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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (95)

'जे फेक्टर'

मैनेजमेंट में एक बड़ा ही प्रचलित मुहावरा है - 'जे फेक्टर' जहां जे का अर्थ है जैलौसी अर्थात ईष्र्या। व्यक्तिस्वयं सुखी होने के स्थान पर अन्यों की प्रसन्नता पर दुखी है और यही 'जे फेक्टर' कहलाता है जो हमें सुखीराम की जगह दुखीराम बना देता है। दुखीराम का आदर्श वाक्य है कि मेरी एक आंख भले ही फूट जाये पर दूसरे के दोनों आंखें फूटनी चाहिए। पराई थाली में ज्यादा घी नजर आना ही ईष्र्या की प्रथम अभिव्यक्ति है। तुलना करना, हर बात में छोटे बच्चों की तरह काम के भार को तौलना और तनिक भी समझौता नहीं करने की प्रवृत्ति बिना वजह की ईष्र्या को जन्म देती है।
दो महान प्रोफेसर्स एक परिचित के यहां अतिथि के रूप में गये। जब पहले प्रोफेसर स्नान के लिए गये तो उस घर के मालिक ने दूसरे प्रोफेसर से पहले प्रोफेसर के बारे में पूछा। दूसरे प्रोफेसर ने कहा कि पहला वाला प्रोफेसर तो बिलकुल ही गधा है। रिसर्च और डेवेलोपमेंट में बिलकुल ही बेकार है। जब दूसरा प्रोफेसर स्नान के लिए गया तो पहले प्रोफेसर ने गृह स्वामी से कहा कि पहला प्रोफेसर तो बिलकुल बैल है और बिलकुल ही अडिय़ल मूर्ख है। दो अति बुद्धिमान विद्वानों की ईष्र्या को मिटाने के लिए गृह स्वामी ने एक तरकीब लगाई। ज्यों ही दोनों प्रोफेसर भोजन के लिए बैठे तो उसने एक की थाली में भूसा और दूसरे की थाली में घास रख दी। तदुपरांत उनसे कहा कि गधे और बैल का भोजन प्रस्तुत है। इस जे फेक्टर की वजह से दोनों प्रोफेसर अत्यधिक शर्मिंदा हुए।
निंदा और ईष्र्या का भाव अमानवीयता का प्रतीक है। तुलना, निन्दा, हर छोटी बात पर बेवजह का क्रोध व्यक्तित्व का नाश कर देता है। ईष्या अकरने से आपके जीवन का दायरा छोटा हो जाता है जिस कारण सोच भी छोटी हो जाती है। इससे बचिये। याद रहे, भगवान सभी को एक दिन में चौबीस घंटे का समय देता है। यदि उन चौबीस घंटों में कोई व्यक्तिआपसे ज्यादा अच्छा और उत्पादक कार्य कर रहा है तो इसमें प्रेरणा लेवें और ईष्र्या नहीं करें। जे फेक्टर का त्याग ही हमें मनुष्यत्व की ओर ले जाता है।

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'सभी आपस में जुड़े हैं'

