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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (104)

'जीवन एक उत्सव'

जीवन क्या है और इसकी परिभाषा क्या है? जीवन की परिभाषा देना आसान नहीं है. क्या भोजन करना, प्रजनन करना, मकान बनवा लेना, बच्चों का विवाह कर देना और समाज में सुख - दु:ख के अवसरों में भाग लेना ही जीवन है? अधिकांश व्यक्ति इसी को जीवन मानते हैं. कुछ लोग धनार्जन को तो कुछ लोग आनंद के साथ जीने को ही जीवन मान लेते हैं. यह जीवन नहीं है. ये सभी कार्य (भोजन व्यवस्था आदि) तो पशु, पक्षी और कीट - पतंगे तक भी करते हैं. वास्तविक जीवन को हम जैसा परिभाषित करते हैं, हमारा जीवन वैसा ही बनता जाता है. 

जीवन एक संग्राम है : जो व्यक्ति ऐसा सोचते हैं उन्हें लगता है कि जीवन एक 'गला काटÓ प्रतिस्पर्धा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर जीत हासिल करना चाहता है. ऐसा सोचना गलत नहीं है लेकिन ऐसे में प्रतिस्पर्धा का भाव महत्वपूर्ण हो जाता है. जहां प्रतिस्पर्धा है वहां टीमवर्क, सहयोग और समन्वय का लोप हो जाता है. ऐसे व्यक्ति पल प्रति पल और अधिक हासिल करने, प्राप्त करने और ऊंचा चढऩे की लिप्सा से आगे बढ़ते जाते हैं. उनमे अत्यधिक महत्वाकांक्षा होती है. जीवन को संग्राम या प्रतिस्पर्धा मानने वालों को सोचना चाहिये कि यदि वे शहर की सारी सीढिय़ों को मिलाकर एक ऊंचाई पर पहुँच भी जायें तो वे यह पायेंगे कि ऐसी ऊंचाई पर कोई भी नहीं रहता. अत: जीवन को सिर्फ संग्राम न समझें.
जीवन एक संघर्ष है : कुछ व्यक्ति जीवन को संघर्ष मानकर चलते हैं. जब संघर्ष का भाव होता है तो व्यक्ति को लगता है प्रत्येक संसाधन की प्राप्ति हेतु अथाह श्रम और संघर्ष करना ही पडेगा. यह उसकी नियति बन जाती है. यही से व्यक्ति में परस्पर द्वेष, क्लेश और कुटिलता का जन्म होता जाता है. यदि आप जीवन को संघर्ष मानते हैं तो यह कुछेक अर्थों में तो सही है लेकिन पूर्ण रूप से सत्य नहीं है.
जीवन एक उत्सव : तो आखिर जीवन क्या है? जीवन एक उत्सव है. इस उत्सव रूपी जीवन में हमें समाज और राष्ट्र के लिये कुछ योगदान देना चाहिये. जीवन की सार्थकता यह समझने में है कि-
* आपने अपने कर्तव्यों का कितनी उत्कृष्टता से पालन किया?
* आपके कारण कितने लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट आई?
* आपने अपने माता पिता की सेवा किस मनोयोग से की?
* आप अपने बच्चों के लिए एक रोल मॉडल या हीरो बन पाये क्या?
यहां मन्त्र यही है कि जीवन का प्रति पल ईश्वर का आशीर्वाद है. प्रति पल जीयें. समाज के लिये जियें. राष्ट्र के लिये जियें. दूसरों की खुशी के लिये जियें. सुबह उठते ही आपके पैरों तले जमीन मिलना एक उत्सव से बढ़कर है क्योंकि इससे सिद्ध होता है कि आप जीवित हैं. जीवन के हानि - लाभ आदि को त्यागिये और जीवन्तता से जीना सीखिये. यही जीवन है.

