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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (104)

'एक खरगोश ही काफी'

चन्दू के पिता चन्दू को खरगोशों के पार्क में ले गये. उन्होंने चन्दू को कोई भी एक खरगोश पकडऩे का लक्ष्य दिया. सबसे पहले चन्दू ने सबसे सुंदर खरगोश को पकडऩे के लिये दौड़ लगाना प्रारम्भ किया. सुन्दर खरगोश पकड़ में नहीं आया. चन्दू भी थक रहा था अत: चन्दू ने तुरंत ही दूसरे खरगोश को पकडने के लिये दौड़ लगाना शुरू किया. दूसरे को पकड़ पाने से पहले ही उसे एक चितकबरा खरगोश दिखा और वो उसके पीछे दौड़ पड़ा. ऐसा चलता रहा. चन्दू खरगोश बदलता रहा और अंतत: किसी खरगोश को न पकड़ सका. उसके पिता ने उसे समझाया कि यदि वो अनेक खरगोशों की जगह किसी एक खरगोश के भागने के पैटर्न पर शोध और समीक्षा करता और योजनाबद्ध तरीके से पीछा करता तो शायद वो किसी खरगोश को पकड़ लेता.

हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो चन्दू की तरह हैं.
जरा सोचिये-
* विद्यार्थी कहता है कि 'साइंस लूंगा, डॉक्टर तो बना समझोÓ. यह कहकर साइंस ली और जैसे ही श्रम करने की बारी आई तो सोफेस्टिकेटेड अंदाज में कह दिया कि 'मेरा इंटरेस्ट साइंस में नहीं है, मैं तो आईएएस के लिए मुफीद हूंÓ. अब चले आईएएस की ओर. वहां भी भरसक श्रम को ताड़कर उससे भी नाता तोड़ लिया और चले किसी अन्य कोर्स की ओर. कोर्स दर कोर्स बदलते रहे. किया कुछ नहीं. ऐसी पढाई का क्या मोल? हर विषय में आपकी दिलचस्पी हो, यह जरूरी थोड़े ही है लेकिन पडऩा तो पड़ता ही है. जिस प्रकार चन्दू किसी खरगोश को न पकड़ सका, उसी प्रकार किसी भी विषय में आप महारथ हासिल न कर सकेंगे.
* खरगोश पकडऩे का उदाहरण सिर्फ विद्यार्थियों के लिये नहीं है. जीवन में भी यही होता है. हम किसी एक लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु जुटते हैं. जैसे ही उसमे मेहनत करने या समर्पण करने का समय आता है, तभी किसी अन्य लक्ष्य की तरफ मुड़ जाते हैं. लक्ष्य संधान न हो पाने का सबसे बड़ा कारण यही है. समूचा जीवन सिर्फ दौडऩे में ही बीत जाता है. मिलता कुछ नहीं है.
यहां मन्त्र यही है कि आप दोनों पैर हवा में नहीं रख सकते. एक पैर जमीन पर होना चाहिये. उसी प्रकार स्वप्न देखने मात्र से लक्ष्य हासिल नहीं होते. मेहनत चाहिये. एक खरगोश अर्थात लक्ष्य पर नजर रखें. यही लक्ष्य संधान का परम सत्य है.

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'दिखावा छोडिय़े'

पांच सौ रूपए के नोट की कीमत पांच सौ रूपए इसलिए होती है क्योंकि उस पर गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं और उन्हीं हस्ताक्षर के कारण उस कागज का मूल्य दूसरे सामान्य कागजों से अधिक होता है। यह हस्ताक्षर आतंरिक मूल्य कहलाता है और कागज फेस वैल्यू है। फेस वैल्यू बाहरी पहचान है और आतंरिक वैल्यू हमारे संस्कारों और श्रेष्ठता का प्रतीक है। मैनेजमेंट में फेस वैल्यू के स्थान पर आतंरिक वैल्यू ज्यादा महत्व रखती है। किसी पद पर पहुंच जाना, धन संपन्न बन जाना, अनेकानेक पुरस्कार प्राप्त करना फेस वैल्यू है, परन्तु देश और समाज के हित में कुछ बेहतर कार्य करने की इच्छा रखते हुए समर्पित भाव से कार्य करना आतंरिक वैल्यू को दर्शाता है। यदि महात्मा गांधी फेस वैल्यू को महत्व देकर बैरिस्टर बने रहते, सुभाष बोस आईसीएस बने रहते, रानी लक्ष्मीबाई सिर्फ एक रानी बनी रहती तो क्या आज हम उन्हें राष्ट्र नायक के रूप में याद कर रहे होते? इन सभी ने फेस वैल्यू के स्थान पर आतंरिक वैल्यू को ज्यादा तरजीह दी और राष्ट्र नायक बनकर उभरे। 