एक दीपक जल रहा था। वायु के वेग से लौ फडफ़ड़ा रही थी। इसे देख अहंकारवश घी बोल पड़ा कि दीपक का वजूद तो घी से है क्योंकि उसके बिना लौ जल ही नहीं सकती। यह सुनते ही दीपक बोला कि उसी ने घी को आश्रय दिया है अत: उसके बिना सब व्यर्थ है। इसी प्रकार लौ ने कहा कि जलती तो वो ही है अत: उसी का योगदान सर्वश्रेष्ठ है। तभी हवा का तेज झोंका आया और लौ बुझ गई। लौ के बुझने से अन्धेरा हो गया। तभी अंधेरे के कारण गलती से एक राहगीर का पैर दीपक पर पड़ा और दीपक चकनाचूर हो गया। अब इस प्रसंग को ऑफिस मैनेजमेंट से जोड़ के देखिये। यह प्रसंग कुछ मैनेजमेंट के तत्त्व समझाता है -
- सभी कर्मचारी एक दूसरे पर निर्भर हैं। कुछ लोगों पर ज़्यादा निर्भरता है तो कुछ पर कम लेकिन निर्भरता सभी पर है। यहाँ यह समझना अत्यावश्यक है कि सभी एक दूजे के सहयोग से ही संस्थान को चलाते हैं।
- यदि किसी भी कर्मचारी को यह अहंकार हो जाये कि संस्थान तो उसी के दम पर चल रहा है तो यह सोच गलत है। प्रत्येक कर्मचारी अपनी एक अलग पहचान रखता है। इस पहचान को सदा अन्यों के समक्ष रेखांकित करना कदापि न भूलें।
- पहचान बोध अर्थात स्वयं को उपयोगी मानने का भाव तो उत्कृष्ट है लेकिन अहंकार के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये।
- हम सभी समाज में आपस में जुड़े हुए हैं। हम ये नहीं कह सकते कि कौन बड़ा है और कौन छोटा। प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपना स्था रखता है। कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता। यह समझना ही वास्तव में व्यक्त्तित्व का विकास है। यह कदापि न सोचें कि दूसरा व्यक्ति आपके कारण जी रहा है या उसका वजूद आपसे है। आपको सदा यह सोचना चाहिए कि अन्यों के कारण ही आपका वजूद है। एकाकी एप्रोच के स्थान पर टीम एप्रोच का होना ही प्रशासन में सफलता दिलाता है। यही मैनेजमेंट का उसूल है।

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'संतुलन ही जीवन'

एक युवक अत्यंत ही कम समय में अत्यधिक प्राप्त कर लेना चाहता था। शास्त्र तो 'ऋतु आये फल होयÓ के सिद्धांत को मानता है लेकिन युवक का स्वप्न कुछ और था। अत: एक दिन वो गाँव के सिद्ध महात्मा जी के पास गया और उनसे दीक्षा ग्रहण की ताकि वो जो चाहे वही हो जाये। स्वामी जी ने युवक को दो सिक्के दिये और कहा कि इन्हें बारी-बारी से गिराये। उसकी मनोकामना पूर्ण होगी। युवक ने एक सिक्का गिराया। सिक्का गिरते ही एक रथ प्रकट हुआ। युवक रथ पर चढ़ गया। रथ वायु की गति से चलने लगा। दिशाहीन, तेज, ज़बरदस्त गति। रथ में स्पीड नियंत्रण हेतु कोई स्टीयरिंग आदि नहीं था। रथ ने तीन बार दुनिया नाप ली। युवक घबराया और उसने रोको का स्विच दबाकर रथ रोका। अब युवक ने दूसरा सिक्का गिराया। वापिस एक रथ प्रकट हुआ। युवक ने जब उसकी सवारी की तो उसने पाया कि वो रथ एक जगह पर स्थिर है लेकिन बाकी सभी वस्तुएं ज़बरदस्त ढंग से घूमे जा रही है। युवक को चक्कर आ गया। उसने रथ रोक लिया और समस्या समाधान हेतु स्वामी जी के पास पहुंचा। स्वामी जी ने बताया कि इन दोनों रथों से हमें जीवन प्रबंध की शिक्षा मिलती है। पहले रथ का नाम है 'तेजतर्रार गतिमान क्रियाशील रथ"। हम में से कई युवा इस रथ पर सवार हो कर तेज गति को ही प्रगति समझ लेते हैं। असल में वो दिशाहीन, व्यर्थ की दौड़ होती है। ऐसी सवारी के समाप्त होने पर लगता है कि भले ही पूरी दुनिया नाप ली लेकिन वास्तविक श्रेष्ठ कार्य तो किया ही नहीं। रथ बहुत घूमा। लेकिन इससे लाभ किसका हुआ? किसी का नहीं। इससे अच्छा होता कि एक लक्ष्य होता, उसकी यात्रा होती और लक्ष्य को प्राप्त करने पर प्रसन्नता भी मिलती। आज का समाज बस पैसा, सुख, सुविधा, लक्जरी, नौकर चाकर की अंधी दौड़ में दिशाहीन घूम रहा है और अन्ततोगत्वा परेशान हो रहा है। दूसरे रथ का नाम है 'विश्लेष्णात्मक क्रियाहीन आलसी नाकारा रथÓ। ऐसे रथों के सवार गिरने के भय, समाज क्या कहेगा के भय के चलते यात्रा ही प्रारम्भ नहीं करते और विश्लेषण पे विश्लेषण करते रहते हैं। इन्हें सफलता कदापि नहीं मिल सकती क्योंकि ये अकर्मण्यता की पराकाष्ठा हैं। यहां मन्त्र यही - दोनों ही घटिया प्रवृत्तियां हैं अत: हमें एक बैलेंस बनाकर चलना चाहिये। न तो संसाधनों के प्रति दीवानगी रखें और ना ही इतने नाकारा हो जायें कि संसाधनों की कमी में जीना दुश्वार हो जाये। संतुलन बनाना ही जीवन 

