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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (58)

अति विनम्रता घातक

विनम्रता सद्गुण है लेकिन जरूरत से ज्यादा विनम्र होना कॉर्पोरेट जगत में घातक सिद्ध होता है। अति विनम्र होने से आप सभी के लिए सुलभ लक्ष्य हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सभी आपको सुलभ, सरल मानकर अपने काम भी आपसे करवाते जाते हैं। आप यह सोचकर अन्यों के भी काम करते जाते हैं ताकि सम्बन्ध नहीं बिगड़ जाये। नतीजा यह निकलता है कि आप स्वयं के कामों में उत्कृष्ट रूप से परफॉर्म नहीं कर पाते. अत: कॉर्पोरेट जगत में अति विनम्र होना या अत्यधिक सदाशयता का परिचय देना बहुत घातक सिद्ध हो सकता है। सभी के लिये उपलब्ध सज्जन मैनेजर की लोग प्रशंसा तो करते हैं लेकिन उसे परिणाम नहीं देते। परिणाम नहीं दे पाने के कारण अति विनम्र मैनेजर लोकप्रिय तो हो जाता है लेकिन प्रभावी नहीं हो पाता। अन्ततोगत्वा उस मैनेजर पर अप्रभावी होने का लेबल लगाकर उसे निकाल दिया जाता है। यही कठोर निर्मम मैनेजमेंट का स्याह सच है। यहां हमें मैनेजमेंट के सिद्धांत 'मंकी ऑन योर शोल्डरÓ सिद्धांत से प्रेरणा लेनी चाहिये। 'मंकीÓ का अर्थ है आपके मूल काम। यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि:
हम उतने मंकी ही अपने पास रखें जिन्हें हम फीड कर सकते हैं अर्थात उतने काम ही हाथ में लेवें जिन्हें आप सफलता पूर्वक कर सकते हों।
सदा विनम्र रहें लेकिन अपनी रीढ़ की हड्डी के केल्शियम को बनाये रखें। इसका अर्थ है कि रीढ़ विहीन 'एस मेनÓ नहीं बनें।
दूसरों के मंकी अर्थात दूसरों के कार्य स्वयं कदापि न करें। ऐसा करने पर आपको बेगार मिलती रहेगी क्योंकि सहकर्मियों को लगेगा कि आपको मंकीज की जरूरत है।
दूसरों के मंकीज यानि कामों को स्वयं ले लेने पर आप यह कहते हैं कि अब वह काम आपका है और आप अपने सहकर्मी को उसकी प्रगति रिपोर्ट भी देंगे।
विनम्र व्यवहार उन्हीं के साथ रखें जो इस विनम्रता का मूल्य समझते हों। जो विनम्रता और सदाशयता को कमजोरी मानते हों, उनके साथ पेशेवर व्यवहार ही उचित और तर्कसंगत है।
प्रशंसा और चापलूसी में अंतर करना सीखिये. चापलूसी को प्रशंसा समझकर हम कई बार अन्यों के कामों को भी कर डालते हैं, इससे बचिये।
मन्त्र यह है कि विनम्रता, प्रेम, दया आदि सद्गुण हैं। इन्हें समझने के लिए परिपक्वता की ज़रूरत होती है। अपरिपक्वों से ये उम्मीद न रखें कि वे आपके विनम्र व्यवहार को समझेंगे। अत: अति विनम्र न बनें।

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‘गार्बेज इन ब्रेन’

जरा एक पल के लिए महसूस करिये। आपका एक पक्का दोस्त आपके घर आकर आपके ड्राइंग रूम में गोबर, विष्टा, मूत्र तथा शहर का सबसे गंदा कूड़ा करकट डाल देवे तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? उस मित्र की धुनाई, या पुलिस बुलाना या संबंधों की समाप्ति। शायद यही होगी। क्या आप उससे यह कहेंगे कि यह कूड़ा ज्यादा संक्रामक नहीं है इसलिये और गंदगी डाल देवें। शायद नहीं। आप उस कूड़े को तुरंत ही साफ करेंगे और उसका नामोनिशान मिटा देंगे।
यहाँ प्रश्न यह है कि जब बाहरी कूड़े को इतने अच्छे से साफ करते हैं तो जो गंदगी व कूड़ा हमारे मित्र बन्धु या जानकार हमारे मस्तिष्क में डाल रहे हैं उसका विरोध क्यों नहीं? क्या गंदे विचारों से मस्तिष्क गंदा नहीं होता? हम जानते हैं कि जो बोयेंगे वही काटेंगे। इसी तरह हम जो भी अपने मस्तिष्क में डालेंगे वही तो प्रोसेस होकर बाहर आएगा। गार्बेज यानि कचरा डालेंगे तो गार्बेज ही बाहर आयेगा। इसे कहते हैं ‘गार्बेज इन गार्बेज आउट’ का सिद्धांत।
कई बार जब हमारा कोई मित्र या परिचित हमारे मस्तिष्क में गार्बेज डाल रहा होता है तो हम तर्क देते हैं कि इस गंदगी का प्रभाव हमपर नहीं पडेगा। घटिया षड्यंत्रकारी फिल्मों, आपराधिक फिल्मों और निकृष्ट वाहियात टी वी शो को देखकर भी हम यही कहते हैं कि ये तो मनोरंजन है। यहाँ हमें समझना होगा कि हमारा अवचेतन मस्तिष्क कुछ नहीं भूलता है। डॉ। विल्डर पेनफील्ड का शोध कहता है कि दो साल की उम्र के बाद व्यक्ति अपने जीवन की कोई घटना नहीं भूलता। अवचेतन मस्तिष्क में गंदगी पडी रहती है और कई बार चाहे न चाहे प्रकट भी होती है। इससे बचिये। सेक सिटी में रहने वाले चाल्र्स को कैंसर के चलते एक गुर्दा निकलवाना पड़ा। उसके फेफड़े भी संक्रमित हो गये। हर दिन उससे मिलने वाले मित्र उससे कहते कि मृत्यु सुनिश्चित है। चाल्र्स ने उन नकारात्मक बातों पर ध्यान नहीं दिया और जीवन जीने की चाह को बनाये रखा। चाल्र्स ने कैंसर की ऐसी दवा ली जो सिर्फ दस प्रतिशत मामलों में सफल होती थी। दवा चाल्र्स पर कामयाब रही। चार्ल्स छह वर्ष और जीया। उसके पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कैंसर नहीं मिला। वो कैंसर से मुक्त इसलिए हो पाया क्योंकि उसने ‘गार्बेज’ को स्वीकार नहीं किया और अपने अवचेतन मस्तिष्क को पोजिटिव रखा। उसकी मौत का कारण दिल का दौरा था। यहाँ मन्त्र यह है कि गार्बेज को अस्वीकार करना ही प्रगति है।

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