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'सभी आपस में जुड़े हैं'

एक दीपक जल रहा था। वायु के वेग से लौ फडफ़ड़ा रही थी। इसे देख अहंकारवश घी बोल पड़ा कि दीपक का वजूद तो घी से है क्योंकि उसके बिना लौ जल ही नहीं सकती। यह सुनते ही दीपक बोला कि उसी ने घी को आश्रय दिया है अत: उसके बिना सब व्यर्थ है। इसी प्रकार लौ ने कहा कि जलती तो वो ही है अत: उसी का योगदान सर्वश्रेष्ठ है। तभी हवा का तेज झोंका आया और लौ बुझ गई। लौ के बुझने से अन्धेरा हो गया। तभी अंधेरे के कारण गलती से एक राहगीर का पैर दीपक पर पड़ा और दीपक चकनाचूर हो गया। अब इस प्रसंग को ऑफिस मैनेजमेंट से जोड़ के देखिये। यह प्रसंग कुछ मैनेजमेंट के तत्त्व समझाता है -
- सभी कर्मचारी एक दूसरे पर निर्भर हैं। कुछ लोगों पर ज़्यादा निर्भरता है तो कुछ पर कम लेकिन निर्भरता सभी पर है। यहाँ यह समझना अत्यावश्यक है कि सभी एक दूजे के सहयोग से ही संस्थान को चलाते हैं।
- यदि किसी भी कर्मचारी को यह अहंकार हो जाये कि संस्थान तो उसी के दम पर चल रहा है तो यह सोच गलत है। प्रत्येक कर्मचारी अपनी एक अलग पहचान रखता है। इस पहचान को सदा अन्यों के समक्ष रेखांकित करना कदापि न भूलें।
- पहचान बोध अर्थात स्वयं को उपयोगी मानने का भाव तो उत्कृष्ट है लेकिन अहंकार के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये।
- हम सभी समाज में आपस में जुड़े हुए हैं। हम ये नहीं कह सकते कि कौन बड़ा है और कौन छोटा। प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपना स्था रखता है। कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता। यह समझना ही वास्तव में व्यक्त्तित्व का विकास है। यह कदापि न सोचें कि दूसरा व्यक्ति आपके कारण जी रहा है या उसका वजूद आपसे है। आपको सदा यह सोचना चाहिए कि अन्यों के कारण ही आपका वजूद है। एकाकी एप्रोच के स्थान पर टीम एप्रोच का होना ही प्रशासन में सफलता दिलाता है। यही मैनेजमेंट का उसूल है।

DNR Reporter

DNR desk

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