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'रिस्क लेना सीखें'

एक गांव की गुफा को लोग मौत की गुफा कहते थे क्योंकि आज तक जो भी उस गुफा में दाखिल हुआ, वह कई दिनों बाद भी वापिस नहीं लौटा था. जब एक माह बीतने पर भी कोई नहीं लौटा तब गाँव के एक वीर नौजवान ने गुफा में जाने की सोची. सभी ने उसे समझाया कि वह ऐसा जोखिम न लेवे लेकिन वो अडिग रहा. जैसे ही वह नौजवान गुफा में घुसा तो उसे किसी ने धक्का दिया. युवक एक बगीचे में गिरा. तभी उसने देखा कि वह स्थान तो स्वर्ग से भी सुन्दर लग रहा था और जो ग्रामीण व्यक्ति अब तक गुफा में गए थे, वे सभी वहां बड़े ही आनंदित थे. युवक के पूछने पर उन सभी ने एक स्वर में कहा कि उन्होंने गुफा में जाने का जोखिम जरूर उठाया लेकिन गुफा में इतनी सुखद जिन्दगी थी कि उनका वापिस आने का मन ही नहीं किया. युवक के आग्रह पर वे सभी वापिस गाँव गए और लोगों को समझाया कि औसत जोखिम लेने से ही सुख और आनंद की प्राप्ति संभव है. 

समस्या यही है कि हम किसी भी तरह का जोखिम या रिस्क तो लेना ही नहीं चाहते. सच तो यह है कि हमने अपने उपजाऊ मस्तिष्क पर एक बड़ा सा ताला जड़ रखा है. जैसे ही हमारे मस्तिष्क में कोई नया विचार या नया कार्य करने की योजना तैयार होती है, वो योजना क्रियान्वित होने के लिये बाहर आ ही नहीं पाती क्योंकि मस्तिष्क पर तो ताला लगा हुआ है. यदि अपना व्यवसाय या कार्य प्रारम्भ करना हो तो रिस्क तो लेना ही पड़ेगा. यदि आप रिस्क नहीं ले सकते हैं तो आप कुछ भी नया, अधुनातन और समाजोपयोगी कार्य कर ही नहीं पायेंगे.
समस्त महान बिजनेस लीडर्स ने रिस्क लेकर ही अपने उद्यम और संस्थान का विकास किया है. स्टीव जॉब्स जैसे व्यक्ति को जब स्वयं द्वारा स्थापित कम्पनी से ही निकलना पड़ा तो भी उन्होंने रिस्क लेकर पिक्चर इंक की स्थापना कर सफलता अर्जित की. सोनी समूह के प्रमुख एकियो मोरिटा ने वॉकमेन बनाया तो उन्होंने भी बहुत जोखिम उठाया लेकिन अन्ततोगत्वा उत्पाद सफल रहा. यहाँ मन्त्र यही है कि भले ही उद्यम हो या निजी जीवन; जो जोखिम लेने का दम रखता है, वो ही सफलता के शिखर पर पहुंच पाता है. यही उद्यमिता का शाश्वत सत्य है.

DNR Reporter

DNR desk

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