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'पति, पत्नी और क्रोध'

एक सिद्ध फकीर था। एक दिन फकीर से मिलने एक व्यक्ति पहुंचा। फकीर घर पर नहीं था। उस व्यक्ति ने जब फकीर की पत्नी से फकीर के बारे में पूछा तो पत्नी ने भड़ककर जवाब दिया कि उसका निखट्टू निकृष्ट पति तो जंगल में लकडियां काटने गया है। व्यक्ति को लगा कि इतने सिद्ध फकीर की पत्नी ऐसी कैसे है? वह व्यक्ति फकीर की तलाश में जंगल की ओर चल दिया। थोड़ी ही देर बाद उसे फकीर नजर आया लेकिन फकीर को देखकर वो व्यक्ति डर गया। फकीर के साथ-साथ एक चीता था जिस पर फकीर ने अपनी लकडिय़ों का ग_र लाद रखा था। व्यक्ति ने फकीर से कहा कि उसकी पत्नी तो उसे निकृष्ट कह रही थी और फकीर तो चमत्कारी है। ऐसा कैसे हुआ? फकीर बोला कि यदि वो अपनी पत्नी के क्रोध और दुव्र्यवहार का बोझ नहीं उठाये तो क्या यह चीता उसके सामान का बोझ उठाएगा? इसका भावार्थ यह है कि चीता इसलिए बोझ उठा रहा है क्योंकि फकीर ने क्रोध पर नियंत्रण कर रखा है। उसका भाव शुद्ध सात्विक निर्मल है। उसके मन में किसी के लिये द्वेष नहीं है। इसीलिए चीता उसका बोझ भी उठा रहा है। 

यही तो सुखी दाम्पत्य का अद्भुत सूत्र है। क्रोध पर नियंत्रण रखने मात्र से नब्बे फीसदी समस्याएं तो वैसे ही समाप्त हो जाती हैं। क्रोध आते ही विचार कीजिये कि यदि भावुकता में जबरदस्त प्रतिक्रिया दे दी जाये तो क्या कुछ फयदा होगा? शायद नहीं। सिर्फ नुकसान होगा। क्लेश बढेगा। छिद्रान्वेषण शुरू हो जायेगा और गलतियां निकालने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जायेगी। सुखी दाम्पत्य के लिये आवश्यक है कि :
* सहन करना सीखिये। उन बातों को सहन कीजिये जिन पर आपका नियंत्रण नहीं चल सकता। इसे अन्यथा न लेवें। इसका अर्थ सिद्धांतों से समझौता नहीं है। इसका अर्थ है कि जीवन साथी को हर पल एक कंट्रोलर की तरह कंट्रोल करने की प्रवृत्ति से छुटकारा। कुछ लिबर्टी देंवे अर्थात खुला भी छोड़ें। कुछ गलतियों को नजरअंदाज करना भी सीखें।
* रिश्ते बोझ नहीं हैं। उन्हें ढोने की नौबत न आ जाये। इसके लिये जरूरी है एक दूसरे को समझना, और विपरीत बातों और विचारों को भी अपनाने का प्रयास। असहमति होना आम बात है। असहमत अवश्य होवें। मतभेद भी होने देवें परन्तु असहमति इतनी ज्यादा न बढ़ावें कि ईष्र्या और युद्ध की नौबत आ जावे।
यहां मन्त्र यही है कि दाम्पत्य जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम एक दूसरे के विपरीत विचारों को भी समझें। डिसएग्री (असहमत) होने के लिये एग्री (सहमत) हो जाना और असहमति होने के बावजूद कलह न होने देना ही सुखद दाम्पत्य का प्राण सत्व है।

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