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अंतर्मन की अद्भुत शक्ति

भारतीय शास्त्र कहते हैं कि हम किसी को भी प्रेरित नहीं कर सकते हैं। हम केवल उस व्यक्ति को उसके अंतर्मन की शक्ति की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं। आंतरिक प्रेरणा रूपी शक्ति का सच्चा बोध व्यक्ति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा देता है। प्रोत्साहन पर आधारित सकारात्मक प्रेरणा और डर पर आधारित नकारात्मक प्रेरणा एक स्तर तक ही काम करती हैं। इन दोनों प्रेरणा की सीमाएं हैं। आंतरिक प्रेरणा या अंतर्मन की शक्ति असीम है। मैनेजमेंट साइंस कहता है कि व्यक्ति धन से प्रेरित होता है। धन से ज़्यादा प्रेरणा लीडर देता है। सर्वाधिक प्रेरणा विश्वास अर्थात अपने अंतर्मन की भावनाओं से होती है। अल्बर्ट आइन्स्टीन को कक्षा में सभी स्टुपिड (मूर्ख) कहते थे। उसके शर्ट पर पीछे स्टुपिड लिखते थे. शिक्षकों का आकलन था कि वो सात जन्म में भी विज्ञान और गणित नहीं सीख सकेगा। आइन्स्टीन ने इन शब्दों की परवाह नहीं की। उसने अपने अनार्मन की सुनी जो सदा कहता था कि भीतर एक महान वैज्ञानिक छिपा है। आइन्स्टीन की हकीकत आज हम सब जानते हैं। यह प्रेरणा न तो धन आधारित थी और ना ही लीडर से सम्बंधित। यह आंतरिक प्रेरणा थी। शिक्षक द्वारा दी गई सकारात्मक प्रेरणा के फलस्वरूप डॉ कलाम देश को मिले तो वहीं दूसरी ओर माता द्वारा दी गई प्रेरणा ने इडियट कहे जाने वाले व्यक्ति को महान वैज्ञानिक एडिसन बना दिया। अंतर्मन की शक्ति का जागरण कर प्रेरित होने हेतु हमें स्वयं से कुछ प्रश्न पूछने चाहिये:


> क्या यह काम मेरे उद्देश्य की पूर्ति करता है?
> मैं और क्या अच्छा कर सकता हूँ?
> क्या यह सफल व्यक्तियों का अपनाया हुआ रास्ता है?
> मैं इस समय जो कर रहा हूँ क्या वह परिवार, समाज, और राष्ट्र के लिए सही है?
ये प्रश्न स्वयं से लगातार करते रहिये। ये सकारात्मक दिशा में आपको आगे बढाते रहेंगे।
महत्वपूर्ण विषय यह है कि यदि कोई अपने अंतर्मन की शक्ति को जागृत ही न करना चाहे तो क्या करें? एक घोड़े को हम तालाब तक तो ले जा सकते हैं लेकिन पानी कैसे पिलायें? ऐसी अवस्था में हमें घोड़े को थोडा नमक चटाना पडेगा ताकि उसे प्यास लगे और वो पानी पिये. इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि प्रेरणा तभी काम करती है जब कोई प्रेरित होना चाहे। जि़म्मेदारी से बचना चाहने वाला, कुंठाग्रस्त, अवसादी, प्रत्येक विषय में नकारात्मक बात खोजने वाला कभी भी प्रेरित नहीं होगा। वह अपने अंतस की ताकत को जागृत होने ही नहीं देता। अत: मूल मन्त्र यह है कि यदि हम प्रेरित होकर कुछ करना चाहते हैं तो सबसे पहले कुंठाओं और हीन भावनाओं को त्यागना होगा। यही प्रेरणा के सिद्धांत का मर्म है।

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