वर्तमान में समाज फेस वैल्यू के पीछे दौड लगा रहा है। वह अपना आतंरिक मूल्य नहीं समझ पा रहा। बाहरी दिखावा, ब्रांडेड पहनावा, शारीरिक रूप से सुंदर बनने की हो?, पैसों का भोंडा प्रदर्शन आदि ने समाज में समस्याएं ही खड़ी की हैं। सुन्दर दिखना या फेस वैल्यू को अच्छा बनाना गलत नहीं है। यह भी बहुत आवश्यक है लेकिन सिर्फ फेस वैल्यू के पीछे पड़े रहना गलत है। प्रत्येक व्यक्ति को समझना होगा कि वह कुछ अच्छा और सार्थक करने के लिए जन्मा है। ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को अद्वितीय बनाया है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग पहचान और शख्सियत है। इसी शख्सियत को या अपने मौलिक सामर्थ्य को पहचानना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।
वर्तमान मैनेजमेंट में भी मौलिक सामथ्र्य अर्थात् आंतरिक मूल्यों को विकसित करने की दिशा में अथक प्रयास हो रहे हैं। कम्प्यूटर की एक प्रमुख कंपनी द्वारा एक ही एसंबली लाइन पर अनेकानेक कम्प्यूटर्स का निर्माण या एक बड़े इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन द्वारा प्रत्येक वस्तु के आकार को सूक्ष्म बनाने का सामथ्र्य विकसित किया जाना इसके उदाहरण हैं। यहां मन्त्र यही है कि व्यक्ति और संगठनों को अपने आतंरिक मूल्य को विकसित कर मौलिक सामथ्र्य में बढ़ोतरी करनी चाहिये।

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'कार्यस्थल के ठग'

एक भिक्षुक था। एक दिन किसी व्यक्ति ने उसे दान में एक बकरा दे दिया। वो भिक्षुक घर जा रहा था तभी सुनसान रास्ते पर तीन ठगों ने उसे देखा। ठगों ने बकरा प्राप्त करने की योजना बनाई और अलग - अलग हो गये। सबसे पहले एक ठग ने भिक्षुक के पास से गुजरते हुए कहा कि वो भिक्षुक एक कुत्ते को अपने कंधे पर उठा कर क्यों ले जा रहा है? इस पर भिक्षुक ने ठग को भला-बुरा कहते हुए कहा कि इतना बड़ा बकरा क्या उसे कुत्ता नजर आता है? थोड़ी दूर चलने के बाद भिक्षुक को दूसरा ठग मिला। उसने भी भिक्षुक से यही कहा कि वो कंधे पर कुत्ता लादकर क्यों चल रहा है। भिक्षुक उसे झिड़ककर आगे बढ़ गया। भिक्षुक से अब तीसरा ठग मिला और उसने भे वही कहा जो पहले दोनों ठगों ने कहा था। भिक्षुक के मन में आया कि हो न हो उसकी आंखे ही धोखा खा रही है क्योंकि इतने सारे लोग झूठ नहीं बोल सकते। उसने बकरे को कुत्ता मान लिया और कंधे से उतारकर घर चला गया। तीनो ठगों ने बकरे को मारकर दावत उड़ाई। सांकेतिक कथा सिखाती है कि-

