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गुरु मंत्र (गौरव बिस्सा) (104)

'रोयें नहीं, समाधान निकालें'

अमरीकाज मोस्ट वांटेड टीवी शो के होस्ट जॉन वॉल्श के छ वर्षीय बेटे का अपहरण शौपिंग मॉल के बाहर से हो गया। कुछ दिन बाद उस बच्चे की लाश वॉल्श को मिली। घटना दुखद हृदय विदारक थी। वॉल्श दंपत्ति चाहता तो निराशा, अवसाद, दु:ख में डूब जाता। चाहता तो केस दर्ज करके मुआवजा लेता। लेकिन वॉल्श दंपत्ति ने मुकदमा छोड़ दिया। उन्होंने चाहा कि जो उनके बेटे के साथ हुआ, वो किसी अन्य के साथ न हो। अत: वॉल्श ने अपने जीवन का एक नया मिशन बनाया और उसपर क्रियान्विति प्रारम्भ की। वॉल्श ने दिन रात मेहनत करके नेशनल कंप्यूटर सिस्टम बनाया ताकि सभी गुमशुदा बच्चों की खोज जल्द से जल्द हो सके। उसके बाद वॉल्श ने नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एण्ड एक्सप्लोइटेड चिल्ड्रन सोसायटी की स्थापना की। इस संस्था में वॉल्श ने 'कोड एडमÓ नामक सुविधा प्रारम्भ कर उसे समूचे देश के डिपार्टमेंटल स्टोर्स से जोड़ दिया ताकि गुमशुदा बच्चे को तुरंत ढूंढ लिया जाये। आज इस संथा में 125 कर्मचारी हैं ओर वे अब तक लगभग पचास हजार से ज्यादा गुमशुदा बच्चों को अपने परिजनों तक पहुंचा चुके हैं। 

इसे कहते हैं समाधान केन्द्रित एप्रोच। रोना रोते रहने वाले को जीवन में कुछ प्राप्त नहीं होता। जो समाधान की सोचता है, वही वास्तविकता में मनुष्य कहलाने का अधिकारी है। 'क्या होना चाहिएÓ कह देने से राष्ट्र, समाज या संगठन की प्रगति असंभव है। हमें तो सदैव समाधान केन्द्रित होकर 'क्या हो सकता हैÓ और 'मैं क्या कर सकता हूंÓ पर बल देना होगा। मैनेजमेंट का मूल तत्व क्रियान्विति है। क्रियान्विति के बिना प्लानिंग बेकार है। महात्मा गांधी ने कहा है कि सौ श्रेष्ठ विचारों को सोचते रहने से अच्छा है एक विचार की क्रियान्विति हो। समस्या यह है कि क्रियान्विति करे कौन? दरअसल सभी ज्ञानदेव की भांति उमड़ घुमड़ के सलाह तो देना चाहते हैं लेकिन कार्य करना नहीं चाहते। अत: कार्य अवस्य करें।
समस्या, बाधा, विपत्ति, क्लेश, झंझट, असफलता तो जीवन का अंग है। इन्हें लेकर न बैठें। इनसे लड़ें, भिड़ें और पराजित करने का दम रखें। रोना आसान है। समस्या से भिड जाना और भिड़कर उसे मात देना ही जीवन का आनंद है। ये बड़ा मुश्किल तो है लेकिन यही तो जीवन है। यहां मन्त्र यही है कि हमें समस्या या कष्ट आने पर समाधान और अवसर तलाशने चाहिये। दीन हीन निर्बल की भांति समस्याओं पर रोना - स्वयं का और मनुष्य जाति का अपमान है।

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'कर्म का चक्रीय रूप'

