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'पर्यावरण संरक्षण और भारतीय चिंतन' Featured

यह 'गुरु मन्त्र' स्तम्भ का तीन सौवां (300 वां) लेख है। डॉ. गौरव बिस्सा के नियमित लेखनीय प्रयास के लिए दैनिक नेशनल राजस्थान परिवार उनका आभार व्यक्त करता है।

प्राचीन ग्रंथों में छिपे हैं पर्यावरण संरक्षण सिद्धांत-
घास का तिनका कैसे उगता है? एक सात वर्षीय बालक को इसका उत्तर देना विद्वानों के लिए भी मुश्किल है। एक घास के तिनके को उगाने के लिए पूरी सृष्टि अपना अतुलनीय योगदान देती है। मिट्टी या पृथ्वी में फूटा अंकुर, जल से सिंचित होकर सूर्य की रोशनी से परिपक्व होता अंकुर, प्राणवायु के सहयोग से आकाश की ओर बढ़ता है। समूचे पञ्च महाभूतों के योगदान से एक तिनका उगता है। इस एक तिनके को अनुपम ईश्वरीय कृति मानकर उसका संरक्षण करना ही हमारे राष्ट्र जीवन की परंपरा है। जब सभी देवताओं की अनुपम कृति एक पौधा है। उसका फल अर्थात अन्न का एक दाना ईश्वरीय अंश है, देव तुल्य है और यही हमारे देश की थाती है। ऋग्वेद में समूचे जगत और पर्यावरण के संतुलन का दायित्व मित्र, वरुण, इंद्र, मरुत और आदित्य आदि देवों का माना गया है।
पर्यावरण का प्रभावी संरक्षण और उसे कदापि हानि न पहुंचाने का सम्पूर्ण विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में समझाया गया है। ऋग्वेद का सन्देश है 'मित्रस्यहम चक्षुषा सर्वानि भूतानि समीक्षेÓ अर्थात हम प्रकृति की समूची कृतियों को मित्र की दृष्टि से देखें। ऋग्वेद में अश्विन से प्रार्थना में उनका आभार जताते हुए कहा गया है कि है कि हमें सूर्य की अत्यंत घातक हानिकारक किरणों तथा ताप से बचाने हेतु आपने जो संरक्षण प्रदान किया उसके हम ऋणी हैं। यह वर्तमान ओजोन परत के सिद्धांत से जुड़ता प्रतीत होता है। चारों वेदों में मनुष्यों द्वारा प्रकृति से की गयी छेड़छाड़ के कारण बिगड़ते ऋतु चक्र का वर्णन है।
अथर्व वेद के पृथ्वी सूक्त में 'माँ भूमि: पुत्रोहम पृथ्विया:Ó अर्थात मैं पृथ्वी माता का पुत्र हूं और समस्त वन और वनस्पति माता का उपहार है। पर्वतों के संरक्षण, जल के विवेकपूर्ण उपयोग, मृदा संरक्षण पर वेदों में प्रार्थनाएं हैं।
पंचवटी रखेगी सभी को नीरोग-
भगवान श्रीराम ने वनवास के चौदह वर्ष पूर्ण स्वस्थ और नीरोग रहते हुए बिताये। इसका मूल मन्त्र भी पर्यावरण के वैज्ञानिक सिद्धांतों की श्रेष्ठ क्रियान्विति थी। भगवान श्रीराम अपने चौदह वर्ष के वनवास में काफी समय पंचवटी में रहे। स्कन्द (स्कन्न) पुराण के हिमाद्रीय व्रत खंड के अनुसार पंचवटी अर्थात सुनिश्चित दूरी पर लगाए गए पांच वृक्षों का समूह है। पंचवटी का विशिष्ट वैज्ञानिक, औषधीय और पौराणिक महत्त्व है। पूर्व दिशा में पीपल, पश्चिम दिशा में बरगद, दक्षिण दिशा में आंवला, उत्तर दिशा में बेल और दक्षिण-पूर्व दिशा में अशोक के वृक्ष लगाने की वैज्ञानिक क्रिया ही पंचवटी है। सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोध के अनुसार-
* पीपल 1800 किलोग्राम ऑक्सीजन प्रति घंटे की दर से उत्सर्जन करता है।
* बरगद प्राकृतिक वातानुकूलन (एयर कंडिशनर) के रूप में कार्य करता है।
* विटामिन सी से भरपूर आंवला रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है।
* बेल पाचन तंत्र सुधारता है।
* अशोक वृक्ष महिलाओं को नीरोग रखता है।
प्राचीन इतिहास में पर्यावरण संरक्षण सन्देश : राजा परिवल्लाल की कथा
पर्यावरण प्रेम का सर्वोकृष्ट उदाहरण हमारे प्राचीन इतिहास में चोल राजा परिवल्लाल का है। राजा परिवल्लाल अपने कुशल नेतृत्व, पारदर्शिता और बेहतरीन निर्णय क्षमता हेतु विख्यात थे। एक दिन वन में अपने रथ को एक स्थान पर छोड़कर किसी सन्यासी से मिलने पहुंचे। वापस लौटने पर उन्होंने देखा कि दो छोटी लताएं (बेल) उनके रथ के पहिये से सर्पिलाकार आकार में जुड़ गई। रथ चलने से दोनों लताएं टूट जाती। राजा परिवल्लाल रथ वहीं छोड़कर, वहां से पैदल लौटे। उन्होंने सारथी से कहा कि वृक्ष, फूल और लताएं ईश्वर का अंश हैं, जीवन देने वाली संपत्ति हैं और इनका संरक्षण प्रत्येक राजा का कर्तव्य है। यह निर्णय सही है या नहीं; मूल बात ये नहीं है। मूल विषय राजा परिवल्लाल का पर्यावरण प्रेम, कर्तव्यपरायणता और संस्कार है जो हमें सोच की नई दिशा देता है। यह घटना हमारे राष्ट्र नायक की सोच और दूरदृष्टि को दर्शाती है।
सस्टेनेबल डेवलपमेंट : हमारे राष्ट्र जीवन की परम्परा
पर्यावरण संरक्षण के साथ सस्टेनेबल डेवलपमेंट (संपोषणीय विकास) की चर्चा वर्तमान में होती रही है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का उद्भव और विकास भारत में ही हुआ है। हमारे गौरवशाली देश ने कभी भी भोगवादी संस्कृति को श्रेष्ठ नहीं माना। 'तेन तक्तेन भुंजीथाÓ अर्थात प्रत्येक वस्तु का त्यागपूर्वक उपभोग करना हमारे देश की परंपरा है। 'जितना मुझे चाहिये, मैं प्रकृति से उतना ही लूं और शेष प्रकृति को लौटा दूंÓ। यह हमारी जीवन शैली है। वर्तमान भौतिक युग में उपभोक्तावाद की संस्कृति हावी है जो अत्यधिक मात्र में संग्रहण, अथाह धन के खर्च, आवश्यक ना होने पर भी खरीद और बिना बात ही पुरानी वस्तु को त्याग नई वस्तु खरीदने को प्रेरित करती है। ऐसा करने पर पुरानी वस्तुओं का कबाड़ इकठ्ठा होता जाता है, उनके निर्माण में लगा श्रम व्यर्थ जाता है और पर्यावरण को हानि होती है। हमारी वैदिक संस्कृति 'अपरिग्रहÓ अर्थात आवश्यकता से अधिक का संग्रह न करने और जितना प्राप्त हो, उससे ज्यादा लौटाने में विश्वास करती है। इसे समझिये। आपके पास एक मोबाइल है। ठीक चल रहा है। आपने विज्ञापनों के प्रभाव या स्टेटस सिम्बल के चलते उसे रखकर नया मोबाइल ले लिया। अब पुराने मोबाइल का क्या? उसे बनाने में, उसकी तकनीक विकसित करने में, हजारों लोगों का श्रम लगा था। आपने एक पल में ही इसे त्याग दिया। अब वो मोबाईल कबाड़ है। यह पाश्चात्य सभ्यता है। इसे छोडऩे की प्रेरणा भारतीय शास्त्र देता है।