1. बार-बार अनेकानेक लोगों द्वारा बोला गया झूठ भी सच ही हो जाता है।
2. यदि आप नौकरी करते हैं तो इस बकरे की कथा से सीखिये कि कहीं आपका ही कोई सहकर्मी बारम्बार बॉस के पास जाकर आपके बारे में असत्य बात न कहता जाये। कहीं आपकी इतनी ज्यादा कारसेवा न हो जाये कि आपकी नौकरी छोडऩे की नौबत आ जाये। इस कथा में आप बॉस को भिक्षुक के रूप में देखें और ठग हैं आपके सहकर्मी।
3. इन ठगों की भांति कार्यस्थल पर भी कुछ कर्मचारियों का 'नेक्ससÓ होता है। वे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से श्रेष्ठ जनों, बेहतर कार्यकर्ताओं का सफाया करते हैं क्योंकि वे यह जानते हैं कि बेहतर कार्मिकों जितना अच्छा कार्य तो वे कर नहीं सकेंगे अत: उन्ही बेहतर कार्मिकों के बारे में उल-जलूल फीडबैक देना इनका धर्म होता है।
4. कार्यस्थल के ऐसे ठगों का मूल लक्षण है बॉस से जबरदस्त जुड़ाव, उसके निजी कार्य करना, उसकी पत्नी और बच्चों का विशेष ध्यान रखना, बॉस को सर्वशक्ति संपन्न होने का बोध करवाना और जब सब ठीक प्रकार से हो जाये तो अपने गुप्त एजेंडे पर कार्य प्रारम्भ करके सीधे और श्रेष्ठ लोगों का सफाया करना। जैसा कि कथा में ठगों ने भिक्षुक के साथ किया।
यहां मन्त्र यही है कि कार्यस्थल के ठगों से सावधान रहें, बारम्बार कहा गया असत्य कहीं सत्य न हो जाये - इसका ध्यान रखें और सदा प्लान बी अर्थात आल्टरनेटिव योजना तैयार रखें।

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'सीखना ही जीवन'

एक दार्शनिक के पास हर दिन कई विद्वानों का जमावड़ा लगा रहता था। सभी लोग उनसे कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करके ही जाया करते थे। स्वयं दार्शनिक खुद को कभी ज्ञानी नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि इन्सान हमेशा नया सीखता ही रहता है तो वह पूर्ण ज्ञानी कैसे हुआ? उन्होंने कहा कि वह प्रत्येक व्यक्ति आपका गुरु है, जिससे आप कुछ नया सीखते हैं। उनका मत था कि ज्ञान का अहंकार करना मूर्खता है। 

उनकी बात सत्य है। इन्सान अपनी पूरी जिन्दगी में भी कुछ पूरा नहीं सीख सकता। हमेशा कुछ न कुछ अधूरा ही रहता है। हर इन्सान के पास कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो दूसरों के पास नहीं है। अत: हर किसी को हर किसी से सीखते रहना चाहिये। हर बात और अनुभव पुस्तकों से नहीं मिलते क्योंकि बहुत कुछ ऐसा है जो लिखा नहीं गया है। समाज के बीच रहकर और लोगो से सीखते रहने की आदत डालकर ही हम अपने आप को श्रेष्ठता की ओर ले जा सकते हैं।
यदि आप नित्य नया सीखने हेतु तत्पर नहीं है तो इसका अर्थ है कि आप सडांध की ओर यात्रा कर रहे हैं। नया सीखना ही जीवन का मर्म है। आपने तालाब से एक लोटा भर लिया। आपने पानी पीया। उससे आपकी प्यास बुझ गई। क्या इसका अर्थ यह है कि आपने पूरा तालाब पी लिया है। प्रत्येक व्यक्ति को समझना चाहिये कि ज्ञान तालाब के सामान है। हमें जितना पता है वो एक लोटे से ज्यादा नहीं है। अत: अपने तथाकथिक ज्ञान का अहंकार करना तुरंत बंद करना चाहिये।
सदा नया सीखने की तत्परता ही मनुष्य को पशु से अलग करती है। क्या आपने कभी सुना या देखा है कि किसी पशु ने अपने ज्ञान में जबरदस्त वृद्धि करके समूचे संसार को जीने की नई दृष्टि दी हो? शायद नहीं। सिर्फ मनुष्य ही ऐसा कर सकता है। अत: नया सीखिये। प्रति पल सीखिये। प्रत्येक व्यक्ति से सीखिये. छोटे से छोटे कारिंदे से सीखिये। प्रत्येक व्यक्ति ऐसा कुछ जरूर जानता होगा जिसे आप नहीं जानते। यहां मन्त्र यही है कि प्रतिपल नया सीखना ही जीवन है। सीखने का त्याग करने का अर्थ है सांस लेने वाला शव बनना। अब मर्जी आपकी है कि आप वास्तविक मनुष्य बनना चाहते हैं या सांस लेने वाला शव?

