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रामानुजाचार्य : जिन्होंने अपनी सरलता से सबसे समरसता पूर्ण वैष्णव संप्रदाय की नींव डाली Featured

सन्दर्भ : रामानुजाचार्य जयंती 20/04/2018

‘सामाजिक समता की दिशा में तत्कालीन ब्राह्मण जहां तक जा सकता था, रामानुजाचार्य वहां तक जाकर रुके. उनके संप्रदाय ने लाखों शूद्रों और अंत्यजों को अपने मार्ग में लिया, उन्हें वैष्णव-विश्वास से युक्त किया और उनके आचरण धर्मानुकूल बनाए और साथ ही ब्राह्मणत्व के नियंत्रणों की अवहेलना भी नहीं की.’

2700 साल पुरानी एक शक्तिशाली धार्मिक रीति से सामाजिक समरसता बनाने के लिए एक अनूठा प्रयोग 17 अप्रेल को हैदराबाद में हुआ। श्रीरंगनाथ मंदिर के उत्सव में तेलंगाना मंदिर संरक्षण समिति के अध्यक्ष पण्डित सी.एस. रंगराजन ने कंधों पर बिठाकर एक दलित भक्त आदित्य को मंदिर में प्रवेश करवाया। ख़ास बात है कि इस दौरान पारम्परिक नाद-स्वर और वेद मन्त्रों का उच्चारण हुआ। हज़ारों लोग इस दुर्लभ दृश्य को देखने के लिए वहां थे। इस अनुष्ठान में व्यक्तिगत मनमानी नहीं है बल्कि यह वैष्णवों के सबसे पुराने रामानुज संप्रदाय की शास्त्रीय पद्धति से की जाने वाली 'मुनि वाहन सेवा' है। जिसका एक सुदीर्घ इतिहास है। इसका मूल आलवार संत-भक्त-कवियों की भक्ति संवेदना में है।आलवारों के द्रविड़ भाषा पद्यों का संकलन 'दिव्यप्रबंधम्' इसका उद्गम है। यह इतिहास मनुष्य की जन्मसत्ता के बजाय उसकी व्यक्तिसत्ता को प्रधानता देता है।


'मुनि वाहन सेवा' की कथा रोमांचित करती है। सांप्रदायिक तथ्यों के हिसाब से 'मुनि वाहन सेवा' परंपरा के निर्माता भगवान रंगनाथ स्वयं हैं। एक पुजारी ने दलित भक्त तिरुप्पन के मंदिर में न आने के लिए भेदभावपूर्ण व्यवहार किया। मंदिर के पट बंद कर दिए। बाद में जब पुजारियों ने मंदिर के पट खोलने चाहे तो मंदिर के भीतर से रंगनाथ भगवान की आवाज आई। भगवान रंगनाथ ने कहा कि पुजारी के व्यवहार से उन्हें बहुत दुख पहुँचा है। अतः मंदिर के दरवाजे तब तक बंद रहेंगे, जब तक वह पुजारी भक्त तिरुप्पन को अपने कंधे पर मंदिर में न ले आए। तब से यह सेवा चल पड़ी, नाम हुआ 'मुनि वाहन सेवा'।
वैष्णवों की इस उदार प्राचीनतम परंपरा की सुदृढ शास्त्रीय भित्ति के निर्माता हैं रामानुजाचार्य। अभी रामानुज का जन्म सहस्राब्दी वर्ष पूरा हुआ है। इनका जन्म सहस्राब्दी वर्ष कब शुरू हुआ, इसकी चर्चा न तो मीडिया में हुई और न ही राजनीति के गलियारों में। यह दु:खद आश्चर्य है कि भारतीय राजनीति के महासागर में चंद हंस ऐसे हैं, जो रामानुजाचार्य के महत्त्व को समझते हैं। रामानुज भारतीय परंपरा के मेरुदंड हैं। उनके बिना भारत के अमर इतिहास की चर्चा नहीं की जा सकती। उनका दार्शनिक चिंतन अपने-आप में एक संसार है, जिसका आधार समानता है.
रामानुजाचार्य का जन्म 1016 ईस्वी में तमिलनाडु के श्रीपेरुंबुदूर में हुआ। वे संस्कृत और तमिल परंपरा के मिलन बिंदु हैं। उन्होंने समाज में ऊंच-नीच और झोपड़ी-महल के बीच समानता के सेतु बनाए। कठोर धार्मिक क्रियाओं को लोगों के लिए सरल और सहज बनाया। ऐसा करते हुए वे अपने पूरे जीवन काल में तीन मोर्चों पर युद्धरत रहे। अपनी परंपरा और समसामयिक समस्याओं में सेतु बनाना पहला मोर्चा है। ब्रह्मसूत्रों पर ' श्रीभाष्य' लिखते वक्त वेदांत को जीवन की जटिलताओं से जोडऩा दूसरा और भक्ति को आम लोगों के लिए ईश्वर प्राप्ति का तरीका बनाना तीसरा मोर्चा है। इस तरह उनका पूरा जीवन युद्धरत दिखाई देता है, जिसका संकेत रामधारी सिंह 'दिनकर' ने अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में किया है। वे लिखते हैं कि ‘सामाजिक समता की दिशा में तत्कालीन ब्राह्मण जहां तक जा सकता था, आचार्य रामानुज वहां तक जाकर रुके। उनके संप्रदाय ने लाखों शूद्रों और अंत्यजों को अपने मार्ग में लिया, उन्हें वैष्णव-विश्वास से युक्त किया और उनके आचरण धर्मानुकूल बनाए और साथ ही ब्राह्मणत्व के नियंत्रणों की अवहेलना भी नहीं की।’
‘पद्मपुराण’ की मान्यता उन्हें भगवान विष्णु की शय्या 'शेष' का अवतार बताती है। इसका संकेत चार शताब्दी पहले भक्त चरित्र के सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा और गायक नाभादास ने ‘भक्तमाल’ में किया है। संत साहित्य के विद्वान ब्रजेन्द्र कुमार सिंघल ‘भक्तमाल’ की रचना 1600 ईस्वी के आसपास तथा रचना स्थल रैवासा (सीकर) तथा वृंदावन मानते हैं।नाभादास ने आचार्य रामानुज के लोकोत्तर व्यक्तित्व और अदम्य कृतित्व को सूत्रात्मक रूप से प्रकट करते हुए लिखा है-


