ा?
आप सही सोच रहे हैं। ये परिवार नहीं हो सकता। जहाँ परिवार रहता है, वहां क्लेश, संघर्ष और ईर्ष्या के लिये स्थान नहीं रह जाता। परिवार तो शुद्ध सात्विक प्रेम, त्याग, आत्मीयता, सहयोग, और समानुभूति के गुणों से चलता है। परिवार का अर्थ है - परी का वार अर्थात माधुर्य का वार जिसके अनुसार प्रत्येक दिन मधुर हो। क्या आपका प्रत्येक दिन मधुरता के साथ बीतता है? यदि नहीं तो आप शायद परिवार में नहीं रह रहे।
- क्या आपको लगता है कि घर जाने से अच्छा तो कुछ पल दफ्तर या कार्यस्थल पर ही बिता दिये जायें ताकि बेकार की किच – पिच न सुननी पड़े?
- क्या आपको प्रतिपल यह चिंता सताती है कि न जाने आज किस बात पर घर में बखेड़ा हुआ होगा?
- क्या आप बाई बेटी के लेन – देन, देरानी जेठानी या सास बहु के झगड़ों के विषय में चिंतित रहते हैं?
- क्या आप और आपके परिजनों के बीच मुकदमेबाजी की नौबत आ चुकी है?
यदि इसका उत्तर हाँ है तो यकीन मानिये कि परिवार में त्याग, सद्भावना और प्रेम में कमी है और आप पाशविक जीवन जी रहे हो। इसका समाधान यही है एक दूसरे से ईर्ष्या करने या अधिकार छीनने के बजाय यह समझें कि पूरा परिवार एक गुलदस्ता है जहाँ प्रत्येक पुष्प भिन्न है। अत: प्रत्येक व्यक्ति की अपनी शक्तियां और कमियां होंगी। कमियों को भी गले लगाना ही सच्चे अर्थों में सहिष्णुता है और यही परिवार में बने रहने की पहली शर्त है। यहाँ मन्त्र यही है कि व्यक्तिगत आचरण में सुधार लाने, बच्चों के आगे स्वयं उदाहरण बनने और छोटी - छोटी बातों का बतंगड़ नहीं बनाने से ही पारिवारिक सामंजस्य बना रह सकता है। स्वयं में सुधार लाना और एडेप्टेशन करना अर्थात खुद को परिवार के नियमों के हिसाब से ढालना ही सुखी परिवार की रीढ़ है।

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'परिवार और मधुर सम्बन्ध'

दो भाई सपरिवार एक घर में रहते थे। एक दिन उनकी पत्नियों में विवाद हुआ और इस कारण भाई आपस में लड़ भिड़े। छोटे भाई ने घर के बंटवारे का प्रस्ताव दिया और दोनों भाइयों के कमरों के बीच में एक दीवार बनवाने का निर्णय लिया। उसने बढ़ई को बुलवाया और कहा कि दो कमरों के बीच में लकड़ी का पार्टीशन बना देवे। बढ़ई चतुर था। उसने दीवार नुमा पार्टीशन बनाने के बजाय दो कमरों को जोडऩे वाला पुल नुमा स्ट्रक्चर बना डाला। वो बोला कि उसे तो यही दीवार बनानी आती है। दोनों भाइयों को गलती का एहसास हुआ। वे पुल के बीच एक दूजे से मिले और पार्टीशन के विचार को त्याग दिया। 