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'बी द चेंज'

तालाब किनारे एक लड़के ने देखा कि एक बूढी महिला छोटे-छोटे कछुओं की पीठ को साफ कर रही थी। लड़के ने जब उस महिला से ऐसा करने का कारण पूछा तो महिला ने कहा कि कछुओं की पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचरा जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है और कछुओं को तैरने में दिक्कत आती है। अत: वो कवच को साफ करते है। लड़के ने महिला से पूछा कि वो अकेली कब तक इन असंख्य कछुओं की पीठ साफ करेगी और इससे आखिर कितना परिवर्तन हो सकेगा? महिला ने बड़ा ही मार्मिक जवाब दिया कि भले ही उसके इस कार्य से से संसार में कोई बड़ा बदलाव नहीं आये लेकिन कछुए की जिन्दगी तो बदलेगी ही। 

छोटा ही सही पर सकारात्मक दिशा में चेंज होना सीखिये। जिन्दगी में बहुत सारे अवसर ऐसे आते हैं जब हम बुरे हालात का सामना कर रहे होते है। हम परिवर्तन की सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते। मन मसोसकर यही कहते हैं कि क्या किया जा सकता है? इतनी जल्दी तो सिस्टम को बदलना संभव नहीं है। ऐसा सोचकर वह कार्य भी नहीं करते जिससे समाज में कुछ नई क्रान्ति आये। इससे निकलिये। गांधीजी ने कहा है - 'बी द चेंजÓ। जो परिवर्तन आप समाज और राष्ट्र में लाना चाहते हैं उसे पहले खुद में लाइये। स्वयं से शुरुआत कीजिये।
* आप चाहते हैं कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें। उन्हें मत सिखाइये। स्वयं पालन करना प्रारम्भ कीजिये। खुद से पूछिये कि क्या आप हेलमेट लगाते हैं या सीट बेल्ट बांधते हैं? यदि नहीं तो क्रान्ति नहीं आयेगी।
* आप चाहते हैं कि नारी का सम्मान हो। बहन बेटियां पड़ें। आगे बड़ें।
जरा सोचिये कि क्या आप अपनी पुत्रियों को उच्च शिक्षा दे रहे हैं?
* आप चाहते हैं कि विवाह से फिजूलखर्ची मिटे। क्या आप अपने पुत्र का आडम्बर विहीन विवाह करवाएंगे?
* आप चाहते हैं कि दान के नाम पर समर्थ पुत्रियों और बहनों को टिफिन/नकद बांटना बंद हो। समाज में कईयों को आपके दान की आवश्यकता है और यह आवश्यकता उन बेटियों से अधिक है। क्या आप टिफिन या नकद बांटना रोक सकेंगे?
क्या पता आपका छोटा सा बदलाव कुछ क्रांति लेकर आये। हर बदलाव की शुरुआत स्वयं से होती है। कई बार तो सफलता हमसे बस थोड़ी ही दूर होती है कि हम हार मान लेते है। अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें। कोई भी सकारात्मक परिवर्तन आसान नहीं होता। परिवर्तन में सदियां लगती हैं। आप परिवर्तन के संवाहक बनें तभी राष्ट्र प्रगति करेगा। 'बी ए चेंजमेकरÓ। यहाँ मन्त्र यही है कि अपनी क्षमताओं पर भरोसा रख कर किया जाने वाला कोई भी परिवर्तन छोटा नहीं होता। सिस्टम तभी बदलेगा जब हम खुद बदलने को तैयार होंगे।

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'अति भावुकता से बचें'