सहस्र आस्य उपदेस करि जगत उद्धरण जतन कियो
गोपुर ह्वै आरूढ उच्च स्वर मन्त्र उचार्यो।
सूते नर परे जागि बहत्तरि श्रवणनि धार्यो॥
तितनेई गुरुदेव पधति भई न्यारी न्यारी।
कुरुतारक शिष्य प्रथम भक्ति वपु मंगलकारी॥
कृपणपाल करुणा समुद्र रामानुज सम नहीं बियो।
सहस्र आस्य उपदेस करि जगत उद्धरण जतन कियो॥


यह सांप्रदायिक इतिहास है कि रामानुज के प्राचार्य (गुरु के गुरु) उस समय भक्ति के सबसे बड़े आचार्य थे। उनका नाम यामुन मुनि है, जिनके पांच प्रमुख शिष्य थे। यामुनाचार्य आलवंदार स्तोत्र तथा सिद्धित्रय ग्रंथों के लेखक हैं।रामानुज को उनके पांच शिष्यों से भिन्न-भिन्न तत्त्वों का ज्ञान मिला। रामानुज के दीक्षा गुरु महापूर्णाचार्य थे।
हालांकि आचार्य रामानुज से पहले उनके परमगुरु यामुनाचार्य ने शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत का खंडन कर जीव की स्वतंत्र सत्ता का प्रतिपादन कर भक्ति मत को शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार स्थापित कर दिया था। परंतु वेद और उपनिषदों पर आधारित ‘श्रीभाष्य’ (ब्रह्मसूत्र भाष्य) लिखकर रामानुज ने ही पहले-पहल भक्ति को मोक्ष के साधन के रूप में स्थापित किया। भक्ति की वेद-प्रतिपादकता और उसकी मोक्ष-कारणता को मजबूत शास्त्रीय तर्कों के साथ सिद्ध कर दिया। उनके भक्ति सिद्धांत ने मानव मात्र के लिए ईश्वर प्राप्ति के दरवाजे खोल दिए। उन्होंने भक्ति और शरणागति में जाति भेद, लिंग भेद और वर्ण भेद के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा। यह सब भी मात्र बौद्धिक तर्कों से नहीं, बल्कि सुदृढ शास्त्रीय आधार पर। उन्होंने यह घोषणा ही कर दी कि ‘कोई व्यक्ति इसलिए नीच या ऊंच नहीं हो सकता कि उसका जन्म किस कुल या जाति में हुआ है। उसकी श्रेष्ठता तो ईश्वर के बताए मार्ग पर चलकर उसे पा लेने से ही सिद्ध होती है। जिसके लिए सदाचरण बेहद जरूरी है।’
आचार्य रामानुज की सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक स्थापना वह है, जिसमें एकमात्र अद्वैत तत्त्व स्वीकारते हुए भी जगत को मिथ्या नहीं कहकर उसकी उपेक्षा नहीं की गई। जगत सत्य है, क्योंकि इसका निर्माण उन पंच महाभूतों से मिलकर हुआ है, जो श्री-भू-नीलानायक श्रीमन्नारायण के शरीर हैं। यह बात ‘बृहदारण्यकोपनिषद्’ ने कही है-यस्य जलं शरीरम्। यस्य वायु: शरीरम्। यस्याकाश: शरीरम्। परमात्मा नारायण इस संसार को सृष्टि अवस्था में स्थूल तथा प्रलयावस्था में सूक्ष्म रूप से सदा धारण करते हैं। वे सगुण ब्रह्म ‘शरीरी’ हैं। हमारा और उनका अंश-अंशी, शरीर-शरीरी, आधार-आधेय और जीव-ब्रह्म का संबंध है। यह संबंध सार्वकालिक होने के नाते सनातन है। इतना ही नहीं, हमारी आत्मा भी उन भगवान का शरीर है-यस्यात्मा शरीरम्। अत: वे परमात्मा हमारे धारक हैं। जीव और प्रकृति से सदा ‘विशिष्ट’ होने के नाते वह ‘अद्वैत’ तत्त्व ‘विशिष्ट+अद्वैत=विशिष्टाद्वैत’ तत्त्व कहलाता है। यह सिद्धांत रामानुज परंपरा का प्राण है।