प्रबंध है।

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'कार्यस्थल राजनीति का अखाड़ा नहीं'

 

संगठन कार्य करने की जगह है, राजनीति का अखाड़ा नहीं। आपकी पूछ काम से होती है। यदि आप राजनीति करते हैं तो लोग आपसे डरते हैं और इसी कारण आपको सम्मानित करते हैं। भय को सम्मान न समझें। कार्यस्थल पर राजनीति करके संगठन को तबाह करने वाले लोगों के कुछ गुण/दुर्गुण निम्नलिखित हैं।
कृपा कर इनसे दूर रहें -
* अन्यों को काम करने दें और उनके काम में सहयोग नहीं करें। फिर यह कहें कि हमारी तो कोई सुनता ही नहीं और किसी को हमारी जरूरत नहीं है।
* किसी मीटिंग, कोर्स, महत्वपूर्ण एकत्रीकरण में नहीं जाएं। फिर सुझाव देवें कि यदि ऐसा होता तो ठीक रहता।
* यदि आपको कोई महत्वपूर्ण काम बताया जाये तो उसे कई दिन तक ना करें। यदि वो काम बॉस किसी अन्य से करा लेवे तो बॉस को तानाशाह कहकर अन्यों से कहें कि संस्थान में कार्य करना दूभर है। यहां डेमोक्रेसी नहीं है।
* मीटिंग में यदि जाना ही पड़े तो जानते समझते हुए भी कोई नया विचार, अच्छी बात ना कहें। औरों द्वारा दिए गए विचारों का घृणित पोस्टमार्टम करें क्योंकि आप ये जानते हैं कि कोई विचार अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होता और हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इस अवस्था में छिद्रान्वेषण करते चले जायें।
* ईमेल, पत्र, नोटिस इत्यादि ना पड़ें। यदि कोई सूचना पत्र लाया हो तो उसपर अपने हस्ताक्षर ना करें और फिर कहें कि यहाँ तो सूचना ही नहीं मिलती।
* संगठन के बारे में बाहर तो नकारात्मक बात फैलाएं और भीतर सर्वोच्च बॉस के आगे यह जताएं कि हमसे बड़ा संगठन भक्त यदा कदा ही जन्म लेता है।
यदि इतने घृणित कार्य करने के बावजूद भी संगठन बढिय़ा चल निकले तो तुरंत ही स्वयं को अति सीनियर जताकर समूचा श्रेय ले लेवें कि आज जो श्रेष्ठता देख रहे हो वो हमारी दिव्य तपस्या का फल है। राजनीति करने वालों से लोग डरते हैं। उन्हें दूर से नमस्ते करते हैं। कार्य करें, ओछी राजनीति से दूर रहें।
यहां मन्त्र यही है कि संगठन में राजनीति कर के आप कुछ क्षणों के लिये तो ऊपरी पायदान पर चढ़ सकते हैं लेकिन जिस ऊंचाई पर आप विराजित होते हैं, वह बड़ी चिकनी और तीक्ष्ण होती है। वहां जितना आसान चढ़ जाना है, फिसल जाना और भी आसान है। यही कॉर्पोरेट सत्य है।

