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'प्रदर्शन या वास्तविक कार्य?'

एक आश्रम में दो विद्यार्थियों ने अनेक विद्याएं सीखीं। एक दिन पूजन के समय एक शिष्य को चमत्कार करने की सूझी। उसने मन्त्र जपा और उसकी चटाई पानी पर तैरने लगी। उसने अपनी विद्या का अहंकारपूर्वक प्रदर्शन करते हुए कहा कि आज पूजा इस चटाई पर खड़े होकर करेंगे क्योंकि वो चटाई अब नौका बन चुकी है। दूसरे शिष्य के अहंकार पर चोट पहुंची। वह भी स्वयं को बड़ा विद्वान मानता था। उसने मन्त्र जपकर अपनी चटाई को हवा में उड़ाया और उसे विमान का रूप दे दिया। उसने कहा कि आज पूजा चटाई रूपी विमान में बैठकर करेंगे। दोनों के इस अहंकारपूर्ण रवैये को देखकर उस गुरुकुल के गुरूजी ने दोनों को डांटा। गुरूजी ने कहा कि विद्या का वास्तविक उद्देश्य उसका वृथा प्रदर्शन या अहंकार के साथ किया गया चमत्कार नहीं हो सकता। अत: वे दोनों भविष्य में ऐसा न करें। यदि वे चमत्कार करना ही चाहते हैं तो समाज हेतु वास्तविक कार्य करें तथा पीडि़त जनों के दु:ख दूर करने हेतु चमत्कार करें। 

जो आडम्बर, अहंकार, शक्ति प्रदर्शन इन दोनों साधुओं ने किया वह वाकई गलत है। हमारे जीवन का मूल उद्देश्य समाज को यह दिखाना नहीं है कि हम कितने ताकतवर या शक्तिसंपन्न या गुणों से युक्त हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य यह होना चाहिये कि हम अपनी शक्तियों और सामथ्र्य से समाज के लिये कुछ उपयोगी कार्य करें और समाज का उत्थान करें।
जरा सोचिये कि इस शक्ति प्रदर्शन से क्या हासिल हुआ? क्या इससे किसी नई समाजोपयोगी तकनीक का जन्म हुआ? क्या समाज और राष्ट्र को इन दोनों के अहंकार से और प्रदर्शन से कुछ हासिल हुआ? क्या इन्होने प्रदर्शन करके विद्या के वास्तविक उद्देश्य को नहीं झुठला दिया?
विद्या का वास्तविक उद्देश्य चमत्कार करना, शेखी बघारना या प्रदर्शन करना नहीं है। विद्या का वास्तविक उद्देश्य जनमानस की सेवा और राष्ट्र की रक्षार्थ समर्पण करने के भाव की जागृति है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या ईश्वर आडम्बर से, प्रदर्शन से या शेखी बघारने की प्रवृत्ति से खुश होता है? शायद ऐसा नहीं है। भारतीय शास्त्र तो 'कामये दु:ख तप्नानाम, प्राणिनाम आर्तिनाशनमÓ के सिद्धांत को मानता है जिसके अनुसार मनुष्य जीवन का लक्ष्य है दु:ख से पीडि़त जनों की सेवा। ऐसे आडम्बरों से भय फैलता है। चमत्कार करना भी हो तो किसी व्यक्ति या समाज के सुधार हेतु करना चाहिये, अहंकार की पूर्ति के लिए नहीं। अत: यहां मन्त्र यही है कि आडम्बर, अहंकार, और प्रदर्शन से मुक्त रहकर ही हम मानवमात्र की सेवा करें। वास्तविक ठोस कार्यों को, धरातल के कार्यों को अंजाम दें। यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिये।

DNR Reporter

DNR desk

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