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'क्यों धन संचय?'

एक सेठ ने साधु को अपना बंगला, संसाधन और एक तहखाने में जमा किया हुआ खजाना दिखाया। सेठ ने साधु के समक्ष अहंकार के साथ पूछा कि साधु को खजाना और उसके द्वारा एकत्र किये गये संसाधान कैसे लगे? साधु ने निर्लिप्त भाव से सेठ से पूछा कि वह इस खजाने से और संसाधनों से कितना कमा लेता है? सेठ ने कहा कि कमाना तो दूर, उलटा उसने चार चौकीदार इस खजाने और संसाधनों की रक्षार्थ नियुक्त कर रखे हैं। यह सुनकर साधु ने कहा कि उसके गांव में एक वृद्ध महिला है जिसके पास संसाधन के नाम पर सिर्फ एक चक्की है। वो चक्की से धान पीसने का काम करती है और अपना गुजारा चलाती है। वो भी अपना और बच्चों का पेट तो भर ही रही है। वो खजाना न होते हुए भी सेठ से कम चिंतित है और बहुत सुखी है। ऐसे में बुद्धिमान कौन हुआ? साधु ने कहा कि अगर खजाने और संसाधनों से कोई कमाई नहीं हो रही है तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल? क्या इस खजाने और संसाधनों को जरुरतमंदों को नहीं दे दिया जाना चाहिये? 

कथा सांकेतिक है। मूर्खतापूर्ण रूप से धन संचय की प्रवृत्ति पर चोट करती है। यह बात सत्य है कि हमने 'खजाने की रक्षाÓ को ही जीवन का मूल ध्येय मान लिया है। क्या संसाधनों का संवर्धन, उनका संरक्षण और उनकी बढ़ोतरी ही जीवन है? यदि यही जीवन है तो हमें कई अपराधियों, कुख्यात चोरों को भी आदर के साथ याद करना चाहिये क्योंकि संसाधनों का भंडारण और संरक्षण तो उन्होंने भी किया था। क्या धन के भंडारण कर लेने के कारण आप और हम उन अपराधियों को सम्मान और आदर दे सकते हैं?
समस्या यह है कि हमारे मन में भविष्य को लेकर बहुत ही ज्यादा डर व्याप्त है। वर्तमान को सुखपूर्वक जीने के बजाय हम भविष्य हेतु संचयन में अधिक इच्छुक रहते हैं। क्या यह सही है? क्या अगले पल का कोई भरोसा है? जो है वह आज है। यदि हमारे द्वारा अर्जित संसाधनों से ही हमें कष्ट हो रहा हो तो ऐसे संसाधनों का क्या मोल है? हमने अपने जीवन में यह तय कर रखा है कि जो भी सर्वश्रेष्ठ वस्तु होगी उसे 'बाद मेंÓ या 'समय आने परÓ इस्तेमाल करेंगे। ऐसा इंतजार करने में ही जीवन समाप्त हो जाता है। यहां मन्त्र यही है कि संसाधनों के भंडारण के बजाय उसे समाजोपयोगी कार्यों में लगाना श्रेयस्कर है। धनगैला अर्थात पैसे के लिये पागल होना वाकई मूर्खता की पराकाष्ठा है। धनगैले बनने से बचें। यही जीवन प्रबंध है।

DNR Reporter

DNR desk

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