रामानुज संप्रदाय के अनुपम आचार्य श्रीवेदांतदेशिक ‘न्यायसिद्धाञ्जनम्’ के प्रारंभ में कहते हैं-एकमेव तत्त्वं तच्च ब्रह्मेति, अर्थात एक ही तत्त्व है, वह है ब्रह्म। वह ब्रह्म अपने शरीरभूत दो तत्त्वों से सदा विशिष्ट है। अत: वे सर्वेश्वरेश्वर एकमात्र ‘विशिष्टाद्वैत’ तत्त्व हैं।
आचार्य रामानुज ने वैदिक मान्यताओं के आधार पर स्थापित किया कि भगवान लक्ष्मीनारायण संसार के माता-पिता हैं। उनका प्रेम और कृपा पाना उनकी हरेक संतान का धर्म है। उन्होंने केवल शास्त्रीय बातें लिखी ही नहीं, बल्कि स्वयं उनका प्रयोग भी किया। दलित भक्त मारीनेरनंबी की उपासना को अनुकरणीय बताकर उन्हें अपने संप्रदाय में आदर्श के रूप में स्थापित किया। मुस्लिम कन्या तुलुक्क नाच्चियार की लोकोत्तर भक्ति के कारण उनके मंदिर का निर्माण करवाया, जहां आज भी उनकी पूजा होती है। यादवाद्रि के प्रसिद्ध संपत्कुमार मंदिर में दलितों का प्रवेश करवाया।
रामानुजाचार्य ने जहां से अपना भक्ति आंदोलन चलाया, वह तमिलनाडु का श्रीरंगम् है. यह नाम अपने आप में भक्ति उत्पन्न करता है। साफ है रामानुज की ‘भक्ति’ का तात्पर्य भगवान के गुणगान और नाम स्मरण से है। विद्वानों का मानना है कि रामानुज संप्रदाय के मठ-मंदिरों का फैलाव उत्तर और दक्षिण दोनों में था। आश्चर्य की बात है कि रामानुजाचार्य के उन विशाल मंदिरों में से अनेक लुप्त हो गए हैं। परंपरा दर्शाते इन मंदिरों में अब लोगों के घर हैं, दुकानें हैं। यदि इन्हें पुराने रूप में आबाद करना संभव हो सके तो ये सामाजिक समरसता के नए आंदोलन का रूप ले सकते हैं।कर्णाटक संस्कृत विश्वविद्यालय,बेंगलूरु के प्रो. वीरनारायण के. पांडुरंगी का कहना है कि महाभारत के बाद भारतीय समाज में हुआ बंटवारा बहुविध है। न केवल सामाजिक बल्कि शैक्षणिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर कहीं भी समन्वय नहीं दिखता है बुद्ध के अवतार के बाद अहिंसा सिद्धांत की प्रतिष्ठा हेतु जीवनोपयोगी हिंसा का भी विरोध होने लगा। मीमांसा व शांकर दर्शन ने मानवीय भावभूमि का तिरस्कार करके केवल कर्म तथा केवल ज्ञान के सिद्धांतों को प्रतिष्ठित किया। इसके बाद एक हजार साल पहले आचार्य रामानुज ने संपूर्ण भारतीय संस्कृतियों को जोडक़र वैदिक अद्वैत सिंद्धांत को यथावत रखते हुए जिस सर्वसमावेशी मार्ग का उपदेश किया है, वह नितांत अद्भुत तथा गंभीर है। जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के डॉ. उमेश नेपाल का मानना है