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'जीवन की यात्रा'

* अन्धकार से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले 

* हम अन्धकार से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वाले
* प्रकाश से प्रकाश की ओर यात्रा करने वाले
यहां हमें यह विचार करना है कि हमारी श्रेणी कौनसी है? अन्धकार का अर्थ है तामसिक, बेकार घटिया मनोवृत्तियां जहां सिर्फ दु:ख, विषाद, तुलना, क्लेश और समस्याएँ हों और हम उनका रस ले - लेकर विश्लेषण करते हों। यदि हमारी श्रेणी अन्धकार से वापिस अन्धकार में जाने वाली है तो इसका सीधा अर्थ है कि हमने समूचा जीवन व्यर्थ नष्ट कर दिया। हमने कुछ भी नया नहीं सीखा। हमारी शिक्षा ने हमें सिर्फ जीविका कमाना सिखाया है। ऐसी शिक्षा को श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
यदि हम अन्धकार से प्रकाश के ओर यात्रा कर रहे हैं तो इससे तात्पर्य है कि हम वैचारिक दरिद्रता और द्वेष के भाव को छोड़कर श्रेष्ठता की ओर यात्रा कर रहे हैं। इससे तात्पर्य है कि हम सिर्फ जीविकोपार्जन को ही नहीं अपितु राष्ट्र और समाज के हित को भी वरीयता देते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने का अर्थ है श्रेष्ठता से निम्नता की तरफ जाना। इससे तात्पर्य है कि अपनी विद्या का गलत इस्तेमाल करना। प्रकाश से प्रकाश की ओर की यात्रा का तात्पर्य है श्रेष्ठता को और निखारना तथा ईश्वरीय निकटता स्थापित करना।
इसे यदि कॉर्पोरेट सेक्टर से जोड़े तो हम यह पायेंगे कि अधिकतर कर्मचारी तो अन्धकार से प्रकाश की तरफ जाते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें और सीखना है अत: वे अपने हुनर, क्षमता, ज्ञान को बढाते हैं और इसमें इजाफा करते रहते हैं। कुछ निकृष्ट कार्मिक ऐसे भी होते हैं जो प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा प्रारम्भ कर देते हैं। उच्च शिक्षण के बाद प्राप्त नौकरी को करते हुए वे संगठन के प्रति निष्ठावान न होकर, परस्पर द्वेष और झगड़ों की राजनीति करते हैं। ऐसी अवस्था में उन्हें हम तामसिक कर्मचारी कहते हैं क्योंकि वे शिक्षण, हुनर, परिवार आदि में श्रेष्ठ थे लेकिन नौकरी में आकर अपना व्यक्तित्त्व खराब करते हैं। प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा करने वालों से अन्य कर्मचारी भयभीत रहते हैं। इनका मस्तिष्क बड़ा तेज होता है लेकिन वे अपना मस्तिष्क नकारात्मक दिशा में खर्च करते हैं। मैनेजमेंट में प्रकाश से अन्धकार की ओर यात्रा वर्जित है। कर्मचारियों का चयन तकनीकी योग्यता के माध्यम से होता है लेकिन उनका निष्कासन मानवीय गुणों की कमी के कारण होता है। हमें यह समझना चाहिये। यहां मन्त्र यही है कि अपनी विद्या का प्रयोग जनकल्याण, संगठन के कल्याण हेतु करें और सदा नया सीखने हेतु तत्पर रहें। यही वास्तविक मैनेजमेंट है।

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DNR desk

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