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'जीना सिखाते हैं श्रीराम'

सत्य और धर्म के पथ पर दृढ़ रहने वाले, नैतिकता की परिसीमा भगवान श्री राम ही सच्चे अर्थों में मनुष्यों को जीवन जीना सिखाते हैं। स्वधर्म पालन कर्ता श्री राम को जब महर्षि जवाली ने काफी समय तक समझाया कि एक महिला के कह देने से और पिता की भावुकता के चलते चौदह वर्ष तक गृह त्याग तर्कसंगत नहीं है। इस पर श्री राम ने अपने स्वधर्म को नहीं छोड़ा। श्री राम ने कहा कि प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपयश की प्राप्ति करोड़ों मृत्यु के समान संताप देने वाली होती है और वे अपने किसी कृत्य से अपने पिता और राज्य को अपयश नहीं देना चाहते। भगवान श्री राम ने अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम धर्म माता पिता की आज्ञा पालन है और उससे पीछे हटना अधर्म है। उन्होंने वन में उनके पीछे आये आर्य सुमंत, भाई भरत और अयोध्या वासियों को भी यही सन्देश दिया। 

भगवान श्री राम नैतिकता और समर्पण की ही नहीं अपितु प्रेरणा प्रदान करने की भी परिसीमा है। खेलों में हर बार अपने सबसे प्रिय भ्राता भरत को विजेता बना देने के गुण ने उनके सभी भाइयों में प्रेम और उत्साह का संचार किया। इसी गुण को मोटिवेशन गुरु का लक्षण कहते हैं। छोटों को खेल में जिताने से उन छोटे भ्राताओं में श्रद्धा बोध बढ़ता है। श्रीराम से हमें प्रशंसा करने की कला सीखनी चाहिये। आजकल मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में हमें संकोच होता है। यह उचित नहीं है। भगवान श्री राम अपने भाइयों की, राज्य कर्मचारियों की और यहाँ तक कि अपने शत्रु की वीरता की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में समर्थ थे। श्रीराम द्वारा मेघनाद, कुम्भकर्ण और राक्षसराज खर के वीर पुत्र मकराक्ष की प्रशंसा करना उनके विराट व्यक्तित्व को दर्शाता है। वर्तमान में हम ऐसा करने से हिचकते हैं क्योंकि हमें असुरक्षा का भय सताता रहता है।
विनम्रता की प्रतिमूर्ति और अहंकार से शून्य व्यवहार श्रीराम का मूल लक्षण है। शिव धनुष के टूटने पर उन्होंने अपनी विनम्रता को बनाये रखा। महर्षि परशुराम के समक्ष उनकी विनम्रता एक महान उदाहरण है। समुद्र द्वारा रास्ता ना देने पर तीन दिवस तक विनम्र निवेदन करना उनके पर्यावरण से प्रेम, उसके संरक्षण और संवर्धन की महत्ता को दिखाता है। शबरी के झूठे बेर खाना सिद्ध करता है कि नि:स्वार्थ भाव से की गई भक्ति से बढ़कर कुछ नहीं। सामजिक समरसता के प्रणेता श्री राम ने शबरी के झूठे बेर ग्रहण कर यह सिद्ध किया कि सभी मनुष्य बराबर हैं और जातियों आदि का कोई महत्व नहीं है। अहिल्या उद्धार उनके अहंकार शून्य शुद्ध सात्विक प्रेम को दर्शाता है। यही तो जीवन प्रबंध है। यही सत्य, धर्म, प्रेम, दया और नैतिकता के गुण वर्तमान समय की आवश्यकता हैं।

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'दान का महत्व'

एक भिखारी भीख मांगने निकला. उसे एक गृहिणी ने दो मु_ी अनाज दिया. वहां से निकला तो उसने देखा कि राजा की सवारी आ रही है. राजा की सवारी भिखारी के पास आकर रुकी और राजा ने भिखारी से दान मांगते हुए कहा कि राज ज्योतिषी के अनुसार राज्य पर संकट आने वाला है और भिखारी द्वारा दिये गये दान से ही इसका निराकरण संभव है. भिखारी ने झोले में मु_ी डाली और भरी. भरते ही सोचा कि इतना ज्यादा अनाज क्यों दूं और उसने मु_ी गीली कर दी. अब मु_ी में अनाज के दो चार दाने ही थे. उसे लगा इतना भी क्यों दूंज यह सोचकर उसने अन्न का सिर्फ एक दाना निकाला और राजा को सौंप दिया. राजा चला गया. वो खुश था कि उसका अन्न सुरक्षित था. घर जाकर उसने झोला खोला तो वो दंग रह गया. झोले में अन्न के साथ सोने का एक सिक्का भी था. उसे अफसोस हुआ कि यदि वो सारा अन्न दे देता तो उसकी निर्धनता सदा के लिये समाप्त हो जाती. इस सांकेतिक कथा से हमें स्व प्रबंध के निम्नलिखित सिद्धांत सीखने चाहिये-