कि भारत के इतिहास में सबसे अधिक प्रभावशाली संत रामानुजाचार्य हैं। इनका प्रभाव केवल बौद्धिक या आध्यात्मिक न होकर सामाजिक किंवा व्यक्तिगत भी है। समाज के हर चेतनावान प्राणी को दृष्टि देने का अभूतपूर्व जो कार्य आचार्य रामानुज ने किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। मानवीय भावना को लेकर आध्यात्मिक एवं सामाजिक समरसता को प्रतिष्ठित करने के लिए रामानुजाचार्य ने ही भक्ति को वैदिक सिद्धांतों के बीच गौरवपूर्ण रूप से स्थापित किया।
राजनीति के लोग हर व्यक्तित्व और उसके इतिहास का अपने हिसाब से उपयोग करते हैं। कुछ ही दिन हुए हैं जब मठ-मंदिरों के विरोध की राजनीति करने वाले एम. करुणानिधि ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से ठीक पहले रामानुजाचार्य को महान दलित हितकारी संत बताया था। इससे रामानुजाचार्य की स्वीकार्यता या अस्वीकार्यता पर कोई खास असर नहीं पड़ा। उन्हें परंपरागत रूप से मानने वाले उन्हें इस रूप में पहले से ही जानते हैं। यही कारण है कि आज पूरे देश में रामानुजाचार्य लोगों के कंठहार और उनके मठ-मंदिर श्रद्धा-वंदन के केंद्र बने हुए हैं। अच्छा भी रहे कि सरकार रामानुजाचार्य के सहस्राब्दी वर्ष के बहाने उनकी स्मृति को चिरंतन बनाने के लिए मजबूत काम करे, जिससे हमारी आने वाली पीढिय़ां भी उनके अमर कृतित्व की छाया में रह सके।
आचार्य रामानुज आज के साधु-संतों के लिए दर्पण भी हैं कि जो आज के दौर के परिवर्तन की दुहाई देकर संन्यास के बदले स्वरूप की पैरवी कर रहे हैं। सत्ता में अपनी जगह बनाने के लिए साधु भगवा चोले का भरपूर उपयोग कर रहे हैं।मठ-मंदिर और गद्दियाँ राजनैतिक पार्टियों से टिकट पाने के साधन बन रहे हैं। संन्यास समझौते में बदलता जा रहा है।यह सही है कि संसार के सभी क्षेत्रों में परिवर्तन हुए हैं। खान-पान बदला है। सामाजिक चिंतन बदला है। किंतु ऐसे परिवेश में भी संतत्व निखरा रह सकता है। संतों का काम बहुत व्यापक है। परंपरा में संत तत्व का विशद वर्णन है। योगदर्शन में लिखा है कि व्यक्ति पूर्णत: अहिंसक हो जाए, तो साक्षात विरोधी जीवों में भी अहिंसा की भावना आ जाती है। इसीलिए शाश्वत विरोध वाले बाघ और हिरण एक साथ संतों के आश्रमों में रहते थे, कोई किसी को परेशान नहीं करता था। प्रेम का वातावरण संत बनाते हैं। दुनिया की दूसरी व्यवस्थाओ में उतना दम नहीं है, जितना संतों की व्यवस्था में दम है। इसी व्यवस्था को आचार्य रामानुज ने ईश्वरीय भावना के अनुरूप ढालकर समाज के निर्माण में एक नए युग का सूत्रपात किया था।


-शास्त्री कोसलेन्द्रदास
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय
जयपुर

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