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'कार्यस्थल की आलोचना न करें'

मेरा का भाव होना, संगठन को अपना खुद का संगठन मानना ही अभिप्रेरणा या मोटिवेशन का मर्म है। जब आप यह महसूस करते हैं कि संगठन परिवार की तरह ही है तभी आप उसमे कुछ अच्छा योगदान दे पाते हैं। यह मेरा संगठन है और मैं इस संगठन का जिम्मेदार सदस्य हूं। भारतीय प्रबंध प्रणाली में इसे सर्वोत्कृष्ट मोटिवेशन माना जाता है। भारतीय प्रबंध प्रणाली में मोटिवेशन केवन आंतरिक होता है और यह अन्दर से बाहर की ओर यात्रा करता है। 

संगठन से जुड़ाव अत्यावश्यक है। अपनत्व की कमी के कारण वर्तमान कर्मचारी, संगठन के साथ जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता और डी - मोटिवेट होता जाता है। कर्मचारी अन्यजनों के समक्ष अपने संगठन की बुराई, अपने संगठन की समस्याओं के विषय में बड़े ही आनंद से चर्चा करता है।
जरा सोचिये-
* यदि आप आज अपने संगठन से टूट जायें या निकाल दिए जायें तो आपकी पहचान क्या होगी?
* संगठन को आपकी जरूरत है या आपको संगठन की?
* यदि आपका संगठन इतना ही नाकारा, घटिया और वाहियात है और आप सभी के सामने चटखारे लेकर उसकी बुराई कर रहे हो तो प्रश्न यह है कि आप जैसा श्रेष्ठ, सज्जन, कर्मठ, जीवट महामानव व्यक्ति इस घटिया संस्थान में क्या कर रहा है?
* क्या आप अपने माता पिता, परिवार और घर की आलोचना अन्यों के समक्ष करते हो? क्यों नहीं करते? क्योंकि आप यह जानते हो कि स्वयं के परिवार की आलोचना तो स्वयं की आलोचना है। तो यह बात अपने संस्थान के लिए लागू क्यों नहीं करते?
* जिस संस्थान से हमें समस्त सुख मिलते हैं, जिस संस्थान के कारण हमारी टेबल पर भोजन आता है, हमारे बच्चों की फीस भरी जाते है, हमारे स्नेहीजनो को चिकित्सा सुविधा प्राप्त होती है और हम उसी संस्थान को बुरा कहते हैं?
यहां मन्त्र यही है कि आपको पहचान, पैसा, और सामाजिक इज्जत देने वाला और कोई नहीं बल्कि आपका वही संगठन है जहां आप काम करते हैं। संगठन के हित को ही अपना हित मानें। यही कार्यालय प्रबंध का मर्म है।

DNR Reporter

DNR desk

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