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'चेन्ज योरसेल्फ'

सड़क पर चलते समय कोई हमारे सामने थूक दे, बिना वजह होर्न बजाये, या ट्रेन-बस में बैठा यात्री सिगरेट पिए और गन्दगी करे तो यकायक हमारा खून गर्म हो जाता है और हृदय में दर्द होने लगता है। बहुत गुस्सा आता है? मन में आता है कि क्या ये लोग आदमी कहलाने लायक हैं? ऐसी बातों पर नाराजगी न जतायें। यही शपथ लेते जायें कि आप तो ऐसा कदापि नहीं करेंगे। जरा सोचिये कि -
* क्या आप समाज को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर सकते हैं?
* क्या आप प्रत्येक व्यक्ति को नैतिकता का पाठ पड़ा सकते हैं?
* क्या आपको लगता है कि सिविक सेन्स का प्रशिक्षण दिया जा सकता है?
* क्या आपको लगता है कि आप एक ही दिन में राष्ट्र को स्वच्छ, समृद्ध और शक्तिशाली बना देंगे?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर ना है। परिवर्तन होने में सदियों लग जाती हैं। परिवर्तन करने का सबसे अच्छा उपाय है स्वयं को बदलना। दूसरे व्यक्ति बदलेंगे, बॉस बदलेगा, संसार बदलेगा ये सभी निर्मूल अवधारणाएं मात्र हैं। कोई नहीं बदलेगा। सिर्फ हम बदलेंगे। अत: समाज को अच्छी दिशा में परिवर्तन करने का मूल मन्त्र है - 'चेंज योरसेल्फ'। स्वयं को बदलना श्रेष्ठता की दिशा में पहला कदम है। एक अकेले की शक्ति भी बहुत होती है। स्वाधीनता संग्राम के नायक सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, बिरसा मुंडा, मंगल पांडे ने अकेले ही क्रांति का अलख जगाया थाण् अत: आज से 'सेल्फ चेंज या सेल्फ ट्रांस्फोर्मेशन' की शपथ लेवें। बड़े-बड़े व्रत न लेवें। उन्हें निभाना मुश्किल है। अणुव्रत अर्थात छोटे-छोटे व्रत लेवें। उन्हें निभावें। इससे अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी। छोटे व्रत जैसे पब्लिक प्लेस पर गंदगी नहीं फैलाना, कचरा डस्टबिन में ही डालना, मूल्यों का त्याग न करना आदि।
इसी का एक जीता जागता उदाहरण बीकानेर शहर के पुष्करणा वेलफेयर बोर्ड ने दिया। एक विवाह समारोह में उन्होंने काउन्टर लगाकर लिखा कि जूठन छोडऩा बहुत गलत है। यदि जूठा छूट भी जाये तो उस मिठाई को उन्हें काउन्टर पर सौंप देवें ताकि उसे भी किसी उपयोग में लिया जा सके। इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों ने जूठन नहीं छोड़ी। पूर्व में जहां कई किलोग्राम भोजन का नाश होता था, पुष्करणा वेलफेयर बोर्ड के इस छोटे से प्रयास का परिणाम ये हुआ कि दो किलोग्राम जितनी जूठन भी नहीं बची। यही है परिवर्तन का मार्ग। इसी को सेल्फ चेंज कह सकते हैं।
यहां मन्त्र यही है कि हम स्वयं अपने कर्तव्य को श्रेष्ठ ढंग सेए ईमानदारी से निभाएं और दूसरों के बदलने की आस किये बिना नित्य प्रति अपना कार्य-व्यवहार सुधारें तो संगठन और समाज अवश्य ही बदलेगाय यही प्रबंध का मर्म है।

DNR Reporter

DNR desk

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