संगठनों में कार्य करना आसान नहीं है। नौकरी अर्थात सेवाधर्म को हमारे ग्रंथों में अत्यधिक मुश्किल बताते हुए यहां तक कहा गया है कि नौकरी तो योगियों के लिए भी निभाना मुश्किल है। इस बात के नेपथ्य में एक सूत्र है। वह सूत्र है कि - यदि संगठन में नौकरी करोगे तो वहाँ पर राजनीति भी होगी ही। कार्यस्थल की राजनीति से पार पाना बहुत ही आसान है यदि हम किसी के सॉफ्ट टारगेट नहीं बनें। सॉफ्ट टार्गेट का अर्थ है किसी का मोहरा बन जाना और स्वयं की अक्ल न लगाना। प्रत्येक कर्मचारी चाहता है कि बॉस सुधरे। कई कर्मचारियों को बॉस से अपने स्कोर सैटल करने होते हैं। ऐसे में वे सीधे तौर पर बॉस से न भिड़कर संगठन के किसी भावुक व्यक्ति को सॉफ्ट टारगेट बना कर उसका इस्तेमाल बॉस की मुखालफत करने में करते हैं। वे उस भावुक व्यक्ति को समझाकर या भड़काकर उसे बॉस के विरुद्ध वह बातें बोलने को कहते हैं जिन्हें असल में वे बोलना चाहते थे। वह भावुक जूनियर कर्मचारी जब तक यह समझ पाता है कि वो तो बॉस की खिलाफत में किसी का मोहरा है, तब तक राजनीति से प्रेरित व्यक्ति अपना काम कर चुका होता है। 

ऐसे में हमें स्वयं का विवेक इस्तेमाल करते हुए क्षण प्रतिक्षण खुद से यह प्रश्न करते रहना चाहिए कि मुझे अमुक व्यक्ति ने ऐसा क्यों कहा? इसके कितने अर्थ और परिणाम हो सकते हैं। मजदूरों की हडताल, राजनैतिक दलों द्वारा आयोजित बंद, और अनेकानेक धरना - प्रदर्शनों में कुछ भावुक लोग पिटते रहते हैं और राजनीति करने वाला उनका फायदा उठा के ले जाता है। सॉफ्ट टारगेट बनने वाले मूलतया भावुक और मूल्यवान लोग ही होते हैं। तेज, चतुर, डेढ़ होशियार व्यक्ति को कोई भी सॉफ्ट टार्गेट नहीं बनाता। चाणक्य नीति के अनुसार, सीधे वृक्षों को उपयोग हेतु तुरंत काट दिया जाता है लेकिन टेढ़े-मेढ़े वृक्षों को कोई नहीं काटता। इस इशारे को समझने की जरूरत है।
निष्कर्षत: हम यह कह सकते हैं कि कॉर्पोरेट जगत में भावुक होना अपराध से कम नहीं है। यहां जो मूल सूत्र है वो सिर्फ यही है कि हम प्रत्येक की सुनें। अपना रिएक्शन बिलकुल न देवें। फिर गहराई से व्यवहार की विवेचना करें और सोचें कि कहीं हमें सॉफ्ट टारगेट तो नहीं बनाया जा रहा है? भावुकता से नहीं, तार्किक होकर निर्णय लेवें। अपने कार्य को सौ फीसदी बेहतरीन बनाए रखें ताकि उसपर कोई प्रश्न चिन्ह न लगा सके। याद रहे, दूसरों का मोहरा बनने से आप अपनी मौलिकता खो देते हैं, इससे बचें।

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'सफलता और समाज'

एक साधु कुछ लोगों को पड़ा रहे थे। तभी साधु के गांव के दो व्यक्ति पधारे। दोनों व्यक्ति साधु के गाँव के होने के कारण साधु को भली भांति जानते थे। वे दोनों ही साधु के वर्तमान आभामंडल और उपलब्धियों से परिचित नहीं थे। अत: उन्होंने तुरंत ही साधु को कहा कि "गणपतिये, तू यहां बैठा क्या पाखण्ड कर रहा है। तुझ जैसा व्यक्ति यदि साधु है तो देश का क्या होगा"। यह कहकर वे हंसने लगे। 

