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'प्रत्येक वस्तु महत्वपूर्ण

 

एक बड़े वट वृक्ष पर तुरई की बेल चढऩे लगी। वृक्ष बड़ा अहंकारी था। वृक्ष ने सोचा कि इतने सबल, उच्च और विराट वृक्ष पर बेल का क्या काम? अत: वो बेल को अत्यंत ही तुच्छ समझने लगा। वृक्ष ने बेल को तुच्छ और निर्बल बताकर उसे भला बुरा भी कहा। बेल ने कोई जवाब नहीं दिया। एक दिन कुछ व्यक्ति पेड़ के निकट पहुंचे। उन व्यक्तियों ने वार्तालाप करते हुए यह तय किया कि वृक्ष को काट दिया जाये। वृक्ष को काटना इसलिए आवश्यक था क्योंकि उस वृक्ष के फल बड़े कड़वे थे तथा मनुष्य के लिये अच्छे नहीं थे। जब तुरई के बेल ने ये सूना कि वृक्ष कटने को है तो उसने तुरंत ही कहा कि ये वृक्ष उसका सहारा है अत: इसे ने काटा जाये। बेल ने कहा कि वृक्ष के फल भले ही कड़वे हों लेकिन तुरई तो मीठी है अत: वृक्ष न काटा जाये। लोगों ने बात मान ली। वृक्ष लज्जित हुआ। वृक्ष जिसे निकृष्ट समझता था उसी बेल ने वृक्ष के प्राण बचाये। वृक्ष समझ गया कि असली जीवन सभी के सम्मान को बनाये रखने में है।
इस कथा से स्पष्ट है कि है कोई भी व्यक्ति तुच्छ नहीं होता। प्रत्येक का अपना अलग महत्व होता है। किसी को कमजोर, नाकारा या बेकार समझना मानसिक दरिद्रता का प्रतीक है। आप नहीं जानते हैं कि कब, कहां आपको किस व्यक्ति से क्या काम पड़ सकता है? अत: किसी भी व्यक्ति के लिये तिरस्कार या घृणा का भाव न रखें। यही जीवन जीने का श्रेष्ठ तरीका है। भारतीय समाज किसी को भी तुच्छ नहीं मानताण् भारतीय दर्शन तो कहता है कि जो ब्रह्म भाव या ईश्वरतत्व का अंश मेरे पास है वही तुम्हारे पास भी है। यदि दोनों मनुष्यों में एक ही ईश्वर निवास करता है तो भेदभाव कैसा? शक्ति, पैसा, रूतबा आदि के बल पर समाज को बांटना मूर्खता है। प्रतिपल यह याद रखना चाहिये कि इस संसार में उपस्थित प्रत्येक सजीव या निर्जीव वस्तु का अपना महत्व है। ईश्वर किसी की भी रचना व्यर्थ में नहीं करता। ऐसा भाव लेकर समाज में जीना चाहिये। सभी को समान और समतुल्य मानने का भाव ही संतोष और आनंद को जन्म देता है। यही सफल सेल्फ मैनेजमेंट का मर्म है।

DNR Reporter

DNR desk

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