* दान देने से दीर्घकालीन सुख और संतोष मिलता है. जितना अधिक देते हैं, उससे चौगुना ईश्वर हमें देता है. इस भाव से दान करना चाहिये कि दान लेने वाला दान लेकर हमें कृतार्थ कर रहा है. उदारता से दान करने पर दीर्घ लाभ की प्राप्ति होती है.
* अन्न बिखरना चाहिये. इसका अर्थ है परिवारजनों, प्रेमीजनों और मित्र - बंधुओं से निरंतर मेल - मिलाप और उनके साथ इस भाव से भोजन करना कि भोजन ईश्वरीय प्रसाद है. अन्न बिखरने का तात्पर्य संयुक्त परिवार प्रणाली से भी है. पहले मित्रों से मिलने जाना, यों ही किसी के घर पर हाल - चाल जानने के लिये जाना आम बात थी. अब सिर्फ आभासी दुनिया और सोशियल मीडिया है. इसमें आत्मीयता का अभाव है. जो आत्मीयता मित्र या बंधुजनों के घर जाकर उनके साथ बैठकर वार्तालाप में, भोजन करने में, चर्चा करने में है वो फोन पर चैट करने या गुलाबजामुन का फोटो भेजने में नहीं हो सकती.
* जब भी आप किसी की उन्नति, विकास, या जीवन में बढ़ोतरी हेतु दान करते हैं तो ईश्वर उसका प्रसाद आपको अवश्य ही देता है. जैसा भिखारी को स्वर्ण का सिक्का देकर किया.सकारात्मक उद्देश्यों के लिये किया गया दान सबसे महत्वपूर्ण होता है.
यहां मन्त्र यही है कि खुले दिल से दान करें. जिसे आवश्यकता हो, उसे कुछ देवें. ईश्वर का आभार जतायें कि उसने आपको देने के काबिल बनाया. देने में जो आननद है वो लेने में नहीं है. यही जीवन है.

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'साध्य और साधन'

एक गांव के आठ साधु नदी पार करने के लिए नाव पर चढ़े। नदी के उस पार देवालय था जहां उन सभी को पूजन करना था। कुछ देर बाद वे दूसरी ओर पहुंच गये। नाव से उतरकर उन्होंने तय किया कि नाव ने नदी पार करवाकर उन सभी पर अहसान किया है। अत: उन्हें इस अहसान का आभार जताना चाहिये। उन्होंने कृतज्ञता ज्ञापन का एक अद्भुत तरीका खोज निकाला। उन्होंने कहा कि उचित यही होगा कि जिस नाव पर वे सवार थे, अब वह नाव उन सभी पर सवार हो जाये। सो उन आठों साधुओं ने नाव को अपने सिर पर उठा लिया और चल दिये। वे बाजारों, गलियों आदि में घूमे। जनमानस ने उन्हें मूर्ख की उपाधि दे दी। उन साधुओं ने जनमानस को मूर्ख बताते हुए कहा कि सभी जन कृतघ्न हैं और उपकार के बदले आभार जताने का महत्त्व ही नहीं समझते हैं। 