यहां यह स्पष्ट हो गया है कि:
* व्यक्ति चाहकर भी अपनी पुरानी छवि को समाप्त नहीं कर सकता।
* समझने की बात यह है कि हमारे बचपन में, या सफलता के शिखर छूने से पूर्व जिन व्यक्तियों ने हमें जिस रूप में देखा होता है; वे बाद में भी हमें उसी रूप में देखते हैं। हमें उन्हें अन्यथा नहीं लेना चाहिये।
* लोगों के विषय में नकारात्मक बातें बोलना समाज की आदत है। इससे घबराएं नहीं।
* सफल व्यक्तियों को ज्यादा कष्ट, समस्या, व्यंग्यबाण और मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। जैसा कि उदाहरण से स्पष्ट है कि यदि गणपतिया साधु न बना होता तो उसे भी प्रतिकूल टिप्पणी नहीं सुननी पड़ती।
गोस्वामी तुलसीदास ने इस सन्दर्भ में कहा है कि:
तुलसी वहां न जाइये, जन्मभूमि के ठाम,
गुण - अवगुण चीन्हें नहीं, लेत पुरानो नाम।
इसका अर्थ है कि व्यक्ति को बड़ा या सफल बनकर अपने गाँव नहीं जाना चाहिये। उस गांव के लोग, उस व्यक्ति के बचपन के प्रेमीजन, उस सफल व्यक्ति के गुणों और क्वालिटी को नहीं समझ सकेंगे। उनके लिये तो वह ज्ञानी सफल व्यक्ति अब भी वही होगा जो वह बचपन में था।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ हद तक समाज को सफल व्यक्तियों को कोसने की आदत सी है। यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगा। फुटबॉल खेलते समय कुछ बालक एक बच्चे को जानबूझकर परेशान करते थे। उसे टंगड़ी मारते, परेशान करते और हंसते रहते। वो बच्चा उस राज्य के सूबेदार का पुत्र था और तथा खेलकूद में निपुण था। जब उन बालकों से किसी ने पूछा कि वे उस बालक को तंग क्यों करते हैं तो उन लड़कों ने जवाब दिया कि सूबेदार पुत्र भविष्य में सूबेदार बनेगा। चाहे वो भविष्य में कुछ भी बन जाये लेकिन हम तो यही कहते रहेंगे कि हमने इसे खूब टंगड़ी मारी थे। यह निकृष्ट भाव है। ऐसे भाव होने से आप अपनी प्रगति को रोकते हैं। यहां मन्त्र यही है कि लोगों की, समाज की प्रतिकूल टिप्पणियों से न घबराकर कार्य करते रहें और यह स्वीकार कर लेवें कि जिस व्यक्ति ने आपको जिस दशा में देखा होगा, आप उसके लिये ताउम्र वही रहेंगे। जिस पेड़ पर सर्वाधिक आम लगे होंगे, उसी पेड़ पर सबसे ज्यादा पत्थर मारे जायेंगे। यही शाश्वत सत्य है।

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'उम्र सिर्फ एक अंक'

्रएक पत्रकार ने किसी राजनेता का इंटरव्यू समाप्त करके कहा कि यह उसका अंतिम इंटरव्यू है क्योंकि वो पैंसठ साल का हो चुका है और रिटायर हो रहा है। यह सुनते ही राजनेता ने कहा कि वो भी पैंसठ साल का है और इस बार वो राजनीति के साथ-साथ समाजसेवा हेतु एक नया एनजीओ प्रारम्भ कर रहा है। उसने कहा कि उम्र का सीखने से कोई सम्बन्ध नहीं है। 