पुल बनाइये। पुल जोड़ता है। पुल जुडऩे का प्रतीक है। दीवार विभाजित करती है। दीवार भेद का, अलग होने का या एक दूसरे से अलगाव का प्रतीक है। भारतीय समाज परिवारों में सेतु या पुल निर्माण को प्राथमिकता देता है। पुल बनाने से तात्पर्य है कि-
* एक दूसरे की गलतियों को नजरअंदाज कीजिये तभी जुड़े रह सकेंगे। गलतियों का छिद्रान्वेषण आपके व्यक्तित्व का नाश कर देगा। आप सडांध की ओर बढऩे लगेंगे।
* बच्चों और महिलाओं की छोटी-मोटी घरेलू बातों के कारण व्यवहार को तोडऩा या व्यर्थ में क्लेश करना मूर्खता है। बच्चों के वयवहार को समझना चाहिये। बच्चे इम्प्ल्सेज यानि आवेगों से अपना व्यवहार बनाते हैं। उन्हें इन इम्प्ल्सेज या आवेगों पर नियंत्रण करना नहीं आता। इससे तात्पर्य है कि यदि बच्चे को प्यास लगी है तो उसे तुरंत ही पानी चाहिये। यदि नहीं मिला तो वह रोयेगा। उसका नियंत्रण नहीं है। इसी प्रकार कई लोग इम्प्ल्सेज द्वारा नियंत्रित होते हैं। उन्हें कुछ भी कहो, वे तुरंत प्रतिक्रिया देंगे। इनपर ध्यान न देवें वरना सम्बन्ध टूटने के कगार पर आ जायेंगे।
* औरतों की (सामान्य बात है, महिला शक्ति सर्वोच्च है, अन्यथा न लेवें) दुनिया बहुत ही छोटी होती है। घर, परिवार, बच्चे, बाई-बेटी का लेन देन, शादी में दी जाने वाली साडिय़ां और कपडे, आदि की बातों पर भी कई बार संग्राम हो जाते हैं। इनपर ध्यान न देवें। यदि ध्यान दिया तो समस्या और कष्ट होगा और घरों के बीच में दीवारें खिंच जायेंगी।
यहां मन्त्र यही है कि बड़ा सोचना, छोटी बातों में न उलझना, क्षमा करने का भाव रखना, इम्पल्स से गवर्न न होना और सदा सहनशील रहना ही परिवार में मधुर संबंधों की स्थापना करता है।

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'भक्ति की शक्ति'

मार्कंडेय की आयु सिर्फ सोलह साल थी. सोलहवें जन्मदिन की पूर्व संध्या पर मार्कंडेय ने शिव पूजा प्रारम्भ की. थोड़ी देर बाद यम प्रकट हुए और मार्कंडेय को साथ चलने को कहा. मार्कंडेय ने निवेदन किया कि उन्हें शिव पूजा के समाप्त होने के बाद ले जाया जाये. यमराज ने उन्हें कहा कि मृत्यु किसी का इंतजार नहीं कर सकती और उन्होंने अपना पाश फैंका. मार्कंडेय ने पूर्ण समर्पित भाव से भगवान शिव को पुकारा. भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने यम से कहा कि मार्कंडेय की भक्ति में शुद्ध समर्पण है अत: उन्हें यमलोक न ले जाया जाये. भगवान शिव उन्हें अपने साथ कैलाश ले गये. मार्कंडेय सदा शिवजी के साथ ही रहे. उनकी आयु सदा सोलह साल ही रही. उन्हें सदा के लिये जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिली. 

भक्ति और प्रार्थना में अपार शक्ति होती है. समर्पित भाव से, सम्पूर्ण सकारात्मक भाव के साथ की गई प्रार्थना में बहुत बल होता है. प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये कि कोई काम, कोई युक्ति काम नहीं आने वाली. सिर्फ प्रार्थना का ही सहारा है. भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवद गीता में भक्ति योग की शिक्षा देते हुए उसे भी ज्ञानयोग और कर्मयोग के समतुल्य ठहराया है. जरा सोचिये कि-
* जब आप ईश्वर से प्रार्थना कर रहे होते हैं तो आपका क्या भाव होता है-आभार जताने का या याचक का?
* क्या आपको नहीं लगता कि जितना जरूरी याचना करना, ईश्वर से मांगना है, उतना ही जरूरी उसका आभार जताना भी है?
* अपनी प्रार्थना में पिछली बार आपने ईश्वर का आभार कब जताया था? क्या आपको याद है?
प्रार्थना का अर्थ यह नहीं है कि हम स्वयं तो अकर्मण्य रहें और ईश्वर से इच्छाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते रहें. ईश्वर हमारी तब सुनता है जब हम पुरुषार्थ भी उच्च स्तर का करते हैं. यहां मन्त्र यही है कि जब आप ईश्वरीय सत्ता हेतु सम्पूर्ण समर्पण कर देते हैं , वहीं से आपका उत्थान प्रारम्भ हो जाता है. कहा गया है कि-
जब सौंप दिया है जीवन का
सब भार तुम्हारे हाथों में;
अब जीत तुम्हारे हाथों में
और हार तुम्हारे हाथों में.

