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'भक्ति की शक्ति'

मार्कंडेय की आयु सिर्फ सोलह साल थी. सोलहवें जन्मदिन की पूर्व संध्या पर मार्कंडेय ने शिव पूजा प्रारम्भ की. थोड़ी देर बाद यम प्रकट हुए और मार्कंडेय को साथ चलने को कहा. मार्कंडेय ने निवेदन किया कि उन्हें शिव पूजा के समाप्त होने के बाद ले जाया जाये. यमराज ने उन्हें कहा कि मृत्यु किसी का इंतजार नहीं कर सकती और उन्होंने अपना पाश फैंका. मार्कंडेय ने पूर्ण समर्पित भाव से भगवान शिव को पुकारा. भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने यम से कहा कि मार्कंडेय की भक्ति में शुद्ध समर्पण है अत: उन्हें यमलोक न ले जाया जाये. भगवान शिव उन्हें अपने साथ कैलाश ले गये. मार्कंडेय सदा शिवजी के साथ ही रहे. उनकी आयु सदा सोलह साल ही रही. उन्हें सदा के लिये जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिली. 

भक्ति और प्रार्थना में अपार शक्ति होती है. समर्पित भाव से, सम्पूर्ण सकारात्मक भाव के साथ की गई प्रार्थना में बहुत बल होता है. प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये कि कोई काम, कोई युक्ति काम नहीं आने वाली. सिर्फ प्रार्थना का ही सहारा है. भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवद गीता में भक्ति योग की शिक्षा देते हुए उसे भी ज्ञानयोग और कर्मयोग के समतुल्य ठहराया है. जरा सोचिये कि-
* जब आप ईश्वर से प्रार्थना कर रहे होते हैं तो आपका क्या भाव होता है-आभार जताने का या याचक का?
* क्या आपको नहीं लगता कि जितना जरूरी याचना करना, ईश्वर से मांगना है, उतना ही जरूरी उसका आभार जताना भी है?
* अपनी प्रार्थना में पिछली बार आपने ईश्वर का आभार कब जताया था? क्या आपको याद है?
प्रार्थना का अर्थ यह नहीं है कि हम स्वयं तो अकर्मण्य रहें और ईश्वर से इच्छाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते रहें. ईश्वर हमारी तब सुनता है जब हम पुरुषार्थ भी उच्च स्तर का करते हैं. यहां मन्त्र यही है कि जब आप ईश्वरीय सत्ता हेतु सम्पूर्ण समर्पण कर देते हैं , वहीं से आपका उत्थान प्रारम्भ हो जाता है. कहा गया है कि-
जब सौंप दिया है जीवन का
सब भार तुम्हारे हाथों में;
अब जीत तुम्हारे हाथों में
और हार तुम्हारे हाथों में.

DNR Reporter

DNR desk

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