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'बनें जगत के अतुल विजेता'

आल्प्स यूरोप की सबसे बड़ी पर्वत श्रृंखला है। रूस के विरुद्ध युद्ध छिड़ जाने पर नेपोलियन की सेना के लिये सबसे बड़ी चुनौती आल्प्स को पार करना ही थी। नेपोलियन ने इस समस्या को ताड़ लिया। आगे बढ़ती सेना को नेपोलियन ने कहा कि यहाँ कोई आल्प्स नहीं है और दिखने वाली पहाडी एक लघु पर्वत है। आल्प्स तो काफी बड़ा है। सत्य बात यह है कि ऐसा सुनकर सेना आल्प्स को पार कर गई। दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। यही है आत्मविश्वास। स्वयं पर, स्वयं की काबिलियत पर विश्वास। इसे स्ट्रांग डिजायर या विल पॉवर या सेल्फ एस्टीम आदि भी कहा जाता है। यह आत्मविश्वास ही सफलता का मर्म है। केवल आत्मविश्वास के सहारे एक विकलांग व्यक्ति इंग्लिश चैनल पार कर लेता है। नैतिक मूल्यों से जन्मे इसी आत्मविश्वास के सहारे एक साधारण दिखने वाला संत- महात्मा गाँधी - भारत देश को अंग्रेजों से आज़ाद करा देता है। इसी आत्मविश्वास के दम पर अपने दोनों पैरों के कट जाने के बावजूद बैसाखियों के दम पर वॉरेन मेक्डोनाल्ड नामक व्यक्ति अफ्रीका की सबसे ऊंची छोटी किलिमान्जारो पर फतह हासिल कर लेता है। संसार में आत्मविश्वास और अंतर्मन की शक्ति से बड़ा कुछ भी नहीं है। हमारी नकारात्मक सोच हमारे आत्मविश्वास को कम कर देती है। नकारात्मक सोच और हर बात में रोने की नकारात्मक प्रवृत्ति ही वास्तविक नरक है। यहाँ यह समझना चाहिये कि जब भी हम नकारात्मक बात करते हैं, नकारात्मक सोचते हैं तो हम नरक की ओर यात्रा कर रहे होते हैं। ऐसी अवस्था में हमें सकारात्मक सोच के साथ, ईश्वर में विश्वास रखकर, प्रत्येक कार्य में जीवटता से जुट जाना चाहिये। यही तो जीवन है। 

'मुश्किलें हैं मुश्किलों से घबराना क्या दोस्त, दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैंÓ।
आत्मविश्वास को बढाने के लिए सर्वप्रथम खुद के जीवन की एक 'विजेता पुस्तिकाÓ बनाइये। इसमें आप अपनी प्रत्येक जीत, उपलब्धि, पुरस्कार को लिखिये। यह जोश वर्धक टॉनिक का काम करेगी और आपको निराश होकर निकृष्ट नरक में जाने से रोकेगी। स्वयं को कमज़ोर, निर्बल, नाकारा समझना ईश्वरीय कृति का अर्थात स्वयं का भारी अपमान है। ऐसा न करें। आप जैसे हैं, अच्छे हैं। यह भाव भी संबल देता है।

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'रोयें नहीं, समाधान निकालें'