उदाहरण से यह स्पष्ट है कि उम्र सिर्फ एक अंक है। सीखने की, नया कर गुजरने की, समझने की कोई उम्र नहीं होती हैअ हमने मनोवैज्ञानिक रूप से हमारे प्रत्येक कार्य को उम्र से बांध दिया है। धार्मिक व आध्यात्मिक पुस्तकें पढऩे की उम्र है युवावस्था। हमने यह सोच रखा है कि इनका अध्ययन तो रिटायरमेंट के बाद ही श्रेयस्कर है। क्या इसे हम सही ठहरा सकते हैं? खेलकूद, व्यायाम आदि में हमारी कम दिलचस्पी का भी यही कारण है कि हमने यह मान लिया है कि खेलकूद तो सिर्फ बच्चे ही कर सकते हैं। इस जाल से निकलना होगा। यह स्वीकारना होगा कि उम्र सिर्फ एक अंक से ज्यादा कुछ नहीं है। बढ़ती उम्र नहीं अपितु मानसिक बुढापा घातक होता है जहां आप नया सीखने के लिये तत्पर नहीं होते हैं।
जरा सोचिये कि-
* श्री प्रभुपाद ने भी बहुत बड़ी उम्र में इस्कॉन सोसायटी को स्थापित किया था। उन्होंने अमरीका जाकर बड़ी उम्र में कई ग्रन्थ लिखे और लोगों को जागृत किया।
* एक असफल गरीब बालक था होर्लंड सेंडर्स। उसकी मां उसको और उसके भाई बहन को छोड़कर मजदूरी पर जाती। वह रोज खाना बनाता। सातवीं तक पड़ा, सेल्समेन बना, कई नौकरियां की, पत्राचार से कानून की डिग्री ली और उसके पश्चात ट्रक ड्राइवरों के लिए खाना पकाकर पहुंचाने लगा। उम्र हो चली परन्तु समर्पित भाव से लगा रहा। थोड़ी सी आय से सेंडर्स केफे खोला और डेढ़ सौ लोगों का रेस्तरां खोला जिसमे फ्राईड चिकन प्रमुख आइटम था। ग्यारह तरह के चिकन बनाए। केन्चुकी के गवर्नर ने उन्हें कर्नल की उपाधि दी। छियासठ साल की उम्र में समर्पण से जमे रहे सेंडर्स को भारी मुनाफा हुआ और देखते ही देखते विशिष्ट चिकन रेसिपी के कारण समूचे विश्व में दो सौ रेस्तरां केन्चुकी फ्राइड चिकन के खुल गए और कल का फटेहाल - तेहत्तर साल का सेंडर्स आज प्रति माह तीन लाख डॉलर कमाने लगा।
जरा सोचिये कि तेहत्तर साल तक किया गया श्रम क्या सिद्ध करता है। छियासठ साल की उम्र में नया उपक्रम लगाना क्या सिद्ध करता है? क्या उम्र किसी कार्य को करने में बाधक है? यही सोचना महत्वपूर्ण है।
यहां मन्त्र यही है कि उम्रदराज होकर कुछ नया करना गुनाह नहीं है। उम्रदराज होने के बाद यदि आपको सफलता मिलती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि पहले का जीवन बेकार गया। पहले का जीवन मानो उस पल की तैयारी करवा रहा था जो आप आज जी रहे हो। यही सेल्फ मैनेजमेंट है।

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'जीवन की यात्रा'

* अन्धकार से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले 

* हम अन्धकार से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
यहां हमें यह विचार करना है कि हमारी श्रेणी कौनसी है? अन्धकार का अर्थ है तामसिक, बेकार घटिया मनोवृत्तियां जहां सिर्फ दु:ख, विषाद, तुलना, क्लेश और समस्याएँ हों और हम उनका रस ले - लेकर विश्लेषण करते हों। यदि हमारी श्रेणी अन्धकार से वापिस अन्धकार में जाने वाली है तो इसका सीधा अर्थ है कि हमने समूचा जीवन व्यर्थ नष्ट कर दिया। हमने कुछ भी नया नहीं सीखा। हमारी शिक्षा ने हमें सिर्फ जीविका कमाना सिखाया है। ऐसी शिक्षा को श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
यदि हम अन्धकार से प्रकाश के ओर यात्रा कर रहे हैं तो इससे तात्पर्य है कि हम वैचारिक दरिद्रता और द्वेष के भाव को छोड़कर श्रेष्ठता की ओर यात्रा कर रहे हैं। इससे तात्पर्य है कि हम सिर्फ जीविकोपार्जन को ही नहीं अपितु राष्ट्र और समाज के हित को भी वरीयता देते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने का अर्थ है श्रेष्ठता से निम्नता की तरफ जाना। इससे तात्पर्य है कि अपनी विद्या का गलत इस्तेमाल करना। प्रकाश से प्रकाश की ओर की यात्रा का तात्पर्य है श्रेष्ठता को और निखारना तथा ईश्वरीय निकटता स्थापित करना।
इसे यदि कॉर्पोरेट सेक्टर से जोड़े तो हम यह पायेंगे कि अधिकतर कर्मचारी तो अन्धकार से प्रकाश की तरफ जाते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें और सीखना है अत: वे अपने हुनर, क्षमता, ज्ञान को बढाते हैं और इसमें इजाफा करते रहते हैं। कुछ निकृष्ट कार्मिक ऐसे भी होते हैं जो प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा प्रारम्भ कर देते हैं। उच्च शिक्षण के बाद प्राप्त नौकरी को करते हुए वे संगठन के प्रति निष्ठावान न होकर, परस्पर द्वेष और झगड़ों की राजनीति करते हैं। ऐसी अवस्था में उन्हें हम तामसिक कर्मचारी कहते हैं क्योंकि वे शिक्षण, हुनर, परिवार आदि में श्रेष्ठ थे लेकिन नौकरी में आकर अपना व्यक्तित्त्व खराब करते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वालों से अन्य कर्मचारी भयभीत रहते हैं। इनका मस्तिष्क बड़ा तेज होता है लेकिन वे अपना मस्तिष्क नकारात्मक दिशा में खर्च करते हैं। मैनेजमेंट में प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा वर्जित है। कर्मचारियों का चयन तकनीकी योग्यता के माध्यम से होता है लेकिन उनका निष्कासन मानवीय गुणों की कमी के कारण होता है। हमें यह समझना चाहिये। यहां मन्त्र यही है कि अपनी विद्या का प्रयोग जनकल्याण, संगठन के कल्याण हेतु करें और सदा नया सीखने हेतु तत्पर रहें। यही वास्तविक मैनेजमेंट है।

