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कितने आसाराम? कितनी निर्भया? Featured

Anurag Harsh
पिछले कुछ दिनों से देश में दुष्कर्म को लेकर बड़ी खबरें आ रही है। मोदी सरकार में बने साहसिक कानून के तहत अब बारह साल तक की बालिका के साथ दुष्कर्म करने वाले को फांसी की सजा दी जाएगी। इस निर्णय के तुरंत बाद जोधपुर की अदालत ने खुद को संत कहने वाले आसाराम को बुधवार को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। 'आसाराम को सजाÓ देशभर की मीडिया के लिए बड़ी खबर है। हर चैनल का पत्रकार बकायदा दिल्ली से सफर करके जोधपुर की जेल तक पहुंचा, वहां से लाइव किया। अखबारों में भी बड़ी खबर यही छप रही है। इस खबर को महत्व इसलिए नहीं दिया जा रहा है कि दुष्कर्म करने वाले को सजा मिली है, बल्कि इसलिए ज्यादा 'प्रचारÓ मिल रहा है क्योंकि वो कभी 'संत आसारामÓ था। उसे पूरा देश जानता है, इसलिए खबर की 'टीआरपीÓ ज्यादा मिलने वाली है, वेबसाइट पर हिट्स ज्यादा आने वाले हैं, फेसबुक पर लाइक ज्यादा मिलने वाले हैं, अखबार की हैडिंग में 'करामातÓ दिखाने का अवसर ज्यादा मिलने वाला है। कहीं न कहीं सवाल सिलसिलेवार उठना चाहिए। पहला यह कि केंद्र सरकार ने बारह साल तक की बालिका के साथ दुष्कर्म करने वाले दरिंदे को ही फांसी की सजा देने का कानून क्यों बनाया? बारह साल से अधिक और चालीस-पचास साल तक की महिला के साथ दुष्कर्म करने वाले दरिंदों के खिलाफ फांसी से कम सजा की रियायत क्यों दी जा रही है। नि:संदेह मोदी सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है लेकिन उम्र का दायरा नहीं रखना चाहिए था। दुष्कर्म पीडि़ता बालिका बारह वर्ष की हो या फिर युवती तीस साल की हो, दोनों का दर्द समान होता है। किसी महिला के साथ ऐसा दुराचार किसी व्यक्ति की हत्या से भी ज्यादा दर्दनाक है। हत्या में एक बार मरना होता है और दुष्कर्म की पीडि़ता को हर पल मरना होता है। यह सोच पाना ही कितना दर्दनाक है कि दुष्कर्म पीडि़ता को खुद पर हुए अत्याचार को साबित करने के लिए लंबी लड़ाई लडऩी पड़ती है। जगह-जगह जांच करवानी होती है, हजार लोगों को जवाब देना होता है। जब तक आरोपी को अदालत दोषी नहीं मान लेती तब तक उसे ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। भले ही उसका कसूर कुछ भी ना हो। इसीलिए आरोपी के खिलाफ जांच में तेजी आनी चाहिए। उस वहशी को सजा ए मौत मिलनी चाहिए, जिसने इंसानियत को तार तार किया हो। राजस्थान सहित देशभर में ऐसे मामलों की फटाफट सुनवाई करने का दौर एक बारगी चला लेकिन फिर ठंडा हेा गया। नि:संदेह जल्दबाजी में किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए लेकिन दोषी को सजा देने में विलंब भी नहीं होना चाहिए।
एक बड़ा सवाल यह भी है कि कितने आसाराम है? आज ही जब आसाराम से जुड़ी खबरों के लिए प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की खबरों को टटोल रहा था तो आधा दर्जन खबरें मिली, जिसमें नाबालिग के साथ दुष्कर्म, छात्रा का शारीरिक शोषण, नई दिल्ली में नाबालिग सौतेली बेटी के साथ दुष्कर्म, झारखंड में आठ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म, ओडिशा में ५० साल की महिला के साथ दुष्कर्म की खबरें नजर आई। सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि क्या एक आसाराम को सजा देकर इन दरिंदों को सबक सिखाया जा सकता है? शायद नहीं। क्योंकि अगर सबक लेना ही होता तो 'निर्भयाÓ के मामले में फांसी की सजा देने के बाद देश में यह अपराध रुकना चाहिए था। आज देश में हजारों आसाराम है और लाखों निर्भया। ऐसे में परिवर्तन समाज में करना होगा, सुदृढ़ और चाक चौबंद व्यवस्था समाज में करनी होगी। ऐसे भेडिय़ों को पहचानना होगा और इनके खिलाफ जोर से बोलना होगा। सरकारों को सिर्फ कानून बनाकर इतिश्री नहीं करनी चाहिए, बल्कि सामाजिक स्तर पर बदलाव लाने के लिए प्रयार करने चाहिए। एक आसाराम के जेल में जाने से भय का माहौल तो बनेगा लेकिन बाहर बैठे हजारों 'आसारामÓ क्या अपनी विभत्स, कुंठित और आपराधिक सोच को छोड़ सकेंगे? इन मुद्दों पर काम करना होगा। 'बेटी बचाओ-बेटी बढ़ाओÓ का नारा देने मात्र से माहौल नहीं बदलेगा।

DNR Reporter

DNR desk

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