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'धैर्य और ईश्वरीय कृपा'

पंजाब में एक गीत प्रसिद्ध है जो धीरज धरने की प्रेरणा देता है।

सदा न बागी बुलबुल बोले,
सदा न बाग बहारां,
सदा न राज खुशी दे होंदे,
सदा न मजलिस यारां।
गीत सिखाता है कि सदा अनुकूल परिस्थितियां हों, यह तो आवश्यक नहीं हैं अत: हमें धैर्य रखना चाहिये। यदि परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो स्वयं से धैर्यपूर्वक कहते रहें कि 'यह वक्त भी गुजर जायेगाÓ। अच्छा वक्त यदि बीत गया है तो क्या बुरा वक्त नहीं बीतेगा? धैर्य रखें। सिर्फ धैर्य रखने से काम नहीं चल सकता। आवश्यक होता है अध्यवसाय। अध्यवसाय का अर्थ है निरंतर धैर्य रखना, लम्बी अवधि तक धैर्य रखना। अध्यवसाय नामुमकिन नहीं है। इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जायेगा कि अध्यवसाय ही जीवन का प्रमुख अवयव है-
* वीर सावरकर को अंग्रेज सरकार ने अंडमान जेल में डाल दिया। उन्हें काला पानी की सजा दी गई। अत्यंत कष्टप्रद यातनाओं के बीच भी वीर सावरकर ने धैर्य नहीं खोया। अत्यधिक घायल होने के बावजूद सावरकर ने बेडिय़ों की नई भाषा इजाद करी। उनमे बोल सकने की भी शक्ति नहीं बची थी। इसके बावजूद उन्होंने धैर्य के साथ सभी कैदियों में स्वतंत्रता की अलख जगाई और जैसे ही वे तीन बार बेडिय़ों को झंकृत करते, उसी समय सारे कैदी एक स्वर में वन्दे मातरम् का उद्घोष करते। धैर्य जीता, उत्साह जीता और यातनाएं हार गई।
* कोलंबस यात्रा कर रहा था। उसके पास क्या था? उसके साथियों को लगता था कि इस निरर्थक यात्रा के बाद कहां जाकर पहुंचेंगे? लेकिन उन्होंने धैर्य रखा। यात्रा जारी राखी। अध्यवसाय अपनाया। इसी कारण अमरीका की खोज हुई।
* सैकड़ों बार असफल रहने के बाद उसकी पूरी प्रयोगशाला जल कर नष्ट हो गई। अध्यवसाय अपनाया। उस व्यक्ति ने एक हफ्ते बाद ही बिजली का बल्ब बना डाला। वह धैर्यवान व्यक्ति एडिसन था।
* कई वर्षों तक निर्धनता झेलने के बाद ईश्वरीय कृपा से धन वर्षा होना, संतानहीनता का दंश झेल रहे दंपत्ति को अकस्मात जुड़वां बच्चों की प्राप्ति, कई वर्ष नेपथ्य में रहने वाले व्यक्ति का अकस्मात उदय आदि उदाहरण हमें धैर्य रखने और अध्यवसाय को अपनाने की सलाह देते हैं।
यहां मन्त्र यही है कि धीरज रखें। जल्दबाजी न करें। ईश्वर सभी को देता है। ईश्वर से गलती नहीं हो सकती। स्वयं को ईश्वरीय सत्ता को सौंप देवें। यह समर्पण ही वास्तव में अध्यवसाय कहलाता है। यही सुखद जीवन का मन्त्र है।

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मूर्खों को न देवें सलाह

एक बन्दर और एक चिड़िया पीपल के पेड़ पर रहते थे. चिड़िया ने दिन – रात मेहनत करके घोंसला बनाया था ताकि विपत्ति काल में या वर्षा ऋतु में वह सुखपूर्वक जी सके. एक दिन भीषण वर्षा हुई. वर्षा होते ही बन्दर सर्दी से ठिठुरने लगा. चिड़िया ने बन्दर से कहा कि बन्दर ने अपना घर न बनाकर बहुत बड़ी गलती की है. बन्दर ने गुस्से से चिड़िया को चुप रहने को कहा. थोड़ी देर बाद चिड़िया ने पुनः बन्दर को घर बनाने और घर के फायदों पर भाषण दे डाला. बार – बार घर बनाने के सलाह सुनकर बन्दर क्रोधित हो गया. बन्दर बोला कि वह घर बना तो नहीं सकता लेकिन तोड़ तो सकता है. ऐसा कहकर बंदर ने चिड़िया का घोंसला तोड़ दिया. चिड़िया भी अब सर्दी में धूजने लगी. चिड़िया को मूर्खों को सलाह देने का दंड मिला.