एक राजा ने अपने तीन मंत्रियों की कार्यक्षमता और ईमानदारी की परीक्षा लेने की सोची। उसने तीनों मंत्रियों को बुलाकर कहा कि वे राजकोष से एक लाख रूपया ले लेवें। उसके बाद उस एक लाख रुपये से जितना श्रेष्ठतम क्वालिटी का राशन और खाने पीने का सामान खरीद सकते हों, वो खरीद लेवें। पहले मंत्री ने ईमानदारी से एक लाख रुपये का श्रेष्ठ सामान खरीदा। दूसरे मंत्री ने सोचा कि क्यों न वो सिर्फ पच्चीस हजार का सामान लेवे और एक लाख का बिल बनवा ले तो राजा को क्या पता चलेगा? अत: उसने घटिया क्वालिटी का सामान खरीद लिया। तीसरे ने तो अनैतिकता की पराकाष्ठा ही पार कर दी। उसने मात्र पांच हजार का घटिया सामान खरीदा और एक लाख का बिल बनवा दिया। सभी राजा के पास पहुंचे। राजा ने तुरंत ही तीनों को एक महीने के लिये जेल भेजने का हुक्म सुना दिया। राजा ने कहा कि वे एक महीने तक उन्ही के द्वारा खरीदे गये राशन से भोजन बनाकर अपना पेट भरेंगे। पहले मंत्री को कष्ट नहीं हुआ क्योंकि उसके खाद्यान्न की क्वालिटी और क्वांटिटी सही थी। दूसरा मंत्री गंदे खाद्य के कारण बीमार हो गया। तीसरे मंत्री के पास खाने को कुछ था ही नहीं अत: वो स्वर्ग सिधार गया। 

ये कथा जीवन का शाश्वत सत्य है। आज आप जो भी हैं उसके लिये सिर्फ आपके कर्म जिम्मेदार हैं। कर्म सिद्धांत के अनुसार आप जो भी करते हैं वही लौट कर आपके पास आता है। इस कथा में भी तीनों पात्रों को वही प्राप्त हुआ जो उन्होंने पहले कभी अपने लिये बोया था। यहां यह समझना जरूरी है कि नैतिकता का कोई विकल्प नहीं है। अनैतिक आचरण सभी समस्याओं का मूल है। अनैतिक आचरण से क्षणिक सुख या आनद तो मिल सकता है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम अति घातक और गंभीर होते हैं।
हमें समझना चाहिये कि नैतिकता और जिम्मेदारी महानता की कीमत है। अनैतिक आचरण के कारण बेहतरीन शिक्षाविद रावण, पराक्रमी बाली और बलवान दुर्योधन का दुखद अंत हुआ। शास्त्र कहता है कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। अत: हमें ईश्वर में विश्वास रख, उसके न्याय से डरकर अपने सभी कर्म करने चाहिये। स्वयं में नैतिक मूल्यों का विकास करना और अपनी नई पीढी को नैतिक मूल्यों से सिंचित करना हमारे जीवन का परम ध्येय होना चाहिये। यहां मन्त्र यही है कि हमें सत्य और धर्म से ही अर्थ की प्राप्ति करनी चाहिए वर्ना अनैतिक आचरण की बड़ी बुरी गत होती है। यही स्व प्रबंध का मूल मन्त्र है।

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'ऑर्थोडॉक्स संस्थान'

आपने देखा होगा कि दफ्तर में कई कर्मचारी अत्यधिक व्यस्त और कार्य से घिरे हुए दिखते हैं। ये कर्मचारी देर तक दफ्तर में डटे रहते हैं। ऐसा करने से उनके सीनियर्स को लगता है कि वे बड़ी निष्ठा से अपना कत्र्तव्य पालन कर रहे हैं। भारत में अधिकांश संस्थान ऑर्थोडॉक्स आधार पर कार्य करते हैं। ऑर्थोडॉक्स संस्थान को देसी भाषा में लाला की दुकान भी कहा जाता है। ऐसे संस्थानों में संस्थान गौरव, कार्य संस्कृति, कार्मिक उत्पादकता आदि शब्दों का प्रयोग वर्जित है। यहां तो लाला जी का फायदा और उनके निकट रहना ही हर कर्मचारी का प्रथम और आखिरी लक्ष्य होता है। ऐसी अवस्था में यदि आप बहुत तेज गति से अपने सभी कार्यों को पूर्ण कर लेते हैं अर्थात ओवर एफिशिएंसी रोग के शिकार हैं तो सावधान होने का समय आ गया है। ऐसे संस्थानों में आपको सिर्फ कार्य पूर्ण नहीं करना है अपितु हर पल कार्य कर रहे हो - ऐसा दिखाना भी जरूरी है। आप क्या हैं-यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह यह है कि आप स्वयं के कार्य व्यवहार से स्वयं को कैसा दिखाते या प्रस्तुत करते हैं। स्वयं को व्यस्त और कार्य में डूबा हुआ दिखाना भी कॉर्पोरेट में जरूरी है। यह आपको सीखना ही होगा।

