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'सबको खुश करना नामुमकिन'

एक व्यापारी के तीन पुत्रों ने अलग अलग व्यापार प्रारम्भ किये। एक ने खेती, दूसरे ने कुम्भकार और तीसरे ने हिल स्टेशन पर होटल चलाने का कार्य प्रारम्भ किया। व्यापारी ने एक दिन तीनों के हाल चाल जानने हेतु यात्रा की। जब वह पहले पुत्र के घर पहुंचा तो उसने पिता से वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। वह किसान था। उसका कार्य वर्षा पर आधारित था। दूसरे पुत्र के घर जाते ही पुत्र ने पिता को भीषण गर्मी पड़ते रहने की प्रार्थना करते रहने को कहा। जब किसान को उसने वर्षा होते रहने की प्रार्थना करते पाया तो वह आगबबूला हो गया और तुरंत ही प्रार्थना बंद करने को कहा। दुसरे पुत्र के कहने पर पिता ने गर्मी पडऩे की प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। अब व्यापारी तीसरे पुत्र के घर पहुंचा। व्यापारी पिता भीषण गर्मी पडऩे की प्रार्थना कर रहा था। यह देख तीसरा पुत्र क्रोधित हो गया और उसने अपने पिता को बसंत काल जैसे मौसम की प्रार्थना करते रहने को कहा। पिता को यह समझ नहीं आया कि आखिर वो ईश्वर से किस मौसम के लिये प्रार्थना करे?


यह बात संगठनों में भी लागू होती है। सभी को खुश कर देने का कोई निर्णय हो ही नहीं सकता। सभी खुश हो जायें, यह पूर्णतया असंभव है। अत: कठोर और नियमानुसार सही निर्णय लेवें। मैनेजमेंट कठोर निर्णय लेने का कार्य है। जो प्रबंधक कठोर निर्णय या निकृष्ट कार्मिकों को दंड दे सकने के निर्णय नहीं ले सकते, वे मैनेजमेंट के पेशे में अनुपयुक्त और बेकार हैं। सभी को खुश कर देने की इच्छा संगठन के सर्वनाश को न्योता देती है। संगठन समाप्त हो जाते हैं। मैनेजर्स के निजी काम होते रहते हैं। सभी खुश कदापि नहीं होंगे। संगठन बहुत बड़ा है। एक की खुशी से दूसरे का कुछ बिगड़ता नहीं हो फिर भी दूसरा व्यक्ति नाखुश हो सकता है। यहाँ यह समझना चाहिये कि प्रत्येक कर्मचारी दूसरे से भिन्न होता है। वह अन्यों से अलग होता है। उसका व्यक्तित्व, परिवेश, खान पान, पूजा पद्धति आदि भी भिन्न होते हैं। अत: जो निर्णय एक समूह को अच्छा लगे वो दूसरों को भी श्रेयस्कर लगे, यह आवश्यक नहीं है।
प्रयास अवश्य करें कि निर्णय में सभी कर्मचारियों का हित संपादित हो जाये। यदि ऐसा न हो सके तो संगठन को वरीयता देवें। यहां मन्त्र ये है कि अपना कर्तव्य करते चलें। लोकप्रिय निर्णयों की प्रतियोगिता में फंस जाने पर आप अपना और संस्थान का सर्वनाश कर लेंगे। याद रखें कि सभी खुश नहीं हो सकते हैं। यही कॉर्पोरेट मैनेजमेंट का सच है।

DNR Reporter

DNR desk

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