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'एक खरगोश ही काफी'

चन्दू के पिता चन्दू को खरगोशों के पार्क में ले गये. उन्होंने चन्दू को कोई भी एक खरगोश पकडऩे का लक्ष्य दिया. सबसे पहले चन्दू ने सबसे सुंदर खरगोश को पकडऩे के लिये दौड़ लगाना प्रारम्भ किया. सुन्दर खरगोश पकड़ में नहीं आया. चन्दू भी थक रहा था अत: चन्दू ने तुरंत ही दूसरे खरगोश को पकडने के लिये दौड़ लगाना शुरू किया. दूसरे को पकड़ पाने से पहले ही उसे एक चितकबरा खरगोश दिखा और वो उसके पीछे दौड़ पड़ा. ऐसा चलता रहा. चन्दू खरगोश बदलता रहा और अंतत: किसी खरगोश को न पकड़ सका. उसके पिता ने उसे समझाया कि यदि वो अनेक खरगोशों की जगह किसी एक खरगोश के भागने के पैटर्न पर शोध और समीक्षा करता और योजनाबद्ध तरीके से पीछा करता तो शायद वो किसी खरगोश को पकड़ लेता.

हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो चन्दू की तरह हैं.
जरा सोचिये-
* विद्यार्थी कहता है कि 'साइंस लूंगा, डॉक्टर तो बना समझोÓ. यह कहकर साइंस ली और जैसे ही श्रम करने की बारी आई तो सोफेस्टिकेटेड अंदाज में कह दिया कि 'मेरा इंटरेस्ट साइंस में नहीं है, मैं तो आईएएस के लिए मुफीद हूंÓ. अब चले आईएएस की ओर. वहां भी भरसक श्रम को ताड़कर उससे भी नाता तोड़ लिया और चले किसी अन्य कोर्स की ओर. कोर्स दर कोर्स बदलते रहे. किया कुछ नहीं. ऐसी पढाई का क्या मोल? हर विषय में आपकी दिलचस्पी हो, यह जरूरी थोड़े ही है लेकिन पडऩा तो पड़ता ही है. जिस प्रकार चन्दू किसी खरगोश को न पकड़ सका, उसी प्रकार किसी भी विषय में आप महारथ हासिल न कर सकेंगे.
* खरगोश पकडऩे का उदाहरण सिर्फ विद्यार्थियों के लिये नहीं है. जीवन में भी यही होता है. हम किसी एक लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु जुटते हैं. जैसे ही उसमे मेहनत करने या समर्पण करने का समय आता है, तभी किसी अन्य लक्ष्य की तरफ मुड़ जाते हैं. लक्ष्य संधान न हो पाने का सबसे बड़ा कारण यही है. समूचा जीवन सिर्फ दौडऩे में ही बीत जाता है. मिलता कुछ नहीं है.
यहां मन्त्र यही है कि आप दोनों पैर हवा में नहीं रख सकते. एक पैर जमीन पर होना चाहिये. उसी प्रकार स्वप्न देखने मात्र से लक्ष्य हासिल नहीं होते. मेहनत चाहिये. एक खरगोश अर्थात लक्ष्य पर नजर रखें. यही लक्ष्य संधान का परम सत्य है.