यह सांकेतिक कथा है। यहां नाव एक साधन है, नदी को पार करने का। नाव का तो निर्माण ही नदी पार करवाने के लिये हुआ है। उसे अपने सिर पर उठाकर घूमने का क्या लाभ? इसका अर्थ है कि हम साधनों के प्रति अपनी दीवानगी इस कदर बढ़ा चुके हैं कि हमें साध्य यानि वास्तविक लक्ष्य पर पहुँचने का तो भान ही नहीं रहता। यहां साधुओं के लिये साध्य यानि लक्ष्य था देवालय पहुंचकर पूजन करना। वे इसी साध्य को भुला बैठे और साधनों को ही साध्य समझने की भूल कर बैठे।
आपकी और हमारी भी गत कुछ इस प्रकार की ही है। मकान, पैसा, गाड़ी, कम्प्यूटर, फिक्स डिपोजिट आदि साधन है। इनसे जीवन सुखमय बनता है। लेकिन क्या इन्हें प्राप्त कर लेना ही जीवन है? मकान, पैसे, गाड़ी आदि को लेकर हमारी दीवानगी इस स्तर की है कि यदि हमारे घर के आगे कोई अनजान व्यक्ति कुछ क्षणों के लिये गाड़ी पार्क कर देवे तो भी हम असहज हो जाते हैं। जीवन का वास्तविक लक्ष्य संसाधनों का भंडारण नहीं है। जीवन का लक्ष्य संसाधनों को ढ़ोना भी नहीं है। वर्तमान में हम संसाधनों को ढ़ो रहे हैं। जीवन का लक्ष्य है सुविधाओं का त्यागपूर्वक उपभोग। सुविधाओं का प्रयोग अवश्य करें लेकिन निर्लिप्त भाव के साथ। संसाधन आज मेरे हैं लेकिन कल मेरे नहीं रहेंगे : यही भाव प्रेरणा देता है। 'तेन तक्तेन भुंजीथाÓ भी यही है। यहां मन्त्र यही है कि सुविधाओं और संसाधनों के भंडारण के स्थान पर लक्ष्य अर्थात मानव कल्याण की बात सोचना और उसकी क्रियान्विति करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।

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असंभव कुछ नहीं

एक विद्यार्थी देर से कक्षा में आया। उसने देखा कि बोर्ड पर दो सवाल लिखे हुए हैं। उसे लगा यही गृह कार्य होगा। उसने सवालों को नोट किया। घर जाकर उसने सवाल हल करना प्रारम्भ किया लेकिन सवाल बड़े ही कठिन और जटिल थे। पूरी रात लगा रहा तब जाकर सवाल हल हुए। अगले दिन गुरूजी को अपनी उत्तर पुस्तिका दी। गुरूजी ने अनमने ढंग से उसकी नोटबुक रख ली। उसे लगा कि इतने मेहनत से उसने गृह कार्य किया और गुरूजी ने शाबासी भी नहीं दी। यहां बात ये है कि वे दो सवाल गृह कार्य हेतु दिये ही नहीं गये थे। दो दिन बाद उस छात्र के घर पर अचानक खुशी से आल्हादित गुरूजी पहुंचे। उन्होंने छात्र का धन्यवाद देकर कहा कि उस छात्र ने उन दो सवालों को हल कर डाला है जिन्हें सांख्यिकी में हल करना असम्भव माना जाता रहा है। गुरूजी ने कहा कि वे तो इसी पर शोध भी कर रहे थे कि इसका हल कैसे निकाला जाये? असंभव को संभव बनाने वाले छात्र का नाम था - जॉर्ज डेंटजिग।

यहां समझने की बात यही है कि वह छात्र यह जानता ही नहीं था कि ये दोनों विश्वस्तरीय सवाल हैं जिनका हल आज तक कोई नहीं निकाल सका था। इससे सिद्ध होता है कि जब आप यह सोच लेते हैं कि अमुक कार्य तो मुश्किलए कठिन या नामुमकिन है, उसी क्षण वो कार्य वाकई नामुमकिन हो जाता है। यह सिर्फ सोच पर निर्भर करता है कि क्या मुमकिन है और क्या नामुमकिन? सच तो ये है कि नामुमकिन कुछ है ही नहीं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बाहरी परिस्थितियांए अन्यजनों के नकारात्मक कमेंट्स और भयभीत करने वाले स्नेहीजनों के कारण ही आप असंभव को संभव बनाने का प्रयास नहीं करते हैं। जैसे ही आपसे कोई कह देता है कि अमुक कार्य में बहुत कष्ट और समस्याएं हैं और यह कार्य तो लगभग असंभव है उसी पल आप उस कार्य को त्याग देते हैं।
विद्यार्थियों के तनाव का भी वास्तविक कारण यही है। किसी मनचले ने कह दिया कि-सिम्पल हारमोनिक मोशन तो मुश्किल है, आयनिक एक्विलिब्रियम के न्यूमेरिकल कठिन हैं या श्रोंडीजर वेव समीकरण तो टेढ़ा है। उसी पल विद्यार्थी यह मान लेता है और दिमाग में एक सोच निर्मित कर लेता है कि ये तो कठिन हैं। अब वो चाह कर भी उन्हें समझ नहीं पाता। पूर्वाग्रहों से बचें। अपनी अक्ल लगायें। दूसरों की बातों को सुनने के बजाय अपने मस्तिष्क का प्रयोग करना ही सफलता के शिखर पर ले जायेगा। यही सेल्फ मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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बिजनेस में माइंड लड़ाने वाले पढ़ें यह किस्सा

