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'जीना सिखाते हैं श्रीराम' Featured

सत्य और धर्म के पथ पर दृढ़ रहने वाले, नैतिकता की परिसीमा भगवान श्री राम ही सच्चे अर्थों में मनुष्यों को जीवन जीना सिखाते हैं। स्वधर्म पालन कर्ता श्री राम को जब महर्षि जवाली ने काफी समय तक समझाया कि एक महिला के कह देने से और पिता की भावुकता के चलते चौदह वर्ष तक गृह त्याग तर्कसंगत नहीं है। इस पर श्री राम ने अपने स्वधर्म को नहीं छोड़ा। श्री राम ने कहा कि प्रतिष्ठित पुरुष के लिए अपयश की प्राप्ति करोड़ों मृत्यु के समान संताप देने वाली होती है और वे अपने किसी कृत्य से अपने पिता और राज्य को अपयश नहीं देना चाहते। भगवान श्री राम ने अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम धर्म माता पिता की आज्ञा पालन है और उससे पीछे हटना अधर्म है। उन्होंने वन में उनके पीछे आये आर्य सुमंत, भाई भरत और अयोध्या वासियों को भी यही सन्देश दिया। 

भगवान श्री राम नैतिकता और समर्पण की ही नहीं अपितु प्रेरणा प्रदान करने की भी परिसीमा है। खेलों में हर बार अपने सबसे प्रिय भ्राता भरत को विजेता बना देने के गुण ने उनके सभी भाइयों में प्रेम और उत्साह का संचार किया। इसी गुण को मोटिवेशन गुरु का लक्षण कहते हैं। छोटों को खेल में जिताने से उन छोटे भ्राताओं में श्रद्धा बोध बढ़ता है। श्रीराम से हमें प्रशंसा करने की कला सीखनी चाहिये। आजकल मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में हमें संकोच होता है। यह उचित नहीं है। भगवान श्री राम अपने भाइयों की, राज्य कर्मचारियों की और यहाँ तक कि अपने शत्रु की वीरता की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने में समर्थ थे। श्रीराम द्वारा मेघनाद, कुम्भकर्ण और राक्षसराज खर के वीर पुत्र मकराक्ष की प्रशंसा करना उनके विराट व्यक्तित्व को दर्शाता है। वर्तमान में हम ऐसा करने से हिचकते हैं क्योंकि हमें असुरक्षा का भय सताता रहता है।
विनम्रता की प्रतिमूर्ति और अहंकार से शून्य व्यवहार श्रीराम का मूल लक्षण है। शिव धनुष के टूटने पर उन्होंने अपनी विनम्रता को बनाये रखा। महर्षि परशुराम के समक्ष उनकी विनम्रता एक महान उदाहरण है। समुद्र द्वारा रास्ता ना देने पर तीन दिवस तक विनम्र निवेदन करना उनके पर्यावरण से प्रेम, उसके संरक्षण और संवर्धन की महत्ता को दिखाता है। शबरी के झूठे बेर खाना सिद्ध करता है कि नि:स्वार्थ भाव से की गई भक्ति से बढ़कर कुछ नहीं। सामजिक समरसता के प्रणेता श्री राम ने शबरी के झूठे बेर ग्रहण कर यह सिद्ध किया कि सभी मनुष्य बराबर हैं और जातियों आदि का कोई महत्व नहीं है। अहिल्या उद्धार उनके अहंकार शून्य शुद्ध सात्विक प्रेम को दर्शाता है। यही तो जीवन प्रबंध है। यही सत्य, धर्म, प्रेम, दया और नैतिकता के गुण वर्तमान समय की आवश्यकता हैं।

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