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'दिखावा छोडिय़े'

पांच सौ रूपए के नोट की कीमत पांच सौ रूपए इसलिए होती है क्योंकि उस पर गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं और उन्हीं हस्ताक्षर के कारण उस कागज का मूल्य दूसरे सामान्य कागजों से अधिक होता है। यह हस्ताक्षर आतंरिक मूल्य कहलाता है और कागज फेस वैल्यू है। फेस वैल्यू बाहरी पहचान है और आतंरिक वैल्यू हमारे संस्कारों और श्रेष्ठता का प्रतीक है। मैनेजमेंट में फेस वैल्यू के स्थान पर आतंरिक वैल्यू ज्यादा महत्व रखती है। किसी पद पर पहुंच जाना, धन संपन्न बन जाना, अनेकानेक पुरस्कार प्राप्त करना फेस वैल्यू है, परन्तु देश और समाज के हित में कुछ बेहतर कार्य करने की इच्छा रखते हुए समर्पित भाव से कार्य करना आतंरिक वैल्यू को दर्शाता है। यदि महात्मा गांधी फेस वैल्यू को महत्व देकर बैरिस्टर बने रहते, सुभाष बोस आईसीएस बने रहते, रानी लक्ष्मीबाई सिर्फ एक रानी बनी रहती तो क्या आज हम उन्हें राष्ट्र नायक के रूप में याद कर रहे होते? इन सभी ने फेस वैल्यू के स्थान पर आतंरिक वैल्यू को ज्यादा तरजीह दी और राष्ट्र नायक बनकर उभरे। 

वर्तमान में समाज फेस वैल्यू के पीछे दौड लगा रहा है। वह अपना आतंरिक मूल्य नहीं समझ पा रहा। बाहरी दिखावा, ब्रांडेड पहनावा, शारीरिक रूप से सुंदर बनने की हो?, पैसों का भोंडा प्रदर्शन आदि ने समाज में समस्याएं ही खड़ी की हैं। सुन्दर दिखना या फेस वैल्यू को अच्छा बनाना गलत नहीं है। यह भी बहुत आवश्यक है लेकिन सिर्फ फेस वैल्यू के पीछे पड़े रहना गलत है। प्रत्येक व्यक्ति को समझना होगा कि वह कुछ अच्छा और सार्थक करने के लिए जन्मा है। ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को अद्वितीय बनाया है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग पहचान और शख्सियत है। इसी शख्सियत को या अपने मौलिक सामर्थ्य को पहचानना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।
वर्तमान मैनेजमेंट में भी मौलिक सामथ्र्य अर्थात् आंतरिक मूल्यों को विकसित करने की दिशा में अथक प्रयास हो रहे हैं। कम्प्यूटर की एक प्रमुख कंपनी द्वारा एक ही एसंबली लाइन पर अनेकानेक कम्प्यूटर्स का निर्माण या एक बड़े इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन द्वारा प्रत्येक वस्तु के आकार को सूक्ष्म बनाने का सामथ्र्य विकसित किया जाना इसके उदाहरण हैं। यहां मन्त्र यही है कि व्यक्ति और संगठनों को अपने आतंरिक मूल्य को विकसित कर मौलिक सामथ्र्य में बढ़ोतरी करनी चाहिये।

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'कार्यस्थल के ठग'

एक भिक्षुक था। एक दिन किसी व्यक्ति ने उसे दान में एक बकरा दे दिया। वो भिक्षुक घर जा रहा था तभी सुनसान रास्ते पर तीन ठगों ने उसे देखा। ठगों ने बकरा प्राप्त करने की योजना बनाई और अलग - अलग हो गये। सबसे पहले एक ठग ने भिक्षुक के पास से गुजरते हुए कहा कि वो भिक्षुक एक कुत्ते को अपने कंधे पर उठा कर क्यों ले जा रहा है? इस पर भिक्षुक ने ठग को भला-बुरा कहते हुए कहा कि इतना बड़ा बकरा क्या उसे कुत्ता नजर आता है? थोड़ी दूर चलने के बाद भिक्षुक को दूसरा ठग मिला। उसने भी भिक्षुक से यही कहा कि वो कंधे पर कुत्ता लादकर क्यों चल रहा है। भिक्षुक उसे झिड़ककर आगे बढ़ गया। भिक्षुक से अब तीसरा ठग मिला और उसने भे वही कहा जो पहले दोनों ठगों ने कहा था। भिक्षुक के मन में आया कि हो न हो उसकी आंखे ही धोखा खा रही है क्योंकि इतने सारे लोग झूठ नहीं बोल सकते। उसने बकरे को कुत्ता मान लिया और कंधे से उतारकर घर चला गया। तीनो ठगों ने बकरे को मारकर दावत उड़ाई। सांकेतिक कथा सिखाती है कि-