'फ्री है क्या?'

एक राजा ने मंत्रियों को यह लक्ष्य दिया कि वे सभी किसी भी तरीके से प्रजाजनों की बौद्धिक क्षमता का विकास करें। मंत्रियों ने तुरंत एक हजार पुस्तकें खरीदी और प्रजा को उन पुस्तकों को पड़ाने की बात कही। राजा ने कहा कि इसमें बहुत समय लगेगा। मंत्रियों ने उन हजार पुस्तकों में से सौ पुस्तकें छांट ली। राजा ने कहा कि यह भी बहुत मुश्किल है क्योंकि प्रत्येक प्रजाजन को सौ पुस्तकें पढ़ाना मुश्किल है। मंत्रियों से संख्या घटा कर दस कर दी। राजा संतुष्ट नहीं हुआ। अब मंत्रियों ने एक पुस्ता ले ली। राजा अब भी असंतुष्ट था। इसके पश्चात मंत्रियों ने सिर्फ एक वाक्य समस्त प्रजाजनों को सिखाने का लक्ष्य ले लिया। राजा संतुष्ट हो गया। वो एक वाक्य था - "संसार में मुफ्त कुछ भी नहीं मिलता, उसकी कीमत चुकानी ही होती है"। 

यह सांकेतिक कथा बड़ा ही गूढ़ सन्देश सिखाती है। संसार में कुछ भी फ्री नहीं होता है। प्रत्येक वस्तु/सेवा का मूल्य चुकाना होता है। प्रत्येक वस्तु/ सेवा या सुख को प्राप्त करने हेतु कठोर परिश्रम, समर्पण और ईमानदारी की आवश्यकता होती है। मुफ्त में कुछ प्राप्त हो जाये की बात सोचना ही मूर्खता है। मनुष्य वो प्रत्येक वस्तु प्राप्त कर सकता है जिसका मूल्य वो चुका सकता हो।
* यदि आपको प्रशासनिक अधिकारी बनना है तो उसका मूल्य है लोकप्रिय होने की बजाय प्रभावी होने की चाहत, उत्तम निर्णय क्षमता और वस्तुनिष्ठ सोच।
* यदि आप चिकित्सक बनना चाहते हैं तो उसका मूल्य है नित्य 14 से 16 घंटे अध्ययन, निस्वार्थ सेवा का भाव और दूसरों की पीड़ा समझने की शक्ति।
आप और हम सिर्फ यह वाक्य समझ लेवें कि "मुफ्त कुछ नहीं है" तो उसी क्षण आपकी बुद्धि का विकास हो जाता है। परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता। मुफ्तखोरी अपराध है, कलंक है। याद रखें कि मुफ्त का माल सबसे महंगा होता है। यहां मन्त्र यही है कि कठोर परिश्रम और कार्य के प्रति आपके जुनून से ही सारे कार्य सिद्ध होते हैं। यही शाश्वत सत्य है।

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'इंट्रोस्पेक्शन'

