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'कृतघ्नता एक अपराध'

एक शिकारी शिकार के लिये गया और रास्ता भटक गया। चार दिन तक भटकता रहा लेकिन कुछ भी खाने को नहीं मिला। थक कर अधमरा सा शिकारी भगवान से भोजन मिलने की मिन्नतें करने लगा। थोड़ी ही देर बाद शिकारी ने एक आम का पेड़ देखा। प्रसन्नता से भरा शिकारी आम के पेड़ के पास पहुंचा और तुरंत आम खाने लगा। जब शिकारी को पहला आम मिला तो उसके नेत्र भीग गये और उसने तुरंत ही ईश्वर का अत्यधिक आभार जताया। दूसरा आम खाते हुए भी शिकारी ईश्वर वंदना करता रहा। छठे और सातवें आम को खाते हुए शिकारी ईश्वर ने धीरे धीरे ईश्वर को उलाहना देना शुरू किया क्योंकि वो चार दिन से भूखा था। दसवां आम तो शिकारी ने फैंक दिया और यह जताया कि आम भोजन थोड़े ही है। हमारी स्थिति भी यही है। यहां हम शिकारी की भूमिका में हैं। आम वे उपहार हैं जो ईश्वर, देश, समाज, परिवार से हमें प्राप्त होते हैं। हम नियमित तौर पर उपहार प्राप्त करते जाते हैं और हमारा लालच लगातार बढ़ता जाता है। दसवां आम भी पहले जितना मीठा था लेकिन उसके लिये धन्यवाद नहीं दिया गया। यह घटिया प्रवृत्ति है।


आज हम जिस स्थिति में हैं, कभी हमने उसी स्थिति में पहुंचने के लिये प्रार्थना की थी। अब जब हम उस स्थिति के समस्त सुखों और आनंदों को भोग चुके हैं तो हमें यह स्थिति रुचिकर नहीं लग रही है। इस स्थिति में पहुंचाने वालों का आभार जताना भी हमने बंद कर दिया है। यह हमारा कृतघ्न होने का सूचक है। हम आज की श्रेष्ठ स्थिति हेतु यही कहते हैं कि ये तो होना ही चाहिये था। हमें ईश्वर से, समाज से, परिवार से, मित्रों से लगातार उपहार प्राप्त होते रहते हैं। हम उन्हें लगातार ग्रहण भी करते जाते हैं लेकिन उनका सही मूल्य नहीं समझ पाते और उन्हें कोई महत्त्व नहीं देते हैं। यही कहते हैं कि ऐसा तो होना ही चाहिये। यही कृतघ्न होने का संकेत है। ईश्वर ने आपको जीवित रहने का या और जीने का उपहार दिया, माता पिता ने आपकी समस्याओं को सुलझाने का उपहार दिया, बच्चों ने जीवंत बने रहने का और पत्नी ने मकान को घर बनाने का उपहार दिया है। क्या यह कम है? क्या हमने कभी इनका महत्त्व समझा है? यहाँ मूल मन्त्र यह है कि आभार जताना सीखिये। हर सुख के लिये, हर आनन्ददायी पल के लिये और जो भी प्राप्त हुआ है उसके लिये। यही सुखमय जीवन का आधार तत्व है।

DNR Reporter

DNR desk

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