स्वयं को सदा कार्य से परेशान दिखाना, कार्य से त्रस्त दिखाना - आज की आवश्यकता है। याद रहे कि श्रेष्ठ कार्य का एक जोरदार परिणाम है - और ज्यादा कार्य। स्वयं को कार्य में व्यस्त दिखाने का यह अर्थ कतई नहीं कि आप कार्य न करें। आप खूब मेहनत से कार्य करें लेकिन ऑर्थोडॉक्स संस्थान में व्यस्त न दिखना भी अपराध है। अत: ऑर्थोडॉक्स संस्थानों में अपना कार्य पूर्ण हो जाने के बाद भी स्वयं को निम्नलिखित तरीकों से व्यस्त दर्शायें -
* बॉस और कर्मचारियों के मध्य ज्यादा वर्कलोड का रोना सदा रोते रहें।
* सप्ताह में कुछ दिन देर तक ऑफिस में रुकें। लगना चाहिये कि बहुत काम है और आप जुटे पड़े हैं।
* अंतिम तिथि से पूर्व कोई एसाइन्मेंट जमा नहीं करें। भले ही वो पूर्ण हो चुका हो।
* ऑफिस के कम्प्यूटर पर सदा एक अधखुली ईमेल रखें ताकि लगे कि आप मेल करने में व्यस्त हैं।
* अपनी टेबल पर सदा 2 या 3 फाइल्स फैलाये रखें ताकि लगे कि आप बहुत व्यस्त हैं।
यहां मन्त्र यही है कि कार्य तो अवश्य करें लेकिन ये भी जतायें कि आप बहुत ही व्यस्त और कार्य से घिरे हुए कार्मिक हैं। कुर्सी से बंधे रहकर, स्वयं को अति व्यस्त दिखाकर और निस्संदेह श्रेष्ठ कार्य करके ही आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यही कॉर्पोरेट मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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'दिमाग में कूदता बन्दर'

एक निर्धन आलसी किसान बिना किसी प्रयत्नऔर मेहनत के तुरंत अमीर बन जाना चाहता था। एक दिन गांव में एक बड़े सिद्ध महात्मा जी आये। वे हर समस्या को हल करने के लिये अचूक मन्त्र देने वाले विख्यात संत थे। किसान ने उनसे अमीर हो जाने का मन्त्र मांगा। महात्मा जी ने किसान को अमीर बनने का अचूक मन्त्र लिखकर दे दिया और कहा कि यह अचूक मन्त्र करोड़ों अरबों रूपए ला सकता है। साथ ही महात्मा जी ने कहा कि यह मन्त्र सिर्फ तभी काम करेगा जब किसान को कोई भी बन्दर परेशान नहीं कर रहा हो। किसान ने सुनिश्चित किया कि मंत्रोच्चार के दौरान बन्दर उसे परेशान नहीं करेगा। घर जाकर ज्यों ही किसान ने मंत्रोच्चार शुरू किया, उसके दिमाग में बन्दर की आकृति छप गई। मन्त्र व्यर्थ गया। ऐसा सैकड़ों बार हुआ क्योंकि जब भी किसान मन्त्र जपता, तो दिमाग में, उसके विचार में उपस्थित बन्दर उसे याद आ जाता और मन्त्र अधूरा रह जाता। अन्ततोगत्वा उसने महात्मा जी से कहा कि चाहे उसे रूपए न मिलें लेकिन उसके दिमाग के बन्दर को बाहर निकालें। 