अमरीकाज मोस्ट वांटेड टीवी शो के होस्ट जॉन वॉल्श के छ वर्षीय बेटे का अपहरण शौपिंग मॉल के बाहर से हो गया। कुछ दिन बाद उस बच्चे की लाश वॉल्श को मिली। घटना दुखद हृदय विदारक थी। वॉल्श दंपत्ति चाहता तो निराशा, अवसाद, दु:ख में डूब जाता। चाहता तो केस दर्ज करके मुआवजा लेता। लेकिन वॉल्श दंपत्ति ने मुकदमा छोड़ दिया। उन्होंने चाहा कि जो उनके बेटे के साथ हुआ, वो किसी अन्य के साथ न हो। अत: वॉल्श ने अपने जीवन का एक नया मिशन बनाया और उसपर क्रियान्विति प्रारम्भ की। वॉल्श ने दिन रात मेहनत करके नेशनल कंप्यूटर सिस्टम बनाया ताकि सभी गुमशुदा बच्चों की खोज जल्द से जल्द हो सके। उसके बाद वॉल्श ने नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एण्ड एक्सप्लोइटेड चिल्ड्रन सोसायटी की स्थापना की। इस संस्था में वॉल्श ने 'कोड एडमÓ नामक सुविधा प्रारम्भ कर उसे समूचे देश के डिपार्टमेंटल स्टोर्स से जोड़ दिया ताकि गुमशुदा बच्चे को तुरंत ढूंढ लिया जाये। आज इस संथा में 125 कर्मचारी हैं ओर वे अब तक लगभग पचास हजार से ज्यादा गुमशुदा बच्चों को अपने परिजनों तक पहुंचा चुके हैं। 

इसे कहते हैं समाधान केन्द्रित एप्रोच। रोना रोते रहने वाले को जीवन में कुछ प्राप्त नहीं होता। जो समाधान की सोचता है, वही वास्तविकता में मनुष्य कहलाने का अधिकारी है। 'क्या होना चाहिएÓ कह देने से राष्ट्र, समाज या संगठन की प्रगति असंभव है। हमें तो सदैव समाधान केन्द्रित होकर 'क्या हो सकता हैÓ और 'मैं क्या कर सकता हूंÓ पर बल देना होगा। मैनेजमेंट का मूल तत्व क्रियान्विति है। क्रियान्विति के बिना प्लानिंग बेकार है। महात्मा गांधी ने कहा है कि सौ श्रेष्ठ विचारों को सोचते रहने से अच्छा है एक विचार की क्रियान्विति हो। समस्या यह है कि क्रियान्विति करे कौन? दरअसल सभी ज्ञानदेव की भांति उमड़ घुमड़ के सलाह तो देना चाहते हैं लेकिन कार्य करना नहीं चाहते। अत: कार्य अवस्य करें।
समस्या, बाधा, विपत्ति, क्लेश, झंझट, असफलता तो जीवन का अंग है। इन्हें लेकर न बैठें। इनसे लड़ें, भिड़ें और पराजित करने का दम रखें। रोना आसान है। समस्या से भिड जाना और भिड़कर उसे मात देना ही जीवन का आनंद है। ये बड़ा मुश्किल तो है लेकिन यही तो जीवन है। यहां मन्त्र यही है कि हमें समस्या या कष्ट आने पर समाधान और अवसर तलाशने चाहिये। दीन हीन निर्बल की भांति समस्याओं पर रोना - स्वयं का और मनुष्य जाति का अपमान है।

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'कर्म का चक्रीय रूप'

एक राजा ने अपने तीन मंत्रियों की कार्यक्षमता और ईमानदारी की परीक्षा लेने की सोची। उसने तीनों मंत्रियों को बुलाकर कहा कि वे राजकोष से एक लाख रूपया ले लेवें। उसके बाद उस एक लाख रुपये से जितना श्रेष्ठतम क्वालिटी का राशन और खाने पीने का सामान खरीद सकते हों, वो खरीद लेवें। पहले मंत्री ने ईमानदारी से एक लाख रुपये का श्रेष्ठ सामान खरीदा। दूसरे मंत्री ने सोचा कि क्यों न वो सिर्फ पच्चीस हजार का सामान लेवे और एक लाख का बिल बनवा ले तो राजा को क्या पता चलेगा? अत: उसने घटिया क्वालिटी का सामान खरीद लिया। तीसरे ने तो अनैतिकता की पराकाष्ठा ही पार कर दी। उसने मात्र पांच हजार का घटिया सामान खरीदा और एक लाख का बिल बनवा दिया। सभी राजा के पास पहुंचे। राजा ने तुरंत ही तीनों को एक महीने के लिये जेल भेजने का हुक्म सुना दिया। राजा ने कहा कि वे एक महीने तक उन्ही के द्वारा खरीदे गये राशन से भोजन बनाकर अपना पेट भरेंगे। पहले मंत्री को कष्ट नहीं हुआ क्योंकि उसके खाद्यान्न की क्वालिटी और क्वांटिटी सही थी। दूसरा मंत्री गंदे खाद्य के कारण बीमार हो गया। तीसरे मंत्री के पास खाने को कुछ था ही नहीं अत: वो स्वर्ग सिधार गया। 