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'क्यों धन संचय?'

एक सेठ ने साधु को अपना बंगला, संसाधन और एक तहखाने में जमा किया हुआ खजाना दिखाया। सेठ ने साधु के समक्ष अहंकार के साथ पूछा कि साधु को खजाना और उसके द्वारा एकत्र किये गये संसाधान कैसे लगे? साधु ने निर्लिप्त भाव से सेठ से पूछा कि वह इस खजाने से और संसाधनों से कितना कमा लेता है? सेठ ने कहा कि कमाना तो दूर, उलटा उसने चार चौकीदार इस खजाने और संसाधनों की रक्षार्थ नियुक्त कर रखे हैं। यह सुनकर साधु ने कहा कि उसके गांव में एक वृद्ध महिला है जिसके पास संसाधन के नाम पर सिर्फ एक चक्की है। वो चक्की से धान पीसने का काम करती है और अपना गुजारा चलाती है। वो भी अपना और बच्चों का पेट तो भर ही रही है। वो खजाना न होते हुए भी सेठ से कम चिंतित है और बहुत सुखी है। ऐसे में बुद्धिमान कौन हुआ? साधु ने कहा कि अगर खजाने और संसाधनों से कोई कमाई नहीं हो रही है तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल? क्या इस खजाने और संसाधनों को जरुरतमंदों को नहीं दे दिया जाना चाहिये? 

कथा सांकेतिक है। मूर्खतापूर्ण रूप से धन संचय की प्रवृत्ति पर चोट करती है। यह बात सत्य है कि हमने 'खजाने की रक्षाÓ को ही जीवन का मूल ध्येय मान लिया है। क्या संसाधनों का संवर्धन, उनका संरक्षण और उनकी बढ़ोतरी ही जीवन है? यदि यही जीवन है तो हमें कई अपराधियों, कुख्यात चोरों को भी आदर के साथ याद करना चाहिये क्योंकि संसाधनों का भंडारण और संरक्षण तो उन्होंने भी किया था। क्या धन के भंडारण कर लेने के कारण आप और हम उन अपराधियों को सम्मान और आदर दे सकते हैं?
समस्या यह है कि हमारे मन में भविष्य को लेकर बहुत ही ज्यादा डर व्याप्त है। वर्तमान को सुखपूर्वक जीने के बजाय हम भविष्य हेतु संचयन में अधिक इच्छुक रहते हैं। क्या यह सही है? क्या अगले पल का कोई भरोसा है? जो है वह आज है। यदि हमारे द्वारा अर्जित संसाधनों से ही हमें कष्ट हो रहा हो तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल है? हमने अपने जीवन में यह तय कर रखा है कि जो भी सर्वश्रेष्ठ वस्तु होगी उसे 'बाद मेंÓ या 'समय आने परÓ इस्तेमाल करेंगे। ऐसा इंतजार करने में ही जीवन समाप्त हो जाता है। यहां मन्त्र यही है कि संसाधनों के भंडारण के बजाय उसे समाजोपयोगी कार्यों में लगाना श्रेयस्कर है। धनगैला अर्थात पैसे के लिये पागल होना वाकई मूर्खता की पराकाष्ठा है। धनगैले बनने से बचें। यही जीवन प्रबंध है।

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