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'उम्र सिर्फ एक अंक'

्रएक पत्रकार ने किसी राजनेता का इंटरव्यू समाप्त करके कहा कि यह उसका अंतिम इंटरव्यू है क्योंकि वो पैंसठ साल का हो चुका है और रिटायर हो रहा है। यह सुनते ही राजनेता ने कहा कि वो भी पैंसठ साल का है और इस बार वो राजनीति के साथ-साथ समाजसेवा हेतु एक नया एनजीओ प्रारम्भ कर रहा है। उसने कहा कि उम्र का सीखने से कोई सम्बन्ध नहीं है। 

उदाहरण से यह स्पष्ट है कि उम्र सिर्फ एक अंक है। सीखने की, नया कर गुजरने की, समझने की कोई उम्र नहीं होती हैअ हमने मनोवैज्ञानिक रूप से हमारे प्रत्येक कार्य को उम्र से बांध दिया है। धार्मिक व आध्यात्मिक पुस्तकें पढऩे की उम्र है युवावस्था। हमने यह सोच रखा है कि इनका अध्ययन तो रिटायरमेंट के बाद ही श्रेयस्कर है। क्या इसे हम सही ठहरा सकते हैं? खेलकूद, व्यायाम आदि में हमारी कम दिलचस्पी का भी यही कारण है कि हमने यह मान लिया है कि खेलकूद तो सिर्फ बच्चे ही कर सकते हैं। इस जाल से निकलना होगा। यह स्वीकारना होगा कि उम्र सिर्फ एक अंक से ज्यादा कुछ नहीं है। बढ़ती उम्र नहीं अपितु मानसिक बुढापा घातक होता है जहां आप नया सीखने के लिये तत्पर नहीं होते हैं।
जरा सोचिये कि-
* श्री प्रभुपाद ने भी बहुत बड़ी उम्र में इस्कॉन सोसायटी को स्थापित किया था। उन्होंने अमरीका जाकर बड़ी उम्र में कई ग्रन्थ लिखे और लोगों को जागृत किया।
* एक असफल गरीब बालक था होर्लंड सेंडर्स। उसकी मां उसको और उसके भाई बहन को छोड़कर मजदूरी पर जाती। वह रोज खाना बनाता। सातवीं तक पड़ा, सेल्समेन बना, कई नौकरियां की, पत्राचार से कानून की डिग्री ली और उसके पश्चात ट्रक ड्राइवरों के लिए खाना पकाकर पहुंचाने लगा। उम्र हो चली परन्तु समर्पित भाव से लगा रहा। थोड़ी सी आय से सेंडर्स केफे खोला और डेढ़ सौ लोगों का रेस्तरां खोला जिसमे फ्राईड चिकन प्रमुख आइटम था। ग्यारह तरह के चिकन बनाए। केन्चुकी के गवर्नर ने उन्हें कर्नल की उपाधि दी। छियासठ साल की उम्र में समर्पण से जमे रहे सेंडर्स को भारी मुनाफा हुआ और देखते ही देखते विशिष्ट चिकन रेसिपी के कारण समूचे विश्व में दो सौ रेस्तरां केन्चुकी फ्राइड चिकन के खुल गए और कल का फटेहाल - तेहत्तर साल का सेंडर्स आज प्रति माह तीन लाख डॉलर कमाने लगा।
जरा सोचिये कि तेहत्तर साल तक किया गया श्रम क्या सिद्ध करता है। छियासठ साल की उम्र में नया उपक्रम लगाना क्या सिद्ध करता है? क्या उम्र किसी कार्य को करने में बाधक है? यही सोचना महत्वपूर्ण है।
यहां मन्त्र यही है कि उम्रदराज होकर कुछ नया करना गुनाह नहीं है। उम्रदराज होने के बाद यदि आपको सफलता मिलती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि पहले का जीवन बेकार गया। पहले का जीवन मानो उस पल की तैयारी करवा रहा था जो आप आज जी रहे हो। यही सेल्फ मैनेजमेंट है।

DNR Reporter

DNR desk

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