यह प्राचीन काल की सांकेतिक कथा है। यहां बन्दर हमारी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन को दर्शाता है। ये बन्दर चिंता करते रहने की प्रवृत्ति को भी दर्शाता है। हम चाहे जो काम कर रहे हों, हमें व्यर्थ की चिंता सताती रहती है। ऐसी अवस्था में हम परिणामों की चिंता में बड़े मगन हो जाते हैं। कई बार तो हम मूल कार्य को पूर्णतया भूल जाते हैं क्योंकि हम तो त्वरित परिणाम चाहते हैं। दिमाग का बन्दर यानि हमारे दिमाग की चंचलता हमें श्रेष्ठ निर्णय लेने से रोकती है। इसी दिमागी चंचलता और मस्तिष्क में छुपे बन्दर रूपी उथल पुथल को उन्प्रोडक्टिव थिंकिंग कहते हैं। इस तकनीक में समस्या का वृथा विश्लेषण चलता रहता है। समाधान कुछ नहीं मिलता। भारतीय प्रणाली इससे विपरीत "ब्रेन स्टिलिंग" अर्थात स्थिरचित्त मस्तिष्क की वकालात करती है। यहां निर्णय लेने हेतु स्थिरचित्त होकर समस्त पहलुओं पर गौर करने को प्राथमिक आवश्यकता बताया गया है। यह आवश्यक भी है।
इस कथा का दूसरा संकेत है कि साधन (मन्त्र का जाप) का भी उतना ही महत्व है जितना कि लक्ष्य (धन प्राप्ति) का। हमें समझना चाहिये कि सिर्फ सोचने से, ठान लेने से, या मोटिवेट हो जाने से ही लक्ष्य प्राप्त नहीं होते। लक्ष्य प्राप्ति हेतु अथक परिश्रम और जीवटता की आवश्यकता है। यहां मन्त्र यही है कि ब्रेन स्टिलिंग और परिश्रम ही सफलता का मर्म है।

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'प्रत्येक वस्तु महत्वपूर्ण

 

एक बड़े वट वृक्ष पर तुरई की बेल चढऩे लगी। वृक्ष बड़ा अहंकारी था। वृक्ष ने सोचा कि इतने सबल, उच्च और विराट वृक्ष पर बेल का क्या काम? अत: वो बेल को अत्यंत ही तुच्छ समझने लगा। वृक्ष ने बेल को तुच्छ और निर्बल बताकर उसे भला बुरा भी कहा। बेल ने कोई जवाब नहीं दिया। एक दिन कुछ व्यक्ति पेड़ के निकट पहुंचे। उन व्यक्तियों ने वार्तालाप करते हुए यह तय किया कि वृक्ष को काट दिया जाये। वृक्ष को काटना इसलिए आवश्यक था क्योंकि उस वृक्ष के फल बड़े कड़वे थे तथा मनुष्य के लिये अच्छे नहीं थे। जब तुरई के बेल ने ये सूना कि वृक्ष कटने को है तो उसने तुरंत ही कहा कि ये वृक्ष उसका सहारा है अत: इसे ने काटा जाये। बेल ने कहा कि वृक्ष के फल भले ही कड़वे हों लेकिन तुरई तो मीठी है अत: वृक्ष न काटा जाये। लोगों ने बात मान ली। वृक्ष लज्जित हुआ। वृक्ष जिसे निकृष्ट समझता था उसी बेल ने वृक्ष के प्राण बचाये। वृक्ष समझ गया कि असली जीवन सभी के सम्मान को बनाये रखने में है।
इस कथा से स्पष्ट है कि है कोई भी व्यक्ति तुच्छ नहीं होता। प्रत्येक का अपना अलग महत्व होता है। किसी को कमजोर, नाकारा या बेकार समझना मानसिक दरिद्रता का प्रतीक है। आप नहीं जानते हैं कि कब, कहां आपको किस व्यक्ति से क्या काम पड़ सकता है? अत: किसी भी व्यक्ति के लिये तिरस्कार या घृणा का भाव न रखें। यही जीवन जीने का श्रेष्ठ तरीका है। भारतीय समाज किसी को भी तुच्छ नहीं मानताण् भारतीय दर्शन तो कहता है कि जो ब्रह्म भाव या ईश्वरतत्व का अंश मेरे पास है वही तुम्हारे पास भी है। यदि दोनों मनुष्यों में एक ही ईश्वर निवास करता है तो भेदभाव कैसा? शक्ति, पैसा, रूतबा आदि के बल पर समाज को बांटना मूर्खता है। प्रतिपल यह याद रखना चाहिये कि इस संसार में उपस्थित प्रत्येक सजीव या निर्जीव वस्तु का अपना महत्व है। ईश्वर किसी की भी रचना व्यर्थ में नहीं करता। ऐसा भाव लेकर समाज में जीना चाहिये। सभी को समान और समतुल्य मानने का भाव ही संतोष और आनंद को जन्म देता है। यही सफल सेल्फ मैनेजमेंट का मर्म है।

