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'धन की गतियाँ'

धन कमाना, संसाधनों का भंडारण करना बुरा नहीं है। धन जीवन की आवश्यकता है और सभी को चाहिये भी। सिर्फ धन कमाना और उसे खर्च करना ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। शास्त्रों में धन की तीन गतियां बताई गई हैं। दान, भोग और नाश। 

1. दान: धन का सर्वोत्कृष्ट उपयोग है अपनी आवश्यकतों के पूरे होने के बाद जो शेष बचे उसे समाज को दान में दे देना या समाज को वापिस लौटाना। यह भारतीय कांसेप्ट है जो उपनिषदों से उपजा है जिसके अनुसार आवश्यकता से अधिक का संग्रह अपराध है। इसी को अपरिग्रह भी कहते हैं जिसके अनुसार आवश्यकता से अधिक के संग्रह का अर्थ है दूसरे के हक को मारना।
2. भोग : धन की दूसरी गति भोग है। यहां से धन का दुरूपयोग प्रारम्भ होता है। हमारी वर्तमान मानसिकता यह हो चुकी है कि जो शरीर से काम लेवे या श्रम करे वो छोटा है और जो काम करवाये वो बड़ा है। यह घृणित सोच है। शारीरिक श्रम करना तो ईश्वरीय कार्य है। इसकी प्रशंसा होनी चाहिये लेकिन हम ऐसा नहीं करते। दूसरों से काम लेनाए स्वयं कम से कम शारीरिक श्रम करना और अन्यों को धन देकर उनसे अपने लिये श्रम करवाना भोग है। वृथा खर्च करनाए अनावश्यक सामान सिर्फ दिखावे के लिये खरीदना, भोग की निम्न अवस्था है। यहीं से आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता का जन्म होता है और व्यक्ति सर्वनाश की ओर यात्रा प्रारम्भ कर देता है।
3. नाश: धन की तीसरी गति है नाश। अनर्गल खर्च, विवाह या मृत्य पश्चात के भोज में दिखावा, जुआ, सट्टा, नशा, हर चीज पैसे से खरीद सकने का अहंकार आदि धन के नाश को इंगित करती हैं।
यहां मन्त्र यही है कि धन कमाना पुरुषार्थ है और अत्यावश्यक भी। समस्या है बुरे तरीके से कमाने या धन को व्यर्थ लुटाने की प्रवृत्ति में। धन का सदुपयोग करें। एक पैसा भी व्यर्थ न जाने देवें। यदि ज्यादा है तो समाज या जिन्हें आवश्यकता हो ऐसे संस्थानों को देवें। दान देवें। मन प्रसन्न रहेगा। यही जीवन है।

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