एक बड़े संत थे। बुजुर्ग हो गये थे। एक दिन उन्होंने सभी शिष्यों की परीक्षा लेकर यह तय करने का सोचा कि उनके पश्चात गुरु की पदवी पर कौन बैठे? संत ने सभी शिष्यों को बुलाकर प्रश्न पत्र दिया। प्रश्न पत्र में एक ही प्रश्न था। वो प्रश्न था कि गुरु की पदवी के लिये कौन सबसे योग्य है? इसके उत्तर में अधिकतर शिष्यों ने सबसे ऊपर स्वयं का नाम लिखा और उसके बाद दो तीन नाम और लिखे। जब संत ने ऐसे उत्तरों का कारण पूछा तो शिष्यों ने दूसरे शिष्यों के दोष गिनवा दिये। इसका अर्थ था कि वे सैकड़ों शिष्यों में सिर्फ दोष देखते थे और उनकी नजर में सिर्फ दो या तीन शिष्य ही गुरु की पदवी के लायक थे। एक शिष्य जिसे गुरु की पदवी मिली उसने बड़ा विचित्र उत्तर लिखा। उसने लिखा कि उसके अलावा सभी इस गुरु की पदवी को धारण कर सकते हैं क्योंकि उसमे कई सारे दोष हैं और बाकी सब श्रेष्ठ हैं। गुरूजी ने कहा कि जो अपने दोष देख सकता है, वही गुरु बन सकता है।

यह कथा एक श्रेष्ठ पाठ पढ़ाती है। जो भी स्वयं के दोषों को देखता है, उनपर विचार करता है और उन दोषों को दूर करने का प्रयास करता है वही वास्तव में सर्वश्रेष्ठ भी होता है। माना कि आज के युग में सेल्फ मार्केटिंग जरूरी है लेकिन इसके लिये भी आवश्यक यह है कि आप स्वयं की शक्तियों का विस्तार करें। यदि आप दूसरों के दोषों को ही देखते रहेंगे तो फिर आप स्वयं श्रेष्ठ कैसे बन पायेंगे? दूसरों को कुपात्र ठहराने की बजाय स्वयं सुपात्र बनना ज्यादा अच्छा होता है। श्रेष्ठता की शुरुआत ही इंट्रोस्पेक्शन से होती है।
-जरा सोचिये कि क्या आप :
* स्वयं से वार्ता करते हैं?
* आप अपनी शक्तियों, कमजोरियों, अवसरों और समस्याओं का चार्ट सदा अपडेटेड रखते हैं?
* अंतर्मन के विचारों को सुनकर फैसले करते हैं?
* दूसरों को नीचा दिखाने के बजाय स्वयं को सुधारने का प्रयास करते हैं?
यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर ना है तो यकीन मानिये कि अभी तक आपने श्रेष्ठता की ओर यात्रा प्रारम्भ ही नहीं की है। यही आज की सबसे बड़ी समस्या है। अत: यहां मन्त्र यही है कि स्वयं के दोषों को समझें, उन्हें दूर करें, इंट्रोस्पेक्शन करें तथा अन्यों के दोष ढूंढने से पहले स्वयं के दोषों पर नजर डालें। यही सेल्फ मैनेजमेंट का मर्म है।

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'शक्तिशाली सकारात्मक सोच'