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'हारिये न हिम्मत'

एक वैज्ञानिक ने एक पानी की टंकी में शार्क छोड़ी। कुछ समय बाद वैज्ञानिक ने उस टंकी में एक छोटी मछली को छोड़ा। शार्क ने तुरंत छोटी मछली पर आक्रमण किया और उसे खा गई। थोड़ी देर बाद वैज्ञानिक ने उस टंकी के बीचों बीच एक ग्लास की मोटी शीट लगा कर उस टंकी को दो भागों में बाँट दिया। अब टंकी के एक भाग में शार्क थी और दूसरा भाग खाली था। वैज्ञानिक ने खाली भाग में एक छोटी मछली डाली। मछली देख शार्क ने आक्रमण प्रारम्भ किया लेकिन शार्क हर बार ग्लास की शीट से टकरा जाती और मछली खाने में असफल रह जाती। अब वैज्ञानिक ने टंकी में से ग्लास की शीट को हटा दिया। वैज्ञानिक अब यह देखकर आश्चर्यचकित था कि शार्क अब उस छोटी मछली पर आक्रमण कर ही नहीं रही थी। यहां ये सिद्ध हुआ कि शार्क हिम्मत हार गई। शार्क ने मानसिक पराजय स्वीकार कर यह सोच लिया कि अब वो उस छोटी मछली को नहीं खा सकती। इसी को "मेंटल बेरियर" कहते हैं। 

इस कथा से हमें यह समझना चाहिये कि:
* वास्तविक बाधाएं सिर्फ मानसिक ही होती हैं। यदि आपके मस्तिष्क ने यह ठान लिया है कि अमुक कार्य असम्भव है तो वो असम्भव ही होगा।
* मेंटल बेरियर्स वे बाधाएं होती हैं जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं होती हैं लेकिन मस्तिष्क में होती हैं। इसका अर्थ है कि उसे भी बाधा मान लेना जो वास्तव में है ही नहीं। मैनेजमेंट एक्सपर्ट्स "मेंटल बेरियर्स" को सबसे खतरनाक बाधा मानते हैं।
* हार मान लेने का भाव ही संसार का सबसे घटिया भाव है। यहां शार्क ने मानसिक रूप से हार मान ली। हार मान लेना ही व्यक्ति की मानसिक मृत्यु होना होता है। अत: जीवन की मुश्किल परिस्थितियों से जमकर लडिय़े।
* आप और हम जब भी पराजित या असफल होते हैं तो भावनात्मक रूप से टूटा हुआ महसूस करते हैं। इस कारण आगे प्रयास करना ही बंद कर देते हैं। प्रयास किये बिना कुछ भी प्राप्त हो नहीं पाता। अंतत: हम परास्त मानसिकता के शिकार होकर हिम्मत हार जाते हैं।
यहां मन्त्र यही है कि हिम्मत हार जाना कायरता का संकेत है। हिम्मत हारना तो अपराध है। हिम्मत हारकर बैठना और खुद को कोसना - स्वयं का, परिवार का, समाज का और ईश्वरीय सत्ता का अपमान है। इससे बचिये। हार से जमकर लडऩे वाले हिम्मती व्यक्तियों को मंजिल मिलना तय है। यही सेल्फ मैनेजमेंट का शाश्वत सत्य है।

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'बहानासाइटिस'

