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उस वक्त भी हुआ था मृत्यु भोज परम्परा का विरोध

बात उस समय की है जब पूर्व महाराजा सार्दुल सिंह की दादी व बीकानेर रियासत के पूर्व महाराज डूंगरहसिंह जी की पड़ी का निधन हुआ था और रिवाजानुसार उनके निधन पर मृत्युभोज 'तीन धडे का जीमण' रखा गया। राजा महाराजाओं सहित सेठ साहूकारों में अपने घरों में किसी बुजुर्ग का निधन होने पर उनकी तेंहरवीं में तीन धडे का भोज करने की परम्परा थी। तीन धड़ों में ब्राह्मण समाज के तीन बडे वर्गों के लोगों को मृत्युभोज खिलाया जाता और इस तरह हजारों लोग इस भोज में शामिल होते। इस अवसर पर एक बडी धनराशि खर्च हो जाती। तत्कालीन समाजवाद समर्थक युवक कांग्रेस के नेता मक्खन जोशी, भैंरूरतन रंगा व उनके साथियों ने समाज में फैली इस कुरीति का विरोध करने का निर्णय लिया और कहा कि ये धनवान लोगों का धन का प्रदर्शन है जो रूकना चाहिए। इनका मानना था कि यह धन जरूरतमंदों में बांटा जाय। इसके लिए उन्होंने एक अपील भी जारी की लेकिन वो बेअसर रही। सार्दुलसिंह ने तीन धडे का भोज करने का निर्णय ले लिया। इस देखकर मक्खन जोशी के नेतृत्व में इन नेताओं ने इस भोज का विरोध करने का निर्णय लिया। लेकिन मक्खन जोशी के पिता झमण सा जोशी भी अपने बेटे के इस विचार से सहमत नहीं थे। यह सब जानकार शहर में चर्चा हो गई कि अब देखते हैं कि बेटे के विरोध के कारण पिता क्या कदम उठाते हैं। इस तरह भोज का दिन आ गया और अपनी धुन के पक्के समाजवादी सोच के युवा नेता मक्खन जोशी अपने साथियों सहित इस भोज का विरोध करने के लिए भोज स्थल जूनागढ के बाहर पंडाल लगाकर बैठ गए और अनशन किया। उधर मक्खन जोशी के पिता इस भोज में भोजन लेने पहुंचे। इस तरह बेटा तो बाहर विरोध कर रहा है लेकिन पिता अंदर भोज ले रहा है। यह देखकर पूरे शहर में यह चर्चा हो गई कि बेटा तो भूखा रह गया लेकिन पिता खाना खाकर आ गया। शहर के लोग आज भी इस घटना को याद कर चर्चा करते हैं लेकिन इस विरोध का समाज पर गहरा प्रभाव पडा और वह तीन धडे का भोज इतिहास का अंतिम भोज ही रहा।

DNR Reporter

DNR desk

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