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'लोग तो कहेंगे ही' Featured

एक मूर्तिकार ने दो एक जैसी मूर्तियाँ बनाई। एक मूर्ति को उसने छिपाकर रख दिया। दूसरी मूर्ति को उसने प्रदर्शनी में सजाया और उसके नीचे लिखा कि इस मूर्ति में कमियाँ बताई जावें। अनेकानेक लोगों ने मूर्ति को देखा और अपनी टिप्पणी दी। मूर्तिकार ने प्रत्येक व्यक्ति ने जो कहा उसके हिसाब से मूर्ति में परिवर्तन कर दिया। सभी खुश थे। अब सौ से ज़्यादा परिवर्तन मूर्ति में हो चुके थे। मूर्ति का मूल स्वरुप नष्ट हो गया था। अब उस मूर्तिकार ने दूसरी छिपाई गई मूर्ति को इस मूर्ति के पास रखकर पूछा कि कौनसी मूर्ति श्रेष्ठ है। सभी ने छिपाई हुई मूर्ति को श्रेष्ठ बताया। 

इस कथा से यह तो स्पष्ट हो गया है कि:
- सभी को खुश रखना नामुमकिन कायज़् है।
- लोग क्या कहेंगे - ऐसा सोचना बेकार है। लोग तो टीका - टिप्पणी करेंगे ही। इसकी अत्यधिक परवाह न करें।
- यदि हम प्रत्येक कार्य को लोगों की टिप्पणी के अनुसार करेंगे तो वह कार्य बहुत ही बुरे तरीके से संपादित होगा, जैसा मूर्तिं के साथ हुआ।
यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि हम लोगों की कही गई वृथा टिप्पणियों को इतना महत्त्व क्यों देते हैं? लोगों का काम ही टिप्पणी करना है। यहाँ हमें स्वविवेक से निर्णय करना चाहिये। 'सुनिये सब की, करिये मन कीÓ का सिद्धान्त यहाँ पर अपनाया जाना मुफीद है।
इस स्थिति को हमें वतज़्मान विद्यार्थियों से जोडऩा चाहिये। विद्यार्थियों को हर व्यक्ति सलाह देता है कि उन्हें श्रेष्ठ करियर हेतु क्या करना चाहिये।यहाँ विद्यार्थी मूर्ति के भूमिका में है और समाज टिप्पणीकार के रूप में। विद्याथीज़् इतने ज़्यादा विकल्प सुन चुका होता है कि उसे यह समझ ही नहीं आता कि उसके लिये श्रेष्ठ विकल्प क्या होगा? यहीं से उनमें तनाव उपजता जाता है। ऐसी स्थिति में स्वयं की बुद्धि, विवेक और विश्लेष्ण के आधार पर निणर्य करना चाहिये। माता - पिता को चाहिये कि वे अपने बालक से वृहद् चर्चा करे, उसके व्यवहार का आकलन करे और उसके बाद निर्णय करें। सुनी - सुनाई बातों के आधार पर, किसी के भी कह देने के आधार पर निणज़्य करना घातक हो सकता है। विद्यार्थी के दिलचस्पी के क्षेत्र में उसका हौसला बढायें। अन्यों से तुलना न करें।
जऱा सोचिये कि यदि बच्चों ने आपकी तुलना अन्य माता - से करना प्रारंभ कर दिया तो क्या होगा? यहाँ मन्त्र यही है कि जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, आत्मावलोकन के बिना, औरों के कहे जाने से प्रेरित निणज़्य सदा ही दु:ख देता है। अत: तसल्ली से स्वयं के आधार पर
निर्णय लेवें। लोग तो कहेंगे ही, कहते रहेंगे ही अत: उनकी ज़्यादा परवाह न करें। यही सेल्फ मैनेजमेंट है।

DNR Reporter

DNR desk

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