ये कथा जीवन का शाश्वत सत्य है। आज आप जो भी हैं उसके लिये सिर्फ आपके कर्म जिम्मेदार हैं। कर्म सिद्धांत के अनुसार आप जो भी करते हैं वही लौट कर आपके पास आता है। इस कथा में भी तीनों पात्रों को वही प्राप्त हुआ जो उन्होंने पहले कभी अपने लिये बोया था। यहां यह समझना जरूरी है कि नैतिकता का कोई विकल्प नहीं है। अनैतिक आचरण सभी समस्याओं का मूल है। अनैतिक आचरण से क्षणिक सुख या आनद तो मिल सकता है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम अति घातक और गंभीर होते हैं।
हमें समझना चाहिये कि नैतिकता और जिम्मेदारी महानता की कीमत है। अनैतिक आचरण के कारण बेहतरीन शिक्षाविद रावण, पराक्रमी बाली और बलवान दुर्योधन का दुखद अंत हुआ। शास्त्र कहता है कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। अत: हमें ईश्वर में विश्वास रख, उसके न्याय से डरकर अपने सभी कर्म करने चाहिये। स्वयं में नैतिक मूल्यों का विकास करना और अपनी नई पीढी को नैतिक मूल्यों से सिंचित करना हमारे जीवन का परम ध्येय होना चाहिये। यहां मन्त्र यही है कि हमें सत्य और धर्म से ही अर्थ की प्राप्ति करनी चाहिए वर्ना अनैतिक आचरण की बड़ी बुरी गत होती है। यही स्व प्रबंध का मूल मन्त्र है।

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'ऑर्थोडॉक्स संस्थान'

आपने देखा होगा कि दफ्तर में कई कर्मचारी अत्यधिक व्यस्त और कार्य से घिरे हुए दिखते हैं। ये कर्मचारी देर तक दफ्तर में डटे रहते हैं। ऐसा करने से उनके सीनियर्स को लगता है कि वे बड़ी निष्ठा से अपना कत्र्तव्य पालन कर रहे हैं। भारत में अधिकांश संस्थान ऑर्थोडॉक्स आधार पर कार्य करते हैं। ऑर्थोडॉक्स संस्थान को देसी भाषा में लाला की दुकान भी कहा जाता है। ऐसे संस्थानों में संस्थान गौरव, कार्य संस्कृति, कार्मिक उत्पादकता आदि शब्दों का प्रयोग वर्जित है। यहां तो लाला जी का फायदा और उनके निकट रहना ही हर कर्मचारी का प्रथम और आखिरी लक्ष्य होता है। ऐसी अवस्था में यदि आप बहुत तेज गति से अपने सभी कार्यों को पूर्ण कर लेते हैं अर्थात ओवर एफिशिएंसी रोग के शिकार हैं तो सावधान होने का समय आ गया है। ऐसे संस्थानों में आपको सिर्फ कार्य पूर्ण नहीं करना है अपितु हर पल कार्य कर रहे हो - ऐसा दिखाना भी जरूरी है। आप क्या हैं-यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह यह है कि आप स्वयं के कार्य व्यवहार से स्वयं को कैसा दिखाते या प्रस्तुत करते हैं। स्वयं को व्यस्त और कार्य में डूबा हुआ दिखाना भी कॉर्पोरेट में जरूरी है। यह आपको सीखना ही होगा।