दो व्यक्ति भजन कर रहे थे। नारदजी वहां से निकले। दोनों ने एक-एक करके पूछा कि मोक्ष कब मिलेगा? पहले व्यक्ति से नारद जी ने कहा कि चार जन्म बाद मोक्ष प्राप्ति होगी। यह सुनते ही वो व्यक्ति जोरदार तरीके से विलाप करने लगा। उसने कहा कि इतना भजन करने के बाद भी चार जन्म? यह तो अनीति है। उसने भजन त्याग दिया और नकारात्मक सोच को अपने ऊपर हावी होने दिया। दूसरे को नारद जी ने कहा कि जितने पत्ते इस पीपल के पेड पर हैं उतने जन्मों के बाद मोक्ष मिलेगा। दूसरा भक्त बोल उठा कि 'वाह, इतनी जल्दी मोक्ष मिल जाएगा'। उसी क्षण ईश्वर ने भविष्यवाणी कर दूसरे भक्त से कहा कि 'तुम्हें तुरंत मोक्ष मिलेगा। तुम सकारात्मक सोच की परिसीमा हो।'
सकारात्मक सोच की शक्ति विचारों में नूतन उत्साह और चेतना जगा कर व्यक्ति को जीवन के संघर्षों से लडऩे की प्रेरणा देती है। व्यवहार विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रो अर्थात मानवीय गुण मैक्रो अर्थात किताबी (ज्ञान) के गुणों से अधिक महत्व रखते हैं। इन माइक्रो गुणों का सरताज है-सकारात्मक सोच जो व्यक्ति में कुछ कर गुजरने की असीम शक्ति प्रदान कर देता है।
जरा समझिए। हमारी सोच कैसी है? क्या हम किसी को खुश देखकर प्रसन्न होते हैं या दुखी देखकर घ् किसी व्यक्ति के पुरस्कृत होने पर उसे बधाई देने का साहस करते हैं या यह सोचते हैं कि यदि बधाई दी तो अन्यों को उसके श्रेष्ठ कार्य का पता चल जाएगा तो क्यों कुछ कहूं? क्या हम हमारे संगठन में मन से किसी व्यक्ति के नए विचार की तारीफ करते हैं या उसे जुगाडू कहकर दरकिनार कर देते हैं? कहीं हमारी सोच राक्षसी तो नहीं है कि हम दूसरों के प्रति इतनी नकारात्मक सोच रखें जैसा राक्षसों में होता है कि मेरी एक आंख भले ही फूट जाए पर दूसरे व्यक्ति की दोनों आंखे फूटनी चाहिए?
निकृष्टतम व्यक्ति में भी कुछ उत्कृष्ट गुण होते हैं। उन्हें स्वीकारें। सड़क पर दुर्घटना में मरे हुए कुत्ते को सभी घृणा से देखते हैं परन्तु एक बालक कहता है कि कुत्ते के दांत तो हीरे जैसे चमक रहे हैं। यही सकारात्मता की सीमा है। यहां मन्त्र यही है कि हम प्रत्येक व्यक्ति, घटना और स्थान में सकारात्मक बात ढूंढें। सदा मानें कि जो होता है, वो अच्छे के लिये होता है। यह सोच संतोष देती है और जीवन को चलायमान रखती है। यही सेल्फ मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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'चेन्ज योरसेल्फ'

सड़क पर चलते समय कोई हमारे सामने थूक दे, बिना वजह होर्न बजाये, या ट्रेन-बस में बैठा यात्री सिगरेट पिए और गन्दगी करे तो यकायक हमारा खून गर्म हो जाता है और हृदय में दर्द होने लगता है। बहुत गुस्सा आता है? मन में आता है कि क्या ये लोग आदमी कहलाने लायक हैं? ऐसी बातों पर नाराजगी न जतायें। यही शपथ लेते जायें कि आप तो ऐसा कदापि नहीं करेंगे। जरा सोचिये कि -
* क्या आप समाज को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर सकते हैं?
* क्या आप प्रत्येक व्यक्ति को नैतिकता का पाठ पड़ा सकते हैं?
* क्या आपको लगता है कि सिविक सेन्स का प्रशिक्षण दिया जा सकता है?
* क्या आपको लगता है कि आप एक ही दिन में राष्ट्र को स्वच्छ, समृद्ध और शक्तिशाली बना देंगे?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर ना है। परिवर्तन होने में सदियों लग जाती हैं। परिवर्तन करने का सबसे अच्छा उपाय है स्वयं को बदलना। दूसरे व्यक्ति बदलेंगे, बॉस बदलेगा, संसार बदलेगा ये सभी निर्मूल अवधारणाएं मात्र हैं। कोई नहीं बदलेगा। सिर्फ हम बदलेंगे। अत: समाज को अच्छी दिशा में परिवर्तन करने का मूल मन्त्र है - 'चेंज योरसेल्फ'। स्वयं को बदलना श्रेष्ठता की दिशा में पहला कदम है। एक अकेले की शक्ति भी बहुत होती है। स्वाधीनता संग्राम के नायक सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, बिरसा मुंडा, मंगल पांडे ने अकेले ही क्रांति का अलख जगाया थाण् अत: आज से 'सेल्फ चेंज या सेल्फ ट्रांस्फोर्मेशन' की शपथ लेवें। बड़े-बड़े व्रत न लेवें। उन्हें निभाना मुश्किल है। अणुव्रत अर्थात छोटे-छोटे व्रत लेवें। उन्हें निभावें। इससे अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी। छोटे व्रत जैसे पब्लिक प्लेस पर गंदगी नहीं फैलाना, कचरा डस्टबिन में ही डालना, मूल्यों का त्याग न करना आदि।
इसी का एक जीता जागता उदाहरण बीकानेर शहर के पुष्करणा वेलफेयर बोर्ड ने दिया। एक विवाह समारोह में उन्होंने काउन्टर लगाकर लिखा कि जूठन छोडऩा बहुत गलत है। यदि जूठा छूट भी जाये तो उस मिठाई को उन्हें काउन्टर पर सौंप देवें ताकि उसे भी किसी उपयोग में लिया जा सके। इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों ने जूठन नहीं छोड़ी। पूर्व में जहां कई किलोग्राम भोजन का नाश होता था, पुष्करणा वेलफेयर बोर्ड के इस छोटे से प्रयास का परिणाम ये हुआ कि दो किलोग्राम जितनी जूठन भी नहीं बची। यही है परिवर्तन का मार्ग। इसी को सेल्फ चेंज कह सकते हैं।
यहां मन्त्र यही है कि हम स्वयं अपने कर्तव्य को श्रेष्ठ ढंग सेए ईमानदारी से निभाएं और दूसरों के बदलने की आस किये बिना नित्य प्रति अपना कार्य-व्यवहार सुधारें तो संगठन और समाज अवश्य ही बदलेगाय यही प्रबंध का मर्म है।