वृक्षों से सीखें जीवन का मैनेजमेंट :
हमारे देश में तो सदैव वृक्षों से जीवन प्रबंध सीखने की बात कही गयी है। मनुष्यों को वृक्षों की मति अर्थात सीख लेने को कहा गया है।
* जितना बड़ा वृक्ष उतनी ज्यादा छाया अर्थात समाज में उच्च स्थान मिल जाने पर भी जगत कल्याण का भाव।
* वृक्ष सभी को सामान छाया देता है और लिंग, जाति, सम्प्रदाय से परे है। मनुष्य भी परोपकारी भाव से सभी का हित करे।
* वृक्ष पर जितने ज्यादा फल उतना ही नीचे की ओर झुकाव अर्थात अहंकार के भाव को त्यागना और समाज के अंतिम व्यक्ति का विकास।
* वृक्षों पर फलों के लिए मारे जाने वाले पत्थर का भी प्रेम से स्वागत कर मीठे फल देने की प्रकृति अर्थात निंदकों और आलोचकों का भी हित करने का भाव।
* वृक्षों द्वारा पतझड़ के बाद नए पत्तों का उगना अर्थात पुराने विचारों को त्यागकर नए और आधुनिक विचारों को जीवन में स्थान देना व रूढि़वादी नहीं होना।
यही तो चेंज मैनेजमेंट है। यही तो जीवन का मर्म है। वृक्षों से सीख ले लेवें तो हमारा जीवन सफल होना निश्चित है।
वेद , पुराण , उपनिषद, ज्ञानी जन कुछ भी कहें और भले ही हमारी परम्परा गौरवशाली हो; इतना ही काफी नहीं है। मूल प्रश्न है क्रियान्विति। जरा सोचिये कि :
* क्या मैं पर्यावरण संरक्षण मिशन का हिस्सा बनना चाहता हूँ?
* क्या मैं अपने आसपास के इलाके में वृक्षारोपण करूंगा और करवाऊंगा?
* क्या मैं प्रतिवर्ष अपने जन्मदिन, विवाह वर्षगाँठ पर पौधा लगाऊंगा और उपहार स्वरुप दूंगा?
* क्या मैं आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करके महात्मा गांधी के सिद्धांतों का वाहक बनूंगा?
यहाँ मन्त्र यही है कि यदि इन सभी पर हमारी सोच सकारात्मक है तो निश्चित रूप से हम प्रभावी संरक्षण कर अपनी आने वाली पीढिय़ों को सुन्दर पर्यावरण का तोहफा दे पायेंगे।

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