स्वयं को सदा कार्य से परेशान दिखाना, कार्य से त्रस्त दिखाना - आज की आवश्यकता है। याद रहे कि श्रेष्ठ कार्य का एक जोरदार परिणाम है - और ज्यादा कार्य। स्वयं को कार्य में व्यस्त दिखाने का यह अर्थ कतई नहीं कि आप कार्य न करें। आप खूब मेहनत से कार्य करें लेकिन ऑर्थोडॉक्स संस्थान में व्यस्त न दिखना भी अपराध है। अत: ऑर्थोडॉक्स संस्थानों में अपना कार्य पूर्ण हो जाने के बाद भी स्वयं को निम्नलिखित तरीकों से व्यस्त दर्शायें -
* बॉस और कर्मचारियों के मध्य ज्यादा वर्कलोड का रोना सदा रोते रहें।
* सप्ताह में कुछ दिन देर तक ऑफिस में रुकें। लगना चाहिये कि बहुत काम है और आप जुटे पड़े हैं।
* अंतिम तिथि से पूर्व कोई एसाइन्मेंट जमा नहीं करें। भले ही वो पूर्ण हो चुका हो।
* ऑफिस के कम्प्यूटर पर सदा एक अधखुली ईमेल रखें ताकि लगे कि आप मेल करने में व्यस्त हैं।
* अपनी टेबल पर सदा 2 या 3 फाइल्स फैलाये रखें ताकि लगे कि आप बहुत व्यस्त हैं।
यहां मन्त्र यही है कि कार्य तो अवश्य करें लेकिन ये भी जतायें कि आप बहुत ही व्यस्त और कार्य से घिरे हुए कार्मिक हैं। कुर्सी से बंधे रहकर, स्वयं को अति व्यस्त दिखाकर और निस्संदेह श्रेष्ठ कार्य करके ही आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यही कॉर्पोरेट मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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'दिमाग में कूदता बन्दर'

एक निर्धन आलसी किसान बिना किसी प्रयत्नऔर मेहनत के तुरंत अमीर बन जाना चाहता था। एक दिन गांव में एक बड़े सिद्ध महात्मा जी आये। वे हर समस्या को हल करने के लिये अचूक मन्त्र देने वाले विख्यात संत थे। किसान ने उनसे अमीर हो जाने का मन्त्र मांगा। महात्मा जी ने किसान को अमीर बनने का अचूक मन्त्र लिखकर दे दिया और कहा कि यह अचूक मन्त्र करोड़ों अरबों रूपए ला सकता है। साथ ही महात्मा जी ने कहा कि यह मन्त्र सिर्फ तभी काम करेगा जब किसान को कोई भी बन्दर परेशान नहीं कर रहा हो। किसान ने सुनिश्चित किया कि मंत्रोच्चार के दौरान बन्दर उसे परेशान नहीं करेगा। घर जाकर ज्यों ही किसान ने मंत्रोच्चार शुरू किया, उसके दिमाग में बन्दर की आकृति छप गई। मन्त्र व्यर्थ गया। ऐसा सैकड़ों बार हुआ क्योंकि जब भी किसान मन्त्र जपता, तो दिमाग में, उसके विचार में उपस्थित बन्दर उसे याद आ जाता और मन्त्र अधूरा रह जाता। अन्ततोगत्वा उसने महात्मा जी से कहा कि चाहे उसे रूपए न मिलें लेकिन उसके दिमाग के बन्दर को बाहर निकालें। 