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'जे फेक्टर'

मैनेजमेंट में एक बड़ा ही प्रचलित मुहावरा है - 'जे फेक्टर' जहां जे का अर्थ है जैलौसी अर्थात ईष्र्या। व्यक्तिस्वयं सुखी होने के स्थान पर अन्यों की प्रसन्नता पर दुखी है और यही 'जे फेक्टर' कहलाता है जो हमें सुखीराम की जगह दुखीराम बना देता है। दुखीराम का आदर्श वाक्य है कि मेरी एक आंख भले ही फूट जाये पर दूसरे के दोनों आंखें फूटनी चाहिए। पराई थाली में ज्यादा घी नजर आना ही ईष्र्या की प्रथम अभिव्यक्ति है। तुलना करना, हर बात में छोटे बच्चों की तरह काम के भार को तौलना और तनिक भी समझौता नहीं करने की प्रवृत्ति बिना वजह की ईष्र्या को जन्म देती है।
दो महान प्रोफेसर्स एक परिचित के यहां अतिथि के रूप में गये। जब पहले प्रोफेसर स्नान के लिए गये तो उस घर के मालिक ने दूसरे प्रोफेसर से पहले प्रोफेसर के बारे में पूछा। दूसरे प्रोफेसर ने कहा कि पहला वाला प्रोफेसर तो बिलकुल ही गधा है। रिसर्च और डेवेलोपमेंट में बिलकुल ही बेकार है। जब दूसरा प्रोफेसर स्नान के लिए गया तो पहले प्रोफेसर ने गृह स्वामी से कहा कि पहला प्रोफेसर तो बिलकुल बैल है और बिलकुल ही अडिय़ल मूर्ख है। दो अति बुद्धिमान विद्वानों की ईष्र्या को मिटाने के लिए गृह स्वामी ने एक तरकीब लगाई। ज्यों ही दोनों प्रोफेसर भोजन के लिए बैठे तो उसने एक की थाली में भूसा और दूसरे की थाली में घास रख दी। तदुपरांत उनसे कहा कि गधे और बैल का भोजन प्रस्तुत है। इस जे फेक्टर की वजह से दोनों प्रोफेसर अत्यधिक शर्मिंदा हुए।
निंदा और ईष्र्या का भाव अमानवीयता का प्रतीक है। तुलना, निन्दा, हर छोटी बात पर बेवजह का क्रोध व्यक्तित्व का नाश कर देता है। ईष्या अकरने से आपके जीवन का दायरा छोटा हो जाता है जिस कारण सोच भी छोटी हो जाती है। इससे बचिये। याद रहे, भगवान सभी को एक दिन में चौबीस घंटे का समय देता है। यदि उन चौबीस घंटों में कोई व्यक्तिआपसे ज्यादा अच्छा और उत्पादक कार्य कर रहा है तो इसमें प्रेरणा लेवें और ईष्र्या नहीं करें। जे फेक्टर का त्याग ही हमें मनुष्यत्व की ओर ले जाता है।

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