1. बार-बार अनेकानेक लोगों द्वारा बोला गया झूठ भी सच ही हो जाता है।
2. यदि आप नौकरी करते हैं तो इस बकरे की कथा से सीखिये कि कहीं आपका ही कोई सहकर्मी बारम्बार बॉस के पास जाकर आपके बारे में असत्य बात न कहता जाये। कहीं आपकी इतनी ज्यादा कारसेवा न हो जाये कि आपकी नौकरी छोडऩे की नौबत आ जाये। इस कथा में आप बॉस को भिक्षुक के रूप में देखें और ठग हैं आपके सहकर्मी।
3. इन ठगों की भांति कार्यस्थल पर भी कुछ कर्मचारियों का 'नेक्ससÓ होता है। वे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से श्रेष्ठ जनों, बेहतर कार्यकर्ताओं का सफाया करते हैं क्योंकि वे यह जानते हैं कि बेहतर कार्मिकों जितना अच्छा कार्य तो वे कर नहीं सकेंगे अत: उन्ही बेहतर कार्मिकों के बारे में उल-जलूल फीडबैक देना इनका धर्म होता है।
4. कार्यस्थल के ऐसे ठगों का मूल लक्षण है बॉस से जबरदस्त जुड़ाव, उसके निजी कार्य करना, उसकी पत्नी और बच्चों का विशेष ध्यान रखना, बॉस को सर्वशक्ति संपन्न होने का बोध करवाना और जब सब ठीक प्रकार से हो जाये तो अपने गुप्त एजेंडे पर कार्य प्रारम्भ करके सीधे और श्रेष्ठ लोगों का सफाया करना। जैसा कि कथा में ठगों ने भिक्षुक के साथ किया।
यहां मन्त्र यही है कि कार्यस्थल के ठगों से सावधान रहें, बारम्बार कहा गया असत्य कहीं सत्य न हो जाये - इसका ध्यान रखें और सदा प्लान बी अर्थात आल्टरनेटिव योजना तैयार रखें।

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'सीखना ही जीवन'

एक दार्शनिक के पास हर दिन कई विद्वानों का जमावड़ा लगा रहता था। सभी लोग उनसे कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करके ही जाया करते थे। स्वयं दार्शनिक खुद को कभी ज्ञानी नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि इन्सान हमेशा नया सीखता ही रहता है तो वह पूर्ण ज्ञानी कैसे हुआ? उन्होंने कहा कि वह प्रत्येक व्यक्ति आपका गुरु है, जिससे आप कुछ नया सीखते हैं। उनका मत था कि ज्ञान का अहंकार करना मूर्खता है। 

उनकी बात सत्य है। इन्सान अपनी पूरी जिन्दगी में भी कुछ पूरा नहीं सीख सकता। हमेशा कुछ न कुछ अधूरा ही रहता है। हर इन्सान के पास कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो दूसरों के पास नहीं है। अत: हर किसी को हर किसी से सीखते रहना चाहिये। हर बात और अनुभव पुस्तकों से नहीं मिलते क्योंकि बहुत कुछ ऐसा है जो लिखा नहीं गया है। समाज के बीच रहकर और लोगो से सीखते रहने की आदत डालकर ही हम अपने आप को श्रेष्ठता की ओर ले जा सकते हैं।
यदि आप नित्य नया सीखने हेतु तत्पर नहीं है तो इसका अर्थ है कि आप सडांध की ओर यात्रा कर रहे हैं। नया सीखना ही जीवन का मर्म है। आपने तालाब से एक लोटा भर लिया। आपने पानी पीया। उससे आपकी प्यास बुझ गई। क्या इसका अर्थ यह है कि आपने पूरा तालाब पी लिया है। प्रत्येक व्यक्ति को समझना चाहिये कि ज्ञान तालाब के सामान है। हमें जितना पता है वो एक लोटे से ज्यादा नहीं है। अत: अपने तथाकथिक ज्ञान का अहंकार करना तुरंत बंद करना चाहिये।
सदा नया सीखने की तत्परता ही मनुष्य को पशु से अलग करती है। क्या आपने कभी सुना या देखा है कि किसी पशु ने अपने ज्ञान में जबरदस्त वृद्धि करके समूचे संसार को जीने की नई दृष्टि दी हो? शायद नहीं। सिर्फ मनुष्य ही ऐसा कर सकता है। अत: नया सीखिये। प्रति पल सीखिये। प्रत्येक व्यक्ति से सीखिये. छोटे से छोटे कारिंदे से सीखिये। प्रत्येक व्यक्ति ऐसा कुछ जरूर जानता होगा जिसे आप नहीं जानते। यहां मन्त्र यही है कि प्रतिपल नया सीखना ही जीवन है। सीखने का त्याग करने का अर्थ है सांस लेने वाला शव बनना। अब मर्जी आपकी है कि आप वास्तविक मनुष्य बनना चाहते हैं या सांस लेने वाला शव?