यह प्राचीन काल की सांकेतिक कथा है। यहां बन्दर हमारी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन को दर्शाता है। ये बन्दर चिंता करते रहने की प्रवृत्ति को भी दर्शाता है। हम चाहे जो काम कर रहे हों, हमें व्यर्थ की चिंता सताती रहती है। ऐसी अवस्था में हम परिणामों की चिंता में बड़े मगन हो जाते हैं। कई बार तो हम मूल कार्य को पूर्णतया भूल जाते हैं क्योंकि हम तो त्वरित परिणाम चाहते हैं। दिमाग का बन्दर यानि हमारे दिमाग की चंचलता हमें श्रेष्ठ निर्णय लेने से रोकती है। इसी दिमागी चंचलता और मस्तिष्क में छुपे बन्दर रूपी उथल पुथल को उन्प्रोडक्टिव थिंकिंग कहते हैं। इस तकनीक में समस्या का वृथा विश्लेषण चलता रहता है। समाधान कुछ नहीं मिलता। भारतीय प्रणाली इससे विपरीत "ब्रेन स्टिलिंग" अर्थात स्थिरचित्त मस्तिष्क की वकालात करती है। यहां निर्णय लेने हेतु स्थिरचित्त होकर समस्त पहलुओं पर गौर करने को प्राथमिक आवश्यकता बताया गया है। यह आवश्यक भी है।
इस कथा का दूसरा संकेत है कि साधन (मन्त्र का जाप) का भी उतना ही महत्व है जितना कि लक्ष्य (धन प्राप्ति) का। हमें समझना चाहिये कि सिर्फ सोचने से, ठान लेने से, या मोटिवेट हो जाने से ही लक्ष्य प्राप्त नहीं होते। लक्ष्य प्राप्ति हेतु अथक परिश्रम और जीवटता की आवश्यकता है। यहां मन्त्र यही है कि ब्रेन स्टिलिंग और परिश्रम ही सफलता का मर्म है।

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'प्रत्येक वस्तु महत्वपूर्ण

 

एक बड़े वट वृक्ष पर तुरई की बेल चढऩे लगी। वृक्ष बड़ा अहंकारी था। वृक्ष ने सोचा कि इतने सबल, उच्च और विराट वृक्ष पर बेल का क्या काम? अत: वो बेल को अत्यंत ही तुच्छ समझने लगा। वृक्ष ने बेल को तुच्छ और निर्बल बताकर उसे भला बुरा भी कहा। बेल ने कोई जवाब नहीं दिया। एक दिन कुछ व्यक्ति पेड़ के निकट पहुंचे। उन व्यक्तियों ने वार्तालाप करते हुए यह तय किया कि वृक्ष को काट दिया जाये। वृक्ष को काटना इसलिए आवश्यक था क्योंकि उस वृक्ष के फल बड़े कड़वे थे तथा मनुष्य के लिये अच्छे नहीं थे। जब तुरई के बेल ने ये सूना कि वृक्ष कटने को है तो उसने तुरंत ही कहा कि ये वृक्ष उसका सहारा है अत: इसे ने काटा जाये। बेल ने कहा कि वृक्ष के फल भले ही कड़वे हों लेकिन तुरई तो मीठी है अत: वृक्ष न काटा जाये। लोगों ने बात मान ली। वृक्ष लज्जित हुआ। वृक्ष जिसे निकृष्ट समझता था उसी बेल ने वृक्ष के प्राण बचाये। वृक्ष समझ गया कि असली जीवन सभी के सम्मान को बनाये रखने में है।
इस कथा से स्पष्ट है कि है कोई भी व्यक्ति तुच्छ नहीं होता। प्रत्येक का अपना अलग महत्व होता है। किसी को कमजोर, नाकारा या बेकार समझना मानसिक दरिद्रता का प्रतीक है। आप नहीं जानते हैं कि कब, कहां आपको किस व्यक्ति से क्या काम पड़ सकता है? अत: किसी भी व्यक्ति के लिये तिरस्कार या घृणा का भाव न रखें। यही जीवन जीने का श्रेष्ठ तरीका है। भारतीय समाज किसी को भी तुच्छ नहीं मानताण् भारतीय दर्शन तो कहता है कि जो ब्रह्म भाव या ईश्वरतत्व का अंश मेरे पास है वही तुम्हारे पास भी है। यदि दोनों मनुष्यों में एक ही ईश्वर निवास करता है तो भेदभाव कैसा? शक्ति, पैसा, रूतबा आदि के बल पर समाज को बांटना मूर्खता है। प्रतिपल यह याद रखना चाहिये कि इस संसार में उपस्थित प्रत्येक सजीव या निर्जीव वस्तु का अपना महत्व है। ईश्वर किसी की भी रचना व्यर्थ में नहीं करता। ऐसा भाव लेकर समाज में जीना चाहिये। सभी को समान और समतुल्य मानने का भाव ही संतोष और आनंद को जन्म देता है। यही सफल सेल्फ मैनेजमेंट का मर्म है।

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