एड्स, कैन्सर और हार्ट अटैक से भी भीषण बीमारी है - बहानासाईटिस.। बहानासाईटिस बीमारी के लक्षण हैं - बहाने बनाना, अपनी असफलता हेतु अन्यों को दोष देना, कुंठाग्रस्त होकर अपनी विफलता के लिये भाग्य को कोसना और सदा कुढ़ते रहना। यदि बुरा वक्त आ जाये तो बहाने नहीं बनायें। ऐसा नहीं सोचें कि बुरा वक्त सिर्फ आपका ही आया है। आप अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिसे मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया है। मुश्किल काल में अपने आस पास देखें कि अन्य कई व्यक्तियों के जीवन में भी मुश्किलें आई हैं। आवश्यक नहीं है कि सौभाग्यशाली या 'चांदी का चम्मच लेकर जन्मेÓ लोग ही सफल हुए हैं। असफलता को चुनौती मानकर उससे डटकर मुकाबला करने वालों की भी संसार में कमी नहीं है। अत: बहाने बनाने छोडिये। मुश्किलों से जमकर लडिय़े और विजयी बनिये।

जरा सोचिये -
* अनेकानेक बार चुनाव हारने और व्यावसायिक असफलता के बावजूद ट्रुमेन निराश नहीं हुए और अमरीका के राष्ट्रपति बने।
* उत्पीडन का शिकार होने के बावजूद ओपेरा महान उदघोषक बनी।
* निराशा के कारण आत्महत्या का विचार कर चुके स्वामी प्रेम आनंद रामकृष्ण परमहंस के समझाने पर बेहतरीन साहित्यकार बन गये।
* फ्रेंक्लिन रूजवेल्ट ने व्हील चेयर पर होने के बावजूद अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में सेवायें दी।
इन उदाहरणों से साफ है कि सफल वही हुए हैं जिन्होंने जीवटता से जीवन का संग्राम लड़ा और कभी भी बहानासाईटिस की बीमारी से ग्रस्त नहीं हुए।
क्या आप इन वाक्यों का प्रयोग करते हैं?
* देखते हैं।
* कल बात करते हैं।
* इसपर कमेटी बना देते हैं।
* मेरा तो भाग्य ही खोटा है।
यदि आप इन वाक्यों का प्रयोग करते हैं तो आप बहानासाईटिस बीमारी से ग्रस्त हैं। इस बीमारी से बचने हेतु :
* अपनी मुसीबतें अन्यों पर या भाग्य पर थोपना बंद कर दीजिये। आज से ही अमल कीजिये।
* अपने भाग्य को स्वीकारिये। प्रतिकूल परिस्थिति को स्वीकारिये। ये जीवन का अंग है।
* विकटतम परिस्थितियों में जीवटता से जमे रहिये।
* स्वयं की मदद स्वयं करें। अन्य मदद करेंगे, ये भाव बेकार है।
यहां मन्त्र यही है कि अपनी ताकत पर भरोसा रखकर समस्त समस्याओं का हल निकालने का प्रयास ही मैनेजमेंट का प्राण तत्व है।
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या दोस्त;
दीवारों में ही तो दरवाजे निकाले जाते हैं।

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'मेन्टल ब्लॉकेज'

मेन्टल ब्लॉकेज वर्तमान समय की बहुत बड़ी समस्या है. मेन्टल ब्लॉकेज का अर्थ है मस्तिष्क को एक दिशा में ही सोचने हेतु मजबूर करना, अपनी कार्यविधि को ही श्रेष्ठ मानना और विरोधी विचारधारा को बिलकुल स्वीकार न करना. यह गलत है. हाल ही में मैं अपने मित्र के घर गया. उसकी पुत्री ने मुझसे कहा कि वो अपने कमरे और स्टडी टेबल को सही ढंग से रखने का बहुत प्रयास करती है लेकिन दो दिन बाद ही कमरा वापिस अस्त व्यस्त हो जाता है. मैंने उसके कमरे में पड़ी एक पुस्तक को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया. ऐसा करते ही वो तुरंत बोली कि यह तो गलत है. ऐसा कहकर उसने पुस्तक को वापिस अपने द्वारा तय किये गये स्थान पर रख दिया. अब मैंने उसे समझाया कि उसने अपने मस्तिष्क में यह तय कर लिया है कि किस वस्तु को कहाँ रखना है. जब ऐसा नहीं हो पाता तो उसे लगता है कि सब अस्त व्यस्त है. अत: इससे बचे. मस्तिष्क को नया प्रयोग करने दे. जरूरी नहीं कि जो वो सोचती है, वही सही हो. अस्त व्यस्त कमरा नहीं अपितु हमारा मस्तिष्क है. इसपर सोचे. 