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'बी द चेंज'

तालाब किनारे एक लड़के ने देखा कि एक बूढी महिला छोटे-छोटे कछुओं की पीठ को साफ कर रही थी। लड़के ने जब उस महिला से ऐसा करने का कारण पूछा तो महिला ने कहा कि कछुओं की पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचरा जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है और कछुओं को तैरने में दिक्कत आती है। अत: वो कवच को साफ करते है। लड़के ने महिला से पूछा कि वो अकेली कब तक इन असंख्य कछुओं की पीठ साफ करेगी और इससे आखिर कितना परिवर्तन हो सकेगा? महिला ने बड़ा ही मार्मिक जवाब दिया कि भले ही उसके इस कार्य से से संसार में कोई बड़ा बदलाव नहीं आये लेकिन कछुए की जिन्दगी तो बदलेगी ही। 

छोटा ही सही पर सकारात्मक दिशा में चेंज होना सीखिये। जिन्दगी में बहुत सारे अवसर ऐसे आते हैं जब हम बुरे हालात का सामना कर रहे होते है। हम परिवर्तन की सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते। मन मसोसकर यही कहते हैं कि क्या किया जा सकता है? इतनी जल्दी तो सिस्टम को बदलना संभव नहीं है। ऐसा सोचकर वह कार्य भी नहीं करते जिससे समाज में कुछ नई क्रान्ति आये। इससे निकलिये। गांधीजी ने कहा है - 'बी द चेंजÓ। जो परिवर्तन आप समाज और राष्ट्र में लाना चाहते हैं उसे पहले खुद में लाइये। स्वयं से शुरुआत कीजिये।
* आप चाहते हैं कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें। उन्हें मत सिखाइये। स्वयं पालन करना प्रारम्भ कीजिये। खुद से पूछिये कि क्या आप हेलमेट लगाते हैं या सीट बेल्ट बांधते हैं? यदि नहीं तो क्रान्ति नहीं आयेगी।
* आप चाहते हैं कि नारी का सम्मान हो। बहन बेटियां पड़ें। आगे बड़ें।
जरा सोचिये कि क्या आप अपनी पुत्रियों को उच्च शिक्षा दे रहे हैं?
* आप चाहते हैं कि विवाह से फिजूलखर्ची मिटे। क्या आप अपने पुत्र का आडम्बर विहीन विवाह करवाएंगे?
* आप चाहते हैं कि दान के नाम पर समर्थ पुत्रियों और बहनों को टिफिन/नकद बांटना बंद हो। समाज में कईयों को आपके दान की आवश्यकता है और यह आवश्यकता उन बेटियों से अधिक है। क्या आप टिफिन या नकद बांटना रोक सकेंगे?
क्या पता आपका छोटा सा बदलाव कुछ क्रांति लेकर आये। हर बदलाव की शुरुआत स्वयं से होती है। कई बार तो सफलता हमसे बस थोड़ी ही दूर होती है कि हम हार मान लेते है। अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें। कोई भी सकारात्मक परिवर्तन आसान नहीं होता। परिवर्तन में सदियां लगती हैं। आप परिवर्तन के संवाहक बनें तभी राष्ट्र प्रगति करेगा। 'बी ए चेंजमेकरÓ। यहाँ मन्त्र यही है कि अपनी क्षमताओं पर भरोसा रख कर किया जाने वाला कोई भी परिवर्तन छोटा नहीं होता। सिस्टम तभी बदलेगा जब हम खुद बदलने को तैयार होंगे।

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