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'बुराई ढूंढना ही पतन'

एक चिडिय़ा थी. वो दिन भर मेहनत करती और अपना पेट भरती थी. उसकी एक आदत थी. उसके साथ पूरे दिन में जो भी बुरा हुआ होता, वो उतने ही कंकड़ अपनी पोटली में डालती जाती थी. शाम को उन कंकड़ों को देखकर दुखी होती रहती और सभी को कोसती. यह उसका नित नियम था. थोड़े दिनों में वो पोटली बहुत भारी हो गई. कुछ दिन बाद उसे भरी पोटली के साथ उडऩे में दिक्कत होने लगी. अब पोटली इतनी ज्यादा भारी हो गई कि उसे लेकर चलना भी दुश्वार था. एक दिन ऐसा आया कि उस पोटली को ढ़ोने की कोशिश में वो पोटली फट गई. सारे कंकड़ चिडिय़ा पर गिरे और उसकी मृत्यु हो गई. 

यह सांकेतिक कथा आज के संस्थानों का स्याह और भयावह सत्य है. नौकरी कर रहे लोगों के बीच की छोटी - बड़ी राजनीति - कब निजी शत्रुता में बदल जाती है; इसका पता ही नहीं चलता है. इस चिडिय़ा की भांति प्रत्येक कर्मचारी दूसरे के गुण - दोषों का लेखा - जोखा लेकर बैठा है. दूसरों के दोषों और कमियों को निकालते - निकालते कर्मचारी इतने ज्यादा नकारात्मक और निकृष्ट बन जाते हैं कि उन्हें निजी और पारिवारिक संबंधों का भी भान नहीं रहता.
जरा सोचिये-
* जो बुरा हुआ उसी को याद रखना और कोसते रहने की प्रवृत्ति कष्टों को जन्म देती है.
* यहीं से मन में कुंठा उपजती है.
* यह कुंठा युद्ध को जन्म देती है जहाँ व्यक्ति किसी भी प्रकार से जीतना चाहता है.
* येन केन प्रकारेण जीत की इच्छा अधर्म और अनैतिक आचरण को भी जाय? मानती है. और यहीं से शुरू होता है पतन.
दूसरों के दोषों को गिनना प्रारम्भ करने का अर्थ है पतन. किसी को इसलिये गिराना क्योंकि आप चढ़ नहीं सकते - इसे ही कहते हैं पतन. बदला लेने का भाव, दोषों को स्मरण करने की प्रवृत्ति और प्रति पल स्वयं को कोसना है पतन. यहां मन्त्र यही है कि स्वयं को श्रेष्ठ बनाने में इतना ज्यादा समय खर्च करें कि दूसरे क्या कर रहे हैं; यह जानने में आपकी दिलचस्पी ही न रहे. यही उन्नति का मार्ग है -चाहे निजी जीवन हो या नौकरी. शाश्वत सत्य यही है.

DNR Reporter

DNR desk

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