हमारी मूल समस्या यही है कि हमने अपने मस्तिष्क को एक ही प्रकार से कंडीशन कर दिया है. यह आवश्यक कतई नहीं है कि जिसे आप सही समझते हों या जो आपका निजी दृष्टिकोण हो, वही शाश्वत सत्य भी हो. मस्तिष्क को नये तरीकों से विचार करने दीजिये. क्या आप जानते हैं कि :
*आपका मस्तिष्क लगभग छ हजार मील जितनी लम्बी वायरिंग के रूप में गुंथे न्यूरोन्स के माध्यम से कम्युनिकेट करता है.
• आपका तंत्रिका तंत्र लगभग 28 लाख न्यूरोन्स से बना है जो शरीर के किसी भी भाग की सूचना को मात्र 20 मिलीसेकेंड में मस्तिष्क को पहुंचा देते हैं.
• आपका मस्तिष्क कई सुपर कम्प्यूटर्स से भी ?्यादा ते? और बेहतर है क्योंकि वो 30 लाख बिट्स की सूचना एक सेकंड में याद रख लेता है.

अब ?रा सोचिये:

• ईश्वर द्वारा दिये गये इस अनमोल तोहफे का क्या आप सही इस्तेमाल कर रहे हैं?
• कहीं आपने अपने मस्तिष्क में कुत्सित और घृणित विचार तो नहीं भर दिये हैं?
• क्या आप विरोधी विचारों को सहन करते हैं?

इनपर विचार करें और मस्तिष्क को खुला रखें. नये विचारों को ग्रहण करें. "सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार मेरे पास आते रहें" – भारतीय शास्त्र के इसी वाक्य को अपना आदर्श मानें. नया सीखना ही जीवन है अत: मेन्टल ब्लॉकेज से बचिये.

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'दिमाग में पड़े पत्थर'

एक अध्यापक सड़क किनारे बैठा जोर - जोर से हंस रहा था। लोग आश्चर्यचकित होकर उसे देख रहे थे। जब लोगों ने उसके हंसने का कारण पूछा तो उसने सभी से प्रश्न किया कि सामने कितने पत्थर पड़े हैं? सभी ने कहा कि वहां एक पत्थर पडा है। यह सुनकर वो फिर हंसने लगा। उसने हंसते - हंसते कहा कि वहां तो दो पत्थर हैं। लोगों को लगा कि वो मानसिक संतुलन खो चुका है। ऐसे में एक व्यक्ति ने हिम्मत करके पूछा कि जब वहां एक ही पत्थर है तो वो उसे दो पत्थर क्यों कह रहा है? अध्यापक ने जवाब देते हुए कहा कि एक पत्थर तो वास्तविक पत्थर है जो यहाँ पडा है और सभी को दिख रहा है। लेकिन दूसरा पत्थर सभी लोगों की अक्ल पर पडा हुआ है। उस अध्यापक ने कहा कि इस रास्ते से सैकड़ों लोग गये, उन्हें पत्थर से ठोकर लगी लेकिन किसी ने भी इस पत्थर को हटाने की कोशिश नहीं की। अक्ल पर पड़े पत्थर को क्या पत्थर नहीं कहेंगे? क्या जो दिखता है वही सत्य है? क्या अदृश्य बाधाओं और समस्याओं को नहीं देखना चाहिये? क्या प्रत्येक व्यक्ति जिसे पत्थर से ठोकर लगी उसे पत्थर हटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिये? कॉर्पोरेट जगत की सबसे बड़ी समस्या – अदृश्य बाधाओं को नहीं देख पाना। दृश्य बाधाएं और समस्याएँ तो नजर आ जाती हैं। बात तो तब है जब आप अदृश्य को भी देख सकने का माद्दा रखते हों। इसी को मैनेजमेंट में सुपर विजऩ कहते हैं जिसका अर्थ है सुपीरियर विजऩ या उसे भी देख लेना जिसे अन्य नहीं देख सकें। आपको याद रखना चाहिये कि छिपी हुई बाधाओं और समस्याओं का निराकरण ही प्रगति के मार्ग खोलता है। इसी को मैनेजमेंट में 'रूट कॉज़ एनेलिसिसÓ कहते हैं। इसका अर्थ है समस्या की जड़ में पहुंचना और फिर इसका स्थायी समाधान ढूंढना। यदि इस समय आप रोगी को ठन्डे पानी में बैठा देंगे तो इसका नतीज़ा आप समझ सकते हैं। अत: 'रूट कॉज़ एनेलिसिसÓ आवश्यक है। यहाँ मन्त्र यही है कि सबसे पहले अदृश्य छिपी वास्तविक समस्या को पहचानो और उसका समाधान खोजो। कई बार वास्तविक समस्या कुछ और होती है लेकिन दिमाग में पड़े पत्थरों के कारण हम उसकी जड़ तक नहीं पहुँच पाते। समस्या का समाधान निकालिये और जड़ तक जाने का प्रयास कीजिये। यही जीवन है।

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'संतुलित अर्थ पिशाच'

एक उद्योगपति था। उसने अरबों रुपया कमाया। जब वो मरने वाला था तो उसने अपने सेक्रेटरी को बुलाकर पूछा कि वो अगले जन्म में अमीर उद्योगपति बनना चाहेगा या उस अमीर उद्योगपति का सेक्रेटरी? सेक्रेटरी ने जवाब दिया कि वो तो सेक्रेटरी ही बनना चाहता है। सेक्रेटरी ने कहा कि वो देख रहा है कि उद्योगपति पिछले चालीस सालों से सिर्फ धन कमाने में लगा है। इसके अलावा क्या कमाया? क्या परिवार को, समाज को समय दे पाया? यदि ऐसा नहीं कर पाया तो उद्योगपति बनने से क्या लाभ हुआ? इस बात को सुनकर उस उद्योगपति को मरते - मरते ज्ञान प्रात हो गया।
धन के लिये आप दिन - रात बहुत दौड़ लगा रहें हैं लेकिन उस दौड़ के समाप्त होने पर कहाँ पहुँच पाये हैं? पैसे की, यश प्राप्ति की, समाज पर अपनी धाक जमाने की अंधी दौड़ से क्या प्राप्त होगा? कहीं उस उद्योगपति की भांति आपका जीवन भी असंतुलित तो नहीं रह गया? दिन रात लालच, एक रूपए को दो रुपया बनाने का जुनून कहीं आपके व्यक्तित्व को असंतुलित न कर दे? यदि आपके पास आपके माता-पिता, पत्नी, और बच्चों के लिये समय नहीं है तो इस धन का क्या मोल? विचार कीजिये। क्या आपके पास मित्रों की अंतहीन सूची है? क्या आपके एक कहे पर बीस मित्र आपकी मदद हेतु आगे आयेंगे? यदि ऐसा नहीं है तो आप सिर्फ एक असंतुलित अर्थ पिशाच हैं। आप वास्तव में संतुलित जीवन नहीं जी रहे हैं।
अधिकांश व्यक्ति असंतुलित जीवन जीते - जीते ही मृत्यु को प्राप्त कर लेते हैं। कहीं आप भी धन की अंधी दौड़ के चलते चिंता, क्लेश और ईष्या रूपी जंजालों में फंस चुके हैं? जरा विचार अवश्य कीजिये। चिंताएं आपको मनोरोगी बना देंगी। आप एक शुद्ध सार्थक जीवन नहीं जी पायेंगे। जीवन में संतुलन का होना आवश्यक है। आप जो आज कर रहे हैं, उससे आपके भविष्य का निर्माण होता है। अत: धन मात्र के संचय पर ही स्थान न देवें। धन के साथ साथ परिवार, सामाजिक नेटवर्क और प्रेमीजनों का भी विशेष ध्यान रखें। ऐसा नहीं करने पर आप एक धन कमाने वाले रोबोट से ज्यादा कुछ नहीं होंगे। याद रखें, कि रोबोट्स के अंतिम संस्कार में कोई नहीं जाता। यह मार्मिक सन्देश समझना ही प्रभावी सेल्फ
मैनेजमेंट है।

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